॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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जानिए धर्म क्या है ? कर्म और धर्म में क्या अंतर है ?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

स्वाती जी बता श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मेरा प्रश्न है कि कर्म और धर्म में बड़ा कौन कर्म करने वाले व्यक्ति के कर्म बहुत एकांतिक सुना नहीं होगा किसका है हा एकांतिक नहीं सुना होगा इसलिए प्रश्न किया है क्योंकि एकांतिक में कई बार चर्चा हो गई है कर्म वही जो धर्म से युक्त हो अगर धर्म से युक्त नहीं तो कुकर्म है वह कर्म थोड़ी कहा जा सकता है व कर्म हो जाएगा जो धर्म विरुद्ध है वो कर्म नहीं है वो कुकर्म है अशुभ कर्म है और जो धर्म से युक्त है उसे ही कर्म कहते हैं तो यह जो भेद की कर्म और धर्म ये सांसारिक शब्दों में है शास्त्रीय शब्दों में धर्म युक्त ही जो क्रिया है उसे कर्म कहते हैं और जो धर्म के विरुद्ध उसे कुकर्म कहते हैं धर्म से विरुद्ध है उसे कुकर्म कहते महाराज जी ये बहुत बड़ी एक भ्रामक वो फैल गई कि धर्म के नाम से मतलब ये होता है कि पूजा पाठ मतलब नहीं जाता मंदिर नहीं जाता धर्म मतलब क्या धर्म का मतलब केवल आरती कर देना मंदिर जाना पूजा पाठ कर देना यह भी उसका एक

अंग है लेकिन धर्म का मतलब आपका उठने से लेकर सय तक जीवन से लेकर मरण तक आपके जितने आचरण है वह सब धर्म युक्त होने चाहिए आपका उठना आपका बोलना आपका दिन चद आपका खानपान कार्यक्रम सब धर्म के अंतर्गत कर अब जैसे एक अधिकारी है उसका कर्म है निर्दोष को बचाना और दोषी को दंड देना अब यह उसका धर्म है धर्म से युक्त कर्म है अब उसने निर्दोष को तो दंड दे दिया और दोषी को छोड़ दिया रुपया ले लिया अब य कुकर्म हो गया समझ रहे ना अ धर्म का मतलब बहुत सब पूरा जीवन है पूरा जीवन है एक आदमी दौड़ के आपके पास है हमें बचा लीजिए वो आदमी मार रहा है अब आपको तत्काल क्ण में आना है क्योंकि शरण में आ गया हम बचाने की सामर्थ्य रखते हैं जितनी उतनी हम कोशिश करते हैं और हम हस कर के उसको उसी के हाथ में उसको दे दिया जो मारने आ रहा था अब ये हत्या हो गई आपके द्वारा और जो अगर बचाने का प्रयास किया उसमें हमको भी कष्ट हो जाता है तो लिखा है परहित लाग तजय जो देही संतत संत प्रंस तेही दूसरे की रक्षा के लिए यदि हमारे शरीर को भी कष्ट हो जाता है

तो सीधे भगवान की प्राप्ति होती है जैसे जटायु जी ने जब सीता जी ने पुकारा हा राम हा राम तो जटायु जी को आवाज में ऐसे दर्द लगा कि जैसे कोई किसी को कष्ट दे रहा है तो आकाश में उड़े तो देखा कि विमान पर सीता जी को लंकाधिपति रावण जटा पहचानते ललका दुष्ट छोड़ पुत्री सीते तू चिंता मत कर और कहां रावण कहां जटायु त्रिभुवन विजेता रावण जटायु तो जटायु ने पंखों से मार काट के फेंक दिया पंख उसके घायल कर दिया अब इतना ही बस था कि चोच और पंख और पंजे इसी से प्रार तो चंद्रहास के द्वारा काट दिव्य तलवार उसके पास काट तो ही गिरा भगवान का चिंतन हुआ य आगे पड़ा जटाय देखा सुमिरत राम चरण की रेखा तो जो महाराज दशरथ पिता थे जो सौभाग्य दशरथ जी को नहीं मिला वो जटाईमेज भगवान ने जटाय जी को अपनी गोद में दुलार करते हुए संपूर्ण अंत क्रिया की और भगवान का स्वरूप धारण करके गीद भगवान के धाम को गया किस कारण से भगवान के भजन तपस्या का कारण नहीं या परहित कारण है सीता जी की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी तो धर्म हर एक चेष्टा

में है देखो हम जो कथाएं बड़े-बड़े महापुरुषों की गाते हैं धर्मात्मा पुरुषों की तो गाते हैं पापा आत्मा की थ गते महाराज शिवी सिंहासन पर बैठे थे तो बड़े धर्मात्मा थे तो उनकी धर्म परीक्षा के लिए एक घटना घटी एक कबूतर आक गोद में बैठ गया महाराज मेरी रक्षा करो तो तुरंत ऐसे कौन है तो देखा कि छत के उसमें बैठ कर के बाज कह रहा है यह मेरा शिकार है महाराज अगर आप दानी है धर्मात्मा है तो इतना जानते हैं कि मैं भी भूखा हूं और मेरा शिकार कबूतर है आप इसको छोड़ दीजिए कबूतर ने कहा महाराज मैं आपकी शरण में हूं आप जानते हैं शरणागत की रक्षा का भाव इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूं मुझे मत दीजिएगा बाज ने कहा महाराज मैं भूखा प्राण त्याग दूंगा क्योंकि कबूतर मेरा शिकार और मैं इसी को खाऊंगा उन्होंने कहा नहीं भाई बात मानो अगर आपको मांस ही पाना है तो मैं अन्य पशुओं का मांस जहां बद होता है पशुओं का वहां से लाकर आपको दे सकता हूं लेकिन कबूतर नहीं दे सकता ये मेरी शरण में आया बोले महाराज आपको पता है कि बाज जो है किसी मरे हुए

पशु का मानस नहीं खाता वो अपने आप शिकार करता और खाता है महाराज मैं राजी नहीं हूं मेरे भी प्राण रक्षा करो कबूतर दे दो उ कहा कबूतर तो नहीं दूंगा अगर इस पर राजी हो कि तुम मेरा मांस ले लो तो मैं तुम्हें दे सकता हूं वहां यह बात हो जाएगी आप अपना मांस दे दो तो तराजू में एक तरफ कबूतर रखा और एक तरफ अपना मांस काटा कबूतर 100 200 250 ग्राम का पर भाई वो कबूतर तो था ले वो तो साक्षात अग्नि देवता अब वो जो जितना मानस रखते जाते हो उतने वजन बढ़ाते जाते आखिरकार स्वयं

बैठ गए और कहा बाज मुझे खा ले लेकिन मैं कबूतर को नहीं दूंगा उस देव राजेंद्र और अग्नि देवता प्रकट हो गए बोले महाराज मैं ना तो कबूतर हूं ना बाज हूं मैं देख रहा था तुम्हारे धर्म की परीक्षा तुम्हारी जय हो महाराज शिवी शिवी का जो महाराज जी का यह धर्म कोई एक छोटी मोटी क्रिया का नाम नहीं है कि कोई मंदिर चला गया अगरबत्ती कर तो धर्मात्मा है धर्मात्मा जीवन की प्रत्येक चेष्टा प्रत्येक चेष्टा धर्म युक्त होनी चाहिए समाल संभाल के पैर रख रहे हैं किसी जीव जंतु र करने लग जाए संभाल के बोल रहे हैं किसी का हृदय ना दुख जाए हमारी हर चेष्टा धर्मम तब वो धर्मात्मा कहा जाता है परिभाषा में देखा जाए तो भागवती कानून जो सबके लिए नियमावली कह सकते हैं उसे तो मतलब जो विधान बनाया गया शास्त्र उचित उसको धर्म कहते हैं कैसे चलना है क्या आपका कर्तव्य है अपने परिवारिक बिल्कुल सब धर्म भगवान के चरणारविंद से जुड़ने से अपने आप आ जाएंगे जो भगवान से विमुख व धर्म को धारण करना बड़ा कठिन है अब जैसे सबसे ज्यादा हमें दुखद घटना इस समय लगती

है कि नौजवान जब अपने माता-पिता को मारते हैं बड़ी शर्म की बात है कि हम रोज इस बात को जागृत करते हैं कि जिन माता-पिता ने मुझे पाला पोषा मतलब कितना गंदा हमारा व्यवहार माता जी के साथ रहा होगा जब हमें ज्ञान नहीं सोच का लघु शंका का और वोह गोद में लिया वहीं हक दिया वही लघु शंका कर दी वोह कभी हमको डांटे नहीं हमको इतना बड़ा किया और जब हम जवान हो गए और वो वृद्धावस्था में शरीर शिथिल है और वो लघु शंका और निकल जाती है सोच निकल जाती है फिर जब वो गाली देते हैं मारते हैं तो लगता है कि मतलब कितना धर्म का ह्रास होता जा रहा है बूढ़े माता-पिता को अनाथालय में छोड़ देना या रोड पर छोड़ देना या मार पीट कर घर के अंदर बहुत दुर्दशा पूर्वक रखना यह सब धर्म विरुद्ध आचरण है और ऐसे आचरण से आपका जीवन आगामी बड़ा दुखद होगा इसलिए गृहस्थी में माता-पिता को भगवान के समान समझो अपने आचरण को पवित्र रखो अब धर्म की परिभाषा कैसे कोई समझेगा जब यह जो गंदी बातें चल गई हैं बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड लिविन रिलेशन यह कैसे धर्म को समझेंगे लोग

कैसे समझेंगे सर हां सरकारी दस्त के कागज बनते हैं लिविन रिलेशन के एक महीना दो महीना ये है क्या भाई तुमने अपने जीवन को चरित्र को क्या समझ रखा है अपना चरित्र बिगड़ गया तो सब कुछ बिगड़ गया अंग्रेजी में था कि जिसका धन गया तो कुछ धन गया तो कुछ नहीं गया स्वास्थ गया तो थोड़ा बहुत गया चरित्र गया तो सब कुछ चला गया अब अब उल्टा है धन के लिए व चरित्र विभेद सकता आज का समाज जो है तो इसलिए हमें लगता है अपने चरित्र को पवित्र रखना चाहिए तभी हम धर्म को समझ पाएंगे जब चरित्र हीन है तो फिर मूल ही धर्म का जो मूल चरित्र है हमारे यहां चरित्र पूजा जाता है और चरित्र ही हीन हो गया आज हमारा समाज चरित्र को नष्ट कर रहा है अपने चरित्र को नष्ट कर रहा है यह बिल्कुल ठीक नहीं है भाई बहनों से सबसे प्रार्थना है जब तक पाणी ग्रहण ना हो तब तक पवित्र रहो ब्रह्मचर्य रहो दोस्ती करो लेकिन गंदे आचरण मत करो तो तुम्हारा जीवन धर्म में रहेगा और जब पहले से य सब भ्रष्टाचार शुरू हो गया तो फिर कहां धर्माचार्य अच्छा लगने लगता है ना तो घर की

रसोई में तृप्ति नहीं होती घर की एक रसोई में बराबर भोजन व नहीं कर सकता क्योंकि उसका पूर्वाभ्यास है आज इस ढाबे का आज उस होटल का ऐसे हर इंद्री का है अगर आपने इंद्रियों को छूट दिए तो आप पति व्रत नहीं रह सकते आप एक पत्नी व्रत नहीं रह सकते फिर आपकी गंदी आदत होगी तो दोनों में भेद होगा फिर गृहस्थ किस काम की पति कहीं पत्नी का भाव कहीं और र एकही घर में रहे ना प्रेम है ना दुलार है तो फिर वो जिंदगी किस काम की तो धर्म का मतलब होश संभालने से लेकर मृत्यु तक जगने से लेकर सोने तक हर आचरण हमारे धर्म युक्त हो तब तो वो कर्म होंगे नहीं तो फिर कुकर्म बन जाएंगे धर्म विरुद्ध आचरण कुकर्म बन जाता है

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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