मौन रहने के फायदे और गृहस्थ में मौन कैसे धारण करें ?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
महारा जी मन मस्तिष्क में एकांकी मौन को लेकर पूज्य उड़िया बाबा जी के वचन बार-बार प्रेरित करते हैं कि उड़िया बाबा जी के अनुसार मौन हमें ईश्वर के पास ले जाता है। मौन ब्रह्म की ओर मौन आत्मा का साक्षात्कार मौन जीवात्मा से परमात्मा तक पहुंचाने की सीढ़ी आता है। महाराज जी क्या मौन से मानसिक मौन और वाचिक मौन से विरह की अनुभूति और प्रगाढ़ होती है। और बिल्कुल बिल्कुल 100% इसमें कोई एक भी परसेंट संशय नहीं क्योंकि वाणी से सबसे ज्यादा अपराध बनता है। हंसी मजाक झूठ बोलना कई तरह की ऐसी बातें होती हैं जो हमारी वाणी से अपराध बन जाते हैं और वाणी का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है।
अब जैसे हम वाणी से मौन है तो वो धीरे-धीरे मन पर भी प्रभाव पड़ने लगता है। आप देखो कुछ दिन मौन जैसे आप बोलने की जैसे तो एक उदासी छा जाएगी कि अब बोल सकते नहीं तो फिर एकांत का मन करेगा कि हम किसी से मिले ना किसी से जुड़े ना पर जैसे जिसका व्यापार है या नौकरी है या अन्य साधनों में रत है और साधनत है तो मतलब विचार मौन रहना चाहे विचार मौन ज्यादा उत्तम है। विचार मौन का मतलब है जैसे आप हमसे कोई बात पूछ रहे हैं। अब हम बार-बार अब पूरी मनोशक्ति लग रही हो। आप समझ नहीं पा रहे।
हम समझाना चाह रहे तो हमारे अंदर चिड़चिड़ापन आ जाएगा। अगर अत्यंत आवश्यक है तो हम बोल देते हैं। और अत्यंत आवश्यक नहीं है तो हम उत्तर नहीं देते। इसे विचार मौन कहते हैं। जो बोलेंगे सत्य बोलेंगे, मृदु बोलेंगे, हितकर बोलेंगे नहीं तो मौन रहेंगे। साधक जो गृहस्थ में है उसे जड़ मौन ना लेकर विचार मौन उत्तम रहेगा। क्योंकि परिवार है, गृह कार्य है। अच्छा संत वेश में क्या है कि अब हम आज से नहीं बोलना चाहते। तुम्हारे ऊपर किसी का अधिकार नहीं। आप हमें नहीं बुलवा सकते।
लेकिन गृहस्ती में बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनमें आपको बोलना ही पड़ेगा। तो उसमें विचार मौन ज्यादा उत्तम है। जड़ मौन ठीक नहीं है। तो विचार मौन के द्वारा भी वही गति प्राप्त की जा सकती है। वाणी का सद्यवहार परमार्थ को पुष्ट करता है या वाणी का मौन दोनों पुष्ट करते हैं। तो हम सद वाक्य बोल के सद व्यवहार करके अपने मन को निसंकल्प बनाएं। अपने मन को मौन की तरफ ले जाए। मन को मौन के मन का संकल्प रहित हो जाना ही सच्चा मौन है। तो इसके लिए वाणी का मौन सहयोगी है। पक्का सहयोगी क्योंकि अपने लोगों ने इसका आश्रय लिया है।
इसका सहारा लिया है। आज भी है शाम टाइम हम इस समय तो हमारा यह सेवा रहती है। इसके बाद फिर हम कोशिश करते हैं कि हमें मौन ही रहना पड़े। इशारे से बात कर ली जिससे कोई बात है कि आप अगर बहुत बोलना हुआ तो दो शब्दों में बोल दिया शांत अपने सुमिरन चिंतन में तो ऐसा है व्यवहारत उपासक को विचार मौन रहना चाहिए हां सबको चाहिए हम व्यर्थ में क्यों बोले हम क्यों गाली गुप्ता करें अपनी जबान गंदी करें झूठ बोले व्यर्थ में क्यों बोले बहुत गंभीर रहना चाहिए शांत रहना चाहिए उसकी बात सुनी नहीं अगर बोलने लायक है तो उत्तर दिया नहीं तो मौन है हमें क्या मतलब चल दिया अगर मान लो आपसे कोई पूछ रहा है आपसे ही डायरेक्ट पूछ रहा है कोई बात पूछ रहा है आपको लग रहा है उत्तर देना ठीक नहीं नजर नीचे की चल दिया वो आदमी जो समझे पागल समझे अभिमानी समझे जो समझे वो समझा करे आप तो प्रपंच रहित है और जो साधक है वो समझ जाएगा बड़ा प्रवीण साधक है अपने आप को कैसे बचाता है देखो मौन होकर बचा लिया शांत बिल्कुल बहुत जरूरी जरूरी है।
नहीं वाणी से इतने अपराध बनते हैं कि लोग समझ नहीं पाते। वाणी से अपराध ही अपराध बनते रहते हैं। शरीर से और वाणी से ज्यादातर अपराध बनते रहते हैं। इसीलिए परमार्थ में उन्नति नहीं हो पाती। अगर शरीर और वाणी निष्पाप हो जाए तो मन बहुत जल्दी भगवान में लग जाए। इसीलिए देखो संतों को देखो बड़ा पवित्र स्नान कपड़ा लत्ता सब पवित्रता से रहना कि हमारा शरीर निष्पाप हो जाए। हमारी वाणी निष्पाप हो जाए तो मन भगवान में लग जाए। मन का तन और वाणी से बड़ा संयोग है। हम जहां बोलते हैं मन हमारा वहीं जाता है।
हम शरीर से जो क्रियाएं करते हैं मन उसी में जाता है। जो संबंध रखते हैं। अगर हमारा देखो तभी तीन की शरणागत कही गई। तन वांग मनो भी शरीर मन और वाणी वांग तनु वांग मनो भी। तीन का बहुत बड़ा योग है साधना में। तो हम शरीर को पवित्र रखें। वाणी को कम बोलने का अभ्यास रखें। दूसरे को ज्यादा बोलने दें।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
संबंधित
- परिवार में नकारात्मकता व कलह हो तो क्या करें? — एसवी चतुर्वेदी जी दिल्ली से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी परिवार में नकारात्मकता हो घर में कलह हो रही हो गृह युद्ध जैसी परिस्थिति बन रही हो तो अध्यात्म के रास्ते पर…
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1400 — संजीव मुखर्जी शेयर इवें राधे-राधे महाराज आईआईटी धनबाद से महाराज जी कृपया मुझे बताइए कि मैं कैसे कम बोलूं अधिक सुनूं बोलते समय नरम रहूं दूसरों को अपनी बात रखने का मौका दूं फिर…
- भगवत् मार्ग पर चलना चाहते हैं, पर हर दिन असफल हो रहे हैं। — आस्था बोरा जी जयपुर से श्री हरिवंश महाराज राधे-राधे महाराज जी 2 साल पहले जब आपको सुनना शुरू किया तो जानना हुआ कि हम कितना अज्ञानता और अंधकार में जीवन जी रहे हैं। आपको सुनने से यह…
- भगवान मिलेंगे या नहीं कैसे पता चलेगा? — भगवत दर्शन का सर्वोत्तम उपाय क्या है? भगवान के दर्शन करने का सर्वोत्तम उपाय क्या है? भगवत दर्शन का सरल और सर्वोत्तम उपाय दिन रात उनके नाम का जप करो और एकांत में रो भगवान मिल जाओ।…
- अगर एक नाम का इतना बड़ा फल है, तो निरंतर नाम क्यों जपें? — निखिल जी मुंबई से राधा वल्लभ श्री हरिव श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी एक नाम का फल पूरा त्रिभुवन से भी बड़ा है तो फिर निरंतर नाम जप क्यों कहा जाता है क्योंकि एक नाम जिसको कहा…
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1399 — जय प्रकाश प्रजापति जी गौरव जी गुरुदेव भगवान आपके चरणों में प्रणाम महाराज जी पिछले दो सालों से प्रतिदिन आपको सुन रहा हूं नाम जप भी कर रहा हूं परंतु कुछ महीनों से संसार की बनावटी…