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संतजन इतना जप-तप करते हैं फिर भी कष्ट में देखे जाते हैं, क्या सबको प्रेम प्राप्त होता है?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

प्रशांत जी मथुरा से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी भारत में अनेक साधु संत महात्मा जो आजीवन सच्ची भक्ति जप तपा करते हैं एक उच्च कोटि का जीवन जीते हैं। उनको शायद शरीर त्यागने पर दोबारा जन्म ना लेना पड़े। पर सांसारिक और सामान्य दृष्टि से उनका जीवन बहुत कठोर और कष्टपूर्ण होता है। पहली बात यह होती है कि सती को पातिव्रत धर्म में कष्ट महसूस नहीं होता। उसे प्यार महसूस होता है। व्यभचारिणी को एक पति के अधीन रहने में कष्ट का अनुभव होता है।

समझ पा रहे हो ना आप? जो साधु महात्मा भगवान के मार्ग में सच्चाई से चलते हैं उनको कष्ट का अनुभव नहीं होता। उनको परमानंद का अनुभव होता है। अगर कष्ट का अनुभव हो तो चला ही नहीं जा सकता। क्योंकि हम चले हैं। यह नहीं होता कि भाई आप अनुमान करके कह रहे हो। हम उसे जिए हैं। वो साधु महात्मा का जीवन गुरु भगवान की कृपा से जिए हैं। 11 वर्ष की अवस्था से ले अभी तक जो भी आयु है उसे जिए हैं। तो कष्ट का अनुभव थोड़ी होता है। पांचप दिन छ दिन भोजन नहीं मिला तो एक आनंद का अनुभव होता है।

एक अद्भुत आनंद उसी आनंद की उमगन में हर कष्ट सहजा है। माता-पिता से बिछो स्त्री भोग का त्याग रस इंद्री जनेंद्र के भोगों की तरफ से पूर्ण उदासीन गर्मी सर्दी बरसात मान अपमान निंदा स्थिति सबको सहते हुए क्योंकि एक परमानंद का अनुभव होता है। तो उसमें कष्ट नहीं होता। कष्ट देखने वाले को लगता है। उसमें नहीं जैसे वीर पुरुष को युद्ध क्षेत्र में कष्ट का अनुभव नहीं होता। उसके अंदर एक उन्माद होता है विजय शिव प्राप्त करने का और जब उसके अंगों में घाव होता है तो उसके अंदर और उन्माद प्रबल होता है।

लेकिन कायर पुरुष को ये देखकर लगता है बहुत कष्ट है इसे। समझ पा रहे हैं ना? तो परमात्मा का मार्ग आनंदमय है ना कि कष्टमय। संसार का मार्ग कष्ट में है। परमात्मा का जो मार्ग है आनंदमय है। स्वयं परमात्मा श्री कृष्ण इस संसार को दुखालयम अशाश्वतम कह रहे। पहली तो ये बात हुई। अब दूसरी बात यह हुई कि जो साधारण जीव है उसको उतना तप करने की जरूरत नहीं पड़ेगी जितना महापुरुषों ने किया है। इंजन बनाने में ज्यादा परिश्रम पड़ता है और डिब्बा बनाने में उतना परिश्रम नहीं पड़ता।

पर इंजन एक दो तीन चार लेकिन डिब्बा 100 150 इंजन से कनेक्शन की जरूरत डिब्बे की है। अगर ठीक कनेक्शन है तो इंजन में एक दो तीन चार लेकिन डिब्बे में 100 150 लोग वहीं पहुंचेंगे जहां इंजन पहुंचेगा। तो हम लोग जो संतों का आश्रय लेते हैं, अनुसरण करते हैं, उनकी आज्ञा पर चलते हैं और खाते पीते मौज मस्ती से हम वहीं पहुंच जाते हैं जहां संत कष्ट करके पहुंचते हैं। क्या सभी को प्रेम प्राप्ति और आनंद की प्राप्ति होती है अंत समय में? नहीं। लक्ष्य क्या था? कल्याण, आनंद और प्रेम।

तीन स्टेशन है। आनंद की प्राप्ति। भगवान में अपनापन होने से होती है। कल्याण की प्राप्ति तो घोर पापी अजामिल को भी हो गई। अपने पुत्र के मिस से उसने नारायण बुलाया अंतिम समय उसको परम पद की प्राप्ति कल्याण मिल गया। लेकिन प्रेम प्रेम ही अत्यंत दुर्लभ वस्तु है। प्रेम तो उन्हीं को प्राप्त होता है जो जननी जनक बंधु सुतारा तनु धन धाम सुरहद परिवारा सबकी ममता ताग बटोरी मम पद्म नहीं बांध बर डोरी समदर्शी इच्छा कछु ना हर्ष शोक भय नहीं मन माही अस सज्जन मम उर्व बस कैसे लोभी हृदय बसह धन जैसे स्वयं भगवान श्री राम जी कह रहे हैं माता से पिता से भाई बंधु पत्नी धन संपत्ति घर परिवार सब की ममता बटोर कर जिसने मेरे चरणों में लगा दिया जो संत समागम ज्ञान के प्रधान भाव में आकर सब जगह एक ही परमात्मा का दर्शन करते हैं।

समदर्शी कोई इच्छा नहीं रह गई। जो कामना रहित है विनिवत्त कामा और जो सुखदख में समान भाव हर्ष शोक से रहित महापुरुष हैं वही भगवान को प्यारे हैं वही भगवान को प्यार कर सकते हैं। भगवान को प्यार करना सबसे कठिन बात है। यद्यपि हम अनजाने में प्यार उन्हीं से करते हैं। मानो हम आपसे प्यार करें तो आप में श्री भगवान इसलिए प्यार कर रहे हैं। अभी भगवान चले जाए तो इस शरीर को जला दिया जाएगा। इस शरीर को गाड़ दिया जाएगा। इस शरीर का कोई महत्व नहीं माना जाएगा। अनजाने में हम प्यार भगवान से ही करते हैं।

पर जानकर जब तक भगवान से प्यार नहीं करेंगे तब तक प्रेम की प्राप्ति नहीं होगी। और भगवान से प्यार करने के लिए सबसे प्यार समेटना पड़ेगा। और यह होना बड़ा कठिन होता है। यह होना सबसे कठिन है। खाते पीते परिवार से प्रेम करते भोगते हुए अगर भगवान मिल जाए तो ठीक है। नहीं तो ऐसे छोड़ना कहां लाखों में कोई बिरला एक को एक पाव भगत जिम मोरी शुद्ध भक्ति भगवान के लिए घर गृहस्ती में रहकर के बहुत कठिन है। पर असंभव नहीं है। कठिन है पर संभव नहीं यदि हम नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी सब कुछ भगवान का है सब में भगवान है नाम जप कर रहे धर्म पूर्वक आचरण कर रहे भगवत प्राप्ति हो जाएगी भगवत प्रेम भी हो जाएगा तो ऐसे चलने से हो जाएगा अब ये जरूरी नहीं कि महात्मा बचपन से गंगा किनारे तप कर रहा है तो हमको भी तप करना पड़े वो इंजन है हम डिब्बे में बैठ जाते हैं हम उसका कनेक्शन कर लेते वहीं पहुंच जाएंगे जहां इंजन पहुंचेगा।

इसलिए हम संतों को गुरु बना लेते हैं। हम संतों के चरणों का आश्रय ले लेते हैं। संतों का भरोसा कर लेते हैं कि ये इनकी कृपा से हमें भगवान की प्राप्ति हो जाए। होती है शास्त्रों लोगों को आज तक जब किसी को भी अगर भगवत प्राप्ति हुई है तो संतों से हुई है। मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेह जतन जहां जे पाई सो जानो सत्संग प्रभाव। लोकम वेद ना अनुपाऊ लोक और वेद में और कोई उपाय नहीं है। संत महापुरुषों का समागम उनका आश्रय उनके वचनों का पालन यही भगवत प्राप्ति करा देता है।

समझ पाया आप?

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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