एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #736 · 22 नवंबर 2024
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
नमेश अहुजा जी पटियाला से प्यारे गुरुदेव महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी आपके श्रीमुख से सुना है कि भगवत प्रेमी महापुरुष नींद में भी नाम जप करते हैं महाराज जी नींद में नाम जप करने की प्रक्रिया कैसे होती व प्रक्रिया करने की नहीं है वो होती है पहले हमें कर होता है जैसे दिल धड़कता है ना नींद में बंद तो नहीं होता ना ऐसे पहले हमारा नाम शवास दो बिलग चलत है इनको भेद नमो को भावे शवास ही नाम नाम ही स्वासा नाम शवास को भेद मिटा यहां तक साधक की बात है रोम रोम और रग रग बोले तब क स्वाद नाम को पहले जबान से चार वाणी हैं परा पश्यंति मध्यमा वखरी वखरी कहते जो हम बोल रहे हैं राधा राधा राधा रा मध्यमा पश्यंति वही नाम हम देख रहे हैं अंदर से वही चल रहा बिल्कुल कहीं कोई हरकत नहीं कि हम नाम जप कर रहे हैं परा य मूला आधार केंद्र में जहां वहां वाणी पहुंची बस वो शुरू हो गई राधा राधा राधा अब साधक जप नहीं रहा अब सुन रहा है ठाड़े बैठे परे उता कबीर कए हम र ठिकाना जागृत स्वप्न सुषुप्ति स् फुरत में
राधा पदा जत छटा चाहे जागृत अवस्था हो या स्वप्न अवस्था हो या सुषुप्ति अवस्था हो हर समय वो किशोरी ज के चरण अरविंद का स्फुरण और नाम चल रहा है यह सिद्ध महापुरुष की स्थिति होती है सोवत हो रसना रटे राधा कृष्ण सुनाम श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी राधा कुंड सोवत हो व सो रहे हैं और जबान से निकल राधा कृष्ण राधा कृष्ण राधा कृष्ण यह निरंतर जब अभ्यास किया तो नाम चिदानंद वो बस गया अब जैसे धड़कन हम धड़का थोड़ी रहे पलके हम वो अपने आप स्वाभाविक होता है स्वाभाविक भजन
होता है सिद्ध पुरुष का साधक को करना होता है अभी करना ही कठिन है खाली समय में हम कह रहे कोई कहता है कि हमें काम बहुत है कितने घंटे 24 घंटे में हम छ घंटे सोने के मान लेते हैं सात घंटे मान लेते हैं सात घंटे सन कर लो नींद ले लो इसके बाद जो है कितना बचा 17 घंटे 17 घंटे में आप कितना काम करोगे कितने घंटे आप बोलो कितने घंटे काम करोगे 10 12 घंटे लगातार कोई काम कर ही नहीं सकता 10 12 घंटे में वह जो अंतराय मिलता है खाली समय खड़े हुए राधा आपको 10 10 मिनट मिल सकता है पाच पाच मिनट चलो हम छोड़ा पूरा छोड़ा 12 घंटे आपके काम के ठीक है अब कितने बचे पाच घंटे दो घंटा भोजन को छड़ दो दो घंटा छोड़ अब तीन घंटे बचे यह तीन घंटे कहां खर्चा करते हो अगर हम उनको बहुत सावधानी से खर्चा करें तो हमारे पास तीन घंटे बचे तीन घंटे में डेढ़ घंटे परिवार के लिए हम दे देते अब बचे डेढ़ घंटे रोज अगर डेढ़ घंटे भजन करो तो बहुत अच्छी स्थिति हो जाए नहीं डेढ़ घंटे हम दिया परिवार मनोरंजन टीवी समाचार ढ़ डेढ़ घंटे तो सेफ बचे अब डेढ़ आप भजन
करके दिखा दो डेढ़ घंटे कहां डेढ़ घंटा कोई भजन में चि जोड़ता होगा बोले हमारे पास टाइम नहीं तो भाई ऐसे देश में आए हो जहां की कमाई का एक रुपया भी नहीं ले जाओगे जैसे आपको ऐसे देश में भेजा जाए कि सब सुविधाएं खूब पैसा सब लेकिन वहां से जब आओगे तो कपड़ा तक उतरा लिया जाएगा ऐसा देश पसंद करोगे ऐसा देश य है मृत्यु लोक शरीर भी उतरा लिया जाता है यही छोड़ दो हे कुछ नहीं यहां का शरीर भी यही छोड़ो आग लगा दिया जाएगा गाड़ दिया जाएगा इसको भी नहीं ले जा सकते तो जो ले
जा सकते हैं उसके लिए समय नहीं है और जो नहीं ले जा सकते उसके लिए पूरा समय दे हो तो क्या कहा जाएगा मूर्ख है तो कहा जाएगा नहीं कहा जाएगा हां तो वो मूर्खता है जो भगवान का विस्मरण करके संसार के धन संपत्ति भोगों में अपना समय नष्ट कर कर रहे हैं जाना है किस समय जाना है कोई पता नहीं फांसी वाले को तो समय निश्चित होता है हमरा तो वो भी निश्चित नहीं है कब अभी इसी क्षण कभी भी तो बड़ा भयावह है कैसे बड़ा भयावह है बड़ा भयावह है एक हमको दृश्य दिखाया कि एक्सीडेंट हुआ और एक ड्राइवर ट्रक में फंसा है आग लगी वो चीख रहा है एक दिखाया बच्चे फंसे हुए हैं चीख रहे हैं आग की ज्वाला क्या भयावह दृश्य है जिंदा आदमी जलेगा मरेगा कितनी देर में मरेगा आप सोचो अपने को जरा सा एक दिया सलाई ऐसे छुआ के देखो या एक बूंद गर्म तेल कितना कष्ट हो पूरा मरेगा पूरा जल कर के जब तक प्राण नष्ट नहीं हो जाएंगे तब तक प्राण निकलते प्राण ऐसे थोड़ी निकलते बहुत कष्ट कब कहां कैसे घटना घटती है इसलिए नाम जप भगवान का नाम जब वही साथ जाएगा वही बचाएगा भी
नाम ही बचाएगा जब तक द्रोपदी जी ने भगवान को नहीं पुकारा तब तक दुशासन की चली और जब भगवान को पुकारा तो दुशासन की नहीं चली भगवान ने यही वस्त्र रूप धारण कर लिया कांधे से वस्त्र नहीं हटा दुशासन थक के गिर गया द्रोपदी सुरक्षित रहे हम लोग भगवान को अपना नहीं मानते अंदर से कैसे अपना मानना जैसे कोई संकट हो तो सबसे पहले किसका नंबर याद आएगा श्री जी नहीं श्री जी का तो याद नहीं आएगा सबसे पहले जो अपने निजी जन है जो प्रिय जन है वहां आएगा कि उनको उनको ये नहीं आए हे
भगवान ऐसे नहीं आएगा नहीं भगवान की अगर सबसे पहले भगवान की याद आवे तो जान लो कि हमारा भगवान से संबंध स्वीकृत हो गया है संबंध तो है सबका भगवान कहते हैं मम वान ईश्वर अं से जीव विनाशी पर हमारी तरफ से स्वीकृति हो जाए जब कोई सुख का तो भगवान की तरफ दृष्ट ये तो भगवान की कृपा से है जब कोई दुख का तो भगवान भगवान आप ही हमारे लेकिन मुश्किल है भारी से भारी दुख में लोगों का सहयोग चाहे वह कोई पदाधिकारी हो कोई मित्र हो कोई रिश्ते नाते वहां जाए भगवान पर दृष्टि नहीं
जाएगी भगवान पर दृष्टि देखो बड़े-बड़े भक्तों की नहीं गई द्रोपदी जी महान भक्ता है यज्ञ कुंड से प्रकट हुई पांडवों पर भरोसा था भीष्म जी पर भरोसा भुजाओ पर भरोसा दात का भरोसा जब देखा अब नहीं तब बाद में भगवान का भरोसा आया ऐसे गजेंद्र जब डूबने को एकदम था आखिरी में तब भगवान की याद आई चतुर वही जो पहले ही भगवान की याद कर ले तो समस्या में ना फसे खूब नाम जप करे अच्छे आचरण करें विष्णु शंकर शर्मा जी जयपुर से राधा वलभ ह राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव तत् बोध क्या है भक्ति के माध्यम से तत् प्राप्त हो सकता है और तत् बोध प्राप्त करने के बाद भक्ति का स्वरूप यही रहता है या बदल जाता है महाराज अगर वो अभेद तत्व में स्थित हुआ तो फिर क्रियात्मक और भावात्मक दोनों भक्ति से अलग हो जाता है व मोक्ष पद का अधिकारी होता है और जो अभेद के बाद भेद है वो प्रेमा अद्वैत जिसमें ब्रह्म नहीं माया नहीं नहीं जीव नहीं काल अपनी सुधि ना रहे एक रहे नंदलाल इस स्थिति में तत्व बोध भी है
क्योंकि इस स्थिति तक पहुंचने के लिए जहां भगवान आदेश करते हैं बहु नाम जन्म नावं ज्ञानवान माम प्रपद्ये वासुदेवा सरमती सात्मा सु दुर्लभा तो देखो गोस्वामी जी ने अनुभव किया ना जड़ चेतन जग जी जत सकल राम में जानी बंद सबके पद कमल सदा जोरी जुग पानी सीय राम में सब जग जानी कर प्रणाम जोरी जुग पानी क्या गोस्वामी जी को तत्व बोध नहीं चर चेतन सब राम में राम में पर भगवान के दासत से युक्त है एक तत्व बोध होता है मैं आत्म स्वरूप हूं यहां से प्रारंभ होता है और जब स्वरूप में स्थित हो गया तो फिर द्वैत का बाद हो गया कोई दूसरा भगवान नहीं है वही भगवान आत्म स्वरूप सेमान है व आत्म मैं अपने स्वरूप को भूल गया था देह भाव में स्थित हो गया मेरा स्वरूप ही सच्चिदानंद में मैं वही हूं तत्त्वम आशी मैं वही हूं बस ये जीवन मुक्त महापुरुष हो गया ये लय हो गया पर वह लय नहीं होगा वह भाव देह की प्राप्ति करके भगवान की सेवा में उपस्थित होगा और यह लय हो गया समुद्र की लहर समुद्र में समा गई अस्तित्व ही खत्म और उसका अस्तित्व रहेगा भक्त
का अस्तित्व रहता हमारे भक्ति के पांच भावों का स्वाद है पहला है शांत भाव शांत भाव द्वंती समदर्शी का सर्वत्र भगवत भाव और अजात शत्रुता ये सब शांत भाव में होता है फिर होता है दास भाव प्रभु मेरे स्वामी मैं प्रभु का दास फिर होता है प्रभु मेरे दोस्त मित्र मैं प्रभु का मित्र फिर होता प्रभु मेरे पुत्र वात्सल्य फिर प्रभु मेरे प्रीतम और फिर सहचर भाव प्रिया प्रीतम के अनन्य भाव से उपासना तो भाव में जब हम भक्ति की चरम अवस्था में पहुंचते हैं तो मोक्ष पद का भी त्याग हो जाता है अलम विषय वारत या नरक कोटि विवत सया वृथा शति कथा शमो बत वि भेम क वलता परेश भजने मदा यदि सुका दया किम तता परंतु मम राधिका पद रसे मनो मजत विषय वार्ता बंद करे तो घोर नर कों को प्रदान करने वाली घृणास्पद है अलम विषय वारत नरक कोट विवस और ता शति कथा श्रम वेद की चर्चा भी अब मेरे से मत करो क्योंकि वेदानता केवलम अव छिन्न अनुरागम लभते जो वेद का भी त्याग कर देता है वह पूर्ण प्रेम को प्राप्त होता है जो वेदा देवर्ष नारद जी का सूत्र है वेदा प
सस्त सा केवलम अवन अनुरागम लते वह केवल अखंड प्रेम को प्राप्त होता है भगवत मार्ग में हमारे शास्त्रों के चार पुरुषार्थ हैं धर्म अर्थ काम मोक्ष तो प्रेमी मोक्ष भी नहीं चाहता तो उसके आगे व्रथा वार्ता हुई ना वृथा शति कथा श्रम धर्मार्थ चतुष्टय विजयता किमत ब्रथा वार्ता हमें धर्म अर्थ का मुख चाहिए नहीं अपने प्यारे की रूप माधुरी में डूबकर आठो पहर उनकी सेवा में रहना चाहते हैं तो कह रहे कि वेद वार्ता भी मेरे से मत करो और एकांतिक भक्ति में जो डूबे हुए उनको प्रणाम है लेकिन मेरा मन तो श्री किशोरी किशोर ज की दास्ता में तो वि भेम क वलता विभ माने भय निर्भय पद मोक्ष मुझे नहीं चाहिए मुझे भय प्रदान करता है लय वृत्ति हो गई तो श्यामा श्याम में वृत्ति कैसे होगी मुझे मोक्ष नहीं चाहिए मुझे वृत्ति का लय नहीं चाहिए मुझे वृत्ति चाहिए भगवता का वृत्ति मुरारी पादा अर्पित चित्तवृत्ति श्याम तो भक्ति में आगे चलकर यह भेद हो जाता है वह अद्वैत में स्थित हो जाता है वह अद्वैत का अनुभव करके फिर भावा द्वैत प्रेमा द्वैत इस भाव
में रहता है आप समझ पा रहे भक्त इसके आगे की जो रसास्वादन प्रेम का है व इससे आगे नहीं तो अद्वैत स्थिति को प्राप्त भगवान संकर के भाव को देखो सन काद के भाव को देखो सुखदेव मुनि के भाव को देखो और परम ज्ञानी ब्राप शि उद्धव जी को देखो जब भगवान अशु प्रवाह कर रहे हैं मथुरा में और हा राधा हा गोपी तो उधव जी भगवान सच्चिदानंद सर्वव्यापी सर्वज्ञ सर्व स्वरूप यह किसके लिए रो रहे हैं सर्व स्वरूप भगवान से प्रार्थना की तो भगवान ने कहा देखो हमने गीता में कहा ये था प्रप तेता भज वो रो के मुझे भज रहे इसलिए मैं रो केर भज रहा हूं अगर तुम उनका रोना बंद करवा दो तो मेरा रोना अभी गए अभी ज्ञान उपदेश करेंगे अभी अभी य र वृंदावन की य बिकल कर देती है जब भजन होता था उधव अधिकारी थे ज भी आए मैया और बाबा की स्थिति देखी मैया में भरी माखन लाती है कन्हैया कन्हैया कहां है बाबा कहते अरी बावरी व तो मथुरा तो विकता वात्सल्य रस मैया की गओ को देखा कृष्ण तो कान खड़ी कर देते व देखते कहां कृष्ण छोटे छोटे बछड़े और ब्रजवासी सखा और जब कांत
भाव की गोपियों के पास पहुंचे तो सारा ज्ञान उनका जो उपदेश देने का था ना वो मिट गया प्रेम के आंसुओ में इतनी दम होती है कि उद्धव जी लौटने लगे रज में वंदे नंद बृज शी राम पाद यह प्रेम भूमि वृंदावन है भगवान से प्रेम होना यह बहुत कठिन बात है भोगों से प्रेम होना रिश्ते नातों से प्रेम होना यह तो स्वाभाविक सब फसे हैं लेकिन जिसको मैंने देखा नहीं उससे प्यार कर रहा हूं उसके लिए जिंदगी अर्पित कर दे उसके लिए हर कष्ट अपमान सह रहे और वह सर्वत्र है फिर वह जब प्यार
पलट कर के आता है और जब उनकी प्यार माधुरी रूप माधुरी और उनका अपनापन तो उस जीव की दशा बिगड़ जाती है छिन छिन रुदन करं छिन गावत आनंद भरी छिन छिन हार ह संत यह जो कृपा है बस यह है कि जैसे भूखा है ना तो उसे भोजन का स्वाद समझ में आता है छके को नहीं समझ में आता ऐसे जो प्रभु के लिए भूखा है जो वियो में जो रिश्ते नातों में अपने मन को फसा चुका है उसको प्रभु का स्वाद नहीं आता इसलिए भगवान ने कहा जननी जनक बंधु सुत दरा तन धन धाम सुद परिवारा सबकी ममता ताग बटोरी जब
आपके सिवा हमारा कोई है नहीं और आप हमें मिले ना और आपके लिए पूरा जीवन है तो कैसा लगेगा और आप है इसमें कोई संशय नहीं और पूरा जीवन हो गया पुकारते पुकारते आप मिले ना तो कैसा हृदय होगा विरही उसको एक क्षण भी भगवान छोड़ते नहीं यह बात है जो भगवान के लिए तड़पता है भगवान एक क्षण उसे छोड़ते नहीं भगवान के मिले हुए होने पर भी अमलन का अनुभव होता रहता है अमलन में भी मिलन का अनुभव ये प्रेम है तन मन के बिछड़ नहीं चाह बढ़े दिन रन पर कब संजोग न मान देख भरी भरी नन उद्धव जी ने गोपियों के प्रेम रस को देखकर यही मांग कि हमारा ज्ञान ध्यान दो जितना सब बेकार मुझे वृंदावन की कोई गुल्म लता औषधि बना दी जाए ये थोड़ा कठिन है कठिन मार्ग इसलिए है कि हमने देखा नहीं उनको कभी केवल उनकी बात सुनकर उनके लिए अर्पित हो गए ऐसे वह मिलेंगे वैसे चलते रहे जैसा कहा गया वैसे चलते रहे और वह अव्यक्त है ऐसे प्रकट में हमारी तुम्हारी तरह थोड़ी मिल जाते हैं अब उनके लिए जो जलन जो सहन किया गया जब हृदय निर्मल हुआ और आंख खुली उन्हीं के द्वारा
खुलती है वो आंख तीन नेत्र है एक नेत्र मानस ये जो मानस के बने हुए नेत्र है इनसे केवल प्रकृति का दृश्य देख सकते हैं आप और एक है हृदय के नेत्र उन्हें प्रेम चक्षु कहते हैं और एक होते है बुद्धि में चक्षु जो ज्ञान चक्षु कहते हैं अगर वो ज्ञान चक्षु खुल गए तो तत्व दर्शन होगा और हृदय के तो जित देखो तित श्याम में उधर अपना प्रीतम दिखाई सच्ची आपसे कहते हैं प्यार शब्द तो सार्थक भगवान में होता है वह कितना प्यार करते हैं कदम कदम पर दिखाई देता है कोई क्षण ऐसा नहीं रहता जिसने किसी और को अपना मन दिया वही अनुभव नहीं कर सकता यह खास बात है जिसने केवल जैसे मीरा जी कहती मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसर अब अब उनके हृदय की जो दशा होगी वो जो कृष्ण आकर्षण होता है जो कृष्ण की रू माधुरी सामने आती वह कभी ऐसा अनुभव नहीं होने देती कि व हमारे पास नहीं है हर समय भक्त उन्हीं में आनंद पर शर्त है दूसरों न कोई अगर दूसरा कोई वस्तु व्यक्ति स्थान ऐसा फिर वह आनंद नहीं आ पाए भगवद आनंद फिर व गोस्वामी जी कह रहे एक भरोसो एक बल एक आश केवल
आपके सिवा हमारा कोई नहीं तब ये मार्ग खुलता है प्रवचन दे देना य सब कथा वार्ता भगवान की सब मंगलमय है पर इसका उद्देश्य क्या है भगवान को प्राप्त करना या रुपया यश कीर्ति भोग विलासिता तो अंतर्यामी भगवान जानते हैं व सब दे देंगे लेकिन अपने को छुपाए रखेंगे और जिसने इन सबको ऐसे कर दिया जैसे भगवान का ऐसा स्वभाव समझो जैसे बालक रोता है तो मां खिलौना बेजती है वो खिलौनों में खेलने लगा तो मा अपने काम में लगी खिलौनों को फेंक दिया तो फिर किसी अन्य को भेज ए बिटिया तू उठा ले जाक गोद में लेकिन बिटिया की गोद में भी चुप ना हुआ तब वो अरे ये मेरे बिना नहीं मानेगा ऐसे ही पहले भगवान माया के खिलौने बेचते हैं खेलो इनमें माया के वो रोता है नहीं चाहिए मुझे तो फिर रिद्धि सिद्धि रूपी बिटिया भेजते हैं ले सिद्धि ले चमत्कार अगर इनका प्रयोग कर ले तो आगे का मार्ग रुक जाएगा रिद्धि सिद्धि पेरे बहु आई बुद्धि लोभ दिखावे भाई होए बुद्धि जो परम सयानी तन च अ वो बुद्धि भगवता का तब फिर प्रभु को चयन नहीं पड़ता कि खिलौनों में भी नहीं
राजी हुआ और किसी सिद्धि में भी राजी नहीं हुआ तो फिर जैसे देखना चाहो वैसे देख सकते हो आपकी तरह देखना चाहो तो आपकी तरह देख सकते हो अनुभव करना चाहो अनुभव कर सकते हो हर तरह राजी रहते हैं यहां तक कि अपने भक्त के सेवक भी बन जाते हैं माधव दास बाबा जगन्नाथ पुरी में थे तो उनको संग्रहणी का रोग इसम बारबार सोच होती है दो चार द सोच में तो आदमी ढेर हो जाता है तो वृद्ध महात्मा पीतांबर का साफा बांधे हुए 14 वर्ष की अवस्था नौ किशोर अवस्था स्वामी जगन्नाथ जी लंगोटी धो कर के ऐसे फैला रहे हैं बाबा को चेतना जागृत हुई देखा अरे तो मेरे स्वामी है कहा प्रभु आप तो कहा क्यों बाबा तुम्हारा और कोई है क्या प्रभु आपके सिवा हमारा कौन है का कौन है भगवान के सिवा कौन है अगर कोई है वो बात अलग है लेकिन जो वास्तविक भगवान के मार्ग के पथक है तो भगवान के सिवा कौन है तो प्रभु ने कहा जब हमारे सिवा कोई नहीं तो सेवका हम स्वयं करते हैं अनंत दास भगवान की जय विजय बड़े बड़े समर्थ पार्षद भगवान स्वयं लंगोटी स्वयं लंगोटी धो रहे भगवान स्
अर्जुन का रथ हाकने के लिए भगवान का जो सारथी दारुक विश्व ब्रह्मांड में कोई उससे बड़ा कोई है ही नहीं सारथी का ज्ञात त्व लेकिन भगवान अपने सारथी दारु को नहीं कहा कि अर्जुन का रथा को अपने हाथ से बागडोर संभाल ली भगवान भगवान तुम्हारे अंदर है भगवान कण कण में विराजमान है बस देखने की दृष्टि चाहिए और उस दृष्टि के लिए एक बार दृष्टि सबसे हटानी पड़ती है और यह कठिन काम है सबसे दृष्टि हटा पाना कठिन काम है बहुत मार पड़ती है काम क्रोध लोभ मोह म मत्सर य सब पीटते हैं हृदय को तो इसीलिए साधक फिर बैलेंस बना लेता है जन्म जन्म लग जाते हैं और एक बार ब्रक लगा दे कि अबलो नशा नहीं अबना नश आपसे प्यार करता हूं चाहे कट जाऊ मर जाऊं पर कभी आपके से फिर मार्ग आगे ब फिर ऐसा नहीं कि परीक्षा नहीं आती भोग भय प्रलोभन और भय दो बड़े जोर से परीक्षा आती है और दोनों में एक मात्र बस इन्ही नैनन सब सुख देखो अपनो जन्म सुफल कर जब तक आपको भर नेत्र नहीं देखूंगा तब तक भर पेट भोजन नहीं करूंगा चैन से सोऊंगा नहीं रात दिन मैं पुकारूंगा देखूं
मेरी आवाज पहुंचती है कि नहीं आप तक पक्का भगवान पक्का तो प्रेम एक अलग वस्तु हो जाता है और ज्ञान का बोध एक अलग वस्तु हो जाता है आगे चलकर प्रारंभ में तो सबके संयम नियम आराधना साधना वही होती है स्वरूपा अनुसंधान भक्ति रे वगरे से स्वरूप बोध के लिए भी भक्ति सर्वश्रेष्ठ है ऐसा नहीं कि भक्ति से स्वरूप का बोध और जो स्वरूप बोध ज्ञान में बड़ी कठिन से होता है भक्त को भगवान सहज करा देते हैं मम दर्शन फल परम अनुपा जीव पाव निज सहज स्वरूपा भगवान का साक्षात्कार होते ही सच्चिदानंद स्वरूप अपना प्रकाशित हो जाता है पर इतनी प्रबल माया है कि ऐसे खिलौने यहां है कि इनके खेल से छोड़ना बड़ा कठिन है बहुत कठिन हे प्रभु उपदेश करना बहुत सहज है लेकिन खिलौनों को छोड़ना यह खिलौने इतने आकर्षक बने हैं कि लाखों में जो चलते हैं कोई चलने वालों में कोई बिरला ऐसा होता है जो क्रॉस कर पावे नहीं कंचन कामिनी कीर्ति के ऐसे बगीचे हैं जिनमें मनोरंजन में फंस कर के अपना जीवन का जीवन समाप्त कर दिया खत्म आप भगवत साक्षात करने कार करने की
योग्यता खो दे योग्यता में तो वही जो तड़पता रहता है भगवान किस पर रीते हैं जो किसी भोग को स्वीकार ना करके रात दिन रुदु स्वरम राजन कृष्ण दर्शन लालसा एकांत में बैठा हो कि मैं क्या उपाय कर सकता हूं कैसे मिल सकते हो आप मैं क्या कर सकता हूं प्रभु आप कृपा करो रुदु सु श्रम राजन कबीर दास जी कहते हैं कबीरा हसना छोड़ दे रोने से कर प्रीति बिन रोए किन पाइया प्रेम प्यारा मित कैसे मिलोगे आप दिखाई प्रकट में तो दे नहीं रहे हो अगर छवि रूप में हो तो आप तो बात नहीं कर रहे हो कैसे मिलोगे आपके सिवा मेरा कोई है नहीं यह हृदय में आना अनंत जन्मों के शकतो का फल है जिसके हृदय में आ जाए कि मैं नंद नंदन को देखना चाहता हूं अब मैं भगवत साक्षात का अब मैं इस संसार से मुक्त होना चाहता हूं नहीं फसना यह सबसे कठिन विषय है यहां मुक्त कौन होना चाहता है भगवान के सारे खिलौनों से खेलना चाहते हैं प्रवचन कर रहे हैं बढ़िया रूप आ जाए बढ़िया नाम हो यश हो प्रणाम नमस्कार हो तो भगवान वो सब दे देंगे लेकिन भगवान ऐसे हाथ आने वाले नहीं बहुत
चतुर शिरोमणि है हां जिसने अपने सच्चे सरल हृदय से भगवान को चाहा उसे भगवान मिल गए भगवान कहां है आप में है आप में आप में यह शरीर थोड़ी है इसके अंदर जो पावर है वो भगवान ही है आप सबके अंदर पावर जो है वो भगवान ही है दूसरा कोई नहीं है जैसे आपसे पूछा जाए आप कौन है तो आप अपना नाम बताएंगे शरीर रखा हुआ है जन्म बताएंगे जो शरीर का हुआ है और इसे बताएंगे कि मैं हूं आप नहीं है यह तो ढांचा है पांच भौतिक ढांचा इसमें रह रहे हो आप कौन है तो देखो आपको पता नहीं कि आप कौन है बता सकते हैं आप कौन है केवल सुनी बात बता सकते हैं आपने अपने को देखा नहीं साढ़े तीन हाथ के मकान में रहते हुए पांच भौतिक की रचना है साढ़े तीन हाथ का आपके हाथ से 40 वर्ष हो गए होंगे 50 वर्ष हो गए होंगे 50 वर्ष में एक सेकंड भी आप अपने से को नहीं देखा अपने से नहीं मिले अगर अपने से मिल लो तो भगवान से मिल लोगे क्योंकि वो जो है वो भगवान का अंश है ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन अमल सहज इसी को तत्व ज्ञान कहते हैं जब आप अपने को देख लोगे तो तत्व ज्ञानी हो
जाओगे और अभी अपने को नहीं देखा तो देहा भिमानी जीव भोगों में रत है यह बड़ा कठिन प्रश्न है भगवान की प्राप्ति की चाह आना य बहुत कठिन और इतना प्यार आप सोचो जितना प्यार त्रिभुवन में है वात्सल्य मां में अन्य मित्रों में वह सब भगवान के प्रेम समुद्र के एक अंश से तो भगवान कितना प्यार करते होंगे सच्ची आपसे कहते हैं अगर वह प्यार ना करते ना तो हम माइक से कहते पर हम ये कहते हैं कि उनकी करुणा ही करुणा है हमारी तरफ से मांग कमजोर है दाता तो हमारी मांग से भी ज्यादा देता जा रहा है जो आनंद लौकिक पारलौकिक सारे आनंद को बिछा दिया है आप समर्पित होकर तो देखें देखो ना अगर आप ईमानदारी से देखो तो आपको कितना प्यार कर रहे हैं खुद जजज बनो और अपनी स्मृति से लेकर अभी तक के अपने अपराधों को नोट करो और देखो क्या दंड दिया है कोई दंड मिला है कितना प्यार कर रहे हैं अपराधी होने पर भी हम सब अपराधी हैं भारतीय कानून और शास्त्री कानून दोनों में अगर हमें पहुंच हो ज्ञान हो और हम अपने को दे तो कितने ऐसे पाप है जो हमको दंड मिलना
चाहिए और भगवान ने अभी तक दंड नहीं दिया हमें दुलार ही दे रहे हैं तो उनकी कृपा कितनी है उनकी कितनी अपार पर हम बहते चले जा रहे हैं भगवान के विरुद्ध धर्म के विरुद्ध और कानून के विरुद्ध तो हमारी फिर हृदय की शांति नष्ट हो जाती है उदगता चिंता भय विषाद यह लक्षण है पाप के और जब ज्यादा पाप बढ़ जाता है तो मनुष्य डिप्रेशन में पहुंच जाता है वो स्वयं भयभीत रहता है इतना भयभीत हो जाता है कि अपने आप को नष्ट करने के लिए तैयार हो जाता है नेगेटिव सोच पाप का लक्षण पॉजिटिव से अच्छा पुण्य का लक्षण अगर अभी पॉजिटिव सोच आ जाए तो भारी से भारी विपत्ति में भी आप मुस्कुराएंगे सोच शरीर अस्वस्थ हो सकता है और दिमाग अगर स्वस्थ है तो सब ठीक है शरीर स्वस्थ है दिमाग का स्वस्थ सब बेकार है दिमाग को भगवान के चरणों में लगाओ बुद्धि को प्र के नाम में लगाओ अभी आनंद का अनुभव होने लगेगा जो चाहोगे प्राप्त हो जाएगा लौकिक पारलौकिक तत्व ज्ञान जो चाहिए क्या चाहिए जो चाहिए जो चाहिए शब्द समझ लो जो चाहिए वह सब प्राप्त हो जाएगा पर एक बार
नाम पहले सफाई करेगा तुम्हारे पाप की पाप की प्रवृत्ति दोनों नष्ट होने पर अनर्थ निवृति होने पर फिर तो बादशाह हो जो इच्छा करोगे तत्काल वही पूर्ण हो जाएगा तत्काल इसलिए यदि सुखी होना चाहते हो तो नाम भगवान का आश्रय ले लो भगवान का आश्रय ले लो और बुद्धि शुद्ध तो सब शुद्ध और बुद्धि भ्रष्ट तो सब बेकार हो जाता है य अगर ड्राइवर नशे में हो तो ठोकेगा कहीं ना कहीं ये शरीर रथ है इंद्रिया घोड़े है मन लगाम है और बुद्धि उसका सारथी है अगर सारथी ठीक है तो लगाम खींचे रहेगा तो इंद्रिय रूपी घोड़े ठीक रास्ते पर चलते रहेंगे इस भाव की निरंतरता कैसे रहेगी हा भाव हां खास बात है आपकी भाव की निरंतरता के लिए आहार शुद्धि सत्व शुद्धि पहले भोजन शुद्ध होना चाहिए साधक का भोजन शुद्ध पेय पदार्थ और खाद्य पदार्थ दोनों शुद्ध हो तो सतोगुण बढ़ेगा सतोगुण बढ़कर के ज भजन में तन्मय होता है तब वो गुणात होता है तो पहले भोजन शुद्ध हो फि आहार और विहार फिर आपके चरित्र शुद्ध होना चाहिए चरित्र पवित्र होना जो पराई मा बहनों की तरफ गंदी दृष्टि
करते हैं जो इधर उधर गंदे दृश्य देखते हैं मोबाइल में गंदी बातें करते हैं गंदी क्रियाएं करते हैं मुझे लगता है कि अभी उनकी यात्रा में कदम नहीं पहुंचा व कोई भी हो चाहे जितना बड़े विद्वान हो यात्रा में अभी परमार्थ में कदम नहीं रखा है नारायण हरि भजन में पांचों नु सुहात विषय भोग निद्रा हसी जगत प्रीति बहु बात नहीं खान पान त भा न कोमल वसंत सुहावे है सब विषय लगे त खारा है हरि आशिक का मग न्यारा है जो हरि से प्यार करता है ना उसे अच्छे अच्छे पदार्थ जो खानपान सुख चाहत अपने तिनको प्रेम छुत नहीं सपने रबड़ी रस गुल्ला भंडारा गुलाब जामुन समोसा चटनी भजन नहीं होगा सिद्ध सिद्धांत समझो जिसका भोजन नीरस उसका भजन सरस और जिसका भोजन सरस उसका भजन रस भजन में मन नहीं लगेगा एक देखो भंडारे का बढ़िया भोजन पाक देखो और एक दिन यदि गृहस्थ हो तो अपने धर्म की कमाई की रोटी दाल पाओ या विरक्त हो तो माधु कररी मांग के पाओ देखो भजन कैसा होता है मधुकरी मांग के पाओगे तो भगवान की याद आएगी और भंडारा पाओगे ना तो अधर्म के अगर पैसे से
भंडारा हुआ तो बुद्धि अधार्वा इसलिए बहुत संभलकर पहले आहार शुद्धि फिर विहार आचरण शुद्धि हमारी हो तो आगे भजन की दो बातें संभाल ले रसेंद्र को जने इद्री को यही है शिष्ण दर जबान जिसकी जबान ठीक देखो नरसिंह मेहता जी बहुत सरल भाषा में कहते हैं काछ वाच मन निश्चल राखे धन धन जननी तेरी रे भर नर सैया दर्शन पावा बड़े भाग्य जो ऐसे पुरुष के दर्शन हो जाए जो लंगोटी का पक्का जबान का पक्का और मन का पक्का काच वाच मन निश्चल राख है अगर गृहस्थ है तो अपनी पत्नी के सिवा दूसरी की तरफ आंख उठा के गलत दृष्टि से ना देखे जवान का पक्का मन का सच्चा लंगोटी का पक्का हो गई और तुलसीदास जी महाराज कह रहे हैं सत्य वचन अधीनता परती मात समान इतने पर हरि ना मिले तो तुलसीदास जवान यदि जने को काबू में रखा प्रति मात समान और जबान से सत्य बोले और भगवान के अधीन रहे तो तुम्हे भगवत प्राप्ति पक्की हो जाएगी तीन बात में भगवत प्राप्ति का वादा कर दिया सत्य वचन अधीनता प्रति मात समान यह खिलवाड़ नहीं है जब प्रति मात समान सोचोगे ना कि नहीं सब जननी
है माया ऐसा रूप रख के आएगी आओ स्वीकार करो हमें ऐसे भ्रष्ट करती माया ऐसे भ्रष्ट करती पूछो मत हा मन जब तक भु नहीं जाता तब तक उसमें स्फुरण होता रहता है जैसे चना भून जो ना और फिर खेत में डाल दो तो अंकुरण नहीं होगा ऐसे भगव का वृत्ति वाले महात्मा का मन नहीं चलेगा नहीं तो फिर बहुत बलवान देवी है भगवान कहते देवी है सा गुमई मम माया दुर बहुत विचित्र है ज्ञानी नाम चेता देवी भगवती सा लादा कृष महाय महामाया प्र ज्ञानियों के चित्र को तो अज्ञानी की तो बात बहुत संभल के चले तो पार हो जाए नहीं कल काल है ऐसे कदम कदम पे मनोरंजन फेंके हुए सबसे ज्यादा मोबाइल है एकांत में जहां हुआ मन इधर-उधर हुआ सर्च किया देखा भाग पड़े संसार की तरफ भगवान की तरफ चलना बहुत कठिन है बहुत कठिन और सरल तब हो जाता है जब हम सही मार्ग में पहुंच जाते हैं तो फिर अपने आप से हो जाता है मार्ग में च तभी आपसे कहा उपदेश दे देना भेस बना लेना यह सब लेकिन मार्ग पर चल जाना यह बहुत कठिन बात है बहुत कठिन बात है हर उपदेश में चाहत है अगर बोलने वाले की
तो कोई उपदेश काम नहीं करेगा उसे रुपया मिलेगा उसे सम्मान मिलेगा लेकिन जिस हेतु से उपदेश दिया जाता है वो रंग नहीं लाएगा रंग तब लाएगा जब वो आचरण हमारे अंदर हो वह बात हमारे अंदर हो जो हम बोल रहे हैं तो वह चढ़ जाएगी तुम्हारे दिमाग में चढ़कर वही करवाएगी जो सुन के आए हो उपदेश अगर आचरण युक्त है जैसा बोला एक बार किसी संत के पास एक माई अपने लड़के को लेकर गई और कहा बाबा तुम मना कर दोगे तोय गुड़ खाना बंद कर देगा बहुत गुड़ खाता है तो उ क एक हफ्ते बाद आना एक हफ्ते बाद बोले बेटा गुड़ खाने से पेट में भी कीड़ा हो सकते है हा में भी कीड़ा हो सकते है मत खाया करो तो उस माई ने कहा एक हफ्ते इस बात के लिए क्यों लगाया बोले मैं भी कभी-कभी गुड़ खाता था पहले एक हफ्ता गुड़ छोड़ा तब हम उपदेश किया तो जो साधु होता है वो स्वयं आचरण पवित्र और निष्काम भावना और सर्वे भवंतु सुखना सर्वे संत निरामया सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित दुख भाग भवे अब उपदेश काम करेगा खूब भजन करके जगत को भजन दे दे सब जगत का मंगल हो सब निरोग रहे सब
स्वस्थ सबकी बुद्धि भगवान शुद्ध रखें यह संतों का जीवन रहा है तो खूब भजन करो आहार शुद्ध रखो भाव तभी बनेंगे जब प्रभु से अपनापन हो जाएगा शरीर का भी अपनापन छूट जाए तब भगवान से देखो सब जगह से संबंध छोड़ देते हैं तो इससे संबंध बहुत जोर का बना रहता है मन मार्या तन बस में कीन्हा हुआ भरम सब दूर बाहर से कछु देखत नाही अंदर चमके नूर आपो त्याग जगत में बैठे नहीं कि किसी से काम उनमें तो कछु अंतर नहीं संत का हो चाहे राम भगवद आकार वृति प्राप्त की भगवान का प्रेमी महात्मा वो भगवत स्वरूप होता है भगवान और भक्त में अभेद स्थिति जागृत हो जाती है वैष्णवी आनंद जी राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी माया बड़ी प्रबल है वे हमें संसार में बांधती है माया की रचना ईश्वर करते हैं फिर वह हमें उत्पन्न कर माया में क्यों बांधते हैं हमें यह बताओ किसको माया बांधे माया किसको बांधे यह माया बांधे हमें बता दो आप खुद भगवान का एक सुदर बाजार है इस बाजार में आप क्या खरीदते हैं आपकी छूट है आप श्री जी के लिए इत्र खरीदते हैं या अपने
लिए शराब खरीदते हैं आप श्री जी के लिए माखन मिश्री खरीदते हैं या अपने लिए मांस खरीदते हैं अ ये आपकी विषय आपको बांधे कौन है हमें बता दो यद्यपि मृषा कौन सा बंधन है आपका आप स्वयं बंधे हो बंधे कीर मर्कट कीना आप ही पसंद की हो माया को मां माने नहीं या माने जो जो है नहीं उसको पसंद की और जो है उससे आप अपनापन नहीं किए और दोष दे रहे हैं हम श्री भगवान को काले कर्म ईश्वर मिथ्या दोष लगाए मुझे नहीं समझ में आता कि माया कौन है किसका प्रश्न है बच्चा कौन सी माया है
और आपको कौन सी माया मिली जो उसने बताया कि मैं माया हूं देखो मैं आपको बांधे हूं महाराज मेरा प्रश्न यह है कि जैसे हमें यहां पर भगवान ने भेजा है कि हम ईश्वर की प्राप्ति करें ठीक है और हम उन्हीं का अंश है अगर हम उन्हीं का अंश है तो उन्होने हमें अपसे उनसे अलग क्यों करा उन्होंने अलग नहीं किया हमने अलग हो गए हमारी मां जैसे अंगुली पकड़े मां की हम चल रहे थे तो हमने खिलौने देखे और मां को छोड़ दिया खिलौने में लग गए अब तब जब से बिछड़े तब आज तक हम अपनी मां की
आधी नहीं कर पाए ऐसे ऐसे खिलौने मिलते गए और हाथ लगा कुछ नहीं अब फिर मानव देह मिला है तो संत समागम से फिर एक जागृति हुई कि यह सब हमारा नहीं है हमारे तो श्री भगवान है तो हम जहां जहां फसे हैं वो हम जानबूझ के फसे हैं हमको किसी ने नहीं फासा है हमको एक आदमी बताओ कि आप को माया ने कहां फसा है हमें बता दो भोगों की लालसा आपने की वस्तु आप पसंद करते हैं जो आप पसंद करते हैं उसे आप इस संसार में स्वीकार करते हैं बाद में कहते हैं हम फसे अभी आप चाह मिटा दो कोई चाह
आप ना करो अगर आप और भगवान में भेद रह जाए तो मुझे बता देना जाही न चाही कबहु कछु यह चाही माया है यह कामना ही माया है आप कामना करते हो यही आपका बंधन है कामना छोड़ दीजिए जाही ना चाहे कबहु कछु तुम सन सहज सने बसह निरंतर ता सूर सरा उर निज ग जिसको कोई भी चाह नहीं है उसके हृदय में स्वयं भगवान प्रकाशित हो जाते हैं और वह भगवत स्वरूप भगवान का अंश अपने को भी देखता है भगवत स्वरूप तस्मत जने भेद भावा भगवान और भगवान के जन् में भेद का अभाव है ब्रह्मविद ब्रह्म भवत जो भगवान को जान लेता है व भगवान का स्वर हो जाता है इसलिए बच्चा कोई माया नहीं है हम जानबूझकर फंसे हमारे भगवान ने एक सुंदर संसार की रचना की है इसमें हम फसते हैं हमें कोई नहीं फासे हम फसते हैं जैसे कहते इन्होंने फासा तो उसमें हमने इनमें भी अपना सुख देखा तब फसे नहीं ऐसे नहीं फसगे हम जहां फसते हैं अपने सुख को लेकर व अपना सुख हमने शरीर सुख इंद्रिय सुख मान रखा है इसलिए फस जाते हैं अगर अपना सुख अस तो जोही उसका स्मरण आएगा शंकर सहज स्वरूप सहारा तो लागी
समाधि अखंड अपारा जो आत्म सुख है ही उसका चिंतन होगा समाधि लग जाएगी कोई माया नहीं हम राम राम जपे हरि हरि जपे कृष्ण कृष्ण जपे और जो भगवान ने मना किया वह ना करे देखो कौन सी माया है देखो यह माया है माया कृत है ना लाभ दे रहा ना यह माया कृत है यह माया कृत है ये माया कृत यह बांधने वाला है कि मोक्ष देने वाला है आप विचार करके यह भी तो माया कृत है यह सब माया कृत है पांच भौतिक माया के द्वारा ही तो रचा गया है कुछ डिपार्टमेंट माया का है जो हमें भगवन का साक्षात्कार करवाती है जैसे रोटी दाल सब्जी भोग यह भी तो माया है और जो हम ठाकुर को भोग लगाते हैं तो माया होती है क्या प्रसाद प्रसाद सर्व दुखा नाम हानि रस उपजाति जबान भी माया है अब इसे गाली बके या राधा राधा बोले अब कितना अंतर है अब गाली बकें तो बंद गए और राधा राधा बोलोगे तो मुक्त हो जाओगे राम राम बोलोगे तो मुक्त हो जाओ हमें लगता है हम अपनी गलती से फंस रहे हैं हमें कोई फंसा नहीं रहा बताओ बच्चा हमें एक भी बात बताओ जो तुम्हें कोई फसा रहा हो तुम तभी फसो
जब अपना सुख देखोगे अपना सुख जहां नहीं दिखाई देगा वहां तुम फस नहीं सकते व अपने सुख को तुमने जाना नहीं इंद्रिय और शरीर सुख को तुमने सुख माना यही माया इसी में फस गए क्यों बच्चा जी महाराज जी हां बच्चा तो हमें लगता है कि हम भगवान को दोष ना देकर भगवान की कृपा बनावे और जो हम सुख बुद्धि करके गलत आचरण में जा रहे हैं उनको छोड़ दे अगर हम गलत आचरण को छोड़ दे तो अभी आनंदित होकर कह सकते हैं कोई माया नहीं देखो आप माया हो बच्चा आप हमारे भगवान दिखाई दे रहे हो मेरे भगवान इस तरह रूपों में आए और अभी हम आपके प्रति गंदी दृष्टि कर ले तो फस गए माया में फस गए ना हम देख रहे हैं कि हमारी श्री जी की सखी है हमारा हदय आनंदित हो रहा है गंदी दृष्टि फस गए ना माया माया ने फसाया है हमारी दृष्टि ने फसाया हमारी दृष्टि हमारी दृष्टि बदल गई हमारी चाहत बदल गई फस गए चाहत ही दृष्टि ही माया है अगर दृष्टि ठीक देखो हमें तुम्हें कोई दुष्ट दिखाई देता कोई अच्छा दिखाई देता गोस्वामी जी को सब सी राम में सब जग जानी कहां माया है सब
सियाराम है अ दृष्टि है और दृष्टि में अगर हमारी बदल जाए तो सब तो हमको अपनी दृष्टि सुधारने है हमारी चाहत सुधर जाए तो कोई माया नहीं है चाहा जो है कैसे छूटे भजन भजन भजन भजन नसेनी प्रेम की जैसे नसेनी में हम चढ़ के ऊंचाई पर जाते ना तो हमारे धुर दस जी कहते भजन सेनी प्रेम की भजन तभी होगा जब भजना नंदी संतों का संग मिलेगा भजन न होई संग बिनु और भजन बिना नहीं प्रेम छिन भजन न छाड़ धरिए ध्रु या नेम और गोस्वामी जी बड़े ललकार के कह रहे हैं बारी मथे ग्रत होए बरु सिकता ते बरु तेल बिनु हरि भजन न भव तरी या सिद्धांत पेल भजन करो सब ठीक हो जाएगा राधा राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण कृष्ण मेरे क्वेश्चन है आपने जो बोला अभी प्रश्न है परिवार जो है वो मोह है या धर्म है बच्चा अगर अगर उसे एक छोटा था परिवार जो हैना आज के डेट में बटा हुआ है परिवार लोभ से भरा हुआ है वैसे बच्चा हम इतनी बात जानते हैं कि आज के समय में पति-पत्नी के बीच में विश्वास होना माता-पिता पुत्र के बीच में विश्वास होना परिवार भाई भाई के प्रति विश्वास होना
यह बड़ा दुर्लभ होता जा रहा है होता जा रहा छोटी-छोटी सुख वृत्तियों में वो विभाजन होता जा रहा है हमारा प्यार जो विशुद्ध होता है उसका महत्व नहीं रह गया है अब जो प्रकृति में आपको देखने को मिल रहा है और पहला प्रश्न जो आपका कि मोह है या धर्म है तो बात अगर तुम आसक्ति पूर्वक करोगे तो मोह है और भगवत भाव से करोगे तो वो धर्म है अपने परिवार का पोषण करना धर्म है जैसे आप किसी के भाई हैं किसी के पुत्र हैं हो सकता है ब्याह हुआ तो किसी के प्रति है आप किसी के अलग-अलग संबंध अब आपको इन धर्मों का पालन करने से भगवान की प्राप्ति होगी अब उस भाव से देखो अगर मोह से देखोगे तो फिर दूसरों के साथ अमंगल कार्य करके अपने परिवार का पोषण करोगे यदि मोह से देखोगे और धर्म क्या है कि हम मेहनत से कमा कर के अपने परिवार को भगवान की आज्ञा मानकर क्योंकि नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी यह धर्म है समझ पाए कुछ गलत कर रहा है हमें पता है जी तो हमें वो तब भी अपना धर्म निवाना चाहिए देखो वो वो गलत कर वो गलत कर रहा है
उसका फाइनल होगा लेकिन मैं गलत नहीं करूंगा उसके साथ मेरा जो जैसे मानो मेरे माता-पिता है अब वो गलत है एक बात कह रहा हूं तो मेरा कर्तव्य जो है मैं पुत्र कर्तव्य को गलत नहीं होने दूंगा वो माता-पिता के कर्तव्य से चूक गए तो मैं बेटे के कर्तव्य से नहीं चुकू वो भाई है वो अपने कर्तव्य से चुक गया तो मैं अपने भ धर्म से नहीं चुकू वो पत्नी है वो चूक गई तो मैं अपने पति धर्म से नहीं चुकू यह आप में होना चाहिए महाराज जी आप कभी कहते हैं कि यहां पर बैठने बैठ जाओगे तभी भगत प्राप्ति हो जाएगी आपको नहीं तो बैठने का मतलब समझते हो अंदर की भाग मिट कर के जो हम कह रहे हैं उस परे टिक जाओ शरीर को बैठाने के लिए थोड़ी है शरीर को बैठाने के लिए तो आप कितनी बार हमारे पास बैठ जाओ हमारी बात एक ना मानो तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी बच्चा तो फिर बैठ जा जैसे ट्रेन में एक आदमी दौड़ रहा था ना तो उससे पूछा क्यों दौड़ रहे हो तो उसने कहा हमको अमुक स्टेशन जाना है बोले ट्रेन चल रही तू बैठ जा तू बैठ जा सृष्टि चक्र त्रिगुण का चल रहा है तू
बैठ जा किसी नाम का आश्रय लेकर अंदर के बैठने के बाद बाहर से तो क्रिया करो अंदर से एक में बैठ जा राम में कृष्ण में राधा में हरि में तो यहां बैठने का मतलब वृंदावन श्री जी में और कल्याण नहीं हो जाएगा मंगल नहीं हो जाएगा संतों की बातों को अर्थ में भावार्थ में रहस्यांगल और भगवत प्राप्ति के बीच में जो बात है पहले आओ तो फिर हम तुम्हें बताएंगे हमने बुलावा दिया वृंदावन आ जाओ तुम्हें भगवत प्राप्ति निश्चित है अब आ गए वृंदावन मैं आ गया वृंदावन हां तो अब सुनो ऐसी रहनी से रहो ऐसे नाम जप करो ऐसे भजन करो भगवत प्राप्ति हो वृंदावन और भगवत प्राप्ति हो जाएगी इसके बीच का बीच का जो मार्ग है उसमें बैठ जा अपने आप भगवत प्राप्ति हो जाएग जैसे आओ हमारे ऐसा तो प्राया सत्संग में कहते रहते हैं कि श्रीपाद प्रभु द नंद जी कह रहे आप आ जाओ वृंदावन एक बार आ जाओ एक बार बैठो सत्संग में आपको भगवत प्राप्ति हो जाएगी कैसे हो जाएगी सत्संग की बातें जब पकड़ोगे और अपने जीवन में उतारो ग तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी बैठने मात्र से भगवत
प्राप्ति हो जाएगी ऐसा तो मुझे नहीं लगता जब तक आप बैठोगे नहीं सत्संग में तब तक सुनोगे नहीं बिन सत्संग विवेक ना हुई और विवेक के बिना वैराग्य नहीं हो और वैराग्य के बिना अनुराग नहीं होता तो एक क्रम है जैसे कहा जाए आप राधा राधा जपो आपको सब कुछ प्राप्त हो जाएगा अब आप सुबरे देखो कि चेक आए कि नहीं तो ऐसा नहीं होगा समय लगेगा पहले आपके पाप नष्ट होंगे वासना नष्ट होंगे तब जैसे किसान दाना डालता है और कहता है 50 मन अन्न होगा तो दूसरे दिन हो जाएगा क्या 50 मन छ महीना सेवा करके तब फिर एक मन जो डाला उससे 40 मन 50 मन पैदा करता है धैर्य पूर्वक बैठ जाओ भगवान के नाम नाम में भगवान के आश्रय में भगवान के चिंतन में निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी मानो आप जैसे राधा राधा कह रहे अभी हमारे प्राण निकल जाए भगवत प्राप्ति हो गई पुत्र के बहाने नारायण बुलाया तो भगवत प्राप्ति हो गई जान बूझ के नारायण नारायण जपोगे शवास रुक जाए तो भगवत प्राप्ति नहीं हो जाएगी इसलिए बैठ जाओ नाम को लेकर बैठ जाओ अंदर की बात है बाहर से तो क्रियाए
करो नाम के सहारे में बैठ ग जैसे गोस्वामी जी राम नाम में बैठ गए ये नौका है भगवान की राम नाम में कोई राधा नाम में बैठ कोई कृष्ण नाम में बैठ गया कोई भगवान के धाम की निष्ठा में बैठ गया कि एक कदम प्राण चाहे निकल जाए धाम से बाहर नहीं जाए ये बैठना है सदई भाषा को केवल शब्दार्थ में ना लिया जाए समझ पाए बच्चा शुरुआत में कितने घंटे काम जप करना वैसे बच्चा हम घंटे पर ज्यादा बात नहीं देते हम देते हैं स्वास पर कि आप शौचालय में हो तो राधा बोलो शौचालय के बाहर हो तो राधा बोलो काम कर रहे हो तो राधा राधा स्वास शवास में चलाओ बैठे हो तो राधा राधा चलाओ अब जैसे हम तुमसे कहे गृहस्ती के काम में घंटे भर दो घंटे भर बैठना उसी समय खेत में पानी लगाने जाना उसी समय कोई कार्य है तो फ बैठना नहीं होगा उठते बैठते चलते फिरते राधा राधा हर शवास एक विश्वास खाली ना जाए बढ़िया पक्का भगवत प्राप्ति हो जाएगी आ गई समझ में गौरव बग्गा जी राधे राधे जी महाराज जी मेरे पिता विधायक हैं तो हमने बचपन से पूरा परिवार समाज और लोगों की सेवा करता
आ रहा है गुरु जी कभी-कभी मन बहुत परेशान हो जाता जब समाज और लोगों की सेवा में से 100 काम करने के बाद अगर एक काम किसी का खराब हो जाता तो लोग नाराज हो जाते हैं गुरुजी ऐसा बारबार होते देखा गया गुरुजी मेरा मार्गदर्शन करें मन इस सम ने नेकी का दरिया में डाल अगर हम किसी से पलटकर थैंक यू सुनना चाहेंगे तो हमको दुखी होना पड़ेगा बहुत कडुआ व्यवहार है आप प्राण समर्पित कर दो वही आदमी अवसर आपके प्राण लेने के लिए तैयार हो जाएगा ऐसा जगत है मतलब बहुत कडुआ है जगत का
व्यवहार बहुत आप ईमानदारी से सच्चाई से सब कुछ कीजिए ना भी बिगड़े तो भी वह धोखा दे देगा तो भी वो ठीक अवसर पर आपको अंगूठा दिखा देगा तो आपको फिर दुखी होना पड़ेगा आप तो ऐसे करो नेकी कर दरिया में डाल मैंने जो किया वोह अपने धर्म के अनुसार किया तू जो बोले मुझे उससे मतलब नहीं तू धन्यवाद बोले या तू गाली बोले ये तेरी खोपड़ी की बात है मुझे जो सिखाया गया है मैं समाज सेवा राष्ट्र सेवा धर्म युक्त करूंगा पर होता है तो यह कान हमारे थोड़ा अहम सुख लेना चाहते हैं लेकिन आप जो सेवा करते हैं ना मब आप समाज सेवी ये सुनना चाहते कान क्योंकि हम मेहनत कर रहे हैं हम सच्चाई से लग रहे हैं तो उसका फल इतना तो कम से कम आवे कि जिनके लिए कर रहे हैं वो थोड़ा पर ऐसा भी नहीं इससे ऊपर उठो तो आप फिर सुख दुखे समय कृत्वा लाभा लाभो जया जयो आप एक अच्छे बन जाएंगे जिसे अच्छाई कहते हैं कि आपको कोई गाली भी देगा ना तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा पर सेवा का अवसर आएगा तो उसी गाली देने वाले की आप सेवा करोगे यह आपकी मानता होगी अभी क्या है कि हम
जैसे आकांक्षा रखते हैं तभी हमें दुख होता है अगर हम आकांक्षा ना रखे तो नहीं दुख नहीं होगा अगर आकांक्षा मिटा दी जाए तो फिर बात बन जाए निष्काम कर्म उसे ही कहते हैं जो आकांक्षा रहित होता है कि अगर हम इसकी सेवा है कठिन काम क्योंकि हम तन मन धन से इसकी सेवा कर रहे हैं और वोह आदमी मुझे कटु वचन बोल रहा है वह मेरी निंदा कर रहा है और मुझे उसका मंगल करना है अब यह थोड़ा कठिन पड़ अगर कठिन का निपटा ले जाए तो इसी से भगवत प्राप्ति भी हो जाए इसे कर्म योग कहते हैं केवल कर्म नहीं हुआ ये कर्म योग हो गया निष्काम भाव से कि आपके धन्यवाद देने की मुझे कोई जरूरत नहीं है मेरा जो कर्तव्य मैं कर रहा हूं मुझे जो मिलेगा तो भगवान से मिलेगा तुमसे इंसान से हमें क्या मिल लेना समझ रहे हो अगर आप भगवान को सामने रखोगे तो आपका हृदय शीतल रहेगा और अभी तो यह छोटी सेवा है भगवान चाहेंगे तो और बड़ी सेवा दे देंगे 00 रप ठीक खर्चा करो तो पिता हजार दे देगा और हजार ठीक खर्चा करो तो लाख का अधिकार और लाख ठीक करो तो करोड़ों का अब जब समय ठीक
से नहीं खर्चा हो पाए तो फिर यह लगेगा कि हजार बर्बादी करेगा तो ऐसे ही हम हम अपने कर्तव्य का ठीक से पालन करते जाए तो यही नहीं हम परम पद प्राप्त कर लेंगे भगवान की प्राप्ति कर लेंगे चक्रवर्ती सम्राट अमरीश जी थे राजा होते हुए भी महान भक्त थे भगवान का सुदर्शन चक्र उनकी रक्षा में रहता था तो यह थोड़ी कि आप सांसारिक कार्य कर रहे हो आप भगवान का कार्य कर रहे हो यह समाज भगवान का स्वरूप है पर खोपड़ी अलग-अलग रची ये तो पक्की समझ लो यह हमने जीवन में देखा है बहुत
से ऐसे धार्मिक पुरुष है जिनको ऐसे टॉर्चर करते हैं लोग ऐसे वचनों के द्वारा कि वो मतलब दुखी होकर कहते हैं कि हम क्या करें तो हम कहते ये छोड़ दो उनसे नमस्कार पाना छोड़ दो उनसे धन्यवाद की आशा छोड़ दो अभी सुखी हो जाओगे नहीं आपको बात समझ में आ गई मर जी इनका जो कार्यक्षेत्र है उसमें कामना तो रहती है क्योंकि अच्छा काम करेंगे तो अगली बार फिर चयन होगा यह कामना से आप इतनी बात समझ लो अगर ये धर्म से अच्छाई से चल रहे हैं और सैकड़ों लोग विरोधी होंगे विरोधी होते
हुए भी ठप्पा लगवाए गे भगवान ओ बात समझ लो कितने ऐसे लोग हैं हमने जो सुना भले एक दो क्रियाओं में ऐसा लगे कि ऐसा ठीक नहीं लेकिन अंदर से भावना यही रहेगी कि यार हमारे प्रदेश का हमारे क्षेत्र का यही अधिकारी बने तो बढ़िया क्योंकि आदमी की नजर में आता है कि ठीक है हमारी नहीं बनती लेकिन यह धर्मात्मा है यह बेईमान नहीं है ये फ्रॉड नहीं है अगर यह बनेगा ना तो सबके काम आएगा और सबके हृदय में भगवान भवान बैठे हैं वो लगाने कहीं जाएगा लग कहीं जाएगा यह भी बात समझो भगवान जब ताते हैं ना तो उनका खेल ही अलग रहता है इसलिए आप भगवान का भरोसा रखो भगवान के भरोसे से आज तक किसी का अहित नहीं हुआ इतिहास साक्षी है जो भगवान को दूध पिला कर के मारना चाहती है जहर लगा के उसे यशोदा मैया की गति दी भगवान ने पूतना को अगर हम सच्चाई से भगवान की सेवा में लगे तो हमारी दुर्गति कैसे हो सकती है ये देखो चार लोगों की तो बात कोई ऐसा सृष्टि में नहीं है जो किसी को सब सपोर्ट करते हो चाहे साधु महात्मा किसी को ऐसे ही हर जगह है अगर चार आदमी
आपको अच्छा कहेंगे तो चार आदमी आपकी बुराई करने वाले भी मिलेंगे तो आप देखो ना कृष्ण चंद जू के प्रति कुछ ऐसे नास्तिक है जो भगवान नहीं मानते तो ऐसे आप बिल्कुल जब भगवान के नहीं हुए जब भगवान का नाम नहीं लोग ले रहे तो हमारा तुम्हारा नाम क्या लेंगे संसार की आशा मत रखो अपने कर्तव्य का पालन करो इसी में विजय होगी आशा रखने में निराशा ही मिलेगी आज तक किसी को अगर धोखा दे पाया है कोई तो कोई सगा मित्र धोखा दिया है भगवान के सिवा अपना कोई सगा नहीं बात समझ लो अपने हृदय की गुप्त बात भगवान से केवल करें दूसरे से ना करें अपनी गुप्त बात को सिर्फ भगवान बस सिर्फ तो कभी हारेगा नहीं और अपनी आशा सिर्फ भगवान किसी व्यक्ति से नहीं उसको कभी कोई दुख ही नहीं कर सकता आशा एक राम जी से दूजी आशा छोड़ दे नाता एक राम जी से दूजा नाता छोड़ दे अगर हम नाम भगवान का जप रहे भगवान के भरोसे बिल्कुल विजय ही विजय है हर तरह से हमारा हृदय आनंदित रहेगा
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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