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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #874 · 9 अप्रैल 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

विक्रांत जी दिल्ली से राधे-राधे गुरु जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी यदि किसी फील्ड में हम प्रसिद्धि पाना चाहते हैं तो उसमें बार-बार विफल होते हैं तो उसे छोड़ देना चाहिए या अंतिम समय तक उस कार्य को करते रहना चाहिए हां नाम जप करो करो आराधना करो और क्योंकि पूर्व प्रारब्ध विफलता ला रहा है तो नवीन क्रमाण इतना जोर हो जाए कि उस प्रारब्ध को दबा दे तो आप विजय को प्राप्त हो जाएंगे तो नाम जप करो भगवान का जो नाम प्रिय हो खूब नाम जप करो और ये भावना करो कि इस फील्ड पर हम विजय प्राप्त कर ले तो हो जाएगा गुरु जी जब से आपको देखा जब से राधा राधे ही जप रहे हां तो आप देखना राधा राधा का कमाल देखना हां श्याम सुंदर अधीन हो जाते हैं राधा नाम से तो फिर और कोई कामना की पूर्ति राधा किशोरी जी तो महा करुणामई है खूब नाम जप करो और जब तक सफलता नहीं मिले तो जिस फील्ड में लगे उसी में लगे रहो और नाम जप करो तो आगे उसमें सफलता मिल जाएगी प्रारब्ध बुरा प्रारब्ध जो है जो हमें असफल कर रहा है वो क्षीण हो जाएगा तो विजय प्राप्त

हो जाएगी सनी्नी जी लंदन राधेधे राधेधे महाराज जी प्रभु जी मैंने बचपन में श्री कृष्ण संकीर्तन में एक गुरु जी से दीक्षा ली थी फिर जब मैं बड़ा हुआ तो हमारा पूरा परिवार जिन गुरु जी को मानता था वहां से दीक्षा ले ली। महाराज जी क्या दो गुरु से दीक्षा लेना गलत है? और मैं कौन से गुरु द्वारा दिया गया? गलत है। कोई खिलवाड़ थोड़ी है। पर यह है कि बचपन में तो अबोध अवस्था होती है। पर जो दीक्षा लेनी चाहिए वो किसी की प्रेरणा के अनुसार नहीं लेनी चाहिए। जब अपना विवेक जागृत हो जाए और जिन संत भगवान पर ब्रह्म बुद्धि हो कि गुरु साक्षात परम ब्रह्म और अध्यात्म पे चलन तब दीक्षा लेनी चाहिए अब इनको दीक्षा ले ली उनसे दीक्षा ले ली उनसे दीक्षा ले ली पता नहीं कि हमें जाना कहां है करना क्या है अब किसका भजन करें मान लो तीन चार जगह दीक्षा ले ले तो कहां किसका भजन करें गुरु एक शिक्षा गुरु चाहे आप 50 बना लो लेकिन दीक्षा गुरु एक होना चाहिए चाहिए।

शिक्षा के लिए भगवान दत्तात्रेय जी ने 24 गुरु बनाए। शिक्षा गुरु लेकिन दीक्षा एक गुरु से होनी चाहिए। ये सब खिलवाड़ वाला बच्चों पन वाला बात हो रही है ना तो अब कहां तुम्हारी श्रद्धा है? दोनों जगह गुरु जी। एक कृष्ण भगवान के एक हमारे गुरु जी के एक जगह किशन भगवान के दूसरी जगह कौन भगवान के हैं। दूसरे गुरु जी को बोलते हैं। गुरु जी को मानो। अच्छा तो किशन जी गुरु जी हैं। गुरु जी किशन जी हैं। ऐसा मान लो दोनों एक ही हैं। नाम जप अभी कौन सा करें जो बचपन में लिया था वो बोला नाम जप करें कि ये वाला नाम कर अभी हमको क्यों अपराध करवाओगे कि हम कहे कि उनका ना करके उनका करो।

अब आप देख लो इसीलिए ये दुविधा में दोनों गए माया मिली ना राम तो ये बात ठीक नहीं। एक चयन करो। एक ही का किसको चयन किया? आपको चयन किया। अब तीसरा है। आपने तो और कमाल कर दिया कुमारी कोमल जी उत्तराखंड राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव कई बार श्री जी के लिए भोग बनाते समय मन में अनेक प्रकार के व्यंजन आते हैं जैसे खीर हलवा पूरी इत्यादि परंतु समय नहीं आता ये हमारी इच्छा है या श्री श्री जी की पाने की इच्छा उसको उसको भावना में लाओ कि हमारी श्री जी आज ये पाना चाहती किसका प्रश्न हमारी हमारी श्री जी आज ये पाना चाहती इसलिए हमारे दिमाग में बात आई और बनाओ अच्छे से श्री जी को पवाओ और फिर हो सके तो श्री जी के भक्त

को पवाओ और अगर स्वयं पाना हो तो थोड़ा किनका ले लो फिर गौ और अन्य जीवों को बांट दो अच्छे-अच्छे पदार्थ स्वयं नहीं पाने चाहिए उनको बांटना चाहिए जो श्री जी को अच्छे-अच्छे पदार्थ भोग लगावे तो उसको बांट कर पाना चाहिए अकेले नहीं पाना चाहिए स्वयं अगर स्वयं रोज हलवा पूरी पाओगे तो बीमार भी हो जाओगे तो अच्छे-अच्छे पदार्थ जो भावना में आए अपने पास अर्थव्यवस्था है तो थोड़ा थोड़ा भोग बना के नहीं तो हमें लगता है रोटी सब्जी दाल रख दो थोड़ा मीठा रख दो और इसके बाद भावना में पवाओ भावना में अमुक हलवा बनाया अमुक हलवा बनाया अमुक रायता बनाया अमुक कढ़ी बनाए ये ये और विविध पदार्थ भावना में पवाए भावना में पा लो प्रसाद तो कोई परेशानी भी नहीं भावना सबसे ज्यादा श्रेष्ठ रहती है पदार्थ हम कहां तक लाएंगे पदार्थ भावना में जैसे आज हमारा मन है कि श्री जी को हम 50 प्रकार के भोग बनावे तो हमें जो जो याद है वो सब 50 प्रकार के भोग अपने दिमाग में तैयार किए और सोने की थाली बड़ी सी है और अलग-अलग कटोरियों में प्रिया प्रीतम विराजमान

अपने हाथ से पवा रहे हैं और सामने भोग लगा दो रोटी दाल सब्जी और हम 50ों चीजें श्री जी को पवा रहे तो भावना में पवा दिया करो और जो प्रगट में हो सुविधा हो तो प्रगट में भोग लगा दिया करो और भोग लगा के बांट दिया करो क्योंकि स्वयं अच्छे अच्छे-अच्छे पदार्थ पाएंगे तो भजन नहीं बन पाएगा। स्वामी हरिदास जी के लिए आता है उत्तम भोग लगाए मोर मरकट को सेव। उत्तम भोग लगाते थे अच्छे-अच्छे पदार्थों का लेकिन वृंदावन के ब्रजवासी मोर मरकट ब्रजवासी जन इनको पवाते कर्मवीर जी आगरा से महाराज जी राधे-राधे गुरुदेव क्या निकुंज में सभी को श्री जी का बराबर प्रेम मिलता है या वहां भी जिसकी जो सेवा या भाव ज्यादा बराबर प्रेम प्रेम में इतना मिले सबको श्री जी का बराबर दुलार मिलता नहीं कोई जीवित ही ना रह पावे अगर ऐसा लगे कि हमें श्री जी कम चाहती हैं तो कैसे जी पाएंगे बराबर वैसे ही प्यार सबको पर्सनल श्री जी सबकी पर्सनल है हां श्री जी पर्सनल है सबकी पर्सनल मतलब जैसे को लगता है ना श्री जी केवल मेरी है तो ऐसे अनुभव आएगा कि श्री जी केवल मेरी है।

अब दूसरा पान पवा रहा है। उस समय आप इतने तन्मय है कि वो पान आप ही पवा रहे हैं श्री जी को। हर सेवा आपके द्वारा हो रही है। पर वो वहां पहुंचने पर पता चलेगा क्योंकि यह सब चिदानंदमय बात है। प्राकृतिक शब्दों से उसका वर्णन किया ही नहीं जा सकता। जो सहचरी भाव के द्वारा प्रिया प्रीतम की सेवा है वो चिदानंदमय सेवा है और चिदानंद में द्वैत नहीं होता प्रेम गलति सा में दोनों समाए उसमें द्वैत नहीं होता उसमें तदात्म होता है जैसे गोपी जन कह रहे हैं कान भय प्राण में प्राण भय कान में ही में ना जान परे कान है कि प्राण है वो बात हो जाती है अक्षी जी राधा वल्लभ श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम गुरुदेव मेरे शरीर का भाई अपने कर्मों के फल से शारीरिक व मानसिक रूप से अस्वस्थ है।

जिस कारण वो माता-पिता से ऐसा व्यवहार कर देता है कभी-कभी जब जो माता-पिता के करने योग्य नहीं है। क्या उसको इसका फल भोगना पड़ेगा? क्योंकि वह तो अनजाने में करता है महाराज जी। हां अब जैसे पागल आदमी तो उसको तो दंड नहीं मिलेगा क्योंकि उसको तो दंड स्वत मिल ही रहा है। उसकी बुद्धि अपवित्र है। अब अपवित्र पागल बुद्धि जैसे इसीलिए कानून भी पागल के साथ बर्ताव अगर साबित हो गया रिपोर्ट में कि पागल है तो उसे सजा देने के लिए उसमें मरवत होती है कि आखिर विक्षिप्त है।

पागल है वो कुछ भी कर सकता है। तो तो पशुवत आचरण स्वाभाविक हो रहा है। वो कोई संकल्प करके थोड़ी कर रहा है। उसकी कोई निर्णय पूर्वक थोड़ी क्रिया है। वह तो एक स्वाभाविक क्रिया है। तो मुझे तो लगता है कि उसके द्वारा किया हुआ कर्म जो है वो विकर्म ही माना जाएगा। अकर्म में ही जाएगा। वो फल देने में समर्थ नहीं हो पाएगा। गुरुदेव लेकिन ना उसे पश्चाताप भी होता है कि अगर मैं यह क्रिया कर देता हूं तो उसे मान लो पागल अवस्था उन्माद अवस्था में कर गया। बुद्धि शांत हुई तो पश्चाताप हो रहा है।

लेकिन वो रहेगा उन्माद वाली बात ही में। जैसे उन्माद में किसी कुछ हो गया पागलपन में तो बाद में उसको पश्चाताप हो रहा है तो बाद में अगर बुद्धि काम कर रही तो पश्चाताप हो रहा है ना इसलिए उसको दंड नहीं मिलेगा गरिमा जी राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया है। गुरु मंत्र मिलने पर भी उसे ना जपा संसार में बड़ा मन लगता था। जब से माता-पिता गुजरे तब से मन उचाट हो गया। आपका सत्संग सुनने से उत्साह हुआ कि मुझे नाम जप करना जरूरी था। अभी महाराज जी अब जितनी स्वासे बची है उतना जप लो जितना जीवन बचा है अब सुधार लो अब लो नसानी अब ना नश जितना समय बचा है यह भगवत प्राप्ति कराने में समर्थ है खडवांग जी को जब पता चला कि दो घड़ी 48 मिनट तो उन्होंने दो घड़ी में परमात्म प्राप्ति कर ली 48 मिनट में अपनी इंद्रियों को समाहित करके भगवान में लगा के भगवान की प्राप्ति कर ली तो हमारा जितना भी सेकंड बचा है हर सेकंड राधा राधा राधा राधा तो हमें निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

मीनाक्षी जी मैनपुरी से राधे राधे राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी गोस्वामी तुलसीदास जी ने प्रभु को प्राप्त करने के लिए दो मार्ग बताए हैं। एक ज्ञान मार्ग एक भक्ति मार्ग महाराज जी ज्ञान मार्ग थोड़ा सा कठिन नजर आता है। इसलिए भक्ति मार्ग को बहुत उत्तम बताया गया। परंतु भक्ति भी कई प्रकार की बताई गई है। जैसे हनुमान जी ने प्रभु राम जी से अनपायनी भक्ति की मांग की। सनकादिक ऋषियों ने प्रभु से प्रेमा भक्ति की मांग की। गोस्वामी जी ने स्वयं अविरल भक्ति विशुद्ध भक्ति की याचना की।

एक ही पर्यायवाची शब्द है। प्रेम लक्षणा भक्ति के पर्यायवाची अनपायनी भगवान के चरणों के सिवा अन्य कोई आशा भरोसा ना हो। अविरल निरंतर भगवान में चिंतन वृत्ति चली जाए। प्रेम लक्षणा भगवान से प्रीति हो जाए। ये एक ही बात निरंतर भगवान का स्मरण रखना। अन्य भावों का त्याग होकर अन्य इच्छाओं का त्याग करके एकमात्र भगवान में ही अपनी आस्था भाव विचार जितना चिंतन वो सब और भगवान से प्रेम करना एक ही बात है अलग-अलग है जैसे शरणागति के कहीं है आत्म समर्पण कहीं है प्रपत्ति कहीं उसे शरणागति तो बात एक ही है उसको शब्दावली के द्वारा अलग-अलग कहा गया है और भक्ति सरल नहीं है अगर किसी को लगता हो भक्ति भी बहुत कठिन है निरंतर अंतर संसार के चिंतन को काटते हुए भगवान का चिंतन करना भक्ति है।

देवर्षि नारद जी कह रहे हैं तदपिता अखिलाचारिता तद विस्मरण परम व्याकुल तेति समस्त आचरण कृष्णपित हो श्री कृष्ण के अनुकूल हो प्रतिकूलस विसर्जनम प्रतिकूल एक भी आचरण ना हो कितना कठिन है सब आचरण भगवान श्री कृष्ण के अनुकूल हो तो भगवान के अनुकूल क्या होगा गीता जी है भागवत है इनमें बताया गया है कि आप ऐसे चलो ऐसे चलो ये करो ये ना करो करो तो जो शास्त्र कह रहा है करो वो श्री कृष्ण अनुकूलेन जो कह रहा ना करो वो प्रतिकूलस तो विसर्जनम प्रतिकूलता का त्याग और भगवान के अनुकूल आचरण करना भगवान के अनुकूल अपने मन के अनुकूल नहीं अपनी वासनाओं के अनुकूल नहीं श्री कृष्ण अनुकूलन प्रतिकूलस विसर्जनम प्रभु के प्रतिकूल आचरण प्रभु का तस्मात शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थित क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए यह शास्त्र आज्ञा करता है तो शास्त्र आज्ञा के अनुसार किए हुए कर्म को भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित करता हुआ तद स्मरणन परम व्याकुल तेति एक क्षण के लिए भी वो विस्मरण बर्दाश्त नहीं करता इतना भगवत

स्मरण परायण है अन्य कामना शून्य अन्याभिलासिता शून्य कोई भी अन्य अभिलाषा ना हो केवल श्री कृष्ण मिलन की श्री कृष्ण प्रेम की अभिलाषा हो बस इसी का नाम प्रेम लक्षणा भक्ति है। कोई भी आचरण प्रभु के प्रतिकूल ना हो। एक भी वृत्ति श्री कृष्ण से विमुख ना हो। कोई अन्य चाह ना हो। अन्य आशा भरोसा ना हो। इसी का नाम भगवान की निरपेक्ष भक्ति है। अनुपायनी भक्ति है। शरणागति हुई कि इस भक्ति के लक्षण आने लगेंगे। पहले शरणागति पुष्ट करो। खूब भगवान की लीला कथा सुनो, खूब भगवान की लीला कथा गाओ, खूब नाम कीर्तन करो, खूब नाम जप करो।

दूसरे में भगवान की भावना करके सेवा करो। तब ये साधन भक्ति के द्वारा प्रेम लक्षणा भक्ति का प्रादुर्भाव होता है। जी राजेंद्र कुमार शुक्ला जी रायपुर छत्तीसगढ़ से राधा वल्लभ श्री हरिव श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी अपने शरीर व संसार के प्रति आसक्ति है जो प्रयास करने के बावजूद भी कम होने का नाम नहीं ले रही। महाराज जी ऐसे में कैसे इसके प्रति राग द्वेष आत्मक वृत्त नाम जप करो जितना भजन होगा उतना ही मन निर्मल होगा निर्मल मन अनासक्त होता है मलिन मन आसक्त होता है जो मलिन मन है वो शरीर और भोगों में आसक्त होता है जो निर्मल मन है वो अनासक्त होता है शरीर और भोगों से विरक्त होता है तो हम पहले मन को निर्मल करें मन को निर्मल करने के लिए भगवन नाम जप बहुत बड़ी औषधि है जा सुना नाम भयो भषज हरण घोर त्रिशूल दैहिक दैविक भौतिक तापों को मिटाने वाला और समस्त पापों को मिटाने वाला समस्त मलों को नष्ट करने वाला भगवन नाम है इसलिए भगवन नाम अधिक से अधिक जप करो गुरु के द्वारा मिले हुए भगवन नाम जप करने से बहुत जल्दी लाभ प्राप्त होता है।

अभी अगर गुरुदेव ना मिले हो तो जो नाम तुम्हें प्रिय हो वो नाम जप करो। जब गुरुदेव में ले जाए तो उनके द्वारा दिए हुए नाम के द्वारा इस माया पर विजय प्राप्त करो। माया मलिन मन पर अटैक करती है। निर्मल मन भगवान की तरफ जाता है। निर्मल मन जन सो मोह पाओ। इसलिए खूब नाम जप करो। पर नाम जप तभी होगा जब भोजन पवित्र होगा। गृहस्ती में धर्म के द्वारा कमाए हुए धन से अतिथ्य सत्कार करते हुए भगवान को जो भोग लगा के पाया जाता है उसे पवित्र भोजन कहते हैं। अगर भोजन पवित्र नहीं है तो फिर भजन नहीं बनेगा।

और भोजन के साथ भक्त संग भजन न होई संग बिन भजन बिना नहीं प्रेम छिनहु भजन न छाड़िए धरिए या ध्रु नेम भजन बिना भजनानंदी भक्तों के दर्शन संभाषण से नहीं होता अगर भक्तों का दर्शन संभाषण ना हो तो भजन नहीं होने वाला भजन तभी होता है जब भगवत प्रेमी महात्माओं का संग हो तो महात्माओं का संग और पवित्र भगवत अर्पित भोजन और पवित्र आचरण और खूब नाम जप करो। अभी देखो सब ठीक हो जाएगा। अभी हमारी जहां ममता लगनी चाहिए वहां ममता पहुंच जाएगी। जहां हटनी चाहिए वहां अपने आप हट जाएगी।

भजन किए बिना बुद्धि से नहीं होता है। बुद्धि से गणित लगाते रहो। माया अपना काम करेगी। आपको परास्त कर देगी। नाम जप करो। खूब नाम जपो। मृदुल जी राधे-राधे महाराज। राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी ईश्वर एक है जो हमारे और सबके हृदय में बैठा हुआ है। तो महाराज जी हम सब क्यों एक दूसरे को निंदा करते हैं? एक दूसरे आप देखा आपने ईश्वर को जो आपके हृदय में बैठा है। इसीलिए ईर्ष्या द्वेष करते हैं कि हम केवल ज्ञान की बातें कर लेते हैं। अनुभव बिल्कुल नहीं है।

अगर अनुभव हो जाए कि सबके हृदय में ईश्वर है तो फिर निंदा स्तुति अपमान मान ये सब बातें चली जाए। ईश्वर सम है फिर समता आ जाए विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण गवस्तनी स्वच सुपाकेचा पंडिता समदना वो समदर्शी महात्मा विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण में गाय में हाथी में कुत्ते में चांडाल में एक ही जो परमात्मा को देखता है वो राग द्वेष रहित होता है राग द्वेष कब होता है जब हम मनुष्य देखते हैं। परमात्मा तो देखते नहीं। आपने जो कहा सबके हृदय में एक ही परमात्मा बैठा है। ऐसा आपको अनुभव हुआ नहीं हुआ।

ऐसा लोग कहते हैं सुनते हैं अनुभव नहीं करते। जो अनुभव कर लेता है वो समदर्शी महात्मा हो जाता है। एक थप्पड़ मारे इधर चंदन लगावे दोनों के प्रति समान भाव होगा। तनिक भी उसे आवेश नहीं आएगा। क्रोध नहीं आएगा। जैसे अपनी दांतों से ही जबान कट जाए तो किस पर क्रोध करें? अपने हाथ से अपने चोट लग जाए तो किस पर क्रोध करें? ऐसे एक ही ईश्वर जो हमारे हृदय में बैठा है सबके हृदय में बैठा है। अगर उससे द्वारा हमारे हृदय में पीड़ा पहुंची तो दूसरा थोड़ी वो तो अपनी आत्मा ही है।

पर यह ज्ञान है कहां? ये केवल बातों से थोड़ी होगा। ये जब अनुभव होगा साधना करके तब वो स्थिति आएगी। तभी तो महात्मा समदर्शी होते हैं। तो महात्मा बनना खिलवाड़ थोड़ी है। पहले हम संसार के भोगों को त्यागे, संसार के राग को त्यागे, शरीर के अभिमान को त्यागे और खूब भजन करें। तब जाकर के हमारा अध्यात्म मार्ग खुलेगा। अध्यात्म मार्ग खुल गया तो यह स्थिति आ जाएगी। नहीं तो राग द्वेष पूर्वक तो पूरा चराचर जगत जी रहा है। पशु पक्षी भी इसी में जी रहे हैं। नहीं हां तो इस बात का अनुभव ना होने के कारण ये राग द्वेष रहता है।

जिस दिन अनुभव हो जाएगा उस दिन राग द्वेष का नाश हो जाएगा। समझ पाए आप? महाराज जी मेरा कहना ये था कि जैसे हमें सिखाया जाता है कि अपने सभी का सम्मान करें। तो इसका मेरा जो कहने का अह अर्थ था वो यह है कि अगर मैं अपने पिताजी का सम्मान करता हूं तो यह ठीक है। लेकिन मैं किसी दूसरे के पिताजी का अनादर करूं वो चीज गलत है। अन्य धर्म के लोग हमें गलत बोलते हैं। हम लोग उनको गलत बोल रहे हैं। सोशल मीडिया पे ये सब चीजें हर अब हमारी अभी बात समझ ही नहीं पाए तुम। जो तुम कह रहे हो ये राग द्वेष तो है ना।

सर्व राग द्वेष का नाश हो जाएगा। जब समदर्शी परमात्मा को सब जगह देखोगे। अपने पिता और दूसरे पिता में भगवान एक ही तो है ना। अपने भाई और दूसरे भाई में भगवान एक ही है ना। अपने देशवासी और दूसरे देशवासी में भगवान एक ही है ना। वो विश्वदर्शी महात्मा हो जाता है। विश्वात्मा भगवान सर्वत्र विराजमान है। तभी वो राग द्वेष से रहित होगा। नहीं तो ये तो ममता का लक्षण है। मोह का लक्षण है कि अपने पिता का आदर किया और दूसरे वृद्ध का अनादर किया। अपने परिवार से राग है और पड़ोसी के परिवार से द्वेष है।

यही तो ममता मोह है। यही तो अज्ञान है। यही तो अविद्या है। और आप जो बात कर रहे हो वो ज्ञान की बात कर रहे हो कि एक ही परमात्मा सर्वत्र विराजमान है। और ऐसा होते हुए भी ऐसा क्यों होता है? क्योंकि सबको अनुभव नहीं होता है। क्योंकि सब वाणी से बोल सकते हैं। केवल दूसरे को सुना सकते हैं। लेकिन हृदय में अनुभव नहीं तो हृदय में अनुभव ना होने के कारण वो ज्ञान की बात करते हुए भी अज्ञान की चेष्टा करेगा। अज्ञान की क्रियाएं करेगा। तो आपको लगेगा ऐसा क्यों हो रहा है?

क्योंकि वो अज्ञानी है इसलिए हो रहा है। समझ पा रहे हैं आप? चिदंबर फंडिश जी राधे-राधे। राधे-धे महाराज जी दंडवत प्रणाम महाराज जी संसार और गस्थ निभाते हुए आध्यात्मिक लक्ष्य को जल्दी कैसे पाया जा सकता है महाराज जी शास्त्र सम्मत गृहस्थ धर्म में आचरण किए जाए तस्मात शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थित फिर मनमानी आचरणों का त्याग हो पहले शास्त्र सम्मत आचरण हो और धर्म के द्वारा अर्थ की व्यवस्था संभाली जाए हमारे यहां चार पुरुषार्थ है पहले है धर्म फिर है अर्थ फिर काम फिर मोक्ष मतलब धर्म के द्वारा अर्थ व्यवस्था से अपनी कामनाओं की पूर्ति की जाए तो मोक्ष पदवी की तरफ बढ़ने का चांस है।

अगर धर्म को हटा दिया जाए और केवल कामना पूर्ति के लिए मनमानी आचरणों के द्वारा धन कमाया जाए तो मोक्ष हट जाएगा। अपने आप हट जाएगा। फिर उसे दुर्गति को प्राप्त होना पड़ेगा। तो धर्मा आचरण करते हुए पवित्र धन के द्वारा अपने परिवार का पोषण करें और परिवार को भगवान की सेवा समझे नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी अपने परिवार को भगवत अर्पित भावना से और खूब नाम जप करें जितना समय मिल जाए इसी से उसे कलयुग में भगवत प्राप्ति हो जाएगी अगर वो नाम जप नहीं करता है तो भी वह धर्मात्मा पुरुष उत्तम लोकों को प्राप्त होगा लेकिन भगवत प्राप्ति की बात नहीं कह सकते और नाम जप कर रहा है तो निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी क्योंकि कल नास्ते नास्ते नास्ते गति अन्यथा भगवन नाम के बिना अन्य कोई साधन अब समर्थ नहीं है जो भगवत प्राप्ति करा सके भगवान का नाम तो पुत्र के बहाने से अजामिल ने नारायण बुला दिया तो भगवत प्राप्ति हो गई और अगर हम नारायण को जानबूझकर नारायण नारायण जपेंगे तो हमें भगवत प्राप्ति क्यों नहीं हो जाएगी जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपको पहले कहते सुना था कि भोगों से आसक्ति हटाने के लिए नाम जप करो और भगवान को अर्पित करके खाना खाओ।

महाराज जी मेरी भोगों में शक्ति इतनी बढ़ चुकी है कि यह शरीर अब बर्बाद होने की कगार पे है। दिमाग को पता है कि ये बुरा है फिर भी हो रहा है। गुरुदेव मैं आलस्य से भर चुकी हूं। हालात ये हो चुके हैं कि मैं पेट मतलब ये कह रहे हैं कि अब भूख ना लगे इसके लिए कुछ करना चाहती हूं और आपके बताए दिनचर्या का पालन कर सकूं। खाना शुरू करने से पहले नाम लेती हूं और खाना शुरू करते लेकिन कभी-कभी भूल जाती हूं। फिर आलस और खाने पीने असली बात आपका प्रश्न है आपका शरीर ही आपको दुख देने के योग्य हो चुका है।

अब इतना शरीर बैठने में, उठने में, चलने में, दिनचर्या में ये आलस्य प्रवाह तो करें। कोई आप शरीर हो क्या? आप इतना शरीर को बढ़ा लिए। आपके क्या वो है क्या? हां वो क्या थायराइड? थायराइड वो है क्या? हां। तो फिर आप उस रोग की औषधि कीजिए। उसकी औषधि इतना भारी शरीर उठना बैठना चलना फिरना कार्य करने में बड़ी परेशानी होती है तो आप उसकी औषधि लीजिए ले रहे प्रभु जी मैं आयरलैंड में जहां रहती हूं कह रहे हैं कि ले रहे हैं बट कह रहे हैं कि जब खाना शुरू करते हैं फिर मतलब थोड़ा सा जहां खाना बनता है वहां पे मांस आदि बनता है तो भगवान को अर्पित करके खा नहीं पाते भाई इस विषय में तो हम ज्यादा नहीं बोल सकते जहां मांस आदि बनता है उस रसोई का तो स्पर्श भी हमारे दिमाग से तो नहीं होना चाहिए।

खानपान तो बहुत बड़ी बात है। जिस नहीं बर्तन अलग कर लिए। बर्तन अलग कर लिए बट कह रहे हैं कि खाने की आसक्ति है। उसको कैसे कम करें? ये तो भाई मुख्य भाव ये है कि हम थाल में पहले रखे हैं कि आठ रोटी पा सकते हैं। तो हम चार पाएंगे। चार रोटी एक चम्मच से सब्जी डाल ली। थोड़ी दाल डाल ली। बस भगवान को भोग लगा। दोबारा लेना नहीं है। नियम बनाना पड़ेगा। नियम बनाना पड़ेगा तभी ये शरीर फिर बार-बार भूख लगेगी तो उसको सहो ना राधा राधा राधा जपो अपने लोग तो पांच-प दिन छह-छह दिन भोजन नहीं मिलता था गंगा किनारे जब भ्रमण में थे तो उसको सहा जाता है सहने से अभी सब ठीक हो जाएगा ये सब पाप के लक्षण होते हैं जितने रोग होते हैं फिर मतलब अगर पा उधर चार पांच जने रहते हैं ये अपने बात बर्तन तो अलग कर लिए हैं बट कह रहे हैं कि वही रसोई में बनाते हैं तो भोग लगा सकते हैं हां अपने बर्तनों के द्वारा रसोई को पवित्र ित्र कर लिया अपने बर्तनों में बना ठाकुर जी को अर्पित करो पर पहले निकाल के रख लो कि हम जैसे पता है हमको 10 रोटी चाहिए तो पांच रोटी रख लो और वही भोग लगा के फिर और दो बार पाओ भोजन और एक बार बाल भोग थोड़ा ले लो बाल भोग में जो भी आपको फल फ्रूट दूध जो भी अनुकूल पड़े और दो बार भोजन पाओ एक नियम बनाओ तब तो ठीक रहेगा और नाम जप करो और नहीं अभी कितनी अवस्था है आपकी 28 साल अभी क्या कोई अवस्था है आपकी?

अभी इस समय आपका इतना भारी शरीर हो गया। यह आपको जीना मुश्किल कर देगा। उठना बैठना चलना फिरना ये सब परेशानी कर देगा। अभी आप सावधान हो जाओ। जी राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी मुझ में आत्मविश्वास की कमी है। महाराज जी अगर मुझे कोई एक बात सुनाता है तो मैं उसे चार बात सुना देती हूं और बहुत सोचती हूं। फिर मन अशांत हो जाता है। फिर महाराज जी बहुत जिद्दी स्वभाव के हो गए हो कि मन इधर-उधर विचलित करता है। ये जितने भी हमारे अंदर मलिनताएं हैं वो भगवान से विमुख होने के कारण है।

अगर हम भगवान के सन्मुख होकर भगवान का यशोगान सुने, भगवान का नाम कीर्तन करें, भगवान की आराधना करें तो हमारे अंदर दिव्य दैवी सद्गुण आ जाए। दैवी ये दैवी संपदा है कि कोई हमें गाली दे, हम मुस्कुरा के चले जाए। यह साधारण क्षमता थोड़ी है। सामने वाला हमें गाली दे रहा, मुस्कुरा के चले गए। यह दैवी संपदा है। यह भागवतिक सद्गुण है। यह कोई छोटी मोटी बात थोड़ी है। सामने वाले ने गाली दिया, हमने चार गाली दे दिया। ये तो सांसारिकता है। तो हमारे अंदर जो सांसारिकता है उसको दूर करने के लिए हमें भगवान की शरण में जाना होगा।

भगवान की आराधना करनी होगी। भगवान की लीला कथा सुननी होगी। भगवान की लीला कथा का गायन करना होगा। घर में बैठकर एक अध्याय रोज गीता भागवत का गायन करो। देखो आपकी बुद्धि शुद्ध होती है कि नहीं। आप में क्षमता आती है कि नहीं? अब देखो टीवी के सीरियल और मनमानी आचरण किए जाए और फिर सोचा जाए कि हम दैवी संपदा धारण करें तो असंभव है। राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी मोह, अहंकार और माया का लालच के कारण बहुत सी गलतियां हुई हैं। जीवन में अब बहुत पछतावा होता है। कैसे अपने आप को इससे मुक्त करूं?

अगर पछतावा होता है तो मुक्त होने में देर नहीं लगेगी लेकिन वास्तविक पछतावा हो तब ना पछतावा हो कि हृदय जल रहा है अब खाना अच्छा नहीं लगता पानी अच्छा नहीं लगता रात दिन एक जलन पैदा हो रही है मेरे से ऐसा तो वही पश्चाताप ही उसको भस्म कर देगा और होता है रात को सो नहीं पाती अंदर से चिंता होती है क्यों हो गया कैसे हो गया हां तो ये ये पश्चाताप ही उस जो भी मलिनता है उसका नाश कर देगी और खूब भगवान का नाम जप करो। नाम जप करते हो अधिक से अधिक भगवान का नाम जप करो।

नाम जप से ही कलयुग में भगवत प्राप्ति है। अन्य युगों में अलग-अलग भगवत प्राप्ति के साधन थे। जैसे सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में पूजा लेकिन कलयुग में केवल हरि नाम केवल हरि नाम कलौ नास्तेव नास्तेव नास्तेव गति अन्यथा भगवान श्री कृष्ण दपान व्यास देव जी महाराज तीन बार कहते हैं कि बिना हरि नाम के किसी का भी कल्याण नहीं हो सकता। नहीं हो सकता नहीं हो सकता। हरे नाम हरे नाम हरे नामव केवलम कलौ नास्तेव नास्तेव नास्ते गत अन्यथा हर प्रश्न का उत्तर नाम जप है नाम जप करो आप देख लो हर प्रश्न का उत्तर समाधान आपको मिल जाएगा हर बात का समाधान हर संकट का समाधान हर चीज जो चाहिए वो सब नाम कल्पतरो जप के तो देखो अब नाम ना जप करो भगवत विमुख होकर गंदे आचरण करो चाहो सुख तो कैसे प्राप्त हो सकता सुख सिंधु भगवान से विमुख होकर किसी को सुख मिला है।

इन मलिन माया के भोगों में कहीं सुख है? जितने भोगे सब हाथ मलते रह गए और यहां से चले गए। मनुष्य जीवन का जो परम लाभ है वो है परोपकार करो और नाम जप करो। अगर चार रोटी भगवान ने दिया है तो एक रोटी अपनी चार में से निकालो। पशु पक्षियों को बांट दो। भक्त को पवा दो। किसी गाय को दे दो। किसी वैष्णव को दे दो और अपना पेट पर पालो। तीन रोटी से पूरे परिवार का ऐसे चला जाता है गृहस्ती में। अगर हमारे पास चार रोटी है तो तीन में पूरा परिवार पाते हैं। एक रोटी दूसरे को देते हैं और खूब नाम जप करते हैं।

देखो आनंद आ जाए। लेकिन आज का मानो दूसरे की चारों अपहरण करके स्वयं सुखी होना चाहता है। उसको भूखा रखना चाहता है। दूसरे का छीन झपट करके बेईमानी करके घूसखोरी करके वो सुखी होना चाहता है। कैसे हो सकता है? अधर्मी कभी सुखी नहीं हो सकता। और धार्मिक सदैव सुख को प्राप्त होगा। वर्तमान में दुख ही देखकर के उसको यह सोचो कि यह धर्म करता है, दुख भोगता है तो धर्म का परिणाम दुख है क्या? नहीं। यह वर्तमान का नहीं है। पूर्व का किया हुआ कर्म है। वर्तमान का जो धर्म है उसे जय और सुख को प्राप्त कराया।

महाराज जी डेढ़ साल से मैं वहां सुन रही थी। पर आपके दर्शन और प्यार खींच के ले आया। अब मेरी गलतियां माफ कर दो। मेरे को पक्ष दो। मैं खूब नाम जप करो। खूब नाम सुना गुप्ता जी यूएसए से राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी भगवत मार्ग में आगे बढ़ते हुए साधक के जीवन में क्या संकेत अथवा पड़ाव आते हैं जीव का अंतःकरण तीन गुणों से प्रभावित रहता है सतोगुण रजोगुण तमोगुण कोई सतोगुण प्रधान होता है सबका एक जैसा नहीं होता कोई सतोगुण प्रधान होता है कोई रजोगुण प्रधान होता है, कोई तमोगुण प्रधान होता है।

वैसे ही उसके भाव जागृत होते हैं। वैसे ही उसकी भक्ति होती है। वैसे उसका लक्ष्य दृढ़ होता है। लेकिन तीनों गुणों से जब पार हो जाया जाता है त्रिगुणातीत तब सबके समान स्थिति आने लगती है। उसमें कोई भी चाह ना रह जाना। किसी भी भोग की, किसी भी पद की, किसी भी लोक परलोक के सुख की कोई चाह ना रहे। एकदम शांत एकदम ऐसी तृप्ति कि जैसे केवट से भगवान कह रहे हैं कि अब ये अंगूठी ले लो सिया जी की। तो कह रहा अब कछु नाथ न चाहे मोरे। दीन दयाल अनुग्रह तोरे। प्रभु आज जो चरण पखारने को मिला उसमें जो मुझे सुख मिला बहुत काल में कीन मंजूरी बहुत जन्म जन्मांतर सब कर्म किए आज मैं पूरा हो गया हूं आज दीन सब विधि भल पूरी अब कछु नाथ ना चाहिए मोरे दीनदयाल अनुग्रह तोरे जब भक्ति का त्रिगुणातीत आनंद मिलता है तो उपासक के हृदय से एक बात निकलती है अब कुछ नहीं चाहिए अब कुछ नहीं चाहिए जब तक कुछ चाहिए तब तक अभी साधक को भगवनंद नहीं मिला है।

और जब जाह ना चाही कबहु कछु जाह ना चाह कबहु कछु तुम सन सहज सने बसो निरंतर तासुर सुरा निज के पहले सबसे पहले चाह पर आक्रमण होता है चाह मिटी चिंता मिटी मनुआ बेपरवाह जिनको कछु न चाहिए वे साहन के सा महात्मा है वही साधक है तो हम गुणा गुण के अंतर्गत की बात नहीं बोले गुण के अंतर्गत में बताया कि अंतःकरण तीन गुणों से प्रभावित होता है। कोई सात्विक प्रवृत्ति वाला होता है, कोई राजसिक प्रवृत्ति वाला होता तो, कोई तमोगुणी प्रवृत्ति वाला होता है। उसकी प्रधानता में बहुत भेद हैं।

भक्ति के बहुत भेद हैं। लेकिन गुणातीत जब होगा साधक भजन प्रभाव से तब सबकी एक जैसी स्थिति आने लगेगी। फिर गुणों के भेद से स्थितियां बदलती है। गुणातीत स्थिति में भगवान का जो अंश है अविनाशी वह तो निर्विकार है। वो विकार को पकड़ लिए था। अब भक्ति के रंग से विकार मुक्त हुआ तो निर्विकारता उसके अंदर आ जाती है। मतलब चाह मिटना शुरू हो जाता है। सकल कामना हीन जे राम भगत रस लीन। जो कामना रहित हो चुके हैं वही भक्ति में लीन होते हैं। तो गुणातीत भक्ति गुणातीत स्थिति गुणातीत भगवान का चिंतन ऐसे आनंद का सृजन हृदय में करता है कि उसका हृदय शांत हो जाता है।

सबसे पहला भाव है शांत भाव। शांत में आपको कोई गाली दे या आपकी स्तुति करे दोनों का प्रभाव आपके हृदय में नहीं पड़ना चाहिए। तब उसे शांत कहा जाएगा। आपका मान हो या अपमान आप सुख की परिस्थिति हो बाहरी या दुख की आपके हृदय में कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। यह गुणातीत स्थिति की बात कर रहे हैं। यह जो आगे चलकर स्थिति भक्ति का रंग आता है वह इस कोटि का आता है। शत्रु मित्र समझानी मानी मान अपमान सम दुख लाभ ना हानि यह जो कृपा हरिवंश की दुख सुख लाभ हानि शत्रु मित्र मान अपमान इनमें समान भाव जागृत हो जाता है और भगवान के नाम में इतना प्यार हो जाता है कि तद स्मरणन परम व्याकुल ते जरा सा भूल हो जाने पर उसके प्राण व्याकुल हो जाते हैं।

जैसे मछली को जल से अलग करो तो तड़पने नहीं लगती। ऐसे वो भक्त तड़पने लग जाए एक क्षण के लिए व्याकुलता भगवत विस्मरण में इतनी जोर की कि प्राण व्याकुल हो जाए यह गुणातीत स्थिति है उसकी और तदपिता अखिलाचारिता समस्त आचरण श्री कृष्ण अनुकूलन प्रतिकूलस विसर्जनम भगवान के अनुकूल ही उसके आचरण होंगे प्रतिकूल आचरणों का त्याग क्योंकि कोई चाह ही नहीं रह गई इतना आनंद उसके हृदय में आ गया अब उसकी कहीं भी ममता नहीं रह जाती ममता रहितम कामना रहितम वह ममता केवल प्रभु के चरणों में अनन्य अपने इष्ट देव के चरणों की ममता जागृत हो जाती है।

जैसे मीरा जी कहती मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई ऐसे अपने इष्ट से प्यार हो जाता है। इष्ट से अपनी प्रीति हो जाती है। धीरे-धीरे उसकी स्थिति इतनी बढ़ती है कि देह का विस्मरण होने लगता है। मैं स्त्री हूं, मैं पुरुष हूं। मुझे क्या करना है, क्या नहीं। ये भगवान आकर हृदय में बैठ के करवाते। उसकी क्षमता इसके ऊपर हो गई। अब भगवान उसके हृदय में जैसे अर्जुन के बागडोर पकड़े बैठे हैं। ऐसे उसके हृदय में बैठ जाते हैं और जो मन आता है सो करवाते हैं। ये जितने बड़े-बड़े कार्य संतों द्वारा होते हैं स्वयं भगवान करते हैं।

उनके हृदय में बैठकर के जगत का परिवर्तन, जगत का मंगल जो उच्च कोटि की वो बातें मतलब मनुष्य कृत नहीं होती। लाखों लोग बदल रहे हैं। करोड़ों लोगों का उद्धार हो रहा। वो भगवान उस संत को निमित्त बना के स्वयं बैठकर के कार्य करते हैं उनके हृदय में। तो वो चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष हो उसका हृदय भगवान का भवन हो जाता है। भगवान का मंदिर बन जाता है। जो पूर्ण रूप से भगवान अनंत गुण है। अगर हम दिन भर ऐसे वर्णन करते रहे ना तो भी पार नहीं पाएंगे। भगवान गुण धाम है तो समस्त गुण भक्त में आ जाते हैं।

समस्त दैवी संपदा आ जाती है। पर दो बातें बस ध्यान देनी है खास कि वो भगवान के प्रतिकूल कभी आचरण नहीं कर सकता और भगवान को भूल नहीं सकता। बस दो बातें पकड़ लो तो सब आ जाएंगे इसी में। तदपिता अखिलाचारिता और तद विस्मरण परम व्याकुलते भगवान का विस्मरण असय हो जाता है उसके लिए। हर समय नाम जप करता रहता है और भगवान के अनुकूल आचरण करता है। क्योंकि चाह जब तक भोगों के तभी तो पाप कर्म होते हैं। जब चाह खत्म है चाह प्रभु की हो गई तो प्रतिकूल आचरण बनेंगे ही नहीं। पर यह बहुत ऊंची भक्ति में इसके पहले खूब प्रयास करना होता है।

तभी तो तीनों गुणों के साम्या अवस्था को प्राप्त होता है। नहीं तो गुण ऐसा थोड़ी है। जब जो गुण चाहे वो करवा लेता है। जैसा चाहे वैसा सोचवा लेता है। वैसी क्रिया करवा लेता है। जी क्या कह पागल भी गुणातीत हो सकता है। जैसे वह भी किसी से राग द्वेष नहीं रखता। नहीं ऐसे नहीं चिंतन से होता है। ऐसे नहीं कि बुद्धि पागल है तो गुणातीत हो गया। ऐसा एक पागल की हरकत और एक गुणातीत की हरकत में बहुत अंतर होगा। नहीं जैसे समाधि की स्थिति होती है। घोर गाढ़ सुशुप्ति गाढ़ सुसुप्त समझते हो ना गहरा से सोया हुआ बिल्कुल भान नहीं शरीर का और यही समाधि की स्थिति होती है।

लेकिन उसमें जागृत होते हुए भी गाढ़ सुशुप्त जागृत होते हुए गाढ़ सुशुप्त उसे समाधि कहते हैं। और ऐसे सुशुप्त सो रहा है तो तो मतलब उसका कोई महत्व थोड़ी है। गाढ़ सो रहा है तो समाधिष्ट थोड़ी माना जाएगा। लेकिन समाधिष्ट की गाढ़ सुसुप्त जैसी स्थिति होते हुए भी जागृत में किंचिन मात्र कोई स्पना नहीं। तो पागल और सिद्ध पुरुष में बहुत अंतर है। वह अज्ञान के द्वारा बंधा हुआ और वो ज्ञान के द्वारा मुक्त पुरुष है। तो पागल को थोड़ी होगी स्थिति प्राप्त होगी। चिंतन से प्राप्त होती है ना।

अब पागल का चिंतन ही ठीक नहीं है। तो क्या है? वो पागल जैसा लग रहा है। वो पागल थोड़ी है। वो तो शास्त्र वेदों का परम ज्ञाता विद्वान महापुरुष है। वो पागल जैसी चेष्टा कर रहा है। अपने शास्त्र आज्ञा करते हैं कि बहुत बुद्धिमान होने पर भी जड़वत आचरण करें। अपने को दिखावे में ना लावे। कोई जान ना पावे कि इस कोटि का महापुरुष है। तो हो सकता है ऐसा महापुरुष पागल जैसा दिखाई दे रहा हो। पागल जैसी चेष्टा लेकिन वो पागल नहीं है। और पागल जो है वो ज्ञानी नहीं है। वो परम पद का अधिकारी नहीं वो नरक जाएगा और वो पागल जैसी चेष्टा करके परम पद में बैठा हुआ है।

जीवन मुक्त है क्योंकि उसने भजन चिंतन करके ऐसी स्थिति प्राप्त की है। समझ रहे हैं? एक जानबूझकर नाटक करना और एक असलियत में पागल होना। तो असलियत में जो पागल है वह तो बेचारा अपने कर्म का फल भोग रहा है। लेकिन जो जानबूझकर पागल का रोल कर रहा है वह अपने आप को बचा रहा है। वह तो सिद्ध पुरुष है। जीवन मुक्त महापुरुष है। समझ पाए बच्चा महाराज जी जैसे हम पशुओं को है ना जैसे वो मृत आप बोलते हो मरते शाम नाम सुना देना चाहिए। जैसे हम पशुओं से कोई क्रम नहीं बनते। शुभ अशुभ उनको भी जैसे घर में पशु उनको राधा नाम कीर्तन होता है।

उनकी भी गति हो जाएगी। पक्का गति हो जाएगी। यदि अंतिम समय कान में राधा नाम पड़ा और शरीर छूटा तो भगवत प्राप्त पशु तो दो साल मरे पशु तो पर राधा नाम तो सुना रहे हैं पर वो कर्म कोई नहीं बन रहा उनसे नवीन है ले फाइनल तो आखिरी वाला माना जाएगा उनका मंगल होगा लेकिन फाइनल आखिरी वाला उनका शरीर छूट रहा है और उनके कान में राधा नाम पड़ा वो भगवत प्राप्त हो जाएंगे। यह सौभाग्य पशु पक्षी कोई भी हो नहीं तो जैसे कई ऐसे पशुओं के चरित्रों में आता है कि भक्त के घर में होने के कारण उन्हें राम नाम कृष्ण नाम हरि नाम सुनने को मिला और अंतिम समय भगवान को प्राप्त हुए तो अंतिम समय फाइनल की बात है।

अब जैसे अभी आप बोल लिए राधा और तो अब जब अंतिम समय आपका आएगा उस समय का फाइनल देखा जाएगा कि अब कहां है आपकी चित्रवृत्ति तो यदि गलत जगह हुई तो इसका आपको फल मिलेगा राधा नाम का कि आपको चांस मिलेगा भजन करने का लेकिन फाइनल आखिरी में होगा अंतिम जीवन का फाइनल राधा ये अजामिल का हो गया था फाइनल में बोला नारायण बेटे के लिए ही सही पर मुख से नारायण निकला यमदूत आ गए गला दबा दिए तो भगवान के पार्षद आ गए उनकी फांस काट करके उनको जीवन मुक्त कर दिया तो क्या नारायण पहले नहीं बोला था हजारों लाखों बार बोला होगा जब बेटे का नाम है तो उस समय ना भगवान के पार्षद आए ना कोई घटना घटी अंतिम फाइनल में जब शरीर छूटने का था तो पुत्र को बुलाया नारायण बस इसी से फाइनल हो गया फाइनल अंतिम में है।

इसीलिए हम प्रयासरत रहते हैं पूरे जीवन कि अंतिम समय हमारा भगवान के नाम का स्मरण हो जाए और शरीर छूट जाए तो हम भगवान को प्राप्त हो जाएंगे। ऐसे जप रहे हैं व्यर्थ नहीं जाएगा। नामे भक्त प्रणसति भक्त का नाश नहीं होता। भजन का नाश नहीं होता। पर भगवत प्राप्ति का फाइनल वो आखिरी में होगा। उस समय अगर भगवान का स्मरण आ गया तो जीवन मुक्त। नहीं आया तो फिर चांस देंगे भगवान। ऐसे भक्तों के यहां श्रीवान कुलवान के यहां जन्म देंगे जहां आपको भजन का सहयोग मिले फिर भजन करके निकल जाए तो चाहे पशु हो चाहे पक्षी हो या मनुष्य हो कोई भी हो अंतिम समय उसके कान में नाम पड़ जाए तो उसको भगवत प्राप्ति होती है।

सुरेंद्र जी कोशिश है। राधे-राधे महाराज जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी ये प्रकृति हमें सब कुछ देती है। हम इसका कर्ज कैसे चुका सकते हैं? नहीं प्रकृति का कर्ज का मां का कर्ज चुका सकते हो क्या? मां का कर्ज चुका सकते हो क्या? नहीं चाहे कोई सन्यासी हो, चाहे कोई हो, मां को साष्टांग दंडवत करके महाप्रभु चैतन्य देव ने कहा था कि माता सची से कि अगर हम अपने श्री अंग की चमड़ी उतार कर आपकी पादुका बनाए तो भी हम आपसे उ नहीं हो सकते। मां तो ये जगदंबा है। ये जगतंबा है।

प्रकृति परमात्मा पिता है और प्रकृति मां है। हम इससे उण तभी हो सकते हैं जब हम परमात्मा प्राप्त हो जाए। तो हम प्रकृति से मुक्त हो जाएंगे। मना कष्टान इंद्रियाण जो प्रकृति स्थान करसति वो परमात्मा स्थान आ जाए तो हमारा सब काम सब ऋणों से मुक्त हो जाए। मात ऋण पित ऋण देव ऋण ऋषि ऋण सब ऋणों से मुक्त हो जाए। यदि भगवत प्राप्ति हो जाए और भगवत प्राप्ति नहीं हुई तो फिर पुनरप जननम पुनरप मरणम इसी की गोद में बार-बार जन्मना मरना सूअर कुत्ता जो भी बनाए बनना पड़ेगा जन्मना पड़ेगा प्रकृति के बंधन से मुक्त होना है प्रकृति के ऋण से मुक्त होना है तो परमात्मा की प्राप्ति अनिवार्य है।

भगवत प्राप्ति के बिना इससे मुक्त नहीं हुआ जा सकता। भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी ने एकादशी स्कंध में भागवत में कहा है कि जो मेरा भजन करके मेरे को प्राप्त कर लेते हैं वो समस्त ऋणों से मुक्त हो जाते हैं। तो समस्त ऋणों में भी प्रकृति भी आ गई। यही है ना प्रकृति। अब आप देखो जब हम अलग करके देखेंगे तो फिर समझ में आना कठिन हो जाएगा। आप प्रकृति को ऐसे देखते हैं ना ऐसे देखो। यह भी तो प्रकृति है। पंच भौतिक यह प्रकृति है। यह हम थोड़ी है। हमारा स्वरूप थोड़ी है। ये ये तो प्रकृति का रचा हुआ स्वरूप है।

जो हमारा स्वरूप है वो परमात्म स्वरूप है। भगवत अंश है। तो उसको तो देखा नहीं। देखो बड़े आश्चर्य की बात है। 30 35 40 के हो गए। लेकिन एक मिनट भी अपने आप को नहीं देखा। देखा कभी? आपसे कहा जाए देखा? बोले हां देख यह देखें यह आपका स्वरूप नहीं है। यह प्रकृति के द्वारा रचा हुआ है। यह भी तो प्रकृति का रचा हुआ है। अंतःकरण वो भी प्रकृति का है। स्वभाव वो भी प्रकृति का है। तीनों गुणों से तीन शरीर बने हुए हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण जो इन तीनों शरीरों का लाग त्याग करके परमात्मा में स्थित होता है, वह जीवन मुक्त होता है ज्ञान मार्ग में।

और जो तीनों शरीरों को भगवान के चरणों में समर्पित करके निरंतर भजन करते हुए, अशुभ प्रवाह करते हुए रुदन करते भगवान को पुकारता रहता है। वह भक्ति के द्वारा भगवान को प्राप्त कर लेता है। दो ही मार्ग पुष्ट मार्ग हैं। एक ज्ञान और एक भक्ति। कर्म योग तो दोनों तरफ हो सकता है। ज्ञान का भी उसमें और भक्ति का भी उसमें लेकिन स्वतंत्र भगवत प्राप्ति के जो मार्ग हैं वो जैसे भक्ति है ऐसे ज्ञान योग है। बिना ज्ञान के माया से तरना कठिन है और बिना भगवान के प्रेम के शुद्ध ज्ञान होना कठिन है।

इसलिए उत्तम जब हम आते हैं तो भक्ति आती है। उसी के पुत्र हैं ज्ञान वैराग्य। तो नाम जप करो। भगवान के आश्रित रहो। भगवान की कृपा मनाओ। वही हमें प्रकृति से मुक्त कर देंगे। प्रकृति का उपकार नहीं है। प्रकृति में हम फंसे हुए हैं। हमें छूटना है प्रकृति से। प्रकृति का उपकार नहीं है। क्या उपकार है प्रकृति का? प्रकृति हमें जल दे रही है। वायु दे। नहीं तो प्रकृति प्रकृति का ही पोषण कर रही है। हमें थोड़ी जल चाहिए। हमारा जो स्वरूप है उसे कभी पानी थोड़ी चाहिए। नैन छिन शस्त्राण नैन धात पाव चैन क्ल मारता।

जल उसे भीगाया नहीं सकता। आग उसे जला नहीं सकती। अस्त्र उसे छेद नहीं सकता। जो हमारा स्वरूप है। अब यह प्रकृति से रचा हुआ शरीर है। इसको जरूरत है। क्षितज जल पावक गगन समीरा तो इसको वही वायु की जरूरत है। किसको? प्रकृति को। मेरे को थोड़ी जरूरत है। बोले मैं वायु नहीं लूंगा तो मर जाऊंगा। नहीं मैं अविनाशी हूं। अभी यही तो ज्ञान नहीं जाना। यही तो सत्संग नहीं कहना। मेरा स्वरूप अविनाशी है। मैं वायु से जीवित नहीं हूं। वायु से जीवित प्राण है इस शरीर के प्रकृति जनित प्रकृति से ही प्रकृति का परमात्मा पर प्रकृति से पोषण नहीं होता उसका समझ पा रहे हो शायद समझ पाओ क्योंकि अध्यात्म है थोड़ा गढ़ है तो जब हम आते हैं जब प्रकृति शब्द देखते तो इधर देखते हैं यह प्रकृति है नहीं नहीं इधर लौट के देखो यह प्रकृति है यह प्रकृति है इसी पर विजय प्राप्त करना इसी से राग रहित हो जाना यही प्रकृति प्रकृति में प्रकृति का भोग हो रहा है।

जीवात्मा को कुछ भी नहीं चाहिए। बस अपने स्वरूप को भूलकर भगवान की विस्मृति करके इस शरीर में लग गए तो फिर बात गलत हो गई। प्रकृति है ना ये जानते हो ना? तो भूख प्यास जितने सब प्रकृति में हो रहे हैं। परमात्मा में थोड़ी हो रहे हैं। ना जीवात्मा में हो रहे हैं। प्रकृति शरीरों में हो रहे हैं। प्यास लगी प्राणों का धर्म है। भूख प्यास पाना देखना सुनना सब इंद्रियों का धर्म है। हर इंद्रिय अपना प्रभाव दिखा रहे हैं। तो आप कहां हो? और वही बात देखनी है कि हम अपने आप को भूल करके इसे अब आपा मान लिया।

बस यही बंधन है। इसी से हचना है। एक मिनट कभी अपने को नहीं देखा आपने। 30 35 वर्ष हो गए इस घर में रहते हुए और अपने को नहीं जाना तो क्या ज्ञान है अपने को नहीं जाना हम भगवत अंश है और यही जहां जानने लगोगे तहां फिर जितेंद्र होने लगोगे गंदी बातें छूटने लगेंग भगवान का भजन होने लगेगा ठीक है नाम जप करो सत्संग सुनो परोपकार करो इसी से मंगल होता है राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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