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1 हाथी को खिलाने का पुण्य और 1 लाख चींटियों को खिलाने का पुण्य में से किसका पुण्य ज्यादा होगा ?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

प्रशांत त्रिवेदी जी राधे-धे महाराज जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी क्या एक हाथी को खिलाने का पुण्य और 1 लाख चीटियों को खिलाने का पुण्य क्योंकि हाथी की खुराक बहुत होती है। चीटियों की संख्या बहुत होती है। होना खिलाना भावना सेवा में अगर हाथी में भी भगवान देख के पवा रहे हो। चींटी में भी भगवान देख के पवा रहे हो तो एक चींटी और एक हाथी के पवाने का बराबर पुण्य मिलेगा। और भगवान नहीं देख के हाथी देख रहे हो, चींटी देख रहे हो तो भेद तो हो ही जाएगा। कोई पुण्य में फिर बेवकूफी थोड़ी है।

चींटी तो एक दाना से तृप्त हो जाएगी। उसके लिए एक कुंतल भोजन चाहिए। दोनों में भगवान देखकर यदि दे रहे हो कि हाथी में भी वही भगवान है और चींटी में वही भगवान तो पुण्य बराबर और हाथी को हाथी देखकर चींटी को चींटी देख के तो पुण्य में घाटा। हाथी के पवाने का हाथी का फल मिलेगा और चींटी के पवाने की चींटी का फल मिलेगा। बात समझ में आ रही है? निर्णायक चतुर है। एक हाथी को खिलाते तो एक आत्मा को पुण्य मिलता और 10 लाख चीजों को खिलाते 10 लाख आत्मा हमारी बात नहीं समझे 10 लाख आत्मा है ही नहीं 10 लाख घड़े रखे हैं और एक एक सूर्य का प्रतिबिंब पड़ रहा है तो 10 लाख सूर्य हो गए क्या तो 10 लाख आत्मा है नहीं आत्मा तो एक है वो सब में प्रकाशित हो गया क्योंकि हम अज्ञान में है ना इसलिए समझ नहीं पाते हमने जो पहला शब्द कहा जो जो भगवान हाथी में है वही चींटी में है।

अगर यह भावना करके हम पवाते हैं तो बराबर फल मिलेगा क्योंकि वही आत्मा है। आत्मा 10 20 नहीं है। आत्मा 10 लाख नहीं है। आत्मा एक है। देखो अब आपसे कहे कि ये पांच सात बिजली है। आप हमको क्या कहोगे? फैला यंत्र के कारण उसका प्रभाव अलग-अलग है। हीटर यंत्र है तो गर्मी फेंक रही। पंखा है तो हवा फेंक रही। एसी है तो ठंडा फेंक रही लेकिन बिजली एक बस ये खोपड़ियां अलग-अलग है। बिजली एक है इनमें। जो बिजली है इनमें वह परमात्मा है वह एक आत्मा है। एक वाह गुरु है। वह एक है।

वह अनेक नहीं है। बहुत अच्छे से समझ लीजिए। अगर हम भगवत भाव से किसी को पवाते हैं तो चाहे चींटी को पवाए चाहे हाथी को पवे हमें बराबर लाभ मिलेगा। और चींटी को चींटी मान के और हाथी को हाथी मान के तो फिर हाथ एक हाथी पवाओ और दो चार अरब चींटी पवाओ तो शायद समानता की बात सोची जाए क्योंकि परिणाम है ना वो एक क्विंटल में छकेगा और एक किलो में लाखों हो जाएंगी नहीं हो जाएंगी और अगर एक चींटी में आत्म तत्व भगवान को देखकर एक हाथी में देख के तो बराबर फल मिलेगा वो तुम देख के क्या पाते हो तुम्हारा विषय है समझ गए मन बहुत चंचल है इधर उधर बार-बार चला जाता है।

हमेशा आपकी कृपा से नाम जप होती रहती है। पर फिर भी इधर उधर भटक जाता है। हां कोई भटकने दो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मन जाने से हमारी हानि नहीं है। मन के अनुसार तन जाने से हानि है। मन हमारा कह रहा है ये खा लो। हम नहीं खाए कोई फर्क नहीं पड़ा। अब मन कह रहा है खा लो हमने खा लिया। अब फर्क पड़ जाएगा। तो मन जो कहे तो वो तो कहेगा। उसका स्वभाव है। जब तक भगवत प्राप्ति नहीं हो जाएगी तब तक वो कहेगा। तो मन के कहने के अनुसार हम क्रिया ना करें तो मन से हमारी कोई हानि नहीं है।

वह धीरे-धीरे आ जाएगा। लाइन में आ जाएगा। खूब नाम जप करते रहो। मन के अनुसार क्रिया कर दी तो फिर नहीं आएगा। फिर तो और भटकना शुरू हो जाएगा। क्रिया को रोकना है मन के अनुसार जो

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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