॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #647 · 25 अगस्त 2024

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

विशाल सिंह जी राधे राधे गुरुदेव राधे राधे गुरु आज्ञा ही जीवन है गुरु वाणी ही सत्य है गुरुदेव आपका सत्संग सुनकर हमारे हर प्रश्न का उत्तर प्राप्त हो जाता है मैं आपकी कृपा से प्रतिदिन आपका सत्संग प्रातकाल सुनता हूं उसी के प्रभाव से मुझे कुछ अनुभव हो रहा है जिसे आपके द्वारा किसी के सामने प्रकट करने के लिए मना किया गया है प्रभु निराकार है क्या उनको देखने के लिए आंखों की सुनने के लिए कानों की चलने के लिए पैरों की इत्यादि की जरूरत है ऐसी ही किसी चीज में

मुझे प्रभु का भाव बन रहा है साक्षात मुझे प्रभु नजर आने लगे हैं क्या यह भ्रम है या स आप पहली बात तो ये है कि प्रभु निराकार ही है ऐसा कैसे कह सकते हैं प्रभु निराकार भी है प्रभु काकार भी है प्रभु सत है असत से परे हैं और प्रभु ही असत में भरे हैं इस संसार को जिसे कहा गया असत्य ना यही सत्य सच्चिदानंद भगवान ही भगवान है भगवान के सिवा कुछ नहीं है मत्ता पर तरम नानत किंच दस्ती धनंजय जैसे कुहार है तो चाक अलग है मिट्टी अलग है फिर वो पात्र बनाता है भगवान ने ऐसे सृष्टि नहीं बनाई अपने आप से अपने आप को फैला दिया वही भगवान ही भगवान है दूसरा कुछ है नहीं तो यह हम नहीं कह सकते कि भगवान निराकार ही है नहीं भगवान साकार भी है और निराकार भी है और भगवान सत भी है भगवान असत भी है यह जो असत तुम देख रहे हो इसमें सत भगवान ही है जिसे तुम असत कह रहे हो वो भगवान ही है भगवान के सिवा कुछ नहीं है अब हमारा भाव कहां भगवान का लग जाता है प्रहलाद जी से पूछा खंभे में भगवान है उ कहा हां खंबे में है तो भगवान खंभे से नरसिंह रूप में

प्रकट हो गए हमारी जहां निष्ठा बन जाए गुरु भगवान गुरु में बन जाए तो गुरु भगवान दिखाई देने लगेंगे श्री विग्रह में भगवान दिखाई दे हमारा भाव बन जाए तो चर अचर में भगवान दिखाई देंगे जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में जानी वही साकार है वही निराकार है वही सगुण है वही निर्गुण है वही सबसे परे हैं वही सब में भरे क्यों सब में भरे हैं वासना वासुदेव स्य वासित भत्र सर्व भूत निवासम वासुदेव नमोस्तुते अच्छा जो अपने को अनुभव हो रहा है व हम दूसरे को बताए क्यों यह अहंकार

ही तो अंदर प्रेरित कर रहा है बताओ कि कुछ हम श्रेष्ठ है देखो हमारे पास आने का मतलब है आपका रेशन होना आपकी वह बात जो आपके भजन को ले डूबे उसको हटा देना आपको जितना अनुभव हो रहा है उससे करोड़ गुना बढ़ कर के संतोक अन हो चुका है अा उनको हम क्या बतावे और जब मां खवा रही है तो मां को क्या बताए कि तो संत सदगुरु देव तो पवार है उनको तो पता ही है कि आपको क्या मिला है आपको क्या भाव बना है तो बस शांत चुप गुप्त रहो भजन जितना गुप्त उतने ही अंदर बढ़ता है और जितना प्रकाशित उतने उड़ जाता है कपूर की तरह है कपूर को गुप्त रखो तो सुव्यवस्थित बना रहेगा और खुला रख दो तो उड़ जाएगा खुला मत करो ये जो आपको शीतलता मिली है भजन की जो अनुभव है किसी को भी उसे खुला मत करो बकाया अहंकार इतना प्रबल होता है कि वो छुपा नहीं सकता अ चा दीवाल से क कहेगा जरूर कि हमको ऐसा अनुभव होने लगा है मतलब थोड़ा अहम का जो रूप होता है ना वो बिना कहे नहीं रहेगा और जो अहम को मार दे वही बारबार कहता कहो कहो हमने यह दान पुण्य किया हमने यह भजन किया

हमको यह लाभ हमारी यह स्थिति है किसको बता रहे हो क्यों बता रहे हो तो बोले रहा नहीं जा रहा है उसी को सह जाओ तो भजन आगे बढ़ जाएगा ठीक है मंदिरों में जो दान दक्षण देते हैं और नाम अनाउंसमेंट करते हैं फलाने ने इतना दिया फलाने वो सब हा वो सब काम का नहीं काम का तो ऐसा है कि कोई जान ना पावे दान पुण्य जानते हो कैसे होता कोई जान ही नहीं पाया कि कुछ करके गया चुपचाप चला गया करके हा कहते हैं कि एक हाथ से दे दूसरा हाथ ला जाले ऐसा भी कहते हैं तो नेकी कर दरिया में डाल कोई जान ना पावे पर वो जो माइक को अलाउंस और दिखावा और वाह वाह जय जय तो हो गया उतने में हो गया हिसाब किताब वो भगवान की प्राप्ति वाला दान पुण्य नहीं है सस्ते में नहीं बट ग हां बहुत बहुत बहुत ही ये घाटे का सौदा है इतनी मेहनत करके अर्थ कमाया और आपने 100 लोगों को भोजन पवाया और इसके बाद पोस्टर छपवा दिए लोग पढ़ रहे हैं कि आज 100 ब्राह्मणों का भोजन 100 साधु का भोजन ये खत्म खत्म जो जो पढ़ रहे हैं सब खत्म आप पुण्य के हिस्सेदार हो गए किसी को मतलब

यहां तक कि अगर कोई पूछे कि आप करवा रहे हो क्या तो तुरंत उत्तर नहीं नहीं हम तो पत्तल परोस रहे हैं हम तो कोई जान ना पावे कि कौन करवा रहा है और चुपचाप गुप्त तो सब जमा हो गया भगवान की बैंक में और आपको कई गुना बढ़कर मिलेगा यदि कामना रखते हो और नहीं रखते हो तो वही आपकी भगवत प्राप्ति का हेत हो जाएगा पछ साने जगन्नाथ जी विदाई करवाई थी घर से तो वो तो फिर सबको पता लग ही जाएगा कि आपके घर से ज ऐसे भक्ति के प्रसंगों में हम चाहते जैसे हम नाम कीर्तन करें तो सबको

पता हो रहा है ना कि नाम कीर्तन हो रहा है हम प्रचार प्रसार नहीं करना चाहते हम अपने इष्ट का आराधन कर रहे हैं वो अंदर की बात होती है वो बात जैसे कि ₹1 अमुक ने दिया ऐसा ऐसा कार्य किया धर्म का भक्ति का उसका प्रचार हम करना चाहि वो अलग बात है अब हमारे घर में कीर्तन हो रहा हमारे घर में संत महात्मा आ रहे हैं उनका हम स्वागत कर रहे चार लोग जान रहे हैं इससे कोई हानि नहीं होनी क्योंकि हमारा प्रचार प्रसार कर थोड़े आकाश से थोड़ी गुप्त रूप से आ जाएंगे संत महात्मा भगवंत के जो उत्सव होते हैं घर में वो तो होते ही है उससे कोई हम उसको प्रचार प्रसार इस रूप में ना करें कि हम बड़े धर्मात्मा हम बड़े दानी हम बड़े पुण्यात्मा नहीं उसका वो सुकृत छीन हो जाएगा अभिषेक मितल जी राधे राधे महाराज जी राधे राधे महाराज जी भगवान भगवान श्री कृष्ण भगवत गीता के चौथे अध्याय के नौवे श्लोक में कहते हैं कि जो मेरे जन्म और कर्म को तत्व से जानता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता यहां महाराज जी भगवान को तत्व से जानने का क्या अर्थ है

भगवान के ही वचन है मेरा जन्म भी दिव्य है और मेरा कर्म भी दिव्य है जो भगवान को दिव्य जानता है व तो भगवान सर्वत्र व्याप्त है भगवान अजन्मा होते हुए भी अपने भक्तों के प्रेम के लिए जन्म धारण करते हैं विप्र देन सुर संत हित लीन मनुज अवतार लेकिन भगवान को यह देखना कि मनुष्य रूप में भी भगवान चिदानंद में देह तुम्हारी विगत विकार जान अधिकारी भगवान सच्चिदानंद रूपाय हैं भगवान विश्वो उत्पति आद हेत में हैं भगवान ताप करय विनाशाय व श्री कृष्णाय वयम नमा यह जो तत्व से जानता है कि भगवान त्रिगुणा त है भगवान कालातीत है भगवान दिव्य है भगवान अजन्मा है पर अजन्मा होते हुए भी अपने भक्तों के लिए जन्म की लीला करते हैं वो मां के गर्भ में नहीं रहते भय प्रकट कृपाला दीन दयाला भगवान प्रकट होते हैं और सामने पहले प्रकट हुए चतुर्भुज रूप से फिर माता पुनि बोली सो मति डोली तज ताते रूपा की जय सिस लीला अति प्रिय शीला सो सुख परम अनूपा तो सुनि वचन सुजाना रोधन ठाना होई बालक सुर भूपा ये चरित्र जगावे हरि पद पावे तेन परे भ कोपा भगवान

जो है बाल रूप धारण करते हैं माता जी की प्रार्थना पर वैसे भगवान दिव्य रूप से प्रकट हुए तो भगवान माता के गर्भ में में जाने वाले कोई मनुष्य नहीं है भगवान अजन्मा अद्वितीय का चिदानंद सच्चिदानंद वही अवतार लेकर दिव्य लीला और दिव्य कर्म करते हैं भगवान के कर्म दिव्य होते हैं मानुष कर्म थोड़ी होते हैं जैसे भगवान ने छठी के दिन पूतना का उद्धार किया कोई मार सकता था बड़े-बड़े देवता कांपते थे पूतना से तणाव बकासुर अघासुर गिरिराज गोवर्धन को उठाना काली देह के विष को अमृत कर देना कालिया का मर्दन करके रमण द्वीप भेजना भगवान की सब दिव्य लीला कर्म है ना भगवान कहते जो मुझे तत्व से जानता है तत्व से वही मेरे को जानता है और वह परम पद को प्राप्त होता है जो मुझे तत्व से जानता है वह परम पद का अधिकारी हो जाता है व भगवान को प्राप्त हो जाता है समझ पा रहे हो आप जैसे मराज जी हम कृष्ण के बारे में सुनते हैं उनका लीला श्रवण करते हैं सत्संग सुनते हैं तो हमने उनकी लीला समझ ली अभी नहीं समझी अभी तो अभी समझी नहीं सुनी है अभी सुनी

है जब समझने का ताप तब होता है जब कृष्णम मन कृष्णम बुद्धि कृष्णम चित्त और कृष्णम अहंकार अभी देह में अहंकार है अभी बुद्धि त्रिगुण के अंतर्गत है और लीला चरित्र सुनते सुनते जब त्रिगुणा त बुद्धि हो जाएगी और आपका अंतःकरण कृष्ण में हो जाएगा तब आप सोय जाने ज देव जनाए वो जनाए तब समझ पाओगे कृष्णम होकर कृष्ण की लीला में डूबा जाता है अभी तो कृष्ण में कहा अभी तो दे मैं हो अभी तो बुद्धि काम कर रही है अभी तो मन भी तो है ना उदो मन न भए द ब एक हु तो सो गयो श्याम पे अब लीला चरित्र दर्शाए अब लीला चरित्र समझ में आएगा अभी तो मन है ना बुद्धि है ना चित्त है ना आम है अभी तो आप सुन रहे हैं अभी आप सुन रहे हैं अभी तो मनन भी पूरा नहीं हो रहा है जब मनन और श्रवण करते करते तदा का स्थिति हो जाए तदा का मन कृष्ण बुद्धि कृष्ण चित्त कृष्ण अहम कृष्ण अब वो कृष्ण बन कर के कृष्ण की लीला में प्रवेश पाता है कृष्णा का होकर ही तो कृष्ण लीला में प्रवेश पाता है ऐसे मनुष्य भाव में थोड़ी देहा अभिमानी थोड़ी लीला को समझ पाएगा कैसे समझ

पाएगा लीला अब सोचो वह भगवान माखन चोरी कर रहे हैं जो अनंत ब्रह्मांड का भरण पोषण कर रहे हैं बाबा के यहां बाल्टिया में दूध दही थोड़ी होता है कुंडों में है दूध का कुंड दही का कुंड घृत का कुंड मक्खन का कुंड न लाख गवे तो केवल नंद बाबा के और कितने नंद है और सबके लाड़ले लाल जू है और हर नंद के पास लाखों ग हैं और भगवान के घर में कुंडों की ऐसे लाइन के लाइन कुंड बने दध के दूध के माखन के भगवान खूब दिन भर ना आए तो भी कमी नहीं पड़ेगी हा गोपी जनों का भाव कि जो यशोदा मैया को सुख मिल रहा है व मुझे कैसे सुख मिले मैं सुंदर दूध दू अच्छा दही जमाओ मथुर खन मन और मैं दूर टांगू और लाला मेरे घर आवे और ऐसा जब करे और मैं पकड़ूं तो जैसे मैया डांटते हो लाला भै भीत होता है वैसा मैं देखना चा क्या प्रभु मुझे ऐसा सुख प्रदान करेंगे तो हर गोपी को जैसी भावना ये था माम प्रपद्यंते तास भगवान वैसा सुख प्रदान करते हैं तुम भगवान की लीला की समानता नहीं कर सकते हो भगवान वहां भाव वहां चोरी थोड़ी कर रहे चोर तो वो होता है अभाव में

चोरी होती है कि नहीं एक तो भगवान और दूसरे नंद के लाड़ले लाल वहां कोई अभाव है अरे ब्रज के मंडल के राजा हैं नंद बाबा वहां कुछ कमी है क्या लाला के लिए हीरे जब आरा तो छावर में दिए जाते चोरी कहा हमारे पूर्ण समर्पण इससे रिलेटेड है जैसे आपने परसों के सत्संग में बताया था कि हम अपना पूरा भार भगवान को दे हम सोचते कि मैं क मर हूं मैं मर गया तो मेरे घर वालों को क्या होगा तो ये भी हम मतलब ये इसी के अंतर्गत आता है पूरा भक्त का पूरा तन मन परिवार जीवन सब कुछ भगवान है सब कुछ भगवान को समर्पित होता है और भगवान वैसा पालन पोषण करते हैं भक्त के द्वारा क्या ऐसा थोड़ी कि केवल माल चलता रहता है नहीं भक्त के द्वारा फावड़ा भी चलता है भक्त के द्वारा व्यापार भी होता है भक्त के द्वारा नौकरी भी होती है ऐसा थोड़ी होता है भक्त का मतलब केवल थोड़ की कंठी तिलक बांध लिया ब माले लिए यह तो निवृत्ति परक है प्रवृत्ति परक भक्त जो होते हैं गृहस्ती में उनके लिए कार्य भी है और सब कार्य भगवान के लिए देखो पांडव कितने महान भक्त है

पर देखो कैसा कार्य कर रहे हैं अमरीश जी कितने महान भक्त चक्रवर्ती सम्राट पूरा राज्य शासन चला रहे हैं तो समझ पा रहे हो ना भक्ति का मतलब कायर नहीं होता अगर संत जन भी है तो देखो प्रयास रत रहते साधना तपस्या समाज सेवा लोक सेवा कोई कायर बन के थोड़ी जो कायर बन के बैठता है वो भक्त नहीं होता चाहे गृहस्थ हो चाहे बाबा जी हो कायर कभी भक्त नहीं होता जो प्रयत्नशील है तपस्या धर्मा चरण परायण भजन परायण समाज सेवी देखो संतों को देखो बड़ी-बड़ी समाज सेवा हो रही है अपना परिवार पोषण करना मुश्किल आखों का पेट संतों के द्वारा भर रहे वो क्या है आज सत्संग में सुना लक्ष्मी जी स्वयं उनकी सेवा में उपस्थित हो जाती क्योंकि भगवान के भक्त है ना ऐसे मांगे थोड़ी कोई देता है भगवान देते हैं अपने आप सब चलता है छल कपट पाखंड काम नहीं करता ध्यान रखना आज नहीं तो कल जब पोल खुलेगी तो पूरा का पूरा महल गिर जाएगा सच्चाई से भगवान की भक्ति करो ही परलोक सकल सुख पावत मेरी सो भैया कृष्ण गुण संच य लोक और परलोक में समस्त सुख आपको प्राप्त

अरे भगवान का भजन करना परमानंद पर इसमें कसौटी कसना पड़ेगा देखा ना हरिपाल जी का चरित्र सुना कसौटी में कस गए तो भगवान लुटने के लिए आ गए अपने को लुटाने के लिए आ गए तो यह भाव है जगरूप सिंह जी न्यूजीलैंड राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मैं नीच मूर्ख और पतित अजामिल हूं महाराज जी 2021 में श्री वाहेगुरु की कृपा से य से संत संग हुआ और नाम चलने लगा अथवा नाम जपते समय एक भाव था कि जिसका नाम जप कर रहा हूं वह मेरे सामने है वह मेरा प्रेम स्वरूप है दयालु है और खूब नाम चलता था बाद में धीरे-धीरे वह भाव खत्म हो गया और कु भाव हो गया और नाम जपने में एक सेकंड भी चित्त नहीं लगता था अभी भी नाम जपते इसमें दो भाव ही हमने पकड़े हैं दो चार घंटा समस्या रहना भोजन का दोष होता है और लंबे समय तक दिनों में दोष आ जाना अपने में अकार आ जाना कि मैं भजना नंदी हूं मैं बहुत श्रेष्ठ हूं दूसरे में लघु भाव आ जाना इससे या किसी संत का अपराध निंदा कर देने से इन दो भावों से ही ऐसा होता है तीसरा नहीं है खूब छानबीन करके आप

देख लीजिए इसको अब आपके अंदर कौन सा भाव आया वह आप देख लीजिए उसी दोष के कारण भजन रुकता है अन्यथा भजन नहीं रुकता क्यों भाई आप बताओ आपने कुछ पकड़ा कि आपका कहीं अहंकार तो नहीं बढ़ गया इस बात में कि मैं बहुत भजनानंद हूं भगवान मेरे सामने और किसी के प्रति लघु भाव और या किसी संत की निंदा नहीं ऐसे नहीं रुक सकता बिल्कुल ऐसे नहीं रुक सकता यह बड़ा सूक्ष्म भजन का मार्ग है अभी परसो नरसो एक संत भगवान आए हुए थे बहुत अच्छी अवस्था संत भगवान की थी तो वह भी रो के यही

कह रहे थे कि मेरी ऐसी स्थिति थी रुक गई अब मैं तड़पड़ा रहा हूं के संत के पास गया तो उन्होंने आपका बताया कि उनके जाओ ठीक हो जाएगा ऐसा तो भगवान की कृपा से थोड़ी देर में ही उनसे कहा चलने लगा कि नहीं चलने ल उ कहा हां चलने लगा उनको जैसा कहाया था आप भी वैसा कर लीजिए गुरुजनों ने जो निषेध किया है जी अगर वैसे आचरण कभी गलती से हो जाए तब आचरण से नहीं बाधा पड़ेगी आचरण नहीं जैसे आचरण में कोई त्रुटि हो जाती है ना मान लो काम क्रोध आदि जनि जैसे कोई अपने से दोष बन

जाते हैं ना तो छाती जलती है पर भजन नहीं रुकता छाती जलेगी बारबार अंदर से आएगा बहुत नीच हो यार ये कैसे हो गया ये गलती कैसे ये जो पश्चाताप होता है तत्काल वो भजन में ले आता है और भगवान बड़े कृपाल होते हैं उस समय क्षमा कर देते हैं लेकिन यह दोष भजन नहीं होने देगा किसी संत पर हमारी कोई टीका टिप्पणी ऐसी जो निंदा बन गई या किसी की अवहेलना अपने में अहंकार का भाव इससे भजन चौपट हो जाएगा पक्का रुक जाएगा और चलेगा नहीं जब तक अपराध क्षमा चला उसका समाधान समाधान अ उस दिन करवाया था आज आप समझ लीजिए हे विश्व के समस्त संत भगवान व्यक्त और अव्यक्त हमारे जाने अनजाने में जो कोई पाप अपराध बन गया हो जो कोई दोष बन गया हो मुझे अज्ञानी का क्षमा करो मैं हृदय से क्षमा चाहता हूं और सब मुझे आशीर्वाद दो कि मेरा भजन पुनः चलने लगे ऐसा यहां तो सुना एकांत में कहीं एकांत में खड़े होकर ऐसी प्रार्थना करना चारों तरफ घूमकर विश्व के सब संतों को प्रणाम करना और जिसकी याद आ जाए और यह लगे कि इनके प्रति दोष क्या है तो उस अगर वह उपस्थित हो

तो उनसे प्रार्थना मांग अगर व अंतरध्यान हो गए तो उनसे विनय कर लीजिए तत्काल भजन चलने लगेगा बिना अपराध के भजन नहीं रुकता पक्की बात दो चार घंटे विक्षेप पढना भोजन से हो सकता है लेकिन दिनों में भजन रुक जाना यह अपराध सेही होता बड़ा सूक्ष्म अपराध होता है बड़ा सूक्ष्म अपराध होता है मतलब यह बहुत सूक्ष्म होता है किसी भी संत के प्रति जरा भी भाव आ जाए तो इसलिए यह बहुत सूक्ष्म विषय किसी भी संत महात्मा के प्रति किया हुआ अपराध सीधे भजन को रोक देगा और यही एक है जिसमें अपने में अहंकार दूसरे में दोष दर्शन यही हमको गिरा देता है साधु को यहां सावधान रहना चाहिए और इस पर देख लेना बच्चा अभी अभी देख लेना अगर यह बात करोगे ना तो तत्काल कनेक्शन जुड़ जाएगा तत्काल चलने लगेगा आप खुद देख लेना ठीक है हां बस अब जो तुम्हें चित्र दिखाई दे साधु का क्या बस उसी से क्षमा मांगते जाओ अभी अपने आप चल जाएगा ये भागवत है मतलब ये कोई बाहरी नहीं है कि किसी से सोच ले तो भजन रुक जाए संतों के प्रति सोच ले तो भजन रुक जाए ऐसा खतरनाक खेल है

इसीलिए सब संतों के चार जुगन के भगत जी तिनके पग की धूरी सर्वस ल सिर राखियो मेरी जीवन मूरी इसी से हम बढ़ते हैं भक्तों का अपराध ना भक्तन का अपराध सो डर पत रहो ये अपराध ऐसो है पूरे जीवन के सुकृत को नष्ट कर दे पूरे पुण्य के पुण्य पूरे जीवन के नष्ट कर दे साधु अवज्ञा तुरत भवानी कर कल्याण अखिल केनी यही से हम नए साधक हैं तो चूक हो जाती है कि हम भजना आनंदी हम श्रेष्ठ और दूसरे अरे बड़े विचित्र विचित्र भगवान के भक्त हैं आपको क्या पता कौन किस स्थिति में सबको नमस्कार करो अच्छा सब में भगवान है तो भगवान तो आदेश कर ही रहे हैं सातो सम मोहि मैं जग देखा मोते अधिक संत कर लेखा सातवी भक्ति है सब में समान भाव से भगवान को देखे लेकिन भगवान कह रहे हैं मेरे से भी अधिक मेरे भक्तों को देखो मेरे संतों को देखो मोते अधिक संत कर लेखा यह भगवान की सातवी भक्ति का वर्णन स्वयं भगवान ने किया संतों को भगवान से भी बढ़ कर के देखे तो अपराध ही नहीं बनेगा बच जाए अगर कोई संत इधर उधर तो अपना आंख मदे अपने को बचाओ चलो भगवान उसकी लीला को

भगवान जाने अपने चलो हम दूसरे के ठेकेदार थोड़ी है पूरी सृष्टि के ठेकेदार तो भगवान जो जैसा करेगा भोगे हम काहे को निंदा स्तुति करे हम अपने मार्ग को पुष्ट करें नारायण स्वामी कहते तेरे भावे जो करे भलो भुरो संसार नारायण तू बैठ के अपनो भवन बुहार तू अपने को ठीक कर ले दूसरे की चिंता मत कर दूसरे सब भगवत स्वरूप है भगवान संभालेंगे कुनाल जी दिल्ली से राधे राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोट कोटि प्रणाम महाराज जी श्रीमद भगवत गीता अध्याय नौ श्लोक संख्या 29 में भगवान अर्जुन से कहते हैं कि मैं सबके प्रति समान हूं लेकिन जो कोई भक्ति पूर्वक मेरी सेवा करता है वह मेरा मित्र है मुझ में है और मैं भी उसका मित्र हूं महाराज जी भगवान तो भाव ग्राही जनार्दन है तो क्या भगवान की सेवा भाव अनुसार करनी चाहिए या नियमानुसार दोनों प्रकार के है जो वैदिक सिद्धांत से चलते हैं व नियमानुसार चलते हैं और जो भगवान के प्रेम मार्ग के पथिक भावा अनुसार चलते हैं और भगवान का जब नियम पूर्वक आराधन होता है तो फिर भाव की प्राप्ति होई

जाती है और कुछ ऐसे प्रेमी जन है जो नियम की परवाह ना करके भाव से करते हैं जैसे वृंदावन के प्रेमी जन जो है ना य भाव प्रधान है और अन्यत्र वैदिक सिद्धांतों से भगवान की सेवा होती है यहां प्रेम से होती है यहां क चार बजे सुबह ही भोग लगा दे ठाकुर जी को जैसे कर्माबाई की खिचड़ कीना वो भाव और जो सिद्धांत है स्नान करके फिर ला फिर ऐसे कर्मा भाई सीधे उठती थी ना कोई स्नान ना कुछ और सीधे खिचड़ी बनाती थी कि रात भर ठाकुर को भूख लगी होगी और बुलाती तो ठाकुर जी गोद में बैठ कर के पाते थे वैसे भगवान रीते प्रेम से ही है नहीं हां भाव का भूखा हूं मैं और भाव ही एक सार है भाव से मुझको भजे तो भव से बेड़ा पार है भाव बिन सुनी पुकारे मैं कभी सुनता नहीं भाव पूरत टेर ही ती मुझे लाचार है भावो सवे भजता रस काम धेनु तम राधिका चरण रेणु महाम स्मरामि पर जो सिद्धांत नियम से चलते हैं वैदिक सिद्धांत से वो भी आखिरी में भाव को ही प्राप्त होते हैं पर भगवान प्रधानता भाव की रखते हैं भाव से ही भगवान को अधीन किया जा सकता है भाव उत् सवे

भजता रस काम धन भाव में भर कर के एक बाजरे की रोटी भोग लगाए तो ठाकुर धन्ना जाट के आ पाए नहीं वैदिक मंत्रों से भाव नहीं है तो फिर भगवान भाव को भगवान ग्रहण करते हैं भाव ग्राही जनार्दन साधक को तो गुरुदेव नियम देते हैं हा तो उसी से तो भाव की प्राप्ति होती है लंबे समय तक नियमावली नियमावली से चले तो भाव की प्राप्ति हो जाती है अब जैसे अपने लोगों की नियमावली भाव वाली ही है कुछ सिद्धांत है वैदिक सिद्धांतों से ऐसे ऐसे ऐसे तो फिर वो आगे चलकर को प्राप्त होते हैं अपनी जैसे वृंदावन की उपासना भाव से ही है इसमें जो नेम है वह भी भाव के ही है यह नहीं कि नेम करके भाव को प्राप्त होगा य भाव से ही नेम का पालन हो रहा है वहां नेम के द्वारा ही भाव का पोषण होगा अगर जो नेयम के विरुद्ध होगा व भाव नहीं स्वीकार किया जाएगा और यहां भाव के द्वारा ही नियम है जो नियम भाव में बाधा पहुचा उसका त्याग कर दिया जाएगा यहां न लाज तीन लोकन की ना वेद को कहो करे ना संक भूत प्रेत की ना देव वेदा सस्सा केवलम अवन अनुरागम लभते जो वेद का भी

संन्यास करके और भाव में भगवान के वो प्रेमी जन प्रेम की बात अलग है और तभी वो है उद्धव जी से जो गोपी जनों की वार्ता हुई ना तो नेम उद्धव के भूले सब वैदिक सिद्धांतों के ज्ञाता ब्राप शि उद्धव लौट गए चरणों में गोपियों का भाव देखकर गोपी का प्रेम देख कर के तो सारे नियमों की पूर्ति प्रेम भाव में ही है और अपने लोगों की तो उपासना भाव की है भाव बजता रस काम देनु तम राधिका चरण रेमराम कर्मा भाई भगवान नाथ भक्त र तो उनका भाव अगा तो महाराज जी जैसे हमतो का प्रेम भाव तनाना तो हम पैदा करें ना हृदय तो वही अविनाशी तो हम भगवान के अंश है जो कर्मा भाई अविनाशी अंश थी वही हम अविनाशी अंश है जो कर्मा भाई का हृदय था वही हमारा हृदय अंतर ये है कि कर्मा भाई का हृदय जगन्नाथ जी के लिए था हमारा हृदय जगत के भोगों में लगा है बस अंतर इतना है तो खींच ले तो बात उतनी वही आ जाएगी हम लोग ये जो ऊच दूरी बनाकर बात करते हैं कि वो तो अमुक थे भला हम कैसे हो सकते नहीं उनके भी भगवान थे हमारे भी भगवान थे वो भी भगवान के अंश थे हम भी भगवान

के अंश थे अंतर ये है कि वो केवल भगवान में चित्त लगाए थे हम विषयों में भोगों में लगाए बस अंतर इतना है हमको अपने चित्त को मन को हटाकर प्रभु में लगा दे तो वही आ जाएगा फिर कोई अंतर नहीं होगा तस्म त जने भेद भावा भगवान और भगवान के जन में अभेद स्थिति हो जाती है तो हम कमजोर क्यों बने हम उनका चरणों का आश्रय लेकर वैसे ही बढ़े हम भी तो भगवान के अंश है हम भी तो भगवान की आराधना कर सकते हैं पर हम विषयों में मन दिए इसीलिए हम अपने को दीन हीन विषय मान लेते हैं नहीं वह दोष है उसका त्याग करेंगे आगे बढ़ेंगे प्रयास करते हां नाम जप करो भगवत चर्चा सुनो भक्तों का आश लो भक्त नामावली गायन करो इससे बहुत लाभ प्राप्त होता है भक्तों की कृपा प्राप्त होती है आनंदी लहोटी जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी मैं कौन मेरा कौन मैं नहीं मेरा नहीं ना मैं कुछ हूं ना मेरा कुछ है तो जो है वही है है बस वो है जहां है के आगे कुछ लगा वह क्या है वही माया है बस केवल है यह नहीं है वहां भी है यह है वहां भी है जो है वही भगवान है वही

परब्रह्म है और जिसके आगे कुछ लगा वही माया लग गई कुछ भी लगे मैं के आगे कुछ भी लगे अभी लगा हुआ है आप स्त्री है मैं स्त्री हूं लगा है ना मेरे पति है मेरे परिवार में मेरा पुत्र इसी का नाम माया है जहां कुछ लगा वही माया है और जब सब कुछ जो लगा हुआ है उसे हटा दो तो जो बचा वही है वह क्या है परमात्मा है ब्रह्म है भगवान है ईश्वर है जो कहना चाहो योगी उसे परमात्मा कहते ज्ञानी उसे ब्रह्म कहते हैं भक्त उसे भगवान कहते हैं व एक ही परम तत्व है जो है वही आप है जो आप इस समय मान यह नहीं बस दो ही प्रकार से भगवत प्राप्ति होती है अन्वय और व्यतिरेक व्यतिरेक नहीं है नहीं नहीं अन्वय है है है यह नहीं है यह पहले भी नहीं था बाद में भी नहीं रहेगा बीच में केवल दिखाई दे रहा रोज नाश हो रहा है रोज नष्ट हो रहा है यह नहीं यह जिसे हम कह रहे नहीं है इसमें भी है यह नहीं है तो इसमें भी है ये जो चलन हिलन लन उसी परमात्मा से तो चैतन्य उसी परमात्मा से वह परमात्मा अभी अंतर ध्यान हो जाए अभी शांत हो तो है जब मुर्दा है तो क्या यह

मुर्दा है उसमें भी है बोले मर्दम परमात्मा है हां है कथा सुनी है वेन के शरीर का मंथन किया गया दाहिने से भगवान पृथु का अवतार हुआ बाए से अर्च जी का अवतार हुआ वेन के मुर्दे शरीर से भगवान का अवतार हुआ पढ़ लेना भागवत में वेन चरित्र में भगवान पृथु का अवतार हुआ मुर्दे से कोई जगह नहीं जहां व है नहीं तो मुर्दे में भी तो है कोई जगह नहीं जहां परमात्मा नहीं वही जो है बस वही है ना हम है ना तुम है ना मैं है ना मेरा है वही है हम कौन हैं वही है मेरा क्या है बस वही जो है और कुछ नहीं मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई यह बात समझ लो तो फिर दूसरो वही जो है वही आपका है वही जो है वही आप है जो है वह आपका है जो है वही आप है इसके सिवा ना आप है और ना आपका कुछ है आप शरीर को लेकर और आपका माना हुआ संबंध धन संपत्ति रुपया पैसा या अभी शरीर छूटे दुनिया में लाखों का मेला जुड़ा हंसा जब जब उड़ा तो अकेला उड़ा कोई साथी नहीं कोई साथी नहीं बड़ा प्रपंच जिंदगी में जोड़ते हैं और जब शरीर छोड़ के जाते तो कोई साथी नहीं अपना किया हुआ

कर्म पाप पुण्य वही भोगो जाकर के अगर अभी है को जान लो तो पाप पुण्य से मुक्त हो जाओगी ब्रह्म प्राप्त हो जाओग मोक्ष हो जाए तो उसको जानना बड़ा कठिन है इसलिए नाम जप करो हर समय भगवान का नाम जप करो इसी से भगवत प्राप्ति हो जाए पैरा कमांडो यदुवीर सिंह जी गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव मैं पहले कभी व्रत रहा नहीं पर आपकी कृपा से अभी गुरु पूर्णिमा से प्रत्येक गुरुवार को व्रत स्टार्ट किया है दो बार व्रत टूट भी गया इसमें श्री जी से मांगता हूं कि आपका स्वास्थ हमेशा ठीक रहे और उम्र इतनी लंबी हो जाए कि आप इस कलयुग के सभी जीवों का कल्याण करते रहे और श्री जी कृपा हम उम तो लिमिट है हमको पता नहीं आपको पता नहीं पर प्रभु को पता है कि इतने सेकंड इतने मिनट इतने महीने इतने साल जिएगा यह शरीर उसी बल से हम दाढ रहते हैं इसी ज्ञान से उन्हीं का बल चल रहा वो जितना लंबा चलाना होगा उनको चला देंगे हम यह चाहते हैं कि हमारे जिंदा रहने का फल है कि आप सबकी बुद्धि इतनी बढ़िया भगवान में लग जाए गंदे आचरण छोड़ के

कि जब मिलो तब मुस्कुराते हुए प्रसन्न और आनंदित तो मुझे लगेगा मुझे जीने का फल मिल गया आपके साधना का फल मेरा जीना नहीं है मेरे जीने मेरी साधना का फल आप हो आप मुस्कुरा दो आप आनंदित रहो आप प्रसन्न रहो आप हमारे राष्ट्र की सेवा करो आप गंदे आचरण से मुक्त हो जाओ यही हम चाहते हैं हमारी समाज सुधरे हमारे नौजवान सुधरे उनकी सद्बुद्धि हो वह सुखी रहे तो हम सुखी हैं हमारे जीने का बहुत लंबा जीने का लाभ यही है कि हमारे वचनों से हमारे दर्शन संभाषण से हमारे भारतवासी

हमारे विश्व के जन सत मार्ग में चले तब तो हमारा जीना ठीक है नहीं तो आप सत मार्ग चल रहे हो तो हमें बड़ी प्रसन्नता है व्रत टूट जाना हम व्रत पर ज्यादा आपको ध्यान नहीं देंगे हम आपको ध्यान देंगे सुनो आप हमारे सरकारी आदमी हो राष्ट्र सैनिक हो आपको जो मिले भरपूर भोजन पाओ और हर समय तैनात रहो दुश्मन की छाती चीरने के लिए आपका व्रत तिरंगे की रक्षा राष्ट्र समाज की सुरक्षा इसके अवसर पर आपको यह नहीं ध्यान आना चाहिए कि हमें पानी पीना कि हमें भोजन पाना है यही व्रत

है मिले अच्छे से भोजन पाओ नाम जप करो और कई कई दिन ना मिले तो प्राणों की बाजी लगाकर हम अपने देश की रक्षा के लिए भूखे भी रह सके इसकी भी परवाह ना हो ऐसे व्रत तो ठीक है ऐसे नहीं मिल कोई बात नहीं आप ऐसे अभ्यास कर लो लेकिन हमारा उद्देश्य यही है कि नाम जप ना छूटे अब मान लो व्रत में नाम जप छूट जाए और व्रत में आपको हमारी राष्ट्र सेवा में लगेगी आज तो व्रत है आज हम नहीं जाएंगे नहीं व्रत रहो बिल्कुल मत रहो दबा के पाओ चौड़ी छाती करके दुश्मन की छाती पर गोली बरसाने की तुम्हारे अंदर उत्साह वृति हो बस यह व्रत है और खूब नाम जप कर समझ रहे हो हां ऐसे रह पाओ रह पाओ कोई बात नहीं नहीं रह पाओ तो कोई बात नहीं भोजन पाओ और हर समय जहां तैनात हो ईमानदारी से तैनात रहो और नाम जप करो यही सबसे बड़ी साधना आपकी है ऐसे सहज स्वाभाविक रह जाओ रह जाओ टूट जा कोई भैया हमारी बात समझना यह व्रत भगवान की हम प्रसन्नता के लिए रहते हैं अपने शरीर को कष्ट देते हैं अगर हमारा भजन ना हो तो केवल व्रत रहने से भगवान मिलते तो कितने ऐसे पशु

पक्षी हैं जो केवल पानी पी के रहते हैं जरा विचार करना सृष्टि में इतने पक्षी हैं जो केवल फल खा के रहते हैं कितने जीव है जो केवल मिट्टी खाक रहते हैं कितने जीव हमारी क्या इनको भगवत प्राप्ति हो गई क्या भगवत प्राप्ति होती भजन से अगर भूखे रहकर भजन हो रहा है तो ठीक है अगर भोजन पा कर के भजन हो रहा है तो भजन करो भूखे रहकर भोजन का चिंतन हो रहा मत रो व्रत दो रोटी खाओ और भजन करो भगवान का चिंतन करो भूखे रहकर खूब बढ़िया भजन हो रहा है रह जाओ कोई बात नहीं भूखे रह

कर के शरीर कमजोर नहीं करना क्योंकि आपका शरीर प्रधान राष्ट्र सेवा में लगा हुआ है आप एक वीर योद्धा है तो आपकी वीरता में कमी ना आवे आपका शरीर आपका उत्साह आपकी बुद्धि तीनों आपके देश पर निछावर करने के लिए तैयार रहो यही हमारी प्रार्थना है ठीक है हा आप नाम जप करो और उत्साह संपन्न रहो आपको राष्ट्र सेवा में अपने प्राणों को न्योछावर करने का उत्साह बना रहे सबसे बड़ा यह वीर व्रत है इस जो आपके लिए इस समय है और कोई व्रत नहीं हर समय आप अलर्ट जहां आप तैनात किए गए हो वहां गद्दारी ना होने पावे वहां अधर्म ना होने पावे जरा सी चूक में न जाने कितनों की जान पर आ जाएगी मान लो आतंक फैलाने वाले लोग जरा सी चूक में निकल आवे तो चुकाई तो हो जाती है तो कित्र सैकड़ों को मार देते हैं हमको हर समय सावधान रहना है जो हमारे राष्ट्र के सैनिक है उनका संतों के समान सम्मान करते हैं इसीलिए कि उनको कहां तैनात कर दिया जाए कोई प्रश्न नहीं है अपने प्राणों की बाजी लगाकर हर समय परिवार से दूर रहकर हर कष्ट सेकर राष्ट्र रक्षा में समर्पित

है आपका व्रत है राष्ट्र रक्षा आपका व्रत है उत्साह संपन्न होकर समाज सेवा इस पर जरूर ध्यान देते रहना गुद भगवान जब से आपसे नाम मिला है तब से मन ऐसा हो गया जैसे किसी को अब कोई जैसे वहां पर देखा ता है एक लड़का पानी की टंकी से कूद गया तो कोई भी देखता हूं जैसे कोई मर गया कोई हां शरीर को नष्ट पूरे दिन का जितना भी मैंने भजन किया है आपकी कृपा से जो भी है इसको दे दो मतलब जो भी कुछ गलत देखता हूं इसको दे दो बिल्कुल दयालुता का यही स्वरूप है और उसका पलटकर आपको और अच्छा फल मिलेगा यह भी है जैसे आप आज का दिन का भजन आपने किसी को दे दिया तो वह जाएगा उसका कल्याण करेगा और उस कल्याण का जो फल आएगा लौट के वो आपको डबल मिलेगा यह कोई बिरला अवस्ता है इसलिए आप ऐसे अब फौजी क्टर में थोड़ा सा छोटे-छोटे कीड़े मकोड़े होते हैं अब मेरा मन उससे ज्यादा दुखी होता है बाथरूम में भी जाता हूं तो मैं उनको निकाल निकाल के बाहर रखता हूं मतलब मेरे को लगता है नाना यही है फिर भी जाते नहीं है ख झाड़ू मार दिया कुछ हां देखो कुछ कुछ देखो कुछ

जीवों की सृष्टि ऐसी है जिनका दिन में विनाश होता ही है जैसे आप गाड़ी से चल रहे हो हजारों जीव मरते हैं आप जूता पहने चल रहे हो हजारों जीव मरते हैं और सही पूछो आप सांस ले रहे हो इसमें बहुत से जीव मर रहे हैं तो यह तो सृष्टि के विधान से हमको यह देखना है कि हम जानबूझकर किसी जीव को कष्ट ना दे और दूसरी बात यह हिम्मत इतनी दयालुता ना घुस जाए कि सामने वाला पता नहीं आतंकवादी है कि नहीं है तो हम पूछेंगे उससे क्या कि तुम भैया आतंकवादी हो क्या तब तक तुम्हें सूट कर देगा हमारी बात समझना क्योंकि आप राष्ट्र सैनिक हो हमारा उपदेश जो है जहां दया का है वहां अलग डिपार्टमेंट है और अपने देश के लिए सुरक्षा और अन्य जीवों की रक्षा यह तो हम पैर संभाल के रख सकते हैं किसी कोई जीव ना मरे इतना तो ठीक है लेकिन इतना हृदय लुजु आजा ना हो जाए कि कहीं शत्रु पक्ष के लिए भी दया शत्रु पक्ष में दया नहीं होती और आप लोग हमारे राष्ट्र के सैनिक है तो इस पर आपको विशेष ध्यान रखना ज्यादा हृदय दयालु नहीं होना चाहिए समझ रहे हो जैसे मच्छर है

जैसे चीटी है यह क्या है आप लाख बार सोनी से चीटी हटा दो पोछा लगाओगे तो पूछा देखोगे 10 पाच मरी मिलेंगी अब बात बाथरूम है रसोई है कुछ ऐसे जीव है जो अपने आप निकलते हैं मर जाते हैं हमको जानबूझ के नहीं मारना हमको हटा देना है हम ये चाहते पर इतना पश्चाताप भी ना कर बहुत से छोटे-छोटे जीवाणु तो इतना हृदय को थोड़ा लुजु आजा ल कर दे कि मतलब हम इसी दिमाग में पर फंसे रहे कि यार ये ये नहीं अब जैसे गाड़ी चलाते हुए एक आदमी परसु नरसो हमें प्रश्न किया कि हम गाड़ी चला रहे थे रफ्तार से चला रहे थे कोई गाय एकदम ऐसे आई अब संभाल ले संभाल ले तले को गाय पधार गई अब वो अब वो कह रहा था कि मैं बहुत दुखी हो गया मैं तो उसको समझाया कि भाई गाय बैठी होती गाय खड़ी होती और आपकी ड्राइवरी में कमी होने के कारण उसको लग जाता आप अपराधी थे लेकिन अचानक कोई पशु गाय या कोई पशु भी आ जाता है तो अब वो रफ्तार से जैसे हाईवे प गाड़ी चल रही अब वो एकदम वृक्ष थोड़ी में लग जाएगी और वो क्रॉस कर रही रफ्तार से उसको पता थोड़ी है अब वो पधार गई और सहद

होने के कारण दुख होता है ये जो भक्त हृदय होता अरे बाप रे गाय मर गई गौ हत्या लग गई तो गौ हत्या तब मानी जाएगी जब गाय खड़ी है गाय बैठी है आपको दिखाई दे रहा है और आप कंट्रोल फ्री होकर उसमें ठोक दिए अब मांगी जाएगी ऐसे ही हम चल रहे हैं हम क्रिया कर रहे हैं अचानक कोई जीव पधार जाता है तो हमारा हम जानबूझकर किसी जीव को कष्ट नहीं देंगे और शत्रु पक्ष में जानबूझकर हम निर्दय स्वभाव रखेंगे हमारे दयालुता को कोई जान ना पावे दयालुता हमारा हृदय का विषय है लेकिन राष्ट्र रक्षा के लिए बहुत हमें स्वभाव में कठोरता धारण करनी पड़ेगी समझ रहे राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा रा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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