एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #723 · 9 नवंबर 2024
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
अभिषेक कुमार पांडे जी पटना बिहार से जय श्री ह जय श्री राधे महाराज जी श्री हरिवंश आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी किस पाप कर्म का क्या प्रश्चित होगा कैसे पता चलेगा और पाप कर्म का प्रश्चित कैसे करें शास्त्रों का स्वाध्याय महाभारत में भगवान शिव से पार्वती जी प्रश्न करते जाते हैं कि आदमी अंधा क्यों होता है उसके पाप का लकवा क्यों मार जाता है उसकी बुद्धि क्यों खराब हो जाती है उसका अंग ये क्यों महीन शास्त्रों में लिखा शास्त्रों का स्वाध्याय करो अब ऐसे एक पाप हो 10 पाप हो तो बता दे वृतिया हजारों है तो हजारों वृत्तियों का असत में प्रयोग है तो सब पाप ही तो होगा विनाश सत के पाप से नहीं बचा जा सकता असत चिंतन असत भोग वासना तो हमारा चिंतन पाप हमारी क्रिया पाप हमारा बोलना हमारा देखना सब पाप में हो सकता है सबसे बचना है तो भगवान के नाम का स्मरण करता जाए तो बुद्धि रूपी सारथी को ठीक रास्ते में नाम भगवान चलाएंगे ई भजन सारथी सुजाना भगवान का भजन ही बुद्धि को शुद्ध करता है और शुद्ध बुद्धि निष्पाप
होती है और जो पूर्व में पाप हो जाते हैं वो भी भजन नष्ट कर देता है नाम संकीर्तन यस्य सर्व पाप प्रणास पर अगर यह जानकारी करने कि किस पाप का क्या फल होता है तो महाभारत ले लीजिए उसमें देवाधि देव महादेव पार्वती संवाद है जिसमें बहुत बड़ा प्रसंग है सब में कौन सा पाप करने का क्या फल होता है भ्रूण हत्या गर्भ हत्या इनका सबका क्या दंड मिलता है सब लिखा हुआ है तो उसको पढ़ लीजिए तो अब एक दो पेज में हो तो उसको याद करके बोलो तो बहुत प्रसंग है तो पढ़ लीजिए और बकाया कुछ ना पढो तो तुम्हें बता दें कि कौन सा पाप तुम्हारे हृदय से प्रकट हो रहा है अंदर भगवान बैठा हुआ है वो तुम्हें तुरंत संकेत करता है यह पाप है इसका भयानक दंड होगा लेकिन हम लोग उनकी आवाज नहीं सुनते और मन की बात मान कर के चल देते हैं अंदर सच्चिदानंद भगवान सबके बैठे हुए हैं और व सबको प्रेरणा करते हैं गलत है फस जाओगे इसका दंड होगा जहां वह आदेश करते हैं वहां हम सुन नहीं पाते और फिर बाद में कोई कोई कहता कि यार मेरे मन में तो आया था कि ना करू पर पता
नहीं क्यों कर लिया ऐसा नहीं वो भगवान अंदर जलन देते हैं अंदर आपको रोकते हैं पर आप नहीं रुकते हैं कर बैठते हैं उस वो पाप होता है और जो शास्त्र प्रमाणित क्रियाएं होती वो पुण्य होता है और जो भजन होता है पाप पुण्य दोनों का विनाश करके भगवत प्राप्ति कराता है जान तो अगर अपने धर्म का ज्ञान करना है तो वेदो नित्य मधी अता रोज शास्त्रों का स्वाध्याय करो संगा सत सु विधेय काम महापुरुषों का संग करो और महावाक्यास विचार काम जो महावाक्य संतों के हैं उन पर विचार करो
और एकांत सुखमा शतामन्म पवित्र अन्य के द्वारा प्राणों का पोषण करो तो अभी भगवान के मार्ग के पथिक बन जाओगे पाप का कोई सवाल ही नहीं उठता जो उठे हैं हमसे हुए हैं वो भगवान कृपा करके नष्ट कर देंगे नहीं बहुत बड़ी दुर्गति है जीव की वो देखने में जैसे घटनाएं हैं ना तो लगता है दूसरों पे हो र मेरे पे तो होनी नहीं है क्योंकि हम नहीं वो अपने ऊपर भी है आदमी मस्ती से जा रहा है अपने साइड से जा रहा है अब ड्राइवर का कंट्रोल चिथड़ा उड़ गए एक पाप का कर्म आया उसको नष्ट
कर दिया वो बैठे चाय पी रहा पीछे से दीवाल गिरी दब के मर गया जरा जरा से कितनी घटनाएं शास्त्रों लाखों घटनाएं ये सब अपने-अपने कर्म का भोग भोगना होता है और मनुष्य शरीर बना ही दोष है पाप और पुण्य से तो सबके जीवन में दो घटनाएं घटने विपत्ति संपत्ति सुख और दुख इसी से मुक्त होने के लिए अध्यात्म है संपूर्ण विपत्तियों का नाश संपूर्ण दुख का नाश एक मात्र आनंद ही आनंद पाप अगर है तो संपूर्ण शब्द नहीं लगेगा पाप जहां खत्म हुआ तो फिर दुख है ही नहीं आनंद है भगवान का
स्वरूप आनंद में और अपना स्वरूप आनंद में नहीं ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन अमल सहज सुख राशि सुख राशि सहज सहज में सुख जिस सुख को जान लेने पर समाधि लग जाती है शंकर सहज स्वरूप सहारा लाग समाधि अखंड अपरा तो ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन अमल सहज सुख राश सहज सुख अपना स्वरूप है और अपने जो अंशी है जो आनंद सिं सुख राशि वो भी सुख राशि है ना सुख राशि का बच्चा सुख राशि ही तो होगा हम सुख राशि हैं लेकिन पाप कर्म करके दुख में फंस गए देखो लोग जब जीवों को उबाल हैं भूज हैं काटते हैं उनमें भी तो भगवान है चैतन्य परमात्मा है अब आप जो पाप कर रहे हो अब तुम्हें भूजा जाएगा तो हम तो कई बार एकांतिक में कहा है भगवान जानते हो कैसे भूज हैं एसी गाड़ी में चल रहे हैं फिल्मी गाना बज रहे है व आग लग गई और पहले वो तार बंद हुए जो रिमोट से दरवाजा खुलता है पहले वोह तार नष्ट हुए अब दरवाजा नहीं खुल रहा जैसे वह जीव तुमने कढ़ाई में डाला था ना व चिट चिट करके वही मर गया तड़प तड़प के अब ऐसे गाड़ी में एसी गाड़ी में बाहर से लोग तमाशा देख रहे
हैं व बुन गए इतने में बहुत अवश्य में भक्त व्यम कृतम कर्म सुभास एक तितली की गुदा में कांटा डाल के छोड़ दिया था मांडव ऋषि ने तो सूली अंदर डाली गई थी एक बाण से ऐसे उठा कर के सांप को काटों की झाड़ी में फेंक दिया था तो छ महीना बाणों की सैया पर भीष्म पितामह जी रहे हम तुम क्या चीज है बड़े-बड़े ऋषि मुनियों को भोगना पड़ता है इसलिए डरो तुम्हारे द्वारा कोई पाप ना हो जाए और वह डर तुम्हें निडर कर देगा जो कानून से डरता है शास्त्र से डरता है भगवान से डरता है समाज से डरता है वो महान हो जाता है और जो इनसे नहीं डरता है वो भ्रष्ट नीच पुरुष हो जाता है आप देख लो समाज का भय ना हो कानून का भय ना हो भगवान का भय ना हो तो फिर क्या व राक्षस ही हो जाएगा देख लो जिनको भय नहीं व राक्षस है और जिनको भय है यार चार लोग क्या कहेंगे बस यही डर उसको संभाल देगा नहीं यार हम ऐसा ऐसा नहीं करें समाज का भय भगवान का भ है तो यह हमें निष्पाप बनाता है तो हम पापों का फल पढ़े या ना पढ़े सीधे पापों का विनाश करें ना जो भी हो उनका विनाश
होता है भगवान नाम से भगवान की शरण में हो जाओ खूब नाम जप करो और अबलो नसानी अबना आज तक कि अब नहीं करूंगा सबका मंगल हो जाएगा भगवान बड़े कृपालु हैं अगर वह क्षमा ना करें तो हम लोगों की सबकी दुर्गति हो जाए सबसे पाप होते हैं नहीं होते अपने अपने जीवन में पीछे के समय को देखो आज से लेकर और उनको अगर देखो तो कितने बड़े-बड़े पाप हो गए हमसे लेकिन भगवान ने दंड नहीं दिया हमें क्षमा किया है हम उनके पुत्र हैं उनके अंश हैं तो हम उनका नाम जप करें और निष्पाप होकर आगे
कोई पाप ना हो आगे हमारा अच्छा आचरण हो ठीक है कभी आपको समय मिले तो महाभारत पढ़ लेना गीता प्रश् गोरख पुर से आती है और तीसरे चौथे ख जिस खंड में हो देख लेना शिव पार्वती संवाद और बड़ा प्रसंग है उसमें पार्वती जी प्रश्न करती जाती हैं कि उसका अंग कैसे खराब हो गया कौन सा पाप किया था तो बताते हैं यह पाप करने से यह अंग खराब होता है यह पाप करने से वो कुछ होता है ऐसे पाप से दुष्ट पुत्र पैदा होगा ऐसा पैदा होगा ऐसे सब वर्णन है ऐसे सुकृत से महात्मा पुत्र पैदा हो
ऐसे बड़ा वर्णन शास्त्रों का स्वाध्याय करने से ज्ञान अर्जन होता है जी डॉक्टर प्रकृति सक्सेना जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी भगवान में आस्था है पर पूजा पाठ है सत्संग में मन नहीं लगता पूजा करती हूं पर श्रद्धा से नहीं डर से फिर लगता है भगवान तो अपने ही है फिर डर क्यों नहीं डर अच्छा है यही डर ही डर हरिवंश हित जिन भ्रम गुण सलिल पर वही तो हम कह थे भगवान से पूजा में मत डरो कर्म में डरो कि हमसे कोई गलत कर्म ना बन जाए देखो पुलिस डरने वाली बात नहीं है कानून विरुद्ध आचरण डराता है नहीं आप कानून विरुद्ध आचरण ना करो आप जाइए कि हम उत्सव करने वाले तो 10 लोग खड़े हो जाएंगे आपकी सेवा में 10 पुलिस वाले आ जाएंगे आप कीजिए उत्सव आप कह दीजिए कि मुझे थोड़ा समस्या है कि मैं वहां जाना है हमको आप प्लीज हमारा सहयोग कर दीजिए मुझे डर लग रहा है मे पास को वो आपका सहयोग कर देंगे आप जब कानून के विरुद्ध करेंगे तो वर्दी देखते आप बत हो जाएंगे नहीं हो जाएंगे तो आज नहीं कल हम लोगों से पाप हुए हैं जो हमको भय प्रदान करते
हैं पाप के बिना भय शब्द नहीं ध्यान रखना यह शब्द हम जो बोल रहे हैं ये पाप के है भय चिंता शोक उद्वेग अशांति जन्म मृत्यु यह पाप के लक्षण बड़े-बड़े संत महंतों मुनियों को भी देखो कष्ट नहीं इस शरीर से जो गलती होगी और कभी-कभी संत जन अपने शरणागत के पाप को ले लेते हैं बड़े जो महापुरुष होते हैं देखा कि अ ये तो इसका तो भजन रुक जाएगा तो संकल्प किया उसके पाप को स्वयं अपने शरीर में ले लिया मिटा नहीं सकते ध्यान रखना अवश्य में भक्त अवम भगवान के वचन है तो इसलिए एकमात्र भगवान की शरण भगवान का चिंतन भगवान का आश्रय यही जीव का परम मंगल करता है ना इधर-उधर किसी की दृष्टि दे कि कोई तुम्हें सुधार सकता है कोई तुम्हें तुम्हें सुधरना पड़ेगा देखो हम आपसे बातचीत केवल कर रहे हैं आपने मान लिया हमारी बात तो आप कहोगे बाबा की बड़ी कृपा उसी दिन से हमारा जीवन संभल गया सही पूछो तो आपने अपने ऊपर कृपा करी आपने बात मान ली तो बात मान लो तो परम मंगल हो जाएगा यह जीवन भगवान के लिए हमारे दिमाग में केवल एक ही बात है जीव चाहे जैसे
राधा राधा बोल दे बस उसका मंगल हो जाएगा अगर भगवान का नाम नहीं है भगवान का स्मरण नहीं तो सब जानकारियां सब धन संपत्ति रूप जो भी है सब बेकार है शरीर छूटा खत्म ना कोई जानकारी ना रुपया ना पैसा ना पद ना प्रतिष्ठा कोई साथ जाने वाला नहीं क्या प्रश्न था सखी का श्रद्धा से पूजा नहीं करते डर से करते हैं डर से करो तो श्रद्धा हो जाएगी इनका एक आगे भी है कि अच्छे कर्म काफी है या पूजा पाठ के बिना उसका फल नहीं मिल आप उसको अलग-अलग क्यों कर रहे हैं अच्छे कर्म हम भगवान के लिए ही तो कर रहे हैं ना अपने लिए क्यों माने अच्छे कर्म भगवान के लिए मैं कर रहा हूं तभी वो अच्छे माने जाएंगे अपने लिए माना हुआ स्वार्थ पूरत शुभ कर्म हो सकता है पुण्य वो कोई खास चीज नहीं है एक महाराज निग हुए हैं भागवत में पढ़ लेना करोड़ों अरबों गौएं दान किए और सबके पैर में खुरो में सींग में ऐसे सब सोना लगा के ब्राह्मणों और एक अपराध बन गया तो द्वारिका में गिरगिट के रूप में जन्मे थे क्या पुण्य इतना बड़ा पुण्य और एक अपराध उनको गिरगिट बना दिया
बहुत बड़ी बड़ी यज्ञ करने वाले महाराजा नहुष जो देवराज इंद्र के पद पर बैठे एक अपराध सची के प्रति गंदी दृष्टि करने पर उनको अजगर की योनि प्राप्त हुई अजगर की यो हमय बताना चाहते हैं कि अच्छे कर का मतलब है भागवत कर्म पुण्य का कोई ज्यादा महत्व नहीं आप एक रुपया दोगे मेरा ठाकुर वो और दे देगा उसे क्या होगा क्या आप बहुत विवेक से देखिए अच्छा कर्म किसे कहते हैं जो दूसरों के लिए मंगल किया जाए उसे अच्छा कर्म कहते हैं अपने लिए किया हुआ स्वार्थ होता है अपने लिए हर
कार्य व स्वार्थ होता है दूसरों के लिए किया हुआ धर्म कार्य कहा जाता है अच्छा कार्य परहित सरिस धर्म नहीं भाई अब आप विचार करो जब दूसरों के प्रति हम कार्य करते हैं तो उनमें भावना क्या होनी चाहिए व्यक्ति गरीब आदमी नहीं भगवत भावना मेरे भगवान इस स् रूप में आकर सेवा ले रहे हैं और जो सेवा दे रहे हैं वो त् दयम वस्तु गोविंदम तुभ में समरपुर हैं यह है भागवत कार्य यह है अच्छा कार्य अच्छा कार्य किसे कहते हैं किसका प्रश्न था कि अच्छा कार्य किसे कहते हैं दूसरो की
अच्छी चीज सोच के हा बस बस मुझे ये जी हमारी बात केवल समझने की चेष्टा कीजिए कि हम जो कह रहे हैं वह तुम्हारे लिए बहुत मंगलमय होगा दूसरे में यदि हम गरीब आदमी देखेंगे पहले कह दिया है आपको दूसरे में यदि मैं तो फिर वह एक पुण्य होगा और हम देख रहे मेरे भगवान है मरीज के रू उनका दुख सर अपना लगता है मैं डॉक्टर ही हूं मरीज को भगवान मानना ये डॉक्टर की सबसे बड़ी पूजा है उसको गरीब नहीं देखना भगवान इस रूप में आए अग अध्यात्म की स्थिति में इसीलिए हम डॉक्टर मास्टर जज वकील जो जहां है वहीं वही उसको भजन की पद्धति वही वही अपने कर्तव्य को भगवान की पूजा मान लेना अध्यात्म की पूर्ति है अगर हम उसको गरीब आदमी मान कर के बीमार मानकर केवल डॉक्टरी करते हैं तो हमारा केवल कर्म होता है कर्म योग नहीं होता ध्यान रखना कल्याण कर्म से नहीं होता कर्म योग से होता है आप कर्म करते हैं आपको पैसा मिलता है कर्म योग करेंगे तो पैसा भी मिलेगा भगवान भी मिलेंगे कितना बढ़िया लाभ हो गया केवल उस मरीज में भगवत भावना करने मेरे प्रभु इस रूप में
पधारे जो प्रभु ने मुझे ज्ञान दिया उसके द्वारा मैं उसका दुख दूर कर रहे जो सामने आया हुआ प्रभु बढ़िया मंगल हो गया अध्यात्म भगवत भाव सिखाता है अगर अचित भाव भगवत भाव नहीं है तो हर कार्य आपका व्यर्थ है हर कार्य ऊंचा से ऊंचा क्योंकि उसका होगा पुण्य और पुण्य से मिलेंगे ऊपर के लोग तो आप ब्रह्म भूना लोकान पुनरावर्तन अर्जुन ब्रह्म लोक तक तो परिवर्तन ही परिवर्तन नाशवान है आ ब्रम स्तंभ पर्यंत सर्वम माया मयम जगत तो लाभ क्या मिला और अगर हम भगवान की भावना करके एक कुत्ते को भी रोटी डाल देते हैं तो वह भी भगवत प्राप्ति के योग्य कार्य बन गया हमारी बात को समझना नामदेव जी ने जब कुत्ते में भगवान की भावना करके रोटी दी तो वहीं विट्ठल भगवान वही विट्ठल भगवान प्रकट हो गए तो हमें जीवन मिला है भगवत प्राप्ति के लिए तो भगवत प्राप्ति कैसे होगी जो भगवान ने हमें कार्य दिया है जो कार्य किसान हो व्यापारी हो जो भी आप कार्य कर रहे हो उसे अपने धर्म के अनुसार करो और उसे भगवान को अर्पित कर दो और जितना बन सके नाम जप करो आप
गृहस्थ में होते हुए भी आत्मा है अच्छा इसमें कोई परेशा की जरूरत नहीं इसमें कोई परेशानी की जरूरत नहीं जैसे आप डॉक्टर भगवान ने आपको ज्ञान दिया है हजारों मरीजों के दुख का निवारण करने की योग्यता आप में अब आप पैसे की प्रधानता ना रख के भगवत भाव रखें तो जहां अर्थ की प्रधानता है वो चाहे जितना तुम कर्म करो वह दो ही श्रेणी में रहेगा शुभ और अशुभ और जहां भगवत भाव की प्रधानता है वो शुभ अशुभ को विध्वंस करके वो कर्म योग बन गया और कर्म योग भगवान से सीधे जुड़ता है
तो काम तो वही कर रहे हो भगवान से जुड़ गए कितनी बढ़िया बात हो गई तो इसलिए हर कर्म भगवान को समर्पित करें हर कर्म भगवत भाव से करें और हर कर्म में जो भी हम सेवा कर रहे हैं वो भगवान की दी हुई बुद्धि या वस्तु से कर रहे हैं बढ़िया एकदम निष्काम अहंकार रहित वो महात्मा है चाहे वो किसान हो चाहे व्यापारी हो चाहे डॉक्टर हो चाहे वकील हो चाहे जज हो कोई भी हो अपने कर्तव्य का पालन दो बातें जिसमें आ गई वो नष्ट हो जाएगा प्रलोभन या भय भय या प्रलोभन कैसा भय आप इस मरीज को हटाइए समाप्त कीजिए अब कुछ भी हो जाए व मरीज तुम्हारे लिए भगवान उसकी रक्षा करना उसकी सुरक्षा तुम्हारा है कानून का सहयोग लो हर सहयोग लो डरो मत एकदम नहीं तो आप अपने धर्म से चूक कर बैठेंगे और प्रलोभन य रुपया लो एक डॉक्टर साहब आए थे उन्होंने कहा था हमारे पास कितने ऐसे लोग आते हैं जो अपने परिवार वालों को मारने के लिए ऐसे जहर की आा करते हैं जो दो महीने तीन महीने चार महीने में धीरे-धीरे मार दे और बड़ी मोटी रकम मिलती क्या वो लेना पाप है तो हम कहा
आप बताओ जरा विचार करके हमसे पूछ ले आ आप ही बताओ आप ही बताओ बोले है तो गलत तो हमका फिर चूक मत करना तो यह आप जो अच्छे कार्य है वह भागवत कार्य में तो कर्म योग बन जाएगा भगवान की प्राप्ति हो जाएगी संजय अग्रवाल जी राधे राधे नदीश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी वृंदावन परिक्रमा और गोवर्धन परिक्रमा के फल में क्या अंतर है कोई नहीं अंतर है ये प्रिया प्रीतम की कड़ा भूमि वृंदावन ऐसे प्रिया प्रीतम की क्रीड़ा भूमि गिरिराज जी उनकी तलहटी में भी तो श्यामा श्याम खेलते हैं हां उसमें कोई अंतर नहीं चाहे वृंदावन की लगाओ चाहे गिरिराज जी की लगाओ चाहे बरसाने की लगाओ सब प्रभु के ही हैं प्रिया प्रीतम के ही घर है अय कि जिनको शरीर में ज्यादा सामर्थ्य है वही गिरिराज जी की परिक्रमा लगा सकते हैं 21 किलोमीटर पैदल दल जिनमें थोड़ा बल है नहीं बल है तो 6 किलोमीटर बरसाने की लगा लो और वृंदावन की है तो 1214 किलोमीटर होगी 12 14 किलोमीटर 12 किलोमीटर हां ऐसे होगी तो अच्छा और भी ना कुछ लगा पाओ तो राधा वल्लभ जी
बिहारी जी के चार परिक्रमा कर लो मंदिर की वही फल मिल जाएगा सबके लिए भगवान ने बना अब जैसे शरीर है तो उत्साह पूर्वक 21 किलोमीटर वाली पकड़ना चाहिए कि थोड़ा थके थोड़ा कष्ट आवे शरीर में हमारे पाप नष्ट हो भगवान की कृपा मिले तो अगर हो सके तो एक बार तो जरूर लगानी चाहिए हां कोई कोई तो तीन-तीन परिक्रमा गिरिराज जी की रोज लगाते हैं कोई संत भगवान ऐसे हैं तीन परिक्रमा रोज लगाते गिरिराज जी की और कोई कोई तो मतलब ब्रज चौ कोष की भी परिक्रमा तो अपने कम से कम जब ब्रज
में आवे तो एक एक परिक्रमा चयन कर ले कि इस बार गिरिराज जी की फिर कभी बरसा कभी इससे पवित्र होता सब तीर्थों के अवगाहन से जो फल मिलता है ना ब्रजभूमि में किसी भी जगह परिक्रमा लोटपोट हो जाए उससे सब पाप नष्ट हो जाते हैं जी महाराज जी आज्ञा हो किसी ने एक बार मैं परिक्रमा कर रहा था महाराज जी मैंने दोनों परिक्रमा की हुई है तो उन्होंने कहा कि गोवर्धन महाराज जी की परिक्रमा करोगे तो आपकी कोई इच्छा पूर्ति होती है और वृंदावन जी की परिक्रमा करोगे तो आपको मोक्ष की
प्राप्ति होती है ऐसा नहीं गिरिराज जी केवल इच्छा पूर्ति नहीं करते गिरिराज जी भगवत प्राप्त करा में पूर्ण सामर्थ्य शली भगवत साक्षात्कार गिरिराज जी की तलती में कितने सिद्धों को होता है और गिरिराज जी भगवत प्राप्ति कराने में इतने समर्थ है कि अभी कुछ दिन पहले गिरिराज जी की चर्चा की थी जो रोज सत्संग सुनते हैं उन्होंने सुना होगा कि एक बाहर का कोई ब्राह्मण यहां मथुरा कर्जा लिए हुए था तो वह कर्जा निपटाने के लिए आया तो वह जब मथुरा से गिरिराज जी की तरफ चला तो
एक सुंदर शिला गिरिराज जी की छोटी छोटी उठाया खेल में जेब में डाल लिया और वो जा रहा था तो आगे एक भयानक राक्षस उनके सामने प्रकट हो गया और कहा मैं बहुत भूखा हूं मैं और उनके ऊपर आक्रमण करने गर्ग संहिता में गर्ग संहिता में चरित्र तो उसको लगा क्या तो ऐसे गिरिराज जी की शिला उठाई मार दी जही गिरिराज जी की शिला का स्पर्श हुआ वो चतुर्भुज भगवान हरि का रूप धारण कर लिया तो उन ब्राह्मण ने कहा महाराज यह कैसे हो गया आप कौन है आप तो अभी भयानक रूप में थे तो उन्होंने
कहा मैं राक्षस योनि से इन गिरिराज जी के स्पर्श से हमारा उद्धार हुआ गिरिराज जी से सीधे हरि रूप तो हमारी मान्यता है जो गिरिराज जी वही वृंदावन वही बरसाना हां अब वृंदावन में आप इच्छा करोगे कामना करोगे तो वृंदावन कल्पतरु आपकी कामना पूर्ति कर देगा ऐसे गिरिराज जी में आप कामना करोगे तो कामना अगर कामना नहीं करोगे तो भगवत प्राप्ति सीधा फल भगवत प्राप्ति है ऐसे हम भजन कर रहे कामना कर रहे हैं तो कामना की पूर्ति होगी भगवान थोड़ी मिल जाएंगे और जब निष्काम भजन करेंगे तो भगवान की प्राप्ति होती प्रियांशी जी फरीदाबाद से राधा वल्लभ शी हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी सब लोग भिन्न भिन्न क्यों है सभी लोग सत मार्ग पर चलकर अच्छे कर्म क्यों नहीं करते मुझे लगता है हमारे कर्म तन मन सब कुछ भगवान कंट्रोल कर किसका प्रश्न है अच्छा तुम्हारा प्रश्न है कैसे समझोगे बच्चा हो भी तीन गुण है पूरी सृष्टि को रचने में सतोगुण रजोगुण तमोगुण सतोगुण वाले अच्छे स्वभाव वाले दया करना भजन करना दूसरों का हित
करना ऐसे स्वभाव वाले लोग होते हैं जो रजोगुण की रचना होती है बड़े-बड़े कार्य करना भोगों की इच्छा करना और इस तरह के छल कपट नाना प्रकार के रजोगुण में और तमोगुण में हिंसा पाप आलस्य प्रमाद ये सब तो तीन गुण है इसलिए तीनों का प्रभाव सबके ऊपर रहता है किसी में सतोगुण अधिक होता है किसी में रजोगुण तमोगुण कम और किसी में रजोगुण अधिक होता है सतोगुण तमोगुण कम किसी में घोर तमोगुण होता है रज सत की बिल्कुल नाम मात्र पा जिसमें घोर तमोगुण होगा वो राक्षस स्वभाव का होगा जिसमें घोर रजोगुण होगा बिल्कुल राजशी और जिसमें शुद्ध सतोगुण होगा वो भगवान का भक्त प्रिय होगा तो इन गुणों के प्रभाव से अलग-अलग खोपड़ हों की रचना हुई तीन गुणों से सृष्टि की रचना की है उन गुणों में ब्रह्मा जी रजोगुण विष्णु भगवान सतोगुण और भगवान शंकर तमोगुण इसीलिए विनाशकारी उनका उनकी सेवा सृष्टि का संघार ब्रह्मा जी का है रचना और भगवान का है पालन मतलब सतोगुण पालन करता है रजोगुण कामा आदि के द्वारा उत्पन्न करता है और तमोगुण फिर विनाश लीला होती है
उसमें घोर तमोगुण हिंसात्मक स्वभाव वाला होता है विनाशी स्वभाव वाला खेल ना उनका खेल है जैसे हम विविध प्रकार के खेल खेलते हैं तो खेल में क्या होता है दो पक्ष बनते हैं और दो पक्ष में एक हार होती है एक जीत होती है हम ही लोग जैसे आप बैठ कर के वो खेलो लूडो चार लोग बैठ के खेलोगे घर के खेलोगे लेकिन उनमें एक जीतेगा फर्स्ट और फिर एक आखिरी हारेगा जो आखिरी में आखिरी वाला संतुष्ट होगा पहले वाला हर्षित होगा बीच वाला ठीक में रहेंगे ना वो हर्षित है ना शकित है दो तीन वाले हर्षित शकित नहीं ले फर्स्ट वाला हर्षित होगा फर्स्ट आ गए और जो फोर्थ आया वो थोड़ा एक खेल है भगवान का अपने आप में अपने आप से त्रिगुण माया का खेल है अब इसी में भजन करके इस खेल से निकल जाए यही रचा गया गेम है एक गेम स्त्री पुरुष अच्छा बुरा ये भगवान ने अपने आप को रचा है तुम्हें नहीं अपने आप को रचा ये सब वही है आप समझ नहीं पा रहे अब इसमें जो इस शरीर में आसक्त हो गया अब निकलो ये गेम है इस शरीर की आसक्ति से नहीं निकलोगे तो फिर अगला गेम है सुवर
कुत्ता कीट पतंगा और भूत प्रेत ये भी गेम है और अगर भजन कर ले गए तो जीवन मुक्त हो गए गेम में फर्स्ट क्लास पास हो गए और भगवान गले लगा लिए अब ये गेम है बच्चा गेम क्यों तो फिर इसका उत्तर ले एक को हम बहु श्यामा ये गेम है उनका बहु श्यामा से एको हम मुक्त हो गए एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति अनुभव करो मुक्त हो गए अपने आप से बोले भगवान ने मुझे क्यों फसा दिया तुम कौन हो वही तो हो यही नहीं जान रहे हो इसलिए फसे हो यही जान लो मुक्त हो जाओगे जानत तुम्ह तुम हो जाए अब बच्चा हो धीरे-धीरे अभी नाम जप करो फिर आगे चलकर भगवान से प्रार्थना करना इस गेम को क्यों बनाया मालिक और इस गेम से निकालो हमें तो वह सब बता देंगे सोय जाने जी देहु जनाई और जानत तुम्हे तुम्ह वही जान सकता है जिसे भगवान जना दे और जो जान गया वह भगवत स्वरूप हो जाता है क्योंकि भगवत स्वरूप था भगवत स्वरूप है भगवत स्वरूप रहेगा भूल से शरीरों को मैं मानकर दुर्गति हो रही है अभी बच्चा हो नाम जप करो ठीक है अच्छा पंडित जी बाबा महाराज प्रक वर्ष कृपा मूर्ति
स्वामिनी जी मेरी सु को करा लाड़ली जी को मेरी सुध कौन करा है ऐसों को जो मो गरीब की बरबस वा गवे उन मेरी सुध कौन करावे कहा मैं पतित कहां श्री राधा मेरो समझत ही अखला व्यास स्वामिनी बिन भोरी को आस महाराज जी मैं आसू की भी मांग आया रंग ब्रजवासी हूं आप मुग भाव दे मेरे आंसू सुख महाराज जी आंसू ना आंसू आना कोई खास बात नहीं है प्रेम का केवल लक्षण आंसू ही नहीं है शायद इसको इश्क कहते हो जैसे कोई दिल को मसला करे भाई जी से हनुमान प्रसाद पदार जी ने प्रेम दर्शन में लिखा कि प्रेम अपने प्रीतम के लिए हृदय में एक कसक एक पीड़ा एक अजीब सी स्थिति बस उनकी याद ले लेकर के कराहना कभी-कभी आंसू भी सूख जाते हैं आंसू भी नहीं निकलते पर हृदय की जो व्याकुलता है वही है श्री जी से मिलन की जैसे गोपी जन व्याकुल हो गई प्रभु के लिए तो रुदु राजन कृष्ण दर्शन लालसा तासा महावीर भूत छोरी स्मय मान मुखा बुजा पीतांबर धरा श साक्षा मथ मन मता तो हमारी लाडली जू तो लाल जू से भी कृपालु है सहज स्वभाव पर नवल किशोरी जू को मृदु दयालुता कृपालु
की राशि है तो हम जैसे भी हैं किशोरी जी के हैं और निरंतर स्मृति बस जितने भी संत महात्मा भगवत प्राप्त हुए हैं उनके श्री मुख का जो उच्छिष्ट मिला है वो यही मिला है कि निरंतर भगवत स्मृति हर क्षण वर्तमान प्रभु से जुड़ा होना वर्तमान हमें ना भूत की चिंता है ना भविष्य की हमारा वर्तमान प्रभु से जुड़ा हम राधा राधा राधा राधा हो गया हमारा काम इसी देखी रूप नाम आधि ना जैसे नाम चलेगा निरंतर ना तो रूप छा जाएगा और रूप छा गया तो बकाया क्या रहा है लीला में प्रवेश हो
गया नाम और रूप ये जब दोनों तो ये भगवान की लीला में प्रवेश पाने के लिए दो पक्ष है नाम और रूप तभी धाम की जो लीला है वो प्रकाशित होती है तो मूल है नाम जैसे चद्दर का चार कोना है एक कोना पकड़ लो तो तीन कोना अपने आप समिट आएंगे नाम रूप लीला धाम तो नाम पकड़ लिया राधा राधा तो नाम रूप को पकड़ के प्रकाशित करेगा और रूपा शक्ति लीला में प्रवेश करा दे और जहां लीला हो रही वो धाम अपने आप प्रकाशित हो जाएगा हम निरंतर नाम परायण रहे और नाम के लिए सबसे खास बात महाप्रभु चैतन्य देव जी ने कही णा दप सुनी चन तरो स सुना अमानी ना मान देन कीर्त निया सदा हरी यदि हम चराचर जगत को अपने स्वामी का रूप मानकर दैन्य भाव से अपने को त्रण से भी नीच समझे और भगवान के द्वारा दिया हुआ प्रसाद मान कर के हर प्रतिकूलता को आनंद पूर्वक सहे ूरी से सुना और दूसरों को मान देते हुए स्वयं मानी रहे तो भगवान के नाम स्मरण का प्रभाव निश्चित रूप प्रकाशित कर देगा रूप निश्चित लीला में प्रवेश पहुंचा देगा ये सब लीला सिद्ध महापुरुष हैं जिनकी आप
सेवा और शरण में ये सब लीला में पहुंचे हुए महापुरुष हैं नित्य लीला में अभी अभी विराजमान है वृंदावन में भाई जी राधा बाबा पूज्य पंडित जी बाबा ये सब यही विराजमान है अमित अग्रवाल जी लखनऊ से राधे राधे राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी अपने विकारों पर काम कर रहा हूं बट कभी-कभी लगता है क्यों मन को मारे छोटा सा जीवन है क्यों औरों की तरह हम भी करें मृ हा तो नरक की व्यवस्था कर ले मन को ना मार करके मनमानी आचरण करके इस छोटे से जीवन
में अनंत काल के लिए दुर्गति की व्यवस्था कर ले यह बुद्धिमानी होगी क्या अपने लिए अगर हम अपने मन को निर्विक करके परमात्मा में स्थापित कर देते हैं इस छोटे से जीवन में तो अनंत जन्मों की बिगड़ी हम बना लेते हैं और अगर हम अपने मन को छूट देते हैं मन मानी भोग भोगते हैं तो फिर हमारी दुर्गति नहीं हो जाएगी तो हमको अपने अनंत जन्म को बनाने की फिक्र है या बना बिगाड़ने की हमको इसमें छूट देनी है आप भी विवेकवानी है आप विचार करके देखिए मना कष्टा इंद्रियानी प्रकृति स्थान कर सती हमारे को जन्म मिला परमात्मा के स्थान में इनको लगाना है मन और इंद्रियों को तो हमें जीवन जीना है तो विषय भोगना है विषय के बिना शरीर चल नहीं सकता तो हमारे लिए भगवान ने धर्म युक्त विषय बनाया है नहीं बनाया हमारे पास अगर गृहस्थ है तो पत्नी है हमें प्यार करने के लिए पुत्र है परिवार है रिश्ते संबंध है भोजन सब व्यवस्था है अब हम दूसरे की पत्नी की तरफ क्यों देखें हम दूसरे के पुत्र की हानि कर के अपने पुत्र को धनी बनाने की क्यों सोचे हम किसी से
ईर्ष्या क्यों करें किसी की निंदा पाप आचरण के लिए मन को रोकने के लिए यह छोटा शब्द बहुत बड़ा आतंक फैला देगा मन में छूट देने की बात मात्र से ये हमारा मन ऐसी जगह फसा देगा जहां से निकलना मुश्किल है भले हम नहीं रुक पा रहे हैं लेकिन हम रोकने का प्रयास करेंगे छूट नहीं देंगे जो आपने कहा कि हम इस पर काम कर रहे हैं अर्थात हम प्रयास रत है पर यह जो बुद्धि की एक छोटी सी बात कि यार मौज क्यों नहीं लेते तो मौज किसे कहते हैं क्या मौत को तुम मौज मानोगे मस्ती लेनी है तो देखो कृष्ण कृष्ण बोल के देखो कृष्ण में अपने चित्त को लगा जब उनकी रूप माधुरी सामने आती तो ऐसा लगता है हृदय फटेगा वही हमारे प्रीतम है वही हमारे अंसी है हम अपने जीवन को अच्छा हम एकदम घर जैसी बात कर रहे हैं संसार में सबसे बड़ा सुख क्या है अब हम आपको एक एक सुख में दिखा रहे हैं रुपए का कोई सुख नहीं है सुख होता उससे भोगों का ध्यान रखना अगर रुपए का सुख हो तो 10 20 ट्रक आपके सामने 2000 के नोट डाल दिए जाए भला आपको इतना भी सुख हो तो बताना 500 रुपए
जैसा भी सुख नहीं होगा क्योंकि उससे कुछ नहीं खरीदा जा सकता मतलब रुपया केवल योग्यता उसकी विषय खरीदने की है ठीक है विषय अब हम विषय में आते हैं तो सबके मन में खा पी के रुप कमा के सब कुछ देख सुन के एक बात में मन अटकता है भोग सब देख लो आप अपने मन की यह हम शास्त्र सम्मत बात कहते हैं कि सब सुखों में सांसारिक उनमें काम आगे है इसीलिए सबसे पहले काम है सबसे पहले काम है और भगवान ने कहा है यह नित्य बैरी काम इसी को काम को बैरी भगवान ने कहा है अब यह काम सुख कहां
है कौन सा अंग है आप विचार करके देखो जिन अंगों को हम स्पर्श करके कई बार साबुन से हाथ धोते हैं रज लगाते हैं उन अंगों में कहीं व सुख है जो मैं चाह रहा हूं आप विचार करके बहुत एकदम खुला परेशन हम कर रहे हैं पूरे संसार के सुख का केंद्र य माया रखे दुर्गंध युक्त घृणित मल मूत्र के द्वार उन्हीं से हम पैदा हुए हैं उन्हीं से पैदा हुए और फिर वहीं जाने का राग हमारा पुष्ट हो रहा है कौन सा सुख है जिसको तुम चाहते हो कि थोड़ी जिंदग में मजे ले ले आप हमें इन सुख के अलावा बताओ कौन सा ऐसा सुख है कौन सा ऐसा हृदय में आपके है कि अगर यह मिल जाए तो मैं सुखी हो जाऊ आप बताओ धन जितना भी आता है उतना भी कम लगता है तो भोग जितना भी भोग लो उतना भी कम लगता है यही माया है यही माया है जब तक आप भगवान श्री कृष्ण चंद्र जू के चरणों का आश्रय लेकर निरंतर भजन में नहीं लगोगे तब तक देवी हेशा गुणमककुम प्रपद्यंते माया मताम तरंतो आप सच्ची मानना मतलब कुछ भी कहना माया कृति है क्योंकि वाणी माया में है आज तक मुझे कोई रूप नहीं दिखाई दिया इस
विश्व में और आज तक मुझे कहीं भी कुछ भी ऐसा नहीं लगा कि यार यह चीज आज तक नहीं लगी बचपन से भगवान के मार्ग में जिधर देखो गौर से देखो तो बस या तो वो जिसका हमने लक्ष्य किया है अगर वो नहीं तो ऐसा दिखाई देता जैसे मकान में आग लगा दी जाए तो खंडहर कुछ नहीं है क्या है आप विचार एक उदाहरण में एक काम वाली राजा के यहां काम करती थी तोब राजा काम वाली भी अलग होती है वो तो खुद राजा महाराजा की तरह सब वैभव होता है एक लड़का था उसका एक दिन व अपनी मां के साथ महल तक गया वहां राजकुमारी को देखा राजकुमारी को देखते एकदम अब वो कह तो कुछ नहीं पाया वापस लौट आया और उदास होकर लेट गया कि मैं वाली का लड़का और राजकुमारी कहां खाना ना पीना एक अंदर आग लग गई कई दिन हो गए मां ने पूछा बेटा तू सच्ची बताना क्या तुझे हो गया है अगर तुझे परेशानी हो तो महाराज से कह के राजवैद्य दिख वाऊ तो उनका रोग मुझे कुछ नहीं मां शायद आप पूर्ण नहीं कर सकती तो उनका मां हूं एक बार जान की ताकत लगाऊंगी आप बताओ ना बोले राजकुमारी को देखकर मैं आसक्त हो गया
हूं अब मैं राजकुमारी के बिना जी नहीं बोले बेटा राजकुमारी शब्द बोलेंगे तो हमारी गर्दन उड़ा दी जाएगी राजकुमारी हम काम वाली हैं पर हम प्रयास करेंगे तुम उठो राजकुमारी सुधीर काम वाली थी राजकुमारी से मिली की जय जय हमारी प्राण रक्षा हो हम आपसे एक बात करना चाहते हैं तो बहुत सुलझी हुई थी राजकुमारी जी उनसे कहा हमारा पुत्र एक दिन आया था आपको देखकर आश क्त हो गया है आप उसे मिल नहीं सकती और मैं मिला नहीं सकती और वह प्राण त्याग देगा मेरा अकेला पुत्र है क्या कोई
उपाय निकल सकता है जिससे उसकी प्राण रक्षा हो बहुत नम्रता से विवेक से प्रार्थना की नहीं तो तो हुकुम की देखो ऐसा राजकुमारी ने कहा तीन दिन बाद राजकुमार को मेरे इसी कमरे में ले आना जय जय चली उसने खूब सोच वाली दवाई खाई तीन दिन बराबर सोच सोच सोच और सोने के घड़े में बंद करवा द सोच अब गई तो आखि चिपट गई गाल तीन दिन में सोच मान लो 10 20 सोच रोज हो तो तीन चार सोच में खड़े होना मुश्किल हो जाता है अब वो पड़ी थी राजकुमारी उसको बुलाया लड़के को तो पूरा कमरा दुर्गंध युक्त था कहा कहां राजकुमार बोले वो बिस्तर में पड़े राजकुमार देखा बोले वो सुंदरता कहां है बोले सोने के घड़े में घड़ा खोला बोले यही चमक रहा था जो गाल चमक रहे थे ना वो यही चमक रहा था उसकी आसक्ति खत्म लि हमें नहीं चाहिए राजकुमारी उसने विवेक से काम फिर औषधियों के द्वारा अपने को पुष्ट कर अच्छा शरीर में सुंदरता किस बात की है मल मूत्र की सुंदरता है पांच भौतिक शरीर है क्या हम सच्चिदानंद भगवान की प्राप्ति के लिए जो जन्म हुआ इसको इसमें खो दे यही
बुद्धिमानी है नहीं ये बुद्धिमानी नहीं हम बिना विषय के नहीं जी सकते शरीर नहीं रह सकता इसलिए धर्म युक्त विषय का भोग भोगो जो गृहस्ती में हो खान पान आपकी एक भगवान ने व्यवस्था की है उस व्यवस्था की सीमा में रहो अगर सीमा के विपरीत तो फिर अशांति कलय बहुत कोई भी भगवान से विमुख होकर कभी सुख शांति को प्राप्त इसलिए प्रभु कभी मन को छूट मत देना धर्म युक्त चलो जो आप गृहस्थ में हो जो आपको धर्म युक्त भोग मिले उनको भोगो भगवान का प्रसाद मानकर और नाम जप करो और जहां अधर्म की बात आवे वहां डर जाना क्योंकि अधर्म कभी किसी को सुख शांति से नहीं रहने देता वो उसका नाश ही कर देता है हस्तिनापुर में कोई कमी नहीं थी केवल अधर्म घुस गया कौरवों के वंश का विनाश हो गया नहीं हो गया नहीं धर्म से रहते दोनों भाई क्या परेशानी थी वोह इंद प्रस्थ के राजा व हस्तिनापुर के राजा खूब आनंद लेकिन वो कहा सुई अग्रेन के सभा तो काट के फेंक दिया भगवान ने धर्म से चलो सुख पूर्वक रहो गए जी रचित जी हिमांशु जी महाराज जी हमने अपनी यूनिवर्सिटी में कई
तरह के नाच गाने उत्सव का आयोजन होता है उसमें आपसे प्रेरणा लेकर वृंदावन युवा उत्सव का आयोजन किया है महाराज जी महाराज जी ऐसे युवा कार्यक्रम करने में कोई दोष ना लगे ऐसा कुछ ध्यान रखना चाहिए हम छात्र हैं सभी तो धन राशि औरों से मांगकर कार्यक्रम करवाते हैं तो क्या हम वृंदावन और श्रीज के उत्सव आयोजन करते हुए धन राशि मांग सकते हैं अब हमसे पूछोगे ना तो मैं उसे मांगना नाना कह कर के यह कहता हूं कि चार लोग मिलकर उत्सव कर लीजिए धन का किसी भी तरह से मांगना हम अनुमति नहीं देते ना हमारे जीवन में यह है और ना हम अनुमति इस विषय की देते हैं ये कि आप आठ 10 लोग मिल जाओ और आपस में धन लगा के उत्सव करो किसी से मांगना मंगो भलो न बाप सो जो प्रभु राखे टेक बच्चा ऐसे करना मृत्यु है ऐसे करना अमृत्व है ऐसे बनो कि र किसी के लिए ऐसा ना करना पड़े हम यह नहीं सिखाएंगे बच्चा तुम्हें 10 जवान तुम हो युवक हो आपस में 100 स पा पा स हजार हजार जो तुम्हारी सामर्थ ऐसे यह हमारे ना जीवन में रहा बच्चा और ना इस की हम कभी अनुमति किसी को
देंगे हमारा सिद्धांत है मंग बो भलो न बाप सो जो प्रभु राख है टेक और उसी सिद्धांत से सब खेल हो रहे हैं सब उत्सव हो रहे हैं सब बात हो रही अपने आप ऐसा ना अपने आप वो व्यवस्था भगवान व्यवस्था एक एक बात हमारे भगवान सुन रहे हैं देख रहे हैं और कर रहे हैं इसलिए अभी नौजवान हो अगर आदत बनाली किसी उत्सव के लिए अर्थ मांगना तो धीरे-धीरे मांगने की आदत पुष्ट हो जाएगी नहीं हम ये उत्सव करना चाहते हैं जिसको मन हो सहयोग कर दो नहीं तो उत्सव फिर ऐसा उत्सव क्या जिसमें गिड़गिड़ाना पड़े उत्सव तो हृदय का होता है हम चार लोग मिलकर के अपने वो उत्सव करेंगे जिसमें इतना अर्थ नहीं लगता और अर्थ जितना है वो हम आपस में लगा ले उतना करो गिड़गिड़ाना ना यार किसी से पैसा मांगना मतलब मृत्यु समझो हम तो ऐसे लगता है किसी के आगे ऐसे करो ना और फिर वो किसलिए उत्सव का क्या उत्सव है है कोई कागज आपके पास यार तुम लोग फ्रड तो नहीं हो कि मांगते हो और बस ऐसे अब बताओ यह क्या होगा अगर किसी ने ऐसा कह दिया तो यह तुम्हारे लिए क्या हो इसलिए बच्चा
मुझे लगता है कि अपने मित्रों से जो आपके जानकार हैं आपस में संगोष्ठी करके और फिर उत्सव कर लो किसी से मांगो मत य ऐसा उत्सव किसी काम का नहीं जिस में हमें अर्थ के आगे किसी के आगे हाथ फैलाना पड़े क्यों और आप विश्वास रखो अगर भगवान को आश्रय लेकर के भगवान के लिए लिए तो हम तो पूरे जीवन भर यही देखते आए हैं पूरे जीवन देल हार कोई और है देत रहत दिल रैल लोग भरम मोपे करे ता सो नीचे नैन भगवान का सहारा ले बच्चा भगवान के आशय हम ये नहीं कहेंगे कि संसार से मांगकर कोई उत्सव करो नहीं वो उत्सव उत्सव नहीं जो चंदा बटोरे दूसरे से कहे दूसरे को उपहास है य सब सच्चे दाता भगवान है उनसे मांगो नहीं वो उत्सव करो जिसमें आप सब जवान मिलकर के भाव प्रदर्शित कर सके अर्थ की कम खर्चा हो ऐसे अर्थ के भारी दिखावटी पना ना करो जिससे किसी से मांगना पड़े ठीक है आप ऐसे बनो कि ऐसे ना करना पड़े ऐसे करना पड़े ऐसा करना उचित है अगर हमारे पास चार रप है तो हम किसी को दे सके लेकिन किसी से ऐसा ना करना पड़े हम तो ऐसा बनाना चाहेंगे आपको आप ऐसे
ही बनिए ऐसे किसी भी कार्य के लिए हमारे भगवान को नहीं चाहिए वो चीज जो तुम्हें ऐसे करने गरज होगी तो अनंत ब्रह्मांड के स्वामी आपके पास ऐसी व्यवस्था भेज देंगे सब करने लगे ऐसे करके जीना और ठीक नहीं भगवान पर विश्वास करो भगवान का नाम जप करो कोई पाप कर्म ना करो रसा ना करो मांस ना खाओ मनुष्य जीवन मिला है पराई माता बहनों की तरफ गंदी दृष्टि ना करो दूसरों का मंगल करो दूसरों तुम सुखी हो जाओगे तुम आनंदित हो जाओगे भगवान सबको देख रहा है जैसे हमको रचा तो हमारे जीवन को पूरा व देख रहा है वो सर्वांतर्यामी है ऐसी जगह कोई नहीं जहां भगवान की दृष्टि ना हो अगर ये याद रखोगे तो कोई पाप कर्म नहीं बनेगा और एक बार आप भगवान पर विश्वास करके देखिए जीवन की धरा बदल जाएगी बच्चा जीवन की धरा बदल जाएगी वो मच्छर को ब्रह्मा बना दे ब्रह्मा को मच्छर बना दे मसक करें बिरंचि अज म सकते हैं हो सकता है भगवान तुम्हारे द्वारा भारत का कौन सा कार्य करवाना चाहते हैं सीधे कनेक्शन भगवान से रखो हां संसार के प्राणियों से नहीं भगवान से वो जो
जैसा हम जीवन में जिए हैं वही हमारे अंदर कहने का मन होता है अगर भगवान से सीधे कनेक्शन है तो मंगल ही मंगल है भगवान का नाम है मंगल भवन अमंगल और सब लोग परेशान हैं वासनाओं से कामनाओं से यही दूर करने के लिए तो आप आए हो यही दूर करने के लिए अच्छा तुम किसी से मांगोगे और सब मांग रहे हैं या भिखारियों से क्या मांगना आप सच्ची मानि सब मांगता है दाता तो सिर्फ भगवान है सब मंगता है आप देख लो किसी को कोई मांग है किसी को कोई मांग है किसी को कोई मांग है निष्काम तो दो ही है भगवान और भगवान के प्रेमी भक्त जन प्रेमी खूब नाम जप करो कोई गंदा आचरण मत करो और मांगना है तो ऐसे से मांगो जहां मांगना मिट जाए एक बार वह देख लेगा तो मांगना मिट जाएगा बच्चा सब आनंदित रहो यह बात हम सबके लिए कह रहे हैं कभी भी भगवान से अपनापन करके मांगना फिर देखना फोन नंबर तुरंत लग जाएगा अपनापन करके हम लोग भगवान से ए ठाकुर जी हमारा काम बन जाए हम 00 का भोक चढ़ा देंगे यार नौकर समझे हो क्या कि 500 में काम कर देंगे ही लोग कहते ऐसे नहीं ऐसे कभी
पूर्ति नहीं होगी लक्ष्मी जी नाराज हो जाती है हमारे पति को नौकर समझर कह र 500 में इतना काम कर दो नहीं लोग कहते ये देखो 56 भोग लगाएंगे ऐसे भगवान नहीं ऐसे भगवान जैसा भी हो नाथ आपका हूं प्रभु आपने गृहस्थ दि काम दिया ये समस्या है नाथ आप जैसे उचित समझिए इस समस्या का सम प्रभु आपके सिवा कोई नहीं यह अपने पन से भगवान से बात करना ऐसे बात करके देखो फौरन सुनते हैं जब अपना नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी प्रभु आपका सब वैभव यह समस्या है आप समाधान करो वो देख रहे हैं कि यह मेरे आश्रित है और जब हम ऐसे बात करते हैं कि आपका फूल बंगला बनवा देंगे आपको भोग लगवा देंगे तो फिर वो भगवान आप भगवान को भगवान कहां समझ रहे हैं कि आप जैसे किसी आदमी से काम करवाया जाता है या रुपया देंगे काम कर दो वो काम कर दिया उसे 00 दे दिया तो ऐसे बिहारी जी को समझाए क्या ऐसे राधावल्लभ जी को समझाए क्या ऐसे प्रभु को समझाए प्रभु हमारे प्राण धन है ईश्वर है जगत के मालिक है हमारे घर के मालिक है हमारे जीवन के मालिक ऐसे बात की जा
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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