क्या करें कि किसी के बुरा करने पर भी क्रोध न आए ? (महाराज जी ने सुनाई स्वयं के साथ घटित एक घटना!)
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
अमित जी राजस्थान से राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी हम लाली जी की कृपा से सही रास्ते पर चलने का प्रयास कर रहे हैं पर कई बार हमारा बुरा करने चाहता है कोई फिर हमारे साथ बुरा व्यवहार करता है तो हमारा संयम टूट जाता है महाराज जी हमें सामने तुम्हारी परीक्षा है सही चलने की यही परीक्षा है जब हम सही चले और हमें गलत कहा जाए और हम अपने मार्ग से हिले नहीं हमारे साथ गलत किया जाए गलत कहा जाए और हम सही चल रहे हैं हम सही ही चले यही हमारी परीक्षा है यह थोड़ी कि हम दुखी हो जाए बैठकर रोने लगे देखो आप तो गृहस्थ धर्म में हो हम भगवान के धर्म में हमें पीटा भी गया गाली भी दी गई अपमानित किया गया पूरे जीवन में लेकिन उस समय हम यही सोचते रहे कि मेरे भगवान मेरी परीक्षा ले रहे हैं धैर्य की परीक्षा ले रहे बे मतलब अब हम रात्रि में आ रहे थे 11 बजे अकेले चलते थे उस समय ये कोई शिष्य परकर कोई चाहे शराब पी हो या जो भी हो गाड़ी रोकी उतर के हमें पीटने लगे ऐसे ऐसे थप्पड़ मारे थे कि पूरी छाती में पूरे पंजा बने हुए थे
ऐसे कई दिन तक बने रहे तु राधा राधा द राधा समझ ही नहीं पाए कि कौन क्या इतने में एक ब्रजवासी माई लाठी लिए आ रही थी बूढ़ी अरे उसने गाली देला शुरू किया वो लोग भाग गए हम लौट कर के भी नहीं देखा कौन थे क्यों प्रारब्ध है उसका भगवान निराकरण करवा रहे कोई कुछ नहीं बोला उनको कुछ नहीं एक शब्द नहीं हमने पहचाना भी नहीं मन से कुछ नहीं बोला दिल से कुछ नहीं बोला कुछ नहीं बोला और हृदय बहुत शीतल हो गया निपट गया बुरा प्रारब्ध निपट गया जो हमारे जीवन का बरा प्रारब्ध था
निपट गया हमने लौट कर के नहीं देखा खूब लाइट थी देखकर पहचाना जा सकता था हमने देखा ही नहीं वो जैसे मार रहे थे बस ऐसे शांत राधा अंदर चल रहा था वो भी जबान से नहीं और हमें पद है जो पद गा रहे थे अंदर वह हमें बिल्कुल पूरा ध्यान है कि हमारी इस लाइन पर थप्पड़ पड़ा था कौन सा पद था वो आवत स वृष भान दुलारी रूप रास अति चतुर शिरोमण अंग अंग सुकुमारी तो लि हम पूजा गर्मी का समय था तो अ चला उतार के ऐसे काने में डाले हुए थे कमंडल और छड़ी थी हमारे हाथ में डंडा था वो हमें मार रहे थे हमने ऐसे भी नहीं किया ऐसे भी नहीं किया कि बचाव पक्ष में किया हो ना विरोध पक्ष में कुछ बस शांत ना उनको लौट के देखा प्रारब्ध होग क्या देखे देखेंगे तो दुश्मनी भाव आ जाएगा पहचान आ जाएगी कि वही आदमी ऐसा बहुत पूछा हम लोगों से जब हमने दिखाया कि कल रात्रि में ऐसा उनका एक बार बता दो कौन है कहां का है कैसा हम हम खुद नहीं जानते हमने देखे नहीं देखे नहीं बस मस्त एकदम चले आए तो यदि हम सत मार्ग में चल रहे हैं और अच्छे मार्ग में चल रहे हैं कोई
हमारे साथ बुरा कर रहा है तो जरूर हमने बुरा किया होगा उस बुरा का निर्णय हमको भोगना पड़ रहा चुपचाप भोग लो अच्छे मार्ग में चलते रहो और अच्छे की बुराई ही होती हो ऐसा नहीं है अच्छे की बुराई ही हो ऐसा नहीं यदि आप अच्छे मार्ग से चल रहे हो तो एक दिन बुरा आदमी झुकेगा और आपकी अच्छाई को स्वीकार करेगा पक्की बात हमारी मान लेना अगर आप बुरा करने लगे तो अच्छाई के पथिक ही कहां थे आप अपनी अच्छाई ही करते रहिए वोह बुराई करता रहे तो हार जाएगा एकनाथ जी महाराज स्नान करने जा रहे थे गंगा स्नान करके आए तो एक विधर्मी का ऊपर मकान था गली के थूक दिया ऊपर उनके ऊपर फिर वह स्नान करने गए फिर वो आया थूक दिया 100 बार थूका वो ना ऐसे हेरे ना कुछ बस वहीं से लौट जाते स्नान करके आ जाते उसके मन में बड़ी गलानी हुई कि एक साधु को हम वो नीचे आए साष्टांग दंडवत हुए और बोले महाराज मुझे क्षमा करो मैंने 100 बार आप पर थूका लेकिन आपने ना क्रोध दिखाया ना हमारे बोले भैया क्रोध तो तब दिखाऊ जब आपने हमारा बुरा किया हो एक दिन में एक बार स्नान
करता था आपकी कृपा से 100 बार स्नान हुआ इसमें तो आपकी कृपा हुई इसमें आपने बुरा कहां किया ये ये अच्छाई का मार्ग है वो उसी दिन से बदल गया जब हम अच्छाई पर चलेंगे तो बुराई बहुत हल्की होती है अच्छाई बहुत गरु होती है हां यह जरूर है कि अच्छाई पर टिके रहना बहुत कठिन होता है क्योंकि बुराई जब अपना प्रभाव दिखाती तो हमें खुद अपनी अच्छाई पर विश्वास लुटने की संभावना होती है हटने की संभव अच्छाई को पकड़ो तो फिर पकड़े रो कुछ भी हो परिणाम देख लिया जाएगा तो बुराई करने वाला भी अच्छाई पर आ जाएगा जब जब अच्छाई ने अपना कठोरता से नियम पालन किया है तो बुराई को नष्ट होना पड़ा है और बुरे लोग अच्छे बने हैं तो इसलिए हम यह ना सोचे कि हमारी बुराई हो रही तो हम अपने अच्छे मार्ग से हट जाए या बैठ के रोने लगे दुखी हो जाए ऐसा नहीं है म जी आपके जीवन का कोई अनुभव आपसे कोई बहुत विरोध करता हो या द्वेष भाव रखता हो और बाद में आपका हां पास में एक संत रहते थे तो जैसे कुछ लोग आए आते ही थे तो दो लोग चार लोग आए तो जब आते थे तो सेव है
संतराय है यह वस्तुएं और उनका सामने कुटिया थी तो जब देखते तो उनके हृदय में जलन होती थी ईर्ष्या होती थी कि मेरे पास लोग आते नहीं तो हम रोज उनको प्रणाम करते और जो वस्तु हमारे पास आती पहले उनके पास भेजवा लोगों के चले जाने के बाद अच्छी-अच्छी वस्तु उनके पास तो काफी दिन तक उनका द्वेष बढ़ता रहा और जब हमारा रोज प्रणाम और कोई द्वेष नहीं तो इतनी मित्रता वो करने लगे मतलब इतना दैन्य होकर मिलने लगे कि जैसे एक बहुत पुराना मित्र मिलता है महाराज जी पर ऐसे धैर्य तो ये साधन और नाम जप से ही मिलता है हां हमें दूसरों के सुख की तरफ देखना है जो हमारा विरोध कर रहे हैं उनके सुख की तरफ देखना है जो हमारा विरोध कर रहे हैं हमारी निंदा कर रहे हैं उनकी निंदा नहीं करनी हमें उन पर विचार करना कि वो ऐसा क्यों बोल रहे हैं अगर मेरे में कमी है और व मैं सुधार करूं और उनकी निंदा बंद हो जाए तो हमें करना चाहिए अगर मेरे में कमी नहीं है और निंदा कर रहे हैं तो फिर भगवान जाने फिर हम उनका तब भी नहीं करेंगे पर कभी तो सह लेते तो कभी सह
नहीं पाते तो मतलब कैसे रेगुलर करसे आप नाम जप नाम जप नाम जप से स और सबसे बड़ी बात है कि हमें यह पता है कि मेरे भगवान मेरे साथ है अगर मुझे थप्पड़ मारेगा कोई तो मेरे भगवान के आदेश से मारेगा अगर भगवान के आदेश से मारता तो मुझे सर झुका देना चाहिए जैसे कभी कोई मार देता है तो कभी लेते पर फिर दोबारा ऐसे होता रहता होता रहता तो फिर ऐसा नहीं ऐसा नहीं होगा वार को पीटेगा ऐसा नहीं होता देखो ऐसा नहीं होता ये केवल मन की गणित है ऐसा नहीं होता प्रारब्ध भोग है तो कभी-कभी आता है ऐसा थोड़ी होता है हर इतवार को आता है हर शनिवार को आता है ऐसा नहीं आता है तो बहुत आता भैया कहते थे नाम तब भी तेरे को इतना क्रोध आता क्या फायदा क्रोध जैसे नहीं फायदा तो अलग चीज है जो नाम हमने 500 नाम जब कि हो तो भगवान के बैंक में जमा है और क्रोध कर रहे हैं हमारी गलती है हमको क्रोध से बचना चाहिए अगर क्रोध करें तो अपना तेज नष्ट होता है अपनी बुद्धि मलिन होती है हो जाती है ऐसा होता है कि सबका नष्ट हो जाता फिर बाद में होता है कि क्यों
गुस्सा करा नहीं गुस्सा आए तो एक उपाय है मौन कभी तो मौन हो जाता है कभी होता ही नहीं और वो करता है नहीं देखो इसका अभ्यास करें अभ्यास से ठीक होता है जैसे अभी कोई गाली देने लगे हम मौन का पहले महाराज ने कहा था मौन गुरुदेव आपने तो जिंदगी बदली दो साल से आपको सुन के आपने ब धीरे धीरे आप इस क्रोध पर विजय प्राप्त कर लेंगे यदि मौन का आश्रय ले हट जाने का स्वभाव बना ले हार जाने में भगवान का बल मिलता है और जीत जाने में अहंकार पुष्ट होता है सुनेरी मैने निर्बल के
बलराम अप बल तप बल और बाहुबल चौथ बल है दाम सूर किशोर कृपा ते सब बल हारे को हरि नाम जो हार गया वो जीत गया और जो जीत गया वो अहंकार में हार गया उसका अहंकार पुष्ट हो जाएगा और गए तो हे भगवान मैं आपके आशित हू आप देख लेना तो हम जीत गए क्योंकि हम माया में नहीं हम भगवान में स्थित थे जिस समय हार रहे थे और जो जीत रहा था व अहंकार में स्थित था अहंकारी का विनाश निश्चित होता है और भगवान के जो आशित होता है भगवान उसकी रक्षा करते हैं
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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