एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #916 · 21 मई 2025
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री वृंदावन धाम की जय सदगुरुदेव भगवान की जय। भावना शर्मा जी बेंगलुरु से राधे-राधे। राधे-राधे महाराज जी गुरु जी कमाई का कितना हिस्सा धर्म के मार्ग पर लगाना चाहिए? अपनेप सामर्थ्य हमारी बात सुनो। अगर कोई आपको एक्सीडेंट का केस दिखाई दे रहा है।
आप दौड़ पड़ो। उसे उठाओ। गाड़ी में डालो। अस्पताल ले जाओ। जितना खर्चा लगे लगाओ। कोई भूखा दिखाई दे रहा है। अपनी भोजन की ताल उसे दे दो। कोई ठंडी से कांप रहा है। अपना कपड़ा उसे दे दो। ऐसा नहीं है कि हम महीने में निकाल करके रखें। हमें जहां जरूरत पड़ी हां बहुत आ रहा हो करोड़ों में तो बहुत मिशन खुले हैं। ऐसे जो धर्मार्थ मिशन है उनमें आप दे सकते हो। लेकिन गृहस्ती में जितना आ रहा है अपने परिवार का पोषण करो। भगवान के घर में सेवा विराजमान करो। अति सेवा करो। भूखे टूटे के साधु संत महात्मा बीमार पशु पक्षी कोई भी हो उसकी सेवा की भावना रखो।
उसमें भी यह नहीं देखना है कि हमारा दशांश खत्म हो गया। अब तो अब हम क्या खर्चा करें। नहीं हम दो-चार दिन भले भूखे रह जाए लेकिन आज यह बीमार आदमी है। इसको हम दवाई दिलाते हैं। आज इसकी हम सेवा करते हैं। सेवा करने की भावना रखो। दान देने की भावना मत रखो। सेवा करने के लिए हमारे पास जो कुछ तन मन धन है अगर जरूरत पड़ी हम दूसरों की सेवा में तन से भी लगेंगे मन से भी लगेंगे और धन से भी लगेंगे। हमारी भावना तो यह है कि तदय वस्तु गोविंदम तभव समर्पय हे भगवान आपकी दी हुई वस्तु हमारे पास है जब जरूरत जहां जैसे पड़े हमें प्रेरित कर देना हम सेवा कर देंगे हम दान देने लायक नहीं है क्योंकि दान अपनी वस्तु का दिया जाता है और वस्तु भगवान की है तो हम क्या दान दें भगवान की वस्तु जहां जरूरत पड़ेगी वहां लगा देंगे वैसे शास्त्री नियम में बताया गया है कि 100 में ₹1 धर्म के लिए निकाल देने चाहिए दशांश कहते 100 में ₹1 धर्म के लिए निकाल देना चाहिए कि भाई अगर हमारे पास ₹100 हैं तो ₹1 रखें किसी धर्म कार्य में जब अवसर आएगा तो हम इसे लगा देंगे।
ऐसा शास्त्री पर हम कह रहे हैं कि अगर हमें जरूरत है उसको ₹100 की दवा दिलाने की। हमने ₹1 निकाल के रख तो हम 90 और लगा देते हैं। भैया तुम्हारी दवा 100 की है। तुम जाओ और खाओ और स्वस्थ रहो। ऐसे भावना से करना चाहिए। अगर दान वाले सिस्टम पे तो फिर अब उसको 90 कहां से चलो जरूरत तो हम 90 का घाटा सह लेंगे हम तुम्हें पूरे 100 दे देंगे आज तुम्हें बीमार हो आज तुम्हें आवश्यकता है तो हम तुम्हारी सहायता करते हैं ऐसी भावना रखनी चाहिए वैसे शास्त्री नियम दशांश निकालने का है कि 100 में ₹1 निकाल के रख दे कभी तीर्थ यात्रा कभी साधु सेवा कभी गौ सेवा कभी बीमार सेवा उनमें लगा दे ऐसा इसलिए देने की बात छोड़ो अपने परिवार का बढ़िया पोषण करो लड़का बच्चा को बढ़िया पढ़ाओ भाव लिखाओ और जरूरतमंद की सेवा कर दो।
कभी कोई भूखा टूटा प्यासा बीमार ऐसा जरूरतमंद दिखाई दे तो उसे अपना भी वस्त्र दे दे कोई बात नहीं। मान लो हम साल ओढ़े कोई कांप रहा है तो हम तो घर में जाकर दूसरी व्यवस्था कर देंगे। उसको ओढ़ा देते हैं। ये है सच्ची सेवा। कोई भूखा है हम अपने हिस्से का भोजन उसको दे देते हैं। ये सच्ची सेवा है। जी। आयुष जी भोपाल से। प्रियंका जी गुजरात से। महाराज जी आप दोनों का सेम प्रश्न है। आप कहना चाह रहे हैं कि आप अपने अंदर के सूक्ष्म अहंकार को कैसे पहचाने और मिटाएं? जब किसी दूसरे पर दोष दर्शन होने लगे तो समझना चाहिए हम में अहंकार बढ़ रहा है।
जब हम किसी के दोष देखें तो अपने में गुणा अभिमान होता है। तभी दूसरे में दोष दिखाई देते हैं। और इस अहंकार का नाश गुरुदेव के चरणों का आश्रय, संतों के पावन चरित्र पढ़ने से और भगवन नाम जप करने से यह अपने आप नष्ट हो जाएगा। गुरुदेव के चरणों का दृढ़ आश्रय हो। भक्तों के चरित्रों का गायन श्रवण हो और खूब नाम जप हो तो अहंकार मिटिया मेट हो जाता है। भक्त चरित्र सुनने से लगता है मेरे में क्या भक्ति है। इनमें जो महान भक्ति रही ये जो भजन किए उसमें मेरा भजन कितना तो अहंकार नष्ट होता है।
जब गुरुदेव के चरणों का आश्रय लेते हैं तो यह होता है कि मेरे से जो साधना बन रही तो गुरु कृपा से बन रही है और नाम जप करने से हृदय पवित्र होता है। तीनों से अहंकार नष्ट हो जाता है। गुरु चरणों का आश्रय, भक्त के पावन चरित्रों का पठन श्रवण और गुरु चरणों का आश्रय से बहुत जल्दी लाभ मिलता है। जो गुरु चरणों के आश्रय में नहीं है तो अहंकार तो पोछता ही रहता है। फिर वो बढ़ता रहता है। और नाम जप, नाम जप बहुत जल्दी हृदय को पवित्र करता है। ये तीन साधन है अहंकार नष्ट करने के लिए।
इनको चाहे जो चाहे अपने अहंकार का नाश करना। ये तीन साधन स्वीकार कर ले। गुरु चरणों का आश्रय भक्त चरित्र और नाम जप आशु सिंह जी हनुमानगढ़ से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जब नाम जप सिमरन करते हैं तो शरीर ही नाम जप करता है मन कभी भूतकाल में चला जाता है कभी भविष्य में चला जाता है पर तो महाराज जी इधर-उधर घूमता रहता है यह उसको कैसे एक जगह हाजिर करते रहो लग जाएगा अभ्यास योग युक्त चेतस निगामिना अभ्यास बनाओ। जहांजहां मन भाग के जाए उसे नाम जप में लगाओ। बार-बार लगाओ।
दीर्घकाल निरंतर सत्कार सेवितो दृढ़ भूमि। दीर्घ काल तक यदि ऐसा अभ्यास करोगे आदर पूर्वक तो दृढ़ हो जाएगा। मन लगने लगेगा। आप चिंता मत करो। नाम मन लगने पर भी जो जबान से नाम लिया जाता है वही निष्पाप कर देता है। आप जी ने जो कहा था ना लिखकर नाम जो उससे फर्क पड़ने लगा है। हां धीरे-धीरे आ जाएगा। धीरे-धीरे आ जाएगा। अभ्यास योग युक्त चेतस निगामिना अभ्यास करते करते मन फिर स्वयं पकड़ लेता है भजन को अब जैसे आप बिल्कुल यह नहीं कह सकते कि मन नहीं पकड़ा कुछ मिनट तो पकड़ लिया है ना अब अगर ना करो तो मन को बेचैनी होगी उसने पकड़ लिया धीरे-धीरे और पकड़ाओ एक मिनट और पकड़ाया एक मिनट और उसको धीरे धीरे धीरे अभ्यास में ले आओ तो 24 घंटे पकड़ लेगा उसको अभ्यास में लाने की जरूरत है नीरज गोयनका जी राधे राधे श्री हरिव जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मेरी रुचि श्री कृष्ण नाम में ज्यादा है लेकिन मैं कोशिश कर रहा हूं एक नाम पर मन नहीं टिका पा रहा कभी कृष्ण नाम जपता हूं कभी गोविंद कभी नारायण कभी राधा कृष्ण कभी राधा गोविंद महाराज जी मन भटकता रहता है कोई एक नाम में कोई बात नहीं कोई बात नहीं बहुत अच्छी दवा है हमें इसे पहले संसार के चिंतन से हटाना खास बात पकड़ो हमारा मन कह रहा है गोविंद गोविंद गोविंद कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधा राधा राधा तो हमें संसार का चिंतन छुटाना खास खास बात है।
आगे चलकर के हम एकाग्र हो जाएंगे। आगे चलकर के कोई एक नाम अपने आप अधिकार प्राप्त कर लेगा। लेकिन अभी ऐसे जपो जैसे जप रहे हो। जब जहां मन लगे जब मन कहे राम राम तो राम राम कहो मन कहे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कहो। पहले संसार का चिंतन छूटे। फिर वो बात एक आ जाती है एकाग्रता की कि प्रियता की कि एक नाम प्रिय हो गया। फिर उसी में हमारा मन लग गया। अभी तो ऐसे ही चलो जैसे चल रहे हो। खूब संसार का चिंतन छूटे, नाम भगवान का चले। ऐसा प्रयास करते रहो। महाराज जी आप तो राधा जी की सहचरी हैं।
आपको राधा जी का प्रिय नाम पता है तो मुझे बताइए ताकि मैं एक निष्ठा से जप गोविंद नाम ठीक है। हां तो स्वयं श्री जी जपते हैं। त श्यामे नित प्रण रस लाल जो जपते हैं तो श्यामे सुंदर मनो हरे कंदप कोटि ललिते सुनागरे तुम कृष्ण कहो गोविंद कहो लाडली को बहुत अच्छा लगेगा ठीक है आप खूब नाम जप करें जगजीत सिंह जी हनुमानगढ़ से राधे-धे महाराज जी महाराज जी वैराग्य क्या है दुनियादारी से दूर होना या स्वयं से अंतर्गत प्रेम प्रसार होना त्याग त्याग, वैराग्य, उपरति ये तीन शब्द शास्त्रों में आते हैं।
त्याग कहते हैं भोगों की इच्छा भोगने की है पर शास्त्र विरुद्ध है। हम नहीं भोगेंगे। हमें भगवत प्राप्ति करनी है। भोगों की भोगने की इच्छा है पर हम भोगेंगे नहीं। उसे कहते हैं त्याग। और भोग सामग्री पास है पर भोगने की इच्छा नहीं है उसे कहते हैं वैराग्य और भोग सामग्री है ऐसा बोध भी नहीं रह गया है उसे कहते हैं उपरति वैराग्य का तात्पर्य होता है भोगने की इच्छा ना रहना राग रहित हो जाना हमारा किसी भी वस्तु व्यक्ति स्थान से राग ही नहीं रह गया है अपनापन केवल एकमात्र परमात्मा से रह गया है कोई भोग भोगने की इच्छा नहीं।
भोग की इच्छा का निरंतर के लिए त्याग हो जाना उसे वैराग्य कहते हैं। किसका प्रश्न था? हां, भोगों की इच्छा का त्याग हो जाना वैराग्य कहते हैं। और भगवान से अनन्य प्रेम वाह गुरु से अनन्य प्रेम हो जाना यही जीवन का वैराग्य का फल है। अगर वैराग्य केवल है और ब्रह्म बोध नहीं है या भगवत प्रेम नहीं है तो वैराग्य किस काम का? वैराग्य की पूर्णता प्रेम या भगवत प्राप्ति में है या तत्व बोध हो जाए तो उससे वैराग्य की पूर्ण केवल वैराग्य हमें भगवत प्राप्ति नहीं करा सकता।
वैराग्य सहायक है लेकिन हमें तत्व बोध होना चाहिए या भगवत प्रेम होना चाहिए। दो में अगर एक नहीं है तो अभी पूर्णता नहीं है। वैराग्य कोई खास वस्तु नहीं है। खास वस्तु अनुराग है। मिले न रघुपति बिन अनुरागा किए कोटि जप जोग विरागा चाहे जितना योग हो चाहे जितना वैराग्य हो लेकिन भगवान से प्रेम नहीं तो योग किस काम का जोग कुजोग ज्ञान अज्ञानु जहां नहीं राम प्रेम प्रधानु भगवान से प्रेम नहीं तो योग किस काम सनकाद निरंतर हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम जपते रहते हैं और ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष हैं।
तत्व बोध है जिनको वह भी निरंतर नाम जप करते हैं। तो नाम जप करो और असत भोगों का त्याग करो। सत भोगों से तो शरीर का पोषण करो। धर्म का पालन करो। असत भोगों का त्याग करो। जिसे शास्त्र निषेध करता है। जो पाप कर्म है उनका त्याग कर दो तो आगे बढ़ते चले जाओगे। राधे-राधे महाराज जी महाराज जी इनका भी प्रश्न ऐसा इसमें पूछना चाह रहे हैं कि मतलब एक तो हम चीज का त्याग कर देते हैं एक है कि इच्छाएं हैं कामनाएं हैं बट उसको स्वीकार कर लिया तो उसके परिणाम में फिर विचलित नहीं होंगे ऐसा मतलब कोई एक ऐसे एक है कि नहीं खाना मेरे को रसगुल्ला नहीं खाना तो एक है कि रसगुल्ला खाऊंगा फिर रसगुल्ला खाना नहीं खाना यह हमारे मन की बात नहीं चलेगी शास्त्र क्या कहता है तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थितौ अगर शास्त्र कहता है जैसे काम भोग है अपनी पत्नी के साथ काम भोग किया हुआ वो धर्म में है लेकिन दूसरे की पत्नी के साथ किया हुआ पाप में है जो पापी पुरुष ये सोचता है कोई शोक नहीं कोई चिंता नहीं कोई प्रायश्चित नहीं तो पापी पुरुष है अंतकरण मलिन है वो नीच है दुर्गति को प्राप्त होगा ऐसा थोड़ी कि तुम्हारे सोचने से हो जाएगा तुम्हारे सोचने से नहीं होगा।
शास्त्र प्रमाणित विषय होना चाहिए। यह नहीं कि एक है कि विषयों की लालसा है और उसको दबा रहा है और एक है कि विषयों की लालसा है। वो भोग रहा है। कोई प्रायश्चित नहीं, कोई पश्चाताप नहीं। तो तो घोर पापी पुरुष का लक्षण है। ये तो घोर पापी पुरुष का लक्षण है। ये कोई पुण्य आत्मा या सतमार्ग वाले का लक्षण थोड़ी सतमार्ग वाले से तो जरा सा धर्म विरुद्ध होगा तो हृदय जलने लगेगा। त्राहिमाम बोलेगा वो पश्चाताप करेगा। का अनुष्ठान करेगा जिससे उसका पाप नष्ट हो। यह तो जैसे आतंक है कि हजारों को मार दिया उनको कोई पश्चाताप नहीं और जाकर पार्टी मनाते हैं।
ऐसे विषय भोगी पापी पुरुष हैं। गलत आचरण करते हैं और खूब खुशी होते हैं कि आज तो हमने ऐसा किया। ये पापी पुरुष का लक्षण है। ये पुण्यत्मा महात्मा या सतार्ग का लक्षण नहीं। सतमार्ग वाला है कि जो धर्म विरुद्ध आचरण भूल कर भूल ना दे कुमार्ग पाऊं। भूल करके भी हम असत आचरण नहीं करेंगे। अगर असत आचरण बन गया तो भारी जलन, भारी पश्चाताप और उपाय पूछेंगे कि उस पाप का प्रायश्चित क्या होना चाहिए जो हमसे हो गया। यह है सतार्ग में चलने वालों का ऐसा नहीं। ये तो पापी पुरुष का लक्षण है।
क्यों? मनमानी आचरण करके फिर तो क्या है कि गोली मार रहे हैं, लूट रहे हैं, व्यभचार कर रहे हैं, मौज से शराब पी रहे हैं, मस्ती से घूम रहे। उनको कोई प्रायश्चित है क्या? ये तो पापी पुरुष का लक्षण है। ऐसी गंदी बात मन में मत लाओ। अभी नए बच्चे हो फिर गंदे आचरणों में बहते चले जाओगे। हरिपथ दास जी बरसाना से महाराज जी राधे-राधे श्री हरिवंश महाराज जी आप कह रहे हैं कि एकांतिक वार्तालाप में एक बार आपके प्रकट शरीर का नाम तो जानते ही हैं और आंतरिक शरीर का नाम भी जानने को मिला।
महाराज जी हम जानना चाहते हैं कि उस स्वरूप का परिधान एवं परिचर्या क्या है? महाराज कितने रुपए बैंक में जमा है? कितने जेब में है? यह पोस्टर लगाया जाता है क्या? यह पोस्टर लगाया जाता है क्या? आपका स्वरूप क्या है? उसके पहनावा क्या है? आपकी सेवा क्या है? यह हमारा पर्सनल विषय है। आप अपनी स्थिति की बात करो कि आपकी साधना में क्या विक्षेप है? उसका उत्तर लीजिए। ये कोई प्रचार प्रसार का विषय है क्या? पोस्टर लगाने का विषय क्या? साधना को, दिनचर्या को, उपासना को, उपास्य को गुप्त रखा जाता है।
यह कोई एकांतिक में वर्णन करने वाली बातें हैं क्या? आप अपनी साधना में बताइए कि आप कहां पहुंच रहे हैं। जहां पहुंचने में विक्षेप हो उसका उत्तर लीजिए। यह ऐसी बातें नहीं की जाती है। यह अपनी गुप्त आदमी साधारण धन को नहीं बता सकता कि हमारा बैंक बैलेंस कितना हमारी जेब में कितना हमारे घर में कितना सोना रखा है? कितना फिर ये परमार्थ की बात कैसे वो तो गुप्त रखी जाती है। यह कभी वर्णन थोड़ी की जाती है। और जो कर दे तो खत्म। यह भी बात है। अगर भावावेश में आकर अपनी प्रधानता रखने के लिए कर दें तो वहीं से स्टॉप हो जाएगा।
प्रिया प्रीतम के प्रेम रस की बातें यदि रख सको तो अपने मन में गुप्त रखो। इसे कभी वो तो महाराज जी ने प्रश्न किया तो नहीं तो हम प्रिया प्रीतम की बात ही नहीं करते। पूरे एकांतिक में सुनना गौर से सुनना। भगवान शब्द का प्रयोग करते हैं। कभी प्रियाजू प्रिय लालजू और अपनी प्यारी यह हमारा गुप्त विषय है। हां कोई पर्सनल ऐसा आया ऐसा कोई प्रश्न किया जैसे महाराज जी बरसाना से आए तो प्रेम रस धाम से आए तो चलो थोड़ी चर्चा हो गई। अपने स्वरूप के वर्णन के ये सब बातें थोड़ी है।
स्वरूप का थोड़ी वर्णन हो सकता है। वो तो वो तो वो तो स्वाद का विषय है। रसगुल्ला आपको खवाया कैसा लगा? बोले मीठा कैसा मीठा लगोगे बोले बहुत मीठा नहीं कैसा बहुत मीठा बोले खा के देख लो तो तुम भी उसी मार्ग में चल रहे हो तो आओ उसी रंग में आओ खुद अनुभव गम्य भजे संता वो अनुभव गम्य विषय उसको थोड़े से अभिषेक नागर जी मध्य प्रदेश से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जोई जोई सगुन जानकी ही होई असगुन भयो रावण ही सोई महाराज जी आप कह रहे हैं कि लंका में माता सीता जी को अनुभव हो रहा था मतलब शगुन और इनको अश्वगुन हो रहा था।
महाराज जी ये कह रहे हैं कि ये ये अश्वगुण और शगुन अपनी अंतर चेतना का भावनात्मक या पवित्रता की या धर्म निष्ठा का या बाहरी जैसे कोई बिल्ली रास्ता काट गई या छीक आ गई इससे अशु इन से बिल्ली रास्ता काट जाए चाहे बिलावटा रास्ता काट जाए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वहां एक भागवतिक संकेत है कि जब स्त्री का स्त्री शरीर का बाम अंग फड़कने लगता है तो कुछ शुभ होने वाला है। और जब पुरुष का बाम अंग फड़कता है तो कुछ अशुभ होने वाला है। ऐसा संकेत होते हैं। तो बाम अंग फरकने लगे जानकी जी के तो उनको शुभ शकुन होने लगा कि रावण के अशकुन होने लगा।
जब बांगुन के फर्कने लगे तो उसको अपशकुन होने लगे कि कुछ अब गलत होने वाला है। तो वहां संकेत मात्र केवल उसके लिए बिल्ली में भगवान देखो कभी अपशकुन नहीं होगा। भगवान तो बिल्ली में भी विराजमान है। राधा राधा कहो कोई बाधा नहीं। जब घर से निकलो तो राधा राधा राधा राधा राधा जहां तुम्हें ऐसा लगे किसी ने छींक दिया, किसी ने अपशकुन कर दिया, किसी ने तो वहां राधा राधा राधा बोलो। गांव में बहुत सी ऐसी प्रणालियां हैं। ये कोई शास्त्रीय नहीं है। शास्त्री ग्रह नक्षत्र हैं जो प्रतिकूल होने पर दंड देते हैं और अनुकूल होने पर सुख सुविधा देते हैं।
तो समस्त ग्रहों की शांति के लिए भगवान का भजन करें। वो सर्वलोक महेश्वर हैं। उनके भजन करने से कोई ग्रह नक्षत्र प्रतिकूल होने पर भी प्रतिकूल फल नहीं देता। और भगवान से विमुख है तो अनुकूल होने पर भी अनुकूल फल नहीं देता। जो भगवान शंकर सहस्र विष्णु अज तोही सक राख राम कर द्रोही तो हमें विचार करना चाहिए और ये छींक और ये सब इन बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए कि बिल्ली रास्ता काट गई बिल्ली में भी भगवान है भगवान रास्ता काट गए क्या फर्क पड़ता है कुछ नहीं होता नाम चल रहा है ना सब मंगल होगा और नाम नहीं चल रहा चाहे जितने शकुन हो अमंगल ही है का हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई जब तो सुमिरन बस खास बात यही पकड़ो बिल्ली काटना विपत्ति नहीं है।
भजन छूट जाना विपत्ति है। कहे हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई जब तो सुमिरन भजन हो। शास्त्री वार्ता को स्वीकार करना चाहिए। ग्रामीण वार्ता तो बहुत विचित्र बहुत खाली बाल्टी देख लिए। अब वो पानी लेने जा रहा है। कुआं हम घर से निकले इसने खाली बाल्टी दिखा दिया। अब अपशकुन हो गया। अब गाली ला अब शकुन बाद में होता। लाज जूता उसी समय शुरू हो गया। गांव की बातें तो गांव ग्रामीण की बहुत विचित्र बात है। गांव की बातों में तो शास्त्री बात माननी चाहिए। राधा केसरी जी बरेली से राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव भगवान हम रोज नियम से एकांतिक वार्तालाप सुनते हैं तो देखता हूं कि आपको बहुत प्यार करने वाले प्रिय भक्त हैं।
उनके प्यार के आगे मेरा प्यार तो कुछ भी नहीं है और अपने आपको बहुत छोटा महसूस करता हूं। गुरुदेव भगवान इन सब भक्तों को देखकर हृदय में बहुत जलन सी होती है। ये जलन कैसे खत्म हो गई महाराज जी भक्ति का तो यह स्वरूप है कि अपने इष्ट को जब कोई प्यार करता है तो हम उसकी चरण रज माथे पर लगाते हैं। हमें ईर्ष्या नहीं होती। हमें जलन नहीं होता। जो हरिवंश को नाम सुनावे तन मन प्राण तास बलिहारी। जो हरिवंश उपासक सेव सदा सेऊं ताके चरण बिचारी। यदि हमारे गुरुदेव से जो प्रेम करते हैं तो हमें ईर्ष्या नहीं होती।
हमें उनके चरण वंदना करने का मन होता है कि अहो भाग्य धन्य भाग्य कि आप हमारे गुरुदेव की सेवा करते हैं। आप हमारे गुरुदेव की आज्ञा में रहते हैं। आप हमारे गुरुदेव को प्यार करते हैं। इसलिए हम आपको बहुत प्यार करते हैं। बहुत आदर करते हैं। भक्ति ईर्ष्या नहीं पैदा करती। भक्ति प्रेम पैदा करती है। तो यह गलत बात है। इसको हटाओ अंदर से। यह ठीक बात नहीं है। जो गुरु को प्रेम करने वाले हैं उनको मानसिक नमस्कार करें कि धन्य भाग आप इतना प्रेम करते हैं। काश हमारे अंदर भी ऐसा भाव हो कि हम आप जैसा गुरुदेव से प्यार कर पावे।
यह बात तो है। उनकी चरण वंदना करें। उनके प्रति सच्चे भाव रखें। ईर्ष्या ना करें। ईर्ष्या करना भक्ति नहीं है। यह गलत है। यह शास्त्र विरुद्ध है। यह भक्ति विरुद्ध है। भक्ति ईर्ष्या नहीं कराती। व्यक्ति प्रेम कराती है। जी पर जी ऐसा ऐसा भी ऐसा भाव भी हो सकता है कि वह आगे निकला जा रहा है। मैं पीछे वहीं के व तो उसकी चरण धूल माथे पर रखो। वह आगे भजन में निकल रहा है तो उसके चरण धूल माथे पर रखो कि तुम्हारा जैसा भजन हमें ईर्ष्या करने ईर्ष्या तो संसार में होती है।
भक्ति में ईर्ष्या थोड़ी होती है। भक्ति में तो नमन होता है। अपने से बड़े भक्तों के तो चरणामृत पिया जाता है। जूठन पाई जाती है। उनकी चरण रज माथे पर लगाई जाती है। उनकी दासता स्वीकार की जाती है। ईर्ष्या थोड़ी की जाती है। अरे बड़े भक्तों की तो बात जाने दो। अगर कोई छोटा बच्चा भी काउंटर लिए राधा राधा जप रहा है तो हमारा मन होता है इसके चरण छुए। यह हमारी श्री जी का नाम जप कर रहा है। इसके हम चरण छुए। गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे तुलसी जाके मुख से धोखे निकत राम ताके पग की पग तली मोरे तन की चाम धोखे से भी राम कोई कह दे तो उसकी चरण पग तली तो मेरा शरीर ऐसा वो पवित्र हो जाता है तो भक्ति नम्रता सिखाती है विनय सिखाती है प्रणाम उसका आदर उसका सम्मान ना कि ईर्ष्या ईर्ष्या ये गलत बात है गौरव सक्सेना जी इंदौर से राधेधे राधेधे महाराज जी महाराज जी मेरी जिज्ञासा कर्म कर्म समर्पण को लेके आपने पहले बताया है कि हमें केवल अपने सत्कर्मों को ही अपने इष्ट को समर्पित करना है।
असत्य कर्मों को नहीं क्योंकि असत्य कर्म समर्पित करने से वह वापस लौट कर आते हैं और हमारा बुरा कर देते हैं। किंतु महाराज जी हम तो अब शरणागत हैं तो कोई भी कर्म हमारा बुरा जिस दिन शरणागत हो जाओगे तो बुरा कर्म होगा ही नहीं। पहली बात अभी शरणागति का प्रोसेस चल रहा है। गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं गुण तुम्हारा समझे निज दोष जेह सब भांति तुम्हार भरोसा जिसे सब प्रकार से हे हरि आप पर भरोसा है पर गुण तुम्हार समझे निज दोष गुण है हरी आपका दिया हुआ है और गलती हुई तो हमसे हुई ये अभी शरणागति का प्रोसेस चालू शरणागति नहीं हुई शरणागति जिसकी हम शरण में उसके सिवा हमारी स्मृति में कोई नहीं तो पाप कर्म कैसे बन जाएगा पाप कर्म तो तब बनता है जब खाली समय मिलता है ना धते विषय पुसा संगास्ते उपजायते जब हम विषयों का ध्यान करते हैं चिंतन करते हैं तो विषय भोग की इच्छा जागृत होती है तभी हमसे पाप बनता है और जब हम हर समय राम राम कृष्ण हरि जप रहे हैं क्योंकि हम शरणागत हैं और भगवान अच्छा शरणागत से अगर कोई चूक होने वाली है सही में शरणागत जो है तो कर सदा तिनके रखवारी जिन बालक राखे महतारी मैं उन भक्तों की सदैव रक्षा करता हूं जो मेरी शरण में है जैसे मां अपने बच्चे की रक्षा करती है तो पाप कर्म की संभावना नहीं।
अगर बन जाता है तो हम प्रायश्चित करते हैं। हम हृदय से पश्चाताप करते हैं। भगवान से विनय करते हैं। मेरे से गलती हो गई और उस कर्म को नष्ट करते हैं। भजन के द्वारा ना कि जमा करते हैं। उसको नष्ट करना है। पाप कर्म को नष्ट करना है और सुकृतों को भगवान के चरणों में समर्पित कर देना है। भगवान से यह जरूर कहना है कि हे नाथ मैं आपकी शरण में हूं। अब मेरा बस नहीं कि मैं यह ना करूं। मैं चाहता हूं कि ना करूं पर मेरे से हो रहा है नाथ मुझे बल दीजिए और क्षमा कीजिए प्रभु मेरे और हृदय में जलन होनी चाहिए कि मेरे से ऐसा क्यों हो गया वो सब समाप्त हो जाएगा नाम जब चल रहा है वो भस्म कर देगा उसे जमा करने की जरूरत नहीं जमा करना है सत्कर्म समझ पाए आप जो संशय और क्रियानमान है उनको भी क्या हम कर सकते समर्पण संशय क्यों है संचित कर्म संचित जो संचित कर्म है वो हमारे बस बस के नहीं हो, समर्पित करने के नहीं हो तो गोदाम में अपने आप आग लगाएंगे।
जिनकी हम शरण में हैं। जो क्रमाण है, वर्तमान में जो कर्म हो रहे हैं वही तो समर्पित करना है। प्रारब्ध को भोगना है। संचित को प्रभु भस्म करेंगे। क्रमाण को हम समर्पित किए दे रहे हैं। हमारा जीवन बिल्कुल मंगलमय हो जाएगा। जी आयुष जी हरियाणा से। राधेधे बाबा। राधे-राधे महाराज जी बाबा जल्दी से जल्दी स्वामी जी का साक्षात्कार उनका भाव एवं नित्य विहार प्रकट हो जाए। ऐसा क्या करूं? कौन सा साधन करूं? कैसी रहनी दिनचर्या जरूरी स्वामी जी का साक्षात्कार नहीं है। जरूरी है स्वामी जी की आज्ञा का पालन करना।
यदि हम स्वामी हरिदास जी की आज्ञा का पालन करें। रोज केलीमाल जी का पाठ करें और हर स्वास में कुंज बिहारी श्री हरिदास कहें तो कोई प्रश्न की जरूरत नहीं पड़ जाएगी। अपने आप सब ठीक हो जाएगा। हर स्वास कुंज बिहारी श्री हरिदास और केलीमाल जी का रोज पाठ पूरा रोज पाठ केलीमाली जी का करो और कुंज बिहारी श्री हरिदास स्वासों से ना विसरे तो श्यामा प्यारी कुंज बिहारी खेलने लगेंगे और जब श्यामा प्यारी कुंज बिहारी खेलेंगे तो वो होगी गोद हरिदास की तो एक ही बात हो गई हरिदास जी की गोद में श्यामा प्यारी कुंज बिहारी का साक्षात्कार हो जाए राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी मैं गांव के मंदिर में कितनी बार और मैंने लिखा बागेश्वर धाम में बहुत जगह महाराज जी मैंने बहुत कसमें खाई कि मेरा ब्रह्मचर्य ना टूटे।
कसमें से ब्रह्मचर्य नहीं रुकता है। कसम खाने से ब्रह्मचर्य नहीं रुकता। सात्विक भोजन पाने से रुकता है। कसम खाने से थोड़ी होगा। सतोगुणी भोजन पाओ। मोबाइल से गंदी बातें मत देखो। गंदे बच्चों का संग मत करो और हस्तमैथुन करने की चेष्टा मत करो। तो कुछ दिनों में ब्रह्मचर्य ठीक हो जाएगा। सुबह दो-ती किलोमीटर दौड़ लगाओ। 15 20 मिनट दंड बैठक मारो। बढ़िया शीतल जल पियो। सात्विक भोजन पाओ। अभी दिमाग ठीक हो जाएगा। देखोगे मोबाइल से गंदी बातें। गंदे बच्चों का संग करोगे।
हस्तमैथुन करोगे। ब्रह्मचारी बनने के लिए कसम वसम थोड़ी रोक लेगी। कसम थोड़ी रोक लेगी। हाथ से गंदी क्रियाएं कर रहे हो तो उसमें कसम क्या करेगी? चाहे गंगा कसम खाओ, चाहे भगवान कसम खाओ, सब टूट जाएंगे। कसम तब रुकती है जब हृदय पवित्र होता है। हृदय से निश्चय होता है तब रुकती है। बात समझ में आई बच्चा? कसम टूटने का पाप जो बना है उसका नाम जप करो। भगवान का नाम जप करो। आगे से गंदी बातें मत करो। ठीक हो जाएगा। दौड़ भाग करो। शरीर को थकाया जाता है। ब्रह्मचर्य के लिए शरीर को थकाया जाता है।
इससे खूब सेवा, खूब व्यायाम, प्राणायाम, नाम जप खूब इससे थकाया जाता है। तब ब्रह्मचर्य पचता है। ऐसे ब्रह्मचर्य थोड़ी पचता है। महाराज जी भगवान का प्रेम कहां? हां सब इसी में हो जाएगा। पहले गंदी आदतें तो छूटे तब भगवान से प्रेम हो। पहले गंदी आदतों में जो प्रेम है वह छूटे तब आगे की बात बने। खूब नाम जप करो और शरीर स्वस्थ रखो। पवित्र आहार करो। गंदे दृश्य गंदे बच्चों का संग त्याग हो। मोहित जी करनाल से हरियाणा राधे राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी कुछ दिन पहले आपने नाम की संख्या का वर्णन किया था।
आपने बताया था कि एक करोड़ नाम जप होने पर शारीरिक शरीर निष्पाप हो जाता है और दो करोड़ पे धन का अभाव खत्म हो जाता है। महाराज जी मैं इस स्थितियों को प्राप्त करना चाहता हूं। महाराज जी मुझे कोई एक नाम दे दो और उसका नियम या सावधानियां बता दीजिए। बस राधा राधा राधा राधा राधा राधा अपवित्र पवित्र सर्वावस्था पुंडरिकाक्षम सवायाभ्यांतरा सूची जो नाम जप करता है तो बाहर और भीतर से पवित्र हो जाता है। चाहे सोच में बैठे हो चाहे पवित्र हो किसी भी स्थिति में निरंतर नाम जप करो आप बस काउंटर का प्रयोग लेटरिंग में बैठ के मत करना हां बकाया हर समय गिनती करो बहुत सुंदर देख लेना खुद निहाल हो जाओगे नहीं जी अभी तक जपता था तो कई बार ना काम और क्रोध गिरा देता है महाराज जी क्रोध अधिक कुछ भी गिरा दे फिर खड़े हो फिर चलो राधा राधा राधा बहादुर की तरह चलो ठोकर लग जाए गिर जाने पर हमें रास्ता नहीं रुकना ऐसे ही काम क्रोध सुधा थे हमें गिरा देते हैं तो हमें रुकना नहीं
फिर खड़े हुए फिर चले राधा राधा राधा फिर गिर गए फिर राधा राधा राधा राधा एक दिन गिरना बंद हो जाएगा और हम क्रॉस कर जाएंगे चलते रहो चलते रहो बस खानपान गलत ना होने पावे अगर खानपान गलत करोगे तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी फिर अब जैसे मान लो मदिरा पी लिया मांस खा लिया इधर गंदे भोजन पा लिए तो ये फिर हां कोई गंदा आचरण मत करो गंदा भोजन मत करो निकल जाओगे खूब नाम जप करो संख्या पूर्वक संख्या पूर्वक कि इतने आज जप किए और बढ़ाया इतने आज किए इतने आज किए उससे मन लगता है।
अनिकेत सिंह जी मुंबई से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी इनका जैसे आप कहते हैं कि संसार दुखालय मैं कोई भी किसी का साथ नहीं देता। ये कह रहे हैं कि मैं किसी की भी मदद करता हूं तो मदद लेने के बाद वो इंसान मतलब बदल सा जाता है। फिर उसका भाव अलग से दिखते हैं। महाराज जी ऐसे मैं मदद करूं आगे या किसी के यहां मदद करना। हो मदद करो इंसान से बदले में कुछ चाहो मत भगवान से चाहो इनको तुमने ₹500 दिया उसका हिसाब मालिक देगा इनसे नहीं लेना इनसे इच्छा मत करो कि लौट कर आपको थैंक यू बोले नहीं ऐसा नहीं विपरीत हो जाते हैं हां हो जाने दो ना हमें उससे कोई लेना देना नहीं हमने परोपकार किया इसका फल भगवान मुझे देंगे इंसान क्या देगा उसको तो आपने स्वयं दिया है।
वह उससे लौटकर आप क्या चाहते हो? नहीं। यही हमारी कमजोरी है। अध्यात्म में यही हमारी कमी है कि हम दूसरों को जब सुख देते हैं जैसे वस्त्र, भोजन, रुपया, पैसा, सहयोग जो भी देते हैं। उसके बाद में हम चाहते हैं कि वो हमसे नम्र रहे। वो हमसे कृतज्ञ रहे। वो हमें प्यार करें। वो हमारा सम्मान करें। लेकिन नहीं करेगा क्योंकि माया के द्वारा प्रेरित है। वो नहीं करेगा। ज्यादा आप उपकार करोगे तो आपको बुद्धिहीन समझेगा। लेकिन आपको अपनी स्थिति में रहना है कि इस व्यक्ति के आचरण से या इस व्यक्ति के व्यवहार से मुझे दुखी नहीं होना।
क्योंकि मैंने जो उपकार किया परमात्मा उसका मुझे हिसाब देगा। मुझे यह क्या देगा हिसाब? तो परोपकार का हिसाब परमात्मा देता है। तो हमें परमात्मा से लेना है या व्यक्ति से लेना है? अगर व्यक्ति को आपने पानी पिलाया और हाथ जोड़कर बोल दिया धन्यवाद आपने पानी पिलाया तो हो गया आपका पानी पिलाने का हिसाब और अगर वह चला गया तो पानी पिलाने का हिसाब ठाकुर जी देंगे। जब भगवान देंगे तो बहुत ज्यादा देंगे। तो हमको व्यक्ति से धन्यवाद लेने से क्या मतलब है? हम तो मनाएंगे कि वो हमें धन्यवाद ना दे।
वो चुपचाप चला जाए। हम प्रभु से लेंगे तो आपको प्रसन्नता रहेगी। जब आप किसी का परोपकार करें और वह आपको प्रतिकूलता दे, आपका अपमान करें तो आपका परोपकार सरकारी बैंक में जमा हो गया। अब उससे जो लाभ मिलेगा वो बेचारा व्यक्ति क्या दे सकता था आपको? समझ रहे हो ना? तो वैसे भी देहातीती भाषा में कहते हैं नेकी कर दरिया में डाल। कहते हैं ना कि अच्छाई करो और दरिया में बहा दिया। मतलब उसकी याद भी मत करो कि मैंने इसके साथ नेकी की थी। तभी वो नेकी फलीभूत होती है। हम लोग थोड़ा मनुष्य स्वभाव होने के कारण ये चाहते हैं कि यार थोड़ा सम्मान देता है यार ऐसा पक्का है।
तुम्ही को नहीं कोई भी करे उसको झटका लगता है। उसको झटका लगता है। लेकिन परमार्थ क्या कहता है? तेरे से थोड़ी लेना है। मुझे तो मालिक से हिसाब लेना है। नेकी कर दरिया में डाल। हेमंत सिंह जी जयपुर से। राधे राधे-राधे महाराज जी। गुरुदेव प्रणाम। महाराज जी मन में हमेशा यह प्रश्न रहता है कि मेरी उम्र में मतलब 22 23 साल की उम्र में क्या युवकों को पूजा पाठ माला जप को अधिक महत्व देना चाहिए? बहुत बहुत क्योंकि अगर इस अवस्था में नहीं किया ना तो किसी अवस्था में नहीं कर सकते।
जैसे अब हम हैं आप हमें पिस्तौल दीजिए और कह दीजिए चलाइए तो हम नहीं चला पाएंगे क्योंकि हमने कभी अभ्यास ही नहीं किया। समझ रहे हैं ना? तो एक साधारण यंत्र है। वह अभ्यास ना करें तो नहीं चल सकता। अब हमें पता ही नहीं कि कहां से चलता है, कैसे चलता है, क्या है। तो आपने जीवन में कभी पूजा नहीं किया, कभी भजन नहीं किया, कभी भगवान से चित्त नहीं जोड़ा तो आप बुढ़ापे पर थोड़ी जुड़ सकते हैं। क्योंकि अभ्यास नहीं किया ना। तो गंदी बातों का अभ्यास इस अवस्था में ज्यादा होता है।
तो हमें चाहिए कि अपनी गंदी बातों को रोक कर अच्छी बातों का अभ्यास करें। सद्गुण लाएं। भगवान की पूजा भजन में जब हम चित्त जोड़ेंगे तो हमारे अंदर अच्छाइयां आएंगी और बुराइयों का नाश होगा। तो बुराइयों का नाश हो और अच्छा आदमी बने। समाज की सेवा करें, राष्ट्र सेवा करें, परिवार की सेवा करें। यही मनुष्य जीवन का लाभ। देखो आप जैसे नए बच्चे जब गंदी बातों में फंस जाते हैं तो ड्रग्स लेने लगते हैं, नशा करने लगते हैं। तो जवानी में यदि सद्गुण ना हो तो दुर्गुणों की बाढ़ आ जाती है और लोग गंदे आचरणों में उतर जाते हैं।
जवान बच्चे माताओं बहनों की जंजीरें छीन लेते हैं। मोटरसाइकिल से निकले और ऐसे पकड़ा अब वो गिरे चाहे मरे चाहे कुछ भी हो चोरी करने लगते हैं। बुरे आचरणों में उतर जाते हैं। अगर आप सच्चे अच्छे बच्चे बनेंगे तो आप जैसे बच्चे समाज का उद्धार कर देंगे। मान लो एक कोई भी पद मिल जाए नेता बन जाओ चाहे आप कोई पदाधिकारी बन जाओ या आप साधारण पुरुष भी रहो तो भी आप समाज का उपकार करेंगे। तो सद्गुण बिना भगवान के चिंतन से तो आएंगे नहीं। देखो आप जब पूजा करोगे, भजन करोगे और आपको कोई श्राप दे कहोगे यार नहीं मैं पूजा भजन करने वाला हूं।
मैं यह सब लेने वाला नहीं हूं। अपने आप आपका मन कहेगा नहीं यार मैं नहीं और अगर आप पूजा भजन नहीं करते तो आपके अंदर उदंडता रहेगी फिर पार्टी ज्वाइन होगा शराब मांस व्यभचार ये गंदी बातें रहेंग तो हमें लगता है बाल्यावस्था से अच्छे गुणों की तरफ चलना चाहिए बुराइयों का त्याग करना चाहिए पूजा भजन का मतलब बाबा जी बन जाना नहीं है पूजा भजन का मतलब है अच्छे सद्गुण धारण करना अच्छे सद्गुण धारण आप ऐसे लेकिन साधुओं के वचन सुनो, सत्संग सुनो, अंदर ही अंदर नाम जप करो, माता-पिता के चरण छुओ, उनकी सेवा करो, परोपकार करो।
एक अच्छे आदमी बन गए आप। बन गए कि नहीं? हां। हम ये कहते हैं मान लो जैसे समाज में तुम्हें चंदन तिलक लगाने में, कंठी बांधने में लगे कि लोग कहेंगे दिखावा करता है। मत करो। अच्छे अंदर सद्गुण धारण करो। अंदर वाली बात आपकी मजबूत होनी चाहिए। अंदर आप राधा राधा जप रहे हैं कौन जानता है नहीं तो अंदर नाम जप करो और अंदर सद्गुणों को बढ़ाओ बुराइयों का त्याग करो अच्छे आदमी बनो यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है जी स्वामी राम राम जी बरसाना से जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी श्रीमद् भागवत जी के गोपी गीत इस बात का संकेत है कि गोपियों को भगवान श्री कृष्ण के ईश्वर तत्व का भान था और श्लोक संख्या इसमें एक लिखा है कि तुम वो कह रहे हैं कि तुम समस्त शरीर धारियों के हृदय में अंतर्यामी रूप से रहने वाले साक्षी हो।
कह रहे हैं ना कि आप केवल यशोदा नंदन नहीं हो। अखिल अखिल देह धारियों के अंतर में विराजमान परमात्मा हो। न खल गोपिका नंदनो भवा अखिल देहना मंत्रात्म दिक विखन सार्थितो विश्व गुप्त सख उदयवान सात्वताम कुले आप सात्वत कुल में जो उत्पन्न हुए हो विश्व में तत्व रूप से गुप्त हो यशोदा नंदन ही केवल नहीं हो अखिल देह धारियों के अंतरात्मा हो जी तुम ब्रह्मा जी की प्रार्थना से विश्व की रक्षा करने हेतु यदुवंश में पैदा हुए हो महाराज जी फिर गोपियों को भगवान श्री कृष्ण से विरह का अनुभव क्यों हुआ प्रेम तत्व ज्ञान अलग चीज है।
तत्व बोध होते हुए भी प्रेमी तत्व रूप में नहीं प्राप्त करना चाहता। प्रेमी प्रगट रूप में भगवान को प्राप्त करना चाहता है। वो कह रहे मैं जानती हूं। मुझे यह बोध है कि आप सर्वत्र व्याप्त हैं। लेकिन सर्वत्र व्याप्त से मुझे संतोष नहीं है। रुद सुरम राजन कृष्ण दर्शन लालसा तासा महावीर भूत छरी उसी समय उन्हीं के बीच में भगवान प्रकट हुए। पीतांबर धरा सर साक्षात मनमत मनमथा वो तत्व रूप से नहीं प्रकट हुए। वो श्री कृष्ण रूप से प्रकट हुए। उनका तत्व प्रेम नहीं है। तत्व समझाने गए उद्धव तो कहते हम जानते हैं लेकिन हमारा प्रेम जो श्री कृष्ण रूप से है जित देखूं तित श्याम मई तुम जो तत्व ज्ञान समझाने आए हो आत्म तत्व का उधव मन न भय द 20 एक होतो सो गयो श्याम पे तो आत्म तत्व किसका समझा रहे हैं उन्हीं का समझा रहे श्याम सुंदर ही तो आत्म स्वरूप है लेकिन प्रेमी तत्व रूप में नहीं प्रेमी साक्षात रूप में प्राप्त करना चाहता है यही प्रेम का स्वरूप है।
तत्व का साक्षात्कार सर्वत्र व्याप्त तत्व है। यह ज्ञान हर एक महापुरुष को होता है। जैसे हमारे यहां सहचरी भाव है। तो हमारे यहां उपदेश है ये क्रूरा पापिनो नच सताम संभास दृश्य सर्वा निरीक्ष स्वराध्य परम स्वराध्य बुद्धिम जो क्रूर है पापी हैं दुष्ट है नीच है उनमें भी साक्षात राधा वल्लभ लाल विराजमान है। भावना करनी है। लेकिन हमारी तृप्ति इससे थोड़ी होगी। हमारी तृप्ति होगी निकस कुंज ठाड़े भए भुजा परस्पर अंश श्री राधा वल्लभ मुख कमल निरख नयन हरिवंश तत्व रूप में सर्वत्र विराजमान परमात्मा यह हमें संसार के इस प्रपंच से निवृत्त करता है।
लेकिन प्रेमी रूप का आशिक है। रूप छके घूमत रहे तन को तनिक न भान नारायण दृग जल बहे यह प्रेम पहचान तन मन के बिछुरे नहीं चाह बढ़े दिन रह रेन बहुत सूक्ष्म विषय है। अगर आपने जो प्रश्न किया अगर उसे समझे आप तन मन के बिछुरे नहीं प चाह बढ़े दिन रहन और कबहु संजोग न मानही देख भरी भरी नैन ये सबकी समझ में ले आएगी अति आरति आतुर आरत दुख भरे नेत्र आतुरता व्याकुल भरे नेत्र और देख रहे हैं अनुरागी लंपट भूल गई गति पलहु लगेना राधे तू मुख चंद चकोर नैना अरवरात मिलबे को निश दिन मिले ही रहत मनो कबहु मिले ना और भगवत रसिक रसिक की बातें रसिक मिला को सब ये जो प्रेम है अरबरात मिलवे को निस दिन और निस दिन मिले ही रहे मनो कब मिले भगवत
रसिक रसिक की बातें रसिक मिला को सब कहला तो गोपी जन श्री कृष्ण तत्व प्रेमी नहीं है श्री कृष्ण रूप प्रेमी है इसीलिए रूप का अंतर् ध्यान होते ही तत्व का ज्ञान होते हुए भी सुरम राजन कृष्ण दर्शन लालसा तासा महावीर भूत छरे स्मयमान मुखांबजा पीतांबर धरा शग साक्षान मनमत मनमता इसीलिए भगवान भगवान तुरंत उनहीं के बीच में तासा महावीर वही थे तत्व रूप में लेकिन तुरंत श्री कृष्ण रूप धारण करके पीतांबर धारी कोटि मनमत हारी भगवान अपने रूप को प्रकाशित किया समझ पा रहे हैं आप जी के पास पहुंच भाई जी के पास बात नहीं पहुंचनी आपको पहुंचना है भाई जी के पास हां बात नहीं पहुंच बात तो पहुंच ही चुकी आपको पहुंचना है।
अब चिंता नहीं करनी वही जाना है। जहां श्री जी की सेवा में भाई जी राधा बाबा व जाना है अपने लोगों को। बस वही जाते हैं। आप चिंता ना करो। आपका पास बन गया है। पास बन गया आपका। महाराज जी कह रहे हैं। आप चिंता ना करो। बनी हुई है। राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा इतनो तो कबहु हसी हो इतना तो कबहु हंस दे सुनहु कृपालु किशोरी राधे सुनहु कृपाल किशोरी राधे राधे राधे राधे राधे सुनहु कृपाल किशोरी राधे अवसी कृपा की कोल चित हो इतनो तो कबहु हस हो तुम मोहि मिलो मिलो लॉर्ड
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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