एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #976 · 20 जुलाई 2025
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की श्री वृंदावन धाम की सतगुरुदेव भगवान की जय श्री नाथ जी नाड़ से राधे राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी प्रभु कृपा से सब कुछ ठीक है कोई विशेष चिंता नहीं है बट एक ओवरथिंकिंग की समस्या बनी
रहती है और मन में हमेशा इसको ठीक करना है तो नाम जप शुरू कर दो जहां व्यर्थ के विचार आते हैं जहां इधर-उधर की कल्पनाएं आती है वहां नाम लिखना शुरू करो राधा राधा राधा बहुत सुंदर हो जाएगा बहुत आनंद आ जाएगा जहां ओवर थिंकिंग है व नाम चला दो जीवन सार्थक हो जाएगा यह लोक परलोक सब मंगलमय हो जाएगा ठीक है नाम चलाओ नाम बहुत नाम ही सब कुछ है हमारे हर प्रश्न का उत्तर नाम है हमारे जीवन की साधना का फल नाम है हम सब संतों की वाणियों का सार बता रहे नाम है जो नाम जप करेगा वह उतना ही महान बनेगा जितना अधिक नाम जप करेगा हर समस्याओं का समाधान नाम है।
आप नाम जप के देख लीजिए जो होना होगा वह होके रहेगा। जो नहीं होना वो हो ही नहीं सकता। भगवान के सिद्धांत में मगन रहो। नाम जप करो। हर विपत्ति पर विजय प्राप्त करो। नाम जप करके। जो चाहोगे वो प्राप्त हो जाएगा। जो चाहोगे हमारी बात मान लो। नाम जप करो। कोई पैसा नहीं लगता। कोई कठिन नहीं। राम राम कहने में क्या कठिन? राधा राधा कहने में क्या कठिन है? जो चाहोगे तुलसीदास जी के चरणों में जब अकबर बादशाह ने ताज उतार के रखा ना तो गोस्वामी जी के आंसू आ गए तो बाद में संतों ने पूछा कि अकबर ने प्रणाम किया इस आनंद के कारण आंसू आ गए बोले नहीं कि जब तुलसी राम का नहीं था तो मांगे कौर नहीं मिलता था और आज राम का है तो बादशाह पैरों में ताज उतार के रख रहा है तो ये बात समझना है भगवान के नाम में भगवान का हो जाने में जो जीवन का आनंद है वह किसी पद में नहीं वो कितना भी बैंक बैलेंस कर लो नहीं कितना भी सुख सामग्री एकत्रित कर लो शांति नहीं मिलेगी डॉक्टर देवराज जी जयपुर से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी ये मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसका परम लक्ष्य आत्म साक्षात्कार एवं परमात्मा की प्राप्ति है।
इसके लिए कई मार्ग हैं। जैसे ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग तथा राजयोग आदि। इसमें यह इसमें ध्यान देना है। समस्त मार्गों का उद्देश्य परमात्म प्राप्ति है। तो समस्त मार्गों का मुख्य साधन क्या है? चाहे कर्म योग हो, चाहे ज्ञान योग हो, चाहे भक्ति योग हो या जो भी योग अष्टांग योग हो। सबका मुख्य साधन क्या है? मुख्य लक्ष्य क्या है? यह बात समझो। अष्टांग योग चित्तवृत्ति निरोधा सायोगा जो चित्तवृत्ति का निरोध कर दे चित्तवृत्ति को रोक दे संसार में जाने से और परमात्मा में स्थित कर दे उसे योगी कहते हैं।
कहते हैं ना ज्ञान ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या जो इस संसार के चिंतन को छोड़ के चिंतन शून्य आत्म स्वरूप में रति कर ले वो ज्ञानी कर्म योगी शरीर के द्वारा संपूर्ण चेष्टा करते हुए भगवान का स्मरण करना सच्चिदानंद भगवान का जो विश्वूप भगवान है सबकी सेवा करना और निरंतर भगवान की स्मृति में रहना भक्त भगवान के लिए संपूर्ण कर्म करना और भगवान के लीला गुण का गान करते हुए चित्तवृत्ति का निरंतर भगवदाकार कर देना। मुरारी पादार अर्पित चित्तवृत्ति सब योग का फल एक ही आया ना संसार का चिंतन छूट जाए और भगवान का चिंतन बन जाए।
भगवान स्वयं कहते हैं जो मेरा सतत प्रेम पूर्वक भजन करता है उसे मैं बुद्धि योग प्रदान करता हूं। भगवान के वचन है। भजता प्रीति पूर्वकम ददाम बुद्धि योगम तम मायातेशा सतत युक्त नाम भगवान कह सतत युक्त होकर भजताम प्रीति पूर्वकम तो ददाम बुद्धि योगम तम ये मामया प्रेम पूर्वक राधा राधा कृष्ण कृष्ण राम राम राम हम जप रहे हैं और शरीर से भागवतिक चेष्टाएं जो भगवान के लिए मंगलमय हो रही चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो निश्चित निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी। अब संसार का चिंतन नहीं छूटा तो उसे भोगी कहते हैं।
योगी नहीं कहते हैं। चाहे प्रेम योगी हो, चाहे भक्ति योगी हो, चाहे ज्ञान योगी हो, चाहे कर्म योगी हो, चाहे अष्टांग योगी हो, योगी योग का तात्पर्य है संसार का चिंतन छूटना और भगवान का चिंतन सतत होना। भगवान का चिंतन होना चाहिए। चाहे वो पट शर्ट में हो, चाहे बाबा जी के भष में हो। अगर चिंतन भोगों का हो रहा तो विषय है। चिंतन भगवान का हो रहा है तो संत है। भगवान ने जब विभीषण जी पधारे तो कहा तुम सारीखे संत प्रिय मोरे धरहु देह नहीं आन निहो रे विभीषण जी को भगवान ने संत कहा भगवान श्री राम जी ने क्या वेशभूषा थी लंकाधिपति रावण के प्रधानमंत्री और उनके छोटे भाई थे बिल्कुल राजभष उषा लेकिन आचरण संत के थे संपूर्ण चित्तवृत्ति भगवान राम में रंगी हुई थी तो भगवान ने कहा तुम्हारे जैसे संतों के लिए मैं अवतार धारण करता हूं।
तुम सारी के संत प्रेम मोरे धरो देह नहीं आनी रे। जब रावण ने लात मारी विभीषण जी को तो विभीषण जी ने साधुता का दर्शन कराते हुए कहा तुम पितु सरिस भले ही मोहि मारा पर राम भजे हित नाथ तुम्हारा तुम्हारा मंगल होगा यदि वो लात मार रहे हैं वो मंगल बता रहे हैं तो भगवान शंकर ने भीषण जी को संत कहा उमा संत के इाई मंद करत जो करे भलाई रावण मंद कर रहा है लात मार रहा है और विभीषण जी भलाई करे यही संत भगवान शंकर ने भी संत कहा और भगवान राम जी ने भी संत कहा तो हम यह ना सोचे कि हम गृहस्थ में है हमें भगवत प्राप्ति नहीं हो सकती हम गृहस्थ में हम भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते ऐसा सिद्धांत नहीं कर्म करो और भगवान के लिए करो और नाम जप करो।
बस हो गई भगवत प्राप्ति। हम कर्म अपने लिए करते हैं तो उसमें पाप कर्म बन जाते हैं। और जब हम कर्म भगवान के लिए करेंगे तो वो कर्म निष्पाप होगा। डरेंगे हम कि हम भगवान को ऐसा पाप कर्म कैसे समर्पित कर सकते हैं तो मदर्थ कर्म भगवत अर्पणम जो कर्म किया जाता है वो मोक्ष प्राप्ति का हेतु होता है जो अपने लिए किया जाता है वो बंधन कारक होता है तो इसलिए भगवत अर्थ कर्म करो और भगवत नाम जप करो भगवत नाम कीर्तन करो भगवत गुणगान करो भगवत लीला कथा सुनो इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी क्या कहना हम जैसे गस्थ जन कभी कबभार तो भजन कीर्तन कर लेते हैं कभी ज्ञान प्राप्ति के लिए पुस्तक पढ़ने लग जाते हैं।
कभी संतों का प्रवचन सुन लेते हैं। कभी ध्यान आपको सार बात बता दी। समझ में आ गई ना? प्रश्न पूरा चाहे जो कुछ कर डालो उसका उत्तर पहले ही आपके पास है कि हर योग का फल है। संसार का चिंतन छोड़कर भगवान के चिंतन में मस्त होना। बढ़िया मार्ग है। कलयुग केवल नाम आधारा सुमिर सुमिर नर उतरे पार। बस तुम नाम जप करो भगवान का और शरीर से नौकरी व्यापार जो भी आपके कार्य हैं उन कार्यों को करो और उन कार्यों को कृष्ण अर्पणमस्तु क्या जाता है मान लो चार घंटे हम काम में बिजी रहे इसके बाद हे भगवान ये चार घंटे का समय मैं आपको अर्पित करता हूं क्या जाता है ये महा भागवत धर्म है जो कर्म भगवान को समर्पित कर दिया जाता है और भगवान का स्मरण किया जाता है इसी से भगवत प्राप्ति हो जाती है जी दीपक जी राधेधे राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव क्या सांसारिक रिश्ते भागवतिक प्रेम के मार्ग की पाठशाला हो सकते हैं?
सांसारिक रिश्तों में जब महतत्वाकांक्षा अहम मोह मतलब कम हो जाए शुद्ध निस्वार्थ प्रेम रह जाए तो क्या यह ईश्वर प्रेम का एक स्वरूप ही है? निस्वार्थ प्रेम होना तो बहुत कठिन है। नहीं तब हमें पता चले जब हम जिससे प्रेम करते हैं हमारे सामने हमारे प्रति प्रतिकूल व्यवहार करें। फिर भी हमारा प्रेम सुरक्षित रहे तो हमारा निस्वार्थ प्रेम है। इसकी परीक्षा है। जैसे हम आपसे प्रेम करते हैं और आप हमारे प्रतिकूल चले फिर भी हम आपको प्रेम करें। तो इसका मतलब हमारे अंदर स्वार्थ बुद्धि नहीं थी।
स्वार्थ बुद्धि अनुकूलता की चाह करती है। और स्वार्थ ना होने के कारण आपके प्रतिकूल व्यवहार का हमारे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ा। और हम ज्यों का त्यों आपका मंगल मनाएंगे। आपका शुभ करेंगे। आपके अनुकूल चलेंगे। इसे प्यार कहते हैं। अगर यह है तो निस्वार्थ प्यार है। अगर यह नहीं है तो बड़ा मुश्किल है। संसार में निस्वार्थ प्यार होना ये बड़ा कठिन है। बड़ा कठिन है। स्वार्थ की कुछ ना कुछ गंध लेकर ही प्यार हमारा बढ़ता है। रूपवान गुणवान धनवान परिवार का मेरा प्रियजन कहीं ना कहीं कोई ना कोई आज नहीं तो कल ही हमारे काम आएगा।
जब यह बिल्कुल बातें ना हो और वह हमारे साथ प्रतिकूल व्यवहार करें, हमारी निंदा करें, हमको दुख पहुंचाना चाहे, हमारी हानि कर दे और फिर भी हम प्यार करें, उसे निस्वार्थ प्यार कहते हैं। समझ में आ रहा है आपको? जी अंशुल जी राधे राधे। राधे-राधे महाराज जी। जी मेरा प्रश्न यह है कि अगर हमें किसी सामान्य व्यक्ति से प्रेम होता है तो हमें उसका चिंतन निरंतर होता है। यदि हमें पता वो व्यक्ति भी हमसे प्रेम करता है तो ये चिंतन दुगना हो जाता है। उसके चिंतन में ही आनंद प्राप्त होने लगता है।
महाराज जी ऐसे ही श्री जी से प्रेम क्यों नहीं हो रहा महाराज जी ये मन इतना शैतान क्यों अपनी पहली बात पे आओ हम उसका चिंतन करते हैं। फिर अगर पता चल जाए कि वह हमें प्यार करता है तब तो हम दुगना चिंतन हो जाए। बहुत सुंदर सूत्र है पर पहले सूत्र में टिक जाओ तुम। पहला अपने ही मुख से जो आपने वर्णन किया उसके पहले सूत्र में टिक जाओ केवल अनन्य चिंतन अनन्य चिंतनो माम अब आओ इस कसौटी पे मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई तुम अपना चिंतन संभालो तो तुम्हें उत्तर मिल जाएगा कि श्री जी आपको कितना प्यार करती किसी बीच के गवाही की जरूरत नहीं पड़ेगी वो डायरेक्ट आपके हृदय में पता चलने लगेगा कि अपार कृपा लाडली जी की है।
मेरे ऊपर लाडली जी की अपार दया है। मुझे बहुत प्यार करती हैं श्री जी। यह अनुभव होने लगेगा। छाती में अनुभव होने लगेगा। कोई फोन थोड़ी आएगा। अपने आप अनुभव होने लगेगा। अपने आप हृदय में। अब हम कैसे बताएं तुमको कि जब हम प्रभु से जुड़ते हैं तो हमारे हृदय में कितना आनंद होता है। अपार आनंद होता है। एक अपार मस्ती होती है। ना मृत्यु का भय ना जीने की चाह ना कोई लाभ ना कोई हानि। एक अद्भुत मस्ती होती है। तो पहले अपना क्षेत्र संभालो। अनन्य चेता सततम योमा स्मृति नित्यसा मेरा अनन्य चिंतन हो।
अभी तो चिंतन बटता है। अभी चिंतन छूटता है। अभी चिंतन भूल जाते हैं हम। पहले अपने क्षेत्र को संभालो। हमारा एकाकी प्रेम होना चाहिए। मैं आपसे प्यार करता हूं। आप मुझे प्यार करो या ना करो। ऐसे भगवान से प्यार करना चाहिए। और भगवान तो प्यार समुद्र है। हम उनके अंश होकर जब इतना प्यार करेंगे तो हमारे अंशी समुद्र है। प्रेम भगवान प्रेम समुद्र है। वो हमें कितना प्यार करेंगे ये हमें अनुभव में आएगा। पहले खूब नाम जप करो। भगवान का चिंतन ना छूटने पावे। समझ पा रहे हो आप?
विराट दर्शन दीक्षित जी सर महाराज जी महाराज जी जब जबजब हम भगवत मार्ग में प्रवृत्त होते हैं तबतब षड दोष काम क्रोध मद आदि अपनी सारी शक्ति से हमें परास्त कर देते हैं महाराज जी इसका हां बिल्कुल ये ये मतलब अक्षरशा सत्य है इसमें कोई संशय नहीं क्योंकि जब तक हमें पहलवान कोई देखे कि हमारे नीचे रहता है तब तक वो उपेक्षा करता रहता है जब यह समझ में आता है कि हमको लतियाना चाहता तो पूरी ताकत लगा देता है। तो हम जब भगवान की तरफ चलते हैं तो ये जो सड विकार हैं ये हमारे ऊपर हावी हो जाते हैं।
बहुत गंदे तरीके से। मतलब जब हम किसी को अपने वश में करना चाहते हैं तो कोई भी हथकंडा अपनाना पड़े। ऐसे ही काम क्रोध जब कोई साधक भगवान के मार्ग में चलता है तो पूरा अपना प्रभाव दिखाते हैं। तो इनका प्रभाव और भगवान के नाम का प्रभाव दोनों अलग है। यह प्राकृतिक हैं। मात्रा स्पष्ट कौते शीतोष्ण सुख दुखदा आगमा पनो अनत्यास यह दो बातें इनमें हैं। ये आने जाने वाले हैं। स्थाई टिक नहीं सकते। काम क्रोध स्थाई नहीं टिकते। यह आने जाने वाले हैं। हर समय थोड़ी बने रहते हैं।
आगमा पनो भगवान के वचन है। आगमा पनो और अनत्यास यह नाशवान है और नाम टिकाऊ चीज है। नाम अविनाशी है। नाम आनंद समुद्र है। नाम महाबल है। सुमिर पवन सुत पावन नाम अपने बस कर राखे रामू। जब भगवान को अधीन कर सकता है तो काम क्रोध क्या चीज है? जब भगवान को अधीन कर सकता है नाम जापक तो काम क्रोध क्या चीज है? काम करो तो अपने आप गुलाम बन जाएंगे। पर डट के नाम होना चाहिए। केवल बातों से बातों से अधीन होने वाले नहीं। डट के नाम जप करो और सहन करो। तास तितक्षस भारत आगमा पनो अनित्यास तास तितक्षस भारत।
भारत का अर्जुन को संबोधन करते हुए भगवान कह रहे हैं इनको सहो सहने से ये नष्ट हो जाते हैं। भोगने से ये प्रबल हो जाते हैं। हमारा मन कहता है भोगने से शांति मिल जाती है। और त्यागा शांतिम भगवान कह रहे हैं इनके त्याग से शांति मिलती है। भोगने की इच्छा का त्याग करने से परमार्थ पुष्ट होता है। और भोगने की इच्छा होने पर भोगने से संसार पुष्ट होता है। काम पुष्ट होता है। क्रोध पुष्ट होता है। इसलिए बहुत सावधान। सबसे पहली गलती काम को बढ़ावा देने की है। विषयों का ध्यान करना।
विषयों का चिंतन करना। धतो विषय पुसान संगा जहां हम विषयों का चिंतन करते हैं तो वही भोगने की इच्छा प्रबल हो जाती है और जहां इच्छा प्रबल हुई वहां काम अपना तांडव मचा देता है धते विषय पुसा संसते संगात संजयते कामात क्रोधो भी जाते क्रोधा समोहा समोहा स्मृतिमा स्मृति भसा बुद्ध ना बुद्धि ना प्रण स्थिति वो भ्रष्ट हो जाता है। इसलिए विषयों का ध्यान नहीं भगवान का ध्यान होना चाहिए। प्रभु का चिंतन होना। अगर साथ-साथ में विषयों का चिंतन चल रहा है तो हमारी हानि नहीं कर पाएगा।
लेकिन केवल विषय चिंतन चल रहा है वो हमारी हानि कर देगा। अब साधक को चाहिए कि जैसे विषय चिंतन चल रहा है। अब गुणों के वशीभूत अंतःकरण मान लो काम का चिंतन कर रहा है तो राम का चिंतन ना छूटने पावे। तो काम हमारे ऊपर हावी नहीं हो पाएगा। और अगर भगवान का चिंतन छूट गया तो कहे हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई जब तो सुमिरन भजन यह बात पकड़नी चाहिए हनुमान जी महाराज की है जब सुमिरन भजन छूट गया उसी समय कोई ना कोई माया फंसा लेगी तो हमें नाम निरंतर जपना है पूनम जी गुरुग्राम से जय जय श्री हरिवंश महाराज जी राधे-राधे श्री हरिवंश प्रभु जी त्रिगुणातीत स्थिति क्या है गुणगुणों में बरत रहे हैं इस स्थिति को और अधिक स्पष्ट समझाने की कृपा करें महाराज जी।
पहले तो अंतःकरण पवित्र होना चाहिए। जैसे अंतःकरण में हमारे चार पार्ट हैं। बुद्धि का काम है निश्चय करना। मन का काम है संकल्प विकल्प करना। चित्त का काम है चिंतन करना। अहंकार का काम है क्रिया को स्वीकार करना। भोगों का भोगता बनना। यह पूरा डिपार्टमेंट गंदा है हमारा। बुद्धि ने निश्चय कर लिया है। शरीर में, पदार्थ में, वस्तु में, धन में, पद में इसमें सुख है और शांति है। गलत निश्चय। हमारे मन ने पांच ज्ञानेंद्रियों के साथ संसार के भोगों को भोगना ही लक्ष्य बना लिया।
गलत मन का निर्णय। हमारा चित्त, वस्तु, व्यक्ति, स्थान, भोग, रुपया, पद, प्रतिष्ठा इसी के चिंतन में लगा रहता है। गलत चिंतन। हमारा अहंकार दाशत्व भाव में भगवान के ना जाकर भोक्तत्व भाव में आकर के मैंने भोगा, मैं भोग सकता हूं। मैं भोगूंगा। मैंने ये किया, मैं करता हूं। मैं कर सकता हूं। बस इन्हीं गंदगी के कारण हम तीन गुणों में फंस गए। कभी सतोगुण का चक्र तो शांत दया करुणा कभी रजोगुण का चक्र तो भोग वासना धन संपत्ति की चा कभी तमोगुण का चक्र तो निद्रा आलस्य प्रमाद ये स्थितियां आ जाती हैं।
जब हम निरंतर भगवान का नाम जप करते हैं। हमारा निश्चय एक होता है। कि परमात्मा के सिवा सब असत्य है। जैसे हमारा ये शरीर है। किसी पद में है। कुछ भी व्यापार नौकरी धन संपत्ति के लिए जो हम कर रहे हैं जो भी धन संपत्ति प्राप्त हो रही है जो भी हम भोग भोग रहे हैं एक स्वप्निक है अभी शरीर छूटा आपका पद गया बैंक बैलेंस यही रहेगा परिवार छूट गया केवल आप निकल कर के गए और आपके साथ जो पाप और पुण्य सामग्री है वो अब इसके बाद हमें कौन सी योनि में डाला जाएगा हमें कुछ पता नहीं ये गुणों के चक्र में हमारा बार-बार जन्म, बार-बार मरण, बार-बार मां के गर्भ में जाना, बार-बार कर्मों के चक्र में फंस के भोग भोगना यही चला आ रहा है अनादि काल से।
अब हमें अवसर मिला है मनुष्य जन्म में कि हम इस चक्र को सुधार सके। पूरा काट दें। ये तो कोई महापुरुष काट सकता है। सुधार सके। अब हमारे द्वारा ऐसे पापा आचरण ना बने जिसके कारण हमारी दुर्गति हो। हम सबसे अच्छी योनि में आ गए हैं। मनुष्य योनि। अब हमारे द्वारा ऐसे आचरण ना हो कि हम सूअर कुत्ता बने जाकर, भूत प्रेत बने जाके हमें कम से कम पुनः मनुष्य शरीर मिले। हम पुनः अपने राष्ट्र की सेवा कर सके। पुनः हम भगवान का भजन करके सुख और शांति को प्राप्त कर सके। तो ये जो गुणों का चक्र है इस चक्र से हम तब मुक्त होते हैं जब तीन शरीरों से हमारा राग खत्म हो जाता है।
स्थूल शरीर, इसके अंदर है सूक्ष्म शरीर, उसके अंदर है कारण शरीर और सबके प्रकाशक तत्व के रूप में आत्मा विराजमान है। जब हम अपने आत्म स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। तीनों शरीरों के राग से मुक्त हो जाते हैं तो हम त्रिगुणातीत हो जाते हैं। और जो त्रिगुणातीत हो जाता है उसका लक्षण होता है। वह मान रहित होता है। वह मोह रहित होता है। कोई भी विषय भोग सामने उपस्थित होने पर भोगने की इच्छा नहीं होती। निरंतर आत्म स्वरूप के चिंतन में मगन रहता है। विनिवृत्त कामा समस्त कामनाएं उसकी शांत हो जाती है।
मान अपमान सुख दुख लाभ हानि निंदा स्तुति इसमें समान हो जाता है। वो परम पद का अधिकारी होता है। निर्माण अमोहा जित संग दोष अध्यात्म नित्या विनिवत्त कामा द्वंद विमुक्त सुख दुख संग गच्छंत अमोढ़ा पदम तत अब त्रिगुणातीत पुरुष गुणानुगुण वर्तते मनुष्या पार्थ सर्वसा ये कैसे देखता है जैसे हम देख रहे हैं कि आप क्रिया कर रहे हैं लेकिन उसमें अहम नहीं कि मैं कर रहा हूं। ऐसे वो देख रहा है कि ये पंच भौतिक शरीर सूक्ष्म शरीर के द्वारा प्रेरित होकर यह क्रिया कर रहा है।
मैं नहीं कर रहा हूं। और जो क्रिया हो रही है वो गुणों में हो रही है। कभी सतोगुण में कभी रजोगुण में कभी तमोगुण में। वो ज्ञानी महात्मा अपने को अकर्ता जब अनुभव करता है वो मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। समझ पाए? किसका प्रश्न था? अनुराग जी महाराष्ट्र से राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी हे गुरुदेव आत्मा की पूर्ण शांति और परमात्मा में एकत्व की अवस्था को किस स्थिर रूप से अनुभव कर सकते हैं ताकि यह केवल ज्ञान ना रह जाए बल्कि मेरे प्रत्यक्ष देखो जब तक इंद्रियों के भोगों में सुख मिलता रहेगा आपको जब तक जगत के हर वस्तु व्यक्ति स्थान को आप सत्य मानेंगे तब तक कभी भी आत्म स्वरूप की तरफ झांक भी नहीं सकते आप बहिर्मुख वृत्ति से हम आत्मज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते।
आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना है। लोक परलोक के भोगों से वैराग्य सत असत वस्तु का विवेक जितेंद्रिय मनोनिग्रही समाधान परमात्मा में निरंतर चित्त की स्थिति मुमुक्षता में मुक्त हो जाऊं तब तक हां साधना के बिना जैसे देखो दूध में घी विराजमान है लेकिन आप पूरी नहीं बना सकते पकवान नहीं बना सकते कि दूध में पकवान बना ले उसी में घी विराजमान है कैसे निकालोगे उसकी प्रक्रिया है जिसको ज्ञान है उस प्रक्रिया का ज्ञान जिससे है उसके पास जाओ और प्रक्रिया सीखो दूध को टो उबालो दही जमाओ दही को मथो मक्खन
निकालो ये निकल आ रहा मेहंदी में लालिमा है लेकिन ना पत्ते में है ना डाल में है ना उसकी छाल में है आप पत्ते को चीर के देखो कहीं लालिमा दिखाई दे रही हो तो उसकी प्रक्रिया है उसको बांट बाट ो बांट कर अपने हाथ पर रखो 30 40 मिनट रखे रहने दो धो दो आप देखो आपका हाथ लाल हो जाएगा परमात्मा सर्वत्र है पर उसकी प्रक्रिया है जब तक उस प्रक्रिया से साधना नहीं करोगे तब तक आप उस परमात्मा का अनुभव नहीं कर सकते बिल्कुल सर्वत्र विराजमान उसके बिना किसी की सत्ता ही नहीं है जैसे हम हिला डुला रहे हैं ये उसी परमात्मा से हो रहा है वो परमात्मा अंतर्ध्य हो जाए तो हमें मुर्दा कहा जाएगा उसी उसी परमात्मा को जानने के लिए साधना करनी है।
जब तक इन भोगों में हमारी प्रीति है, रुपया पैसा नाना प्रकार की भोग सामग्री अच्छी लगती है तब तक वो परमात्म ज्ञान के सोचे बिना सोच भी नहीं सकता। भोगश्वर प्रसक्त नाम तत चेत साम व्यवसायत्मिका बुद्धि समाध विधते ये भगवान श्री कृष्ण के वचन है जिसको भोग और ईश्वर में चित्त अपरित हो चुका है वो समाधि अर्थात परमात्म प्राप्ति का लक्ष्य ही नहीं कर सकता है अगर वो आरती पूजा भी करेगा तो अपनी मनोती पूर्ण करने के लिए अपनी कामनाओं की चाहत पूर्ण करने के लिए ना कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए ना कि मोक्ष प्राप्ति के लिए इसलिए हम शास्त्रों का स्वाध्याय करें।
उचित ब्रह्मचर्य का पालन करें। उचित ब्रह्मचर्य गृहस्थ में महीने में एक बार मासिक धर्म के बाद सहवास का सिद्धांत लिखा हुआ है। और जब तक ब्याह ना हो तब तक ब्रह्मचर्य से रहे। आजकल जो गंदगी फैल रही है। ब्रह्म ज्ञान की तो बात जाने दो। हम कह रहे हैं मनुष्यता धारण कर लो सबसे अच्छी बात है। पहले मनुष्यता धारण ब्रह्म ज्ञान और मोक्ष और परमात्म प्राप्ति ये तो बहुत ऊंचाई की बात है। आज मनुष्यता नहीं रह गई है। राक्षसी पना इतना बढ़ता जा रहा है। पति पत्नी का प्रेम सुरक्षित नहीं है।
माता पिता पुत्र परिवार के जो संबंध है जिनमें प्रेम पाया जाता है। वो आज प्रेम नहीं दिखाई दे रहा है। पत्नी पति को मारे दे रही है। पति पत्नी को मारे दे रहा है। पुत्र मां का अपमान कर रहा है। मां पुत्र की हत्या कर क्या क्या मनुष्यता नहीं रही जा रही है तो ब्रह्म ज्ञान तो बहुत अलग की बात है भोजन पवित्र नहीं है विचार कहां से पवित्र हो जाएंगे तो पहले हमारा चरित्र पवित्र हो हम कई बार सत्संग में कहते हैं जो अपने चरित्र को महत्व देता है वो अध्यात्मवान बनता है और जिसने चरित्रहीन हो गया जो अपने चरित्र को नष्ट कर दिया वो कुछ नहीं वो पशु है अरे मनुष्य जीवन बड़ा दुर्लभ है शास्त्र में वर्णन दुर्लभो मानुषो देवो ये मनुष्य देह प्राप्त करने के लिए देवता तरसते हैं।
बड़े भाग मानुष तन पावा सुर दुर्लभ सद ग्रंथन गावा साधन धाम मोक्ष कर द्वाराारा पाए न जे परलो इससे आप परोपकार कर सकते हो इससे आप राष्ट्र सेवा कर सकते हो आप भगवान को प्राप्त कर सकते हो आप जो चाहो कर सकते हो लेकिन यहां हमारी गति केवल इंद्रियों के भोगों में स्थित हो गई नाना प्रकार की वासनाओं की पूर्ति चाहिए तो कैसे हम ब्रह्म ज्ञान की तरफ बढ़े कैसे हम आत्म ज्ञान की तरफ बढ़े पहले हम गंदगी को दूर करें। हमारा भोजन पवित्र हो, हमारे आचरण पवित्र हो, हमारे विचार पवित्र हो, परोपकार की भावना हो, सब में भगवत भावना हो, तब हमारा भजन बने।
और जब भजन बनेगा तभी ज्ञान होगा। बिना भजन के शास्त्र पढ़ लेने से ब्रह्म ज्ञान नहीं होता। ध्यान रखना। नहीं तो सब ब्रह्म ज्ञानी हो जाते। जितेंद्रियता ब्रह्मचर्य इतनी पवित्र वस्तु है जिसको लोग समझ ही नहीं रहे हैं। ब्रह्मचर्य से आपकी स्मृति बलवान होगी। आपका शरीर स्वस्थ रहेगा। तो अगर आप ब्रह्मचारी हो तो आपका विद्या अध्ययन, आपका विचार, आपकी स्मृति, आपकी पुष्टता, अब गंदे गंदे आचरण, गंदा गंदा भोजन, गंदा गंदा विचार दूसरे को दुख पहुंचाने का जो चिंतन है वो हमें नष्ट किए दे रहा है।
इसलिए हमें चाहे ब्रह्म ज्ञान तो छोड़ो पहले आचरण पवित्र करो। पहले जितेंद्र बनो, मनोनिग्रही बनो। हम जहां चाहे वहां मन को लगा सकते हैं। अगर हम अपने आप में आ जाए तो आप ढोल बजाओ। हमें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आप दुनिया की बातें करो बस इतना समझ में आएगा कि आवाजें आ रही बस उसका कोई चिंतन नहीं। अभ्यास योग युक्त चेतसा हम जहां चाहे अपने चित्त को लगा दें। जहां चाहे अपने चित्त को रोक दें। अभ्यास योग युक्त बचपन से जैसे अभ्यास किया ना तो जहां चाहे वहां ऐसा नहीं कि हम नाम जप कर रहे हैं।
मन संसार में जा रहा है। ऐसा नहीं। अगर हम नाम जप कर रहे हैं तो बिल्कुल नाम में लगा हुआ है। एक मिनट भी कहीं इधर से उधर नहीं हो सकता। बिल्कुल निशाने पर रहेगा हर समय। तो अभ्यास योग युक्त चेतसा नाम निगामिना। भगवान कह रहे हैं ऐसा अभ्यास करो कि चित्त परमात्मा में स्थित हो और संसार की क्रियाएं शरीर से हो रही हो। क्रियाएं संसार की मुख में हो राम नाम राम तेरे हाथ में। बंदे तू अकेला नहीं राम तेरे साथ में। तन से कर्म करो विधिनाना और मन रखो जहां कृपा निधाना भगवान में मन रखा हुआ है साव मन कृष्ण पदारविंदो और शरीर से क्रियाएं हो रही है इससे बड़ा ब्रह्म ज्ञानी क्या हो सकता है जो भगवान का चिंतन कर रहा है और शरीर से धर्म पूर्वक क्रियाएं कर रहा है वही तो ज्ञानी है आज ज्ञान की बातें बघारी जाती है बड़ी-बड़ी बातें की जाती है और चिंतन होता है रुपए का चिंतन होता है मान प्रतिष्ठा का क्या ज्ञान क्या ज्ञान एक ज्ञान का व्यापार किया जा रहा है।
ज्ञान इसलिए है कि हमारा धन से राग हट जाए। हमारा भोगों से राग हट जाए। हमारी पाप बुद्धि खत्म हो जाए। सब में भगवत बुद्धि हो जाए। यह ज्ञान का फल तो हमें लगता है। पहले हम जितेंद्र बने, मनोनिग्रही बने, खूब नाम जप करें, परोपकार करें। अपने आप आत्मज्ञान हो जाएगा। क्योंकि हम आत्म स्वरूप हैं। हमें किसी और का ज्ञान नहीं प्राप्त करना। मैं स्वयं आत्मा हूं। अपने देह को मैं मान करके मैं अपने स्वरूप को भूल गया हूं। इसलिए खूब नाम जप करो। पहले नाम जप से ही ज्ञान प्राप्त होता है।
अंजलि जी सूरत से राधेधे महाराज महाराज जी आत्म प्रेम और स्वार्थ में क्या अंतर है? कैसे पता चलेगा कि मैं आत्म प्रेम कर रही हूं या स्वार्थी हो रही हूं। आत्म प्रेम निष्काम होता है और स्वार्थ देह से संबंधित। देह संबंधी जितनी भी मांगे हैं वह सब स्वार्थ है और जहां मांगे खत्म हो जाती हैं उसे आत्म प्रेम कहते हैं। आत्मा में कोई मांग नहीं होती। ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचति न का समा सर्वेशु भूते मत भक्ति लते पराम जो आत्म स्वरूप का ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
जिसे आत्म प्रेम प्राप्त हो जाता है। वो ब्रह्म भूत होता है। जो ब्रह्म भूत होता है उसमें कोई सोच नहीं रह जाती। कोई चाह नहीं रह जाती। प्रसन्न आत्मा अखंड आनंद जब अंदर आनंद का अभाव होता है तब हम बाहर आनंद खोजते हैं। जब अंदर का आनंद मिल जाता है तो बाहर फिर आनंद की चाह नहीं रहती। बाहर आनंद है नहीं। आनंद का भास है। जैसे रेत में सुबह सुबह जब गंगा जी किनारे भ्रमण करते थे तो जो किरण पड़ती थी तो ऐसा लगता था निर्मल जल भरा हुआ है और एक बूंद पानी नहीं। उसे मृग मरीचिका कहते हैं।
मरभूमि में जल का भान होना। तो ऐसे ही संसार में आनंद का भान हो रहा है। हमें लगता है इस शरीर को भोग ले तो हम सुखी हो जाए। लेकिन उस शरीर को कोई भोग रहा है और वो किसी और शरीर को देख रहा है। हमें लगता है इस वस्तु को भोग ले तो हम सुखी हो जाएंगे। लेकिन उस वस्तु के भोगने के बाद और दूसरी वस्तु की चाह हो जाती। अगर आनंद होता तो तृप्ति हो जाती। आनंद है भगवान के नाम में और भगवान के चरणों में। देखो केवट जब भगवान के चरण धो रहा है तो अति आंद उमगी अनुरागा चरण सरोज पखारन लागा क्या फल हुआ भगवान सीता जी की अंगूठी दे रहे हैं तो क्या कह रहा है अब कछु नाथ न चाहिए मोरे दीन दयाल अनुग्रह तो अब मुझे नहीं चाहिए जहां चाह खत्म हो जाती है उसे आत्म प्रेम कहते हैं और जहां चाह रहती है उसे स्वार्थ कहते हैं।
वो चाहे जितना महान चाह हो वो स्वार्थी है। मिथिलेश जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं आपका सत्संग व वार्तालाप तीन वर्ष से सुन रही हूं और राधा नाम जप करती हूं। महाराज जी मेरा प्रश्न है कि बिना गुरु दीक्षा के भगवत प्राप्ति कैसे हो सकती है? हमारे गुरु जी पूज्य हरि बाबा जी महाराज हैं। उन्होंने कभी किसी को गुरु दीक्षा नहीं दी। केवल नहीं आप देखो गुरु दीक्षा का मतलब कंठी बंधाना ही केवल नहीं होता। जैसे हम कह रहे हैं कि आप राम राम जपो आप राधा राधा जपो आप कृष्ण कृष्ण जपो।
आपने वो बात मान ली। आप राम राम जपने लगे। आप राधा राधा जपने तो संत के मुख से निकला मंत्र मूलम गुरु वाक्यम जो संत के वाक्य निकले उनको हमने मान लिया हो गया गुरु गुरु मानने का मतलब होता है कि किसी महापुरुष के मुख से हमने वचन सुन लिए और अपना चल दिए अच्छा ऐसे कंठी बना लो हमारी बात ना मानो तो क्या शिष्य हो गए क्या उससे तो शिष्य नहीं माने जाओगे कि आपने कंठी बना ली तिलक ले लिया मंत्र ले लिया और मन माने आचरण कर रहे हो तो शिष्य थोड़ी हो गए और लाखों लोग ऐसे हैं जिन्होंने कंठी नहीं बनाई।
हमारी बात मान रहे हैं तो क्या उनका कल्याण नहीं होगा? उनका पक्का कल्याण होगा। तो गुरु संबंध का मतलब होता है किसी महापुरुष के वाक्यों पर विश्वास करके परमार्थ में चल देना। मेघ जैसे बराबर वर्षा करते हैं। ऐसे संत की कृपा बराबर सब पर होती है। बस उनके वाक्यों को मानकर जो चल पड़ा वही उनका लाभ ले सकता है। और जो उनके वाक्यों की अवहेलना कर दी वो लाभ नहीं ले सकता। बस ये बात है चाहे कंठी बनाओ चाहे कंठी ना बनाओ पूनम जी राधा मंडलम श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपका नाम जप वाला वीडियो देखा और अभी 10-15 दिन पहले से मैं नाम जप काउंटर से शुरू कर दिया महाराज जी मैं पूछना चाहती हूं मैं एक महतत्वाकांक्षी लड़की हूं मैं एक दिन भारत देश की राष्ट्रपति बनना चाहती हूं इसके लिए मुझे कितना नाम रहती जर्मनी में हूं आप क्यों नहीं बन सकती वो तो हम इसमें इस तुम्हारीत्वाकांक्षा को काटते नहीं है।
लेकिन इसके लिए बहुत बड़ा तप चाहिए। मतलब ये छोटी मोटी बात नहीं है। बहुत बड़ी तपस्या उसने की पूर्व जन्म में। इस जन्म की नहीं है। इस जन्म की तपस्या नहीं है। यह पूर्व जन्म की तपस्या है। पूरे भारत में कितने संत महात्मा कितना सब गंगा, यमुना, कितना अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, अवंतिका पूरी कितनी महिमाशाली देश है और इस देश की वो राष्ट्रपति है तो पूर्व जन्म में तपस्या तो आपका भजन इतना श्रेष्ठ हो तो राष्ट्रपति बनना तो छोटी बात है। भगवान के समीप पहुंचकर परम पद प्राप्त हो जाता है।
भगवान की प्राप्ति हो जाती है। भजन से क्या नहीं हो सकता तो खूब नाम जप करो और भगवान से प्रार्थना करते रहो कि प्रभु जिसमें हमारा मंगल हो वही आप विधान करो तो ना इस जन्म में सही तो अविनाशी जीव है अगले जन्म में आप राष्ट्र अगले जन्म ही मिलेगा नहीं भगवान की प्राप्ति तो इसी जन्म में लेकिन राष्ट्रपति की प्राप्ति के लिए थोड़ा संशय है जगत पति तो मिल सकता है पर ये सांसारिक पद है ना जगत पति चाहिए जगत पति चाहिए जगतपति के तो मिलने के लिए बिल्कुल सरल रास्ता है। आर भाव से पुकारो।
भगवान स्वयं गीता जी में कहते हैं अनन्य चेता सततम योमा नित्यसा तस्याह सुलभा पार्थ सुलभा मैं उसके लिए सुलभ हूं। कौन? जो मेरा अनन्य चिंतन करता रहता है। अगर हम भगवान का निरंतर नाम जप कर रहे तो शरीर रहते या शरीर छूटते मुझे निश्चित भगवत प्राप्ति होगी। इसी जन्म में होगी। खूब नाम जप करो। मोदी जी फरीदाबाद राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी हमें दूसरों की सहायता करनी चाहिए अगर वह शास्त्रविरुद्ध नहीं है तो परंतु महाराज जी क्या अपने कार्यों को रोक कर दूसरों की सहायता सही है महाराज जी ये कह रहे हैं कि मैं दूसरों की सहायता करने चला जाता हूं तो अपने ही काम छूट जाते हैं और कहीं ना कहीं वो मेरे पर डिपेंडेंट हो जाता तो ऐसे में क्या मेरे को सहायता करना नहीं अगर अपने काम से भी श्रेष्ठ आवश्यकता दूसरों को सहायता करने की उस समय रोज तो ऐसा नहीं होता रोज तो ऐसा नहीं यह तो कभी-कभी घटना घटती है तो हमें अपना काम छोड़ देना चाहिए।
रोज तो कोई ऐसा कार्य नहीं करता कि भाई सुबह से उठकर परोपकार के लिए झोला टांग लिया घूम रहा है। ऐसा नहीं होता। परोपकार ढूंढा नहीं जाता। वो तात्कालिक होता है। जैसे हम निकले घर से और किसी का एक्सीडेंट हो गया और बड़ी बुरी दशा में अब हमें अपना काम छोड़ देना चाहिए। अब जैसे भी बने उसको अस्पताल तक ले जाना, उसको दवाई करवाना और जब देख लिया कि उसकी व्यवस्था वाले आ गए तो राधेश्याम अपने काम के लिए चले जाना। अपना काम उस समय छोड़ देना चाहिए जिस समय विशेष आवश्यकता हमारी हो।
हम उस समय उसको सहयोग करें। यही हमारी मनुष्यता है। विशेष आवश्यकता अपने आप दिखती है कि अब इसके पास कोई नहीं। मुझे जरूरी है इसके पास रहना तो हमें अपना काम छोड़ देना चाहिए। तो आपके काम से जो आपको लाभ मिलना था उससे ज्यादा लाभ आपको भगवान देंगे। क्योंकि मालिक देख रहा है ना कि आप परोपकार कर रहे हो तो परहित सरिस धर्म नहीं भाई पर पीड़ा श्रम नहीं असमाई। यदि हम दूसरों को दुख देते हैं तो सबसे बड़ा पाप करते हैं। और दूसरों को सुख देते हैं तो सबसे बड़ा धर्म करते हैं।
सबसे बड़ा पुण्य करते हैं। महाराज जी ये प्रश्न मैं इसलिए कर रहा हूं कि एक तनाव में है इसलिए महाराज जी कह रहे हैं कि स्कूल के एक साथी को अपशब्द बोल दिए। फिर वो उस वह मानसिक तनाव में चले गया और उसने अपना शरीर नष्ट कर लिया महाराज जी। अब कह रहे हैं कि अब मैं सबसे नजरें बचाती फिर रही हूं। उनके माता-पिता या अपने माता-पिता या समाज में ऐसा हो गया है। अब महाराज जी मैं क्या करूं? मतलब नहीं वैसे वैसे चाहिए कि किसी का हृदय इस कोट से दुखी ना हो जाए कि वह सुस् की सोच ले।
तो हमें बहुत संभालकर अपने जीवन को रखना है। और दूसरे के जीवन को बचाना है। मान लो आपका स्त्री शरीर है, कोई आपसे ऐसा तो हम बहुत संभाल करके अगर कोई ज्यादा उपद्रव करता है तो हम कानून का सहारा ले लेते हैं। लेकिन हम कोई ऐसा व्यवहार ना करें। हम कोई ऐसा वचन ना बोले कि कोई इतना डिस्टर्ब हो जाए कि सु कर ले। वो अच्छी बात नहीं है। तो भगवान से प्रार्थना करो कि उसकी आत्मा को शांति मिले। उसका मंगल हो। लेकिन उस बच्चे को भी सोचना चाहिए जिसने किया कि कोई कुछ कह दे तो वैसे आजकल बहुत बावरे बच्चे हैं।
बच्चे पढ़ाई में ना ध्यान देकर अच्छाई में ना ध्यान देकर बुराई की तरफ बढ़ते जा रहे हैं। नए-नए बच्चे बच्चियां गलत भावनाओं से युक्त होती चली जा रही हैं। यही है आजकल वातावरण थोड़ा बदल रहा है। जो धर्म शास्त्र इनके विपरीत चल रहा है। अब माता-पिता बेचारे रो रहे हैं। यह नए बच्चे कुछ समझ नहीं रहे। अपनी जिंदगी को खिलवाड़ बना रहे हैं। वह तुम्हें नहीं पसंद करती। कोई ना कोई तो पसंद करेगा। यार जाओ छोड़ो। तुम उसे छोड़ दो। अपनी जिंदगी संभालो। उसको अपनी जिंदगी जीने दो।
प्यार का मतलब क्या होता है? अगर तुम हमसे संतुष्ट नहीं हो तो तुम अपनी जहां संतुष्टता होती हो। वो जीवन जियो। हम अपना जीवन जी लेंगे। ये तो मतलब बहुत ही अज्ञान की वृत्तियां फैल रही। इतना दुर्लभ मनुष्य शरीर इसको इस तरह से मार देना इस तरह से कर लेना ये तो बहुत हानि का विषय है। रतिका सिंह जी नोएडा से जी जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी खुद में खुशी का एहसास नहीं होता। हर वक्त खुशी के लिए किसी और का सहारा ढूंढती हूं। खुद में और खुद में अगर भगवान का आश्रय ले लो तो हर समय खुश रहोगी।
यहां बाहरी कहीं खुशी नहीं है। यहां तुमसे जो प्यार करेगा तो तुम्हारे शोषण के लिए करेगा। तुम्हारे पोषण के लिए नहीं करेगा। तुमसे अच्छा कोई मिल जाएगा तो तुम्हें त्याग देगा। यहां का प्यार तो खुशी दे ही नहीं सकता। वो अपनी खुशी के लिए आपसे प्यार कर रहा है तो वो आपको क्या खुद कर पाएगा? जो हमारी खुशी के लिए हमसे प्यार करे वो भगवान है। क्योंकि वो पूर्ण है। उसे कुछ नहीं चाहिए। वो केवल मेरी खुशी के लिए। हमारी दोनों किडनी फेल है। शरीर कष्ट में रहता है। लेकिन हम खुश रहते हैं।
क्योंकि हमारा प्रीतम प्रभु है। हर समय प्रसन्न रहता हूं। आनंदित रहता हूं। क्यों? क्योंकि हमारे यार भगवान है। हमारे प्यार भगवान है। हमारा जीवन भगवान है। तो अगर सही मायने में खुश होना चाहते हो तो श्री कृष्ण से प्यार करो। राम जी से प्यार करो तो तुम्हारा हृदय प्रसन्न रहेगा। देख लेना अतिशय प्रसन्नता भगवान से प्राप्त होगी। संसार से नहीं। ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा जो भगवान से जुड़ गया जो भगवत चिंतन में लग गया वही प्रसन्न रहता है एक अपार आनंद आता रहता है जब हम भगवान से जुड़ते हैं अच्छा संसार से जुड़े तो देखो सब जुड़े हो चिंता शोक भय उद्वग्नता यही प्राप्त होगा चिंता भय शोक उद्विग्नता यही प्राप्त होगा आप जी जान से किसी को प्यार करो फिर आप देखो आपको कितना दुख मिलता है सुख नहीं मिलता।
कितना दुख मिलता है। अगर वह व्यक्ति किसी की तरफ देख भी लेगा तो आपके हृदय में जलन हो जाएगी। आपका हृदय अशांत हो जाएगा। और फिर कहीं संसार में तो ऐसा है नहीं कि कोई एक जगह टिक सके। वो तो केवल वही है जो धर्म से चलता है। जो नियम से चलता है। ऐसे संसार में कोई आपको प्यार करें। मुझे नहीं लगता। प्यार करने वाले तो सिर्फ भगवान हैं जो हमारे अवगुणों को भी भुला करके हमसे प्यार करते हैं। यहां तो केवल गुणों का प्यार है। जिस दिन देखा कि तुमसे अच्छा कोई मिल गया फिर ब्रेकअप जूही जी नहीं राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।
महाराज जी रात को सोते समय मृत्यु का सा डर लगता है महाराज जी नाम भी लेती हूं बट भय जा नहीं रहा महाराज जी क्या वैसे यह भय बहुत अच्छा है किसका है यह भय हमें तो बहुत अच्छा लगता है कि अगर हम भयभीत हैं तो भगवान का चिंतन होगा भगवान का आश्रय होगा संसार का आश्रय छूटेगा भय तो बहुत अच्छी चीज है हमें भय अच्छा लगता है संसार से भय लगना मृत्यु से भय लगना किसी पर विश्वास ना होना कोई धोखा खा कर सकता है। तो यह सब जब हमारे अंदर आ जाएगा तो एक जगह टिक जाएंगे हम। भगवान का विश्वास भगवान का बल तो हम निर्भय हो जाएंगे।
तो उस समय भगवान का चिंतन करते हुए सो क्योंकि भगवान ही निर्भय करने वाले हैं। और सच अच्छी बात है। हम इसका निषेध नहीं करते क्योंकि पता नहीं सो के उठे कि ना उठे। है ना? सोने में सोते-सोते ही दिल फेल हो जाते हैं। पता नहीं उठ पाए कि ना उठ पाए। बड़ा जीवन संकट में है। बड़ा जीवन संकट में पता नहीं जीवन साथी कैसा मिले। बड़ी समस्याएं हैं। मान लो जिस जीवन साथी को हमने अपना प्राण प्रिय माना वही जीवन साथी हमारे साथ धोखा कर जाए। कब कहां क्या हो जाए क्या भरोसा बड़ा अपने पले हुए परिवार को छोड़ के अनजाने परिवार में जाना तो हमें लगता है बहुत प्यार सम्मान से लड़की को रखना चाहिए।
लड़की को चाहिए कि अपने पति को भगवत भाव से देखे। बड़ा प्यार सम्मान करना चाहिए। आजकल ये सब बातें किताबों में लिखी केवल रह रही हैं। वर्तमान में तो दिख नहीं रही है। वर्तमान बोले हम शुरू हो गए हैं। हां अगर एक एक सुधरेगा तो सब सुधर जाएंगे। एक एक सुधरे ना तो सब सुधर जाएंगे। आज वातावरण बहुत गंदा हो रहा है। तो हमें लगता है अगर हम भगवान का नाम जप करें, भगवान की कथाएं सुने, संतों का संग करें तो हमारी बुद्धि पवित्र हो। इन सब बातों से हटे और भगवान का चिंतन करें तो हम निर्भय हो सकते हैं।
भगवान के चिंतन से निर्भय हो सकते हैं। दूसरा कोई ऐसा नहीं जो हमें निर्भय कर सके। अपने आप में भय होना अच्छी बात है। क्योंकि यह भय ही हमें भगवान तक ले जाएगा। जो सभीत आवा शरणाई रख्यों ताई प्राण की नाई भगवान कहते हैं जो भयभीत होकर मेरी शरण में आ गया उसे मैं प्राणों से भी अधिक प्यार करूंगा रखो ताई प्राण की नाई श्री हरिव महाराज जी महाराज जी ब्रह्मा जी की आज्ञा से करदम ऋषि जी ने अपने मननुकूल पत्नी पाने के लिए 10,000 वर्ष तपस्या की तब जाकर देव देवभूति जैसी पत्नी मिली और स्वयं भगवान उनके पुत्र बने।
महाराज जी क्या हमें भी अपने मननुकूल पत्नी पाने के लिए 10,000 की तो आयु ले तो महाराज जी कलयुग में कितने उन्होंने तो 10,000 वर्ष तपस्या की अपने अगर एकादशी उपवास कर ले यही बहुत बड़ी बात है हां करना चाहिए भगवान शिव की आराधना अंबा की आराधना करनी चाहिए जिससे सुयोग्य पत्नी मिल जाए ऐसा नहीं संसार में सब कुछ है एक से एक पवित्र आचरण वाले बच्चे हैं एक से एक पवित्र आचरण वाली बच्चे हैं तो आराधना करनी चाहिए भगवान शंकर की आराधना करनी चाहिए। कहां से शुरू करूं? कब से?
आज से शुरू कर दो। तीन साल से जुड़ा हूं। निरंतर नाम जप करने। हां पत्नी के लिए भगवान शंकर को जल चढ़ाओ। बिल पत्र चढ़ाओ। उन्हीं से प्रार्थना करो। अंबा जी से प्रार्थना करो। वही सुंदर पति या सुंदर पत्नी प्रदान करने में समर्थ हैं। बीमा करा दीजिए आप। बीमा करा दो। वो तो वो तो फिर यह चाहते नहीं होते। उसमें तो जो समर्पित हो गए तो अब जोई जोई प्यारो करे सोई मो भगवान हमें जब पत्नी देना होगा तो पत्नी दे देंगे पुत्र देना होगा पुत्र दे देंगे नहीं देना होगा नहीं देंगे हम भगवान के भरोसे हैं उसमें अपनी साधना का फल नहीं हमारी साधना का फल श्री भगवान है अब वो जो चाहे सो करें ऐसे चला जाता है भगवान की शरणागति में बीमा का मतलब कल जो कह रहे थे वो शरणागति है पूर्ण शरणागति भगवान की तो भगवान जोई जोई प्यारों करे सोई मोह भावे जैसे जैसे भगवान जो करे वही हमारे लिए
हम भगवत आश्रित रहते हैं आपके लिए कुछ श्री राधा कवचित पल्लभ वल्लरी के राधा पदांग विलन मधुरा स्थली के राधा यशो मुखर मत खगावली के राधा विहार विपने रमदा मनो में श्री राधा साध्यम साधनम यस राधा मंत्रो राधा मंत्र दात्री च राधा सर्वम राधा जीवनम यस राधा राधा राधा वाचम तस शेषम नवादा नील मनोराय प्रफुल राजीव विलोचनाय वेणु स्वराना मोहित गोकुलाय नमोस्तु गोपी जन वल्लभा कान्हा माई डियर मस्ताना कान्हा माई डियर मस्ताना म गॉड दीवानों का दीवाना भाई गॉड दीवानों का दीवाना आई एम सॉरी आई एम सॉरी लेट पहचाना भाई गॉड दीवानों का दीवाना माई गॉड दीवानों का दीवाना और कौन थे दीवाने दीवानी थी मीरा दीवानी थी मीरा पिया विष का प्याला तो प्याले में आया नजर नंदलाला तो प्याले में आया नजर नंदलाला डेंजरस पोइजन का पी गई पैमाना का पी गई पैमाना बाय गॉड दीवानों का दीवाना बाय गॉड दीवानों का दीवाना जिधर से भी गुजरो और जिस राह जाओ जहां भी रहो सामने उनको पाओ जहां वी रहो सामने उनको पाओ इंपॉसिबल है इनसे बच पाना इमॉसिबल है इनसे बच पाना
म गॉड दीवानों का दीवाना कान्हा माई डियर मस्त कान्हा माई डियर मस्त आना म गॉड दीवानों का जय हो बाबा कृपा बनी द्वेष तो सन्यास है बट हम प्रेम भाव से कृष्णा जी हां आप सभी भगवान से प्रेम करना ही तो सन्यास है ये सर्वाण कर्माण सन्यास मत परा अनन्य योग माम ध्यांत उपासते भगवान कह रहे हैं सन्यास का स्वरूप यही है भगवान के दो रूप है एक निराकार आत्म स्वरूप और एक साकार शिव स्वरूप राम स्वरूप कृष्ण स्वरूप तो भगवान तो भगवान ही है ना चाहे हम राम राम बोले चाहे शिव बोले चाहे कृष्ण कृष्ण तत्व तो एक ही है।
उसी तत्व की आराधना कर रहे हैं। और इस शरीरों से प्रेम हटाकर उस तत्व से प्रेम करना ही आत्म प्रेम है। चाहे हम साकार प्रेम करें या निराकार परमात्मा से प्रेम करें। शरीरों से प्रेम ना करें। संसार के भोगों से प्रेम ना करें। परमात्मा से प्रेम करें। इसी बात के हम सन्यासी हैं। आत्म प्रेम या भगवत प्रेम। प्रेम जरूरी है। बिना प्रेम के तो जीवन व्यर्थ है। सन्यासी है बट हम तो कृष्णा तो बेटा मानती है। हां अपने अपने भाव से भगवान को दुलार कर सकते हैं। राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा इतनो तो कबहु हसी में हो इतना तो कबहु हस दे सुनहु कृपा किशोरी राधे सुनहु कृपाल किशोरी राधे राधे राधे राधे राधे सुनहु कृपाल किशोरी राधे अवसी कृपा की गोल चित
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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