एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #738 · 24 नवंबर 2024
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
अशोक जी दिल्ली से राधे राधे महाराज जी महाराज जी कोई भी कार्य करने से पहले दिमाग और दिल के बीच कंफ्यूजन पैदा हो जाता है इस समय पर किसकी बात माने दिल कुछ कहता है दिमाग और दिल के बीच में प्रभु को ले आओ प्रभु को ले आओ फिर आपको उत्तर सही मिल जाएगा उस समय भगवान का स्मरण करने लगो कि प्रभु इसमें मुझे क्या कर लंका में प्रवेश करने के पहले हनुमान जी कि लंका बहुत ही निशाचर वहां बोलबाला सब तो हनुमान जी कैसे प्रवेश कर रहे प्रभ श नगर की जय सब का हृदय राखी कौशल पुर राजा दिल और दिमाग दोनों गंदे हैं इनका काम क्या मानना है यह तो सपोर्ट वही करेंगे जिससे वासनाओं की पूर्ति हो जिससे स्वार्थ की पूर्ति हो जो हमें सही निर्णय दे सकते हैं व भगवान हम उस समय भगवान का नाम सुमिरन करें भगवान से प्रार्थना करें तो सच्चा उत्तर आ जाएगा करना है या नहीं करना है वैसे हमें लगता है सबको उत्तर मिलता है बिना पूछे आप जब गलत कार्य की तरफ कदम बढ़ाएंगे तो आपको उत्तर मिल जाएगा गलत है मत करो आता है कि नहीं सच्ची बताना हृदय में एक अंदर
आता है यार गलत है मत करो पर हम उनकी बात नहीं सुन पाते तो उनकी बात सुनने के लिए मुझे पावर चाहिए और बात मानने के लिए पावर चाहिए इसलिए राधा राधा राम कृष्ण हरि जो नाम प्रिय लगे नाम जप करो अपनी सद जानकारी का सदुपयोग करने के लिए हमें पावर चाहिए वह भगवान के नाम से मिलेगा सद जानकारी सबको है सद जानकारी सबको है कि यह नहीं करना चाहिए यह नहीं करना चाहिए यह सबके अंदर आता है पर उस जानकारी का प्रयोग करने की सामर्थ्य नहीं है हम इंद्रिय और मन के गुलाम हो चुके हैं
जैसा चाहते हैं वैसा हम कर बैठते हैं तो हमको इस समय भजन चाहिए भजन बल के द्वारा हम सही और गलत का निर्णय कर सकते हैं नहीं तो मन तो सही कहता है बुरे से बुरा कर्म करने के लिए व सलाह दे देता है मान धोखेबाज सलाहकार नष्ट कर देता है मालिक को पक्का तो यह बेईमान धोखेबाज सलाहकार मन है और दिल कोई सलाह नहीं देता है दिल की एक अलग प्रक्रिया जिसे हम दिल कहते हैं उसे अंतःकरण कहते हैं अपने लोग मतलब ग्रामीण भाषा में कह देते हैं ना दिल से बोलो यार कि दिमाग से बोल रहे
हो दिल का तात्पर्य हृदय और हृदय का तात्पर्य शास्त्री भाषा में अंतःकरण अंतःकरण चार होता है मन बुद्धि चित्त अहंकार बुद्धि का काम है निश्चय करना मन का काम संकल्प बनाना चित्त का कार्य उस विषय का चिंतन करना अहंकार का कार्य स्वीकार कर लेना जब बुद्धि का निर्णय होता है तो गलत होता है और जब बुद्धि में विवेक होता है उसका निर्णय होता है बहुत सही होता है विवेक जो बुद्धि में उपज है वह सत्संग से होता है बिन सत्संग विवेक न होई और राम कृपा बिन सुलभ न सोई विवेक कभी गलत निर्णय नहीं देता बुद्धि गलत निर्णय दे देती है यह हमारे स है जो जीते हुए मन बुद्धि नहीं है यह हमारे दुश्मन है जब तक हम नाम जप नहीं करेंगे तब तक हम में व बल नहीं आएगा कि हम गलत सलाह देने वाले मन बुद्धि को पकड़ पावे हम उसी में दस्तखत कर देते हैं जो क पाच मिनट का काम सीधे गोली मारी गई सीधे फांसी की सजा हुई सीधे जेल गए यह बात नहीं यह धोखेबाज मन बुद्धि है इनकी सलाह में ही पूरी जेल भरी है इनकी सलाह में ही सारे कुकर्म होते हैं और जिसकी बुद्धि
भगवान से जुड़ी है उस बुद्धि में विवेक होता है सही निर्णय विवेक कर पाता है सही निर्णय विवेक कर पाता है 50 हजार की घोष में पूरी पढ़ाई लिखाई और पूरी की पूरी सब बर्बाद कर दी बुद्धि ने निर्णय कर दिया ना कि फिर मिल रहे अब कितना पढ़ा होगा कितना व अपने परिवार के लिए आशा रखता होगा परिवार कितनी आशा रख चंद रुपए में वह सब खत्म बुद्धि का निर्णय अगर बुद्धि में वि है नहीं हमें सरकार देती है जितना हम उतने से काम चलाएंगे लेकिन दोषी को बखे नहीं निर्दोष को दंड नहीं
देने अब उसका सही मार्ग चलने लगा जहां हमारे अंदर बुद्धि की केवल प्रधानता होती विवेक नहीं होती वहां फसा देती बुद्धि बुद्धि फसा देगी और जहां विवेक होता है तो बुद्धि को फसने नहीं देगा वह जलन पैदा कर देगा नहीं हम ऐसा नहीं हम गलत नहीं होने देंगे बहुत से ऐसे संसार के कार्य हैं जहां से हमने अपनी प्रतिष्ठा खो दी जहां से हमने अपना सुख खो दिया जहां से अपनी हमने शांति खो दी यह मन और इंद्रियों के कहने से मुझे लगता है सही निर्णय आत्म स्वरूप गुरुदेव अंदर बैठकर देते हैं उसके सुनने की और उसके पालन करने की सामर्थ्य भगवान के भजन से आएगी नाम जप करो और फिर पूछो सही उत्तर नावे तो हमें बताना नाम जप करते हुए गलत सोचोगे तो जलन पैदा हो जाएगी और सही सोचोगे तो शीतलता आ जाएगी एकदम हृदय शीतल होने लगे बस समझ लो जब ठंडा होने लगे तो समझ लेना बात सही है जब हृदय में थोड़ी भी जलन हो तो रुक जाओ गलत मार्ग में जा रहे हो वापस लौटो नाम जप करोगे तब यह स्थिति आएगी नहीं तो एक झोका मन मारेगा और आप वो कार्य कर बैठेंगे जो बुद्धि ने
सोच रखा है गलत अब हमारी बात समझ पा रहे हैं जी मनोज कुमार वर्मा जी वृंदावन से जी जी मराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम मराज जी सुना है कि बड़ी कृपा होती है उन लोगों पर ठाकुर जी की जिनको श्री धाम वृंदावन में निवास करने का अवसर मिलता है उसी कृपा से से मुझे जन्म के साथ ही बृजवासी बनने का सौभाग्य मिला लेकिन लेकिन बच्चा नहीं नहीं अब पहली बात ये यहां हम रुकते हैं थोड़ा सा ध्यान देते हैं कि जो वृंदावन में वास कर रहे हैं कृपा है जो जन्मे हैं कृपा है लेकिन अब क्या कर रहे हैं कृपा तो हो गई पर अब क्या कर रहे हैं वृंदावन बस के इतनो बड़ो सयान जुगल चरण के भजन बिन निमिस नदी जय जान आंख जपक को निमिस कहते हैं इतना भी समय प्रिया प्रीतम के भजन के बिना नहीं जाने दे वो धन्यवाद वृंदावन वासी का अगर भजन नहीं मन मानी आचरण मन माने तो फिर लाभ कैसे मिल पाएगा आप हमें बताओ ब है नहीं अगर अमृत है उसका हम पान ना करें तो हम यहां तक खड़े रहे तो भी अमर नहीं होंगे तो वृंदावन अमृत धाम है पर हम प्रिया प्रीतम को भजन ना करें
हम उद्दंड करें गंदी बातें करें गंदा चित्र देखें गंदे व्यवहार करें गंदा खानपान मुझे लगता है बच्चा कि धाम की कृपा का अनुभव तो नहीं हो पाएगा वृंदावन इ विधि बसे तज के सब अभिमान त्रण ते नीच आपको जाने सोई जान जो अपने को बिल्कुल दीन समझता है रात दिन भजन में लगा हुआ है अच्छे आचरण पवित्र य धाम है ना जैसे उपजाऊ भूमि में गलत बीच पड़ जाए तो जगेगा अच्छा बीच पड़ जाए तो जगेगा यहां का पाप भी परव के समान बज्र के समान होता है तो थोड़ा समझना पड़ेगा कि वृंदावन धाम कृपा सिंधु है श्री जी की कृपा से यहां पर यहां रहनी अगर रहनी नहीं है तो लाभ नहीं मिल पाएगा आप देखो क्यों धाम में मनमानी आचरण तो फिर वो मलिन मन और दूर रह रहा है स कोष दूर और ललचा रहा है धाम के लिए ललचा रहा है सत्संग के लिए और प्रिया प्रीतम का चिंतन करर उसका परिवर्तन हो जाएगा उस पर विशेष कृपा हो जाएगी यह थोड़ा मतलब समझने का विषय है तो यदि आपको वृंदावन वासी हो कहीं किसी कार्य के लिए बाहर जाना पड़ता है तो वृंदावन का चिंतन करते हुए श्यामा जू का चिंतन
कर जाइए कोई परेशानी इसमें नहीं कोई अंतर पड़ने वाला नहीं श्री जी ने नौकरी अगर बाहर दे दी हो महाराज जी कोई परेशानी नहीं कोई परेशानी नहीं बच्चा आप बाहर नौकरी कीजिए माता-पिता परिवार के सदस्यों का पोषण कीजिए और वृंदावन का तो जो दृश्य देखा है वो चिंतन कीजिए परिक्रमा मार्ग यमुना जी बिहारी जी राधा रमण तो वृंदावन को चिंतवलप्पु व्यापत जहां रसिक सिर मोर हमारे उर वृंदावन वृंदावन का स्मरण करते हुए भगवान के बताए हुए मार्ग पर चलो नौकरी पेशा व्यापार बाहर रह कर के जो करो भगवान ऐसा नहीं आप हमें बता सकते हो कि भगवान कहां नहीं है है नहीं स जिस समय ब्रह्मा जी के पास गौ देवता सब विकल होकर गए रावण के आतंक से महादेव जी के पास भी गए महादेव जी भी बोले चलो चला जा छीर समुद्र कोई कहे बैकुंठ चला जाए कोई कहे तो भगवान शिव ने कहा तेही समाज गिरजा मैं रहे हं अवसर पाई वचन एक कहे हरि व्यापक सर्वत्र समाना प्रेम ते प्रगट होही मैं जाना भगवान शिव ने कहा मेरी बात कहीं जाने की जरूरत नहीं यही सब प्रेम से पुकारते भगवान यही प्रकट
वही प्रकट हो गए भगवान प्रेम ते प्रगट ई म जा तो तुम जहां हो वृंदावन का प्रेम है प्रियालाल का प्रेम है तो तुम्हारा बाल बाका नहीं होना मंगल है बच्चा और वृंदावन में रहकर कुमार्ग गामी प्रवृत्तियों के आचरण किए जाए मुझे लगता है कि कम लाभ मिलेगा दूर रह कर के यदि हम अच्छे आचरण करें भगवान का चिंतन कर रहे तो हमें लगता पूरा लाभ मिलेगा इसमें कोई चिंता की बात नहीं ठीक है म जैसे मेरे माता पिता यहीं पर रहते हैं तो जैसे मैं वीकेंड में आता हूं जी तो कभी कभी ऑफिस प्रश्न आता है कि भाई बार-बार आप घर क्यों जाते हो बार-बार आप घर क्यों जाते हो मतलब मेरे मां-बाप यहां पर हैं कौन प्रश्न करता है जैसे ऑफिस वाले कलीग्स हैं या कुछ सीनियर्स हैं हां कोई कोई बात नहीं तो आप छुट्टी के अधिकार के अनुसार देख लीजिए आपकी नौकरी भी ना जाए ऑफिस वाले या नौकरी वाले यह चाहते हैं कि आपके द्वारा सेवा बने तो आपकी छुट्टी भी तो होती होगी छुट्टी का कोई विधान होता होगा तो उसी विधान से आ जाइए कोई परेशानी नहीं आप बार-बार अवहेलना करके आएंगे
तो नौकरी छूट सकती है शनिवार तो जो छुट्टी का अधिकार है उस पर वो क्यों बोलेंगे ताना देते क र कि कहा जा रहा है वृंदावन कोई परेशानी नहीं अपने मां-बाप के पास जा रहे हैं उनकी सेवा की जरूरत है ऐसा किसी के ताने सुनने से कोई परेशानी नहीं है थोड़ा मजबूत बनना चाहिए इतना हल्का फुल्का नहीं कि कोई फू क दे हम मुड़ जाए ऐसा भी नहीं होना थोड़ा मजबूत हृदय वाला बनना चाहिए ठीक है जी लभ कुमार यादव जी हरि बाबा बा महाराज जी मेरा प्रश्न है कि भगवत प्राप्ति से संबंधित यह प्रश्न है जैसे कि हमने श्री विष्णु पुराण जी में पढ़ा है कि चार युग मिलकर एक चतुर्य बनता है फिर जब 1000 चतुर्य बन होते हैं तो ब्रह्मा जी का एक दिन फिर ब्रह्मा जी की आयु 100 वर्ष है अर्थात सृष्टि इसके बाद प्रलय हो जाती है महाराज जी अब प्रश्न ये उठता है कि अगर किसी जीव को भगवत प्राप्ति हो गई तो क्या उस जीव को इस सृष्टि की अवधि तक विश्राम मिलेगा अर्थात फ अभी अभी इसी क्षण भगवत प्राप्ति अभी संसार चक्र खत्म अभी परमानंद में स्थित कोई प्रलय नहीं कोई नाश
नहीं कोई परिवर्तन नहीं उसी को तो जीवन मुक्त परम पद कहते हैं जहां प्रलय का भी प्रवेश नहीं प्रलय ब्रह्मा जी के द्वारा रची हुई होती है हम ब्रह्मा जी के द्वारा रचे नहीं हमारा शरीर रचा हुआ है शरीर अभी नष्ट हो जाए कोई फर्क नहीं पड़ता हम अविनाशी चेतन अमल और यह जब बोध हो गया भगवत प्राप्ति हो गई तो सब भय खत्म सब नाटक खत्म माया का जग गए तो स्वप्न में कतल हो रहा था बच गए ना जो सपने सिर काटे कोई बिन जागे दुख दूर ना होते सब स्वापक है सृष्टि रचना भी स्वापक है सृष्टि पालन भी स्वापक है और सृष्टि का नाश भी स्वापक है उस अविनाशी का ना रचना होती है ना उस अविनाशी का पालन होता है ना उस अविनाशी का विनाश होता है वही अविनाशी तुम हो नैनम छिंदंति शस्त्राणि नैनम ति पाव का न चैन क्लेंप न शोष मर्ता यही आत्म बोध है और उसी सच्चिदानंद का जब दर्शन होता है तो तत्व ज्ञान अपने आप हो जाता है खत्म खेल ये सब भय खत्म समझ रहे हो ना यह माया का जादू है उमा कह मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब सपना अभी समझ में नहीं आया भगवान य मैं
तो हाथ खड़े करके आपके श चरणों की शरण में हूं लेकिन कभी कभी य बुद्धि की रा से तर्क करती है क्यासे उत्तर ले लो तो इसका अभी कई महीनों से य तर्क क्या जैसे हम को अभी भगवत प्राप्ति हो गई किसी भी अभी तुम जाना ही नहीं भगवत प्राप्ति किसे कहते एक बार तो खा के तो देखो फिर आ इसके बाद क्या दिखता है पहले भगवत प्राप्ति का लक्ष्य बना ना सृष्टि है ना पालन है और ना लय है यह त्रिगुण की माया में है और त्रिगुणा तीत है भगवत प्राप्ति जब वो दृष्टि आ जाएगी है ही नहीं अरे
भैया स्वप्न में सब कुछ दिखाई दे रहा जगने प कुछ है क्या तो अभी तुम स्वापक पुरुष हो जगे हुए पुरुष हो क्या तुम्हें ब्रह्म बोध हो गया क्या तुम्हें भगवत साक्षात हो गया क्या तो स्वापक संकल्प विकल्प हो रहे है अब जगाने की चेष्टा कर रहे जग जाओ धीरे-धीरे निरंतर नाम जप करो और ये जो सृष्टि प्रलय की कथा लिखी हुई है कि हम भयभीत होकर ऐसे भगवान की शरण में जाए यह सत्य है संसार की लीला में य ऐसा होगा लेकिन हम ऐसा भजन करना है कि अब हमको इस प्रपंच से ऊपर उठ जाना है और भगवत प्राप्ति में कुछ नहीं होता ना प्रलय होती है ना पालन होता है ना लय होता है अभी ज्ञान तो है नहीं अब भी आत्म स्वरूप क्या पालन होता है अ भी आत्मा स्वरूप का कोल बाल बाका कर सकता है इसका ब्रह्मा सजन कर सकते जो ब्रह्मा की आत्मा वही हमारी आत्मा है अभी बच्चे हो कैसे समझोगे नाम जब करो तब समझ में आएगा य तो अध्यात्म का खेल है नाम जप करते रहो पहले भगवत प्राप्ति की तरफ चलो भगवान आपके सानिध्य में ह काफी समय से य कभी कभी प्रश्न करती लेकिन मैं इसका चिंतन
नहीं करता हूं आपके चरणों के तो आप समझ में आ रहा है कि नहीं जैसे स्वप्न में आप देख रहे हो कि एक मित्र मिला पत्नी मिली लड़का दुनिया का सब प्रपंच देखते हो क्या कुछ सत्य होता है क्या यहां क्या सत्य है हमारी बाल्यावस्था सत्य थी क्या हमारी जवानी सत्य थी क्या और कुछ दिन बाद ये रूप ऐसा मिट्टी में मिल जाएगा ढूंढने से नहीं मिलेगा त्रिभुवन में त्रिकाल में ये सब नाटक है माया का यह सत्य थोड़ी है और जो हम हैं वो थे है रहेंगे कभी विनाश नहीं अग्नियास्त्र हमारा कुछ नहीं जला सकता वायवा स्त्र हमारा कुछ नहीं उड़ा सकता वरुणा हमारा कुछ नहीं तभी तो नैनम चिंद सस्त्र नन ति पाव का अभी ना आत्मज्ञान है ना भगवत साक्षात्कार तो बुद्धि तो चंचल होही जाएगी नाम जप करते रहो और जो संशय आवे उसका उत्तर लेते मानते रहो आप मानते रहो तो जान जाओगे अगर मानोगे नहीं तो फिर तर्क में बुद्धि फसा करके नेगेटिव भी चला सकते हैं नकारात्मक सोच भी ला सकती है म जीी मानने के लिए भी पावर चाहिए क्या अंदर हा भजन के बिना तो मान्यता भी नहीं होगी भजन
इसीलिए बारी मथे ग्रत होए बरु सिकता ते बरु तेल बिन हरि भजन न भव तरिया सिद्धा सपना सपना कब लगता है मराज जब उठ जाते हैं तब सपना लगता है जब ज्ञान होता है तब जब ज्ञान हो जाता है तत्व ज्ञान अपने स्वरूप का बोध हो जाता है या भगवान का दर्शन हो जाता तब लगता है कि अरे जैसे रस्सी को सांप मानकर डर रहे हैं पर जब तक सीधा प्रकाश रस्सी में नहीं पड़ेगा और हम रस्सी नहीं जानेंगे तब तक हम डरते रहेंगे और जब प्रकाश पड़ा देखा रस्सी तो हस देंगे यारे तो रस्सी थी हम इसे साप मान रहे थे ऐसे सर्वत्र ब्रह्म व्याप्त है सर्वम लमदम ब्रह्म यहां कोई भय का विषय नहीं पर जब तक हम ब्रह्म बोध नहीं कर लेते तब तक भय से निवृत्ति नहीं हो सकती क्योंकि महाराज जी बहुत कठिन पड़ती है उस बातों को सब कठिन इसलिए पड़ती कि हम आसक्त हो गए हैं शरीर में शरीर के भोग हम कह रहे हैं बहुत छोटी बात है तंबाकू चाय छोड़ना कठिन है आप देख लो ना हम छोटी-छोटी आदतों में फस गए फिर इतने बड़े शरीर में फस गए और शरीर के भोगों में फंस गए अब इसको छोड़ना तुम
खिलवाड़ समझते हो क्या चाहे जितना उपदेश दे लो चाहे सुन लो जब शीसा से तिलक लगाओ तो लगता है ये हमारे माथे पर सही तिलक लगा है ना हमारे सीधे मैं का तदा आत्म भाव इसमें है और जब यह आ जाए कि शरीर अलग है अंदर का विषय और मैं इससे अलग हूं तब अलग खेल शुरू हो जाए अभी तो इसीलिए कहते हैं सिर्फ नाम जप करो सिर्फ नाम जप करो आगे का सब काम नाम संभालता चला जाएगा नाम जप के बिना कुछ नहीं होने वाला नाम जप के बिना कुछ भगवान का मधुर मधुर नाम जो प्रिय लगे जो गुरुदेव ने दिया हो वह नाम जप करो व सब प्रकाशित करता चला भगवान के भजन से लोक परलोक शास्त्र सबका ज्ञान हो जाता है बस भगवान में बुद्धि लगा दे अगर भगवान का भजन नहीं करोगे तो फिर य तर्क में नाना प्रकार के उसमें माया फसा सकती है अपने को चलने में ऐसे ऐसे संकट पड़े हैं ब लगा है कि अब रास्ता बंद वही भगवान का स्मरण किया तुरंत रास्ता खुला अंदर का तुरंत रास्ता अच्छा यहां से ऐसे ऐसे ये बहुत बहुत बड़ा मतलब बंधन है कोई छोटा नहीं गुरु स्वामी तुलसीदास जी कहते जड़ चेतन
ग्रंथि पड़ गई जदपि मसा छूटती कठिन बहुत कठिन है नहीं कठिन अब देखो प्यास लगेगी तो आप कहोगे कि प्राणों को प्यास लग रही मेरे को नहीं ये भूख प्यास प्राणों का धर्म है मेरा नहीं नहीं मुझे प्यास लगी है मैं देखना चाहता हूं मैं सुनना चाहता हूं ये तदा आत्म हटे ज्ञान के द्वारा तब पर ये सब छोड़ो नाम जप करो वो अपने आप आगे का रास्ता पुष्ट कर देंगे ऐसे संजय कुमार द्विवेदी जी प्रयागराज से राधे राधे राधा वल्लव श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव भगवान यह जीव केंद्र कारागार प्रयागराज में तैनात है लगभग एक वर्ष से आपका सत्संग सोशल मीडिया पर सुनता रहता हूं तथा राधा नाम का जप भी कर रहा हूं कारागार के अंदर जिज्ञासु कैदियों के साथ सत्संग करता हूं आपके सत्संग से प्रभावित होकर यह जीव आपकी शरण में आया गुरुदेव इसी जन्म में अपने आत्म स्वरूप का दर्शन करना चाहता हूं क्या यह संभव है जैसे अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण ने अपना स्वरूप दिखाया था जिससे उनका संपूर्ण संशय ही नष्ट हो गया था ठीक उसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण का स्वरूप
देखना चाहता हूं जिससे मेरे मन में किसी भी प्रकार का संच भगवान ने कहा है यज्ञ और तपा आदि के द्वारा मेरे इस स्वरूप का दर्शन नहीं हो सकता मेरी अनन्य भक्ति के द्वारा ही स्वरूप का दर्शन हो सकता है तो अनन्य बनने के लिए बहुत बड़ी मेहनत करनी पड़ती है जननी जनक बंधु सुत दारा तन धन धाम शहद परिवारा इन सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मन बांध बर डोरी एक मात्र श्री भगवान से अपनापन पत्नी पुत्र माता-पिता परिवार में भगवत भाव जैसे अभी मेरी मां है इस मान इस भाव से सेवा करते हैं आप भाव करो कि मेरे भगवान ही मां के रूप में है मेरे भगवान ही पत्नी के रूप में है मेरे भगवान ही पुत्र के रूप में क्योंकि सबके रूप में शरीर य पंच भौतिक है लेकिन अंतर में जो प्रकाशक तत्व व भगवान ही है जब यह भाव आ जाएगा शरीर से अन्य संबंधों से ममता समेटकर श्री भगवान में समर्पित हो जाएगी और एकमात्र भगवान के चिंतन करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करेंगे तो कुछ दुर्लभ नहीं है भगवान का विराट स्वरूप देखना चाहते हो यह है यह जो आप चराचर जगत देख रहे हो
ना यह भगवान के एक अंश में विराजमान गीता जी में भगवान कह रहे योमा सर्वत्र सर्वम चम पश्यति तस हम न प्रसम सचमन प्रणति जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मेरे में देखता है उससे मैं कभी दूर नहीं रहता वह कभी मुझसे दूर नहीं रहता मैं सदैव उसकी दृष्टि में रहता हूं मेरे भगवान इन सब शरीरों के अंतर्गत विराजमान है आप भी आप भी सब भगवान का आदर करते हैं कैसे करते हैं जब शरीर से भगवान अंतरध्यान हो जाते हैं तो आप शरीर का अनादर कर देते हैं जला देते हैं गाड़ देते हैं अभी जीवित में जो आदर करते हैं मेरा भाई मेरी पत्नी मेरा पुत्र वो भगवान का ही आदर करते हैं उसी भाई उसी पत्नी उसी पुत्र के शरीर से हमारे भगवान अंतरध्यान हो जाए तो आप पैसा देकर जला देते हैं भारी अनादर कर देते हैं उस शरीर का विध्वंस कर देते हैं उस शरीर को नष्ट कर देते हैं तो सम्मान भगवान का ही तो कर रहे हैं ना तो हम भगवान क्यों नहीं मान रहे सब में भगवान को देखें वही भगवान बैठे हुए हैं अपने स्वरूप को भूले हुए हम अपने को देह मान रहे ये अपने को देह मान
रहे यही अज्ञान है आज ब्रह्मा जी स्तुति में सत्संग में यही कह रहे थे कि प्रभु आप सबकी आत्मा है और भगवान भी गीता जी में कह रहे हैं मता पर तरम नानत किंच दस्त धनंजय मेरे सिवा किंचन मात्र और कोई नहीं तो आपको सही कहते हैं जड़ चैतन्य स्त्री पुरुष दुष्ट महात्मा यही भ का विराट स्वरूप है इस संसार में देख रहे हो ना कोई बहुत नीच स्वभाव का है कोई बहुत उच्च स्वभाव का है कोई दयालु है कोई क्रूर है तो विराट में रूप देखिए आप भगवान के जो चित्र की भावना में झका गए हैं सौम्य रूप घोर रूप शांत रूप अशांत रूप नहीं दिखाया गया यही है य चराचर जगत भगवान का विराट रूप है सब में भगवान है और सब भगवान में है भगवान के सिवा कोई नहीं यह वास्तविक ज्ञान हो जाना केवल पढ़ लेना प्रवचन कर लेना यह बात अलग है अब यह ज्ञान कैसे होगा जब हम निरंतर नाम जप करेंगे जैसे आप कह रहे एक साल से सत्संग सुन रहे हैं और नाम जप कर रहे हैं संतान में से स 9798 में एक संत भगवान वो सत्संग करते थे तो 9697 से तो मतलब हम कई जगह जाना आना शुरू किए और तमाम
सत्संग में तब से हम जाते हैं और हम कुछ ये पांच बातें जीवन में उतार लो सब ठीक हो जाएगा पहला स्वाध्याय ये जैसे पंच सकारण चूर्ण होता है ना व उधर बिगड़ जाए तो ठीक कर देता है ऐसे पांच सकार साधन है पहला स्वाध्याय जो शास्त्र आपको प्रिय लगे रामचरित मानस श्रीमद् भगवत गीता श्रीमद् भागवत जो भी पुराण जो भी साथ उसको अपना जीवन बना लो कि हमको दिन में एक बार आधा घंटा एक घंटा जो समय खुद स्वाध्याय करना है स्वाध्याय फिर सत्संग किसी ऐसे संत का सत्संग जिनसे हमारी भावना जुड़ गई है जिनकी बात पर हमें विश्वास होने लगा है तो सत्संग स्वाध्याय सत्संग और सुमिर जो आप बताए राधा नाम जैसे सुमिरन कर रहे हैं और फिर सेवा कैदियों की हम भगवान की सेवा कैदियों में करने की बात कह रहे हैं कैदियों की सेवा उस पर शासन करना है पर सेवा भावना करने की भगवान हीन सब रूपों में आए हैं तो सेवा आप अपने पद और अधिकार के अनुसार सेवा कीजिए आप अपने जो श्रेष्ठ जन है उन परे दोष दर्शन ना करके आप अपने पद और अधिकार के अनुसार जितनी आपके हाथ की पहुंच
है उतनी तक सेवा कीजिए भगवान उतने में संतुष्ट हो जाएंगे और सबसे बड़ी सेवा होती है जीव को दुर्गुण दुराचार से हटाकर सद्गुण सदाचार में लगाना जब हम किसी से मिले तो उसे ऐसी वार्ता करें कि उसकी दुर्बुद्धि सद्बुद्धि में परिवर्तित हो जाए यह सबसे बड़ी इसमें किसी का भी किसी का हस्ताक्षेप नहीं होगा इसमें होगा किसी का हस्ताक्षेप मुझे लगता है इसमें किसी का नहीं और यह सबसे बड़ी से कुपथ निवार सुपंथ चलावा क्योंकि वह सब अ कानून के विरुद्ध आचरण करने वाले वहां गए हैं तो उनको हम इतना प्यार दें उनको ऐसी सद्बुद्धि की बातें कहे जिससे वह जब छूटे तो एक अच्छे इंसान बनकर हमारे समाज में वह जीवन व्यतीत कर सके यदि वह जेल में ही है तो एक बहुत प्रसन्न चित होकर अपना जीवन व्यतीत कर सके क्योंकि आप सत्संगी हो तो हमारी पांच बातें आखिरी वाली को कहते समाधि तो समाधि तक तो योग की पहुंच होती है तो अपने उसे इस भाव में लेते कि हम 244 घंटे में एक दो घंटे ऐसे निकालते हैं जिनमें किसी से संभाषण नहीं करेंगे और कोई बात सोचेंगे नहीं सरल
भाषा में समाधि बता रहे हैं कोई बात सोचेंगे नहीं बस राधा नाम का चिंतन करेंगे इसका अभ्यास 15 मिनट 20 मिनट 30 मिनट एक घंटा आधा घंटा तो पांच ये जीवन में अगर आपकी दिनचर्या में हो जाए स्वाध्याय सत्संग सुमिरन सेवा और समाधि तो जो चाहोगे प्राप्त हो जाएगा इन पांच से अपने जीवन को भरपूर कर लीजिए सच्ची मानिए सब में प्रभु बैठे हैं सच्ची मानिए सब में प्रभु बैठे हैं गुरुदेव अगर कोई अपने अ को कहे कि वो भगवत प्राप्ति इंसान है और और जैसे हम उनसे बात करते हैं तो काफी अच्छा लगता है लेकिन जब घर जाते हैं तो बहुत ही उदासी सी छा जाती है डिप्रेशन डिप्रेशन घबराहट पहली बात तो कोई भी भगवत प्राप्त अपने को यह नहीं कह सकता कि मैं भगवत प्राप्त हूं पहली बात ये है कि वो भगवत प्राप्त नहीं है तुम जेब में रुपया डाले हो बोल सकती हो सभा में हिम्मत नहीं है क्यों लुट जाओगे लुट जाओगे आप अगर थोड़ी भी रकम डाले हो तो सत्संग जरूर सुनोगे लेकिन रकम में यात रहेगी नहीं यहां भगवत प्राप्त कैसे बोले हैं सामने राम जी बैठे हैं सबरी क्या कह
रही अधम ते अधम अधम अति नारी तीन माह में मति मंद ार हनुमान जी भगवत प्राप्त क्या बोल रहे असम अधम सखा सुन मोह पर रघुवीर अहंकारी भगवत प्राप्त होता है मैं भगवत प्राप्त ह अहंकार है और उसको भगवत प्राप्ति किसी ने पूछा किसी भगवत प्राप्त महात्मा से आपको भगवान मिल गए सच्ची बता रहा आपको भगवान मिल गए नका एक दोहा सुना देते हैं बस समझ लीजिए जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाही प्रेम गली अति साकरी ता में दो न समाई व अनंत है इसलिए हां नहीं बोल सकते वह अनंत है
इसलिए हां नहीं बोल सकते और उसके बिना हम जी नहीं सकते इसलिए हम ना नहीं बोल सकते अब तुम्हारी समझ हो तो पकड़ लो ना समझ हो तो ना पकड़ लो जैसे आप बोले ना ऐसे कई बोली बिल्कुल नौटंकी नाटक में मत फसना भगवत प्राप्त में सबसे पहले लक्षण होते हैं काम क्रोध मद मान न मोहा लोभ न छोभ राग नहीं द्रोह भगवत प्राप्ति का मतलब समझते हो श्री सुखदेव जी को भगवत प्राप्ति जब हुई तोब ये प्रमाणित कैसे करें कि भगवत प्राप्ति हो रही यही भगवत प्राप्ति क्योंकि जो भगवत प्राप्त प्रमाण दे ना तब तो भगवत प्राप्ति हुई अब वो जनक जी के पास श्री व्यास देव जी ने भेजा सुखदेव जी को तो सात दिन यह देखो भगवत प्राप्ति की परीक्षा हो रही कि आपको भगवत प्राप्त है कि नहीं सात दिन दरवाजे पर खड़े रखा और रोज पूछते उनके आकृति में कोई परिवर्तन पहली बार कहा जनक जी से मिलना और सात दिन सात रात वैसे ही खड़े रहे नंग धड़ंग 16 वर्ष की अवस्था ना कोई पूछताछ ना पानी ना भोजन ना कुछ पर रोश नहीं आया फिर कहा महलों में ले जाओ और नई नई जवान सेविकाओं के द्वारा
रात दिन सेवा करवाओ रात दिन नौ युवतियां हंसी खेल खवाना पियाना पूछते भूले जैसे गेट के बाहर थे वैसे भी है थाल सजाई आरती की और आए आरती के कहा परमहंस शिरोमणि आपको वो प्राप्त है जिसके प्राप्त होने के बाद कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं रहता है ऐसा कोई अपने आप कहेगा मैं भगवत प्राप्त हूं काहे को मजाक कर आज ड्रामा चल रहा नोटंकी चल रही है भगवत प्राप्त से पूछो तो हाथ जोड़कर ये कहेगा हमारे जैसे अधम पर भगवान की कृपा है उनके नाम से जी रहे भगवत प्राप्ति क्या तो नीच है सीधे भगवत प्राप्त महापुरुषों के यही वचन निकले क् हम तुच्छ परम मधमाशी कर उनमें भगवत भाव करो उनकी बातें मत सुनो नाम पर ध्यान दो भगवान का नाम ध्यान में रखो और श में भगवत भावना करो ना किसी की निंदा करो ना किसी का संग करो बहुत संभालकर अपने आप को रखो भजन मार्ग में चरित्र पवित्र हो तभी भगवत प्राप्ति के योग हो चरित्र भ्रष्ट ना आदमी ना पु स्त्री कोई चरित्र भ्रष्ट भगवान को नहीं पा सकता अलक चरित्र भ्रष्ट रहा लेकिन अबलो नसानी अनान सयो तो प्राप्त कर लेगा
लेकिन चरित्र भ्रष्ट भगवान को नहीं प्राप्त कर सकता बहुत सावधान रहना कलयुग है भक्ति का एक दिखावा करके बड़ा दम और पाखंड के नौटंकी नाटक चल रहे हैं दूर से सत्संग सुनो दूर से सत्संग सुना उनकी बात पकड़ी निकल ग भजन किया चुपचाप अपने घर में बैठ के फिर महीना दो महीना में कभी सत्संग सुना चुपचाप निकल गई आजकल मोबाइल का जमाना जो सत्संग पसंद आवे सुनो एकांत में बैठकर भजन करो जो नौकरी जो पेशा जो भी कर रहे हो अपनी ड्यूटी ईमानदारी से करो वही पूजा है भगवान का स्मरण खास भजन है भगवान की स्मृति पूरी गीता सुनने के बाद अर्जुन जी को क्या मिला नष्ट मोहा स्मृति लब्दा त प्रसादा में चता भगवत स्मृति स्वरूप स्मृति स्मृति प्राप्त होना ही सबसे बड़ी बात है जी मज आप डॉक्टर हैं इधर ब्रजमंडल में निशुल्क सेवा करते हैं गौ सेवा और संतों की सेवा जी जैसे आप गौ सेवा कर रहे हैं तो बस आपको यह ध्यान रखना कि हमें किसी प्रलोभन में नहीं फसना है हमें गाय से सेवा का मतलब होता है सेवक सुख चाहे तो व सेवा सेवा दे हम सेव्य को सुख देना चाहते
हैं उसे सेवा कर बिना दूध वाली गाय है बछड़ा है सण है अंग भंग है हम ऐसे भी पशुओं की सेवा करें और जो अर्थ हमें गौ सेवा के निमित्त से मिले उसे कभी अपने पानी पीने में भी ना लगाए यह सावधानी रखोगे ना तो गौ सेवा से ही भगवत प्राप्ति हो जाएगी हमारे भगवान स्वयं गौ सेवक बनके प्रात काल से सायम तक बछड़े और गौओं को चराते रहे और जो गौओं पर प्रहार करने की कोशिश की या ब सखा हों पर भगवान ने मार्ग फेंक दिया चाहे अघासुर हो चाहे बकासुर हो चाहे वो तणाव तो कोई भी हो तो गौ सुरक्षा वो गौ शब्द से हमारा प्यार होना चाहिए उसके दुग्ध से प्रॉफिट से ये मेहनत करके और जगह से कमा लो डॉक्टरी से कमा लो या जैसे बले पर गौ सेवा का अर्थ अगर 00 आया है तो 99 नहीं 100 ही लगनी चाहिए अगर ये सावधानी रखोगे तो यही भगवत प्राप्ति करा देगा क्योंकि गौ सेवा समर्थ है भगवान से मिलाने में भगवान ने स्वयं सेवा की है और गौ को एक कामधेनु भी कहा गया है कामधेनु माने कामना की पूर्ति करने वाला आप जैसे 100 गाय रख लिए तो ऐसा नहीं हो सकता यदि आप श्रद्धावन
और विश्वास वाले हैं और आप बेईमानी नहीं करते तो 100 गांव की व्यवस्था आती चली जाएगी अपने आप आती चली जाएगी जैसे नदियां बिना चाहे समुद्र के पास जा रहे हैं ऐसे ही धर्मात्मा पुरुष के पास बिना चाहे संपत्ति आने लगती है आप जितनी सेवा का विस्तार करेंगे उतने भगवान आपको संपत्ति व्यवस्था करते चले जाते हैं जब यदि हम उसका दुरुपयोग कर ने लगते हैं फिर बात अलग होने लगती है सदुपयोग हो यह पक्की बात है आप 10 आदमियों को भोजन पवा इए तो बीच की व्यवस्था होती रहेगी देख लीजिए 20 को पवा तो 40 की व्यवस्था होती ही रहेगी तो आप धर्म पूर्वक चलिए नाम जप कीजिए यही मनुष्य जीवन का लाभ चार दिन का जीवन है किसी को हम सुख दे पावे है नहीं हम किसी को सुख दे पावे यह रहस्य है परहित सरिस धर्म नहीं भाई खुली बात है इससे बड़ा कोई धर्म नहीं चाहे का हित हो किसी मनुष्य का हित हो पक्षी का हित हो लेकिन किसी का अगर हित कर लिए तो हमारा मानव जीवन लेना सार्थक हो गया हमारे मानव जीवन की यही प्रधानता है दूसरों को सुख देना जी राधे राधे महाराज जी
महाराज जी पिछले दो तीन वर्षों से लोगों से धोखा मिला और भरोसा उठ गया यह मुझे जन्मों से मिलता चला रहा है समझ नहीं पा रहे जन्मों से मिलता चला रहा है लोगों से क्या अपना मन धोखा दे रहा है इंद्रिया धोखा दे रही देख पा रहे हो इतना समय नष्ट होता चला जा रहा है और मन इंद्रियों की गुलामी से हम मनमानी आचरण इंद्रियों के विषय भोगों में हम ठगे जा रहे हैं हम देख पा रहे हैं बाहर के दो-चार व्यक्तियों को देखा तुमने घर के सदस्यों को देखा या कार्य करते हुए ऑफिस के मित्रों को देखा लेकिन अपने मन को देखा वो आपके साथ इतना धोखा कर रहा है कि जन्म के जन्म नष्ट करता जा रहा है और उस धोखेबाज को अपना मित्र मान के आज मेरे मन में यह है यह खाऊंगा यह देखूंगा यह सुनूंगा ये पिऊंगा बस पांच इंद्रियों के साथ मन मानी आचरण करा के हमको भगवान से विमुख कर दिया सच्चिदानंद तत्व से रहित कर रहा है तो हम अपने पहले धोखेबाज को देखें इसको सुधार लो सब सुधर जाएगा बाहर कुछ सुधारना नहीं अंदर सुधारना है आध्यात्म की बात अगर सुनने आए हो आध्यात्म
की बात है बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय जो दिल खोजो आपनो तो मोसे बुरा ना हो ये हमको सुधारना है हमको सुधारना है तेरे भावे जो करे भरो बुलो संसार नारायण तू बैठ के अपनो भवन भ आपको ऐसा लगता है मैं सबके साथ अच्छा व्यवहार करती हूं सब हमारे साथ बुरा व्यवहार करते हैं आपको ऐसा मान लो लग सकता है ऐसा कि मैं अच्छा करती हूं तो सबसे बुरी बात है कि आपको अच्छाई का अभिमान है और आप उससे जिसके साथ करते हो वह स्वार्थ बुद्धि रखती हो कि व आपको नमन करे आपके अनुकूल चले यह अध्यात्म की बुराई है अध्यात्म क्या कहता है दूसरे को सुख दिया और नेकी कर दरिया में डाल वो हमको धन्यवाद बोले ऐसी आकांक्षा नहीं मैं ने अपने कर्तव्य का पालन किया तेरा स्वभाव तेरी बुद्धि तू जैसा बोले मुझे उससे कोई मतलब नहीं ऐसे चला जाता है अध्यात्म में कोई दुख नहीं दे सकता आपका स्वभाव आप मुझे गाली देते हो मेरा स्वभाव मैं आपको प्रणाम करता हूं आपकी अनुकूलता करूंगा क्योंकि मैं अध्यात्म का पथिक हूं आप संसार के दुष्ट प्राणी स्वभाव वाले हैं तो
आप अपना स्वभाव सांप क्या करेगा अगर वो नमस्कार भी करेगा प्यार भी करेगा तो फनाई मारेगा उसके पास कोई और है नहीं दुष्ट स्वभाव का आदमी अगर बोलेगा तो गाली बोलेगा प्रतिकूल बोलेगा वो जो भी करेगा अपनी दुष्टता के अनुसार करेगा हमको विवेक प्रधान रखना है हमको सावधान रहना है बच्चा यहां सब रूपों में भगवान है यह बात कहां हम जान पा रहे हैं यह दुष्ट है यह स्त्री है यह पुरुष है यह नीच है क्यों हमारे अंदर वही चल रहा है जो चल रहा जो वृत्ति है वही दिखाई देगी जब राम की
वृत्ति होती तो सारा जगत राम में दिखाई देता सीय राम में सब जग जानी और काम की वृत्ति होती तो सब कामी नजर आते हैं दुष्ट वृत्ति होती तो दुष्ट नजर आते हैं हमारी जैसी वृत्ति वैसा हमें बाहर दृश्य दिखाई देता है अब अगर अध्यात्म की बात सुनना चाहो तो मन और इंद्रियों को संभालो किसी से थैंक यू की इच्छा मत रखो और दूसरों का मंगल करो तो तुम्हारा मंगल होगा भगवान तुम्हें आनंद प्रदान करेंगे अपनी गलतियों की जांच करो रोज शाम के बैठ के सुबह से शाम तक मेरे द्वारा कौन सी गलती हुई कौन सा धर्म विरुद्ध आचरण हुआ अभी कुछ दिन में आप देखो ना कि आनंद आने लगेगा हम अपनी गलतियों को बिल्कुल छुपा लेते हैं दूसरे की छोटी गलती को सभा में बड़ी करके बताना चाहते हैं लेकिन अपनी बड़ी गलती को बिल्कुल नॉर्मल मान के उसे शांत कर देते हैं हमको चाहिए दूसरे की बड़ी से बड़ी गलती को नॉर्मल करके छोड़ दें अपनी छोटी सी गलती को बिल्कुल नॉर्मल ना करें उसे बड़ी करके नष्ट कर दें तो हम निर्दोष हो जाएंगे जब हम निर्दोष हो जाएंगे हमारी दृष्टि में सब
मंगलमय हो जाएगा हमारा अध्यात्म का अब अगर आप व्यवहार की बात करना चाहते हैं तो बोलिए महाराज जी जैसे आपने बोला कि बाहर से धोखा मिला बट अभी कह रहे हैं कि जैसे बाहर से धोखा मिला तो ईश्वर के करीब चले गए कि आस्तिक बड़ बहुत सुंदर बहुत सुंदर उसके बाद फिर प्रेम की भावना सिर्फ ईश्वर से ही हो रही है बट अभी असमंजस में है कि आगे विवाह आदि के लिए अभी जाए या पता कि सारा संसार जब ईश्वर के नजदीक पहुंच रहे तो छोड़ दो ना उनके ऊपर उनको दूल्हा दिलाना होगा अनुकूल दूल्हा बनकर आ जाएंगे वो अपने को क्या चिंता करनी है ऐसे रह जाओ आगे जो होना वो सब हो जाएगा आप चिंता क्यों करो आप तो चिंतन करो अनन्य चिंत तो माम ये जना परिपास तेशाम नित्या भ युक्ता नाम योगक्षेम वामम भगवान कह रहे योगक्षेम में वान करूंगा चिंता क्यों करते हो तुम चिंतन करो भगवान वैसे ऐसा थोड़ी है ऐसे ऐसे लोग हैं जो तुमसे 100 गुना अच्छे मिल जाएंगे तुम सोचते हो कि जैसे हम अच्छे हैं तो आपसे 100 गुना अच्छे ऐसे पुरुष मिल जाएंगे कि आप जिंदगी भर भगवान से कहोगे
कि प्रभु आपने बड़ी कृपा की जो मुझे ऐसा जीवन साथी मिला दिया आप प्रभु के ऊपर छोड़ दीजिए मर जी इसकी भी चिंता नहीं करनी चाहिए आगे कहां जाना है बिल्कुल बिल्कुल अगर भगवान का भक्त है तो चिंतन करना चाहिए चिंता नहीं अपने आप वो व्यवस्था कर देंगे सारी व्यवस्था व अपने आप कर देंगे बिल्कुल विश्वास करो यह हमने ऐसे चटपट देखा है पूरे जीवन की हम एक एक घटना की बात बता सकते हैं यदि ऐसे हो तो हर जगह भगवान तुम्हारे सामने हमने भगवान का चमत्कार देखा है हर कदम कदम पर उनका दुलार देखा है अपने को समर्पित कर दो फिर देखो प्रतिकूलता जितनी नहीं होगी जैसे इस बच्ची ने कहा मैं प्रभु के नजदीक पहुंच रहे हूं आज सत्संग में था भगवान प्रतिकूलता जब देते हैं गुरुदेव प्रतिकूलता देते हैं या समाज प्रतिकूलता देती है तो भक्त और खसक कर भगवान के समीप पहुंच जाता है ये ऊंचाई पर चढ़ाने के लिए यह पतन के लिए नहीं होता इसलिए बहुत सावधान होकर चले अपनी कोई चिंता नहीं करनी आगे से आगे भगवान व्यवस्था करते हैं विश्वास करके तो देखो सब काम बन जाते
सब काम बिल्कुल आपसे कह रहे सत्य मानिए वो तिनके को ब्रह्मा बना दे ब्रह्मा को तिनका बना दे ऐसे खिलाड़ी है मसक करे रंज आज मसक ते हीन ब्रह्मा को मच्छर बना दे मच्छर को ब्रह्मा बना दे ये उनके वही मु कम करोति वाचाल पंगम लंगते गिरिम यत कृपा तम हम बंदे परमानंद माधव बैठ गए आके हृदय में तो सब बात जागृत हो गई नहीं हमसे लगभग 20 वर्ष या 22 वर्ष पहले की बात कह रहे हैं एक आश्रम में तो संगोष्ठी थी संतों की तो स्वरूप तो हमारा शुरू से ही ऐसे ही तो और डाउन हो गया तो
स्वरूप मतलब ब्रह्मचारी रहे तो जटा जूट से तो उनका स्वामी जी आप भी कुछ बोलिए लाल वस्त्र में थे तो कहा हमें तो कुछ आता नहीं बोले नहीं अपनी जिंदगी का कुछ भी आप अनुभव संत है आप बोलिए पहली बात तो एक मतलब एक होती ना झक तो जाकर बैठे और बस थोड़ी देर नाम कीर्तन किया हमका अपनी वाणी को विश्राम देते उतर के चले आए बोलने की हिम्मत नहीं बोलने का ज्ञान नहीं जो सीधे राम नहीं कह सकते थे ना मरा मरा व रामायण रचनी उस प्रभु का चमत्कार देखो वह रामायण भगवान के जन्म लेने के पहले रच द संस्कृत में यह है मोकम करोति वाचाल पंगम लंगते आज प्रश्न नहीं पूरा होता उत्तर पूरा शुरू हो जाता है और जहा यह हालत हमारी कि हम कक्षा नौ पढ़े हैं ना कोई हम व्याकरण आचार्य हैं ना हम कहीं किसी जगह सत्संग का प्रोग्राम अटेंड कि भाई ऐसे ऐसे बोला जाता है कुछ नहीं ब भगवान की शरण में है वही बैठ गए तो वेद उनकी स्वांसों से निकले भगवान की शरणागति और भगवान का यह नहीं सोचना कि अब कौन मिलेगा कैसे नहीं नहीं नहीं आप बिल्कुल भरोसे पर हो जाओ पर भरोसा
अडिग हो बस बात बल गई आप देख लेना गले तक तलवार आते आते हार बन जाएगी व काट नहीं पाएगी आप विश्वास कर लो हमने जीवन में हजारों बार देखा है ब भगवान का भरोसा हो अगर भक्त कहीं डाउन होता है तो किन हो इस क ब अभिमाना सुख हो अंचा कृपा निदाना कहीं अभिमान हो गया अब भगवान उसे नीचा गिराना चाहते हैं इसलिए बहन आप निश्चिंत रहिए भगवत भरोसे में रहिए और अगर भगवान संयोग मिलाएंगे तो बढ़िया मिलाएंगे उनका सहयोग कराया हुआ कभी अमंगल नहीं होता है जी जी जो है एक संत के पास में गया था जी तो मैंने सेसे नाम का जप करते हैं तो उन्होंने कहा मतलब हम जब उनसे कुछ पूछे तो उन्होंने कहा कि जैसे कि तुम रोटी रोटी रोटी रोटी कर रहे हो क्या रोटी का स्वाद जानते हो तुम तो रोटी और भगवान के नाम में नहीं नहीं उन्होने नहीं ये अवहेलना है नाम की और हम उनकी बात का खंडन करते हैं कह कहां लगी नाम बड़ा राम न सक ही नाम गुण गाई नाम सच्चिदानंद रूटी प्राकृतिक पांच भौतिक मल मूत्र बनाने वाले भांड का पोषण है और नाम सच्चिदानंद कैसा है जो नाम की हेलना
कर रहा है इसीलिए तो कहते पाखंड घुसा हुआ बैठा है केवल पाखंड और दंभ के द्वारा हम अपनी वासनाओं का पोषण करते हैं जो नाम के महत्व को नहीं जानता रूप के महत्व को अरे सुमर पवन सुत पावन नाम अपने बस आखे नाम समझते हो दोनों किडनी फेल है केवल राधा नाम के माने ताल ठोक रहे हैं इसको खिलवाड़ ना समझा जाए बस हमको इस बात से बहुत ही है कि ऐसे पाखंड से बचो ऐसे दम भियो से बचो जो भगवान के नाम की भगवान के श्री विग्रह की भगवान की रूप लीला की अवहेलना करते हैं कुछ नहीं अरे भगवान वेदव्यास जी कहते हैं कृत युगे ध्यायतो विष्णु त्रेता याम यजत मख द्वापर परिचर्या याम कलत धरि कीर्तना श्रीमद् भागवत में कई जगह लिखा हुआ है अहो ब पतो गरिया य जिव्या वर्तते नाम तुभयम जिव्या के अग्र भाग पर राम राम राम कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरि गोस्वामी जी क्या कह रहे हैं राम नाम मणि दीप धर जीह देहरी द्वार तुलसी भीतर बाहर जो चाह से उजियार कलयुग के केवल नाम अधारा सुमरी सुमरी नर उतर ही पारा ये छाती की बात कहते हैं कोई आके बात करे छाती की बात कहते इसी
नाम के बल से हर प्रश्न का उत्तर है इसी के नाम केवल से दोनों किडनी फेल है और सुधार रहा हूं नाम के प्रताप से चल रहा है ये तो बहुत छोटी बात है नाम के प्रताप से अजत भगवान को जीत लिया जाता है य भगवान के नाम की महिमा की अलना करते हैं रो रोटी कहने से पेट भर जाएगा राम राम कहने से ऐसा पेट भरेगा कि जन्म में जन्म जन्म की जो पेट में जाने का अभ्यास वो बंद हो जाएगा नाम लेत भव सिंधु सुखाई करहु विचार सुजन मन माही भगवान ने अवतार लेकर कुछ को तारा राम का नाम कृष्ण का नाम राधा का नाम लाखों को तार दिया तारता रहेगा हम केवल छाती की बात कहते जबान की बात नहीं कहते कहते ऐसे नहीं पाखंड और दंब का नाटक कर एक तो वैसे कलयुगी प्राणी भगवान के नाम रूप लीला धाम की अलना कर रहे और दूसरे भेष बना लिए और पाखंड करके रुपया कमा रहे हैं तो नाम की हेलना कर रहे हैं हनुमान जी जैसा कोई ज्ञानी महात्मा है लेकिन राम राम राम राम राम यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनम तत्र तत्र कृत मुस्त कालम वास्प वारी परिपूर्ण लोचन आंसू बते हुए सुनते शंकर जी जैसा
कोई ज्ञानी है अस जपन लगे हरि नामा सती गई जहां प्रभु सुख धामा नाम जप कर रहे हैं विभीषण जी भगवान के महान भक्तों में राम राम तेही सुमिरन कीना हृदय हरस कप सज्जन चीना य सन हट करी हो पहचानी साधते होए न कारज हानी अरे भगवान के नाम शवास शवास में नाम जपे दुविधा कोई भगवत प्राप्ति जितने सिद्ध हुए आज तक नाम से हुए भगवान का स्मरण भगवान का नाम जब यार हमारा तो जीवन नाम जब नाम के प्रति जब कोई कहता है कि वैसे ही कलयुग का पाखंड इतना बढ़ता चला जा रहा है कि व छू छापे
जंतुर मतु पर राख पर इस पर विश्वास है हमारा जो शास्त्र कह रहा उसके अनुसार चलना बड़ा कठिन हो रहा है अब जो दो चार सुन के भी चलना चाहते तो ऐसे पाखंड हों के चक्कर में फस जाते हैं कि वो भी चला जाता है आप गए और और जो क सत मार्ग प्रतिपाल जो सत मार्ग में चलना चाहते हैं अब जैसे अभी नई श्रद्धा है बोले रोटी रोटी कहने से तुम्हारा पेट भर जाएगा अब क्या करें अब रास्ता क्या रहेगा जो शुरू किया था वह भी बंद हो गया उनसे बोलो क्या करोगे उनसे बोलो क्या करें कैसे करें क्या उपाय है सदैव सदैव के लिए जगह जगह शास्त्रों में पढ़कर हम तुम्हें बोल रहे हो अनुभव करके बोल रहे हो चल के बोल रहे हैं केवल पढ़ी बात नहीं बोल रहे पूरी जवानी नाम के सहारे काठी है आज भी हमारा जो जीवन है भगवत आश्रित है नाम के ही बल पर है किसी का सपोर्ट नहीं हमारे और कोई साधना नहीं है एक ही मात्र नाम नाम नाम इसीलिए हमें एकदम जैसे नहीं कोई दुखती जगह पर अंगुरी रख दे हमारा सबसे कमजोर जगह हृदय में है नाम नाम नाम से ही आज तक कोई कहे आ ब्रह्म स्तंभ पर्यंत
सर्वम माया मय जगत सत्यम सत्यम पुनः सत्यम हरेर नाम यु केवलम हरेर नाम यु केवलम ये कैसे मतलब क्या पढ़े हैं क्या लिखे हैं क्या समझ रहे हैं क्या अनुभव किया है बैलेंस बना के चल रहे जब काम का भोग आया तो भोग भोग लिए जब रसेंद्र का भोग आया तो भोग भोग लिए खूब रुपया है पैसा है तुम व्यास से बढ़कर हो वशिष्ठ से बढ़कर हो इन महापुरुषों से बढ़ कर हो काछवा मन निश्चल लाख है धन धन जननी तेरी रे जो लंगोटी का पक्का जबान का पक्का मन का पक्का वो बोले हम बात सुन लेंगे सब कोई बिरला ऐसा नहीं कोई धर्म की आड़ लेकर के कोई ग्रंथों की आड़ ले लेकर कोई भगवान की आड़ लेकर वासनाओं की पूर्ति होती है उपासना के मार्ग में चलना बहुत कठिन बात होता है और जब उपासना में चला जाता है तब बात समझ में आती है ये सब पाखंड का बोलबाला है जो भगवान के नाम की रूप की लीला की धाम की अवहेलना करें भगवान शिव नाम जपते हैं भगवान शिव लीला का गायन करते हैं सनक सनन सनातन सनत कुमार से बढ़कर कोई ज्ञानी कोई योगी है सदैव अवस्था बढ़ने नहीं देते पाच वर्ष के और
हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम रटते रहते तो ये ऐसे लोगों की बात ना सुननी उठकर खड़े होकर चल देना चाहिए सभा से जहां भगवान की अवहेलना हो रही भगवान के नाम की रूप की लीला की धाम की यह आज का समय ऐसा अरे मूर्ति पूजा किसकी पूजा कर रहे हो तुम बिना मूर्ति पूजा के तुम्हें अगर निराकार का ज्ञान हो जा तो मुझे बताओ गुरु मूर्त होता है या मूर्त निराकार होता है मैं बताओ गुरु निराकार होता है कि साकार होता है साकार होता है दिखाई देता है ना तो प्रवचन साकार है या निराकार से निकल रहे हैं साकार से निकल रहे पैर निराकार के छ साकार के छू रहे हो तभी तुम निराकार का अनुभव कर पाओगे जब साकार की आराधना करोगे ये हम चाहे मूर्ति मान के करें चाहे तुम्हें मान के करें चाहे गुरु मान के करें चाहे जहां करें हम मूर्ति की पूजा करते हैं मूर्त में स्थित हो जाते हैं सर्वम लमदम ब्रह्म या मूर्त रूप है ये कौन सा ज्ञान भक्त को नहीं रहता य अनम यज्ञ गणी हनुमान जी परम भक्त दासत को प्राप्त है ये जो बहुत प्रपंच है यह संसार का स्वरूप आ रहा है जो
कलयुग आ रहा है वो यही हमारे बृज मंडल के हर संत 2 बजे रात्रि से बैठ गए और 12 ब एक बजे तक केवल नाम जप उसका प्रभाव छाया है नाम जप से श्यामा श्याम मिलते हैं बड़े-बड़े सिद्ध रसिक ने कहा हित ध्रुव जी ध्रुव दस जी हमारे बहुत बड़े रसिक संत हुए वो कह रहे हैं जो चाहत है नित्य सुख अरु मन को विश्राम हित ध्रु हित सो भजते रहो पल पल श्यामा श्याम गोस्वामी जी कह रहे बारी मथे घृत होए बरु सिकता ते बरु तेल बिनु हरि भजन भव तरी यह सिद्धांत पता नहीं कौन से ज्ञानी आ गए संसार में जिधर देखो पाखंड का बोल भाला का हिमवंत मुनीष सुन जो कुछ लिखा लिलार दुख जो मिला है ना सुख जो भाग्य में लिखा है ना हां कोई मेंटने वाला पैदा नहीं हुआ का हिमवंत मुनीश सुन जो कछ लिखा लिलार देव धनुजा की निंदा हम बिल्कुल नहीं स सकते हम भगवान से भी बढ़कर भगवान के नाम को मानते हैं और उसी पर जीवित हैं उसी से हम दहाड़ रहे हैं उसी के बल हम हैं हम केवल ऐसे केवल खाई हुई बात कर रहे हैं केवल प्रवचन की बात नहीं कर रहे यह और तुम्हें आंखें हो तो खोलकर देख
लो लाखों लोगों का परिवर्तन हो रहा है केवल राधा नाम कोई जादू टोना जंतुर मतु राख कुछ नहीं धज्जिया उड़ा दिए किसी भी तरह के नौटंकी नाटक नहीं भगवान के नाम की महिमा की अवहेलना साधु हो के तो है कौन वो अरे काल नेम भी नौटंकी नाटक कर रहा साधु का तो भी श्री राम जय राम जय जय राम कर रहा तुम तो काल नेम से भी गिरे हुए हो जो भगवान के नाम की अवहेलना करते हो धाम की अवहेलना करते हो राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा
राधा राधा राधा रा
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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