जगतगुरु रामानंदाचार्य श्री वल्लभाचार्य जी ने महाराज जी से क्या चर्चा की ?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
अपनान किया स तो हमारा है कि आप सी का दर्शन हो है अरे महाराज जी आप दर्शन देने आए जो प्रभु मोही अनुग्रह की तुम श्री जी के बिना र जाए ऐसे ऐसा कौन सा उपाय पहला उपाय तो उनकी कृपा ही है य गुन साधन ते नहीं हुई तुम्हारी कृपा पाओ कोई कोई और दूसरा उपाय है अपने में सब तरह से असमर्थता आ जाना यह अनुभव में आ जाए सबे अंग गुण हीन हो ता को जतन न कोई एक किशोरी कृपा ते जो कछ होए सो होई सो कृपा सुलभ नहीं ता को कौन उपाय तो चरण शरण हरिवंश की सहज बन बना अपने गुरुदेव के
चरणों का दृढ़ आय और अपने में असमर्थता का शुद्ध शरणागति का स्वरूप है अजात पक्षा मातरम खगा जैसे छोटा सा बच्चा पंख नहीं निकले वो केवल मां की बाट जो होता है ऐसे हम केवल कृपा की बाट लाड लीज की लाडली जू बहुत कृपाल है ऐसा स्वभाव ऐसा महिमा में स्वरूप हमारे प्रभु अधीन है श्री जी के अधीन है हमारे प्रभु अनंत ब्रह्मांड के स्वामी शिव संका आद जिनके चरणों का ध्यान करते हमारी श्री जी के चरणों में महावर लगाते हैं हमारी श्री जी की महिमा तो प्रभाव तो ये है और स्वभाव अत्यंत करुणामय सहज स्वभाव पर नवल किशोरी जु को मृदु होता दयालुता कृपालु होता की रास है ने कहु न रिस कह भूल ह न होत सखी रहत प्रसन्न सदा हे मुखा ऐसी सुकुमारी प्यारे लाल जू की प्राण प्यारी धन्य धन्य धन्य ते जेल के उपास है स्वामिनी ज का स्वभाव स्वामिनी ज का प्रभाव तो हम उनकी बाट जो है कृपा की बाट जो है सिर्फ अनन्य चातक की भाति अन्य किसी कृपा को स्वीकार ना करते हुए केवल लाडली ज की कृपा जैसे गोस्वामी जी कह रहे बने तो रघुवर ते बने बिगरे तो भरपूर
तुलसी औरते बनेता बनि बे पे धूर तो असमर्थता हमने देखी स्वामिनी जी की प्राप्ति का सहज पाए अपने में कोई बल का अनुभव ना होना यही दरबार दीन को आदर रीति सदा चली आई तो जब अपने में अहम गलित हो जाए और कोई सद्गुण ना दिखाई दे और रोना आने लगे कि लाडली जू अब तो सिर्फ केवल आपकी ही कृपा कोर से हो सकता है जो कुछ मेरे में तो कुछ नहीं सब अंग गुण हीन हो ताको जतन ना कोई हम चाहते हैं आकाश छूना और है बने कैसे छू सकते हैं कृपा से हो सकता है तो यह कृपा से हो कि आप जो अनंत ब्रह्मांड के ईश्वर आपके अधीन है तो हे प्यारी जू मुझ जैसा आदम आपके चरणों को कैसे छुपावे कैसे आप तक पहुंच पावे तो आप कृपा करो मेरे में कोई साधन नहीं और दृढ़ दृढ़ भाव अनन्य भाव असमर्थता यह स्वामिनी जी की कृपा पात्र बना देते हैं स्वामिनी जी की सहज करुणा उस पर बरसती है और एक बार स्वामिनी जी ने जिसे स्वीकार कर लिया फिर कभी त्याग नहीं हमारे युगल का स्वभाव है प्रीतम का भी ऐसा स्वभाव और प्यारी ज का स्वभाव अवगुण करे समुद्र सम गनत ना अपनो जान और राई के
सम भजन को मानत मेर समान छोटे से छोटे दाने में राई आता है इतना भजन को सुमेरु पर्वत के समान सबसे बड़ा पहाड़ है सुमेर पर्वत और समुद्र के समान अपराध कर डाले तो मान ऐसे प्रभु का स्वभाव जन अवगुण प्रभु मान का दन बंधु अति मृदुल स्वभाव तो हमको तो ऐसे प्रीतम मिल गए किसी को एक प्रीतम मिलते हैं तो ठसक में घूमता है हमें तो दो दो प्रीतम मिल गए रत दो प्रीतम कुं हमारे हृदय रूपी कुंज में दो प्रीतम बिहार करते हैं गौर श्याम जोरी हर समय लसित हमारे हृदय में तो वह हृदय रूपी निकुंज वही बनता है जहां अहम का राज्य नहीं होता और अहम को बहुत अच्छी तरह से मिटाना जानते हैं गुरुदेव बस एक ही है जो आम को मिटा सकते हैं वो गुरुदेव दूसरा कोई नहीं जिसने अपने गुरु चरणों का आश्रय दैन्य होकर ले लिया तो व सुधार देते हैं अहंकार को बिगड़े हुए अहंकार को सुधार देते हैं ये जो बिगड़ा अहंकार है ना देह भाव विद्या रूप महत्व कुल धन जोवन अभिमान ये बिगड़ा अहंकार और सुधरा अहंकार हमारे माई श्यामा जू को राज हम श्यामा जू के बल अभिमानी टेढ़े
रहे मोहन रसिया स बोले अट पट वाली यह हमारा सुधरा हुआ अहंकार है अस अभिमान जाय जन भोरे मैं सेवक रघुपति पति मोरे तो गुरुदेव अहंकार को सुधार देते अहंकार ही संसृति मूल सूल प्रद नाना सकल शोक दायक अभिमाना य देह भाव ही घोर अविद्या है और भगवत भाव ही परम विद्या है स्वामी जी महाराज जी शीराम अम अब स्वामी जी तो कोई धाम छोड़ कर के जाते ही नहीं ये श्री जी की विशेष कृपा है कि वो ऐसे रख रही है कि कहीं जाने का ना मन होता है और ना ऐसा आप श्री को तो रख लिया हमने कई बार कहा तो रखती ही नहीं है जो उदंड बच्चे होते उनको घर में रखा जाता है और जो प्रवीण होते हैं उनको कहा जाता तुम घर के बाहर काम कर सकते लेकिन यह उदंड इसको घर में रख ले इसलिए घर में रख लिया कि उदंड बच्चा है किसी योग ल मराज जी आप से हमारे श्रीधाम वृंदावन ही नहीं संपूर्ण भारत के नहीं संपूर्ण विश्व के इकलौते बस आप गुरुजनों के चरणों का प्रताप ही काम कर रहा है महाराज आप श्री की रहनी को देख कर के गुरुदेव की रहनी भी याद आती है उन्ही उन्हीं गुरुजनों का
प्रताप है ये जो भगवत प्राप्त महापुरुष ऐसे ही डूबे रहते थे दो दो चार चार घंटे पाच पाच घंटे हो कर के ग पड़े रते थ पीते न करते और ऐसे कई बार तो स्वामी जी को लव शंका जाना भी लगता था कि कहां जाए हा रोने लग जाते थे कि से किशोरी जी खड़ी य से राज सरक ऐसा ही है जानते बहुत कृपा है महापुरुषों की साधक उस कोटि के ऐसे महापुरुषों के ऐसे गुरुजन की स्थिति में कैसे पहुंच सकता है महाराज जी मतलब चलते चलते चलते गुरु कृपा तो जैसे आपने बताया अपना क्याल बात जो आंतरिक बात हम आपको बताए देखो व्यवहारिक बात अगर बताएंगे तो यह साधना करनी चाहिए ऐसे ऐसे चलना चाहिए लेकिन आंतरिक बात बताएं इसमें महापुरुषों का संकल्प काम करता है वो अपना मान लिए ब इसी से हमारी उन्नति हो जाती है उनके चरणों का आश्रय ले लिया और वह अपना मान ले बस इसी से सब काम हो जाता है इसमें साधन वान काम नहीं करता जैसे लोहा सोना बन जाए ऐसी कौन सी साधना है लेकिन पारसमणि छू जाए तो तत्काल सो बल जाएगा ना ऐसे ही महापुरुष जन जो है व करुणा करें तो आप सरिस चाहे सब
किना उनका स्वभाव होता है व अपने समान बनाने का तो जब शरणागत वास्तविक हृदय से शरणागत हो जाता है तो गुरु के हृदय की वस्तु शिष्य के हृदय में प्रकाशित हो जाती है स्पित हो जाती यह साधना तपस्या इसमें सब केवल यद अल्पज्ञ वाला प्रश्न है महाराज जी बट इसमें प्रकट सनिया गुरुदेव तो अपक सानिध्य में भी महाराज जी गुरुदेव कभी अपक होते ही नहीं गुरुदेव कोई मरण धर्मा नहीं है क्योंकि हां गुरु शरीर रहे या ना रहे गुरुदेव हर समय रहते हैं अब जैसे हमारे गुरुदेव हैं तो क्या
दिमाग उनसे खाली है क्या यही आसन लगाए बैठे हैं हर समय वही बैठे मंत्र रूप से वही हृदय में चल रहे हैं इष्ट रूप से वही हमें दुलार कर रहे हैं वही हमें प्यार कर रहे हैं हमें तो गुरुदेव का अभाव कभी अनुभव में नहीं आएगा हां प्रगट में जो प्यार दुलार दर्शन स्पर्श है तो वह ज्यादा दिन टिकेगा नहीं क्योंकि अनित्य संसार में जब अनित्य देह लेकर के लीला की जाती है तो नित्य स्वरूप में स्थिति जरूर प्रदान करते हो लेकिन वह शरीर टिकेगा नहीं वह परिवर्तन कर ही लेते हैं अपने शरीर का वो चिदानंद स्वरूप में स्थित होकर पांच भौतिक शरीर का बड़े-बड़े महापुरुषों ने किया है तो विरह तो सताता है ऐसा नहीं कि विरह ना सताए ज्ञान विरह को समाहित नहीं कर पाएगा पर वह विरय ही हर समय गुरु के सानिध्य का अनुभव कराएगा हर समय गुरु के सानिध्य का अनुभव कराएगा उद्धव जी को लगता था गोपियां भी रही हैं भगवान से बहुत दूर है लेकिन जब उन्होंने देखा कि गोपियों के पास जो श्री कृष्ण मेरे पास नहीं मैं उनके समीप रहा लेकिन मैं वह अनुभव नहीं कर पाया
श्री कृष्ण का स्वरूप जो गोपियों के हृदय में स्फूर्त हो रहा है प्रेम विराग में संयोग का प्रेम का स्वरूप होता है संयोग में विरह का और विरह में संयोग का अनुभव होता रहता है तन मन के बिछु नहीं चाह बढ़े दिन रन कब संजोग न मान यह देखो तन मन के बिछड़ नहीं पचा बढ़े दिन रन और कब संजोग न मान देख भरी भरी नन भगवत ऋषिक जी ने लिखा कि अरव रात मिलवे को निस दिन और मिले रहत मनो कब मिले ना तो लिखना पड़ा भगवत रसिक रसिक की बातें रसिक बिना को सबध सकेला तो ये प्रेम जो है
जैसे गुरु प्रेम है और गुरु अंतर ध्यान हो गए हैं तो लोक वत शब्द में अंतर ध्यान हो गए उस उपासक के हृदय से नेत्रों से मानस पटल से आज्ञा चक्र से कभी नहीं व वही विराजमान रहते हैं गुरुदेव महाराज जी आपने बोला कि अभी केवल गुरुदेव के संकल्प से हीय बात बनती है महाराज जी कुछ कृपा पात्रों को ही प्रकट सानिध्य का ऐसा सौभाग्य प्राप्त होता है महाराज जी और गुरुदेव के तो असंख्य शिष्य है महाराज जी उन परे गुरुदेव का कैसे कृपा पात्र कौन होता है मन बचन कर्म से गुरुदेव
की जो आज्ञा का पालन करता है वही कृपा पात होता है जैसे भगवान ने ब्राह्मण पत्नियों को कहा कि मेरे अंग संग सानिध्य ही मेरे प्रेम का कारण नहीं है मेरे नाम रूप गुण लीला धाम का चिंतन करने से मेरे प्रेम को प्राप्त हो जाओगे तो गुरु जी का आज्ञा पालन करते हुए गुरु जी का चिंतन करें ध्यान करें तो हमें लगता है नजदीक जो रह रहा है और आज्ञा उल्लंघन कर रहा है उससे ज्यादा कृपा लाभ वो प्राप्त कर लेगा जो दूर रहकर गुरुदेव का चिंतन उनकी आज्ञा का पालन कर रहा है तो चाहे
जहां जितनी दूरी हो गुरु से तो दूरी है नहीं क्योंकि गुरु अखंड मंडला काम व्याप्तम तो आप में भी गुरु व्याप्त है जो भाव कर तत्काल पहुंच रहे और तत्काल उत्तर मिल रहा है और तत्काल आपकी भाव उन्नति होगी गुरुदेव हृदय में ही विराजमान है एक बात आज भगवत अभिमान और आचार्य अभिमान जी दो अभिमान में सर्वश्रेष्ठ अभिमान आचार्य अभिमान आचार्य अभिमान से ही क्योंकि भगवत अभिमान ने वाले आचार्य ही है आचार्य के बिना भगवत अभिमान नहीं आ सकता अभी कुछ क्षण पहले शब्द भगवान ने निकाले थे कि गुरु ही है जो हमारे अभिमान को सही कर सकते हैं इसलिए हम गुरु अभिमान में रहेंगे गुरु ही है जो हमारे अभिमान को सही कर सकते हैं इष्ट भिमान गुरु ही प्रदान करते हैं नहीं तो देहा अभिमानी कभी इष्ट भिमान से युक्त हो ही नहीं सकता और देहा अभिमान का गलन गुरुदेव के संग से होता है तिनकी संगति रहत जाति कुल मद सब नंस संतत सेवक सदा भज ज श्री हरिवंश जो आचार्य अभिमान गुरु अभिमान रखते हैं वही इष्ट अभिमान को प्राप्त होते हैं इष्ट अभिमान वाला गुरु का अगर
अवहेलना कर दे तो टिकेगा ही नहीं भगवान की ना प्रसन्नता प्राप्त कर पाएगा ना भगवत ठसक में रहेगा ये भगवत ठसक और भगवत प्रसन्नता तो आचार्य और गुरु ठसक रखने वालों के हृदय में होती है जब सेवक जी महाराज बोले मन क्रम वचन शुद्ध स कलमत हम श्रीहित हरिवंश उपासी तो लाडली लाल सामने झलक लगे जब मन वचन कर्म से अपने गुरुदेव की ठसक रखी तो प्रिया प्रीतम पीछे डोलने लगे और अगर प्रिया प्रीतम को पकड़ना चाहे और गुरुदेव को छोड़ दे तो कभी नहीं कभी नहीं गुरुदेव वो डोरी है जिनमें प्रिया प्रीतम रूपी पतंग उड़ती है अगर हम पतंग को पकड़ना चाहे डोरी छोड़ दे कभी नहीं डोरी पकड़ ले और डोरी खींचते रहे तो पतंग छाती से लग जाएगी आकर तो गुरुदेव की ठसक सबसे बड़ी आचार्य की ठसक सबसे बड़ी केवल और केवल गुरुदेव का ही आश्रय हो जाए महाराज जी हा गुरुदेव ही इष्ट रूप है जब गुरुदेव कृपा करते हैं तो गुरुदेव कोई साधन नहीं है गुरुदेव ही साध्य है जब यह असली में अनुभव करोगे तो प्रिया प्रीतम का मिलित रूप ही गुरुदेव विराजमान है वही अपने आप में
अपना दर्शन करा देंगे निहाल हो जाओगे बड़े सौभाग्यशाली शिष्य होते हैं जो गुरु को ब्रह्म भाव से इष्ट भाव से देख पाते हैं नहीं तो अच्छे संत साधु महात्मा ऐसा मान सकते हैं लेकिन साक्षात हमारे प्रिया प्रीतम है गुरुदेव ऐसा कोई कृपा पात्र ही अनुभव करेगा हमने यह अनुभव की बात कह रहे कि देखा भी है कि गुरुदेव ही हमारे प्रियालाल है और प्रियालाल ही हमारे गुरुदेव है केवल गुरुदेव प्रियालाल शब्दों में भेद है उनमें नहीं वही है दूसरा कोई नहीं है
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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