एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #766 · 22 दिसंबर 2024
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
श्रीमती अर्चना पांडे जी लखीमपुर राधे े राधे राधे आदरणीय महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी बिना किसी दोष अथवा अपराध के कोई मनुष्य यदि सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत तौर पर जीवन में किसी का अपमान करता रहे तो अपमानित व्यक्ति को क्या आचरण करना चाहिए यदि वो आध्यात्मिक है उसे सह लेना चाहिए और भगवान से प्रार्थना करना चाहिए कि उसकी बुद्धि शुद्ध हो और अपने में आज ही सत्संग में था पूज्य पाद श उड़िया बाबा के वचन में कि हमारा कोई प्रारब्ध पूर्व जो
पाप में है हमारे भगवान के द्वारा विधान किया गया है शारीरिक दंड ना भोग कर के मानसिक दंड से उसे निपटाया जा रहा है जैसे हमें कोई गाली देता है या अपमानित करता है तो हमें मानसिक जलन होती है मानसिक जलन से हमारे पाप का प्रश्चित हो गया जो हमें शारीरिक दंड नहीं भोगना पड़ा तो हमारी कोई निंदा करता है या हमारा अपमान करता है या तिरस्कार करता है तो भगवान के विधान से हमें पवित्र किया जा रहा है कबीर दास जी कह रहे हैं निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय अपने सामने रहे पास रहे बिना साबुन बिना पानी निर्मल करे स्वभाव वो हमारे मन के हमारे तन के सारे पापों को नष्ट कर देता है जो श्री प्रबोधनंद जी महाराज कह रहे सम्मानम कलत घोर गलम नीचा अमानम सुधा श्री राधा मुरली धरो बज सखे वृंदावन मात सम्मान विष है जो हमारे पुण्यं को नष्ट करता है अपमान अमृत है जो हमारे पापों को नष्ट करता है और पुण्यं को बढ़ाता है इसलिए मुझे जो अध्यात्मिक है उसे सहना चाहिए और जो एकदम संसार है तो सहेगा ही नहीं वो प्रश्न ही नहीं करेगा तो साठ समाचरेत
वह दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करेगा लेकिन अध्यात्मिक ऐसा नहीं करत ज अनसन निंदक तिन उपय अनुग्रह करयो जो तुम्हारे अनसन अपमान करते हैं निंदा करते हैं उनको भी सहकर उसका मंगल मनावे यह आध्यात्मिक स्थिति है इससे हमारा मंगल होगा हमारे पाप नष्ट होंगे हमारे भगवान प्रसन्न होंगे जीवन का परम लक्ष्य है भगवान की प्रसन्नता किसका प्रश्न था समझ इसमें कोई संशय आचार्य सतीश पांडे जी जबलपुर से जी पूज महाराज जी आपके चरणों में कोट कोट प्रणाम महाराज जी यह कह रहे हैं कि आप एक मंदिर में पुजारी थे वहां इनको ठीक नहीं लगा माहौल तो इन्होंने वहां का त्याग कर दिया और महाराज जी इनको जानना चाह रहे कि मुझे त्याग करने का दोष तो नहीं लगेगा महाराज जी मैंने अगर आपने इस भाव से त्यागा है कि य विविध प्रकार के दोष हो सकते हैं जैसे कोई भगवान के लिए अर्पित कर रहा हो उसका प्रयोग स्वयं कर रहे हैं प्रलोभन वश जैसे आप पूजा करते हैं तो आपकी पेमेंट होगी नहीं गुरुजी मेरे वहा ऐसा कुछ नहीं था व य था कि मेरे साथ फॉर्मेलिटी होने लगी थी
मतलब इससे आप मिलो इससे ना मिलो मैंने कहा मैं फिर भी आपको तो जो चढ़ का चढ़ता होगा वो उससे कोई मतलब नहीं था सेवा देता था मैंने तो फिर आपको छोड़ना नहीं चाहिए फिर सेवा में क्या परे गु जीी मुझे कहा गया कि आप इससे ना मिले इससे मिले व राजनीतिक स्थितियां बनने लगी थी आप प्रपंच प्रपंच हो हा तो भगवान की सेवा में आपको सावधान रहना चाहिए आपको किसी से मतलब आपका आपके ऊपर शासन होगा जी शासन हुआ तो फिर नहीं करना इसके साथ फोटो ना खि चाए ब्राह्मण था हा देता था गुज मैंने 18 वर्ष सेवा करी उन भगवती की और फिर मुझे लगा कि यहां पर प्रपंच हो रहा है य छोड़ देना इट की जिनकी सेवा तो दो नहीं तो आप इष्ट को विराजमान कर लो छवि रूप में अपने घर में और उनकी हा उनको पाठ सुनाओ और उनका नाम जप करो मुझे बुलाते सब चाहते हैं कुछ लोगों के कारण मैंने उसको छोड़ा कोई बात नहीं आप सरल हृदय है जहां भी आप प्रभु को विराजमान करके आराधना करेंगे व आराधना स्वीकार कर लेते जो और लोग है मुझे य मानते मैं किसी के पास नहीं जाता कोई बात नहीं है
भगवान को यजमान बना लो वही सबसे बड़े यजमान है हां भगवान का नाम जब करें देखो हम इस विधान से कि अगर आप में इतनी विवेक प्रणाली होती कि सबकी बातें हटाकर अपने इष्ट से केवल मतलब रखना तो वह आपका अधिकार नहीं है क्योंकि आपके ऊपर शासन है वहां तो इसलिए छोड़ देने में कोई दोष नहीं लगता है नहीं तो हम आपको यही कहते पुनः सेवा कीजिए पर वहां जब आपके ऊपर अधिकार दूसरों का है कि हम जैसा कहे वैसा सेवा करो तो फिर नहीं करना चाहिए फिर अपने छवि विराजमान घर में करके भगवत आराधना करनी और आप निष्काम करते थे इसलिए वह सेवा व्यर्थ नहीं जाएगी आपको आगे उसका फल मिलेगा और सबसे बड़ा फल है कि आपके आंसू गिरे यही फल है हम भगवान के लिए रो दे हम प्रभु की सेवा के लिए व्याकुल हो जाएं हमारे हृदय में तपन हो इस बात की यही भक्ति का फल है वो भगवा के विग्रह को मैंने बाल काल से सी हां कोई कोई बात नहीं अब भाव से सेवन करो अपने घर में छवि विराजमान कर लो जी मानता हूं उनको मेरी लगाव उसे लग है ठीक है भजन करो भजन ही सार बात जी संजय शर्मा जी
राधे राधे राधे राधे महाराज जी मराज जी ज्ञान क्या है ज्ञान को पाने के लिए क्या शिक्षा आवश्यक है या ज्ञान को भक्ति से पाने का तरीका उच्च है भक्ति से पाने का तरीका स्वरूपा अनुसंधान भक्ति रेव गरीयसी भगवान शंकराचार्य जी ने गरी से माने श्रेष्ठ स्वरूपा अनुसंधान अर्थात ज्ञान आत्म स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन भक्ति है पर कुछ स्वाध्याय भी जरूरत है ज पता ही नहीं कि मुझे किस मार्ग से जाना है उस मार्ग में कितने किलोमीटर है कितने किलोमीटर बाद हमारा लक्ष्य मिलता है तो फिर ऐसे चलते हम हार जाएंगे ना इसलिए हमको सबसे पहले इस मार्ग में गुरु का वण करना चाहिए गुरु के वचनों के अनुसार जब हम चलेंगे तो मंजिल बहुत दूर है पर बहुत नजदीक हो जाती है और जब हम भगवान की आराधना करते हैं तो मंजिल चलनी ही नहीं पड़ती है हृदय में ही ज्ञान प्रकट हो जाता है नहीं तो ज्ञान के पंथ कृपाण के धारा परत खगेश लगे नहीं बारा ज्ञान का मार्ग बोले नंगी तलवार पर चलना है बहुत कठिन होता ना क्योंकि पूरे संसार के राग
का नाश करना है पूरे संसार को असत्य कह दिया ज्ञान ने ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या अब हम पूरे संसार में ही फसे मतलब हमारी जितनी आज तक जन्म जन्मांतर से संस्कार स्वभाव वस आ शक्तियां है सब काटनी है और सबसे मूल शरीर में आ जाती जब सब छोड़ सकते हैं लेकिन देह प्राण ते प्रिय कछु नाही सबसे ज्यादा प्रिय देह और अपने प्राण है और इनकी भी परवाह छोड़ देनी है तब हम ज्ञान के मार्ग में चल सकते हैं तो इससे बहुत सरल और संपूर्ण ज्ञान प्राप्त कराने में समर्थ भगवत प्राप्ति कराने में समर्थ भगवान की भक्ति है अब जैसे शरीर का राग त्यागना और शरीर को समर्पण करना दोनों बात एक है लेकिन राग त्यागना बहुत कठिन है और समर्पण करना सहज है राग त्यागना कठिन है मैं शरीर नहीं हूं अब सर्दी लग रही है तो शरीर में तो लग रही है लेकिन आप महसूस कर रहे हैं ना कि आपको सर्दी लग रही है तो अज्ञान है सर्दी किसको लग रही है आत्मा को लग नहीं सकती और पंचभूत जड़ है इनको लग नहीं सकती तो भ्रम ही तो है तो भ्रम है तो उतार दो जाकेट ज्ञान का मत चल है नहीं
पर है ना हमें सर्दी लगती है भूख प्यास प्राणों का धर्म है देखना सुनना इंद्रियों का धर्म है संकल्प विकल्प मन का धर्म है आप सबसे अलग हैं लेकिन आप सबसे अलग नहीं है आप देख रहे हैं आप खा रहे हैं आप सूंघ रहे हैं आप भोग रहे हैं क्योंकि आप शरीर भाव में है इसी को अज्ञान कहते हैं अब इस अज्ञान को त्यागना बड़ा कठिन है है नहीं कठिन अब हम क्या करते हैं इसको घुमा के त्याग हैं बोले भोजन हमें यह पसंद है तो भगवान को भोग लगा अब वो प्रसाद हो गया अब वो राग नहीं करेगा वो बांधे नहीं नुकसान नहीं करेगा वो आपका मंगल करेगा प्रसादे सर्व दुख खाना मनर सेप जाते परिवार में बन तो नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी हे नाथ पत्नी पुत्र परिवार सहित मैं आपका दास हूं बात वही हो रही है राग का त्याग लेकिन वह राग का त्याग करना अत्यंत कठिन हो ये राग का समर्पण भगवत समर्पण इससे बहुत जल्दी ज्ञान प्राप्त हो जाता है पर जब हमारे हृदय में लक्ष्य प्राप्त हो जाए ज्ञान प्राप्ति के लिए तब ये बात हो सकती तो हम सुमिर परायण है पहली
बात तो भक्ति का प्रधान स्वरूप देवर्ष नारद जी ने बताया त दर् पिता अखिला चरिता तद स्मरण परम व्याकुल ते जो सारे आचरण भगवान के लिए करता है जो भी कर्म व्यापार नौकरी सब भगवत अर्पित करता है और इतना नाम सुमिरन में प्रियता हो गई कि अगर एक क्षण के लिए भी छूट जाए तो व्याकुल हो जाए जैसे मछली को पानी से अलग करो तो तड़पने लगती तद विस्मरण परम व्याकुल तेते तो यह भक्ति फिर शुद्ध ज्ञान प्रकाशित कर देगी हर समय देखो जब संसार का चिंतन होता है तो हमारा हृदय मलिन होता है जब भगवान का चिंतन होता है तो निर्मल होता है तो हम राधा राधा राधा राधा राधा राधा हर समय जपे तो हमारा हृदय निर्मल और निर्मल हृदय में ज्ञान प्रकाशित हो जाता है मलिन हृदय में अज्ञान होता है निर्मल हृदय में ज्ञान होता है मलिन हृदय संसार को सत्य मानेगा और निर्मल हृदय सब में भगवान है ऐसा सत्य मानेगा अब हमको सरल सहज और भरोसा ज्ञान में आप भ्रष्ट हो कोई बचाने वाला नहीं और भक्ति में करो सदा तिन के रखवारी जिम बालक राखे मतारी भगवान कह रहे ना मैं उसकी रक्षा
करता हूं योगक्षेम बाहम हम मैं स्वयं योगम का तो सबसे श्रेष्ठ भगवान की भक्ति का जो चरण है जो चिंतन है वह सहज ज्ञान की धरा में पहुंचा देता है अच्छा कोई भक्त अ ज्ञान होता है क्या देखो हनुमान जी ज्ञानी नाम अग्र गणम गरुण महा ज्ञानी गुण रासी विश्वामित्र महामुनि ज्ञानी सबप ज्ञान आ जाता है तो हम नाम जप करें और भक्ति के पवित्र आचरण करें और जो आचरण व भगवान को समर्पित कर दे और पूरा परिवार तन मन धन सब भगवान की शरण में निश्चित भगवत प्राप्त निश्चित ज्ञान हो जाएगा समझ पा रहे आप किरण जी गुड़गांव हरियाणा से राधा वल्लभ श्री हरिवंश गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम पूज्य गुरुदेव भगवान मुझे अदम से एक संत के प्रति दृष्टि दोष हो गया था उसके पश्चात मेरा नाम जब छूट गया मैंने उन संत से भी क्षमा मांग लिया उन्होंने भी क्षमा भी कर दिया फिर भी नाम जब पहले की तरह नहीं चल पा रहा महाराज जी कृपा करके मेरा मार्गदर्शन करें अभ्यास करो शुरू करो और किसी के प्रति हम दोष दृष्टि क्यों करें पहली बात तो हम सब ग्रस्तों से
से प्रार्थना करते हैं कि संतों के वचन सुनो और दूरी रहकर भजन करो उनका भी भजन होने दो और तुम भी भजन करो सत्संग सुनो ब दूरी बना लो बहुते बहुत तुम्हारे अंदर भाव है तो शिक्षा ली है तो भिक्षा दे दो चार रोटी की व्यवस्था कर दो अगर उनको भूख लगी भोजन दे दो ऐसा लगता है कि भाई हम वस्त्र की व्यवस्था कर दूरी बना के रहो ज्यादा संतो से ऐसा नहीं रखनी चाहिए नहीं तो दोष दर्शन हो जाएंगे क्योंकि कौन किस स्थिति में है तुम्हें पता नहीं है या कौन आडंबर कर रहा दम भी है पाखंडी यह भी तुम्हें पता नहीं तो हमें लगता है जब मंच पर बोला जाएगा तो बहुत होश में बोला जाता है होश वाली बात सुनो बस पीछे छोड़ दो पीछे भगवान जाने जो जैसे कर रहा उसको भोग मिलेगा आप केवल मंच से सुनो ब दूरी बना लो ज्यादा लगाव करने की जरूरत नहीं है भाव से लगाव दूरी बना के रखो तो दोष नहीं बनेगा दोष कब देखोगे जब नजदीक जाओगे हम कह नजदीक जाने की जरूरत नहीं है प्रवचन सुनो सत्संग सुनो उसको आचरण में उतारो जैसे बैठे हो सुना जय भगवान दूरी कोई मतलब नहीं तो
इसलिए हमें लगता है दोष दर्शन बचने के लिए हर गृहस्थ को चाहिए गुरु बना लिया मंत्र ले लिया खूब भजन करो चलो दूरी हटो समझ रहे हमारी बात नहीं दोष दर्शन तो हो ही जाएंगे क्योंकि तुम री दृष्टि सही नहीं है और पता नहीं वहा स्थिति ना हो दोनों बातें हो सकता है तुम्हारी दृष्टि ना सही हो हो सकता है वहा उनके आचरण ना सही हो तो इसलिए केवल प्रवचन सुनो और नाम जप करो दूरी बना केर रखो जब बहुत काल के बाद विश्वास हो जाए कि भगवान के विशुद्ध भक्त है तो आपको सच्ची कहते हैं
साधु ते होए न कार जाने भगवान के भक्त से कभी ऐसा नहीं हो सकता कि जो नहीं होना चाहिए कभी नहीं हो सकता उसर बरस त्रण नहीं जामा संत हृदय जिम उपज न कामा भगवान के भक्तों से कभी ऐसा नहीं हो जो वास्तविक भगवान के मार्ग में चलने वाले ऐसा नहीं हो सकता तुम्हारा मंगल होगा तुम्हारा कल्याण होगा पर कुछ ऐसी बाहरी बातें है जो हम उनको दोष दर्शन में ना देखे जैसे सत्संग हो रहा है और बीच सत्संग में राम कृष्ण परमंस जी क खाने को लाओ कुछ पकोड़ा लाओ कुछ ऐसे परमहंस स्थिति तो वि नंद जी ने कहा भी एक बार कि महाराज जी तो उन्होंने कहा जिस दिन हम ऐसा ना करें उस दिन जान लेना कि शरीर छूट जाएगा रजोगुण से शरीर का सेवन हो रहा है रजोगुण अगर ना हो तो शरीर नहीं चलेगा तो कुछ ऐसे लीलाएं होती है खानपान लेकिन गलत लीलाए नहीं होंगी तो उनमें दोष दर्शन ना करें खानपान व्यवस्था उनकी कैसी है अलग-अलग संतों का स्वभाव होता है प्रभाव होता है पर हमें लगता है दूरी बना के रखे तो ज्यादा अच्छा आग से लिपटो मत दूर से सेवन करो राजा जोगी अगिन जल
परशुराम देवाचार्य जी हुए हैं य चार बातें कही राजा जोगी अगिन जल इनके उल्टी रीति परशुराम इनसे बच के रहिए थोड़ी करिए प्रीति जैसे जल है तो अगर भवर में फस गए तो चाहे जितने तैरा को मरी जाओगे वहां कोई उपाय नहीं है अग्नि है दूर से सेख लो ज्यादा प्यार करोगे फफ प जागा जल जाओगे राजा है एक द्वार का निर्माण कराया और जो पर्दा हटाया गया तो राजा ने कहा वाह क्या निर्माण हुआ है तो निर्माण करने वाले को हार का इनाम दिया अब वह फूल गया उसने कहा सरकार यह क्या इससे भी अच्छा बना सकते हैं तो कहाब इससे अच्छा बना सकते तो घटिया क्यों बनाया इसको फासी में चढ़ा दो अब संत है कृपालु है आपका दोष दर्शन हो गया तो सब पुण हो जाए साधु अवज्ञा तुरत भवानी कर कल्याण अखिल केहानी तो मुझे लगता है कि दूर से प्रीति करो उनका भी भजन शुद्ध बना रहेगा और आपका भी भजन शुद्ध बना रहेगा ज्यादा लगाव पन बाहरी मत करो अंदर से भगवान मानो खूब बढ़िया भजन करो कोई परेशानी नहीं बाहर से लगाव करोगे तो उनमें भी दोष हो सकता है और आप में भी दोष हो सकता है
इसलिए दूरी बना के रखे और नाम जप करो कुछ कुछ नहीं आज से शुरू करो नाम जप करना ठीक है ना ये बात भूल जाओ कि तुमसे कोई अपराध हुआ था अब भजन शुरू करो यशिका जी हरियाणा से जी राधा वल्लभ श्री हरिवंश गुरुदेव महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मेरा प्रश्न है कि स्वपन को लेकर है महाराज जी मुझे स्वपन में भूत और भगवान एक साथ दिखते हैं मैं ऐसा कुछ खासम है भूत भावन भगवान भूत भावन भगवान और आगे शकर भूत जब हम उच्चारण करते तो भूत भावन भगवान अरे वही सब है कोई दूसरे नहीं है वही चरा जगत बने हुए हैं अब हमारी बुद्धि शुद्ध नहीं है इसलिए ऐसा है कोई भूत नहीं है वही भगवान है वही सब रूपों में है उनके सिवा कुछ नहीं है नामदेव जी के सामने भूत प्रकट हुआ तो उन्होने कहा जय विठ्ठल तोहा विठ्ठल भगवान प्रकट हो गए तो हम अगर भूत को भूत मानेंगे तो भूत है नहीं तो भगवान के सिवा कोई है नहीं और नाम जप करते हुए सोया करो उटपटांग के स्वप्न नहीं आएंगे जब सय करो नाम राधा राधा राधा राधा जब तक नींद ना आवे तब तक राधा राधा
राधा राधा सो गए फिर आप देखना अच्छे स्वप्न आएंगे यह सब इधर उधर के स्वप्न नहीं आएंगे इधर उधर के स्वपन आते जो सोते समय बातें प्रपंच की सोचते रहते हैं सोते समय नाम जरूर जपना चाहिए पता नहीं जग पावे कि न जग पावे यह भी तो है ना कहो सोते सोते ही दिल फेल हो जाए इसलिए हम भगवान का नाम प्रिया जू का नाम जपते हुए सोए जिससे हमारा शयन भी आनंदमय हो जाए अगर स्वप्न आते तो देखो स्वप्न की दो तीन तिया होती एक होता है ऊट पटांग बेमतलब के स्वपन आते जिनका कोई अस्तित्व नहीं और एक होता है जो हमने पूर्व में किया है उन संस्कारों से होता है और एक होता है आगामी जो होने वाला है उसका संकेत तीन प्रकार के स्वप्न के होते एक होता बिल्कुल सिर पैर के नहीं बिल्कुल बेकार उटपटांग एकदम तुक तान ही नहीं और एक होता है जो पूर्व में हमने किया है उसके संस्कार के स्वपना आते और एक आगे जो होने वाला है संकेत उसके स्वपना आते हैं तो हमें नाम जप किया जाए नाम जप करने का अभ्यास बनाया जाए तो हम तीनों प्रकार के स्वपनों से बच जाए नहीं तो कहो ऐसा
स्वपना आ जाए कि आनंदित हो क ऐसा स्वप्न आ जाए कि रोना पड़े भयभीत हो जाए नाम जप करो तो स्वप्न भी तुम्हारा आनंदित रहे आनंद देने वाला बनेगा स्वप्न में भी दुख नहीं होता भक्त को इसलिए भगवान का नाम जप करो सुकन्या जी बिहार से राधा राधा गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोट प्रणा गुरुदेव भगवान मुझ पर अतु की कृपा हुई है जी मुझे हर समय से यह डर लगा रहता है कि कहीं सांसारिक मोह में फंसकर मैं रास्ता ना भटक जाऊं भगवान की शरण में रहो व अपने भक्त की रक्षा करते हैं जैसे मां अपने बच्चे की रक्षा करती करो सदा तिन के रखवारी जिम बालक राखे मतारी हम तो फस ही सकते आप अगर हमारा हाथ पकड़े तो हम कैसे फस सकते हमें भरोसा भगवान का रखना चाहिए अपना नहीं अपने तो फेल हो जाएंगे इतनी दुरंत माया है जो ज्ञानेन करर चित परही ब आई विमोह बस करई जो बड़े-बड़े ज्ञानियों के चित्त का अपरण करके बलात मोह में डाल दे उसे माया कहते हैं तो भगवान कहते हैं देवी हेसा गुणमककुम जन्मांतर से फसते आ रहे हैं आप ही मुझे बचाओ प्रभु आप ही मेरी रक्षा करो
तो रक्षा कर लेंगे वो हमको तो डरना तो है ही है पर इतना नहीं डरना कि हम भजन छोड़ दे कहीं फस सकते पक्की बात है आपकी लेकिन भगवान जब बचाने वाले हैं तो फसने नहीं देंगे भगवान की शरण में हो जाओ और नाम जप करो महाराज जी महाराज जी जैसे कि घर में वैसा गृहस्थ आश्रम में ऐसा वातावरण नहीं मिल पाता है तो होता है कभी-कभी मन भी वो हो जाता है वैसे में बहुत डर लगता है अब हमको नहीं र हम श्री जी के पास हां तो बस श्री जी का सुमिरन करते रहो अंदर अंदर बाहर कोई भक्ति का ज्यादा प्रकाश मत करो क्योंकि गृहस्थी में विरोध होने की संभावना है तो अंदर अगर हम राधा राधा राधा राधा जप रहे हैं तो हमारा पक्का काम हो जाएगा जो नाम जप कर रहा है हम अपने विश्वास से कहते हैं निश्चित मंगल हो जाएगा चाहे ग्रहस्ती में आप कितने लोग आपके दो चार छह लोग होंगे हमारे तो दसियों लाखों लोग हैं हमारे ही तो है सब भगवान साथ है तो कहीं फसना नहीं है एक का वि ध्यान थोड़ी है क्योंकि हम सबको भगवान के रूप में देखा मेरे भगवान इन सब रूपों में खड़े हैं तो
आप सात आठ लोग परिवार के हो गए सब में भगवान को देखो फसो ग नहीं पुत्र में भगवान पति में भगवान सास ससुर में भगवान सब में भगवान की भावना करो तो फसो ग नहीं सेवा भी बन जाएगी और भगवत प्राप्ति भी हो जाएगी यश जी राधा कुंड से राधा बो श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मुझे प्यारी की बहुत याद आती है उनके लिए रोता तड़पता हूं लेकिन अब धैर्य नहीं रख पाता जिस कारण वश ऐसा बस ऐसा लगता है कि क्या श्री जी मेरे साथ भी हैं क्या वह जानती भी है मैं उनके लिए दिन रात रोता हूं वही चाह रहे हैं तभी तुम्हें रोना आएगा श्री जी आपको जानती नहीं श्री जी ही आपको प्यार दे रहे हैं तभी आप श्री जी के लिए अगर किशोरी जी कृपा ना करें तो एक बार राधा नहीं बोल सकते राम जी कृपा ना करें तो एक बार राम नहीं बोल सकते कृष्ण जी कृपा ना करे तो एक बार कृष्ण नहीं बोल सकते और वो तो सबके हृदय में ही बैठे हैं उनके जानने की बात तो तो हृदय में ही बैठे हैं और उन्हीं की प्रेरणा से आप राधा राधा कहते हैं तो यह तो संशय मत करो कि वो देखती है कि नहीं वो
जानती है कि नहीं वही कृपा करके प्रसाद दे रहे कि आप राधा राधा कह कर के रोना आता है आपको लगता है श्री जी मिल जाए ये तो बड़े भाग्य की बात है पर अंदर छुपाए रहो अपने को भक्त ना मानना कि मैं बहुत बड़ा भगत हूं क्योंकि इससे फिर अभिमान आ जाएगा और नाम जप करो चुपचाप एकांत में रो श्री जी के लिए ठीक है महाराज जी कभी कभी वो जो विरय के समय पर स्मित हो जाता है कि वो साथ में है तो अकेलापन बहुत ज्यादा लगता है तो उसम एक बारर आप कह आप मेरे साथ हो देखो इसमें बात समझना है कि जब विरय होता है तो जिसका विरय होता है वो सामने होता है अगर विरय है तो हमारी बात का अनुभव करोगे ज अगर हम कृष्ण विरय में है तो हमारे भाव देश में कृष्ण छाए हुए हैं तभी तो हा कृष्ण तुम कब मिलोगे प्यारे तुम कब मिलो उस वो अनुभव हो रहा है सामने श्री कृष्ण पर अनुभव हो रहा है विरय का तो ऐसा नहीं है कि वो विरय के समय तुम्हारे साथ नहीं रहते तुम अकेले रहते हो ऐसा विरह तो होता नहीं है विरय जिसके लिए होता है उसकी झांकी दिमाग में होती है आप ऐसे
लौकिक देख लो किसी व्यक्ति के विषय में सोचोगे तो उसका रूप आ जाएगा कि नहीं आ जाएगा कि यार बहुत दिन से वो नहीं मिले तो सामने आपके होगा वो रूप ये सिद्धांत है तो जब हम प्रभु के लिए रोते हैं तो प्रभु हमारे मानस पटल पर होते हैं हे श्री कृष्ण आप कब मिलोगे तो साथी तो है ऐसा कैसे सोचते हो कि आप अकेले हो गुरुजी ऐसे एकांतिक में तो रोज नहीं आ सकते आप तो मेरे साथ ना हमे पक्का हमारी बात मानो हमारी स्वामिनी जी का नाम जप करो तो आप देखो हमारा नाम जानते हो क्या प्रेमानंद प्रेम किसे कहते श्री जी को आनंद किसे कहते लाल जी को प्रिया और लाल दोनों मिलकर प्रेमानंद है तो जहां प्रिया लाल का स्मरण कर रहे वही प्रेमानंद है हमारा कोई यह रूप थोड़ी है ये तो पांच भौतिक शरीर है दो चार कब छूटेगा यह पता नहीं लेकिन छूटेगा लेकिन जो हमारा स्वरूप है वह कभी नहीं छूटेगा वह तो सच्चिदानंद में है इसलिए स्वरूप से प्यार करो शरीर से नहीं नहीं तो चार दिन बाद कहोगे व जिनको हमने अपना माना था वह तो मर गए ये शरीर तो जाने वाला है लेकिन हम
जाने वाले नहीं प्रेमानंद नहीं जहां पुकारोगे वहीं प्रेमानंद प्रेमानंद पुलकित गात विद्य धारा धर समम कांति राधा कृष्णो मनस्य ददा राधा कृष्ण मनसन बंदेह श्री हरिवंश यह प्रेम स्वरूप है खूब नाम जप करो राधे राधे महाराज जी महाराज जी बच्चों को भगवत मार्ग में किस प्रकार से और आगे लेकर आया जाए और बहुत से इन्फ्लुएंस हैं जो लेकर आ सकते हैं जिनका बहुत नाम है जो भगवत गीता से रामचरित्र मानस से कोई भी सबसे पहली बात आपको प्रार्थना करते हैं यदि बच्चों का ब्रह्मचर्य ठीक नहीं रहेगा तो सब उपदेश में पानी फिर जाएगा किसी काम में उपदेश नहीं आएंगे अगर उनका चरित्र ठीक नहीं है तो सब व्यर्थ हो जाएगा इसलिए हमारा सबसे पहला जो कदम होना चाहिए व बच्चों को चरित्र हीनता से बचाओ जो आज हमारी समाज में चरित्र हीनता फैलती जा रही है 12 वर्ष का बच्चा आठ आठ बारन करता है जब हमारे सामने खड़े होकर के बच्चे अपनी हालत बताते हैं ना तो हृदय कांप जाता है कि किसान आदमी जब गेहूं की फसल गले में होती है जो किसान होते हैं व हमारी भाषा समझेंगे
गले का मतलब होता है अन्न की बाली अभी निकली नहीं है और उस समय काट लिया जाए तो एक दाना नहीं मिलेगा और थोड़ा समय का इंतजार कर लिया जाए तो 50 मन उसी से गेहूं पैदा होगा तो ऐसे जब तक 22 वर्ष की अवस्था ना हो जाए तब तक बालक को ब्रह्मचर्य रहना चाहिए फिर पाणी ग्रहण संस्कार आदि गृहस्ती में तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा आज हमारे बच्चों की स्मृति हीनता हो रही आज हमारे बच्चों में व्यसन बढ़ रहा है आज बच्चों में व्यभिचार बढ़ रहा है इसको एक हमारे पास आए थे हित धाम में रामायण कंठस्थ थे भागवत 18000 श्लोक कंठस्थ थे गीता कंठस्थ थे पर भारी व्यभिचारी बच्चा था उसने खुद हमें अपनी हालत बताई कि रात रात भर हम मोबाइल से ऐसे देखते हो ऐसे ऐसे ऐसे आचरण तब हमें लगा कि गजब है रामायण कंठस्थ है गीता कंठस्थ है बच्चे हैं कंठस्थ करा दिया गया लेकिन आचरण तो हमें लगता है कि अगर बच्चों के माता-पिता सहयोग करें गुरु तो सहयोग करें टीचर जो स्कूलों में है माता-पिता सहयोग करें और अपने बच्चों के पास मित्रवत बैठे मित्रवत बैठे और उनके आचरण के
सुधार के उनको सत्संग सुनाए शास्त्र स्वाध्याय कराए भगवान से प्रार्थना करें कि हमारे बच्चों के चरित्र अच्छे हो तो उनको बल मिले और 30 मिनट नाम जप करवाए 30 मिनट केवल नाम जप कराओ फिर आप देखना 30 मिनट बैठ कर के जो नाम उनको प्रिय लगे या आपको जो प्रिय लगे या जो गुरुजनों ने दिया है उस नाम को हम जपें और थोड़ी देर बैठ कर के गीता भागवत अर्थ सहित घर में हम अपने सुनाए तो हमारे बच्चों के संस्कार बदले इतने बड़े-बड़े मोबाइल है स्मार्ट मोबाइल घर में टीवी है माता-पिता विलासी है तो बच्चों के संस्कार भ्रष्ट होते चले जा रहे हैं तो केवल स्कूल से बच्चे नहीं सुधरेंगे घर में भी सुधार होना चाहिए अगर पिता शराब पीता है तो बच्चे को कैसे आचरण हीनता से रोक पाएगा गंदी गंदी बातें आप करोगे दृश्य देखोगे तो बच्चों में वही संस्कार वो छोटा नहीं है उसमें संस्कार पड़ रहे हैं तो माता-पिता सुधरे और अपने बों को सुधारने का सहयोग दे तो हमारी समाज सुधरे बच्चों वाली नहीं तो बहुत बुरा गिरते चले जा रहे हैं अभी कोई अवस्था नहीं और
बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड बनाए घूम रहे हैं कि अरे यह जीवन तुम्हारा हमारे राज्य के काम आने वाले तुम हो तुम ही में कोई एमएलए बनेगा कोई मुख्यमंत्री बनेगा कोई प्रधानमंत्री बनेगा कोई डॉक्टर बनेगा कोई मास्टर बनेगा और तुम आचरण हीन होते जा रहे हो क्या होगा हमारी समाज में क्या होगा आचरण हीन चाहे कोई हो हमारे राष्ट्र की सेवा नहीं कर सकता शोषण जरूर कर सकता है सेवा नहीं कर सकता है जो चरित्रवान है वही बलिदान देने के लिए तैयार हो सकता है वही दूसरों को सुख पहुंचा सकता है तो हमारी नई पीढ़ी बहुत गिरावट में जा रहे है छोटे-छोटे बच्चे व्यसन करने लगे छोटे-छोटे बच्चे व्यभिचार करने लगे हस्त मैथुन आदि के दोषी हो रहे हैं हमें लगता है माता-पिता टीचर और बड़ों को मिलकर के संभालना चाहिए इस विषय में कोई बोलता ही नहीं उनकी जीवनी शक्ति नष्ट हो रही वो हस्तमैथुन कर रहे उनकी दशा क्या होगी डिप्रेशन में पहुंच जाएंगे तो हमारे नए बच्चों को सिखाओ छोटे-छोटे बच्चे एक दूसरे के संसर्ग से एक 12 वर्ष का बच्चा तो हमने पूछा कैसे यह कैसे
सीखे तो क हमारे दोस्तों ने सिखाया तो क्रम बाय क्रम वो कुसंग बसात ऐसे तो यह सुधारण सुधरे तब सुधरे ब्रह्मचर्य स्मृतिवान बनाता है ब्रह्मचर्य बलवान बनाता है ब्रह्मचर्य जिधर चाहो उधर आप ले जा सकते हो ब्रह्मचारी को वो उधर ही विजय होगा अब ब्रह्मचारी की हीनता हो रही भोजन सुधरे ये जो आजकल नए-नए बच्चे पैकेट वाला भोजन पा रहे हैं तो इनके शरीरों में बल बुद्धि तेज नहीं आएगा हां अब यह खाक पहलवान बनेंगे ये खाक बुद्धिमान बनेंगे अरे सात्विक भोजन पाओ दंड बैठक मारो थोड़ा व्यायाम करो ब्रह्मचर्य से रहो फिर देखो जीवन कैसा बनता है तो हमें लगता है इनके चरित्र को सुधारा जाए तभी बनेगा तो हमें लगता है कि सुधार यहां से शुरू हो पहले ब्रह्मचर्य गुरुकुल में इसीलिए दूर रखा जाता था परिवार से इसीलिए दूर रखा जाता था कि सबसे पहली सीढ़ जो परमार्थ की और व्यवहार की वह है ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्य से गृहस्थ ब्रह्मचर्य से वानप्रस्थ सन्यास सब जगह ब्रह्मचर्य से ही होता है तो हमें लगता है ब्रह्मचर्य का उपदेश दिया जाए ब्रह्मचर्य की
रक्षा कराई जाए और उसमें प्रधान होगा भोजन और कुसंग का त्याग भोजन ऐसा सात्विक जिससे ब्रह्मचर्य टिके और कुसंग का त्याग जिससे हमारी गंदी आदतें ना हो छोटे-छोटे बच्चे मोबाइल में गंदी गंदी बातें सर्च करके देखेंगे उनकी हालत क्या होगी तो हमें लगता है बड़ा बड़ा उपदेश देने से बात अब नहीं बनेगी हमको घुसना पड़ेगा उनके जीवन शैली में घुसना पड़ेगा और वो अपने लोग कर नहीं सकते वो माता-पिता कर सकते हैं बैठल करके खुली बातें से पूछे कि आपके ब्रह्मचर्य में कोई हानि तो
नहीं आप कोई हस्तमैथुन तो नहीं करते आप कोई गंदी बात तो नहीं करते देख डरना मत हमसे बता दोगे तो हम तुम्हारी दवाई भी करवा देंगे ऐसी आयुर्वेदिक औषधियां आती है जो ब्रह्मचर्य क्षीण करके अपनी शक्ति हस कर लेता है बच्चा वो उससे पुष्ट प्राप्त होती है तो हमें लगता है कि पहले यहां सुधार होना चाहिए बिल्कुल म आप देखो सीरियल कैसे बन रहे हैं समाज के लिए तो सीरियल बन रहे हैं सीरियल कोई भी सीरियल ऐसा नहीं मिलेगा जिसमें अश्लीलता और अभद्रता ना दिखाई दे आप देखिए और जहां से हमारा काम बनना है या तो संतों के उपदेश या तो शास्त्रों का स्वाध्याय दोन शास्त्र स्वाध्याय है नहीं और संतों को ऐसा दिखाया गया मतलब जैसे वेब सीरीज कहते हैं जी जी तो वेब सीरीज में ऐसे दिखाए गए फिल्मों में ऐसे दिखाए गए कि श्रद्धा नहीं रही और शास्त्रों का स्वाध्याय है नहीं तो जीवन बचाएगा कौन दोही है शास्त्र और शास्त्रों के मर्मज्ञ संत जन वही समाज को सुध मते हैं और आजकल नए बच्चों को यही सब देखने को मिलता है गंदी बातें एक सीरियल में पूरा देख जाओ
जो वेब सीरीज है और उसमें देखो हर वो बात मिलेगी जिससे जीवन चरित्र नष्ट हो ना कि चरित्र बने पहले के फिल्में भी बनाई जाती थी जिनमें आदर्श उपस्थित किया जाता था आचरण पवित्रता पहनावा उनावा सही और आज देख लो सब अपवित्र होता तो अब नए-नए बच्चे जब ये देखेंगे तो उनके मन में यही करने की भावना आएगी अगर हम शास्त्र और भगवान के प्रेमी महात्माओं का संग नहीं करेंगे तो इन सब से हमारी आचरण वृत्ति बिगड़ेगी बनेगी नहीं अच्छा संतों पर श्रद्धा होना बड़ा कठिन होता है आज भगवान की बड़ी कृपा है जो कुछ संतों पर श्रद्धा करके लोग आते हैं बैठते हैं सुनते हैं नहीं तो एक अभी पीछे ही समय ऐसा आ गया था कि ऐसा लगा था कि चौपट हो गया सब एक ऐसा मतलब झोका आया था कि लगा कि संत का मतलब दिमाग में बैठ गया सबके कि फ्रड ये गिरा ये गि जैसे विकट प विकट ना गिरे ऐसे बड़े-बड़े जब भगवान की कृपा हुई तो फिर श्रद्धा सी जागृत हुई है तो संत वचन और शास्त्र वचन यह दो ही उठा सकते हैं अन्यथा उठाने की सामर्थ्य नहीं है चाहे जिस समाज को लेकर देख लो अगर
कोई उत्सव होता है पार्टी होती है तो मदिरा उसमें होगी उसमें अश्लीलता होगी अब बच्चा उस पार्टी में जाएगा तो क्या सीख के लाएगा वही अश्लीलता देख रहा है वही संस्कार बन रहे हैं तो हमें लगता है भगवान कृपा करें और सत्संग सुनाया जाए नाम जप करवाया जाए और उनको बैठ कर के ब्रह्मचर्य आदि साधन बताए जाए तोय आगे आधुनिक पढ़ाई में भी उन्नति वान होंगे और अध्यात्मिक पढ़ाई में भी ये उन्नति वान होंगे जी हां क्योंकि जी कल मेरे साथ ऐसा हुआ कि कल राधा बाबा कुए से मैं जल ले
रहा था गीता बरसाने तो राधा बाग राधा बाग राधा बाग से जल ले रहा था कड़ से बाबा तो जल लिया घर के लिए और लेके उसके नीचे जो सीढ़ है उसपे मैंने बैठ के वहीं जल पी लिया तो एक बाबा वहां बैठे हुए थे वो बहुत निषेध हां निषेध है अच्छा मैंने उनको बोला कि निषेध इसलिए कि वो श्री जी का कुआ है और वहां से श्री जी के लिए जाता है इसलिए निषेध है पहली गलती तो वहां आदेश लेना चाहिए दूसरी बात कुआ के ऊपर नहीं राधा बाग के बाहर पीना चाहिए वो श्री जी का निज बाग है उस उसमें कोई व्यवहारिकता नहीं होनी चाहिए तो उस डांट को कृपा मानो दोष दृष्टि मत करना ठीक है ना सबका सार है अंदर का चिंतन करना हमारा मौन तभी सार्थक जब निरंतर भजन करें हमारा त्याग तभी सार्थक है जब भगवान प्यारे लगने लगे भगवान के लिए सब कुछ छोड़ा है संसार में यश कीर्ति और प्रतिष्ठा ये तो सब आखिरी मेल है जिसमें गिर जाता है साधु आखिरी मेण में गिर जाता है अब मान लो जैसे कोई तप कर रहे हैं और उसका बहुत लोग जानकारी हो रही है बहुत लोग आ रहे हैं भेट चढ़ रहे हैं और
बड़ी संस्था चल रही उस तप के प्रभाव से तो उतना ही है भगवान नहीं मिलेंगे पहले भगवान से मिलो समाज से नहीं फिर समाज तो कोई हानि नहीं और पहले ही समाज तो फिर भगवान नहीं पहले भगवान पहले भगवत साक्षात्कार करो एकांत रहकर कोई जाने ना पर जी साधकों के लिए ज हम सब साधकों के लिए फिर तो उचित मौन मर्जी ज्यादा अच्छा है उचित हा हा भगवन जैसे राधा राधा बोला तो करोड़ों मौन से बढ़कर है हम गंदी बात ना बोले हम किसी को अशुभ ना बोले किसी की गलत चेष्टा हों को हम बढ़ावा देने
वाली बातें ना बोले तो और राधा राधा बोले तो मौन नहीं है वाणी का मौन नहीं है हम अपने धर्म की कमाई की नमक रोटी खाए तो बहुत बढ़िया फलाहार से भी बढ़कर बढ़िया तपस्या है बहुत कम पैसे में जो जीवन चले और तपस्या करे तो तपस्या अग्रसर हो जाती है और बहुत मतलब बाहरी इसमें फिर गड़बड़ हो जाता है तपस्या करनी चाहिए पर गुप्त करनी चाहिए कोई जाने ना जब तक हमें भगवत साक्षात्कार ना हो जाए अलग-अलग निष्ठा हैं पर भजन प्रदान रखना चाहिए सब साधन कर यह फल सुंदर प्रभु पद पंकज प्रीति निरंतर भगवान के चरणों का निरंतर चिंतन हो प्रेम हो यही सब साधनों का फल है अक्षत जिंदल जी नोएडा से ददा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव आपका जीवन और साधना हम सभी के लिए एक प्रेरणा है गुरुदेव आपने काशी में शिव जी की उपासना से प्रारंभ कर वृंदावन में श्री राधा वल्लभ श्री हरिवंश से राधा नाम का अद्भुत प्रकाश पूरे भारतवर्ष में फैलाया है यह ना केवल आपकी गहरी भक्ति बल्कि राधा रानी की असीम कृपा का प्रमाण भी है आपका
ये भक्ति भाव और प्रवचन हम जैसे लोग के लिए यह बताता है कि भक्ति मार्ग में कोई सीमा नहीं होती यह अनंत और व्यापक है मेरा प्रश्न यह है कि जब आप श्री राधा रानी की पूजा प्रारंभ कर रहे थे तब क्या शिवजी और राधा जी दोनों की पूजा करते थे क्या उस दौरान किसी आंतरिक संघर्ष का अनुभव हुआ या आपकी भक्ति सहज रूप से आंतरिक संघर्ष का अनुभव हुआ पर पूजा नहीं करते थे आंतरिक संघर्ष का अनुभव हुआ कि जहा हम एकाग्र होते तो पहले देवाधिदेव महादेव क्योंकि पूर्वाभ्यास होता ना य
कोई खिलवाड़ थोड़ी है कोई असत अभ्यास थोड़ी था सब अभ्यास था तो फिर उसको भगवान शिव से ही प्रार्थना की कि आपने ही भेजा है आप ही इस मार्ग में लगाए हैं तो आप कृपा करके जिस मार्ग में लगाया उसे पुष्ट प्रदान कीजिए फिर वो धीरे धीरे धीरे धीरे लेकिन समय लगा मतलब वर्षों लगा ऐसा नहीं लगा कि आज श्री जी के जुड़े एकदम पूजा नहीं की पर आंतरिक मानसिक पूजा मानसिक अभिषेक मानसिक चिंतन हमारा होता था उस पर बहुत समय लगा बदलने में बहुत समय लगा और उन्हीं की कृपा से हुआ नहीं
तो असंभव था ब्रह्म ज्ञान के मार्ग में चलने वाला अहम ग्रह उपासक दासो हम की पद्धति में आना बहुत कठिन होता है ये भगवान की गुरुदेव की शिव जी की असीम कृपा से हीय हुआ है हमारी सामर्थ्य इसमें नहीं थी क्योंकि हमारा कोई परिचय नहीं था इधर का वही परिचय था तो जा पर कृपा न करे पुरारी सो न पाव मुनि भगति हमारी और एक गुपत मत सबई कहो कर जोर शंकर भजन बिना नर भगति न पावे मोर तो भगवान शिव की ही कृपा से प्राप्त हुआ और वही कृपा करके इसमें दृढ़ रति दिए हमारी सामर्थ्य नहीं थी उन्हीं की कृपा से सब हुआ है पर संघर्ष तो चला पूजा नहीं की जिस दिन से उन्होंने हमको श्री जी के चरणों में अर्पित किया उस से अर्ग दान प्रकट भी नहीं किया मानसिक जो चलता रहा उस पर संघर्ष चल और फिर कुछ दिन बाद ठीक हो गया समझ पा रहे पर श्रद्धा और विश्वास और भावना बराबर की है आज भी ऐसा नहीं कि इतना भी कम हो भगवान शिव के प्रति इतना भी जितना श्री जी के प्रति उतने शिव जी के प्रति है इतना भी अंतर नहीं क्योंकि सही आपको तो बताए शिव जीी ही श्री जी है आप
देवी भागवत में प्रमाण देख लीजिए भगवान शंकर ही जो रांग गंगाधर है वही गोरी प्रिया जो है और जो भगवती उमा है वही कृष्ण रूप में है हम एक बार ऐसे चर्चा की थी तो एक संत आए थे तो फिर प्रमाण लेकर नहीं आए थे जी पहले बैच में वो चर्चा की आपने अगले पाच मिनट बाद प्रमाण लेकर के आपने जो कहा था चार पांच श्लोक में देवी भागवत के तो उस समय हमने वो तो नहीं प्रमाण करके बोला था हमने तो अपने भाव में बोला था कि हमारे गंगाधर करपूर गौरम करुणावताराम वही गोरी किशोरी के रूप में विराजमान तब जाकर चित्त की पूर्ण एकाग्रता ऐसे हुई यह संघर्ष तो होता ही है क्योंकि सत चिंतन होता है उसको बदलने में बहुत समय लगता है म जीी यद्यपि आपको तो अनुभव होते रहते होंगे मजी अभी याद आती है पूर्व की जैसे जैसे अब विश्वनाथ जी का प्रसाद आया या ओंकारेश्वर का आया महाकालेश्वर का आया परल वैद्यनाथ जी का आते ही रहते जो वो आएगा तब फिर एकदम मतलब हदय सिथिल हो जाता है कि आपकी अपार कृपा अपार कृपा जी कभी आप कहते मैया बप्पा की तरह मतलब अब ऐसे नहीं
स्वाभाविक नहीं आएगा कोई आ गया काशी से ऐसे प्रसाद लेकर बिल पत्र ले फिर एकदम पुराना जैसे ना पुराना अभ्यास तो व एकदम जागृत हो जाएगा मन शिथिल हो जाएगा भगवान शंकर के प्रति भाव में मोहित शर्मा जी हिसार से राधे राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मेरे मन में आता है खूब दान पुण्य करूं पर मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है महाराज जी ऐसे जन है जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक दान पुण्य रुपया से ही थोड़ी होता है बच्चा दान पुण्य जो होता है ना वो भाव से होता है अब जैसे कभी किसी पशु पक्षी या मनुष्य को तुम्हारी शरीर सेवा की जरूरत हो आप सेवा कर दो बहुत बड़ा पुण्य हो जाएगा कभी कोई भूखा है तो रोटी दाल पवा दीजिए आपके पास जैसे कोई ठंडी से कांप रहा है अब आपके पास ये जाकेट है आप उतार के पहना दिए जरूरी नहीं कि हमारे पास रुपया हो तो हम दान करें नहीं हमारे पास चार रोटी अगर हमारे पास भाव है तो मैं आज भूखा रह जाऊंगा और वह चार किसी को पवा दूंगा ये सेवा बन गई ये पुण्य बन गया सुकृत बन गया धन की
आकांक्षा नहीं करनी चाहिए धर्म के लिए धर्म बहुत सूक्ष्म विषय बच्चा अपने को जितना मिला हुआ उसी से महान धर्म हो जाएगा भगवान प्रसन्न हो जाएंगे एक महाभारत में प्रसंग आता है कि एक नेवला आधे स्वर्ण का शरीर था और भगवान श्री कृष्ण और युधिष्ठिर जी के पास से से निकला और कहा मुद्गल ऋषि की सतुवा यज्ञ के सामने आपकी राजस यज्ञ बेकार है भगवान ने कहा नेवले तुम ऐसी निंदा कैसे कर सकते हो राजस यज्ञ की बोले प्रभु एक मुद्गल नाम के ऋषि है जिनको आप जानते हैं और वो शिलो च
वृत्ति से जीते शील उंच शील कहते हैं जो किसान लोग खेत काट लेते हैं उसके बाद जो बाली या दाना पड़ता है उसको बीनना सीला बिन्ना कहते हैं सील कहते हैं और उंच कहते हैं जो बाजार में अन्न जहां बिकता है वहां व अपने सब ले गए जो दाने पड़े हुए हैं उनको चुन लेना उसे लोच वृत्ति कहते हैं और उससे किलो दो किलो 4 किलो होता होगा तो उसे पिछवा लेते थे सतुआ बनाकर और रोज थोड़ा चुटकी भर पाल ते 12 महीने ऐ से रहते थे तो बोले एक दिन वह सतुवा पिसवा के 12 महीने के लिए रखा उतने मेंही आ गए अतिथि रूप में भगवान तो वह इतने भूखे थे कि उनके पास जो दो चार किलो सतुआ था सब खा गए अब साल भर उनको भूखा रहना पड़ेगा मुद्गल ऋषि को तो जल पिलाया व बोले भगवान की बड़ी कृपा आज हमारा पेट भर गया तो वहां जो सतुआ के कण पड़े थे तो नेवले ने कहा मुझे भूख लगी थी तो मैं उस कण को पाया जही निकला तो मैं आधा सोने का हो गया तो मैं सोच रहा था यु दिष्ट जी की बहुत पूण्य यज्ञ हो रही है तो जाऊंगा पूरा स्वर्ण का बन जाऊंगा लेकिन सब जगह लौटा कहीं इसका मतलब
मुद्गल ऋषि की सतुवा यज्ञ से बढ़कर तुम्हारी राजस यज्ञ नहीं है समझ रहे हो युधिष्ठिर की राजस यज्ञ और मुद्गल ऋषि की सतुवा यज्ञ तो सतुवा यज्ञ की जय हुई राजसी यज्ञ उतनी बराबरी नहीं कर सकी गरीब अगर एक रोटी भी दे देता है ना किसी को उसका बहुत बड़ा भंडारा माना जाएगा और बेईमानी से कमा के लाखों को भंडारा करे तो उसे भंडारा नहीं माना जाएगा तो धन के लिए चा मत करो धर्म के लिए धन की चाह नहीं है सत्य और निष्ठा की चाह है धर्म के लिए सत्य और निष्ठा की चा हमारे पास भगवान ने जो दिया है उसी से हम धर्म करेंगे हमें धन की चा नहीं करनी चाहिए नहीं धन की चा फिर हमें पुण्य की जगह पाप मिले जाएगी जितना धन की चाह बढ़ती जाएगी उतना ही पाप बढ़ता चला जाएगा क्योंकि फिर हम निर्णय नहीं कर पाएंगे धनाम हो जाएंगे हम निर्णय नहीं कर पाएंगे कि धन सही है कि गलत है 100 रप धर्म से कमाओ रप फिर दूसरों की सेवा में लगा दो यह तुम्हारा धर्म बन जाएगा और बेईमानी घूस और पापा आचरण का पैसा जहां जाएगा वहां बुद्धि भ्रष्ट कर देगा और पाप ही कराएगा
पुण्य तो हो ही नहीं स पाप के पैसे से पुण्य नहीं हो सकता धर्म द्वारा कमाए हुए 00 रप से 10 निकाल दो गौ से सेवा संत सेवा भिक्षु कों की सेवा बीमार की सेवा वह बात मान गए लेकिन ऐसा नहीं पापा आचरण करो इसलिए बहुत धन की आकांक्षा ना करें धर्म की आकांक्षा करें तो धर्म से जो धन आएगा वो मंगलमय होगा समझ रहे बच्चा मरजी अधर्म आचरण से धन कमा लिया आपकी वाणी सुनकर आज से प्रेरणा हुई कि नहीं कमाएंगे तो आपने बोला जहां वह धन जाएगा वहां दुर्गति करेगा तो फिर ऐसी स्थिति में वो धन का क्या करें या किसी गौशाला हां गौशाला में दे दे गौओ की उस सेवा में दे दे या बीमारों की सेवा में दे दे साधु महात्माओं को कदापि ना दे क्योंकि उनका जीवन नष्ट हो जाएगा उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी अच्छा गाय भगवत स्वरूप है और जैसे बीमार लोग है औषधि ले रहे हैं तो संसारी जन है उनका कोई एकाग्रता से तो लेनदेन है नहीं और संत का एकाग्रता से लेनदेन है अगर भोजन गलत हो जाएगा तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी भजन नहीं होगा वही सुआई देगा संसार के भोग वासना
प्रपंच यहां तो आपने एक बार बोला था कि कुछ ऐसी जगह भी दे सकते जहां आपको यश की प्राप्ति ना हो मतलब आप जैसे मान लो बहुत से ब्रजवासी और संतों की सेवा होती रहती है आप जाओ चुपचाप दे दो जा करके काम हो जाए और यह गलती मानो कि आगे हम पाप नहीं करेंगे लेकिन संतों को डायरेक्ट नहीं देना चाहिए पाप का कमाया हुआ धन संतों को नहीं देना चाहिए नहीं तो निश्चित उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो ग तुम्हें डबल पाप लगेगा क्यों और क्या वह भजन कर रहे हैं उनके भजन में विघ्न डाल दिया तो तुम्हें पाप नहीं लगेगा तो इसलिए पाप के धन से तो कभी पुण्य हो ही नहीं सकता उ प्रश्चित है जैसे आप दे आए गौशाला बीमार वो प्रश्चित है तुम्हारे पाप का पुण्य नहीं बनेगा पुण्य तो बनेगा धर्म से कमाए हुए धन के द्वारा ऐसा हो तो फिर क्या है ऐसा नहीं है अवश्य में भोग तव्य कृतम कर्म शुभ शुभम शुभ और अशुभ कर्म दोनों भोगने पड़ेंगे इसलिए बहुत संभल के चलना चाहिए शास्त्र में धर्म का कमाया हुआ रुपया उसमें रुप किसी को कर सकते हो ऐसा लिख राधा राधा राधा राधा राधा राधा
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा राधा
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
संबंधित
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1400 — श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान…
- भगवत् मार्ग पर चलना चाहते हैं, पर हर दिन असफल हो रहे हैं। — आस्था बोरा जी जयपुर से श्री हरिवंश महाराज राधे-राधे महाराज जी 2 साल पहले जब आपको सुनना शुरू किया तो जानना हुआ कि हम कितना अज्ञानता और अंधकार में जीवन जी रहे हैं। आपको सुनने से यह…
- भगवान मिलेंगे या नहीं कैसे पता चलेगा? — भगवत दर्शन का सर्वोत्तम उपाय क्या है? भगवान के दर्शन करने का सर्वोत्तम उपाय क्या है? भगवत दर्शन का सरल और सर्वोत्तम उपाय दिन रात उनके नाम का जप करो और एकांत में रो भगवान मिल जाओ।…
- अगर एक नाम का इतना बड़ा फल है, तो निरंतर नाम क्यों जपें? — निखिल जी मुंबई से राधा वल्लभ श्री हरिव श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी एक नाम का फल पूरा त्रिभुवन से भी बड़ा है तो फिर निरंतर नाम जप क्यों कहा जाता है क्योंकि एक नाम जिसको कहा…
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1399 — जय प्रकाश प्रजापति जी गौरव जी गुरुदेव भगवान आपके चरणों में प्रणाम महाराज जी पिछले दो सालों से प्रतिदिन आपको सुन रहा हूं नाम जप भी कर रहा हूं परंतु कुछ महीनों से संसार की बनावटी…
- जिसका लक्ष्य भगवत् प्राप्ति होता है उसके क्या लक्षण होते हैं? — रस शेखरी शरण जी वृंदावन से महाराज जी जिसका दृढ़ लक्ष्य भगवत प्राप्ति हो गया है उस साधक के क्या लक्षण है नारायण हरि भजन में पांचो न सुहात विषय भोग निद्रा हंसी जगत प्रीत बहु बात ये…