एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #653 · 31 अगस्त 2024
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
दीन बंधु राम अनुज दास जी जय श्रीमन नारायण महाराज जी महाराज जी दास का मन हर बार फिसल जाता है क्रोध और काम वासना में क्रोध में किसी का भी मन दुखा देता हूं फिर बड़ा अफसोस हो आपने कहा था कि बैटरी डाउन हो जाए तो यहां आ जाना मैं बैटरी चार्ज करवाने आया हूं बात इसमें हमें देखनी है कि हमारा लक्ष्य क्या है आपका लक्ष्य भगवत प्राप्ति है जी भगवत साक्षात्कार करना है जी उसका साधन निरंतर भगवान का भजन करना है अगर भगवान से बढ़कर हम किसी वस्तु व्यक्ति स्थान को मानेंगे तो उसके संयोग में आते ही भगवान को मूल जाएंगे एक तरफ हमारे भगवान हैं और भगवान की प्राप्ति का उपाय निरंतर भगवत स्मरण है भगवान का स्मरण छुटा वाला कोई विषय कोई व्यक्ति कोई वस्तु का जहां संयोग हुआ हम भगवान को भूल गए तो वह भगवान से अधिक होता है क्या ऐसा होता है ऐसा होता है इसलिए हमारा लक्ष्य अभी दृढ़ नहीं है अभी हम भगवान को भगवान नहीं मान रहे हैं भगवान को विषय से भी छोटा मान रहे हैं क्योंकि विषय संयोग हो होते ही भगवान को भूल गए तो विषय बड़ा हुआ
ना मान लो हमारे सामने एक कीमती वस्तु रखी है और एक इधर वस्तु रखी है अब हम इधर की वस्तु में लग गए तो यह हो गई ना हल्की हो गई ना तो हमारा जो लक्ष्य था भगवान थे और भगवान की प्राप्ति का जो साधन है वह निरंतर अव्यावहारिक भगवान का उतना महत्व है विषय संयोग होते ही चाहे भोजन हो पानी हो दृश्य हो भोग हो कोई भी हो हम भगवान को भूल जाते हैं यहां हमें अपनी कमी सुधार पड़ेगी सब इसी में ठीक हो जाएगा एक सुधार कैसे सुधरे भगवान के चरणों में एकांत में रो और प्रार्थना करो कि आप इतनी तो कृपा कर दो कि आपके समान कोई ना दिखे फिर विषय इतने आपसे बढ़ के हो जाते हैं कि हम आपको भूल जाते हैं पक्का बिना भगवान से बढ़कर विषय माने हम भगवान को कैसे भूल सकते हैं समझ रहे ना तो हमें भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए नारायण से कि हे नारायण करुणा सिंधु आप हम पर कृपा करो हमें इतना तो महत्व दे दो अपना कि हर विषय के सेवन में भी हम आपको ना छोड़े आपका स्मरण चलता रहे अखंड स्मृति उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते हर समय भगवत स्मृति रहे अब जब
भगवत स्मृति में हमारी रुचि हो जाएगी या रति हो जाएगी तो हम किसी को बोलेंगे क्यों नाम में प्रीति ना होने के कारण ही तो आप बोलते हो अगर नाम में प्रीति हो तो कैसे बोलोगे अभी हम आपको बता रहे हैं नाम निरंतर जपने का उपाय अगर आपने सुना हो सत्संग में तो आप ध्यान दीजिए जबान को ऊपर तालू के उसमें लगाइए और लगाकर नाम चलाइए और नाम चलाते हुए अब देखिए आपसे कोई बात करना चाहे तो आपको कैसा लगेगा कि जबान हटानी पड़ेगी नाम छूटना पड़ेगा तो दुख होगा कि नहीं होगा तो हम उसको दुखद वचन कब बोलेंगे हमारे पास समय कहां है हमारे पास इतना समय नहीं है कि उसको दुखद वचन बोले वो गाली दे रहा हम सुनक चुपचाप चल देंगे क्योंकि हमारा भजन चल रहा है अभी भजन नहीं चल रहा इसलिए बोल देते हो य बोलने का मतलब क्या है महाराज जैसे प्रारब्ध को कोई टाल नहीं सकता जैसे आशीर्वाद से तो भजन प्रारब्ध को आप किसने का कोई टाल वगैरा रोग वगैरा अरे वो शरीर में आते हैं बुद्धि में आते हैं क्या भगवान के भजन करने के लिए जैसे आप भगवान के भजन के लिए बुद्धि मव
मन बुद्धि निवेश शरीर कष्ट में है राधा राधा राधा राधा राधा हम मन प्रभु में लगाए कुछ नहीं बिगड़ा है अगर शरीर में मन बुद्धि लगा है तो स्वस्थ भी हो तो क्या फायदा जिन हरि भगति हृदय नहीं आनी जीवित स समानते प्राण प्रारब्ध को क्यों इतना बड़ा कर रहे हो दास का प्रश्न था जैसे आप आशीर्वाद से भजन में मन लगातार रख सकता है महापुरुषों के आशीर्वाद हम बिल्कुल इस बात पर राजी नहीं है कौन सा महापुरुष ऐसा है जो करुणा हृदय करके हमें आशीर्वाद ना दिए हो यह हमारी प्रमाद स्थिति है प्रमाद स्थिति हमारे गुरु की हम पर कृपा है हमारे भगवान की हम पर कृपा है सब संतों की हम पर कृपा केवल हम अपनी कृपा नहीं कर पा रहे प्रभु अपनी कृपा हमें अपनी कृपा की जरूरत है कि जो आज्ञा हुई उसके अनुसार हम चल ले अब उसको हम टाल रहे हैं कि प्रारब्ध जोरदार है काल कर्म ईश्वर मिथ्या दोष लगाए आप समझ पा रहे हो इस बात अरे समय अनुकूल नहीं है अरे ईश्वर की इच्छा नहीं है प्रारब्ध बड़ा बलवान है दैव बड़ा ये सब बेकार की बातें परमार्थिक पथिक नहीं देखते नियम
लिया निष्ठा ली प्राण दे देंगे लेकिन बढ़ेंगे ये वीर बहादुरों का मार्ग है समझ रहे हो ला हां हर कदम सुदृढ़ नाम जपते हुए भगवान का भरोसा हर मार्ग के जितने सिलाए हैं रोड़ा एं हैं सब हटते चले जाएंगे ये भगवान का मार्ग बच्चा शूरवीर बनो लक्ष्य में दृढ़ता ना होने के कारण भजन में प्रियता ना होने के कारण ये सारे दोष सुरक्षित बने रहते हैं हम अपने दोषों को बहुत प्यार से छुपा के रखते हैं निर्दोष के पक्ष में अगर हो तो फटाफट हम एक-एक को निकाल सकते हैं अंदर से लेकिन वह इतने प्यारे दोष हैं कि उ निकालते नहीं बनते अगर कहे भी कि आप अभिमानी हो क्या आप कामी हो क्या देखो कैसी दोष दृष्टि है आप हम पे काम खुश हो जाना चाहिए हा हा पकड़ गए पकड़ गया हमारे अंदर जो दोष था आपने पकड़ लिया धन्यवाद नाथ अब इससे कैसे निपटा जाए हम हम लोग बड़े दोषों को छुपाते हैं दोषों को छुपा आते हैं और सामने प्रस्तुत करना चाहते सद्गुण तो दो समय अंदर ही अंदर जो मिटिया मेट करते रहते हैं होना यह चाहिए कि सद्गुण छुपा जाए और दोषों को व्यक्त कर
दे देखो बड़े महापुरुषों को गोस्वामी तुलसीदास जी लिख रहे हैं जो मैं अपने अवगुण कह बाढ़ कथा पार नहीं लह गो स्वामी तुलसीदास जी कह रहे हनुमान जी क्या कह रहे असमय अधम सखा सुन मोह पर रघुवीर अपने को अधम कह रहे हैं है नहीं हम लोग क्या करते हैं अपने दोषों को छुपा जाते हैं हम दोषों के खिलाफ अंदर से रहे वो हमारे दोष दुश्मन है मित्र नहीं उनको बाहर करो अंदर से दोष कहेंगे मत बोल नहीं खुले बोल देखो साधु हैं सूरदास जी क्या कह रहे मौसम कौन कुटिल खल कामी जिनम को तन दियो ताही बिसरा ऐसो नोन और हम लोग जब कहीं जाएंगे तो परिचय देंगे ना कोई अपना पद का परिचय कोई अपनी डिग्री का परिचय कोई अपनी विद्वता का परिचय सम्मान का परिचय और जो कूड़ा करकट है वह बिल्कुल सुरक्षित इसीलिए सफाई नहीं हो पाती जब कहीं संत समाज में जाए तो चुन चुन के अपने अंदर के दोष उनको पकड़ पकड़ के लिखे दिमाग में मेरे अंदर यह दोष है यह दोष संत समाज क्या होता है दर्पण होता है संत समागम आप वहां बैठ जाइए अपने आप आपको अपने दोसों की रील समझ में आ जाएगी
अपने आप दिखाई देगा आज से ये नहीं करूंगा यार ये बहुत बुरी आदत है हमारे अंदर ये नहीं करूंगा ये अपने आप आएगा संत संगम संत संघ का एक प्रभाव होता है आप जैसे बैठे हो अपने आप आपके चलेगा यार आज से ये छोड़ दूंगा आज से ये छोड़ दूंगा आज से ऐसा करूंगा आज से ऐसा कर ये संत समागम का तेज अपने आप आप से कराएगा तो हम लोगों को दोषों को छोड़ना है हमें भगवान को प्रथम जगह रखना है इतनी ऊंचाई पर रखना है कि त्रिभुवन की राज लक्ष्मी देने पर भी आधे पल का जो भगवान का विस्मरण नहीं करता वही महा भागवत है समझ रहे यही त्रुटि सुधार लो सब सुधर जाएगा एक साधे सब सद भजन पकड़ लो नाम जप ना छूटे सब ठीक हो जाएगा समझ रहे रता है इसी तरह से एक तरफ तो विश्व ब बा बात य देखो हमारी बात यहां यह समझनी है कि हम सबको अपनी अपनी बुद्धि को भगवता का बनाना है हम दूसरों की बात करके अपना समय नष्ट करेंगे सुधार नहीं सुधार होगा हमको तब संपन्न होना है हमको अपनी बुद्धि को परमात्मा में बनानी है तब हमारे वचनों का प्रभाव समाज के ऊपर लागू होगा आज हमारे यहां
उपदेश बहुत बढ़ गए हैं पर स्वयं के आचरण मलिन होते चले ले जा रहे हैं इसलिए दम और पाखंड की बढ़ती हो रही है बिन विवेक वैराग्य भक्ति बिन सत्य नय को मानो भगवत विमुख कपट चतुराई सो पाखंड जानो हम वाणी से बहुत लक्ष्यदीप वित्र हो तो उससे कुछ नहीं आचरण पवित्रता बुद्धि की पवित्रता यह समाज में बहुत कम हो रही है समाज में बुद्धि की ष्टता आचरण की अपवित्र बढ़ती चली जा रही है इसलिए सुधार पहले हमको अपने अपने से शुरू करना होगा समाज से नहीं हमारे लोगों की जो बुद्धि खराब हो गई है उसका कारण है हम यह कह रहे हैं कि यह सब सुधरे कभी ऐसा नहीं हो सकता पहले हमें सुधरना होगा फिर ऐसे सुधार हो देखो भगवान की तीन प्रकार की लीलाएं हैं एक सतोगुण लीला जिसमें सृजन एक रजोगुण लीला जिसमें पालन और एक तमोगुण लीला जिसमें शृंगार पक्का होगा क्योंकि भगवान की लीला है हमको संसारी आदमी बोले बोले दो हमको यह देखना है कि मेरे प्रभु की क्या इस समय रुचि है क्या लीला है जैसे सृजन अत्यंत आवश्यक है वैसे पालन अत्यंत आवश्यक है तो क्या वैसे विनाश
आवश्यक नहीं है कभी-कभी दैवी संपदा बढ़ती है तो असुरों का विनाश होता है आसुरी संपदा का कभी-कभी आसुरी संपदा बढ़ती है तो दैवी संपदा का नाश होता है ये खेल चलता रहता है जो ज्ञानी है जो भगवत मार्ग का पथिक है वो सर्वे भवंतु सुखना पर यह जरूर देखता है कि इसमें तीन लीलाएं भगवान की हो रहे हैं इसलिए सुख दुखे समय कृत्वा लाभा लाभो जया जयो सुख दुख में लाभ हान में जय पराजय में समान भाव रख कर के अपने धर्म का पालन करते हुए हम भजन में लगे हुए हमारे संग में जो आ गए उनको सद उपदेश सत मार्ग ना चलो भ्रष्ट हो तुम्हारी मौज चलो उत्तम बनो तुम्हारी मौज हम दोनों में समान रहेंगे हमारे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा अगर आप गलत चलते तो मैं मानता हूं कि आप अपना नाश स्वयं कर रहे हैं तो हम तुम्हें कैसे बचा पाए आप सही चल रहे हो तो हम सर झुककर तुम्हें सारा प्रणाम करते हैं सरा आखों पर तुम्हें रखते हैं आगे बढ़ाते हैं ऐसे अपने संतों का कार्य य है हमें दुख सुख में नहीं लिप्त होना भगवान की ये सृष्टि है जिम्मेवारी उनकी है हमारा कार्य है
स्वयं धर्म में स्वयं में कोई गलती ना होते हुए दूसरों को भगवत मार्ग में चलाना अब जब स्वयं हम धन की लालसा करेंगे हम मान की लालसा करेंगे हम भोगों की लालसा करेंगे और दूसरों को वैराग्य का उपदेश करेंगे तो लागू ही नहीं होगा उपहास होगा कुछ नहीं होगा मनोरंजन सिर्फ वाणी का विलास मनोरंजन होगा तो आचरण में शुद्धि लाना कितना कठिन है आप देख रहे हैं प्रवचन कर लेना बहुत सरल है लेकिन मन और इंद्रियों को विषयों से हटाकर भगवान में लगाना बहुत कठिन है हिमालय उठा लेना सहज है लेकिन मन को पकड़कर भगवान में समर्पित करना बहुत कठिन है वह तो भगवान की कृपा से हो जाता है नहीं तो बहुत कठिन मन को लगाना पूरे जीवन भर मन को शांत रखना विषय भोग ना भोगना परमात्मा के चिंतन में रखना यह हमारे ऋषियों की परंपरा रही है उसी परंपरा से भारत जो है जगत गुरु पद पर विश्व गुरु पद पर व सर्व मंगल उन्हीं से होता है उन्हीं संतों से होता है वैसे सत्संग में तो हम अतरे दिन कहते रहते हैं कि बिना भगवान के भजन के ऐसा कोई जादू टोना ऐसा कोई मंत्र ऐसा
कोई जंत्र सृष्टि में है नहीं जो ठीक कर सके बिल्कुल भा तो वही हमें लगता है कि आज जो युवा है युवा संतों को सुनना चाहते हैं मगर ये कुछ पुरुष है जो उनको बरगला देते हैं तो वैसे सत्य को कोई बरगला नहीं सकता है नहीं कहा मुनि हिमवंत सुनु जो कछु लिखा लीला भाग्य में लिख गया देव नुज नर नाग मुनि को न मेटन हार फिर क्या करें फिर क्या करें येय जंतुर मं तुर सब काम ना जो तप करे तुम्हारी कुमारी तो भावी मेटी स कहे त्रिपुरारी यदि तप किया जाए भजन किया जाए तो भाग्य को पलटा जा सकता है य हवन जंतु मतु ये सब नहीं ये खुली बात लिखी है कहा मुनीष हिमवंत सुनु जो कुछु लिखा लेला ना देव दनुज मुनि नाग कोई भी कोन मेत सुनो भरत भावी प्रबल बिलख कहो मुनि नाथ हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विध्या कोई भी सिद्ध महापुरुष भगवत मार्ग का ये सब नौटंकी नाटक करते नहीं मिलेगा हमारे ब्रज मंडल में एक से एक सिद्ध हुए अगर आप एक का भी नाम बता दें कि ऐसे कोई बात करता था एक का भी नाम हाथ जोड़ के बात करके चरण वंदना करके भिक्षा लेकर भगवान को प्राप्त हो
गए या एक से एक सिद्ध जिनके अधीन प्रिया प्रीतम है भगवान है वह ऐसे निकल गए कभी कोई जान नहीं पाया कि इस कोटि के सिद्ध है तो हम इन बातों को तो ज्यादा महत्व देते ही नहीं है हम यही बात कहते हैं यदि अपना मंगल चाहते हो तो भगवान का नाम जप करो और अपने आचरण सुधारो तुम्हें किसी के आशीर्वाद की जरूरत नहीं आचरण सुधारो के सब आशीर्वाद अपने आप मिल जाएगा कन्हैया जी मुंबई से श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपने मुझ जैसे ना जाने कितनों का ही जीवन परिवर्तित कर दिया म जी मेरा एक प्रश्न है पूज्य भाई जी पौदार जी महाराज जी ने अपने निजी अनुभव बताते हुए कहा था कि यदि यह तीन बातों को जीवन में उतार लिया जाए तो भगवत प्राप्ति दुर्लभ नहीं है जीव से भगवान के नाम का जाप भगवान की कृपा पर विश्वास सब में भगवान को देखना महाराज जी आपका भी कहना यही है कि चिंतन के साथ नाम जब चलता रहे तो अच्युत परमात्मा की प्राप्ति निश्चित है परंतु यह तीसरा सूत्र सियाराम में सब जग जानी सब में भगवान को देखना ये कल्याणकारी सूत्र
को मैं अपने जीवन में नहीं उतार पा रहा हूं कोई बात नहीं कोई बात नहीं एक पकड़ लो सब आ जाएंगे अगर जबान से नाम चल रहा है ना नाम जीह जप जाग जोगी परमार्थी प्रपंच वियोगी यह प्रपंच अपने आप हट जाएगा आप चलते रहो देखो गोस्वामी जी बहुत रहस्य की बात कहते हैं राम नाम मणि दीप धरी जीह दे हरी द्वार तुलसी भीतर बाह रहु जो चाह से उजियार बाहर भी ज्ञान का प्रकाश अंदर भी दिव्य ज्ञान का बाहर ज्ञान का प्रकाश जिधर देखता हूं उधर जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में जान व अंदर का
ज्ञान प्रकाश की मैं भी वही हूं यही अनुभव देह भाव रहित आत्मा स्वरूप में स्थित महापुरुष परम ज्ञान ये सब नाम से हो जाएगा एक पकड़ लियो ना नाम जप करना भगवान के आश्रित सब कुछ हो जाएगा आगे की बात चिंता मत करो अपने आप हो जाएगा ये अपने आप हो जाएगा आप देख लेना वो खुद अनुभव में आने लगेगा वो खुद दिखाई देने स्थिति होती है ना जैसे हमारी स्थिति अभी है तो हमें केवल स्त्री पुरुष जड़ चैतन्य दिखाई देता है ना कोई दिव्य महात्मा ना कोई दिव्य आज के सत्संग में सुना था देवर्षि नारद जी ने कहा सात रात इस मंत्र को जपो तो सिद्धों के दर्शन होने लगे होने लगे आकाश चारी सिद्धों के दर्शन सात रात में हम लोग अभी जैसे जैसे भजन से पाप नष्ट होगा प्रवृत्ति पाप की नष्ट होगी योग्यता आगी वैसे-वैसे महापुरुषों से मिलना हो जाता है बड़े-बड़े महापुरुषों से मिलना हो जाता है और महापुरुषों की कृपा से वो ज्ञान प्रकट होता है जिससे चराचर जगत भगवान है परम सत्य है यह अनुभव में आने लगता है यह अकल लड़ाने से नहीं होता ये स्थिति है वासुदेवा
सर्वमत सा महात्मा सु दलवा ये स्थिति आएगी आप नाम जप करो भगवत लीला गुणगान सुनते रहो भगवान के आशित रहो आगे वाली बात खुद अपने आप आ जाएगी चिंता ना करो ठीक है रामचंद्र बनारसिया जी महाराज जी ध्यान में विक्षेप होता है सांसों के ध्यान यात्रा ठीक रहती है लेकिन सांसों से रोम रोम की यात्रा तक पहुंचना नहीं हो पाता आप पहले सांसों में नाम को स्थित कीजिए जो गुरु प्रदत नाम है अपनी स्वांसों में बैठा लिए रोम रोम में आना तो उसकी सामर्थ्य है नाम की अपनी सामर्थ्य से नहीं होता नाम स्वास दो बिलक चलत है इनको भेदन मोको भावे स्वास नाम नाम ही स्वासा नाम स्वास को भेद मिटाए तब रोम रोम और रग रग बोले तब क स्वाद नाम को पावे पहले आप अपना कार्य कीजिए तो नाम अपना प्रभाव दिखा देगा आपका कार्य उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते सोते जागते हर समय नाम में स्वास कर लो जितनी चेतना है एक भी शवास खाली ना जाए आगे का काम वो नाम कर देगा आपके बस की बात थोड़ी है वह तो नाम करता है वो तो हर नस नाड़ी रोम रोम में वह समा जाता है आप केवल नाम
जपने पर ध्यान दीजिए जप रहे नाम हां कोई भी श्वास खाली ना जाए आप अभ्यास ये कीजिए आगे का कार्य तो नाम खुद कर देगा नाम सामर्थ्य शली वही ऐसा कर सकता है अपनी सामर्थ्य नहीं है अपनी सामर्थ्य है नाम को पकड़ना और नाम की सामर्थ्य सारा अध्यात्म प्रकाशित कर देना समझ पा रहे आप हा सुधा शर्मा जी राधे राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि नमन महाराज जी मैंने आपको अपना गुरु मान लिया है आपके मार्गदर्शन से मुझे जीवन के संघर्षों को सहने की शक्ति मिलती है महाराज जी हमें लाडली जू की अनन्य भक्ति किस प्रकार मिल सकती है जैसे निद्रा तंद्रा सुषुप्ति और जागृत अवस्था में हमें भगवान का एक क्षण के लिए भी विस्मरण ना हो नाम पर हमारा पूरा जीवन समर्पित है सबको बार-बार कहते नाम को पकड़ो नाम को राधा राधा राधा राधा राधा उठते बैठते चलते खाते पीते सोते जागते नाम पकड़ लो आगे का रास्ता अपने आप सब आ जाएगा आप पहले नाम पकड़ लो हम लोग क्या करते हैं आगे की बहुत बातें करते हैं चल नहीं पाते एक कदम हमें लगता है यदि हम एक कदम
चले तो हमारी यात्रा एक कदम तो हो गई एक गुरुदेव ने एक टर्च दी किसी शिष्य को यमुना स्नान कर ने जाना था अब वो टर्च बस एक पैर भर दिखाई दे बोले गु गुरुदेव इससे क्या होगा ये दूर का तो रास्ता त तो उनका एक पैर का दिखाई दे रहा है ना अगर इसी पर चलोगे तो हर कदम तुम्हारा प्रकाश में होगा और तुम यमुना जी पहुंच जाओगे ऐसे ही हमें गुरुदेव ने कहा राधा राधा जपो हमें लगता है और तो कुछ बताया नहीं तो तुम राधा राधा जपो इस पर चलो तो अगला कदम तुम देखोगे आध्यात्मिक की ऊंचाई पर चढ़ता चला जाएगा और केवल आध्यात्मिक की ऊंचाई की बातें अगर है तो शास्त्रों में बहुत लिखी है लेकिन आप में एकको नहीं आएंगी जब तक आप भजन नहीं करोगे इसलिए हमें जीव से भजन करना शुरू करना चाहिए पूज्य राधा बाबा कहते जैसे मशीन से नहीं राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा अब चल रहा अंदर राधा राधा आपको कोई प्रश्न करने की जरूरत नहीं रगी सब अपने आप अंदर दिखाई देने लगेगा कि यह मार्ग है यहां से ऐसे चलना है ऐसे चल रहा है सब प्राप्त हो
जाएगा पर आजकल हम लोग बातें बहुत करते हैं और भजन कम करते हैं या भजन नहीं करते हैं तो बातों से तो परमार्थ होगा नहीं तय तय तो होगा पूरा जब हम नाम जप करेंगे अच्छे आचरण करेंगे भगवान के आश्रित रहेंगे तभी परमार्थ तय होगा तो हमें लगता है खूब डट के नाम जप करो किसका प्रश्न है नाम जप करो सब हल हो जाएगा और नाम जप नहीं करोगे तो प्रश्न पे प्रश्न और उत्तर पे उत्तर और मिला कुछ नहीं मिलेगा भजन से हमारी बात समझ जब राधा बाबा से कोई प्रश्न करता तो बाबा पूछते थे कितना नाम जप करते तो जब ये नाम का सही उत्तर नहीं दे पाए कहते जाओ एक महीना एक लाख नाम जप करो फिर आओ फिर उत्तर देंगे तब हमारी बात समझोगे तो भाई हमें लगता है नाम जप किया जाए सब उत्तर उसी में समाए हुए हैं नाम जप करो तो जागृत स्वप्न सुषुप्ति स् फुरत में राधा पदा जत छटा जागृत स्वप्न सुषुप्ति जो आपने पूछा जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति स् फुरत में राधा पदा छटा कब जब हर समय राधा राधा राधा राधा राधा और लंबे समय तक ये नहीं कि दो चार दि दिया देखा राधा छटा आ रहे कि
नहीं नहीं आ रहे तो बोले अभी काम नहीं बन रहा बहुत समय तक हम मन को निरंतर नाम में लगाए और कलयुग है मन को निरंतर नाम में लगाना बहुत कठिन है आप लोग देख लीजिए ऐसे छलांग मारता है कि पता ही नहीं चलता कि 10 मिनट कहां ले गया नहीं फिर हो आया कि अरे तो भाग गया फिर राधा राधा राधा राधा और ऐसा भी हो सकता है कि राधा राधा चल रहा है ले गया बहुत विचित्र है मन को भगवान में निरंतर लगाना सबसे कठिन काम है इसलिए नाम जप करो सब ठीक हो जाएगा जितेंद्र शुक्ला जी राय राधे राधे राधे राधे महाराज जी मर जी कह रहे हैं कि यह गुरु कृपा से संस्कृत पाठशाला बच्चों के लिए स्कूल एवं वृद्ध माता-पिता की सेवा हेतु आश्रम का निर्माण कर रहे हैं और उसके सेवाओ में लगे हैं बट आपका सत्संग सुनने के बाद कह रहे कि इनका मन अभी इनमें नहीं लग रहा अब यह क्या करें करें या नहीं करें ऐसी सेवाए उसे हमें लगता है अगर नाम जप करते हुए करो तो समाज सेवा बढ़िया बन जाएगी और भगवान का भजन करते हुए भगवान की प्राप्ति भी हो जाएगी सब में भगवान है बड़े बूढ़ों
की सेवा करना अना शितोला ये भगवान की सेवा के अंतर्गत आता है जो भगवान इन रूपों में है ना जैसे कोई पागल है कोई बीमार है बड़ा बूढ़ा है अपने शरीर की सेवा नहीं कर सकता उनकी जो सेवा है वह साक्षात भगवान की सेवा है हमें लगता है आप वो भी करो और नाम जप करो तो बहुत अच्छा रहेगा छोड़ो तो नहीं छोड़ने की सलाह आप नहीं देंगे गुरु जी की आज्ञा तो इस मार्ग में चल पड़ा था लेकिन जब से आपका सत्संग और दर्शन हो रहे हैं जी तो हम भी यही चाहेंगे कि नहीं हम भी यही चाहेंगे कि आप विद्यार्थियों को पवित्र भाव से रहकर उनको संस्कृत सिखाओ माता-पिता वयोवृद्ध की सेवा के संस्कार डालो और स्वयं को ऐसे वयोवृद्ध हो उनकी सेवा करो और नाम जप करो छोड़ो मत हां सेवा बहुत बड़ा धर्म है परहित सरिस धर्म नहीं भाई बस गलत भाव ना हो ना बच्चों के साथ गलत भाव हो ना बड़े बूढ़ों से सेवा का पैसा लेने की बात हो बड़े बूढ़ों की सेवा के नाम पर या विद्यार्थियों के पढ़ाने के नाम पर या विद्यार्थियों से असभ्य जो नहीं होना चाहिए वो भाव अगर यह सब नहीं है तो
यही भगवत प्राप्ति करा देंगे बय आपको देखना है यही भगवत प्राप्ति करा नाम जप करते वयोवृद्ध की सेवा विद्यार्थियों को विद्यादान और यही भगवत प्राप्ति कर जब से गुरुदेव आजा से भागवत करना शुरू किया तो सारा जो धन है व बीच मेंही लगाया हा ठीक है बहुत अच्छा है सावधानी रखते रहे माया बड़ी विचित्र है कहीं से भी पकड़ के पटक सकती है सावधान गा गुरुजी एक प्रश्न कि गुरु जीी का तो देह शांत हो गया लेकिन गुरु ने जो मंत्र दिया है लेकिन भाव वो मंत्र के प्रति भी है और ठाकुर जी के प्रति भी जी तो करू क्या मंत्र जपो ठकुर जी से प्यार करो क्या है उन्हीं के सारे मंत्र हैं भगवान के अनंत नाम है एक तो शास्त्र नाम जैसे विष्णु शास्त्र नाम राम शास्त्र नाम गोपाल शास्त्र नाम ऐसे भगवान के अनंत नाम है तो भगवान तो एक है उनके अनंत नाम और मंत्र है तो जो भगवान से प्यार है व भले देवी का मंत्र हो भले किसी का मंत्र हो भगवान ही तो देवी बने हुए हैं कृष्ण ही काली है काली ही कृष्ण है कृष्ण सब वही बध हुए एक ही परमात्मा हम भगवान को अम्मा
मानना चाहते मां भगवान ने मां रूप धारण कर लिया हम भगवान को पिता मानना चाहते भगवान पिता रूप धारण कर लि हम भगवान को दोस्त मानना हमारे भगवान दोस्त हम भगवान को पुत्र मानना चाहते हमारे भगवान पुत्र कितने कृपालु है कितने कृपालु है भगवान तो एक ही है हम सब अलग-अलग उनको प्यार किए कोई उनको पति मानता है कोई उनको पुत्र मानता है कोई उनको पिता मानता है भगवान हर रूप में भगवान हमारे तो हमारे पास कितनी बढ़िया सुविधा है अगर हमें मां से प्यार है तो अपने भगवान भगवान को मां मान कर के मां में भगवान को देख कर के उपासना कर सकते हैं कितना बढ़िया अपना सनातन उपासना कितनी बढ़िया उपासना है कि हम वृक्ष में भी भगवान मानते हैं देखो ना हमारे गांव में घरों में वृक्षों की पूजा होती बर्गत पूजा आज है पीपल पूजा आज है आवला पूजा हम तो गांव के लोगों को देखो साइकिल भी चलाएंगे तो ऐसे पैर छू के चलाएंगे आपने देखा है भले व अनजान है अज्ञानी है लेकिन उनकी इस चेष्टा को देखिए अपने लोगों में सनातन धर्म में अगर वह स्कूटी भी चलाने जा रहे
हैं तो फिर स्टार्ट किए पैर किसके छुए कहीं ना कहीं भगवत भाव है ना कि स्कूटी में भी भगवान है साइकिल में भी भगवान है हमारे यहां जो चारा काटने वाले जो गेहूं के उनको भी स्नान करवा के पूजा की जाती है हर अस्त्र शस्त्र की पूजा होती है पशु पक्षी की पूजा होती है वृक्षों की पूजा हमारा सनातन धर्म जैसा विशाल पूजक भाव कहां हो सकता है आप विचार करके देखि हमारे यहां तो पशु पक्षी की भी पूजा होती है जड़ की भी पूजा होती है चैतन्य तो भगवत स्वरूप है इसलिए बहुत बढ़िया है सबकी सेवा करो नाम जप करते हो शिवम जी जालंधर पंजाब से राधे े राधे राधे महाराज जी महाराज जी सात्विक भक्ति मार्ग में सबका गंतव्य एक ही है तो मार्ग इतना अलग कैसे है अलग अलग संप्रदाय अपनी ओ आकर्षित करते हैं बचा जैसे हमें बिहारी जी जान है वृंदावन आओ तो जो उधर से आ रहे हैं उधर से भी मार्ग टटिया स्थान के बीचे से रंगनाथ जी के होते हुए इधर से मथुरा से आए तो अटला चुंगी से मार गए फिर इधर से आए तो परिक्रमा मार्ग है लेकिन सब बिहारी जी जाएंगे अगर एक ही मार्ग
बनाया जाता तो अव्यवस्था हो जाती कि नहीं हो जाती आप विचार करके देखो अगर चारों तरफ से मार्ग है तो जाना सबको बिहारी जी है लेकिन व्यवस्था बड़ी यहां हो रहे ना अगर एक ही घाट बनाया जाता तो अव्यवस्था हो जाती ना सैकड़ों हजारों घाट है तो हजारों घाट में नहा एक ही यमुना जी रहे लेकिन सुविधा हो गई अब ऐसे जो ज्ञान प्रधान है बुद्धि प्रधान है वो वेदांत मार्ग में चलेगा जो योग प्रधान है अष्टांग योग में चलेगा कर्म प्रधान है कर्म योग से चलेगा भाव प्रधान है तो भक्ति योग से चलेगा लेकिन सबको अनुभूति एक ही परमात्मा की होगी तो बढ़िया हुआ ना व्यवस्था हुई अगर हमारे कई मार्ग ना हो तो अव्यवस्था हो जाए जब बिहारी जी के यहां ज्यादा भीड़ वाला उत्सव होता है ना तो बांस लगाकर दूर वाला मार्ग बनाया जाता है और कई मार्ग बना कर के जिससे व्यवस्था सही रहे तो पूरे विश्व की व्यवस्था सही रहे इसलिए बहुत से मार्ग है परमात्मा तत्व तो एक ही है अच्छा एक ही घाट बच्चा बनता तो कैसे स्नान हो पाते नहीं अगर सैकड़ों घाट बने हुए तो बहुत बढ़िया
व्यवस्था ये गलत व्यवस्था है क्या अगर सैकड़ों यमुना जी होती तो व्यवस्था गड़बड़ होती यमुना जी तो एक ही है घाट सैकड़ों है तो परमात्मा एक ही है आप भी स्वीकार करते हो और मार्ग उसके बहुत है तो बहुत बढ़िया है ना अलग-अलग स्वभाव अलग-अलग प्रकृति के लोग हैं तो उनके लिए मार्ग किसी को यह मार्ग भक्ति का अच्छा लगता है किसी को योग का अच्छा लगता है किसी को ज्ञान का अच्छा लगता है लेकिन जो मार्ग में चलने पर प्राप्त होता है वो परमात्मा तो एक ही होता है इसलिए बच्चा अच्छा है अच्छा है कुछ बुरा नहीं है उसको समझे हम केवल क्यों आपकी राय क्या है हमारे लिए मार्ग कौन सा सही है उसको चूज कैसे करना अपने स्वभाव के अनुसार या फिर अपने गुरुदेव के अनुसार दो बात समझे या तो अपना स्वभाव समझ में आवे तो नहीं तो अपने को किसी संत के हवाले कर दे वो मार्ग बता देंगे आज चल या तो आपके समझे हुए मार्ग हो कि एक यमुना एक्सप्रेस से उधर और एक आता है टला चुंगी से एक परिक्रमा मार्ग से एक स्थान की तरफ से तो अपने को पता है कि भाई हमें तो
परिक्रमा मार्ग वाला अच्छा लगता है लेकिन आपको सब मार्गों का ज्ञान तो है नहीं तो हम क्या करें कि जिसको सब मार्गों का ज्ञान है उससे पहले बातचीत करें वो आपका स्वभाव समझेगा फिर आपको बताएगा कि आपको अच्छा रहेगा भक्ति मार्ग चलो आपको अच्छा रहेगा योग मार्ग चलो आपकी रुचि हमें दिखाई दे रही ज्ञान मार्ग में चलो तो वो अपने अनुकूल आपको मार्ग दे कर के चला लेंगे या तो किसी संत के आश्रित हो जाओ और या फिर पहले मार्गों का ज्ञान प्राप्त करो और फिर उसको करो ठीक है ब्रह्मचारिणी अर्पिता जी ब्रह्मचारिणी ईशिता जी प्रणाम राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में प्रणाम महाराज जी हम बंगाल से कुछ दिनों के लिए वृंदावन वास करने के लिए आए हैं महाराज जी हम दोनों स्वामी सर्वेश्वरा आनंद पुरी जी महाराज जी के मंत्र शिष्य हैं श्री वृंदावन धाम आने के बाद आप सपने में आए हुए हैं हमें तीन से चार बार आप हमको इधर आपसे मिलने आने के लिए बोल रहे हैं या तो एकांत में कुछ बोल रहे हैं हमें समझ नहीं आ रहा महाराज जी हमारा ये हमारी श्री जी का
खेल है वृंदावन शवरी लाड़ली जू का वही खेल है वही इस रूप को प्रकाशित करके आकर्षण करना वचन को प्रकाशित करके आकर्षण करना यह उनका खेल है यह जीवन राधा किशोरी का जीवन है तो वह अपने जनों के स्वप्न में ले जाना यह सब लीलाएं करना नहीं तो हमें पता नहीं होता कि हम आपके स्वप्ने में गए हमें नहीं पता है क्यों क्योंकि हमारी स्वामिनी जो कर ये जैसे लोगों का मन भाव बदलकर सही मार्ग में लग जाना हमारी बात मान लेना यह सब हमारे प्रभु का हमारी लाडली जू का खेल है उसमें हम कहीं नहीं है किंचन मात्र भी नहीं केवल श्री जी श्री जी श्री जी केवल लाडली जो है अब वह क्या निर्देश करते हैं वो वो जाने आप हमसे प्रश्न कीजिए तो हम आपको उत्तर दे सकते हैं उनकी बल से लेकिन वो क्या कहती हैं ये उनकी बात है अगर वो आपको इस रूप का स्वप्न में दर्शन कराती हैं कोई आदेश करते तोव आप देख लीजिए बका हम कहीं नहीं है वो हमारी श्री जी है हमारे प्रभु हैं सान आप अगर कुछ बोलना चाहते हैं हमारे अंदर तो बोलने की चाह नहीं आप प्रश्न करो तो बोलने की चा हो
जाएगी अब श्री जी कहती कुछ बोलना चाहती तो आप सुनो वचन सुनो तो आपको परमार्थ का मार्ग पुष्ट मिल जाएगा चाहे एक भी सत्संग अगर ध्यान से सुन लो तो एक ही सत्संग भगवत प्राप्ति कराने के लिए पर्याप्त है एक ही सत्संग कोई ऐसा सत्संग अधूरा नहीं होगा जिसको सुनने के बाद भगवत प्राप्ति के लिए कुछ जानना बाकी रहे बस चल दो जैसा सत्संग में सुनो वैसा चल दो तो भगवत प्राप्ति निश्चित है साधक के लिए सावधानियां मतलब जैसे साधना में देखो सबसे पहली सावधानी अभी जैसे व संत भगवान
आए थे नारायण स्वामी जी के परिकर के पहली बात है कि हमारा लक्ष्य क्या है साधक का लक्ष्य क्या है खाना पीना जीना रहना आराम व्यवस्था प्रणाम नमस्कार या भगवत प्राप्ति एक ही अलग डिपार्टमेंट है लाखों चलने वालों में से कोई विरला एक दो ऐसा होगा जिसका लक्ष्य बिल्कुल ठीक ठिकाने पर भगवत प्राप्ति नहीं तो हम लोग मनोरंजन करने में जीवन को पूरा बिता देते हैं खाने पीने देखने सुनने भोगने में अच्छा समय जीवित होकर के चल रहा है इस पर राजी है यही हमारे लिए दुर्गति का कारण है हम राजी ना हो हम विकल हो जाएं रुदु सु स्वरम राजन कृष्ण दर्शन लालसा भगवा भगवत प्राप्ति के लिए हमें खानपान नहीं भावे है नहीं कोमल वसन सुहावे सब विषय लगे ते खारा है हरि आशिक का मग न्यारा है नारायण हरि भजन में पांचों नु सुवाद विषय भोग निद्रा हसी जगत प्रीति बहु बाद एक अंदर उदासी एक खिन्नता हर समय निरंतर स्मरण परायण किसी से बोलने का मन ना हो ना का हो सो बोलव ना कोई व्यवहार अपनी कुवर किशोरी को जियत निहार निहार शांत हो जाए पहला है शांत रस पांच
रसों में पहला शांत रस है अगर हमारे अंदर शांत रस आ गया किसी भी तरह का कोई विकार नहीं कोई चाह नहीं कोई अपना नहीं पूरी सृष्टि में प्रभु के सिवा अपना शरीर भी नहीं प्रभु के सिवा अपना शरीर भी अपना नहीं तब जाकर के निरंतरता बनती है भजन की और उसी में प्रेम ब्रह्म बोध सब कुछ प्राप्त हो जाता है खूब नाम जप करो शरीर से असंग रहो अपने शरीर से जब असंग है तो दूसरों से असंता की बात ही क्या है जो दुख सुखा आवे प्रारब्ध के अनुसार शरीर को भोगने दो आप इसके साक्षी होकर निरंतर भजन परायण र इसी से भगवत तत्व का बोध हो जाएगा इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी मराज इसमें एक प्रश्न था मराज जी हम सब साधक जन एक मन में ऐसा रहता है कि हो जाएगा अपने आप हम तो चलते रहे हैं या नाम भी चल रहा है और ये भी चल रहा है ये थोड़ी कमी हो नाम चल रहा है तो ये नहीं हो जाएगा मतलब थोड़ा नहीं ढिलाई दी तो मारे जाओगे मारे जाओगे पक्की बात है अगर 10 मिनट भी मनोरंजन में गए तो तुम 24 घंटे भजन करने वाले हो भले मारे जाओगे माया गिरा देगी ऐसा नहीं है एक भी
बिंदु अगर आपने दोष युक्त अपने अंदर बनाए रखा तो मार के गिरा देगी माया तो इसके लिए साधक नियमावली पहले आजीवन नियमावली पक्की आजीवन थोड़ा भी मनोरंजन तो मार के गिरा दिए जाएंगे उपासक को पहले लक्ष्य दृढ करना चाहिए कि मैं अपनी गर्दन कटा सकता हूं लेकिन अपने साधन को नहीं नष्ट होने दूंगा नहीं तो मनोरंजन के लिए बहुत बढ़िया संसार है माया ऐसे अवसर फेंक देती है एक ही मनोरंजन थोड़ी है नेत्रों का श्रवण इद्री का ग्राण इद्री का रसेंद्र का जने इद्री का इन वेगो को सहना बहुत कठिन है और इनके मनोरंजन के लिए फिर व्यवस्था कर देती है क्योंकि भगवत प्राप्ति करना चाहते हो ना तो ये मनोरंजन वाटिका में आओ तो जो कहता है नहीं तो फिर रिद्धि सिद्धियां का मनोरंजन फिर वह भी नहीं बड़े-बड़े देवता उसकी सेवा में खड़े हो जाते हैं वह भी नहीं ब्रह्मादेवी दना हाय हाय मच जाता है कैसे जिऊ आपके बिना प्रभु रुदन ऐसा रुदन जैसे पूछो मत हृदय फट जाए वो गंभीर बैठा है बैठा है नहीं तो हृदय फट जाए ऐसा तब भगवत साक्षात्कार होता है यहां हम लोग
मनोरंजन में लग जाते हैं समाज को उपदेश देना प्रणाम नमस्कार लेना अच्छे-अच्छे पदार्थ खाना अच्छी-अच्छी भोग विलासिता उसको स्वीकार कर लेना गया मराज जी आज सुबह हम जब आपके साथ ल रहे थे तो आप एक साधक को उपदेश दे रहे थे कि तुम बहुत अच्छा साधन कर रहे हो चुप करके ऐसे लगे रहना बाहरी व्यवहार में आपने उनको एक बात कही थी कि यही अगर यह तो अभी गुरु कृपा के घेरे में हो आप यही बाहर होता तो प्रणाम नमस्कार चालू हो जाता आपका और फिर आप गिर जाते तो ये ये अगर गुरु कृपा के
घेरे में नहीं है तो ये आएगा महाराज जी बाहरी बिल्कुल आएगा बिल्कुल आएगा हां बिल्कुल आएगा अच्छा गुरु कृपा के घेरे में जैसे आप कई स साधक हो अपने साधन में लगे हो अब आपसे कोई मिली नहीं मतलब जितने को रखा गया कि आप मिल लो इसके अलावा किसी को पता ही नहीं कि हमारा साधक किस कोट की साधना कर रहा है अब उस पर हमारी दृष्टि है उस पर दृष्टि बाहरी और सूक्ष्म दोनों अब उस पर आक्रमण करने के पहले हमारे से आदेश लेना पड़ेगा हमारे घेरे को तोड़ना होगा और स्वतंत्र साधक है तो
उसके सहयोग होने लगते हैं कि मानो यह जल पी कर के रह रहा है इतने दिन हो गए अन्न नहीं पाया इतने दिन ऐसा तो लोग उसके परिचर्या में लग जाते हैं फल फूल रुपया पैसा मान प्रतिष्ठा और वो धीरे धीरे धीरे धीरे वो आंतरिक वृत्ति से बैर मुख होकर भ्रष्ट हो जाता है भ्रष्ट होने का मतलब होता अपने मार्ग से गिर जाता है इसलिए बहुत जरूरी गुरुजन की नजर में रहे और अपने लक्ष्य में दृढ़ रहे राजी नहीं होना हमारा जो लक्ष्य उसके अलावा राजी नहीं होना जब ध्रुव जी बनवास तपस्या के लिए तो नारद जी ने तो यही कहा तुम सिंहासन के लिए तो जा रहे हो अभी उत्तानपाद को कहेंगे अभी तुम्हें सिंहासन मिल जाएगा अरे बेटा हो तुम अभी बच्चे हो क्या मान अपमान चलो वापस चलो उ कहा नहीं हमारा क्षत्री कुल में जन्म हुआ हमारा स्वभाव एक बार कर ले उसे हम टल नहीं सकते उनका वहां राक्षस है भेड़िया खा जाएगा पक्का खा जाए तो कोई बात नहीं अगर जिंदा रहेंगे तो भगवत प्राप्ति करेंगे मरेंगे तो कोई बात नहीं तब देवर्ष नारा जी ने देखा छेला पक्का भय और प्रलोभन दोनों से
मुक्त तो द्वादशा आक्षण मंत्र दे छ महीने में भगवत साक्षात्कार कर लिया हम लोग लक्ष्य से हट जाते हैं लक्ष्य से गिर जाते हैं रुपया पैसा मान प्रतिष्ठा मठ महान बड़ी ब बड़ी बड़ी इनमें हमारी राजी हो जाती है और राजी हो जाना बस ये नहीं यह नहीं होना चाहिए राजी नहीं होना है आप भी कुछ भी जाए संसार के भोग संसार की व्यवस्था है ना भोगना है ना राजी होना है वो भगवत प्राप्त हो जाएगा मर जी जैसे आपकी बात सुन रहे हैं तो एकदम दृढ़ता हो रही है अभी कुछ दिन तो चलेगा एक महीना दो महीना फिर ढिलाई क्यों हो जाती है तो इसलिए रोज सत्संग सुनना चाहिए भक्ति कर दीप प्रेम करि बाती साधु संगति कर अनुदिनी राती हमारी बैटरी डिस्चार्ज ही ना होने पावे एक्स्ट्रा में चार्ज होती रहे इतनी कि हम कभी इन बातों में रमे है ना सुनकर के हम आगे बढ़े भगवत मार्ग में बहुत मीठा प्रलोभन जहर मीठा माया देती बहुत मीठा अच्छे अच्छे अपने हाथ से गला काट ले ऐसा है इसका प्रलोभन मान प्रतिष्ठा भोग वासना इनको खिलवाड़ थोड़ी समझा जाता है खिलवाड़ नहीं बड़ी बड़ी
ऊंचाई से ऐसे धम से गिरा देती है माया और अपने को गिरना अच्छा लगता है यह बस इन खाइयो को जो पार कर गया वो महात्मा है सम आत्मा सु दुर्लभा भगवान का विशुद्ध भक्त है चाहे स्त्री शरीर हो चाहे पुरुष शरीर हो हम सब एक ही परमात्मा के अंश है शरीरों के भेद से कोई अंतर नहीं पड़ता अगर हम चलेंगे जिस भाव से वैसे ही मुझे प्रभु प्राप्त हो जाएंगे बहुत बचा के रखना बहुत छुपा के रखना शरीर एक परमात्मा की दी हुई धरोहर है हम ज क त्य वापस कर दे मलिन ना करें कबीर दास जी कहते
चदरिया झीनी रे झीनी जैसी की तैसी धर दली जैसी दी थी प्रभु अपवित्र नहीं जैसी की तैसी र दीनी चदरिया झीनी रे झीनी जो हमारा संत मार्ग है वो यही मार्ग है जैसी की तैसी धर दीनी जो गृहस्थ मार्ग है वो प्रवृत्ति मार्ग से भगवत मार्ग में बढ़े लेकिन जो विरक्ति मार्ग है वो बिल्कुल अलग है किसी भी तरह से कैसे भी ना तन गंदा होना चाहिए ना मन गंदा होना चाहिए हमारा तन मन दोनों भगवान की सेवा का पात्र है अब हमारा अधिकार नहीं है ये गुरु का है गुरु का दिया हुआ है भगवान की सेवा के लिए जैसे श्री जी के पात्र है ना मार्जन करके बड़े पवित्रता से रखते ऐसे श्री जी की सेवा का यह भी पात्र है इसको गंदा नहीं रखना इसको पवित्र रखना विचार पवित्र आचरण पवित्र और शरीर भी भगवान की सेवा में पर एक एक प्रश्न और मराज जी जैसे नए नवीन साधक होते हैं उनके मन में विकार तो आ रहे हैं बट उसकी क्रिया रूप अंदर से आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है विकार स्फर होना कोई आश्चर्य की बात नहीं उसका संकल्प बना आश्चर्य की बात है और संकल्प बनक क्रिया में
उतर जाना यह तो बहुत निंदनीय बात हो गई साधक के हृदय में विषय स्फुरण होना विषयों का आकर्षण होना यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है यह तो बड़े-बड़े अच्छे साधकों के अंदर भी स्फर होती तरंग मात्र लेकिन उसको संकल्प बना देना उसमें चिंतन करके रमण करना और फिर उसको क्रिया में उतार देना वो तो साधक ही फिर गया फिर तो क्या है कामा सं जायते क्रोधा क्रोधा स्मत ब्रह्मा स्मति भ सात बुद्धि नासो बुद्धि नासा प्रणति लेकिन प्रारंभ उसका जो है विषय का ध्यान है विषयों का चिंतन है जब हमारे अंदर कोई प्रलोभन भेजता है मन यह भोग भोग लो बड़ा सुख मिलेगा उसी समय काटना है नहीं मर चाहे जाऊं भगवत सुख के लिए मैंने ये जीवन अर्पित किया इस सुख के लिए नहीं वो हजार बार क बड़ा सुख मिलेगा साधक इसी में फिसलता है अब उस समय वो काटे मंत्र के द्वारा नाम जप के द्वारा नहीं नहीं राधा राधा राधा राधा राधा नहीं राधा राधा राधा राधा राधा बारबार अंदर से हटाए उसका संकल्प ना बनने पाए मन कहेगा चुप रहो इस समय थोड़ा देखो हम क्या तुम्हें दिखा रहे हैं क्या
तुम्हें समझा रहे हैं उसकी बात ना सुने उसे काट दे तो संकल्प नहीं बन पाया और सुन लिया तो संकल्प बन जाएगा और संकल्प बन गया तो क्रिया में उतार देगा ऐसा संग नहीं करना चाहिए साधक को चाहे वह पुरुष हो चाहे स्त्री हो एक दृष्टि में पता चल जाता है हमारी तरफ किस भाव से देखा जा रहा है सबको इतना ज्ञान तो भगवान ने दिया है कि एक दृष्टि में पता चल जाता है कि यह हमारी तरफ किस भाव से देख रहे हैं अच्छा चलो देखना से फिर व्यवहार से पता चल जाता है कि ये सकाम या निष्काम
अगर हमको समझ में आ जाए कि काम संबंधी चेष्टा वाला काम संबंधी चेष्टा वाली जैसे भी तो हमको तत्काल उसका संग ऐसे त्यागना चाहिए जैसे काला सर्प आ जाए हमारी गोदी में गिर जाए तो हम क्या करेंगे विचार करेंगे क्या पहले फटक पहले हमको भागना चाहिए पहले दूरी बनाना चाहिए फिर विचार करना चाहिए हमारे शास्त्रों में ऐसा लिखा है जैसे कोबरा सर्प आके हमारी गोद में गिर जाए तो विचार करेंगे क्या नहीं पहला काम करेंगे उसे फेंक देंगे ऐसे ही कुसंग जहा होने को हो तो पहला काम करे
पहले भागे वहां से हटे विचार की जरूरत नहीं पहले हटो दूरी बनाओ फिर विचार करो अगर विचार में लग गए दूरी नहीं बनाया तो फिर मन की चाल होती है जैसे कोई भी विषय है वह कहेगा हम भोग नहीं दूर से देख लेते हैं किसी भी विषय को भोगना नहीं ब छू लेते हैं धीरे धीरे धीरे धीरे तो मन बड़ी फुसला के फसा आता है हम लोगों को इसी फुसला हट में गिराता है इसी को संभालना है किसी भी तरह से पहले ही उसमें एक विषय में गिरा सकता है तो हर विषय में गिरा सकता है साधक को हर विषय में साव रहना चाहिए छोटे-छोटे बिंदु हैं जिनसे हमको मन फिसला करके सिंधु में गिरा देगा अभी तो बिंदु है लेकिन सिंधु में गिरा देगा जहां से निकल पाना मुश्किल है और वो विषय में डूब जाएगा इसलिए साधक को तो बहुत चाहे जवान हो चाहे बूढ़ा इससे कोई मतलब नहीं शरीर से कोई मतलब नहीं मन को तो हम कभी भी ढिलाई ना दे अगर साधक ढिलाई देगा तो हर सुविधा मिल जाएगी भगवान नहीं मिलेंगे सारे सुख मिल जाए क्योंकि भगवान के लिए चले हो ना तो माया हर मनोरंजन की बात आपको पूरी कर देगी
लेकिन भगवान नहीं मिलेंगे अगर भगवान को प्राप्त करना है तो केवल पहले भगवत प्राप्ति फिर भगवान जब मिल जाए भगवता आनंद की अनुभूति हो गई तो अब महलों में राखो चाहे झोपड़ी में बास दो अब आपकी छूट लेकिन जब तक आप नहीं मिलोगे तब तक आपको भी छूट नहीं कि महलों में राखो चाहे झोपड़ी में बास दो नहीं हमें आप चाहिए पहले आप मिलिए आपसे युक्त होकर जहां चाहो लगा दो आप नहीं मिलोगे तब तक कुछ स्वीकार नहीं करेंगे पहले आप चाहिए साधक को पहले इसमें लगना चाहिए खूब भगवान का भजन करो बुरे आचरण का त्याग करो किसी भी तरह से विरक्त भाव वाले उपासक को भगवान के सिवा किसी भोग में राजी नहीं होना चाहिए पक्का किसी भी तरह का प्रलोभन चाहे वो गुरु हो चाहे कोई भी हो पक्का हम जिस मार्ग के पथिक हैं उस मार्ग को समझना चाहिए अगर गुरु भी हमारी परीक्षा ले तो हमको भ्रष्ट नहीं होना चाहिए विरोध में खड़े हो जाना चाहिए तो गुरु प्रसन्न हो जाएगा असली होगा नकली होगा तो बच जाओगे दोनों बात है ना नकली होगा तो बच जाओगे असली होगा तो प्रसन्न हो जाएगा शाबाश
परीक्षा ली जाती है ना शाबास नहीं महाराज शास्त्र ऐसा नहीं कहता ऐसा आज तक किसी गुरु ने आदेश नहीं किया ऐसा नहीं हो सकता अगर डुप्लीकेट हुआ तो ड़ी कपने लगेगी आपकी दृष्टि मात्र से आप बच जाएंगे अगर असली हुआ तो आशीर्वाद देगा जा निर्भय विचर जब तुम मेरे से फेल नहीं हुआ तो सम कहीं फेल नहीं होगा होता है ना तो हमको यह ध्यान रखना है कि सत लक्ष्य में अगर गुरु भी हमारा आदेश कर दे विपरीत तो हमको उसकी भी बात नहीं माननी वो हमारी परीक्षा होगी और हम आगे निकल जाएंगे और अगर हम डिस्मिस स्वभाव ढुलमुल स्वभाव तो फिर यह मार्ग बहुत कठिन है बहुत कठिन है ऐसे ऐसी परीक्षा ऐसा ऐसा रूप लेकर प्रश्न आती है माया कि भगवान बचा सकते दूसरा कोई उपाय नहीं कोई उपाय ही नहीं है अपने पूरे जीवन में अपने लोगों ने सब देखा है ना तो दृश्य देखे भगवान की माया के अलौकिक अलौकिक दृश्य एक लक्ष्य नहीं ये मेरा लक्ष्य नहीं नहीं नहीं भाग भाग भाग आज तक एक दोस्त नहीं बला एक दोस्त नहीं बला पूरी सृष्टि में हमारा एक भी दोस्त नहीं तो दुश्मन का सवाल ही
नहीं जब दोस्त ले तो दुश्मन के राग ले तो द्वेष का सवाल ही नहीं और जो दोस्त बने हैं वो चमत्कारिक है उन्हीं का सारा खेल चल रहा है वही दोस्त है हमारे प्रभु प्रभु के सिवा कोई दोस्त नहीं यह सब है हम इनको अपना नहीं मानते हमारे स्वामी शिष्य रूप धारण करके आए और मुझसे सेवा स्वांग करवा रहे गुरु रूप का हम इनके सेवक हैय हमारे सब स्वामी हैं आप सब आए हो मेरे भगवान इस रूप में आए प्रश्न उत्तर का आनंद दिला रहे इतना भाव है ये नहीं है कि यहां से ज्ञान निकल रहा है नहीं नहीं आनंद का परस्पर बोध अंतः यह केवल सुख देने के लिए भगवान रूप में आए बहुत सावधानी से चलो तो इसी जन्म में भगवान मिल जाएंगे और ऐसे मिल जाएंगे जैसे हम आपको देख रहे हैं गले लगते हैं बात करते हैं भक्तों के संग भगवान खेलते हैं बस जैसी भावना करोगे वैसा ही आपको अनुभव आएगा जा की रही भावना जैसी प्रभु मूर्ति देखी य यथा माम प्रपद्यंते ताजाम अगर आप चाहोगे कि भगवान मेरे सामने प्रकट हो ऐसे बस वो परीक्षा लेंगे कि और और किसी में राजी तो नहीं है जैसे छोटा
बच्चा खिलौनों से खेलना बंद कर दे रोने लगे माता दूसरा खिलौना बेजती है उससे ही रोता है तो माता किसी और को भेज जा गोद में ले ले थोड़ा खवा पिला ऐसा फिर भी रोना बंद ना करे तो क बड़े नटखट है हमारी गोद में चुप तब वो लेगा ऐसे ही भगवान भी है पहले खिलौने देते हैं खेलो नहीं चाहिए खिलौना तो फिर रिद्धि सिद्धियां जाओ चुप आ दो जाके नहीं चाहिए फिर भी रो रहा है माने नहीं मुझे ही जाना पड़ेगा तब भगवत साक्षात्कार हम लोग तो अब आजकल सुनते हो क्या कि कहीं किसी के ऋषि के पास अ सर रहे मतलब जैसे कि भाई उनका तप भंग करने के लिए देवलोक से अप्सर आ रहे जरूरत तब पले का पहले का हम लोग छोटी मोटी वस्तुओं में गिर गए हम लोग छोटे मोटे भोगों में गिर गए तो जरूरत ही क्या है ऊपर से कोई देवी शक्ति आवे हमें नष्ट करने के लिए है ही नहीं जब गिरा हुआ है तो क्या जरूरत है अगर हम भगवान के सिवा किसी के लिए राजी ना हो तो अभी आपको दिव्यता एं सब दिखाई देने लगेंगी दिव्यता एं ऐसे गंगा की धारा से दिव्य महापुरुष प्रकट हो रहे हैं एक से एक अलौकिक
रेत में बैठे-बैठे दृश्य बदल गया ऐसे अलौकिक काएं दिव्यता है क्योंकि जब आप भोगों से दिव्य की तरफ चलेंगे तभी तो दिव्य को देख पाएंगे अभी तो हम छोटे छोटे भोगों में गिर जाते हैं चंद रुपए में चंद स्वाद में चंद भोगों में गिर जाते हैं हमको चाहिए कि ये जीवन ऐसा मजबूत बनाए कि हम गिरे ना चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो गृहस्थ है तो एक सीमा है अपनी सीमा में रहो तो आप भी साधु हो अपनी मर्यादा में रहो खू नाम जप करो धर्म पूर्वक अन्न कमाओ परिवार का पोषण समाज का पोषण
विरक्त है भिक्षा दि के द्वारा अपना उदर पोषण आकाश वृत्ति के द्वारा उदर पोषण जीवन भजन तो ऐसी ऐसी देवियां हुई है पूज्य राधा बाबा कहते कि आनंदमय माता को जब हम देखते थे तो ऐसा लगता था कि बस सिंह नहीं है साक्षात अंबा बैठी है बाल ब्रह्म चरणी निरंतर भजन परायण तो राधा बाबा कहते थे कि जब आनंदमय माता को देखते तो ऐसा लगता साक्षात अंबा बैठी बस सिंह पास नहीं है नहीं तो साक्षात जगदंबा बैठी दैवी शक्ति जागृत कर ली पुरुष नपुंसक नारवा जीव चराचर कोई सर्व भाव भज कपट तज मोहि परम प्री सोय जो भगवान के मार्ग में पवित्रता से जीवन निर्वाह करते हुए चलता कोटि कोटि बंदन देखो मीराज जी हुई कितनी बड़ी-बड़ी भक्ताई हमारे देश में हुई जो एक से एक दिव्य भाव में कितना कष्ट दिया गया मीरा जी को जब मीरा जी पहले दिन ब्याह करके ले गए थे तो उनको पहले दिन बता दिया था कि हमारा ब्याह हो चुका है श्री कृष्ण गिरिधर से तब उन्होंने कहा था एकांत में तुम और हम जब मिलेंगे तो आप हमारी गुरु होगी मैं आपका शिष्य होंगा कभी पति नहीं पर समाज में
आपको पत्नी का स्वांग करना ना पड़ेगा नहीं तो घर परिवार वाले तो समाज में जब होता तो पत्नी का स्वांग करते हो एकांत में जब होता तो चरणों के पास बैठ कर के सा उपदेश सुनते थे मीरा जी से मीरा जी ने बता दिया था मेरे प्रीतम श्री कृष्ण परम पवित्र परम ब्रह्मचारिणी मीरा जी परम ब्याह हुआ था लेकिन एकांत में गुरु शिष्य की तरह रहते थे ये एकांतिक बात है मीरा जी की उन्होंने बता दिया था मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो ना कोई जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई आप निमित्त मात्र हैं उन्होने कहा मुझे सौभाग्य होगा कि आप हमें एकांत में शिष्य रूप से स्वीकार करें ऐसा ही जीवन रहा तो कोई भी भजन करे भजन करके यदि भगवान को चाहे तो निश्चित प्राप्त कर सकता कोई भी हो चराचर जगत में पर भगवान को कपट छल अच्छा नहीं लगता भगवान ने अपने हृदय की बात कही निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहे कपट छल छिद्र कपट छल छिद्र भगवान को ड्रामेबाजी अच्छा नहीं लगता हम दोषी हैं पापी हैं नीच है प्रभु आपके हैं जैसे हैं और खुले हृदय से प्रभु को पुकारे तो जन
अवगुण प्रभु मान न काऊ दीन बंधु हति मृदुल स्वभाव सारी गलतियों को माफ करके भगवान उसे अपना साक्षात्कार देते हैं राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधारा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा धा श्री राधा
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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