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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #858 · 24 मार्च 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

विक्रम पांडे जी मिर्जापुर से श्री हरिवंश महाराज जी राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी आपका सत्संग सुनता हूं और कृपा का अनुभव है महाराज जी। महाराज जी मेरा प्रश्न यह है कि आपसे सारी दुविधाओं और समस्याओं का समाधान प्राप्त होने के बाद भी महाराज जी आपकी बातें जीवन में उतारने में असमर्थ हो रहा हूं। महाराज जी इसके लिए असमर्थता इसीलिए कि भजन नहीं है। अगर भजन रूपी अध्यात्म बल हो तो समर्थ हो जाओगे। कौन सी कठिन बात है आप हमें बताओ क्या कठिन बात है?

राज जी मैं जब पिछले बार आया था तो अब नसानी नसियों का संकल्प आपसे कहा था टूट जाता है तो आपने कहा था कि बड़ा वृक्ष होता है ना जब वो आंधी में उखड़ जाता है तो महीनों हरा भरा दिखाई देता है लेकिन उसकी जड़ नहीं होती समझ रहे हो ना वैसे अनेक जन्मों से हमारे संस्कार गलत हो चुके हैं अब हम शरणागत है माने उनकी जड़ उखड़ गई है पर हरेभरे कई महीनों तक दिखाई देंगे तो यह हो सकता है कि कई कई वर्षों तक आपकी शिथिल साधना होने के कारण आपको विषय आकर्षण करके भ्रष्ट कर दे।

लेकिन विश्वास करो आप शरणागत हो। आप भगवान के जन हो एक दिन विजय प्राप्त करोगे। यह दृढ़ विश्वास रखो और नाम जप करते रहो और जितना बच सकते हो बचते रहो। जब ना बचने की बात आवे तो ऐसे हो जाओ भगवान से। आप मुझे बचा लो। हमारी बात मानो। ऐसा करना। जहां कहीं गलत हो रहा हो तुम्हारे जीवन में और तुम अपने को ना रोक पा रहे हो वहां से हाथ उठा दो। हे भगवान आप देखना अब आप संभाल लेना मेरी सामर्थ्य नहीं है। मुझे आपकी माया प्रचंड है। घसीटती जा रही है। मैं गलत जा रहा हूं। प्रभु मैं जान रहा हूं कि मैं गलत हूं।

लेकिन मैं नहीं रुक पा रहा हूं। प्रभु हम पर कृ जरूर बल देंगे। वो कोई ऐसा रास्ता बना देंगे कि आप निकल जाओगे। समझ रहे हो ना? लेकिन आप जानबूझकर के गिरोगे तो फिर नहीं फिर तो पड़े ही रहोगे वही जानबूझ के अगर जहर खाओगे तो मर ही जाओगे अगर कोई धोखे से जहर खवाएगा तो भगवान बचाने का चांस है मीरा जी को जहर पिलाया तो बच गए ना लेकिन जानबूझ के जहर खाओगे तो मर ही जाओगे फिर ये जहर से भी विषैला है विषय बहुत जन्मों से भोगते आ रहे हैं तो जहां अब लगता है कि हम गलत काम नहीं करेंगे अवसर मिला तो फिर गलत कर बैठते तो फिर परमार्थ से निराशा आ जाती है।

सबसे ज्यादा घाटे की बात यह होती है कि हमसे गलती हो गई तो वह गलती क्या करेगी? इधर का उन्नति मार देगी। मन ही नहीं लगेगा। भजन में, सत्संग में, साधु महात्माओं की बातों में मन ही खराब हो जाएगा। फिर हमारा जीवन बर्बाद हो जाएगा। गलती हो जाना उतना भयानक नहीं जितना गलती का परिणाम भयानक है। वो हमारे अंदर उत्साह ही खत्म कर देता है। भजन का यार क्या इतने मैनेज कर रहे हैं, भ्रष्ट हो गए। अब क्या होगा? यह कर देता है। वह आध्यात्म से हीन बना देता है। तो हमें लगता है बचने की कोशिश करो।

मनुष्य जीवन बड़ा दुर्लभ है। इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाए। जहां गिरने को हमारी एक एक बात पकड़ लो। जहां गिरने के चांस हो आप संभल ना सकते हो वहां ऐसे हो जाना। अंदर से भगवान वो तुरंत संभाल लेंगे। गिरोगे तो उनकी गोद में गिरोगे। जन अवगुण प्रभु मान न काऊ दीन बंधु अति मृदुल स्वभाव बहुत दीन बंधु करुणामय भगवान है अपने जन के अपराध गिनते ही नहीं है प्रभु जी घर में भगवान जी शिव जी का मंदिर है लेकिन जब से आपको सुनने लगे हैं तब से श्यामा श्याम और आपको विराजमान किए हैं शंकर जी की कृपा से ही श्यामा श्याम के चरणों में प्रीति प्राप्त होती है।

आप तो मंदिर में बात कर रहे हो। हम तो काशी में रहते थे। शंकर जी के ही पूर्ण अनन्य पूर्ण अनन्य पूरे विरक्त केवल शंकर जी और कुछ है ही नहीं तो हमें श्यामा श्याम के मार्ग में भेज दिया तो उनकी कृपा से ही श्यामा श्याम की प्राप्ति होती है। महाराज जी सुबह जैसे उठते हैं 3:00 बजे 4:00 बजे जब भी तो समझ नहीं पाते पहले किसकी पूजा करते पहले शंकर जी की पूजा कर जगतगुरु है वैष्णवाचार्य हैं। उन्हीं की कृपा से श्यामा श्याम की प्राप्ति होगी। ठीक है? राजेश सैनी जी श्री राधा क्लब महाराज जी वैराग्य हुए बिना भी परम पद की प्राप्ति हो सकती है।

हां हो सकती है। यदि हम घर गृहस्ती के भोगों को धर्म पूर्वक भोगे तो जैसे भूख लगी है तो धर्म पूर्वक कमाए हुए अन्न से पेट भरे। काम सता रहा है। धर्म पूर्वक पानी ग्रहण की हुई पत्नी से सहवास करें। हमें मोह सता रहा है। अपने बच्चों से भागवतिक भाव से प्रेम करें। धर्म के अंतर्गत किया हुआ भोग मोक्ष की पदवी प्रदान करने की योग्यता प्रदान कर देता है। और अधर्म से किया हुआ भोग नरक की गति प्रदान करता है। धर्म पूर्वक काम भगवान का स्वरूप है। अधर्म पूर्वक काम नरक का स्वरूप है।

काम क्रोधा तथा लोभा तस्मा देत्रम तजे त्रिविध नरकसदम द्वारम नरक के तीन द्वार काम क्रोध लोभ और वही अगर धर्म पूर्वक किया जाए तो भगवान की प्राप्ति कराने वाला बन जाता है। तो आप अधर्म का त्याग करके भगवान का नाम जप करते हुए घर गृहस्ती में रहते हुए यदि भजन करो तो भगवान की प्राप्ति हो जाएगी। क्यों? भगवान की प्राप्ति करने के लिए जो हमें चाहिए वह है धर्म। वह है भगवान का भजन। अगर विरक्त होकर धर्म से ना चले और भगवान का भजन ना करे तो क्या विरक्त को भगवान की प्राप्ति हो जाएगी?

क्या नहीं अगर ये प्रपंच में फंस गया गुरु चेला रुपया कमाना ये वो तो हर शिष्य धन सोक ना हर सो गुरु घोर नरक मा पर उसको नरक जाना पड़ेगा। भजन से भगवान की प्राप्ति होती है। गृहस्थ विरक्त से कोई मतलब नहीं। मनमानी आचरण करे, पाप आचरण करे, भजन ना करे तो नरक जाएगा कि नहीं जाएगा? अच्छा रुको बाबा जी बन के यहां गलत काम करे तो कानून बंद करेगा कि नहीं करेगा? यहां का कानून उसको उठा के बंद कर देगा कि नहीं कर देगा? जब यहां का कानून नहीं बखशे तो अगर हम संत बनकर के गलत आचरण करेंगे, गंदी बात करेंगे तो हमें नरक मिलेगा।

और गृहस्थ बनकर के यदि हम अच्छे आचरण करेंगे तो भगवान मिलेंगे। तो अच्छे आचरण और भजन दोनों को करना है। चाहे बाबा जी हो, चाहे गृहस्थ हो। अगर अच्छे आचरण और भजन है तो भगवान की प्राप्ति है। चाहे गृहस्थ हो, चाहे विरक्त हो। आचरण भ्रष्ट है। भगवान का भजन नहीं तो कोई भी हो फिर तो दुर्गति है ही। यहां भी दुर्गति वहां भी दुर्गति। जी धीरज कुमार शर्मा जी राजस्थान से महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी भागवत कथाओं आदि में निशुल्क भजन गायन की सेवा देता हूं।

श्री जी की कृपा से उनको रिझाता हूं। महाराज जी मेरा प्रश्न है कि इस घोर कलयुग में जहां व्यभचार आदि फैला हुआ है। ऐसी स्थिति में देखकर विवाह से डर सा लगने लग गया है कि जो भी विवाह करके आए आएगी वो कहीं मेरे भगवत मार्ग में बाधा ना बन जाए। है तो बहुत भयावा की परिवार की सदस्य आजकल जो है कि पत्नी का मतलब है जो साध्वी सुशील सज्जन अपने पति को भगवान मानने वाली तो ब्याह है तो खतरे का मोल लेना आजकल क्योंकि बॉय फ्रेंड गर्लफ्रेंड ये सब जो चल रहा है ना ये बहुत विषैला चल रहा है क्योंकि मान लो जैसे दो चार लड़कों से जो मिली हुई है वो एक पति को भगवान मानकर कैसे पूछ सकती है बड़ी समस्या है पर ऐसा नहीं है जैसे दुराचारियों के बीच में सदाचारी भी रहते हैं।

ऐसे सदाचारणी भी हैं। एक से एक बहुत पवित्र लड़कियां हैं जो अपने जीवन को पवित्र रखें। पर है बहुत कठिन। पवित्र मिलना बहुत कठिन। क्योंकि अपने लोग पवित्र आचरण विहीन हो रहे हैं। तो अपने को पवित्र की आशा कैसे हो सकती है? घर वाले भी जबरदस्ती करते हैं कि करो। ये इकलौता मतलब वंश बढ़ाओ। आप घर में तो संतान उत्पन्न करके वंश उत्पन्न करना भगवान से मनाओ जैसे करदम जी ने 10,000 वर्ष तक तपस्या की भगवान से कहा मुझे पत्नी चाहिए तो देवभूति जैसी पत्नी मिली तो 10,000 ना सही तो साल भर सही साल भर कुछ अन्न कम पाओ शंकर जी की उपासना करो महाराज हमें पत्नी दे दो भगवान शंकर की आराधना करो कि हमें देवी जी की आराधना करो तो कोई हो कि सुशील सज्जन मिल जाए होती बहुत कम है बहुत कम पर भगवान ने कहीं ना कहीं अगर ब्याह है तुम्हारे भाग्य में तो लिखा ही होगा

कहीं ना कहीं तैयार हो रही होगी वो भी आपके पानी ग्रहण के लिए ऐसा हो श्री जी की इच्छा समझ के ही बस चलता रहे कि बस अब जैसी उनकी इच्छा हां बिल्कुल बिल्कुल बकायदा आपका जो प्रश्न है बहुत गंभीर प्रश्न है कि आज सुशील बच्चों को सुशील बच्ची मिलना या सुशील बच्चियों को सुशील बच्चे मिलना बहुत दुर्लभ बात हो गई क्योंकि स्कूलों में नए-नए बच्चे जो थोड़ा अच्छे वो भी मतलब भ्रष्ट मार्ग में जा रहे हैं जैसे नशा करना गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड बनाकर व्यभचार करना ये सब बहुत गंदी बातें हो रही हैं हमारे देश में पहले हमारे समय में तो था ही नहीं गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड था ही नहीं सिस्टम ही नहीं था गंदी भावनाएं नहीं थी अब ये जब से मोबाइल चला ना तब से गंदी भावना का बच्चों में सृजन हो गया।

गंदी गंदी बातें अब तो लिव इन रिलेशन भी चल गया है। वो तो और भी बुरा है महाराज। बिल्कुल बिल्कुल नहीं ये हमारी भारतीय पद्धति नहीं। ये कलयुग का अंतिम चरण है। अभी तो प्रथम चरण है। 432000 वर्ष का है जिसमें अभी 5000 के ऊपर हुआ है। अभी तो 32 पूरे नहीं हुए। अरे भा भ्रष्टाचारा सब संसारा धर्म सुन नहीं कान्हा कलिकाल बिहाल के मनुजा नहीं माने को अनुजा तनुजा ऐसा मतलब समय कलिकाल का आएगा कहां से कौन से क्या क्या चरित्र हैं वह कैसे मतलब उसकी व्याख्या कैसे करें हमारे देश में तो इस बात का प्रमाण है कि एक बार जिससे हाथ मिला लिया आजीवन उससे निर्वाह किया कभी दूसरी की तरफ आंख उठा के नहीं देखा ये भारत है ये भारत है यह विदेश नहीं है कि आज उसके साथ कल उसके के साथ ऐसा नहीं है।

बहुत गंदी बातें विदेश से आई हैं। और देखो सुख भी इसी में है। अपनी पत्नी है। अपना पति है और आजीवन एक के साथ तो सुख भी। अब पति को विश्वास नहीं। पत्नी के ऊपर पत्नी को विश्वास नहीं। पति के ऊपर एक घर में रह रहे हैं। अविश्वास से कैसा जीवन? तो आज का समय बहुत विचित्र है। बहुत विचित्र है। भगवान बचावे। किसी को चरित्रवान पति मिल जाए या चरित्रवान पत्नी मिल जाए तो बड़ी कृपा समझो भगवान के। नहीं तो आजकल देखो सब चरित्र विहीन हो रहे हैं। नए-नए बच्चे विशेष तो व्यभचार प्रवृत्ति तो मलिन प्रवृत्ति है।

इसमें कैसे कहा जा सकता है कि हमारी संतान है। वरण संकरता फैल रही। पितरों को श्राद्ध तर्पण आदि नहीं मिलेंगे। सब तरह से अधर्म की वृद्धि हो रही है। हमें लगता है सुधार करो। भाई जो सुन रहे हो अपने चरित्र को पवित्र रखो। अपने जीवन को महान बनाओ। ये सब गंदी बातों से कोई महान नहीं बनता है। रमेश कुमार वर्मा जी जयपुर से। श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव भगवान आपके अब तक के जीवन काल की कठोर तपस्या के स्मरण मात्र से ही हमारी रूह का काम जाती है जब सुनते हैं आपके परिकर की युवावस्था से इस पथ पर अग्रसर हैं जबकि हमारी तो किसी एक अंश के बराबरी भी कोई साधना नहीं है महाराज जी ऐसे में हम कैसे ऐसे में अग्रसर हो सकते हैं भजन मार्ग पर इंजन में पावर होता है डिब्बे में पावर नहीं होता डिब्बे में कनेक्शन होता इंजन से इंजन में दो चार लोग ही बैठ सकते हैं।

डिब्बे में सैकड़ों लोग बैठ सकते हैं। हम लोग हैं डिब्बा इंजन है आचार्य और गुरु कनेक्शन है बहुत जोर का तुम हो यात्री चुपचाप डिब्बे में बैठे रहो। काहे परेशान होते हैं? ऐसा लगता है नहीं। तो हम कह रहे हैं कि इंजन बनने की कोशिश क्यों करते हो? डिब्बा में बैठ जाओ चुपचाप ट्रेन वही पहुंचेगी जहां इंजन जाएगा नहीं पहुंचेगी तो जीव भगवान का नित्य अंश है वो अपने आप को भूल गया है संत सद्गुरु देव उसे जागृत कर देते हैं। वो उनके वाक्य पर बैठकर के परमात्म स्वरूप का दर्शन करता है।

ध्यान मूलम गुरु मूर्ति पूजा मूलम गुरु पदम मंत्र मूलम गुरु वाक्यम मोक्ष मूलम गुरु कृपा जो हम किसी महापुरुष की साधना देखते हैं। वह आपके लिए हुई है। वह आपके कल्याण के लिए हुई है। जो सब तरह से असमर्थ हैं उनको भगवान समर्थ बनाने वाले हैं और समर्थ बनाकर असमर्थों का पालन पोषण करवाते हैं। हमको तो ऐसे रहना है। हमें थोड़ी देखना है कि इंजन कहां से चला है। वहां जाकर बैठना है। नहीं मथुरा स्टेशन आ गया है। हम यहीं से बैठ लेते हैं। अपने लक्ष्य को प्राप्त होते हैं।

तो हमारे सामने जो महापुरुष है, संत जन है हम उनका सानिध्य लेते हैं और उनके वचनामृत का पान करते हुए उनकी आज्ञा के अनुसार चलते हैं तो लक्ष्य की प्राप्ति हो जाएगी। जरूरी थोड़ी वो जितना तप किया हमको उतना तप करना पड़ेगा। नहीं हम तो उनकी कृपा से पार हो जाएंगे। बस नाम जप करते रहो। गलत आचरणों का त्याग करो और भगवान की लीला कथा अमृत का पान करते रहो। हर कर्म भगवान को अर्पित कर दो। भगवत प्राप्त हो जाओगे। बिल्कुल सरल उपाय है। नहीं प्रदीप जी महाराष्ट्र से राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम प्रभु जी कुछ दिनों से भगवान की कृपा से साधु जीवन जी रहा हूं।

हम सभी के कल्याण हेतु भूतकाल में साधु हुए हैं। भविष्य में भी साधु होंगे और आज भी साधु हैं। प्रभु याचना करते हुए पूछ रहा हूं कि कि महाराज जी हमारे लिए आप मार्गदर्शन करें। करणीय और अकरणीय सूत्रों को समझाने का। हमारी सबसे पहली बात है कि आप भगवत प्राप्ति करो। जगत भगवत स्वरूप है। इसे भगवत प्राप्ति नहीं करना। हमारी दृष्टि में मत्ता परत न्यतत किंचित अस्ति धनंजय मेरे सिवा किंचिन मात्र कुछ नहीं है। वो सब भगवान पूर्ण परमात्मा है। सब रूपों में बैठा हुआ है। यह हमारी दृष्टि है।

अब हमको अपनी दृष्टि इनमें परमात्म भाव में लाने के लिए। किसी माता बहन की तरफ हमारी भोग दृष्टि ना हो। सबसे पहले साधु के लिए है कामिनी। अगर सतार्ग में चलना है तो बांध लंगोटा बचा के इंद्री कभी ना देखा परारे जो काछवाछ मन निश्चल राखे धन धन जननी तेरी रे नरसी मेहता जी कहते हैं पराई माता बहनों की तरफ कभी भी हमारी काम दृष्टि नहीं हो अगर काम दृष्टि हो भी जाए तो क्रिया कभी नहीं होनी चाहिए साधु वेश में सबसे ज्यादा परहेज इसी बात का सबसे पहला परहेज कि हमें पूरे आजीवन यह नियम रखना है कि पराई माता बहनों की तरफ हमारी गंदी दृष्टि ना हो।

कभी अगर दृष्टि भी गंदी हो जाए। मान लो चूक है। बड़े जन्मों से हम उसी में लगे हुए हैं तो क्रिया नहीं होनी चाहिए। काम क्रिया ये नहीं होनी चाहिए। दूसरी बात हमारी वाणी सत्य का ही प्रवचन करें। सत्य ही बोले। भगवन नाम सत्य है। भगवान की लीला चर्चा कथा सत्य है। इसके अलावा मौन रहे। तीसरी बात हमारी श्रवण इंद्री भगवान की चर्चा ही सुने। विषय चर्चा नहीं। ना विषय चर्चा करनी है ना विषय चर्चा सुननी है और ना विषय दृश्य देखने हैं। मोबाइल रखते हो आप? टच वाला रखते हैं।

हां, बहुत सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि टच मोबाइल हम एकांत में बैठे हैं, पढ़े हैं। मन भजन में नहीं लग रहा तो मन फिर देखने को कहेगा। तो आजकल क्या है कि सीरियल विषय पुरुषों द्वारा बनाए गए हैं। जो घोर संसारी विषय पुरुष हैं। अब वह तो मनो आकर्षक के लिए अपना अंग प्रदर्शन भी करते हैं। क्रिया प्रदर्शन भी करते हैं। कोई भी ऐसा सीरियल नहीं है जिसमें अंग प्रदर्शन ना हो और क्रिया प्रदर्शन ना हो। जिससे मनो वृत्तियां सबकी खींचे। तो विरक्तों के लिए बड़ा खतरनाक खेल है।

इसलिए साधु को चाहिए अभी कुछ ही वर्ष से चला है। हमें लगता है 25 30 वर्ष से चला होगा मोबाइल। इसके पहले तो हमने नहीं देखा। जी साल 2003 के बाद आए। हां क्योंकि पहले के साधु महात्मा बिना मोबाइल के पहले काम क्या नहीं चलता था। मान लो गृहस्थों का तो हम मान सकते हैं कि चलो उनके बहुत से व्यापार हैं, बहुत से कार्य हैं। अपने लोगों को एक लाभ मिल सकता है सत्संग का। भाई इतना अगर हमको हो तो सत्संग के लिए यंत्र रख लेना चाहिए। बकाया हमें लगता है मोबाइल से बचना चाहिए साधु महात्माओं को, संतों को, साधकों को।

नहीं तो यह बहुत खतरनाक खेल है। मनुष्य है। सबके हृदय है। सब कोई अन्न पाता है। तो काम, क्रोध, लोभ तो आते ही है ना। अब उस समय जब काम वेदना जागृत हुई और मोबाइल बगल में रखा है। तो पढ़े लिखे लोग हैं। सर्च कर लिए और भ्रष्ट हो गए। गंदी बातें देखकर, गंदे चित्र देखकर, गंदा दृश्य देखकर हमारे अंदर गंदगी बढ़ेगी। इसलिए हम खुली बात कहते हैं। इतनी सामर्थ्य हो कि केवल सत्संग सुनेंगे। इसके अलावा स्विच ऑफ रखेंगे। तो मोबाइल रखो अन्यथा इसको कूड़ेदा दाने में फेंक दो। तो यह बात देखना है हमको कि मोबाइल कहीं हमें गलत चरित्रों में ना फंसा दे।

गलत मार्ग में ना ले जाए। तो नेत्रों से गलत देखना, कानों से गलत सुनना, वाणी से गलत बोलना यह बंद कर दें। अगर हमारा परमार्थ मार्ग भगवान की कृपा से हमें मिला है तो वह पुष्ट होना चाहिए और वह पुष्ट होता है निरंतर भजन करने से हर समय जो गुरु जी ने आपको नाम दिया हो मंत्र दिया हो उसका निरंतर जप करो जो नाम दिया निरंतर जप करो किसी से ज्यादा मिलो मत भोजन के लिए भिक्षा वृत्ति अपना लो या किसी आश्रम से जाकर के ले लो जैसा भी व्यवस्था बने ज्यादा प्रपंच नई अवस्था अवस्था में नहीं करना चाहिए।

आपकी कितनी अवस्था है इस समय? 33 इस समय तो हम केवल गंगा किनारे रहते थे। कभी किसी नगर में प्रवेश नहीं हुए। जवानी में कभी किसी नगर में प्रवेश नहीं हुए। तो इस अवस्था में तप में जीवन व्यतीत होना चाहिए। कष्ट में जीवन व्यतीत होना चाहिए। तभी वीर्य पचता है। ब्रह्मचर्य का जो वीर्य शक्ति है वो तभी पचती है जब भूख, प्यास, गर्मी, सर्दी, मान, अपमान सब सहते हुए चिंतन केवल भगवान का इधर-उधर भटकने ना पावे। तब हमारा जीवन भगवत प्राप्त हो जाएगा। कम बोलना, कम सुनना, कम देखना, कम सोना और कम आहार करना।

ये पांच पर कंट्रोल करो। स्त्री से दूरी बना के रखो। स्त्री शरीर से अगर ब्रह्मचर्य रहना है। नाटक करना है माया का तो बात अलग है। और रुपया पैसा जितनी आवश्यकता हो बिना मांगे आ जाए। जितने काम में प्रयोग क्योंकि आजकल ऐसा है कि कहीं जाना है कहीं भ्रमण करना है तो मान लो सवारियों का साधन का इतना शरीरों में दम नहीं रह गया कि सवारियों का सवारियों का प्रयोग नहीं किया जीवन भर गंगा किनारे चले गंगा ही रोड रहा है हमारा कोई सवारी की जरूरत ही नहीं रही जब रात्रि हो जाती थी तो गांव के किनारे कोई देवालय या मंदिर या स्कूल उसमें पड़े रह के क्योंकि गंगा किनारे जैसे ऐसे ही पढ़ो तो मांसाहारी कुत्ते हैं जो लाश चीखत चीत के पाते हैं तो पता नहीं वो

जिंदा या मुर्दा कब खा जाए क्या पता तो इसलिए रात्रि के लिए थोड़ा स्थान चयन करते थे शंकर जी का मंदिर है या कोई जैसे विद्यालय है तो उसमें रात्रि में शयन कर गए कोई कुछ दे दिया तो खा लिया नहीं तो फिर जहां सुबह 4:00 बजे गंगा किनारे फिर आ गए किसी से कोई मतलब नहीं दिन में कभी सोते थे गंगा किनारे वही जैसे रात भर सर्दी में कांपते रहे कोई कंबल रखते नहीं थे अब धूप लगी उसमें बेहोश हो गए तो उसी को तुम सोना मान लीजिए नहीं जान के थोड़ी सोना तो तब होगा जब भरपेट भोजन मिले कभी एक रोटी मिल गई कभी दो परेठा मिल गए वो जो आते थे ना गंगा किनारे बारी लगाने वाले लोग खरबूजा तरबूज तो वो लोग जब प्रसाद जैसे पा रहे हैं और उधर से तो दृश्य तो लोगे बाबा तो दे दो तो सब तो देते नहीं थे मान लो चार परेठा है तो दो हमें दे दिए दो ले दो ही से काम चल गया अगर दो परेठा हुए तो प्राणों का पोषण हो गया एक दो दिन के लिए चल जाएगा का काम भगवान वैसे देते रहते हैं।

कहीं कभी ना कभी कुछ ना इतना गुण भी मिल जाता था तो बड़ा धन्यवाद भगवान का देते थे कि भगवान बड़े कृपाल भरपेट भोजन तो यदा कदा एक बार एक सन्यासी की कुटिया में गए झोपड़ी में रहते थे तो वो गंगा किनारे की जानते हैं गंगा किनारे के संतों की रहनी तो उन्होंने कहा कई दिन से भोजन नहीं पाया उनका कहा तीन चार दिन तो हो ही गए भोजन एक आदमी ने दूध पिलाया था तीन-चार दिन पहले तो उनका कहा बैठो को मैं मांग के लाता हूं क्योंकि वो भी विरक्त थे तो कोई त्यौहार होगा उस दिन तो इतनी पूरी कचौड़ी लाए और रख दिया एक भी नहीं बची थी पूरी सब पा गए थे तो हमें बाद में ध्यान आया अब महाराज आपके लिए तो बचा ली बोले हमें पता है गंगा किनारे के साधु कैसे होते हैं अब फिर पता नहीं हफ्ता 10 दिन मिले कि ना मिले ऐसा जीवन था उसी जीवन से भगवत आनंद की अनुभूति होती है नए शरीर को ज्यादा गृहस्थों के घर ना सुलाए ज्यादा गृहस्थों से मित्रता ना करें।

दूरी बना के रखें। जो मिले सो आकाश वृत्ति से खाए और गंगा यमुना का सेवन करके तीर्थ धामों में अब गांव में ना घूमे नहीं मार डालेंगे। कहेंगे बच्चा चोर है। नहीं आजकल तो ये और ये भी चला है कि पहले जैसे संत स्वतंत्र घूमते थे। अब घूम नहीं सकते। तो कंचन कामिनी कीर्ति से बचो और खूब नाम जप करो और बहुत संभल करो। बड़े भाग्यशाली हो जो संसार से हट के भगवान के मार्ग में चल रहे हो। बढ़िया निर्विकार शरीर है। 19 साल से घर से बाहर। हां। तो घर से मतलब ना रखो। घर वालों का फोन नंबर है।

बात करते हो? कभी कबभार घर वालों से नहीं। माता-पिता की ऋण है ना? माता-पिता। सन्यास के बाद कोई ऋण नहीं रहता। सन्यास के बाद जब हम सन्यास ले लेते हैं तो हमारा सारा ऋण भगवान मुक्त करते हैं। हमारा किसी से संबंध नहीं है। जिस दिन से घर से निकले उस दिन से बस हमारा वसुध कुटुंबकम ये सब हमारा परिवार है। यही सब हमारे निज जन है। हमारा और कोई निज जन नहीं। संत का वसुध कुटुंबकम। पूरा विश्व हमारा परिवार है। परिवार का एक क्षेत्र। अब मान लो कोई समस्या परिवार में फोन करे तो डिस्टर्ब हो जाओगे।

फोन से बातचीत करके। यह फोन बहुत जहर है। बाबा जी के लिए तो जहर ही है। है नहीं। अब ऐसे मान लो आपके घर में कोई घटना घटी आपको क्या पता? मस्ती से भजन कर रहे हो। अब कुन कुन कुन कुन हां बोले अमुक मर गए। अच्छा अब जाओ तुम नहीं शरीर से गए तो मन से जाओ। अब परेशान हो। भजन चिंतन छूट गया। तो इसलिए बहुत सावधान होकर बहुत कठिन है। कलयुग भगवान ऐसी ऐसी व्यवस्था करे दे रहे हैं कि भजन हो ही ना पावे। कलयुग में भजन होना सबसे कठिन है और जबकि कलयुग में भजन करके बहुत जल्दी भगवत प्राप्ति की जा सकती है।

अब ऐसी व्यवस्थाएं हो रही है कि भजन कैसे होगा? साधु महात्माओं के पास बढ़िया बढ़िया बड़े-बड़े मोबाइल है, लैपटॉप है सभी हैं। अगर चूक जाओ तो गलत समय नष्ट होने लगेगा। अगर चूक जाओ तो गलत समय नष्ट होने लगेगा। बिल्कुल व्यर्थ में समय तो हम सब संतों से साधकों से प्रार्थना करते हैं कि मोबाइल का सदुपयोग किया जाए। सदुपयोग में आप सत्संग सुन सकते हैं। इसके अलावा आप मत देखिए। स्विच ऑफ रखिए। भगवान का भजन कीजिए। अंतर्मुख होने के लिए जीवन मिला है। बाहर मुख होकर मोबाइल में ही लगे रहने के लिए नहीं मिला है।

दीपा जी दिल्ली से। जय श्री राधे। जय श्री राधे महाराज जी। आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी मैं नौकरी फैमिली सब संभाल रही हूं। खुद को बहुत बड़ी भक्त तो नहीं कहूंगी लेकिन कृष्ण मेरे आराध्य हैं। मेरी उम्र 36 वर्ष की हो गई लेकिन अभी तक अपने जीवन के उद्देश्यों को समझ नहीं पा रही। सब जगह अशांति और उलझने अगर मेरा रास्ता गलत है तो सही रास्ता क्या है? और अगर मैं सही रास्ते पर हूं तो इतनी उलझन और अशांति क्यों है? तो क्या सही रास्ते में उलझन नहीं होती क्या?

अशांति नहीं होती क्या? जितना आप सही रास्ते पर चलेंगे त्याग और वैराग्य और सहनशीलता उतना ही बढ़ानी पड़ती है। महानता त्याग के ऊपर टिकी हुई है। महानता भोग में नहीं टिकी हुई है। भोगों को शांति नहीं कहते। त्यागा निरंतरम त्याग में ही शांति की स्थापना है। हमारा लक्ष्य क्या है? जैसे आध्यात्मिक मार्ग में मैं आगे चलना चाहती हूं। लेकिन जो लक्ष्य में लेकिन नहीं होता। लक्ष्य में अगर मगर लेकिन नहीं लगना होता। लक्ष्य में लक्ष्य है। उसको हमें पहुंचना है। वहां हमें पहुंचना है।

वहां लेकिन शब्द नहीं लगता। इसीलिए आप लड़खड़ा रहे हो। इसीलिए आप अशांत हो। आपका लक्ष्य निश्चित नहीं है। आप लक्ष्य को निश्चित कीजिए। आपकी जीवन शक्ति नष्ट होती चली जा रही है। आयु मृत्यु की तरफ पहुंच रही। 36 वर्ष गए। अब 36 सेकंड है कि नहीं पता नहीं। भरोसा 36 सेकंड का भी नहीं है कि हमारा कब कहां विश्राम हो जाए। नाम जप करो। पति को भगवान का भाव रखो। परिवार को भगवान की सेवा समझो। नाम जप करते रहो। जीवन का लक्ष्य भगवान की प्राप्ति बनाओ। परिवार सब की सेवा का फल भगवान की प्राप्ति होनी चाहिए।

ऐसे चलो क्या परेशानी है? किस बात की अशांति है? महाराज जी परिवार को ले काफी चीजें ऐसी रहती हैं। देखो देखो संसार में दुख और सुख ये समान रूप से आते रहते हैं। जैसे दिन और रात सुख आए तो फूलो मत। दुख आए तो भगवान को भूलो मत। क्रॉस कर जाओगे। सुख में तो हर्षित हो गए तो दुख में शोकित होना पड़ेगा। सबको दुख भोगना पड़ता है। तुम ही नहीं हो। जितने बैठे सबसे पूछ लो। सबका जीवन संघर्षमय है। इन फौज के जवानों से पूछो। महाराज जी मैं भी फौज में ही हूं तो घर से दूर ही रहती हूं।

तो अब अब फिर आपको हमारा पहला शब्द था त्याग में ही महानता छिपी हुई है। हम इनका संतों जैसा सम्मान करते हैं। क्योंकि जहां तैनात कर दे वहीं जीवन को समर्पित किए हुए हैं। परिवार का राग मिटा के अपने शरीर का राग मिटाकर छाती चौड़ी करके दुश्मनों के सामने जहां भी लगा दिया जाए वहीं तैनात है। व हम इनका बहुत आदर करते हैं। और यह हमारे लिए प्रमाण है इस बात के कि अगर हमको अपने परिवार की सुरक्षा चाहिए, हमको अपने राष्ट्र की सुरक्षा चाहिए तो हमको त्याग करना पड़ेगा। अपने सुखों का त्याग करना पड़ेगा।

फिर अशांति किस बात में है? अशांति तब होती है जब हम विरुद्ध चिंतन करते हैं। कि काश मैं अपने घर में रहती होती। काश मैं अपने बच्चों के पास नहीं विरुद्ध चिंतन नहीं। हमें भगवान ने सौभाग्य दिया राष्ट्र सेवा का। हमारा परिवार राष्ट्र सम्मानित करेगा परिवार को। जब कोई फौज का जवान शहीद होता है तो हर भारतीय को लगता है कि हमारे परिवार का गया। आप लोगों को पता हो या ना पता हो हर भारतीय को लगता है कि यार हमारे परिवार का सदस्य गया यह और किसी न किसी भारतीय का सदस्य तो होता ही है तो हम नमन करते हैं अपने देश के सैनिकों को और नमन करते हैं उनको जो संघर्ष करते हुए अपने जीवन को धर्म में चलाते हैं तो फिर चिंता सुख किस बात की जब आप आर्मी में हैं हमारे राष्ट्र सैनिक हैं तो आपको चिंता किस बात की है महाराज जी जैसे मैंने बोला कि कृष्ण मेरे आराध्य है कभी आप बोलते हैं नाम जप करने के लिए या एक दिनचर्या होती है या इस तरीके की चीजें होती है तो हम वो फॉलो नहीं कर पाते।

काफी चीजें ऐसी होती है। कभी हम कभी हम आर्मी के आर्मी के जनों को अगर ठीक से प्रवचन सुना हो तो कभी हमने आर्मी के जनों को कोई दिनचर्या नहीं दी है। जो मिले जब मिले जैसी परिस्थिति हो उसमें राधा राधा बोलो और डट करके अपने जीवन को राष्ट्र सेवा में लगाओ। कोई नियम नहीं। 25ों 50ों भारतीय सैनिक शिष्य हैं। कोई उनके लिए नियम नहीं कि आप 11 माला जपो आप यह जपो आप आप जहां हो भारतीय सेना में हमारे राष्ट्र सुरक्षा में हो। आपकी गोली ही माला है। आप उसी समय अपने बहादुर भाव से देश रक्षा के लिए डटे रहो और अंदर से नाम जप करो।

जो मिल जाए खाओ शरीर पोषण करो। राष्ट्र सेवा में समर्पित करो जीवन। चिंता किस बात की है? किस बात की चिंता है? तो महाराज जी तब लगता है कि सब मुझसे बहुत आगे मतलब इतने बड़े-बड़े भक्त हैं और हम कहीं कुछ नहीं कर पा रहे हैं। क्या कर रहे हैं? अब एक तरफ देखो कि बड़े-बड़े भक्तों को तो राष्ट्र भक्तों को नहीं देखती क्या? राष्ट्र भक्तों का त्याग नहीं देख रहे हो। आप जिस मार्ग में हो उसी मार्ग को पुष्ट करो। राष्ट्र रक्षा के हेतु आपने जीवन अर्पित किया है। तो आप बिल्कुल भगवान भी आपको देख रहे हैं और सरकार भी हमारी आपको सपोर्ट कर रही है।

इसलिए आप चिंता मत करो। खूब नाम जप करो और राष्ट्र सेवा में रहो। ठीक है हेमता जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी आप कहते हैं कि मनुष्य को अपने कर्म किसी ना किसी रूप में भोगने ही पड़ते हैं। प्रभु यदि अपनी संतान के द्वारा ही अपमान मिले तो संतान को तो कोई अपराध नहीं बनेगा ना। उसका तो नया कर्म बन नहीं रहा है। दुर्गति उसकी तो होगी ही। अगर अपने माता-पिता को दंड दे रहा है तो माता-पिता अपने पूर्व कर्म को भोग रहे हैं और वह नया कर्म कर रहा है।

अपने माता-पिता को धर्म विरुद्ध आचरण करके दुख दे रहा है तो उसकी दुर्गति तो होगी। समझ पा रहे इसके लिए क्या कर सकते हैं प्रभु? भगवान से प्रार्थना करो कि उसकी बुद्धि शुद्ध हो। नाम जप करके उसको दीजिए। दो माला चार माला नाम जप कीजिए और भगवान से प्रार्थना करके उसको दीजिए। उसकी बुद्धि शुद्ध हो जाए तो अपराध काहे को करेगा? प्रभु वो खुद नाम जप करती है। श्री जी की सेवा भी करती है। बहुत अच्छी है। और मेरी बहन भी है तो वो भी ऐसे ही करती थी। आज वो बहुत दुखी है। तो इसलिए मुझे बहुत डर लगता है उससे।

सब नाम जप करें। नाम जप से बुद्धि शुद्ध हो जाएगी। शुद्ध बुद्धि से अपराध नहीं होते। हमको पक्की बात पता है। जब तक नाम जप ठीक से नहीं करोगे तो बुद्धि अपवित्र रहेगी। अपवित्र बुद्धि में दूसरों का अपमान, दूसरों की हिंसा, दूसरों का दुख यह बना रहता है। माला चलाना कोई खास बात नहीं। भजन करना खास बात है। माला में अंगुली घूम रही है और जबान में नाम जप नहीं चल रहा, मन नहीं लग रहा तो उसका कोई महत्व थोड़ी है। अंगुली चलाने से थोड़ी कोई महत्व है। तो अंगुली चलाओ या ना चलाओ।

तुम्हारा मन भगवान के चिंतन में लगना चाहिए तो परिवर्तन होगा। अब बाहर अंगुली चल रही है। हाथ की क्रिया हो रही है। मन संसार का चिंतन कर रहा है और जबान से आपका नाम नहीं चल रहा तो व्यर्थ का माला चलाना। केवल माला घूमने से भगवान की प्राप्ति नहीं होती। एक मन का लिया राधा सामने राधा नाम दिखाई दे रहा फिर दूसरा राधा राधा थोड़ा भजन भी बहुत लाभ देगा ऐसे करके देखो भजन करने से बुद्धि शुद्ध होती है और शुद्ध बुद्धि में इतनी क्षमता होती है कि वो दूसरों को दुख दे ही नहीं सकता उसका हृदय इतना कोमल हो जाता है रविंद्र पाटीदार जी राधे-राधे गुरुदेव राधे-राधे आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी मैं भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय में एक वैज्ञानिक पद पर पदस्थ हूं हूं महाराज जी मेरा एक प्रश्न था कि दान किसे कहते हैं?

दान लेने और देने योग्य कौन है? यह किस रूप में तन देखो सही मायने में दान है आवश्यकता की पूर्ति करना। जैसे कोई भूखा आदमी है उसे भोजन की जरूरत है। अब उसे अन्नदान करो। उसे पवा दो। कोई बीमार आदमी है उसे औषधि की जरूरत है। कोई सर्दी से कांप रहा है उसे वस्त्र की जरूरत है। जहां अत्यंत आवश्यकता है और वह असमर्थ है। वहां हम जैसे भूखी गौएं हैं उनकी व्यवस्था नहीं उनकी व्यवस्था कर दो। दान का सही तात्पर्य है आवश्यक अत्यंत आवश्यकता की पूर्ति और दान का पात्र अर्थ का केवल विचार करने की जरूरत है।

भूखे को अन्न देने में विचार करने की जरूरत नहीं। कुत्ता भी भूखा हो तो उसको भोजन करा दो। साधु भूखा हो उसको भोजन करा दो। उसमें पात्रता की जरूरत नहीं है। पात्रता रुपया देने में है। हम रुपया देते हैं। शराब पिएगा यह व्यभचार करेगा कि गंदा आचरण करेगा। रुपया में थोड़ा होश में दान करने की जरूरत है। अन्न वस्त्र औषधि जल इनको तो जहां यथायोग्य अवसर मिले पवा दो उसमें दे क्योंकि लेकिन रुपया में कुमार्गगामी प्रवृत्तियों में रुपया खर्चा होगा तो आपको भी नरक जाना पड़ेगा।

इसलिए उसमें फिर पात्र देखते हैं कि हमारे रुपए का यहां सदुपयोग होगा कि दुरुपयोग। अगर लग रहा है सांगोपांग सदुपयोग होगा तो फिर कर देना चाहिए। जैसे कानपुर की एक बूढ़ी माई धनाड्य थी तो नारदानंद सरस्वती जी के पास नैमी सारणी में गई और एक रुपया निकाला और सामने रखा और कहा प्रभु मैं गरीब आदमी हूं। सोचती हूं कि एक रुपया संत सेवा में लग जाए तो क्या संत सेवा में लग सकता है? उन्होंने कहा हां माई भंडारी को बुलाया कहा एक रुपया का नमक लाओ पूरी दाल में डाल दो सब संतों के सामने दाल परोशी जाएगी और माई आज तुम भी प्रसाद पा लो फिर उसने करोड़ों की संपत्ति स्वामी जी के नाम कर दी कि जो एक रुपए का सदुपयोग कर सकता है वो करोड़ों का सदुपयोग कर सकता है तो रुपया थोड़ा देख समझ के ध्यान देने की बात है अन्य वस्तुएं अवसर पर आवश्यकता पर हमें दे देनी चाहिए उसमें विचार करने की जरूरत में जब अर्थ देने की बात आए जैसे कोई मांग रहा है आपसे संत

वेशधारी एक तो संत मांगेगा नहीं जो भगवान का निज जन है वो कभी ऐसे नहीं करेगा ये हम तुम्हें पक्की बात बता देते हैं जो कहावे मोर दासा करे तुच्छ नरन के आशा तो कहो कहां रहा विश्वासा भगवान का दास कहलाकर मरण धर्मा शरीर धारियों के सामने हाथ पसारे तो भगवान का दास है क्या अरे भगवान की दास दासी है लक्ष्मी जी और लक्ष्मी पति के हम दास हैं कि हमें जो आवश्यकता होगी प्रभु देंगे तुमसे क्या मांगने की जरूरत है तो भगवान का भक्त या कोई संत या सन्यासी है मुझे तो नहीं लगता जो असलियत में सतमार्ग में चलता है उसका लक्ष्य तो भगवान है तत्व ज्ञान है वो रुपया की के लिए ना औषधि के लिए ना यात्रा के लिए पैसा मांगेगा नहीं हां कुछ संतों का ऐसा है कि अगर प्रारब्ध आ जाता है तो उसका सदुपयोग कर देते कुछ संत झंझट में भी नहीं पड़ते।

लेकिन अगर कोई वेशधारी आपसे रुपया मांग रहा है कि हमें तीर्थ यात्रा के लिए या यज्ञ कराने के लिए या इसके तो आप स्वतंत्र हैं ना कहने में बिल्कुल डरिएगा नहीं कि हमारा कुछ अहित हो सकता है। कुछ नहीं अहित हो सकता। हमारी श्रद्धा नहीं हम नहीं देंगे। बिल्कुल साफ रहना चाहिए इस समय। महाराज पानी पीना हो पानी पी लो। भोजन करना हो भोजन पा लो। इसके आगे हमारी श्रद्धा नहीं है। अगर आपकी श्रद्धा दिखाई दे रही कि वास्तविक यज्ञ होने जा रही है। आपको पता है उनका परिचय तो जो बने तन मन धन सहयोग कर देना चाहिए।

मतलब उसमें जानबूझ करके ही दिया जा सकता है। अनजाने में धन नहीं दिया जा सकता कि हमारे धन का दुरुपयोग होगा तो फिर उसमें सद्गति बिगड़ जाएगी। श्राप ऐों के पास भजन बल नहीं होता। ऐसों के पास भजन बल नहीं होता जो पैसा मांगते घूमते हैं और जिनके पास भजन बल होता है वह किसी को श्राप देते भी नहीं है और अगर श्राप दे दिए तो भगवान से मिला देते हैं मुनिनकर क्रोधो मुक्ति दातार नारद जी ने यमलार्जुन को श्राप दिया भगवान से मिला दिया अगर भजनानंदी महात्मा तुम्हें दंड दे दे तो भगवान की प्राप्ति करा देगा भजनानंदी महात्मा कभी पैसा नहीं मांगेगा पैसा मांगने वाला कभी भगवान का भरोसा नहीं रखता तासों के पास वह होता नहीं है जो श्राप देते हैं जो

श्राप की धमकी देते हैं उनके पास कुछ होता नहीं और जिनके पास होता है वो श्राप देते नहीं है क्योंकि सम में वो भगवान को देखते हैं अपने भगवान को श्राप देंगे क्या और अगर कभी दंड विधान के अनुसार कर भी दिया तो भगवत प्राप्ति करा देते हैं मुनि का क्रोधो मुक्ति दातार मोक्ष पद प्रदान करने वाला लगता है इसमें धन तन के दान को वरीता दी गई है तन मन तन तो तन पहले आता है तो क्या तन को वरिता दी नहीं आवश्यकता हां अब जैसे कोई गिरा हुआ आदमी पड़ा हुआ है अब वहां तुम रुपया फेंक के चले जाओ तो किसी काम का नहीं जरूरत है उस समय तुम्हारे तन की अब कोई आदमी बहुत डिस्टर्ब है अब उस समय शरीर से पास बैठे रहने की जरूरत नहीं मानसिकता लगाओ मन लगाओ कि इसकी ये डिस्टर्ब स्थिति को हम कैसे संभाल सकते हैं हंसा के बुला के खिला के औषधि से कैसे कैसे और अब वो जरूरत त है औषधि की तो शरीर और मन से काम नहीं चलेगा।

अब धन से काम चलेगा। औषधि लाके उसको दो। आवश्यकता क्या है? मेरे तन की समय आवश्यकता है या मन की आवश्यकता है या धन की आवश्यकता है? तीनों को देखा जाएगा। तीनों अपनी जगह समान है। अपनी जगह आवश्यकता के अनुसार तीनों बराबर है। तन मन धन जी कबीर दास जी न्यूजीलैंड से हां राधा महाराज जी ये कह रहे हैं कि इनको भोजन की इच्छा ध्यान से हटा देती है। ये मतलब जब खाना शुरू करते हैं तो फिर लगता है ओ आने दे आने दे। नहीं गलत भोजन मत करो। कोई गलत भोजन तो नहीं करते। महाराज ये बोल रहे हैं कि डू नॉट ईट एनीथिंग रोंग।

आई ईट सात्विक आयुर्वेदा। ये कह रहे हैं एक सात्विक भोजन खाते हैं। हां सात्विक भोजन और उसमें भी आधा पेट भोजन पाइएगा। जबान को रोकिएगा। आधा पेट भोजन पाइएगा। ईट हाफ द स्टमक। इक्विवेलेंट टू हाफ द स्टमक। प्लीज हैव कंट्रोल ऑन योर डाइट। दैट्स लाइक आई नो द रूल्स फॉर गुड डाइट, गुड गुड सैट्विक फ़ूड बट नॉट श्योर व्हाई। सेम मिस्टेक इवन ये कह मेरे से गलती हो रही है। मैं जानना चाहता हूं अगर योग में चलना है तो भोजन का सुधार करना होगा। सात्विक भोजन में रोटी, दाल, सब्जी और वह भी अपने भरपेट पाने की क्षमता को जान ले कि हम छह रोटी में हमारा पेट भर जाता है तो हम तीन रोटी खाएंगे और आधा लीटर पानी, एक लीटर पानी और उसके ऊपर वायु तीनों चीजें चाहिए ना।

अन्न, जल, वायु तीनों के द्वारा हमारे प्राणों का पोषण होता है। तो अगर हमारा पेट छह रोटी में भर जाता है तो हम तीन रोटी खाएं शेष जल के लिए और उतना जल पिए कि वायु लेने में, स्वास लेने में हमें भारी ना लगे और भोजन पा के तुरंत हम आसन में बैठ जाएं। ऐसी हमारी क्षमता हो। जी। यू शुड ईट टू इक्विवेलेंट टू हाफ द कैपेसिटी ऑफ़ योर स्टमक। इफ यू आर इफ द कैपेसिटी ऑफ़ स्टमक इज़ इक्विवेलेंट टू सिक्स रोटीज़, यू शुड हैव थ्री। एंड देन यू शुड हैव लेयर ऑफ़ वाटर एंड लेयर ऑफ़ एयर।

यू शुड लीव कैपेसिटी विद इन योर स्टमक सो दैट इट कैन अब्सॉर्ब एवरीथिंग एंड देन यू शुड डेडिकेट योरसेल्फ टू ध्यान। समझ पाए? अंडरस्टैंड यू अंडरस्टुड? अंडरस्टुड प्लीज आईडी ट्राइंग अभ्यास करूंगा। हां अभ्यास ये रूल्स जानता हूं। मैं अभ्यास करूंगा उसका। हां। आसन पे बैठना जानते हो? पद्मासन या सिद्धासन? डू यू नो टू सीट ऑन आसन? पद्मासन और सिद्धासन? या वन वन हैविंग। कौन सा आसन जानते हो? पद्मासन लगाओ। देखो भारतीय आसन विदेशी लगा रहे हैं और भारती बैठ रहे हैं कुर्सी पे।

बैठो। ऊपर चढ़ा दिया। हां। नीचे वाला ऊपर चढ़ा। यह सिद्धासन की तरफ है लेकिन पूरा सिद्धासन भी नहीं। पद्मासन एक बार लगा सकते हो? कैन यू डू पद्मासन? फॉर लोटसमीटस कमलासन। लोटस दैट्स राइट। वैसे बहुत अच्छा साधक है। करेक्ट। बढ़िया है। आप बहुत अच्छे हो। यू आर वेरी नाइस। बस आहार सुधार लो। ब्रह्मचर्य इंप्रूव योर डाइट एंड फॉलो ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्य नो गर्लफ्रेंड ओनली गॉड गर्लफ्रेंड। ओनली गॉड भगवान गर्लफ्रेंड है। बहुत सुंदर। बहुत सुंदर। वेरी नाइस। बहुत सुंदर।

अच्छा जीवन है। हां कोई ऋषि मुनि की कृपा है आपके ऊपर क्योंकि विदेश में रहते हुए विदेश में पैदा होते हुए भारतीय संस्कृति का अब देखो नोया बच्चा है। कितने सुंदर सात्विक भाव से चल रहा है। अपने यहां नए के बच्चे जो है विदेशी फार्मूला अपना रहे हैं और विदेशी हमारे धर्म को अपना रहे हैं। धन्यवाद आपको। यू आर वेरी ब्लेस्ड दैट यू आर फॉलोइंग द सात्विक मार्ग। गॉड ब्लेस यू। अतिथि जी हरियाणा से। श्री हरिवंश महाराज जी श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मेरा प्रश्न है कि हमें भगवान जी को कैसे भोग लगाना चाहिए?

उनके सामने भोग रख के पर्दा लगा देना चाहिए या फिर अपने हाथों से खिलाना चाहिए? अपने हाथों से पवा पर्दा किसके लिए लगाएं? पर्दा तो वहां लगाया जाता है मंदिर में जहां बहुत भीड़ बाहरी होती है। अपने घर में तो सब उनके सेवक होते हैं। तो अपने हाथ से प्यार से पवाना चाहिए। एक-एक कवल आराम आराम से पवाना चाहिए और मनाना भी चाहिए। थोड़ी खीर पा लीजिए और पा लीजिए। तो वो तुम्हारे भाव को देख रहे हैं। भाव उत्सवन भजताम रसकाम भगवान को फिर भूख लगने लगेगी। वो आपसे प्रार्थना करने लगेंगे कि मुझको अब यह चीज खवाओ।

स्वप्न में आकर बताने लगेंगे। एक दिन हमारे ठाकुर को भोग लगने में थोड़ी सी त्रुटि हो गई। तो हम मध्यान में विश्राम कर रहे थे। सो एकदम आए। बोले भूख लगी। फिर जग गए। ये स्वप्न में देखा। फिर जब जगे तो हम कहा अरे तुरंत ठाकुर जी को जगवाया और सबको तैयार किया तुरंत भोग बनाओ तुरंत ठाकुर जी को भोग लगाओ ठाकुर जी अपने भावुक भक्तों को वो अनुभव कराते कि मैं भोजन पाता हूं मुझे भूख लगती है मैं सोता हूं मुझे ठंडी लगती है ऐसा अनुभव कराते हैं तो आप अपने हाथ से पवाओ और उस समय पर्दा लगाने की जरूरत नहीं पर्दा दूसरों के लिए लगाया जाता है अपने ठाकुर अपने पवा रहे तो पर्दे की क्या जरूरत है ठीक है राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा आ

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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