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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #910 · 15 मई 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री वृंदावन धाम की जय श्री सदगुरुदेव भगवान की जय जय सागर राय जी राधेधे महाराज जी महाराज जी क्या भगवत प्राप्ति के लिए नाम जप के साथ दीक्षा लेना जरूरी है क्या सबको दीक्षा आवश्यक है जैसे हम दीक्षा ले लेते हैं तो फिर गुरु के अनुशासन में हमारा जीवन हो जाता है हमारा मन एक तरफ चला जाता है कि हमारे वो गुरुदेव हैं और हमारी ये उपासना है नहीं तो मन की जो दशा है वो बड़ी बड़ी विचित्र है।

कभी यह धन प्रिय लगता है, कभी वैराग्य होता है, कभी स्त्री प्रिय लगती है, कभी वैराग्य प्रिय लगता है। कभी जंगल में रहने का मन होता है, कभी भोगों में रहने का मन। मन ऐसे चलता रहता है, चलायमान है। तो मेरे मन पर अनुशासन कर सके वो गुरुदेव। गुरुदेव ने जो आज्ञा करी, गुरुदेव ने जो उपासना दी, मेरे गुरुदेव। तो जहां हम किसी को अपना गुरुदेव मानते हैं तो उनका चिंतन होता है तो उनके दरस परस अग बास निज संग करो दिन तिन मुख हरिज सुनत श्रवण मानो न त्रप चिन एक ममता हो जाती है मेरे गुरुदेव तो उनका चिंतन होता है तो चिंतन मात्र से पाप नष्ट होते हैं संतों का चिंतन करने दरस परस अग बास निज संग करो सुमिरन नाम पवित्र अति उनका सुमिरन करना उनका नाम चिंतन आ जाना उनका रूप चिंतन आ जाना गुरु जी का इससे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और ध्यान मूलम गुरु मूर्ति पूजा मूलम गुरु पदम

मंत्र मूलम गुरु वाक्यम मोक्ष मूलम गुरु कृपा इसलिए जो नाम जप करते हो उसी को गुरुदेव के द्वारा जब मिलता है तो उसकी विशेष महिमा होती है और गुरुदेव के द्वारा मिला ही हुआ है जैसे आप राधा राधा रट रहे हो तो कहीं ना कहीं किसी संत के मुख से राधा नाम सुना तभी तो रट रहे हो तो हो गई दीक्षा मान लेना चाहिए जैसे जैसे पूज्य श्री कबीर दास जी को हमने पढ़ा कि रामानंदाचार्य जी से दीक्षा लेनी थी और वो संभव नहीं हो रही थी तो वो काशी के घाट में सीढ़ियों पर लेट गए तो 4:00 बजे तड़के गंगा स्नान करने जाते थे वो अपने चिंतन में थे तो पैर पड़ा कबीर दास जी की छाती में देखा उनका बेटा राम राम बोले गुरुदेव राम राम बस उसे ही दीक्षा मान ली और बड़े सिद्ध महापुरुष हुए तब जैसे कहा जाता है राधा राधा रटो अब मान लिया राधा राधा राधा ये हमारे गुरुदेव और इनके मुख से निकला हुआ राधा नाम हो गई दीक्षा मानने की है और नहीं कंठी बंधा लो तिलक लगा लो और मनमानी आचरण करो तो कोई शिष्य हो गए क्या वो तो नरक जाना पड़ेगा पापाचरण करो तो नरक जाना

पड़ेगा बात समझ पा रहे हो दीक्षा का मतलब होता है किसी संत से अपनापन हो जाना किसी संत के अनुशासन से हमारा जीवन पवित्र मार्ग में चले उसे ही दीक्षा कहते हैं महाराज जी कुछ कुछ लोग घबराते हैं कि फिर हम एक नियमावली में बंध जाएंगे। फिर एक मतलब क्योंकि मन का अगर आप किसी संत की नियमावली में बन जाएंगे तो माया से मुक्त हो जाएंगे। अगर आप संत की नियमावली में नहीं बनेंगे तो माया अपनी नियमावली में बांध लेगी और माया जिसको बांध लेती है उसकी दुर्गति करा देती है। तो इसलिए जरूरी है किसी संत के आदेश उपदेश के अनुसार हमारा जीवन हो।

हम मनमानी आचरण ना करें तो बहुत बढ़िया जीवन हो जाएगा। आप खुद देख लो किसी संत से जुड़ के देख लो आपका जीवन कैसा हो जाता है और जो जुड़ रहे हैं उनका जीवन कैसा हो रहा है जब वो नहीं जुड़े थे तब उनका जीवन कैसा था वो तो परिवर्तन होता है बच्चा लोहा कभी सोना नहीं बन सकता पर पारस के स्पर्श से सोना बन सकता है तो पारस है संत जन और समाज है जैसे लोहा तो संत जन जब उनको वाणी के द्वारा छूते हैं दृष्टि के द्वारा देखते हैं हृदय से संकल्प करते हैं तो समाज का परिवर्तन शुरू हो जाता है।

जहां राक्षसी वृत्ति थी वहां दैवी वृत्ति आ जाती है। जहां क्रूर हिंसा का भाव था वहां दया का भाव आ जाता है। बड़ा परिवर्तन समाज में होता है संतों के द्वारा जो भगवान के कृपा पात्र जन होते हैं उनके द्वारा समाज का बड़ा सुधार होता है। तो संत हमारे गुरुदेव हैं और जब हम उनसे ममता कर लेते हैं तो हमारा मंगल हो जाता है। हमें डर लगता है कि यार हमसे कोई गलती हो गई उनके सामने जाएंगे। वो जान जाएंगे वो डांटेंगे। नहीं भाई हम गलती नहीं करेंगे। हम कोई पाप नहीं करेंगे।

तो हमारा बचाव हो जाता है। और ऐसे जैसे मन में आया मनमानी तो भजन कर रहे हैं। कभी भोग भोग रहे हैं। कभी जो क्योंकि मन ही है। अब मन के ऊपर शासन कौन करें? तो मन के ऊपर शासन करने वाले गुरुदेव हैं। इसलिए गुरु दीक्षा आवश्यक है। गुरु शरणागति आवश्यक है। भगवान ने स्वयं संदीपनी जी को गुरु बनाया। यदि गुरु बनाने की आवश्यकता ना होती तो भगवान को क्या आवश्यकता है गुरु बनाने की? जिनके श्वासों से चारों वेदों का प्रादुर्भाव हुआ वो भगवान किसी संत के शिष्य बने। अरे संत तो उनके चरणों का भजन करके संत बनते हैं।

तो संदीपनी जी के शिष्य बने ना भगवान श्री कृष्ण विश्वामित्र वशिष्ठ जी का उपदेश स्वीकार किया ना भगवान श्री राम जी ने तो ये विश्वामित्र जी के चरण चापे भगवान राम ने तो विश्वामित्र जी क्या उन्हीं के भजन से तो है लेकिन भगवान ने संतों को गुरु माना। जी प्रदीप जी जयपुर से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी कर्म क्या है क्या सचमुच किसी व्यक्ति के कर्म का फल भगवान तय करते हैं जी कर्म का ही तो फल मिल रहा है जेल में जेल में कर्मों का ही तो फल है कुकर्म हो गए तो पूरी जेल भरी हुई है कर्म वह होता है जो हमारे मन में स्फूरणा होती है संकल्प बनता है बुद्धि निश्चय करती है फिर इंद्रियों से चेष्टाएं होती है उसे कर्म कहते हैं।

कर्म दो प्रकार के होते हैं। एक शुभ कर्म और एक अशुभ कर्म जिनको कहते हैं पाप कर्म अशुभ कर्म और पुण्य कर्म शुभ कर्म दोनों का फल अवश्य में भोक्तव्यम कृतम कर्म शुभाशुभम अवश्य भोगना पड़ता है। उनका परिणाम भोगना ही पड़ता है। कोई कितना भी बड़ा ऋषि महर्षि हो उसको भी भोगना पड़ता है। इसलिए कर्म बहुत होश से करें। बेहोश होकर ना करें। प्रमाद में ना करें। नहीं तो उसका दंड मिलता ही है। अब देखो कर्म है। किसी बहन बेटी को छेड़ दिया। अब डंडा चलेंगे। पुलिस ले जाएगी। मुकदमा चलेगा।

उसको सजा मिलेगी। कर्म है। क्रोध आ गया। हम किसी की हिंसा कर दी। आजीवन कारावास। हिंसा 5 मिनट में हुई और उसका दंड पूरे जीवन भोगना पड़ेगा। या ज्यादा अपराध बन गया तो फांसी की सजा मिल जाएगी। तो कर्म ही तो है और अच्छे कर्म हो गए तो देखो राष्ट्रीय सम्मान मिलता है। समाज में आदर मिलता है और यहां सुख मिलता है और परलोक में भी सुख मिलता है। सारा खेल कर्म का है। कर्म प्रधान विश्व रच राखा और जो जस करे तास फल चाखा। कर्म की प्रधानता से विश्व की रचना हुई है। जो जैसा करता है वैसा फल भोगता है।

समझ पा रहे हैं आप? इसलिए बहुत होश से कर्म करें और होश बनाने के लिए नाम जप है। जब तक नाम जप नहीं तब तक बेहोश ही हो। जानते हो कि यह कर्म नहीं करना चाहे फिर भी करोगे और अगर नाम जप है तो तुम्हारे अंदर जलन पैदा हो जाएगी। तुम्हारे अंदर बल आ जाएगा कि नहीं नहीं हमें पाप कर्म नहीं करना है। सब कोई जानता है पाप कर्म किसे कहते हैं और पुण्य कर्म किसे कहते हैं। भगवान ने इतना ज्ञान सबको दिया है और जब कोई कर्म करने चलता है तो भगवान अंदर से प्रेरणा करते हैं। यह गलत है मत करो।

लेकिन हम लोग इतने मलिन स्वभाव के हैं कि अंदर की बात को ना मानकर और कर्म कर बैठते हैं और बाद में सोचते हैं कि यार हृदय में तो आया था। पहले अंदर आया था कि यार ना करें पर यार अब कर दिया तो फिर अब भोगना पड़ता है इसलिए कर्म बहुत संभाल करके वर्तमान में कभी किसी सत्कर्म का विपरीत फल मिले तो इसका क्या अर्थ समझ नहीं सत्कर्म का विपरीत फल मिलता ही नहीं है वो आगे मिलेगा हां जैसे हमने आज सत्कर्म किया और आज हमको कष्ट मिल रहा है तो यह हमारे सत्कर्म का नहीं मिल रहा यह हमारे पूर्व पाप कर्म का मिल रहा है आज जो सत्कर्म किया है आगे फसल आगे हमें यह सुख देगा लेकिन आज आज हम अच्छे से चल रहे हैं और दुख भोग रहे हैं।

तो इसका मतलब है पूर्व के पाप हमें दंड दे रहे हैं और अभी का जो अच्छा कर्म है वो हमारा भागवतिक बैंक में जमा हो रहा है जो हमें आगे प्राप्त होगा। जैसे किसान की फसल तुरंत अन्न नहीं दे देती। कई महीने लगते हैं। ऐसे बड़ी सरकार है हमारी तो बहुत लेट नंबर आता है। जैसे अभी है तो मुकदमा कई वर्ष नहीं चलता। किसी केस का कहो मुकदमा सालों चलता रहे। कहो 10 साल चलता रहे। कभी-कभी तो उतनी जितनी सजा भोगनी होती है उतना तो मुकदमा में वो जेल में बंद रहता है। तो ऐसे ही भगवान की बहुत बड़ी अदालत है।

अनंत ब्रह्मांडों के जीवों का हिसाब है। होता एक सेकंड के कम हिस्से में है। पर जब होगा बहुत फाइनल में होगा। तो इसलिए बहुत समय लगता है। जैसे आज पाप कर्म किए तो कहो पांच जन्म बाद उसका दंड मिले जाकर तुम्हें तो लगेगा हमने इस जन्म में तो पाप किया नहीं लेकिन भोगना पड़ेगा। वो अवश्य में भोक्तव्यम क्योंकि जीवात्मा वही है शरीर बदल गया जैसे कोई क्रिमिनल हो और वो पट शर्ट पहनता हो फिर धोती कुर्ता पहनने लगे या वो सलवार कुर्ता दुपट्टा धारण करने लगे तो पहचानने वाला तो पहचानता है वही क्रिमिनल है तो भगवान तो जानते हैं ना यह वही जीव है जो पूर्व जन्म में पाप कर्म किया है तो उसको वही दंड दे देते जाओ तुम्हें यह भोगना अब इस जन्म में उसने कोई पाप किया नहीं वैसा लेकिन पूर्व जन्म का पाप पाप कर्म आकर उसे दंड देता है।

जैसे संतों को है। मान लो कोई बचपन से संत है। देखो रामकृष्ण परमहंस जी के गले में कैंसर था। भाई जी हनुमान प्रसाद पुरदार जी के उदर में कैंसर था। बड़े-बड़े संतों को बड़े-बड़े कष्ट भोगने पड़े। क्योंकि पूर्व में किया हुआ पाप भोगना पड़ेगा। भगवान को भी भोगना पड़ा। वह कानून से अलग नहीं रहते। भगवान ने छुप के बाली को मारा व्याध की तरह। तो कृष्णा अवतार में अगले जन्म में अंतिम समय व्याध ही भगवान के चरणों में बाण मारता है तब वह परम पद को जाते हैं। तो यह कानून है तो भागवतिक जो कानून है वो एक राय भर नहीं बखशता।

भारतीय कानून में थोड़ा धोखा हो सकता है कि वकील चतुरतावश दूसरा प्रमाण पेश करके और दोषी को बचा दे और निर्दोषी को फंसा दे। लेकिन हमारे भगवान के दरबार में किसी वकालत की जरूरत ही नहीं। किसी गवाही की जरूरत नहीं। एक सेकंड में उस जीव का हिसाब हुआ। फाइनल। अब अगर उस हिसाब को बदलना चाहते हो तो नाम जप करो। दूसरों का उपकार करो। तीर्थों का अवगाहन करो। भगवान की कथा सुनो जिससे सारे पाप तुम्हारे नष्ट हो जाए। तो यह जो बल है यह तुम्हें बचा लेगा। नाम बल, भगवान का सेवा बल, परोपकार यह बचा लेगा।

अब दूसरों को दुख देना, पाप कर्म करना तो फिर नाना प्रकार के नरकों को भोग कर यहां भी दुर्गति भोगनी पड़ती है। जैसे आपके पाप कर्म है पूर्व के और आप बहुत पढ़े लिखे हो। आप लाख उपाय करो आपको नौकरी नहीं मिलेगी। पढ़े लिखे डिग्री लिए घूमते रहो और कुछ ऐसे हैं कि आपसे ज्यादा वह मंद बुद्धि के हैं। वह ज्यादा प्रवीण नहीं है लेकिन वो निकलते चले जा रहे हैं क्योंकि उनका पुण्य बल काम कर रहा है। तो यहां पुण्य बल अगर सुख चाहते हो तो पुण्य करो। चाहते सुख हो और करते पाप हो तो पाप का परिणाम दुख मिलता है।

शराब पी रहे हैं। गंदी बातें बोल रहे हैं। गंदे आचरण एक एक चीज का फल है आपका। अगर आप बातें बोल रहे हो तो उसका भी फल है। मनुष्य जीवन कर्म योग के लिए भेजा गया है। आप एक मिनट भी फ्री नहीं है। आप एक मिनट में जो करेंगे आपके अंदर ही मन में बैठे हुए चित्रगुप्त तुरंत लिख रहे हैं। आपके मन रूपी चिप में वो बिल्कुल सीन सहित सीन सहित जैसे चिप लगा दो ना तो पूरा टेलीविजन उसमें टीवी में आने लगता है। सब ऐसे ऐसे सीन सहित चित्रगुप्त लिखते हैं भगवान के सामने एक सेकंड में पूरा वो चिप दिख जाती है।

इसने क्या-क्या किया जीव ने बस उसको दंड मिलता है। इसलिए हर समय नाम जप करो। अच्छे आचरण करो। अच्छा भोजन पाओ। दूसरों का उपकार करो। यही मनुष्य जीवन है। यही देवत्व है। नहीं तो राक्षसी भाव में लोग विचर रहे हैं। अपने को धनी मानते हैं। व्यभचार करते हैं। शराब पीते हैं। मांस खाते हैं। दुर्गति को प्राप्त होते हैं। पूर्व जन्म के पुण्य से आज धन है। लेकिन ये बना थोड़ी रहेगा। ये नहीं बना रहे। जहां पुण्य खत्म हुआ तो सब नष्ट हो जाता है। सब नष्ट हो जाता है। तो यह है हमारे कर्मों का फल हमको भोगना पड़ेगा।

तो इसलिए हम भगवान का नाम जप करें। परोपकार करें जिससे हमारा मंगल हो जाए। परीक्षित जी श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आप जब आज जब भी कोई मुसीबत आती है डर लगता है तो आपका ख्याल आता है उससे लगता है कि उस डर को मैं भगा दूंगा और भाग भी जाता है आपके समक्ष आकर पुनः आपको देखकर खुद को ताकतवर बना लेता हूं महाराज जी सभी डरों को पराजित कर लेता हूं लेकिन यह डर लगता है कि यदि कल आप नहीं रहे किसी से शक्ति लूंगा मैं संभालेगा अब ये समस्या तो बड़ी भारी है ही गया ये समस्या तो बड़ी भारी है ही क्योंकि क्योंकि ये मृत मरण धर्मा शरीर है और रोग ग्रसित है।

तो अब इतने भारी रोग से ग्रसित है ना कि इसको कहा नहीं जा सकता कि ये कल चलेगा। हो सकता है 10 20 साल चल जाए। हो सकता है 10 मिनट ना चले। ऐसी बिगड़ी गाड़ी है। दोनों किडनी फेल है। डायलिसिस हो रहा है। तो अब ये तो है ही है कि जब तक सानिध्य है तब तक। अब वैसे भी देखो मोबाइल से देखना और फेस टू फेस देखना। अंतर पड़ता है नहीं तो अब प्रगट में जब हम किसी संत के सामने होते हैं तो हमको परमाणु भी मिलते हैं। मोबाइल से हम उपदेश ग्रहण कर सकते हैं। हमारा कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

लेकिन हमें परमाणु नहीं मिल सकते। परमाणु तो फेस टू फेस ही मिलते हैं। अब जैसे आप देख रहे हो आप बैठे हो इस वातावरण में तो जो भजन के परमाणु हैं, जो भागवतिक परमाणु हैं, जो धाम के परमाणु हैं वो आपके अमंगल का नाश कर रहे हैं और आपके दिमाग में बैठकर पवित्रता का विस्तार कर रहे हैं। ये मोबाइल से तो नहीं होगा ना। वो तो प्रगट में तो अब कितने दिन भगवान को रखना है ये हमको भी नहीं पता है। तब लगा रहता है महाराज जी। हां। आपको ही नहीं लाखों लोगों का ऐसा प्रश्न है। लाखों कई लोग तो रो के बोले ऐसा और आपका जैसा प्रश्न ऐसा हमारा भी प्रश्न है कि हम अपने गुरुदेव से संचलित हैं।

अगर मेरे कल मुझे पता चले कि मेरे गुरुदेव अंतर्ध्य हो गए तो जैसे प्राण निकल गए ऐसा शरीर रह जाए फिर क्या रह जाए? गुरुदेव बैठे हैं तो इतना सास है कि हमारे गुरुदेव है ना। तो गुरुदेव एक बल है। गुरु एक तपस्या भजन उसका बल है। अगर वो मान लो यह तो आपकी श्रद्धा से हो रहा है। और अगर वो अगर संकल्प कर ले मतलब आप श्रद्धावान हो रहे तो आपकी बैटरी चार्ज हो रही है। और अगर वो अपनी तरफ से संकल्प करके आपको दे दे तो आप तो महाबलशाली हो जाएंगे। तो यह बात होती है कि प्रगट तभी तो होता है कि सौभाग्य है कि प्रगट में संतों का संग मिले।

नहीं तो जब संत चले गए तो फिर उतना बात का प्रभाव भी नहीं रहता। जैसे हम हैं तो मोबाइल में उतना प्रभाव भी पड़ रहा है। और जैसे हमारा शरीर ना रहे तो अभी वो सब ऐसे हो जाएगा। फिर उसका वो प्रभाव नहीं पड़ेगा। उतना प्रभाव नहीं पड़ेगा। वो धीरे धीरे धीरे धीरे सब शांत हो जाएगा। तो प्रगट में जब तक संत रहते हैं तब तक धूम मची रहती है। जहां वो अंतर्ध्य हुए तो धीरे-धीरे माया धूल डाल देती है। उनके प्रभाव में उनकी वाणी में उनके तो जब तक महापुरुष प्रगट में रहते हैं तब तक विशेष प्रभाव रहता है।

और जब अंतर्ध्य हो जाते हैं तो धीरे-धीरे माया फिर धूल डाल देती है अपनी और उनका प्रभाव अंतर्ध्य हो जाता है। पर जो श्रद्धालु हैं, श्रद्धा पूर्वक उनकी बात को मानते हैं। वह आजीवन उनकी बात पर मानकर उनका प्रगट अनुभव करते हैं। प्रगट अनुभव जैसे नारद जी हैं तो हैं सृष्टि में तो हैं पर हमारे सामने नहीं। अब हम अगर नारद जी की बात मानते हैं और नारद जी की भक्ति करते तो हमारे सामने भावना में आने लगते हैं कि वीणा लिए नारद जी ऐसे हैं। भावना में आने लगते हैं। मतलब भावना में वो आए।

वो केवल कल्पना नहीं है। वो हमारी भावना में आए। तो जैसे प्रेमानंद अब आप बात प्रेमानंद की मान रहे हैं तो आपकी भावना में प्रेमानंद आएंगे वो झांकी आएगी क्योंकि भगवान ही प्रेमानंद है। यह शरीर प्रेमानंद थोड़ी है। प्रेम और आनंद तो भगवान ही है ना तो वही आएंगे वही तुम्हारी रक्षा करेंगे और वही आपको सपोर्ट करते रहेंगे। ये शरीर तो लिमिट समय का कितना समय है ये हमको भी नहीं पता है। अब कितने मिनट का है कितने घंटे का है या कितने वर्ष का है इसका कुछ पता नहीं। आपका भी नहीं पता है।

नहीं इसका बड़ा विचित्र खेल है। बीमार बैठे रहते हैं, स्वस्थ चले जाते हैं। यह भाई यह भगवान की बड़ी विचित्र लीला है। तो आप चिंता ना करो हम तुम्हारे साथ हैं। चाहे ऐसे चाहे वैसे ठीक है। अपर्णा जी कोलकाता से। श्री हरिवंश महाराज जी। राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी आध्यात्मिक जीवन का स्तंभ क्या है? भगवत स्मरण भगवत स्मृति जैसे आध्यात्मिक ग्रंथ सर्वश्रेष्ठ श्रीमद् भगवत गीता जी किसका प्रश्न है श्रीमद् भगवत गीता जी तो पूरी गीता जी सुनने के बाद अर्जुन जी को क्या प्राप्त हुआ बोले नष्टो मोहा स्मृति लब्ध तत प्रसादान मयाचुता हे अचुत आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे स्मृति प्राप्त हो गई।

हर समय भगवान की मधुर मधुर स्मृति भगवान का नाम चल रहा है। पूर्ण अध्यात्म है। भगवान का विस्मरण वही पतन है। वही संसार है। वही बंधन है। वही दुख है। कह हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई जब तो सुमिरन भजन न होई। जिस समय सुमिरन भजन नहीं हो रहा हम उसी समय अध्यात्म से अलग हैं। उसी समय विपत्ति और दुख और संकट हो सकता है। अगर हम निरंतर भगवत स्मरण कर रहे हैं तो हम निरंतर अध्यात्म में विराजमान है। आत्म स्वरूप का बोध होना भगवान के चरणों में प्रेम होना ये सब भजन से हो जाता है।

इसी को अध्यात्म कहते हैं। संजीव बलिया जी महाराज जी आपका सत्संग सुनने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैंने अपने जीवन में कितने ही पाप किए हैं। मुझे कैसे अनुभव होना शुरू होगा जिससे यह समझ आएगा कि मेरे इस जन्म के पाप कटना शुरू हो गए हैं और यहां कट गए हैं। मेरा जो मैंने नाम शुरू किया हां जब भजन बढ़ना शुरू होगा तब जितना भजन बढ़ता जाए उतने समझो आप निष्पाप होते जा रहे हो और पापवंत कर सहज सुभाव भजन मोर ते भाव न काऊ पापी पुरुष का लक्षण होता है उसे भजन अच्छा नहीं लगता।

जितना अधिक भजन होने लगे उतने आप पवित्र होने लगे। 24 घंटे भजन होने लगे आप पूर्ण पवित्र हो गए। जन्मजन्म के आपके पाप नष्ट हो गए। आप निष्पाप हो गए और इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाएगी। यदि हर समय भजन हो रहा है। जितना भजन कटे उतना ही समझो कि आपका पाप बढ़ रहा है। और जितना भजन अधिक हो उतना ही समझो आपका पाप नष्ट हो रहा है। डॉक्टर अंकिता जी वृंदावन से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी हम हमेशा सोचते हैं कि अच्छा बोले, अच्छा सोें, अच्छा व्यवहार करें पर कभी ऐसी परिस्थिति आ जाती है कि हमें जो नहीं करना चाहिए वो हम कर बैठते हैं।

नहीं परीक्षा तो इसी बात की है कि परिस्थिति में हम अच्छा बोले। ऐसे तो सब कोई बोलता है जब हमारे सामने कटु परिस्थिति हो और फिर हम अच्छा बोले जब हमारे सामने विपरीत परिस्थिति हो हम अच्छा आचरण करें तो हमारी हमारी साधुता है तो हमारी सज्जनता है तो हमारी पवित्रता है ऐसे तो हम अनुकूलता में पवित्र व्यवहार कर रहे हैं वो कोई खास बात नहीं जब प्रतिकूल परिस्थिति है फिर भी परिभाषा में हम उससे बात करें अब अब बिल्कुल परिस्थिति बिगड़ गई अब क्रोध आने का है फिर भी हम शांत होकर मधुर भाषा में तो यह हमारी सज्जनता है।

यह हमारी साधना है। यह हमारी भक्ति है। तो हमारे अंदर जब तक नाम जप नहीं चलेगा तब तक यह बल हमारे अंदर नहीं आएगा। यह केवल विचार से नहीं होगा। विचार दूषित हो जाते हैं। जैसे सामने वाला व्यक्ति है। अब वो ऐसे आचरण कर रहा है। तो आप विचार कर रहे हैं कि मुझे बहुत नम्र बोलना चाहिए। लेकिन सोचते-सचते विचार दूषित हो गए और तुरंत विचार हमारे ऊपर हावी हो गए। क्रोध वाले। अब वो हमसे क्रोध करा ले और अगर उसी समय नाम चल रहा है राधा राधा राधा तो आपके विचार दूषित नहीं हो पाएंगे।

आपके अच्छे विचार उसके दूषित विचारों को दबाकर शांत रहेंगे। लेकिन अगर आपका भजन नहीं चल रहा तो आपके अच्छे विचारों को उसका दूषित विचार दबा देगा और आपके अंदर दूषित भाव आ जाएगा और आप कट बोलने लगेंगे। हमने कुछ बिगाड़ा नहीं। हमने कुछ किया नहीं। व्यर्थ में आदमी हमको तंग कर रहा है। व्यर्थ में हमारे सामने प्रतिकूलता ला रहा है। अब हम चुप नहीं बैठेंगे। वो विचार जो है वो क्रोधानित हो जाएंगे। तो हमें अच्छे विचारों को बचाने के लिए अच्छे विचारों को बढ़ाने के लिए अच्छे विचारों को सुदृढ़ करने के लिए भजन की आवश्यकता है।

नाम जप की आवश्यकता है। जो नाम प्रिय हो वो अधिक से अधिक जपे तो हमारे विचार पुष्ट रहेंगे। जी नेहा जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपकी वाणी सुनकर मैंने अपने सारे बुरे आचरण छोड़ दिए हैं और अपने जीवन को नई दिशा देने की कोशिश में लगी हुई हूं। पर महाराज जी जिस संगति और मित्रों के साथ हमेशा रही हूं अब उनके आचरण मुझे विचलित से करने लग गए हैं। मेरे मित्र मुझसे बहुत प्रिय रहे हैं मेरे तो महाराज जी ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए? उनको सुधारने की प्रेरणा देनी चाहिए या अपना भक्ति मार्ग प्रशस्त करना चाहिए?

मित्र वही है किसका प्रश्न है? मित्र वही है जो कुमार्ग से हटाकर सुमार्ग में लगावे। अच्छे मार्ग में लगावे। यदि आप मित्रों से प्यार करते हैं, वह आपसे प्यार करते हैं, तो आपकी बात ऐसी होनी चाहिए कि उनकी गंदी आदतें हट जाए और वह अच्छे आचरण वाले बने। आप स्वयं अच्छे आचरण वाले बने और दूसरों को अच्छे आचरण वाले बनाएं। यदि वह अच्छे आचरणों को स्वीकार नहीं करते तो मित्रता तोड़ देनी चाहिए। नहीं अपने अच्छे आचरण चले जाएंगे। कुसंग से किसकी बुद्धि नष्ट नहीं हो जाती।

अर्थात सबकी हो सकती। को न कुसंगति पाए न साई रहे न नीच मते चतुराई कितने ऐसे जन हैं जो मदिरा छोड़ दिए शराब छोड़ दिए सत्संग सुन के पर मित्रों को नहीं छोड़ पाए अब मित्रों ने कहा यार हमारी तुम्हारी दोस्ती की कसम है बोले चलो अच्छा अब चलो फिर शुरू हो गया फिर शुरू हो गया गलत आचरण तो यदि हमारे सत आचरणों का प्रभाव हमारे मित्रों पर पड़े तो हमारी मित्रता यदि उनके असत आचरणों का प्रभाव प्रभाव हमारे ऊपर पड़े तो हमको छोड़ देना चाहिए। जाके संग कुमति मति उपजे करत भजन में भंग तजो रे मन हरि विमुखन को संग जिसके संग से हमारा भजन छूट जाए हमारे अच्छे आचरण छूट जाए हमें उस कुसंग को मित्रता नहीं कहनी चाहिए वो शत्रुता का बर्ताव कर रहे हैं हम उनको मित्र मान रहे तो हमारा पतन हो जाएगा यदि हमारी बात वो माने तब तो हमारे मित्र हमारी बात ना माने तब तो फिर हमें त्याग कर देना और जी उनकी संख्या ज्यादा है महाराज जी हैं ऐसे जनों की संख्या ज्यादा ज्यादा तो दोस्ती हां तो नहीं अब ऐसी दोस्ती तो नहीं

करनी चाहिए आपसे दोस्ती करते हैं गंदे आचरणों से नहीं यदि आप गंदे आचरण करते हैं तो फिर हमारी आपकी मित्रता नहीं रहेगी ऐसा व्यवहार रखना पड़ेगा अगर आप ऐसा व्यवहार नहीं रखेंगे तो एक ना एक दिन आप भी भ्रष्ट हो जाएंगे फिर गिर जाएंगे क्योंकि मन है वो एक ना एक दिन जिसके संग रह जाता है उसका रंग चढ़ जाता है काजर की कोठरी में कैसेो भी सयानु जाए दाग लागी है पैलागगी है पैलागी है कह रहे अगर काजर की कोठरी है तो कितना भी सयाना जाए बचकर रहे पर उसे काजर का दाग लगेगा ऐसे ही अगर हम गंदा संग करेंगे तो हम भ्रष्ट होंगे निश्चित भ्रष्ट हो जाएंगे हम पतित हो जाएंगे महारा जी सत्संग और कुसंग का दोनों का एक जैसा सत्संग में भी महाराज जी कितने सारे ऐसे जने देखे हैं जो कभी मतलब असंख्यों हजारों की संख्या में जो कभी भगवत नाम नहीं जप करते थे इधर का संग हुआ और महाराज जी आज मतलब 20 20 50 000 नाम जप कर रहे हैं अपने गलत आचरण अधर्म आचरण सारे छोड़ के तो महाराज जी प्रभाव मतलब जिसका प्रभाव बढ़ गया वही जीत जाएगा महाराज जी हां जब हम

सत्संग करें तो कुसंग से वचन नारद जी से पूछा गया कस्त तरति कस्त तरति मायाम माया से कौन तर सकता है कौन तो सबसे पहले उन्होंने कहा यो संगास तेजति जो कुसंग का त्याग कर देता है। सबसे पहला शब्द उन्होंने माया से तरने के लिए कहा यो संगास्त तेजते कुसंग का त्याग कर देता है तो बोले कैसे बोले महानुभाव सेवते जो महापुरुषों का संग करते हैं वो कुसंग का त्याग कर देते हैं और फिर वही यो ममता रहित जो ममता रहित हो गए और भगवान का नाम जप करते हुए भगवान को प्राप्त हुआ कुसंग का त्याग करके सत्संग का सेवन करते हुए संसार की आसक्ति ममता का त्याग करके भगवत प्राप्त हुआ जा सकता है अगर संतों का संग नहीं है तो कुसंग का त्याग हो ही नहीं सकता।

तो इसलिए संतों के संग से कुसंग का त्याग करो और अच्छे आचरण वाले बनो। परोपकार करो। नाम जप करो तो तुम्हारा मंगल हो जाएगा। पुष्पेंद्र जी पुणे से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी कभी-कभी अज्ञानी मन एक प्रश्न करता है। महाराज जी अभी आपने जो कबीर दास जी का इससे पहले वाले बैच में उदाहरण दिया था कि उनके गुरु जी ने रामराम बोला सीधा तो उन्होंने स्वीकार किया। तो कह रहे कि मोबाइल हमने तो मोबाइल टीवी के माध्यम से ही सुना है तो महाराज जी तभी नाम जप करना शुरू किया तो एक ही प्रभाव होगा महाराज जी हां क्योंकि मानना है ना कि हम इन संत के मुख से वचन सुना और उसी को किया तो मानना से मानने से सब कुछ चाहे पास से मान लो चाहे 1000 कोस दूर से मान लो आपने मान लिया ना कि हम अमुक संत के मुख से अमुक नाम सुना और वही नाम जपने लगे तो वही भाव आएगा मानने से होता है अगर हम माने ना तो पास रहते हुए भी बात नहीं।

भगवान की बात नहीं मानी दुर्योधन ने। भगवान स्वयं समझा रहे हैं तो अगर नहीं मानी तो कुछ महत्व नहीं। वो भगवान को भगवान ही नहीं मानता था। तो मानने से है। हम दूर से मान ले तो वैसे ही हमारा कल्याण हो जाएगा। वैसे ही बात बन जाएगी। कृष्ण कुमार जोशी जी राधा वल्लभ श्री श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मैं राधा कृष्ण मंदिर में पुजारी हूं। जहां मुझे एकादशी, सत्यनारायण प्रदोष व अन्य पर्व या त्यौहार की कथा सुनानी व कहनी पड़ती है। महाराज जी हमने आपके सत्संग में सुना था कि जब तक आत्म बोध ना हो जाए तब तक कथा नहीं करनी चाहिए।

नहीं नहीं नहीं उपदेश नहीं करना चाहिए। उपदेश और कथा में अंतर है। कथा में हम जैसे सूत मागद बंदी जन अपने राजा का जस गाते हैं। ऐसे हम भगवान का जस गान कर रहे हैं। उपदेश करने का अधिकार उन्हीं को है जो स्वयं माया मुक्त है। जो स्वयं भगवान को प्राप्त है या प्राप्त करने की दिव्य लगन में लगे हुए हैं। लेकिन भगवान की कथा कहने के लिए नहीं। भगवान की कथा कहना सबका अधिकार है। सब प्राणी किसी भी जाति का कोई हो भगवान की चर्चा कह सकता है। भगवान की चर्चा सुन सकता है। क्योंकि भगवान अपने हैं ना।

हां जब उसका अनुष्ठान आएगा तब फिर उसमें पद्धति आ जाएगी। जैसे सप्ताहिक भागवत का अनुष्ठान तो विद्वान ब्राह्मण के द्वारा फिर ऐसे करवाना। तो जैसे आप हैं ब्राह्मण में ब्राह्मण कुल के ही तो है ना तभी तो उपासना में लगे हैं तो आप जैसे सत्यनारायण की कथा है भागवत की कथा है या किसी पर्व के विषय तो उसमें कोई दोष नहीं है उसमें कोई दोष नहीं आदेश उपदेश करने का अधिकार सिद्ध महापुरुष को है लेकिन भगवत कथा कहने का अधिकार सबको है। भगवत चर्चा सुनने का अधिकार सबको है। परस्पर भगवत कथा करना या अनुष्ठान की भगवत कथा करना उसमें भेद हो जाएगा।

परस्पर में अपने घर में कोई भी भगवत चर्चा कर सकता है। लेकिन अनुष्ठान वैदिक ब्राह्मण के द्वारा ही करवाना चाहिए। जी दीक्षा जी लुधियाना से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपने एक वार्ता में बताया था कि हमें कितने कोटि नाम जप करने चाहिए तो क्या महाराज जी उसके लिए भी किसी योग्य गुरुदेव से दीक्षा लेनी चाहिए? हां जरूरी है। जरूर किसका प्रश्न है? हां जरूरी है। बिना गुरुदेव के मुख से निकले हुए नाम के द्वारा हम अनुष्ठान पूर्ण ही नहीं कर सकते। वह अनुष्ठान ही पूर्ण नहीं माना जाएगा।

इसीलिए किसी भगवत प्रेमी महात्मा का आश्रय ले ले और उनके मुख से नाम सुनकर के और फिर अनुष्ठान करें। जी अक्षय जी जयपुर से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी अशांत मन को किस तरह शांत किया जा सकता है? हम भगवान के चिंतन के द्वारा तब लग कुशल न जीव कहूं सपने मन विश्राम मन को शांति मिले तभी तो विश्राम मिले स्वप्न में भी विश्राम और शांति नहीं मिल सकती जब लगी भजत न राम कहूं शोक धाम तज काम शोक और कामनाओं का जो हमारे हृदय में बार-बार यह कामना यह कामना ओवरथिंकिंग बहुत चिंतन सांसारिक नेगेटिव चिंतन इससे तभी हम निजात पाएंगे जब हम खूब नाम जप करेंगे।

नाम जप नहीं करेंगे तो फिर कोई उपाय नहीं है। आप सत्संग सुनेंगे थोड़ी देर बाद फिर मन खाली फिर वो हमें खाली नहीं रखना। राधा राधा राधा राधा एक भूत जैसा मन है। एक शिष्य ने भूत सिद्ध किया। तो गुरु जी ने मंत्र दिया था। जब भूत सिद्ध हुआ उसने कहा काम बताओ तो जो काम बताया वह 2 मिनट में कर दिया बोला और काम बताओ काम नहीं बताओगे तो हम उठा के पटक देंगे और गुरु जी के पास गए उन्होंने कहा ये तो बड़ी समस्या है कह रहा काम बताओ अगर काम नहीं बताओगे तो उठा के पटक देंगे तो उन्होंने एक बांस गाड़ दिया लट्ठा और कहा इस पर चढ़ो उतरो जब और काम होगा तो हम बताएंगे तुम्हारे लिए यही काम है चढ़ो बस वही भूत मन है अगर इससे सही काम नहीं बताओगे तो उठाक पटक देगा गंदगी में कोई ना कोई गलत आचरण करवा देगा तो नाम रूपी लट्ठा गाड़ दो राधा राधा राधा राधा चढ़ो उतरो जब और कोई काम होगा तो हम तुम्हें बताएंगे इसी में चढ़ो उतरो राधा राधा राधा तो मन शांत हो जाएगा आप देख लेना त्यागांतम जब भोगों का चिंतन का त्याग होता है तो हमें शांति प्राप्त होने भगवान के वचन है त्यागांतम त्याग से शांति की प्राप्ति होती है ज्ञान से शांति की प्राप्ति होती है तो त्याग और ज्ञान ज्ञान का बल कहां से आवे?

नाम जप से आएगा। खूब नाम जप करो तो मन भोगों का चिंतन त्याग दे। नहीं तो खानपान की सुविधा की कमी है क्या आपके? कपड़ा लत्ता भी पहने हो। क्या परेशानी है? मन की परेशानी है। वो बार-बार बड़ी-बड़ी कामनाएं करता है। फिर नेगेटिव विचार दे देता है। और उसी में हम फंसे जलते रहते हैं। ऐसा हो जाता तो ठीक है। ऐसा हो गया तो क्या होगा? नाना प्रकार का चिंतन हमारे तो जो होगा प्रभु ने रचा होगा वही होगा हमें क्या परेशानी राधा राधा राधा राधा सब समस्याओं का समाधान भगवान है तो भगवान से यदि नहीं जुड़ोगे नाम जप नहीं करोगे अध्यात्म ज्ञान नहीं होगा तो मन को शांत नहीं किया जा सकता मन को अध्यात्म ज्ञान के द्वारा ही शांत किया जा सकता है जी और महाराज जी गुस्से पर वश कैसे किया जा सकता है वही सब गुस्सा क्या काम क्रोध लोभ मोह मदद मत मत्सर ये छह विकार हैं।

सब विकारों पर हम काबू पा लेंगे। जब हम नाम जप करेंगे, सत्संग सुनेंगे, परोपकार करेंगे, पवित्र भोजन पाएंगे। अपवित्र भोजन पाओगे तो भी बुद्धि खराब रहेगी। पवित्र भोजन कोई नशा नहीं। नशा करते हैं कोई शराब और आप कभी कभी नहीं। कभी-कभी पीते हैं। तो ऐसे कभी-कभी वाला क्यों रखो? आज से छोड़ दो। बोलो कि वृंदावन में बैठकर कहता हूं शराब नहीं पूंगा। वृंदावन बैठ कोशिश कोशिश नहीं हम हम आपकी बात का आदर करते हैं। आपकी बात का आदर करते हैं कि आप पूरी कोशिश कीजिए। अगर कोशिश में हार जाते हैं तो फिर कोशिश कीजिए।

ठीक है? हम आपकी बात का आदर करते हैं। कोशिश करना ही हमारा प्रयत्न करना ही हमारा पूरा बल है। इसके बाद अगर हम हार जाते हैं, कभी हार जाते हैं तो हम फिर कोशिश करेंगे। पर संकल्प तभी लेना चाहिए जब हम पक्का निर्णय कर लें। तो कोशिश के बाद ही पक्का निर्णय होता है। बहुत अच्छा निर्णय किया आपने। आप कोशिश कीजिए। भगवान आपको बल देंगे क्योंकि सबके बल दाता हैं। तो कोशिश हमारी तभी पूर्ण होती है जब भगवान बल देते हैं। तो नाम जप करो और भगवान से पुकारो कि वो हमें बल दें जिससे हमारी कोशिश पूर्ण हो।

मां से तो नहीं खाते। हां गंदी बात हां बहुत संभाल के मनुष्य जीवन बहुत कीमती मनुष्य जीवन है। ठीक है। महाराज जी एक आयत है वो कहते हैं वो भी कोशिश करते हैं। बट जब दोस्त कहते हैं फिर सारी कोशिश छूट जाती है। नहीं ऐसे दोस्तों की बात नहीं माननी चाहिए यार। हमको भी दोस्त बना लो। मान लो जैसे दोस्त कहते हैं पी लो तो एक दोस्त कह रहा है ना पियो यार तो हमारी बात मान लो। बहुत दोस्तों को दोस्त बना के देख लिया। एक बार प्रेमानंद को दोस्त बना के देख ले। राजुल जी महाराज जी आपका भी सेम ही था।

प्रश्न कह रहे थे कि दिमाग में बहुत टेंशन हो जाती है महाराज जी। समझता नहीं आपकी क्या सबके दिमाग में टेंशन? मन का स्वरूप यही है। जब तक हम नाम जप नहीं करेंगे। जब तक इसे सत कार्यों में नहीं लगाएंगे तब तक यह अपवित्र मन हमको क्लेश ही तो देता रहेगा। शोक ही देगा, दुख देगा। देखो बाहर कैसी भी दुख की परिस्थिति हो यदि हमारा मन ठीक है तो हम हर परिस्थिति से लड़ सकते हैं। बाहर कैसी भी अनुकूल परिस्थिति हो यदि हमारा मन बोर है तो हम किसी भी परिस्थिति से लड़ने लायक नहीं।

तो क्या होता है? जब हमारे पास अध्यात्म बल नहीं होता तो मन बड़ा कमजोर होता है। हर अनुकूल परिस्थिति में वह नेगेटिव बात फेंकता रहता है। नकारात्मक सोच फेंकता रहता है जिससे हम परेशान हो जाते हैं। महाराज जी करने के बाद भी नहीं आ पाती है। नहीं अगर हम मन भगवान में लगाएंगे और वास्तविक लग जाएगा तो आनंद आएगा। अभी कनेक्शन नहीं जैसे बोर्ड में बिजली आ रही है और आपका बल्ब भी सही है आपका तार भी सही है और आपने कनेक्शन भी किया हुआ है लेकिन कनेक्शन छुआ नहीं है तो ऑन ऑफ करो बोर्ड से तो बिजली ले जाएगी समझ रहे अब आप चेक करवाओ तो आपका तार भी सही है आपका बल भी सही आपका बोर्ड भी सही है आपकी बटन भी सही है लेकिन कनेक्शन और थोड़ा जहां गया तो लप से जल जाएगा ऐसे ही हमारा भगवान से भी कनेक्शन एक्शन सही नहीं है।

सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मनह बांध भर हमारा कोई नहीं भगवान के सिवाय कोई नहीं ना कोई रिश्तेदार ना कोई बचपन से भगवान के मार्ग में तो ना कोई मित्र है ना कोई शत्रु है ना कोई रिश्ता है ना कोई सीधे भगवान ही केवल है हमारे जो कुछ है भगवान है तो महाराज जी बहुत चीजों में जब घिर जाते हैं इंसान और फिर भी जाप करते हैं और उसके बाद भी मन भटक जाते हैं। नहीं ऐसा नहीं है। जप सही ढंग से करो तो वो कंट्रोल करेगा मन को। अब माला अंगुली में घूम रहा है और दिमाग सब आप समझो वही तो आपसे हमने क्या कहा कि बोर्ड भी सही है, बल्ब भी सही है, तार भी सही है।

वो माला भी चला रहे हैं। उनको पता भी कि भजन कर रहे हैं लेकिन उनका कनेक्शन सही नहीं है। अगर कनेक्शन हो जाए तो ऑन करते ही बल्ब जल जाएगा। नहीं जल जाएगा। तो ऐसे ही अगर हमारा कनेक्शन हो जाए भगवान से उसी के लिए तो अभ्यास करते हैं। आते रहते हैं। हां। तो कनेक्शन तभी होगा जब हम थोड़ा प्यार प्रभु को तो दें। जितना प्यार हम अपने एक भाई को देते हैं, मां को देते हैं, पिता को देते हैं, पत्नी को थोड़ा प्यार तो प्रभु की तरफ दें। इतना भी प्यार प्रभु से नहीं। थोड़ा सा नुकसान हो जाता तो नाराज हो जाते।

वही कह रहे तो ये प्यार थोड़ी होता है। प्यार तो जैसे हम पुत्र से करते हैं, मित्र से करते हैं, अपने पत्नी से करते हैं, अपनी मां से करते हैं। थोड़ा सा प्यार प्रभु को हम दे दें तो वो प्यार के समुद्र हैं। वो हमें भर देंगे। वो हमें निहाल कर देंगे। और उनका प्यार आपके ऊपर है। तभी आप यहां बैठे हैं। परम पावन महामहिम श्री वृंदावन धाम में संत समागम में बैठे हैं। सुत दारा धन लक्ष्मी पापी के घर होए। संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दो ये दुर्लभ बात है कि आप प्रातः कालीन बेला पर परम पावन वृंदावन धाम में संत समागम में बैठे अगर आप अपना चाहे तो कनेक्शन की तैयारी फिट है आप कनेक्शन कर सकते हैं जी कल मैंने साक्षात देखा मैं एक डॉक्टर हूं जी तो एक केस खड़ा हो रहा था महाराज जी कल और मैंने परसों ही आपकी एक वीडियो देख रहा था जी कहा जैसे आप राधा राधा लेंगे कहेंगे सब ठीक हो जाएगा जी महाराज जी मैंने पांच बार राधा आंख बंद करके अपना नाम जपा जी महाराज जी वहां

से सब चेंज हो गया वो फेस तुरंत महाराज ठीक हो गया आंखों के सामने आप थे जी जी जी नहीं भगवान सर्व सामर्थ्यशाली है अगर हम उनका सुमिरन करेंगे तो हमारा मंगल अवश्य हो जाएगा अवश्य विकास जी अमरोहा से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं आपको पिछले कुछ दिनों से सुन रहा हूं पर आपसे डर सा लगने लग गया है क्योंकि आप सब कुछ छुड़वा दोगे जिससे मैं छोड़ना नहीं चाहता अगर मैं छोड़ नहीं अगर गलत गलत चीज छूट जाती है तो आनंद आना चाहिए कि डर आना चाहिए हम किसी की सही चीज थोड़ी छुड़वाते हैं।

अब आपसे यह तो नहीं कहेंगे अच्छी बातों को छोड़ नहीं शराब छोड़ दो मांस छोड़ दो परा स्त्री से व्यभचार छोड़ो गंदे स्वभाव को छोड़ो देख आप अच्छे व्यक्ति बन जाएंगे पर मन को तो वही अच्छा लगता नहीं बच्चों को जैसे बाथरूम ले जाओ ना गंदे खेल रहे हो कि उनको बढ़िया नहला धुला तो उनको बुरा सा लगता है कि मेरी मम्मी जो है ये बुरा काम कर रहे हैं कि मुझे नहलाने ले जा रही है लेकिन बालक ये नहीं जानता कि अभी साफ स्वच्छ करके करके श्रृंगारित कर देंगे। ऐसे ही संत मां के समान है।

तुम्हारी बुराइयों को धोना चाहते हैं। तो आप बच्चे के समान उसे डर मानते हैं कि यार मेरी बुराइयां चली जाएंगी। नहीं तो आप बताओ संत संग से बुराई के सिवा और क्या जाता है? संत संग से किसी की हानि हुई है क्या? हां कभी। तो यहां अगर छुड़ाया जाता है तो बुरी आदतें, बुरी बातें जो तुम्हें दुख देंगी तो दुख सब कोई छोड़ना चाहता है लेकिन जिन बातों से दुख मिलता है वो बातें नहीं छोड़ना चाहता। यह खतरनाक सबसे ज्यादा यह बात हो गई कि हमको चाहिए नहीं दुख। लेकिन हम आचरण वही करते हैं जिनका परिणाम दुख होता है।

तो संत जनों से ऐसी बुद्धि प्रकट होती है हमारे अंदर जो दुख देने वाले आचरणों का त्याग कर दे। जैसे आप शराब पीते हैं, आप मांस खाते हैं, आप व्यभचार करते हैं, जुआ खेलते हैं। गंदे आद तो ये आदतें आपका नाश कर देंगी। आपको पतित कर देंगी। आपके शरीर की हानि, आपकी बुद्धि की हानि, आपके धन की हानि। एक भी लाभ किसी को नहीं। वैसे भी जो शराब पी रहे हैं उनके अंगों में जाकर के उनको प्रभाव ही दिखाती है। लीवर है, किडनी है, दिल है तो इसमें लाभ क्या है? और परिणाम शराब पी के फिर आप परिणाम देखो कहीं नाली में पड़ा है, कहीं ऐसे लड़खड़ा रहा है।

एक आदमी को शराब पी के देखा कि उस साइकिल को एक छोटी सी नाली नहीं पार कर पा करा पाया और खुद साइकिल सहित उसी में गिर गया। अब इतनी तो सामर्थ्य हीनता पैदा करती है। रुपया खर्चा होता है। असम्मान मिलता है। सम्मान की हानि होती है। तो क्यों पियो और शास्त्र निषेध करता है तो शराब क्यों पियो? बोले थोड़ा सा गम मिटाने के लिए तो भगवान का नाम जप करो ना। भगवान के नाम का कीर्तन करो ना। भगवान की कथा सुनो ना, सत्संग सुनो ना। उससे तुम्हारा बुद्धि शुद्ध होगी और शोक नष्ट हो जाएगा।

लेकिन लोग सतमार्ग का अनुसरण नहीं करते तो कोई गलत बात बच्चा थोड़ी यहां होती है कि डर लगे झूठ चाहता है उनके मतलब पूजा भी करता रहूं और जो अलग चीजें वही मैं भी प्रसन्न रह हां गंदी गंदी बातें छोड़ना ही जीवन का लाभ है बहुत अच्छे बच्चे बनो क्यों गंदे बच्चे बनो कहीं गंदे आचरण करोगे पकड़े जाओगे जीवन बर्बाद हो जाएगा जीवन बर्बाद हो जाएगा मान लो किसी माता बहन को छेड़ दो डंडा चलेगा आजीवन छोड़ देता हूं तो मतलब विचार आते रहते हैं पुराने चीजें आगे आगे पर नाम चलाओ ना जब खाली समय है तो विचार आएंगे अगर राधा राधा चल रहा है तो विचार आ जो आएंगे भी वो नष्ट हो जाएंगे क्योंकि हमारे पास नाम चल रहा है तो नाम जप करो महाराज जी मन को स्वाभाविक वही अच्छा क्यों लगता है क्योंकि मन बना उसी से है ना मन बना उसी से प्रकृति से ही तो बना है ना इंद्रियां मन ये सब प्रकृति की तरह प्रकृति की चीज प्रकृति की तरफ खींचेगी वो छोड़ना नहीं चाहता महाराज जी हां यही तो है और नाम जप कर दे तो स्वीकार नहीं करेगा कितने ऐसे नाम जापक हैं जो

गृहस्ती में होते हुए भी अब वो कहते हैं हमारी रुचि नहीं रह गई भोगों की तरफ अब हमारी संसार की तरफ रुचि नहीं रह गई तो नाम ने निर्मल कर दिया जितना निर्मल होता जाएगा मन बुद्धि उतना ही संसार से अलग होती जाएगी संसार में रहते हुए भी संसार से अलग और जितना मलिन उतने ही सब गंदे आसन गंदे ऐसे गंदे खानपान व्यवहार अभ्यर्ताव राक्षस हो रहे हैं लोग नहीं राक्षस हो रहे हैं आप सोचो हमारी बहन को कोई गलत देखे तो अच्छा नहीं लगता हम किसी बहन के साथ गलत करें वो भी तो किसी

की बहन बेटी है तुम्हारा अधिकार कैसे हो गया ऐसे और फिर इस तरह राक्षसी भाव से जला देना मार देना काट देना तो यह सत्संग अगर आपको मिला तो आप ऐसा नहीं कर सकते अगर साधु संग मिला है तो आप बुरी बातों से डरेंगे ेंगे तो बुरी बातें हटाने के लिए सत्संग होता है। तो हमें लगता है साधु ते हो ना कार जानी। संत से डरने का तो कोई किसी भी तरह संत किसी को थप्पड़ थोड़ी मारते हैं। किसी को गाली नहीं देते हैं। हां थप्पड़ मारने और गाली देने का स्वभाव हटवा देते हैं। गंदी बातें हटवा देते हैं।

ठीक है। कीरत किशोरी गौरी राधिका है नाम जापो। जी। खेलन के बहाने नंद गाम मा आई। नंद के भवन जाए जसधा सो मिल धाए गोरी भोरी देख यशोदा मन भाई गोद भर दीनी किनी विनती होवे प्रभु श्याम की राधे संग कही बरसाने जाए बात सवन मन भाई है और वा श्याम को के लाला की जय बोल बहु के भैया की जय जय हो जय हो नंद के दुलारे मादा के प्यारेन के काल बलदेव के भाई हैं शीश पे मुकुट वाले हाथ में लपुट प्यारे संतन के प्यारे निज भक्तन के साई को चरावन वारे पंछी को बजावन वारे ग्वाल वाले साथ प्यारे ये श्याम रूप है राधा के प्यारे प्रभु जग के सहारे प्रभु और ये नंद गाव वाले जमाई है नंद के लाला की जय बाबा मीठेमीठे भोजन चाहिए पीवे को चाहिए ठंडो पानी भजन ठाकुर की शरण में यही बहुत बात है गिरिराज जी की शरण में यही बहुत बड़ी बात है मनुष्य जन्म और ठाकुर जी की कृपा के बाद ही भजन ना बन ये ना अपराध ना बन ठाकुर जी कृपा भजन का मतलब क्या होता है?

केवल माला चलाना थोड़ा होता है। एक ठसक होती है। मैं गिरिराज जी का, मैं ठाकुर जी का अगर यह ठसक है ना तो इसी से सद्गति होती है। जैसे मैं पुरुष हूं, मैं स्त्री हूं। ये देहाभिमान हो जाने से जीव की दुर्गति होती है। ऐसे मैं श्री कृष्ण का हूं। मैं गिरिराज जी का हूं। मैं प्रियाजु का हूं। ये जब ठसक आ जाती है इसी से सद्गति हो जाती है। धन्य जय हो बाबा। राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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