॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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गुरु से मिला नाम या मंत्र के जप और स्वयं से जप करने में क्या अंतर है ?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

पहला जब तक गुरुदेव ना मिले तब तक भगवान का कोई नाम चयन करो जपते हो नाम जो नाम जपते हो उसे निरंतरता में लाओ बताने की ज पर यह बिना गुरु के काम नहीं करेगा ये जो द्वादशा अक्षर मंत्र है पंचाक्षर मंत्र है अष्टदशा आक्ष मंत्र है यह गुरु प्रदत होने चाहिए आप हमारी बात मानना हम आपके मित्रवत प्रार्थना कर रहे हैं तो ऐसे गुरु का चयन करो और अभी नाम जप करो जैसे वासुदेव का ही मंत्र है तो कृष्ण कृष्ण कृष्ण या राधा कृष्ण जो आपको प्रिय लगे नाम जप करो अभी मंत्र नहीं जब गुरुदेव मिले तब मंत्र जप करो तो सही अनुभूति होनी शुरू हो जाएगी हमें तो सबसे यही कहना कि बिना गुरु कृपा के भव बंधन से मुक्त होना असंभव असंभव य मतलब अपने जी जी वन की बात कह रहा हूं जहां ऐसे पहाड़ आए हैं कि जिनको मैं हटा नहीं सकता और जब गुरु चरणों में बैठकर रोया गया तो फू ऐसे उड़ गए गुरु प्रसाद से हा मोक्ष मूलम गुरु कृपा मोक्ष मूलम गुरु तो सब प्रश्नों का उत्तर पहला एक है कि गुरुदेव का वर्ण करो जब तक गुरुदेव नहीं मिलते निरंतर नाम जप करो और

शास्त्रों का स्वाध्याय करो गीता है भागवत है है योग वा शिष्ट है पढ़ो उनको शास्त्रों को पढ़ो तो उससे बुद्धि का मार्जन होगा पवित्र बुद्धि गुरुदेव के वचनों को ग्रहण करने में समर्थ होते हैं ठीक है मराज जी आपने बोला कि गुरु प्रदत जैसे इन्होंने जो मंत्र बोला तो वो उसमें क्या फर्क है जैसे इन्होंने पढ़ लिया उससे जप रहे हैं और गुरु प्रदत्त जपने अनुभूति नहीं होगा प्रकाश नहीं होगा उसका प्रकाश नहीं होगा उसका प्रकाश नहीं होगा जो मंत्र का प्रकाश नहीं हो सकता इसीलिए भगवान भी संदीपनी जी को गुरु माना ना राम जी के भी कुल गुरु वशिष्ठ जी थे और शिक्षा दीक्षा के गुरु विश्वामित्र जी बने ना जाके स्वास वेद सुति चारी उनको गुरु बनाने की जरूरत है भगवान को गुरु बनाने की जरूरत है बनाया ना हर विषय का गुरु बनाया फिर हमें मनुष्य हैना मर्यादा है अनुभव ही नहीं होगा आप देखो गीता जी भगवान ऐसे शुरू कर दिए जब अर्जुन जी नित्य सखा है भगवान के खूब हंसी मजाक होती खूब घर के हैं वैसे भी बुआ के लड़का है और वैसे भी मित्र है और वैसे

भी नर नारायण के अवतार है है नहीं गीता जी कब शुरू की जब शिष्य तेह साधि माम प्रपन्नतिहरे मूल चित्त वाला कायरता रूपी दोष से युक्त हो गया हूं क्या मेरा कल्याण है किसमें यह मैं निश्चित नहीं कर पा रहा हूं आप निश्चित करो मैं आपका शिष्य हूं आपकी शरण में हूं यहां से गीता जी प्रारंभ होते है महाराज जी आप जैसे कह रहे हैं वो तो परम सत्य बात ही है हम उसको तत्काल ग्रहण करें तो उसमें कल्याण निश्चित है बट महाराज जी इसमें कहीं ना कहीं अधीनता भी एक बहुत समझ आ रही है कि वो अहम जो प्रकाशित होने वाला जो बाधक तत्व है अहम वो केवल और केवल गुरु कृपा से ही नष्ट होगा हां नहीं इसमें गुरु वाक्यम भी है मंत्र मूलम गुरु वाक्यम आप समझो हमारा शास्त्र जो कह रहा है जैसे आप ऐसे राम राम जप रहे हो और जब गुरु के मुख से निकला कि राम कहो आप देख लेना अगर यही मंत्र गुरु से मिले फिर आप जपना तब आप हमको बताना कि फर्क क्या था आप देखना गुरु कृपा ही मतलब आप जहां बैठे हो यहां सब गुरु प्रसाद ही है गुरु कृपा ही है तो हम तो पूरा का पूरा

गुरु कृपा से बचपन से लेकर अभी तक तो हमारे तो जीवन में गुरु कृपा है आप आप सब संत जन बता सकते हो कि बिना गुरु कृपा के कुछ है तो मुझे तो ऐसा लगता है कि गुरु की शरण लेना अब जैसे यह बता दे कोई कि आप किसी ब्रह्म ज्ञानी महापुरुष को अव्यक्त को गुरु मान लो तो देखो हमको ऐसा गुरु चाहिए जो हमें दुलार भी दे हमें डांट भी सके अब बिल्कुल बिल्कुल आप सही हो वो ऊपर से डाट सभा में लगाए आप ऐसे बैठे जय जय जय जय आज तो अपार कृपा हमारे ऊपर तो अहंकार गलित हो गया हमने तो कोई गलती नहीं की हमने तो अपनी अप अनुभूतियां बतानी चाहिए वो अभी बकाया पूरा कारा बया तो कभी कभी प्रगट में गुरुजल ऐसी प्रतिकूलता रूपी औषधि मारते कि छार छार अहंकार हो जाए वो गुरु सेही होगा बस मंत्र मूलम गुरु वाक्यम वो क्या कह रहे हैं बस हमें चुपचाप प्रश्न नहीं करना गुरु के वचन जैसे निकले वैसे वैसे अगर वो कह दि ना खड़े रहो तो खड़े हो शरणागति य ये उनकी कृपा से आएगी नहीं बहुत जोर की शरणागति है कि आपको जो पसंद है वही मैं बात कहूंगा वही आचरण करूंगा अगर आप

दिन को रात कहेंगे तो मैं अपनी आंखों को झूठा मानूंगा कि गुरुदेव कह रहे हैं रात है मुझे दिन दिखाई दे रहा मेरी आंखें झूठी है गुरुदेव झूठे नहीं गुरुदेव की बात सत्य है ऐसे श गति यह जब आ जाती तो ब्रह्म बोध अपने आप हो जाता है क्योंकि कभी ग्रंथि पड़ी ही नहीं जड़ चैतन्य की गुरु प्रसन्न सावन कूला मिटी सकल कल्पित भय सूला कल्पनात्मक जो भय का शूल था वो मिट गया जैसे स्वापक दुख होता है ना जगने पर मिट जाता है ऐसे गुरु प्रसन्न हुए करुणा करी तो उनकी प्रसन्नता से अज्ञान तिमिर का नाश हुआ तो दिखाई दिया कि कोई बंधन ही नहीं था हम तो जीवन मुक्त थे रहेंगे समझ रहे हो आप कभी बंधन हुआ है क्या आत्मा का तो किसका मोक्ष भव बंधन और भव मुक्ति दोनों अज्ञान है क्यों प्रभु एक बार उड़िया बाबा से पूछा पूज्य स्वामी अखंडानंद जी ने कि जीवन मुक्त अवस्था प्रभु नका अविद्या उका यह तो अविद्या का ना होने पर होती है तो बोले क्या वह बंधन युक्त था क्या आत्म तत्व जो जीवन मुक्त हुआ तो बंधन भी और जीवन मुक्ति भी दोनों अविद्या के ही नाम यह

अनुभूत महापुरुष बोल सकते पढ़ा लिखा तुरंत बोलेगा कि अविद्या का नाश होने पर जीवन मुक्त होता है जीवन मुक्त होता है कि जीवन मुक्त था केवल है कि अनुभूति करनी है बंधन का भ्रम नष्ट हुआ ना बंधा तो नहीं था ना गोस्वामी जी संकेत में कह रहे जड़ चेतन ग्रंथि पड़ गई जदपि म छूट कठ य छूटता है गुरु चरणों से गुरु चरणों बिना महत् पाद रजो अभिषेकम यह नाश नहीं होता अज्ञान अज्ञान ति मरांस ज्ञानांकुर मिलत तस्म श्री गुरु नम हम परमानंद स्वरूप है थे रहेंगे यह भ्रम से देह भाव स्थूल सूक्ष्म कारण और इसी के बंधन से हमारा जन्म मरण हो रहा है अजन्मा का जन्म हो रहा है अमर का मृत्यु को प्राप्त हो रहा है जो अमर है व मृत्यु को अविनाशी मृत्यु को प्राप्त हो रहा है जो एक है उसे अनेक भास रहा है जो अद्वितीय ब्रह्म सुख है वह भोगों की तरफ लालायित हो रहा है बस यही ब्रह्म हटना गुरु कृपा केवल अच्छा कुछ भी कर लो अहंकार बकाया है हमें विश्वास नहीं होता किसी के ब्रह्म ज्ञान के उपदेश पर बिना स्थिति के स्थिति अगर देखने तो थर्मामीटर अपनी

जेब में रखो पवे अध्याय का श्लोक निर्माण अमोहा जित संग दोषा अध्यात्म नित्या वि निवृत कामा द्वंद वि मुक्ता सुख दुख संग गच्छ अमूढ़ा पदम यंत यह थर्मामीटर है अपने अंदर डाल लो चाहे बाहर डाल लो अगर यह है तो परम पद के अधिकारी हो चुके हो अर्थात ब्रह्म बोध हो गया है अगर इसमें त्रुटि है तो अभी कुछ नहीं यह थर्मामीटर है भ ने बोला मान का किंचन मात्र भी स्पर्श नहीं किंचन मात्र भी कहीं ना अपने शरीर में मोह ना किसी के शरीर में हो निर्माण अमोहा और किसी भी भोग की ताकत नहीं उसके हृदय में इच्छा जागृत कर दे जित संग दोषा और क्यों व आत्मा स्वरूप में नित्य स्थित रहता है कैसे बोले विवृत कामा उसकी सारी कामना शांत हो चुकी है द्वंद वि मुक्ता हर दुख सुख मान अपमान लाभ हान हर द्वंद को उसने दूर फेंक दिया है सुख दुख संग गई वो ज्ञानी महापुरुष भगवान को प्राप्त होता है मैं यह किया मुझे ये मैं मैं तो अहंकार भी मूढ़ आत्मा करता मिति अन्यते तो अभी मढ़ता पिंड नहीं छोड़ेगी जब तक गुरुदेव भगवान नहीं मिलेंगे इसलिए भगवान अर्जुन जी

को पूरा उपदेश दिया तो अर्जुन जी को प्राप्त क्या हुआ नष्ट मोहा स्मृति ये मोह का नाश गुरुदेव की कृपा से होता है इसलिए हमें सबसे ना कि अगर परमार्थ के स्कूल में आपको उन्नति शल विद्यार्थी बनना है तो गुरुदेव की शरण ले बिना गुरुदेव के आज तक कभी किसी को कहीं भी कोई गति मति नहीं प्राप्त हुई मति कीरति गति भूति भलाई जब जे जतन जहां ज पाई सो जानो सत्संग प्रभाव लोको वेद ना आनु पाव तो आपका इस विषय में कोई संशय बहुत अच्छे भाग्यशाली हो भगवान के मार्ग के पथिक हो आप चलो पर गुरुदेव का सहारा लेकर चला जब अर्जुन जी लाक्षागृह से भाग कर के बनवास में गए ना तो एक चित्र स नाम के गंधर्व ने उन पर प्रहार कर दिया तो अर्जुन जी तो हस्त लागो प्रवे तो विजय प्राप्त की उका आज तो विजय प्राप्त कर ली लेकिन आगे तुम विजय नहीं होगे क्योंकि तुम्हारे साथ गुरु नहीं है तो धौम्या चार्य जी को उन्होंने उसी समय गुरु के रूप में वर्ण किया और फिर आगे गुरुदेव जरूरी है बड़े-बड़े महापुरुषों के आगे गुरुदेव होते हैं और गुरुदेव जिसके आगे हैं तो

माया नाम की कोई चीज नहीं है गुरुदेव की कृपा दृष्टि ऐसे बड़ा माया का प्रभाव हम गुरुदेव को मनुष्य मानते हैं हम गुरुदेव को बहु संत मानते हैं लेकिन गुरु साक्षात परब्रह्म य नहीं मान पाते अगर यह मान ले तो सच्ची पूछो कोई साधन करने की जरूरत नहीं है परब्रह्म की कृपा दृष्टि पढ़ते ही माया मल काना पर हमारी श्रद्धा उस कोट की नहीं ना गुरुदेव को ब्रह्म नहीं मान पाते यद सर्वम लमदम ब्रह्म तो गुरुदेव तो मूर्तिमान ब्रह्म है ही पर वह मानना नहीं हो पाता हम कई ऐसे साधकों को देखते हैं व अपने गुरु जी की अवहेलना कर देते हैं नहीं नहीं गुरु साक्षात पर खड़े रहो जब तक गुरुदेव नहीं कहेंगे खड़े रहेंगे बैठ जाओ बैठ जाओ बैठ गए मतलब गुरुदेव का स्वरूप भगवान से भी बढ़कर है एक तरफ भगवान एक तरफ गुरुदेव तो हमारी पहली दंडवत गुरुदेव की होगी भगवान की ल होगी गुरु गोविंद दो खड़े काके लागो पाय बलिहारी गुरु आपने गोविंद

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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