एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #788 · 13 जनवरी 2025
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी भगवान के प्रतिकूल कोई भी आचरण बन जाए तो काफी दिन तक जलाता रहता है उसी दौरान हमें फिर गिरा देता है सही मार्ग पर चलते हुए भी नाम जप करते हुए भी 20 2 दिनों बाद मन में जोर की वासना उत्पन्न होती है और कई दिनों तक वो जलाती है फिर गिरने का भय बना रहता है मानते हैं पर अभी इतना नाम जप नहीं हो रहा कि वासना को काट दे अभी इतनी जोर की उपासना नहीं हो रही कि वासना को काट दे इसलिए उपासना को और बढ़ाओ अभी विपक्ष जोरदार है
हमको गिरा रहा है हमको थोड़ा और नाम जप का बल सत्संग का बल पवित्र भोजन का बल पवित्र आचरण का बल तो हम निकल जाएंगे जी व करते हैं ना जब लेकिन शुरू में अभ्यास अनुभूति अच्छा अच्छा उसके बाद फर नहीं शुरू में क्या अनुभूती हो तो भगवान कृपा करके हर जीव को थोड़ा बानगी भेजते हैं अपनी तरफ से जैसे किसी को चाय का नशा डालना हो तो 10 पाच चाय फी पिला दो 10 पा दिन इसके बाद व अपने आप नशेबाज हो जाएगा तो भगवान जब जीव पर कृपा करते हैं तो जहा प्रारंभिक भजन हुआ तो उसको आनंद आने लगता है व समझता है मेरी साधना से आता है नहीं फिर छोड़ देते हैं अब चलो अब उसके पास पास इतना मटेरियल नहीं कि वो ऐसा आनंद ले सके तो हमको बढ़ाना चाहिए भजन बढ़ाना चाहिए भजन बढ़ाओ और देखो मटकी में एक भी छेद हो तो मटकी पूरी भरेगी नहीं छेद बंद कर दो एक एक बूंद डालो एक दिन व भर जाएगी थोड़ा थोड़ा भजन भी हम करेंगे ना तो एक दिन भजना नंदी बन जाएंगे हम पर गंदे आचरण करें हम पाप आचरण करें तो ठीक नहीं है अब हम कैसे बता बड़ा समस्या आ रही है मोबाइल की यह
बड़ा सद्गुणी भी है बड़ा दुर्गुण भी है मतलब सौ भरी जी ने यही वृंदावन की बात है मछली को मैथुन करते देखा तो मन उनका चंचल हो गया मछली के मैथुन सुख को देखकर शभरी जी का मन चलायमान हुआ और राजा मान धाता की 50 पुत्रियों से ब्याह किया और तुम मोबाइल में स्त्री पुरुषों का संसर्ग दोष देखोगे गंदी बातें देखोगे तो कैसे साधना में चल पाओगे भगवान और अध्यात्म में तो बड़ा कठिन है फिर इसलिए हमारी प्रार्थना बच्चा कि पवित्र भोजन पाओ ब्रह्मचर्य पर ध्यान दो जब ब्याह हो जाए तो बात अलग है यह बात समझो गृहस्ती में हो तो भी संयम से चलो और जब तक ब्यान हो तब तक तो ब्रह्मचारी ही रहना चाहिए पहले हमारी भारतीय जो संस्कृति में पद्धति थी बहुत सुंदर थी चाहे राजकुमार हो चाहे गरीब का लड़का हो सबको गुरुकुल भेजा जाता था तो वहां 20 22 तक पढ़ लिख के पूरे योगी बन कर के जब गृहस्थी में आते तो योग की भूमिका थी तो भोग उन्हें परास्त नहीं कर पाते थे 20 2 वर्ष भोग में रहे फिर योग में जाकर परमात्मा प्राप्ति कर लेते थे अब बचपन से भोग में
योग का मतलब में नहीं रह गया मोबाइल है पूरा सर्च किए सब गंदी गंदी बातें 12 12 13 13 वर्ष के बच्चे बच्चियां गंदगी का शिकार हो रहे हैं गंदी वासनाओं का शिकार हो रहे कैसे उन्नति को प्राप्त होंगे ना लौकिक उन्नति लायक रह जाते हैं ना अलौकिक पारलौकिक इसलिए नाम जप करो और सत्संग सुनो और गंदी बात जब करने का मन करे तो सोचो मैं नहीं करूंगा मन परेशान करने टहलने लगो सत्संग सुनने जोर जोर पुकारने राधा राधा राधा आपको लाभ मिलेगा बहुत ठीक से चलो ठीक है सुनील कुमार जी
नोएडा से स्वामी जी आपके चरणों में सतत नमन स्वामी जी जप करने की प्रक्रिया में कभी भक्ति का भाव आता है कभी जप स्वास के उतार चढ़ाव के साथ जुड़ जाता है और कभी सिर्फ शब्दों पर ध्यान रहता है और कभी सिर्फ अर्थ पर जप में एकाग्रता के लिए क्रमबद्ध मार्ग क्या अपनाए मार्ग जैसे चल रहे हो ठीक चल आगे खुद एकाग्र हो जाओगे अभी करते रहो जैसे चल रहा है ना किसका प्रश्न है जैसे चल रहे हो ठीक चल रहे हो इसी में लगो चाहे अर्थ का ध्यान करो चाहे मंत्र का ध्यान करो चाहे नाम
का ध्यान करो या कभी विषयों में भी मन चला जाए तो नए साधक की यही स्थिति रहती है जब गाढ़ स्थिति हो जाएगी तो बात अलग हो जाएगी जैसे चीटा गीले गुण में फस जाए ना तो सिर्फ मरेगा और कुछ नहीं ऐसे ही जब नाम में मन फसे तो मरेगा मन का मरना का मतलब होता चंचलता त्याग निर्विक भगवता आनंद में डूबना एक ऐसा नशा है एक सेकंड छोड़ो तुम क्या बात कर रहे हो क्या कोई मतलब नहीं जैसे हम सुसुप्त में होते ना सोने में पता नहीं होता कि कौन क्या ऐसे गाढ़ एकाग्रता में होता है ़ एकाग्रता शांत बैठे अंदर चिंतन चल रहा है इसका अभी जो चल रहा है ठीक है इसमें कोई त्रुटि नहीं आप ऐसे चलिए आचार्य अनिल जी वृंदावन से महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मेरी जिज्ञासा है कि प्रभु की विशुद्ध प्रेमा भक्ति के लक्षण क्या है और क्या प्रभु की भक्ति करते करते किस स्थिति में आचार विचार गड़ हो जाते हैं क्या भगवान की विशुद्ध भक्ति प्रेमा भक्ति प्राप्त होने पर नियम आचार विचार जरूरी होते हैं व तो स्वभाव बन जाता है उसका जो साधन काल
में किया जाता है स्वभाव बन जाता है पहला प्रश्न क्या है महाराज जी विशुद्ध भक्ति के लक्षण क्या है विशुद्ध भक्ति का देवर्ष नारद जी वर्णन करते हैं तद पिता अखिला चरिता तद विस्मरण परम व्याकुल तेते जितने भी आचरण है तद अर्पिता भगवान के अर्पित हो श्री कृष्ण अनुकूलन प्रतिकूल विसर्जन आराध्य देव भगवान श्री कृष्ण के अनुकूल हो प्रतिकूलता का त्याग हो भगवत विमुख भगवत प्रति एक भी आचरण नहीं होने चाहिए समस्त आचरण श्री कृष्ण के अनुकूल होने चाहिए तद पिता अखिला चरिता और वह सब आचरण वह सब कर्म भगवान को समर्पित होने चाहिए यह तो कर्म परंपरा लेकिन निरंतर इसमें स्मरण भी चलता रहे मामन स्मर युद्ध जैसे तो निरंतर स्मरण चलता रहे अगर जरा भी मिनट भर के लिए वो भगवान को ऐसा लगा भूल गए क्या तो जैसे मछली को जल से बाहर निकालो तो तड़पने लगती है ऐसे व तड़पने लगता है त विस्मरण परम व्याकुल विस्मरण मात्र होने से परम व्याकुलता होती है त्रिभुवन की राज लक्ष्मी देने पर भी जो आधे पल के लिए अपने प्रभु का स्मरण ना छोड़े वह महा भागवत दूसरी
बात हमारा सदैव मन विषयों की तरफ जाता रहता है संसार प्रिय लगता है भगवान अपरिचित से लगते हैं संसार की प्रियता को काट कर के और भगवान की प्रियता प्रकट करें भगवान की कथा में सामर्थ है रत्नावती जी एकदम सांसारिक रानी थी और दासी के मुख से बिहारी जी की चर्चा गोविंद चर्चा सुनकर महा भागवत बन गए मथुरा की ब्राह्मण पत्नियां प्रमाण है कि केवल कथा मात्र से भगवत प्रेम को भगवत साक्षात्कार को प्राप्त किया पहला है अपने समस्त कर्म भगवान श्री कृष्ण के अनुकूल हो प्रतिकूलता का त्याग हो दूसरा है इतना स्मरण में तन्मय रहो कि थोड़ा सा भी विस्मरण होने पर परम व्याकुलता आ जाए तीसरा भगवान की कथा सुनने में और भगवान की चर्चा करने में अत्यंत अनुराग हो कथा सुनते सुनते या कहते कहते जब स्थिति आ जाए गदगद कंठ नयन बाह नहीं रा आंखों से आंसू बहने लगे कं गदगद हो गया अब कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रह गई यह कथा का फल मिल रहा है उसको छिन छिन रुदन करं छिन गावत आनंद भरी छिन छिन हार हसत ये जो कृपा वो अपने प्रभु की लीलाओं का चिंतन
करके गाकर कभी रुदन करता है कभी वह शांत हो जाता है कभी वह नाचने लगता है कभी वह गाने लगता है उसकी लोक लज्जा और वेद रीति इसके ऊपर स्थिति होती है प्रेमी की वेदा न सस्ती सा केवलम अवन अनुरागम लभते तो तीसरा भगवान की कथा में अत्यंत अनुराग होना बावर सो रस में फिरे खोजत नेह की बात अपने प्रेमी प्रभु की बात सुनने को मिलेगी ऐसे बावरा सा घूमता कहां है की चर्चा कहां सत्संग होता है ये उसकी भूख रहेगी चौथा अपने प्यारे के श्री अंग सेवा की भावना होना प्रेम प्राप्त करने के लिए अपने प्रभु के श्री अंग से तो हम प्रभु की प्रतिमा विराजमान करें या प्रभु की छवि विराजमान करें और मंगला से लेकर सय तक हमसे जितना बन सके हम प्रभु की सेवा करें बिना भोग लगाए पानी भी ना पी भगवान को अपने इष्ट को जो भोग लगाए वही पावे पांचवी बात अपने प्रीतम के जो लीला विहार स्थल है बड़े भाग्यशाली है जो उनमें वास करने को पाते हैं और जिनको वास करने का सौभाग्य नहीं मिला उसका रोज चिंतन करें जैसे वृंदावन की परिक्रमा बिहारी जी के दर्शन सत्संग तो ये
सब दिमाग में भर ले जाए और बाहर इसका चिंतन करें वृंदावन रोज आवे भावना से रोज वृंदावन की परिक्रमा लगावे रोज वृंदावन के संतों का दर्शन करें बिहारी जी के दर्शन करें यमुना जी का दर्शन करें तो धाम चिंतन लीला स्थली हों का चिंतन ये उसके हृदय में प्रेम अंकुरण उदय करता है अब सावधानी की बात कम बोलना मृदु उचित सत्य भगवत संबंध से युक्त बोलना येय मौन से भी ज्यादा श्रे उचित भाषण मौन से भी ज्यादा श्रेष्ठ है कम सोना पाच घंटे छ घंटे जो ले ले लो इसके अलावा नींद नहीं आनी चाहिए माला में बैठे हो नींद आ रही है पाठ में बैठे हो नींद आ रही है और अल्पाहार कम भोजन करना कम सोना कम बोलना कम भोजन करना इतना कम भी ना हो कि भोजन का चिंतन हो युक्ता आहार विहार से इन तीन का सुधार और कभी किसी की निंदा ना सुनना ना करना अगर भगवत भक्ति प्राप्त करनी है तो कुछ विधि है कुछ निषेध है यह निषेध वर्णन करने कम बोलना कम सोना कम खाना किसी की भी निंदा ना कानों से सुनना ना वाणी से बोलना अपनी निंदा सुन कर के आनंदित होना अपनी प्रशंसा सुनकर
दुखी हो जाना दूसरे की ना निंदा सुनना है ना करना है हमारा जीवन भगवान के आश्रित है य हर समय चिंतन करना हमारा तन हमारा मन हमारी वाणी और स्वयं में भगवान के चरणों के आशित हो फिर हमारे जो ग्रंथ है उनका स्वाध्याय करने का नियम रखना जैसे मानो स्वामी जी महाराज के तो फ केली माल जी रोज पाठ होना चाहिए हित जू महाराज चतुरा जी सुधा निधि रोज पाठ होना चाहिए क्योंकि आचार्य वाणी गुरु ग्रंथ जो अपनी परंपरा के आचार्य के अगर उनका स्वाध्याय नहीं होगा तो फिर बात नहीं बनेगी उनका गान करना य वृंदावन रस है इसमें गान की बहुत महिमा है पदों का गायन करना मंजीरा नहीं आता तो ताली से गाते हुए प्रभु के जो पद है लीला विहार के व वो गए और 24 घंटे में रात्रि में सोते समय अपनी दिनचर्या को प्रात काल से लेकर के जांचे कि प्रभु के विरुद्ध क्या भाषण हुआ क्या दर्शन हुआ और क्या आचरण हुआ और फिर उस त्रुटि को लिखे अपनी डायरी में और उस पर ध्यान दे कि यह गलती नहीं होनी चाहिए फिर हो जाए तो फिर हम प्रश्चित ले कि एक दिन भोजन नहीं पाएंगे दो
परिक्रमा वृंदावन की लगाएंगे इस गलती की वजह से आपका जीवन पूरा भक्त में आ जाए और जो बाह लक्षण इसमें कोई मान्यता नहीं रखते व तो नाटक में भी किए जाते हैं आंतरिक लक्षण भक्त का प्रकट होता है कि बिरह क मंडल कर लिए बैरागी दो नैन मांगत दरस मधु छके रह अंदर से ऐसा विराग पैदा हो गई कि संसार अच्छा नहीं लगता नेत्र कहीं टिक नहीं रहे मन जो है व व्याकुल है कब देखू दरस बिन दुखन लागे नैन जब से तुम बिछड़ प प्यारे कब न पायो चैन दरस बिन दुखन लागे विरय कमंडल कर लिए बैरागी दो नैन मांगत दरस मधुकरी छके रहत दिन छ के घूमत रहे तन को तनिक न भान नारायण दृग जल भ यह प्रेम पहचान पी मूरति ननन बस तेही रस राय समाय ये लक्षण सुनि प्रेम के और न कछु सुहाय और न कछु सुहाय फिरे अपने रस मातो कुटुंब देहते जाए छूट सभी विधि नातो जहां जहां पी की बात सुने खोजत तिन गन हित ध्रु छिन छिन ले प्रेम जल भरी भरि नैनन प्रिया प्रीतम की रूप माध ऐसी नशा चढ़ा कि अब कुछ नहीं सुहाए दे कुटुंब ते जाए छूट सही विधिना तो हा कृष्ण हा प्रिया हा कृष्ण
प्रिया ऐसे हृदय में उठने लगे जान ले कि भगवान का प्रेम आ गया है वैष्णव जनों के अपराध से बचे निरंतर नाम जपने का अभ्यास करें और जितनी चर्चा की इसको दोबारा सुन कर के अपने दिमाग में धारण कर ले पक्का व महा प्रेमी भागवत बन जाएगा पक्का महा प्रेमी भागवत बन जाएगा राजू सैनी जी इंदौर से जय श्री महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी हमारा मार्गदर्शन करें कि आत्मा तो परमात्मा स्वरूप है वह निर्लेप है नित्य शुद्ध अजर अमल अविनाशी चैतन्य मय है और मन तो शरीर छूटने के साथ यही मर जाता है नहीं नहीं नहीं किसने कहा किस ग्रंथ में लिखा है किस ग्रंथ में लिखा है मन मानी थोड़ी बोल सकते हो किस ग्रंथ में लिखा है कि मन यही मर जाता है यही रह जाता है सारा खेल मनक तो है आत्मा चिदानंद अविनाशी है वह कोई और नहीं आप हो अपने को भूलकर मन में तदा आत्म करके देह में तदा आत्म करके विचरण कर रहे हो तो दुर्गति भोगनी पड़ेगी अजन्मा होने पर भी जन्म का दुख होगा अविनाशी होने पर भी मरने का दुख होगा आप्त काम होने पर भी कामनाओं
से जलो समझ में आ रहा है मन थोड़ी मरता हैय मन का मतलब होता है सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर ढांचा छूट जाता है और जैसे आप शयन किए ना सुषुप्ति में तो स्थूल शरीर तो पड़ा रहता है आपको ज्ञान नहीं रहता लेकिन स्वप्न में आपका एक शरीर और होता है होता है ना जिसमें हम दुख सुख स्वप्न में देखते हैं और यह स्थूल शरीर तो पड़ा रहता है तो हमें दुख सुख होता है ना स्वप्न में जब हम जगते तब वो मिथ्या होता है लेकिन उस समय तो अगर कोई चाकू मार रहा है तो मार रहा है जो सपने सिर काटे कोई बिन जागे दुख दूर ना होए उस समय तो दुख हो रहा था ना तो क्या दुख था क्या क्या सुख था क्या ना होने पर भी हो रहा था ऐसे ही यह शरीर यहां छूट जाता है मन बुद्धि चित्त अहंकार पांच गन इंद्रिया पांच कर्मेंद्रियां त्रिगुण मई माया के द्वारा जितने किए हुए कर्म प्रपंच है उन सबको लेकर नर्क या स्वर्ग जाता है वहां अपने कर्मों का फल भोगता है फिर शेष बचे हुए कर्म प्रारब्ध बनकर पुनः उसको देह प्राप्त होती मृत्यु लोक में 84 लाख योनियों में कर्म के अनुसार जिस
योनि में भेजा गया फिर ये चक्र चल रहा है पुनरपि जनन पुप मरणम पुनरपि जननी जठरे सनम इसी को मिटाने के लिए हमें मानव देह मिला है हम डटकर भजन करें भगवान का चिंतन करें तो हम इस माया चक्र को नष्ट कर सकते हैं अन्यथा नहीं दवी ष गुणमककुम की शरण में गुरु की शरण में होकर उनके द्वारा दी हुई उपासना में रात दिन नहीं लगाओगे रात दिन भजन करो तब तक ऐसे माया को खिलवाड़ दो चार माला घुमा लोगे तो माया से मुक्त हो जाओगे तुम भगवान के तो माया भी भगवान की मम माया दरया मम वां तो मेरा अंश है हमारे लिए कह रहे तो माया को क्या कह रहे म वो कोई दूसरे की माया नहीं भगवान की प्रचंड माया है भगवान का भजन करने से ही वो मुक्त देगी माया मुक्त हो जाओगे समझ पा रहे हो क्या कहना चाहते थे य कना गुरुदेव मन कोई ऑर्गन नहीं है जो मतलब वो तो शरीर के साथ शरीर नहीं नहीं नहीं नहीं नहीं नहीं नहीं नहीं बहुत गलत चिंतन है मन में आत्मा का तदात्मानं में कीना हुआ भरम सब दूर बाहर से कछु दित नहीं अंदर चमके नूर आपो त्याग जगत में बैठे नहीं किसी से काम
उनमें तो कुछु अंतर नहीं संत कहो चाहे राम वो भगवत स्वरूप हो गए जिन्होंने मन मारया हा मन अभी तो पूरा जिंदा है व ऐसे मन नहीं मरता भजन के बिना खूब डट के भजन करो नाम जप करो संतो का संग करो शास्त्र स्वाध्याय करो परोपकार करो इसी से आनंद की अनुभूति होगी सतेंद्र जी प्रयागराज म जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी कामना एवं यश कीर्ति रहित होने का सर्वोत्तम उपाय क्या है शरणागति भगवान की शरण में क्योंकि कामनाएं बिना संतोष के नष्ट नहीं होती बिन संतोष काम नशा ही अछत काम सुख सपन नाही कामनाए बिना संतोष के न नहीं होती और संतोष बिना विवेक के नहीं होता और बने विवेक बिना सत्संग के नहीं होता और सत्संग बिना भगवान की कृपा के नहीं मिलता मूल आया ना भगवान बिन सत्संग विवेक न होई और राम कृपा बिन सुलभ न सोए भगवान की कृपा से सत्संग सत्संग की कृपा से विवेक और विवेक की कृपा से संतोष संतोष से सारी कामनाओं का नाश दूसरी बात यश कीर्ति किसकी क्या है तुम्हारे पास जिसकी तुम यश कीर्ति चाहते हो ना तुम्हारा शरीर है ना
तुम्हारी बुद्धि है ना तुम्हारा धन वैभव है भगवान ने तुम्हें दिया है तो तुम किसका यस कीर्ति भगवान के यस कीर्ति गाओ भगवान की जय जयकार करो तो तुम्हारा अपने आप नाम होने लगेगा अगर अपना ऐसे चाहोगे तो नष्ट हो जाओगे य यस कीर्ति फसा के नष्ट कर देगी जितना यश होता है जितना प्रणाम नमस्कार वाहवाही होती उतने पुण्य नष्ट हो जाते और जहा पुण्य नष्ट हुए तो फिर साइड में हो जाता है पहले से प्रकाशित हुआ गु छप्पा की तरह हैलोजन की तरह एकदम जला और फ्यूज हो गया अगर नाम जब चल रहा भगवान की जय जयकार चल रही तो बिस्तरे सब जग विमल कीरति साधु संगति ना टरे बास वृंदा विपिन पावे श्री राधिका जो कृपा करे अपार सुख मिलता है भगवान का यश गान भगवान का नाम जब भगवान का गुण कीर्तन नाम कीर्तन यही आनंद तो अपनी यस कीर्ति क्या चाहोगे कौन बोले हमारा नाम हो जाए भगवान का नाम तो लोग लेते नहीं तुम्हारा नाम क्या लेंगे लोग सोचते हैं कि हमारा य नाम हो जाए कौन नाम का कहां नाम किसका नाम बड़े-बड़े सम्राट हो गए वैसे खंडहर पड़े तो भगवान का नाम जप
करके भगवत प्राप्ति कर लो यही खास बात लोग इतने अज्ञानी तक एक पंखा देते ना तो पूरा परिचय लिख देते उसम नाम पूरा मोबाइल नंबर मतलब ये सब अज्ञानी जन है अज्ञानी लोग नहीं जानते हैं भगवान ने देखो आपको सब कुछ दिया कहीं कुछ लिखा कितने कृपाल और हम भगवान के लिए कुछ दे तो अपना सब लिखा के टांग दे यही तो अज्ञान यही तो मूर्खता है राधिका शर्मा जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी मन में किसी भी चीज की दृढ़ निश्चय कैसे करें देखो जब तक भजन नहीं करोगे तब तक निश्चय करने की सामर्थ्य नहीं रहेगी दृढ़ प्रतिज्ञा सत्य निष्ठा शपथ का पालन करना ये भजन के बल से आता है जिनका भजन नहीं है तो शाम के कसम खाए सुबरे तोड़ दिए सवेरे कसम खाए शाम के तोड़ दिए दो चार दिन चली फिर चले ग हम नियम लेते हैं आज से ऐसा करेंगे दो चार दिन बाद खत्म हो जाता है पहले हमें खूब नाम जप करना चाहिए उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते सोते जागते नाम जब करोगे तब तुम्हारे हृदय में बल आएगा उस बल के द्वारा आप फिर नियम ले सकते हैं कोई भी नियम ले वो तभी निर्वाह
होगा जब आपके अंदर बल होगा आज से मैं ये नहीं करूंगा फि निर्वाह हो जाएगा अगर भजन नहीं है नाम जप नहीं है तो एक कसम खाते रहो करते रहो आप देख लो अपने जीवन में सब लोग चार दिन नियम चलता है फिर टूट जाता है अगर किसी का नियम ठीक चल रहा है तो किसी संत की कृपा है और वो भजन कर रहा है अन्यथा नहीं व फिर ड्रामा हो सकता है नाटक हो सकता है नियम का सच्चा नियम का निर्वाह तभी होगा किसी महापुरुष की संत की कृपा और वह स्वयं नाम जप करता है तो फिर सब नियम चल जाएंगे नाम जप
नहीं तो फिर संयम नियम केवल बातों में होते हैं आचरण में नहीं होते बातों में तो होते हैं प्रवचन कर लो खूब बढ़िया बढ़िया दूसरों को रिझा लो लेकिन आचरण में नहीं होंगे स्वयं आचरण नहीं होगा लेकिन सच्चाई से अगर चलना है कोई नियम लेना है तो उसके लिए पहले भगवान का भजन भगवान का आश्रय तब कोई भी प्रण तभी पूरा होता है राम प्रताप सुमिर पन रूपा अंगत जी के लिए आता है भगवान की महिमा का स्मरण करके पैर जमा दिया उठा तेरी सभा में कोई वीर हो तो मेरा चरण उठा दे यह बात भगवान का ऐसे नियम ले ले आज के बाद ये नहीं करूंगा आज से यह करूंगा ये तभी पूर्ण होगा जब भगवान का आश्रय और नाम हो किसका प्रश्न है आप समझ पा रहे हा भगवान का आश्रय नाम जप अश्विनी गर्ग जी पंजाब राधा राधा राधा राधा महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी एक संत एक कंत एक नाम एक ग्रंथ में अनन्य कैसे हो जब प्रेम का हमारे अंदर भाव आने लगता है या पिपासा आती है य ऊंची बात है ये ककरा वाली बात नहीं है ये डिग्री वाली बात है तब लगता है अपने प्यारे के
सिवा मैं किसी को देखूं ना हमारे य महाप्रभु हरिवंश चंद्र कहते हैं रसना कटो जो अन रटो निरख अन फूटो नैन श्रवण फूटो जो अन सुनो श्री राधा जस बन ये प्रियता में होता है जागृत स्वप्न सुषुप्ति स् फुरत में राधा पजत छटा वैकुंठे नर मति नान राधा बिना मैं चाहे जग रहा हूं तो राधा सो रहा हूं तो राधा और स्वपन में भी तो राधा मेरी आंखें फूट जाए जो स्वप्न में भी किसी और को देखना चाहे मेरी जबान कट जाए जो किसी और की बात करना चाहे मेरी मृत्यु का व आखिरी दिन हो जिस दिन मैं आपको भूल जाऊं कितनी जोर की बात कहे गई यह प्रेम में होता है साधन में नहीं होता यह प्रेम की बात है तो सांगोपांग उपास एक कंत एक पंथ एक ग्रंथ एक मंत्र यह तभी जब प्रेम प्राप्ति की लालसा हो जाती है कि अब नहीं मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई हा स्वप्न में भी कोई और नहीं जागृत स्वप्न सुसुप्त स् फुरत में राधा पदा छटा ये बहुत डिग्री की पढ़ाई की बात है हमें लगता है पहले हमारा यह लक्ष्य होना चाहिए कि संसार का चिंतन छूटे और
भगवान का चिंतन बने कभी देवी जी आ रहे ध्यान में कभी शिव जी आ रहे कभी राम जी आ रहे कभी कृष्ण जी आ आने दो संसार तो छूटा कभी राम राम जप रहे कभी शीष जप रहे कभी कृष्ण कृष्ण जप रहे तो संसार तो छूटा आगे जब बढ़ो ग तब व प्रेम की बात आएगी यह करने से नहीं होता यह होने से होता है प्रेम बहुत ऊंचाई की प्रेम गलि साकरी ता में दो ना समाए प्रेम में दो नहीं समाते प्रेम गली साकरी इस में अकेला ही होता है दो चार लेकर नहीं चला जा सकता तो राम तो फिर राम कृष्ण तो फिर कृष्ण राधा फ राधा पर वो ऊंचाई की बात है सबकी समझ में नहीं आएगी इसलिए हम सबको छूट देते हैं पहले संसार का चिंतन छोड़ो भगवान का चिंतन पकड़ो जो चिंतन बने म थोड़ी देर राम राम का फिर कृष्ण कृष्ण का फिर शिव शिव का तो है तो भगवान है हमारा संसार का चिंतन तो छूट रहा है हमारा मंगल तो हो रहा है इसके बाद प्रेम की बात लगाती है समझ रहे आप अरे प्रेम हो कैसे जा करने से तो होता नहीं तो कैसे होगा भगवान से रोने से गोस्वामी तुलसीदास जी कबीर दास जी रहीम दास जी
बड़े-बड़े संत महापुरुष एक बात कहते हैं अगर श्वास शवास में नाम जप चल रहा है तो दुविधा र है ना कोई स्वासा स्वासा नाम जपे दुविधा र अब जैसे नाम जप कर रहे हैं तो अभी प्रेम थोड़ी होगा करते करते जब होगा तो नाम जप करना नहीं पड़ेगा होने लगेगा फिर नाम जब होता है करना नहीं पड़ता और जब होता है तब प्रेम आ जाता है तो हमें नाम जप तो करना पड़ेगा यह जो कि एक कंथारिया यह प्रेम में होगी और यह प्रेम प्रकट करने के लिए भजन न सेनी प्रेम की जैसे हम सीढ़ी पर चढ़कर छत में
जाते हैं तो प्रेम रूपी ऊंचाई पर चढ़ने के लिए भजन सर्वोपरि है भगवान का नाम भगवान का गुण कीर्तन भगवान की सेवा भगवान के प्रेमी भक्तों का संग इसी से भगवान से और जब प्रेम होता है तो अनन्य होता आ जाती है फिर दूसरा नहीं मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो ना कोई यह अनन्य आ जाती है तो नाम जप तो करना ही पड़ेगा प्रारंभिक में हम जब तक नाम जप नहीं करेंगे तब तक हम चढ़ाई पर चढ़ ही नहीं सकते तो खूब नाम जप करो भगवन लीला कथा सुनो संतों का संग करो दूसरों को उपकार करो इसी से प्रेम जागृत हो जाएगा ठीक है पर यह क्रिया प्रेम के लिए नहीं हुई यह क्रिया हुई अनर्थ की निवृत्ति के लिए कि हम बिना किए कुछ रह नहीं सकते बिना किए रह नहीं सकते तो अगर हम सत क्रिया नहीं करेंगे तो गंदी क्रिया होगी तो प्रेम क्या नरक जाएंगे तो हम सत क्रिया के बल से असत क्रिया का त्याग कर दिया ज असत क्रिया का त्याग हुआ तो प्रेम अंदर जो हृदय में है वो प्रकाशित हो गया जैसे हम बहुत सुंदर सरोवर में गए प्यास भी लगी लेकिन पर उसकी हरी हरी काई है अब उसको ऐसे
हटा दे हम तो निर्मल जल है अगर दूर से देख के ऐसे चले आवे तो प्यास नहीं बुझेगी तो वो जो हटाना है प्रेम किसी क्रिया से नहीं उत्पन्न हुआ पानी तो पहले से था उसको हटाना ऊपर का ये जो माया कृत शवार लग गया है काई लग गई है यह हटाना है नाम जप करना सत्संग करना साधु सेवा समाज सेवा परोपकार इसके द्वारा हमारा माया मल हट जाएगा ज हटा प्रेम तो पहले से था प्रकाशित हो गया समझ पा रहे आप गुरुदेव जी ऐसे ना आप बोलते राधा नाम लिखो जी जब तो लेता हूं लिखा नहीं जाता मेरे से क्योंकि मन के बिना लिख नहीं सकते लिखो अब हमारे सामने लिखो अंदर आपके माथे पद लिख सकता हूं हा देखो देखो आपको लिखना आया पर ट टके रहना पड़ेगा इसमें टिकता नहीं आप लिख दो मेरे माथे प थोड़ा पक्का हो जाए तो करता हूं पर लिखा हु तो सोच लेता हूं पर लिखा नहीं जाता मेरे से आप लिख दीजिए ऐसे दिल पर माथे पर आज्ञा चक्कर में कि वो पक्का चप जाए अ कैसे कोई पन से तो लिखा र्जा से लिख दीजिए महाराज र्जा से आपकी र्जा बड़ी शक्ति ये जो वचनों से हम बोल रहे ना जैसे हम कह रहे
लिखो आप इसे मान लो तो आपको अभी देखो लिख र अभी देखो राधा नाम दिखाई दे रहा है कि नहीं दिखाई दे रहा बस अब ज्यादा देर इसमें टिकने के लिए हमें बार-बार अभ्यास करना पड़ेगा बार-बार मन जाएगा अलग हमको बार-बार इसी में घसीट के लाना है तो हम उबे ना एक मिनट दो मिनट लगा फिर थोड़ा मन को सहयोग दे दिया ऐसे जब फिर उसको लाए धीरे से घसीट के तो अगर हम थोड़ा-थोड़ा इसका अभ्यास दिलाएंगे तो यह धीरे धीरे एकाग्र होने लगेगा अभ्यास करते र उब एगा नहीं घबराइए नहीं उकता एगा नहीं
धैर्य पूर्वक धीरे धीरे धीरे धीरे शैली जी हिमाचल प्रदेश से महाराज जी नाम दीक्षा लेने के बाद गुरुदेव के कहे अनुसार नाम का ध्यान और सिमर कर रही हूं परंतु जैसे कि आप अपने सत्संग में फरमाते हैं कि नाम ध्यान और सिमरण से आनंद प्राप्त होता है पर मेरे साथ यह अवस्था हमेशा नहीं बनी रहती मेरा सिमरन भी टूट जाता है मैं ज्यादा से ज्यादा अंतर्मुखी नाम ध्यान अवस्था में रहना चाहती हूं गुरुजी इसके लिए मैं क्या करूं हां ठीक है अभ्यास यही अभ्यास जो नाम का अभ्यास है यही आपको वहां परिपक्व अवस्था में पहुंचा देगा बस कार्य करना सीखो बिना कार्य के बैठ कर के भजन करने की बात गृहस्ती में ठीक नहीं है बर्तन माज रहे राधा रोटी बना रहे राधा झाड़ू लगा र राधा राधा कपड़े धो र राधा राधा जल्दी बाजी मत करो आराम आराम से क्योंकि दिन भर कार्य में लगाए रखो शरीर को बहुत आनंद मिलता है बहुत आनंद य हम अनुभव की बात करते बर्तन माज रर अंदर राधा राधा बढ़िया स्वक्ष बर्तन क्योंकि धैर्य है एकाग्रता है पवित्रता है तो हम बैठ कर के साधना नहीं
क्रिया रत होकर साधना करो गृहस्थ में क्रिया रत साधना है ऑफिस जा रहे हैं रास्ते भर में राधा राधा राधा ऑफिस के काम में बैठे तो भगवत सेवा की भावना से फिर अवसर मिला तो राधा राधा राधा रा गृहस्थी व्यवहार भगवान आध्यात्म दोनों को साथ लेकर चला जा और दोनों की पूर्ति हो जाएगी ऐसा नहीं है कि भजन नहीं हो सकता है तो हम निरंतरता में जहां छूटता है वहां देखें कहां छूटता है जैसे अपने देखा कि दो तीन जगह है जहां भजन छूट जाता है किसी से बात करो तो भजन में विक्षेप पड़ जाएगा या भोजन पा रहे हैं तो पड़ जाएगा या कहीं हमको शीघ्रता पूर्वक कोई कार्य करना है तो उसमें छूट जाएगा तो इन बातों की जगह हमें थोड़ा ध्यान देना हमें थोड़ा एकाग्र रहना है कि हमारा भजन ना छूटे तो राधा राधा राधा तो हम अगर पाच मिनट में भी एक बार राधा बोल दिया तो हमारा भजन का तार चल रहा है संसार के कार्य ऐसे हैं जिनको करना ही होता है और उनमें एकाग्रता नहीं रखोगे तो कार्य नहीं हो पाएंगे तो हम एकाग्रता के साथ भजन करते जाए और वो संसार का कार्य भी हो जाए
ऐसा नहीं कि भजन नहीं हो सकता निश्चित होगा और अभ्यास और बढ़ाइए अभी क्या है दीर्घ काल तक नाम जप करने पर हमारे पाप नष्ट होते हैं अंतःकरण की मलिन नष्ट होती है हमारी दुर्वासना भस्म होती तब आनंद आता है अभी धैर्य रखो धीरे धीरे बढ़ते जाओ भजन को बढ़ाते जाओ तो आगे आनंद का ही समुद्र है वो कोई बूंद थोड़ी है जो आनंद सिंध सुख राशि आनंद समुद्र है की कृपा से राष्ट्रीय कवि कैलाश होने मेरा नाम है मैं चार पंक्ति सुना सुना सुना कि जप रयो ब्रज को तो कण कण राधे श्याम ब्रज माही राधे नाम मन कुल भायो है मोर बन नाच श्याम कभी मन हार बन मोर बन नाच श्याम कभी मन हार बन राधिका को मुरली की तान सोर जायो है लेके अवतार प्रभु पापी को श्रृंगार कियो गिरी गिरि राज श्याम नख पे उठायो है और सूर संत मीरा रसखान ने बखान कियो सूर संत मीरा रस खान ने बखान कियो ऐो ब्रज धाम मेरे हिए में समायो है ऐो ब्रज धाम मेरे हिए में समायो है और एक आध मिनट को एक व्यंगात्मक छंद आपके श्री चरणन में पेश कर रहा हूं कि गोपि घेर लयो गोपि घेर लयो मोहन ठट कर
कि गोपने घेर लायो मोहन टोली कर तुमको बता व काना राधिका पसंद है कारो है स्वरूप तेरो बाब सो लागत है राधा रानी तो हमारी फूलों की सुगंद है पूछ के रहेंगे आज मन की तिहारी बात साची साची बते राध बोल का है बंद है और ऐसा तो जवाब देयो अद्भुत मोहन ने ऐसा तो जवाब देयो अद्भुत मोहन ने राधिका की प्रीत में तो बड़ो ही आनंद है राधिका की असल बा दो है ही नहीं वो कहने को दो है श्याम श्यामा राधा कृष्ण कहने को दो है रसोया परमानंद एक दुधा सदा श्री राधा कृष्ण रूपा भ्यम तस्य तस्मै नमो नमः वह परमानंद में रस परमात्मा अपने को दो रूपों में राधा और कृष्ण के रूप में वो खेल रहा है वृंदावन में अनु श्री जैन जी सागर मध्य प्रदेश श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी श्री जी और आपकी कृपा से नाम जप करने का निरंतर अभ्यास करती हूं जीवन में अनुभव भी कर रही हूं शांति का पूज्य महाराज श्री मेरे जीवन साथी जन प्रतिनिधि हैं और उनके साथ मैं भी जन भावनाओं के अनुरूप जन कल्याण के कार्यों के प्रति निष्ठा और शक्ति
से संलग्न रहती हूं मार जी बावजूद इसके जब कभी कुछ कार्यों के संदर्भ में कुछ लोग अनावश्यक निंदा करते हैं तो मन व्यथित हो जाता है यह जानते हुए कि हमारे बस में कुछ नहीं है हम कर्म कर रहे हैं पूज्य महाराज जी हर परिस्थिति में आनंदित रह और किसी की प्रति मन में कोई गलत भावना ना आए और ऐसी स्थिति में भी विवेक विवेक के द्वारा बचा जाता है ज हमारी कोई निंदा करता है हमारी गलती नहीं होती पहले जांचना चाहिए जैसे हमें कोई गाली दे रहा है निंदा कर रहा है तो हमें जांचना है कि मेरी त्रुटि तो नहीं है अगर त्रुटि है तो ठीक वो गाली दे रहा है अगर त्रुटि नहीं है फिर गाली दे रहा है तो हमें और आनंदित होना चाहिए वो हमारे अशुभ का नाश कर रहा है निंदक नियरे राखे आंगन कुटी छवाय बिना साबुन बिना पानी निर्मल करे सुभाय हमारे संतों ने तो कहा निंदक तू स्वस्थ रह तुझे कभी कोई कष्ट ना हो और स्वस्थ रहकर मेरी निंदा कर क्योंकि निंदा सुनने से पाप का नाश हो जाता है तो जो तुम्हारी निंदा करें उसमें पहले देखना है कि क्या निंदनीय कार्य
है क्या हमारे द्वारा जो कार्य होना चाहिए वह कार्य हम नहीं कर पाए अगर हमारे हाथ में है और हमने प्रमाद वश लोभ वश त्रुटि कर दी तो गाली सुनने से उसका मार्जन हो जाएगा और यदि हमारी गलती नहीं हुई तो फिर हमको प्रसन्न रहना चाहिए कि भगवान हमारे शारीरिक दंड को गाली के द्वारा निपटा रहे हैं ये आदमी निंदा करके हमारे शरीर को जो दंड मिलना था पूर्व हमारे द्वारा किया हुआ कर्म जो प्रारब्ध बन के आ रहा है उसको मिटा देगा पक्की बात समझो हम विवेक के द्वारा हर दुख से बच सकते हैं अगर हम विवेक नहीं लगाएंगे तो फिर हम दुखी हो जाएंगे और दुखी सुखी होना भगवान के भक्त का लक्षण नहीं है सुख दुखे समय कृत्वा लाभा लाभो जया जयो सुख दुख में समान लाभ हानि में समान मान अपमान में समान यही तो भक्ति का बल है नहीं तो संसार पुरुष में और भक्त में अंतर क्या है जब हमें 100 बार गाली दे और फिर हम उससे मिले तो वैसे ही मिले जैसे हम किसी प्रेमी से मिलते हैं और अब ठीक है तो आदमी य समझना पाए कि खोपड़ी क्या हैकी 100 बार इसको गाली दी फिर भी इसको
गुस्सा नहीं आता वैसे ही प्रेम से यह भगवान के भक्त का लक्षण है यह भगवान के भक्त में क्षमता होती है आप भक्ति कर ही रही हो तो विवेक के द्वारा उस समय हम अपने को बचा सकते हैं यदि हम विवेक ना लगाएंगे तो हम दुखी हो जाएंगे या फिर द्वेष कर बैठेंगे फिर द्वेष हो जाएगा फिर भक्ति का भाव ना रहकर वो संसार भाव आ जाएगा इसलिए विवेक के द्वारा हम अपने को बचाए उद्धव जी से भगवान ने कहा एकादशी स्कंद में दुष्ट प्रवृत्ति के लोग सत प्रवृत्ति वालों को बाधा पहुंचाते हैं तो हे उद्धव यदि व कभ तुम्हारे ऊपर थूंक दे तुम्हें मारे पीटे बांधे तो तुम अपने आत्म विवेक के द्वारा बचना बाहरी संयोग के द्वारा नहीं बाहरी कोई सहायता नहीं आत्म विवेक के द्वारा कि जैसे हमारी जबान हमारे ही दांत से कट जाए तो हम किको दंड देंगे हमारे हाथ से ही हमें गलती से चोट लग जाए तो हम किसको दंड देंगे ऐसे ही हमारा कोई कर्म उसको केवल निमित्त बना रहा है व निमित्त बनकर हमें दुख दे रहा है जिससे हमारे पापों का मार्जन हो रहा है हमें दुखी नहीं होना है विवेक
के द्वारा निश्चय कर ले तो बढ़िया बात हो जाएगी इसमें यह नहीं कि हम भजन करते करते ऐसी क्षमता को प्राप्त होंगे नहीं इसमें विवेक अभी विवेक धारण करो अभी बच जाओगे और दूसरी बात है यह तो कोई अध्यात्म से कोई फुटपाथ में पागल आदमी अगर गाली दे रहा हो तो हमें दुख नहीं होता है हमको इनको पागल ही मानना चाहिए बाल भूत विवस मतवारे ते नहीं बोल वचन विचारे तिनक कहा सुनी नहीं काना उनकी बात का से ऐसे उपेक्षा कर दो दो प्रकार से या तो विवेक के द्वारा सिद्धांत से और या तो व्यवहार के द्वारा पागल मान के कि सब पागल है अपनी वासनाओं से पागल है अपनी कामनाओं से पागल है इनकी कामनाए पूर्ति नहीं तो गाली देने लगे कामना की पूर्ति हो जाए तो वाहवा ही करने लगेंगे इसलिए ऐसे लोगों की बातें नहीं सुननी चाहिए राम कुमार जी हाथ रस से श्री श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी आप कह रहे हैं कि आपने किसी संप्रदाय से दीक्षा लिया है बालक अवस्था में ही मंत्र दीक्षा मिली थी तभी से स्नान के बाद एक माला प्रतिदिन होती
है ब्रजमंडल में रुचि और आपसी के सत्संग सुनने के बाद राधा नाम में प्रयासरत एक सत्संग में आप श्री के द्वारा अनन्य के विषय में सुनकर संशय हुआ जी विधि होए नाथ हित मोरा करहु सु वेगी दास में तोरा अनन्य के विषय में क्या सं रामानंद संप्रदाय के गुरु जी से दीक्षा ली थी अब ब्रजमंडल ब्रज दवार देरी आदर है तो निकटता रहती है आता रहता हूं और आपके तो राधा नाम जपता नंददास जी सदास जी के गुरु भाई थे और उनका चित्त ठाकुर जी में लगा तो वल्लभाचार्य जी के शिष्य होकर अष्ट
कवियों में है नंददास जी तो तुलसीदास जी ने पूछा नंददास जी से पत्र व्यवहार में कि हमारे राम जी में क्या कमी थी जो तुमने छोड़कर बंसी वाले को अपना लिया राम जी तो उन्होंने कहा पहली बात तो राम जी श्याम जी में अंतर नहीं है दूसरी बात य कि उनकी बंसी की ध्वनि सुनकर के लुट गए इसमें करें तो क्या करें बंसी की ध्वनि सुनकर लुट गए इसमें हम क्या करें तो राम जी श्याम जी में कोई अंतर नहीं है और अगर राधा नाम सुनकर लुट रहे हो ब्रज की महिमा सुनकर लुट रहे हो तो इसमें कोई दोष थोड़ी है कोई गलत थोड़ी है वही है दूसरे कोई नहीं है जो मिथिला में भगवान श्री राम से आसक्त हुई थी वही आकर गोपी बनी और श्याम सुंदर के साथ रास रचाया तो दंड काण की ऋषि भगवान की अजान बाव भुजाओं को देखकर गले लगाने की भावना की वही गोपी बने आके श्याम जी के गले लगे तो हमें यह देखना है कि हमारा चित्त वास्तविक क्या प्रियालाल की तरफ जा रहा है तो फिर भावना करने की राम जी की कृपा से श्याम जी के चरणों में हमारी प्रीति हो रही हमें ये मानना होगा उसमें कोई
संशय नहीं रखना चाहिए अगर संशय बात रखे रहोगे तो ना इधर चित् लग पाएगा ठीक से और ना उधर लग पाएगा है ना हां तो फिर दु चित कबो परितोष न ला दो जगह चि लगाने वाला आनंद को नहीं प्राप्त होता है तो प्रभु से प्रार्थना करो राम जी से कि एक जगह कर दो व सामर्थ साली अपने में लगा दो चाहे इधर लगा दो आप ही हो आप कृपा करो प्रार्थना करना भगवान से व अपने आप व्यवस्था कर देंगे अंदर की ठीक है मैं विधायक हूं राजीव कुमार सिंह बला से और मैं आपके दर्शन का इच्छुक था तो आज मैं छोटा सा जानना चाह रहा कि भगवत प्राप्ति का सरल साधन इससे मन एकाग्र होके नाम जप नाम जप यह कलिकाल मला यतन मन कर देख विचार श्री रघुनाथ नाम बिन नान आन आधार गोस्वामी तुलसी दा जी कह रहे कलयुग केवल नाम आधारा सुमिर सुमिर नर उतर पारा कृतम ध्या विष्णु ताया यजत मख द्वापर परिचर्या कलो तद धर कीर्तन भगवान का नाम कलयुग में सिद्ध साधन है भगवत प्राप्ति का जो राम राम नहीं बोल पाते थे मरा मरा बोले वह भगवान के परम पवित्र एकांतिक लीला चरित्रों की रचना करने वाले बन गए
अगर हम सीधे भगवान का नाम जप करते हैं तो नाम इतना सामर्थ्य शली है सुमिर पवन सुत पावन नामु अपने बस करी राखे राम भगवान को अधीन कर लिया अजत को जीत लिया तो हम उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते सोते जागते अगर हम राधा राधा राम राम कृष्ण कृष्ण बोल रहे तो हमें और किसी साधन की जरूरत नहीं इसी से एकाग्र हो जाएगा जैसे हम राम जप रहे ना तो हम लिखे राम अपने मानस पटल पर राम और अंदर उच्चारण कर रहे हैं और कान से सुन रहे हैं यही एकाग्रता आ जाएगी ध्यान सहित एकांतिक नाम
जप एकांतिक का मतलब अंदर से जप रहे माला लो या ना लो इससे कोई खास बात नहीं भगवान से कह दो तुम गिनो हम जप रहे हैं तुम गिनो और अंदर ही अंदर जपे अब जैसे अपने लोग राधा राधा तो देखो दिमाग में लिखो मन के बिना लिख नहीं सकते तो आजा लिखोगे राधा और उच्चारण करो अंदर से राधा मुंह बंद रहे और कान से सुनो राधा तो पूरी एकाग्रता ज्यादा देर इसमें टिकाया नहीं जा सकता जब तक अभ्यास नहीं हो और जहा अभ्यास दृढ़ हुआ तो उठते बैठते जैसे हम आपसे बात कर रहे हैं तो आपके चेहरे पर राधा राधा बात हम कर रहे हैं लिख रहे हैं तो हमारा नाम जब चल रहा है साथ में य नाम से बढ़कर कुछ नहीं है उठते बैठते चलते इसमें कोई नियम संयम नहीं है आप नहाए हो या ना नहाए हो आप अपवित्र हो या पवित्र हो अपवित्र पवित्रो सर्वा वस्तो पवा याम पुंडरीकाक्ष सवाया भतरा सुच व वाय और अभ्यंतर से दोनों से पवित्र हो जाता है जो भगवान का नाम स्मरण करता खूब खूब आनंद पूर्वक खू अच्युतानंद कुमार जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी आप कह रहे हैं कि
आप पढ़ाई करते हैं और आपके आगे चार चुनौतियां हैं एक है आध्यात्मिक नाम जप करना पारिवारिक जिम्मेदारी अध्ययन करना और ऑफिस का कार्य महाराज जी मैं चारों चीजों को बैलेंस नहीं कर पा रहा एक समय प एक ही कर पाता हूं कि काश मुझे नहीं देखो पहला है तुम्हारा नाम जब दूसरा है परिवार का पोषण तीसरा है अर्थ कमाने के लिए ऑफिस का कार्यक्रम हमें लगता है सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं परिवार का पोषण होगा अर्थ से अर्थ की कमाई होगी ऑफिस में अब इसको हम अगर राधा राधा करते हुए
काम कर रहे तो हमें क्या परेशानी है महाराज जी मैं अध्ययन भी करना चाहता हूं आईस की तैयारी करने के लिए मुझे तो जितनी देर आप अध्ययन कर रहे हैं हर पाच मिनट में एक बार राधा बोल कर के अध्ययन करते रहिए और तीन घंटे चार घंटे जो अध्ययन किया वो बाद में प्रभु को समर्पित कर दीजिए इससे भगवत प्राप्ति का कार्य पूरा होता रहेगा समझ रहे हैं ऐसे ऑफिस का काम जो एकाग्रता पूर्वक कीजिए बीच-बीच में राधा बोलिएगा और चार छ घंटे आठ घंटे ऑफिस का काम कीए और आठ घंटे व प्रभु को समर्पित कर दीजिए हे करुणामय भगवान मैं आठ घंटे से जो ऑफिस का कार्य कर रहा था वो आपको समर्पित करता हूं इससे भगवत प्राप्ति का योग बन जाएगा नाम जप करते हुए एकाग्रता पूर्वक पढ़ाई करते हुए एकाग्रता पूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करते हुए और कुछ ना कुछ अर्थ कमाने की चेष्टा करनी चाहिए ऑफिस में अर्थ मिलता होगा तो फिर उससे परिवार का पोषण होगा आपकी पढ़ाई का सहयोग होगा और बीच-बीच में नाम जप करते रहे समय को भगवान को समर्पित कर दीजिए जो आठ घंटे 10 घंटे या पढ़ाई
का समय वह सबके लिए है ये अपने समय को भगवान को समर्पित करते रहो इससे भगवत समर्पण कर्म हो जाएगा और वही कर्मयोग बनकर भगवत प्राप्ति करा देगा क्या जाता है मान लो आठ घंटे आप मेहनत किया आठ घंटे में एक मिनट हाथ जोड़ा हे प्रभु यह अमुक समय से लेकर अमुक समय तक जो मैं संसार के कार्य में रहा आपका विस्मरण किए रहा यह कार्य में आपको समर्पित करता हूं वह कर्म समर्पण योग बन जाएगा बीच-बीच में राधा राधा राधा स्मरण करते रहिए समझ में आ रहा है कोई समस्या नहीं महाराज मन में कभी कभ एक टीस रहता है कि जैसे कि स्टूडेंट लाइफ में थे महाराज तो आपके आशीर्वाद से राधा रानी के चरणों से माइनिंग इंज में गोल्ड मेड तो मन में लगता है कि अभी मतलब ये तो अनिश्चित चीज है अच्छा यही दो काम ठीक से करते हैं वो तो फिर मन में लगता है कि नहीं इतना अच्छा से उधर पढ़ाई किया अभी मने अभी अभी नहीं कर पा रहे थोड़ा सा पहले जैसा समय मिलता है स्टूडेंट मने उधर पीछे की तरफ दिमाग चला जाता है तो दिमाग चला जाए आप मत जाओ वापस आ जाएगा जहां हमारा मन ले जाए
हमको भूत की तरफ नहीं जाना भविष्य की ज्यादा चिंता नहीं करना वर्तमान को संभालना है तो भूत और भविष्य से दोनों पवित्र हो जाएंगे दोनों मंगलमय हो जाएंगे जो हम कहा इसे करके देखो आप ठीक है हां हम ये नहीं कह रहे कि आठ घंटे बराबर राधा नाम जप करो बीच-बीच में राधा राधा स्मरण करो और ऑफिस का कार्य भगवान को समर्पित करो पढ़ाई का कार्य भगवान को समर्पित करो जो अर्थ मिले उससे परिवार का पोषण करो सब समस्या का समाधान हो गया ठीक है परंतु गुरुदेव उससे ज्यादा बाप प्रकट नहीं हो पाता है ना जब तक हम उस चीज में चले ना उससे ज्यादा बाप प्रकट नहीं हो पाता ना जब नहीं पक्का प्रकट होगा करके तो देखो कितने दिन से कर रहे हो करता हूं कितने दिन से एक दो साल तो ये कोई समय हुआ अनंत जन्मों की बिगड़ी अगर हम कम से कम हमारी सदई भाषा में कहा जाता है 12 वर्ष एक नियम का पालन करो तब जाकर के तो समझ में आवे और अगर अभी प्राण निकल गए तो आप भगवत भाव से हो ना आपका हर समय भगवान को समर्पित हो रहा है वो आप उसे ऐसा खिलवाड़ मत समझे जो कर्म जो
वस्तु भगवान को समर्पित कर दी जाती है वो अक्षय अक्षण और भगवत प्राप्ति के योग्य हो जाती है अगर आपको फायदा ना मिला होता इस कर्म का तो तुम्हारी बुद्धि यहां बैठने के लिए पेरित ना करती दो वर्ष में इतना तो हो गया है कि आप सत्संग सुनना पसंद करते हैं आप साधु समाज पसंद करते हैं आप अध्यात्म की उन्नति चाहते हैं तो यह थोड़ी थोड़ी बात है माया ग्रस्त जीव अगर इतना चाह लिया है तो आगे की मंजिल पूरी हो जाएगी इसे आप खिलवाड़ ना समझे परंतु जैसे हम चाहते हैं कि भगवान की ओ ज्यादा लीन होए बट उसके लिए थोड़ा टाइम ज्यादा निकालना पड़ेगा नहीं टाइम नहीं निकालना है टाइम देना भगवान को पूरा देना और निकालना अलग है निकालने का मतलब होता सांसारिक कार छोड़कर के हम राधा राधा जपे बैठ के वो तो ऐसे निरंतर चलता ही रहेगा ट उसके लिए जब भाव प्रकट करना होगा जब अरे भाव प्रकट हो जाएगा फावड़ा चलाते हुए झाड़ू लगाते हुए कंप्यूटर चलाते हुए एकदम जब ये तुम्हारे कर्म समर्पण तुम्हारे पाप को नष्ट करेंगे ना तो साधारण से साधारण बात में तुम्हें
रोना आने लगेगा और तुम्हें वहां भगवान की कृपा दिखाई देने लगेगी चलो तो कुछ समय तक धैर्य पूर्वक चलो बीच-बीच में नाम जप करो और जो कर्म है व भगवान को समर्पित करो गंदी बात मत करना जब हम कोई अनुष्ठान करते हैं तो हमको नियम लेने पड़ते हैं तो जैसे आपको भगवत आनंद का नियम लेना है तो पहली बात किसी माता बहन की तरफ पाप दृष्टि मत रखो अगर यह करोगे तो फिर यह चलनी में गैया द है और दोष दव को दे बढ़िया गाय 10 लीटर दूध देती हो चलनी समझते हो ना चलनी मिले जाओ एक बूंद नहीं मिलेगा धूने के बाद आप क दो हमारे भाग्य में लिखा है नहीं नहीं पात्र सही रखो तो दूध टिक जाएगा अब आप यह भी करो और वह भी पाप कर्म करो माता बहनों की तरफ गंदी दृष्टि रखना कोई नशा करना गंदे बच्चों का संग करना गंदे दृश्य देखना गंदा चिंतन करना फिर नहीं बात बनेगी हमको समेटना है तो संसार के हर कार्य को भगवत में बनाना है क्योंकि बिना कार्य किए कोई रह नहीं सकता हमको भी तो करना पड़ता है कार्य नहीं करना पड़ता हम 12:30 11 बजे ऐसे जगते हैं अपनी दिनचर्या कर
रहे हैं अब यह आपके साथ बैठे हमारा कार्य है जैसे ऑफिस का कार्य है किसानी का कार्य ऐसे हम बाबा जी हमारा कार्य है तो हम अपने कार्य को सम्यक रूप से निस्वार्थ भाव से कोई कामना रख कर के नहीं भगवान की प्रसन्नता के लिए करते सब हो रहा है उनके सहारे हो जाओ उनको समर्पित करो अच्छे आचरण करो सब ठीक हो जाएगा थोड़ा समय तक दीर्घ काल लंबे समय तक कोई किसान आदमी खेती में अनाज बोता है दूसरे दिन थोड़ी काट लेता है छ महीने लगते हैं व सिंचाई उसको पौष्टिकता देते हुए फिर वह एक मन की जगह 40 मन अन्न पैदा करता है ऐसे ही आप थोड़ा अध्यात्म है थोड़ा इंतजार करो समय आने पर जब फलीभूत होगा तो आपको लगेगा कि हा कितना अच्छा है यह मार्ग तु जी पंजाब से ध महाराज जी सभी उन्हीं की इच्छा से हो रहा है तो उसका फल हमें क्यों भुगतना पड़ रहा है जब सब तुम अपनी इच्छा करना बंद कर दो तुम्ह भोगना बंद कर हो जाए किसका फल तो हां अपनी इच्छा बंद कर अपनी इच्छा से करोगे आचरण नका भोग तुम्हें भोगना पड़ेगा तुम भगवान की इच्छा से चल रहे हो कि अपनी इच्छा
से तुम्हारी इच्छा है मेरे को तो लगता है कि अंदर से जो भाव उठते है क्या भगवान की इच्छा मन मन मन है जब तक मन नहीं मर जाता भगवन को प्राप्त नहीं होता तब तक जीव को कर्म का भोग भोगना पड़ेगा अवश्य में भोग तव कतम कर्म सुभ सुभ कर्ता बनो तुम भगवान के ऊपर छोड़ दो तो फिर भोगना पड़ेगा ऐसा थोड़ी है अच्छा करोगे अच्छा भोगना पड़ेगा बुरा करोगे बुरा भोगना पड़ेगा और जब मन और अहंकार भगवान को समर्पित हो जाता है तो जीवन मुक्त हो जाता है फिर कोई पाप नहीं लगेगा पूरे विश्व का भंडारा हो जाए तो कोई उसे पुण्य नहीं मिलेगा कर्ता भाव रहित होना अभी तो कर्ता भाव से हो अभी कहां इस भाव में आ गए कि जो हो रहा है व भगवान की इच्छा से हो रहा है य भगवान विराजमान हो गए प्रकाशमान हो गए अब जो होगा सो तो उसके द्वारा कुमार्ग गामी प्रवृत्ति थोड़ी होगी और कुमार्ग गामी प्रवृत्ति नहीं होगी पाप नहीं होगा तो दुख ही नहीं मिलेगा कोई समस्या ही नहीं है फिर प्रश्न ही नहीं है क्योंकि भगवान के द्वारा हो रहा है तो मैं करता नहीं तो प्रश्न कैसा
समझ पा रहे हो आप हां तो ये अभी इस दलील से नहीं चलेगा तेरी सत्ता के बिना पत्ता नहीं हिलता तो फिर नरक भी उसकी इच्छा से बना है रोग भी उसकी इच्छा से बने पुलिस डिपार्टमेंट भी उसकी इच्छा से डंडे लगाएगा ये भी उसकी इच्छा है ये भी उसकी इच्छा है तो मतलब यहां चतुर तो चले गले एक बड़े विद्वान थे तो बड़ा उपवन लगाए हुए थे बगीचा कुआ बावड़ सब फूल सुंदर तो एक गाय चढती हुई अंदर आ गई तो शायद उनका मारने का उद्देश्य नहीं होगा क्योंकि धर्मार्थ थे तो उन्होंने एक पत्थर का टुकड़ा उठाया और ऐसे तो गाय के मस्तक में लगी और तुरंत गिरी और मर गई अब गौ हत्या प्रकट हो गई गौ हत्या सामने आए और कहा पंडित जी स्वीकार करो मुझे तुमने अभी गौ हत्या की बड़े विद्वान थे उन्होंने तुरंत देवराज इंद्र का वास हाथ में है जैसे चरणों में विष्णु का वास है अलग-अलग देवताओं का उनका देवराज इंद्र ने मारा क्योंकि हाथ में पत्थर और पत्थर से ऐसे य देवराज इद्र व गौ हत्या देवराज इद्र के पास गई तो इंद्र ने कहा हमने कब ग हत्या की बोले आपका हाथ में वास है
ब्राह्मण बोले शास्त्र में ऐसा वर्णन है तो आपको भोगना बोले चलो हमारे साथ गुप्त रूप से रहना वहां गए सेठ के रूप में बोले पंडित जी प्रणाम क्या सुंदर फूल लगे हुए हैं किसने लगाया बोले हमने वाह बहुत सुंदर य बगीचा है किसने लगाया हमने और ये कुआ हमने बोले गौ हत्या इंद्र ने चढ़ जा इसके ऊपर अच्छा काम किया तो हमने बुरा किया तो देवराज इंद्र ने ग हत्या को तुरंत उसको स्वीकार करना पड़ा तो देखो य चतुर नहीं चलेगी अहंकार जब तक भगवान में समर्पित नहीं होता तब तक यह बात कहने की केवल रहेगी पाप भी भगवान की सत्ता से होरहा अगर मानोगे तो नरक भी भगवान की सत्ता से डंडा भी भगवान की सत्ता से रोग भी भगवान की सत्ता से इसलिए होश में दो विभाग किए गए एक पाप कर्म और एक पुण्य कर्म पहले पुण्य कर्म करके पाप कर्मों का त्याग कर दो फिर पुण्य कर्म में कर्ता भाव का त्याग कर दो भगवान का नाम जप करो भगवान की प्राप्ति हो जाएगी राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राम
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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