॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #985 · 29 जुलाई 2025

▶ YouTube

श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की श्री वृंदावन धाम की सतगुरुदेव भगवान की जय हो। दीपक जी हरियाणा से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी, आज समाज में भक्ति की लोभी जगी है, लेकिन फिर भी कुछ व्यक्तियों का भक्ति को लेकर अलग नज़रिया रहता है।

अगर हम गले में कल- कंठी माला, माथे पर चंदन, तिलक लगाएं या कार फोन में या व्यापारिक स्थान पर आप कथा आदि सुने, तो कहते हैं कि बस अब यह भी बाबा बनेगा। ऐसे में हम अपनी श्रद्धा को कैसे बचाएं और बचाए। इसमें कोई गलत बात है क्या? जैसे कोई कहता है कि बड़े भगवान के भगत बनते हैं या कुछ ऐसा कमेंट करता है हमें सुन लेना चाहिए। बात भूत विवश मतवारे ते नहीं बोले वचन बिचारे तनकर कहा सुनी नहीं कान जो भगवान की भक्ति का उपहास करते हैं या मन से विरोध करते हैं। ऐसे लोगों की बातों को हम नहीं सुनते।

देखो उपहास करने योग्य तो वह है जो खुले शराब पीता है। खुले व्यभचार की चेष्टा करता है। चोरी करता है। हिंसा करता है। यह उपहास के पात्र हैं। कंठी बांधना, तिलक लगाना, भगवान का नाम जप करना, कोई नशा ना करना, कोई गंदे आचरण ना करना, यह कोई उपहास का विषय थोड़ी है। पर जो लोग ऐसे भक्तों का उपहास करते हैं, वह अपना पतन करते हैं। अपने लोगों को उनकी बातें नहीं सुननी। हमें बिल्कुल धैर्यवान बनना है। वह उपहास करें। अपने मुस्कुरा दिए। अपने मार्ग में चले। हम अपने धर्म मार्ग में चलें।

धर्म मार्ग में चलने वाले का जो उपहास होता है वो उसकी उन्नति का कारण बनता है। और जो उपहास करता है उसकी अव्नति होती है। इसलिए धैर्य पूर्वक चलिए। घबराने की जरूरत नहीं। ना लड़ने की जरूरत है। ना उनकी निंदा करने की जरूरत है। मुस्कुराने की जरूरत है। मुस्कुरा दिया चल दिया। वो उसके विचार है। अपने सतार्ग में चल रहे हैं। जी तान्या जोशी जी राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आप कह रहे हैं कि आप एक चित्रकार हैं। श्री जी के चित्र बनाते हैं और राधा नाम की माला बनाने आदि का कार्य करते हैं।

किंतु अब इसकी कीमत तय करना या इसके बदले में धन लेने में संकोच लगता है। ऐसा क्या करूं कि मेरी सेवा भी बन जाए और अर्थ नहीं अब ऐसे न्योछावर कर दोगे तो दुकानें लुट जाएगी। पैसा तो लेना ही पड़ेगा और पैसा नहीं लेंगे तो आपका परिवार कैसे चलेगा? तो व्यापार जब कर रहे हैं तो उसमें यह संकोच नहीं करते। जैसे जो मूर्ति का व्यापार करते हैं ऐसे दुकान लुट जाएगी। ऐसे दुकान नहीं चलती। दुकान तो जैसे दुकान व्यापार का कार्य है उसमें शंको। अगर कंठी ₹100 की है तो भाई ₹100 की कंठी है।

जो जितना है उचित मूल्य लेकर के लाभ लेकर और हम भक्तों की सेवा करें। उसमें ऐसे विचार ना धारण करें कि हम भगवान के नाम को भगवान की छवि को कैसे बेचे नहीं वो व्यापार है तो फिर ऐसा करना है कोमल जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी क्या सिर्फ हमारे मन के चिंतन से हमें प्रभु की प्राप्ति हो गई या अपना भजन कीर्तन कान में लगा लो तो भी भगवत प्राप्ति हो जाएगी नहीं वह श्रवण भक्ति बनी वो श्रवण भक्ति बनी कीर्तन कर रहे कथन भक्ति बनी लेकिन श्रवण और कथन का फल है सुमिरन।

जो मन से सुमिरन किया जाता है वह श्रवण और कथन का फल है। सुमिरन से ही भगवत प्राप्ति होती है। य स्मरण मात्रे जन्म संसार बंधनात विमुचते नमस्तस्मै विष्णवे प्र विष्णवे जिनका स्मरण जो सुमिरन है उसे स्मरण कहते हैं। जिनका स्मरण मात्र करने से जन्म संसार जन्म मरण के बंधन से जीव मुक्त हो जाता है। तो श्रवण कथन सुमिरन सेवन चित्त लावह श्रवण कथन का फल हुआ सुमिरन शांत बैठा हुआ भगवान में चित्त लगाए हुए या कार्य करता हुआ भगवान का नाम जप कर रहा है इसी सुमिरन से भगवत प्राप्ति होती है दीपिका गर्ग जी गुरुग्राम से श्री राधे महाराज जी महाराज जी नाम जप कर रही हूं बट अभी उतना विश्वास नहीं बन रहा महाराज जी आ जाएगा जैसेजैसे मन की निर्मलता आएगी वैसे जैसे विश्वास प्रकट होगा विश्वास कोई साधारण वस्तु थोड़ी है।

विश्वास आ गया तो भगवान अधीन हो जाएंगे। बिन विश्वास भगत नहीं ते बिन द्रवह न राम राम कृपा बुन सपन जीव न लह विश्राम विश्वास से ही तो भक्ति सुदृढ़ होती है तो अभी हमारा मन जितना मलिन रहेगा उतना वो भगवान पर विश्वास नहीं करेगा और निर्मल मन हो जाएगा तो भगवान पे क्या कई बार हमारे सामने ऐसे चैप्टर आते हैं कि महाराज जी आपने गलत समझा वो बहुत गलत आदमी है वो ऐसा बोल गया आप मान गए तो हमारा विश्वास है। आप हमसे बोलो तो हमें संशय नहीं होगा कि आप झूठ बोल रहे हैं। क्योंकि हमारा विश्वास ही जीवन है।

आप तो जो बोले वही मान लिए तो जब हमारा विश्वास दृढ़ हो जाता है तो जनसाधारण के प्रति चोर के प्रति छल कपटी के प्रति पापी के प्रति भी विश्वास हो जाता है। और वो छल कपट करे वो जाने लेकिन हमारा विश्वास है जो हमारे सामने बोले तुम तो हम उसे मान गए। हमें संशय नहीं उत्पन्न होगा। प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं खड़ा होगा। तो विश्वास बहुत बड़ी चीज है और हमें विश्वास है तो हम हर समय आनंदित रहते हैं। हमारे अंदर कोई संशय नहीं, कोई जलन नहीं, कोई प्रश्न नहीं, कोई अशांति नहीं, कोई चिंता नहीं, कोई दुविधा नहीं।

हर समय मगन रहते हैं। क्योंकि हमें विश्वास है आप छल कपट कर नहीं सकते हमारे सामने। क्योंकि हमारे साथ भगवान है। आप छल कपट करने की चेष्टा करेंगे तो छल कपट वापस हो जाएगा और सत्य हमारे सामने प्रकाशित हो जाएगा। तो इसलिए हमें विश्वास दृढ़ करना चाहिए और वह दृढ़ होगा भजन करने से और जब तक भजन पूर्ण नहीं होता तब तक विश्वास नहीं आता। इसलिए खूब भजन करो। महारा जी विश्वास करके नाम जप करें और फिर नाम जप करके फिर विश्वास होगा। हां संत वचन पर विश्वास करके गुरु वचनों पर विश्वास करके नाम जप करें और नाम जप में जब दृढ़ विश्वास हो जाएगा तो भगवान मिल जाएंगे।

दीपक जाट राधे-धे महाराज जी महाराज जी वास्तविक एकांत क्या है और इसका अनुशीलन कैसे किया जाए हरि के सिवा और कुछ स्मृति ना रह जाए हृदय में इसी को वास्तविक एकांत कहते हैं। ये बाहरी भूत आकाश में किसी गुफा में बैठ जाना एकांत नहीं कहते। चित्तवृत्ति संपूर्ण रूप से समाधान को प्राप्त होकर परमात्मा में स्थित हो गई उसे कहते एकांत। यह बाहरी एकांत में कि आप कमरा बंद करके बैठ लिए प्रपंच का चिंतन कर रहे हैं तो आप एकांत में नहीं एकांत में है आप हरि स्मृति में है कोई भी स्मृति विक्षेप नहीं कर रही केवल भगवान की अखंड स्मृति अब वो एकांतिक महापुरुष है वो एकांतिक स्थिति को प्राप्त महापुरुष है गुफा में बैठ जाना कमरे में बैठ जाना ये एकांतिक नहीं है वाह एकांतिक है वास्तविक एकांतिक है हमारी एक एक वृत्त मुरारी पादारपित चित्तवृत्ति जैसे गोपिका हैं हर समय एकांत में रहते हैं।

घर में रहते हुए व्यापार करते हुए सब कार्य देखो जा रहे हैं दही बेचने विक्रेतु कामा खिल गोप कन्या मुरारी पादारपित चित्तवत्त दध्यादम मोह वसाद चद गोविंद दामोदर माधवेती वो कहना चाहते हैं कोई दही ले ले दही लेकिन एकांत में गोविंद बैठा तो कहते कोई गोविंद ले ले कोई दामोदर ले ले कोई माधव ले ले तो सब ब्रजवासी हंसते हैं ये क्या देखो स्थिति गोपियों की मुरारी पाद ार्पित चित्तवृत्ति जिसकी चित्तवृत्ति भगवदाकार है वही एकांत है। अमृत पांडे जी राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जीवन सुख और दुख की प्रतिछाया है।

अतः सुख के पीछे दुख और दुख के पीछे सुख आना निश्चित है। परंतु मैंने यह पाया है कि दुख के समय प्रभु का स्मरण करना आसान होता है और समर्पण भाव अत्यधिक प्रबल होता है। जो ध्यान और समर्पण दुख के समय होता है। उसी की भांति सुमिरन और समर्पण सुख के समय क्यों नहीं हो पाता? क्योंकि मन प्रफुल्लित होकर विषयों में लग जाता है और वहां शोकित होकर एक ही रास्ता दिखाई देता है कि अब दुख से बचाने वाले केवल भगवान है। विपत्ति से बचाने वाले भगवान है और सुख में भगवान का विस्मरण विषय हर्ष से हो जाता है।

विषयों के सेवन से हर्ष होता है। एक आनंद जनित सुख होता है। उसी सुख में हम भगवान को भूल जाते हैं। और जब सच्चा सुख मिलेगा जो सुख और दुख दोनों से परे हैं वह प्रसन्नता है। वह भगवदानंद है। तब भगवान का एक तार स्मरण होता है। जब तक त्रिगुण चक्र में है तब तक वो आनंद की अनुभूति नहीं होती। जब त्रिगुणातीत हो जाता है तब भगवत आनंद की अनुभूति होती है। इसलिए खूब नाम जप करो और हर समय जप करो। चाहे सुख हो चाहे दुख हो। जबान से जप करो। मन तो बहुत चंचल है। दो चार बार नाम जप करेगा फिर भाग जाएगा संसार में।

य्यागे वर्तते नाम तभ्यम अहो सोपो गरियान य जिज्ञ वर्तते नाम तभ्यम वो चांडाल भी महान श्रेष्ठ और जगत पूज्य है जिसकी जिभ्या के अग्र भाग पर हे हरि आपका नाम विराजमान है तो निरंतर नाम अभ्यास करें भगवान के सुमिरन का तो सुख और दुख दोनों से परे वो भगवनंद को प्राप्त हो जाएगा जो कहीं किंचिन मात्र भी दुख का अनुभव नहीं होने देता वो भगवनंद जो दुर्गुणातीत है, जो मायातीत है, जो कालातीत है, वह आनंद प्राप्त हो जाएगा। अभी आनंद काल के अंतर्गत है, माया के अंतर्गत है, गुणों के अंतर्गत है।

जब गुणातीत, मायातीत, कालातीत जो सुख मिलता है वो भगवत आनंद होता है। इसलिए कुम नाम जप करो। बृज मोहन जी मथुरा से। राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी मेरा प्रश्न है कि यदि जीवन का अंतिम लक्ष्य भगवत प्राप्ति है तो क्या पूर्ण रूप से भगवान भजन भगवान का भजन करने पर अकर्मण्यता का भाव नहीं आएगा क्यों कर्म ये सबसे बड़ा कर्म है घिया की उबली हुई सब्जी और रोटी देंगे मन लगाओ भगवान में निरंतर भगवदाकार वृत्ति करो इससे बड़ा अगर कठिन कोई कार्य है संसार में तो हमें बताओ किसी भोग को नहीं भोगने देंगे केवल घिया की सब्जी उबली सब्जी और रोटी देंगे और नाम में मन लगाओ हमको तो हफ्तों भोजन नहीं मिला और नाम में मन लगाओ।

आज तक का एकांतिक सुन लीजिए। अगर कभी यह कहा हो कि सब कुछ छोड़कर के नाम जप करो। कभी नहीं कहा सब करते हुए नाम जप करो। फावड़ा चला रहे हो? राम हरे कृष्ण झाड़ू लगा रहे हो। हरे कृष्ण राधा हरे क्या चला गया? अकर्मण्यता और इस कोटि का भजन करके दिखाओ हमें। हाय हाय मच जाएगी। आग पैदा हो जाएगी। भाग पड़ोगे। एक बार एक संत जी ने देखा कि दो मछुआरे मछली जो बंसी नहीं वो एकदम एक और एकदम ऐसे करके मछली निकालते हैं ना तो नजदीक गए बोले भैया पूरा दिन भर लगे रहते हो कितने कमा लेते हो बोले पेट पालने के लिए कमा लेते हैं महात्मा जी बोले चलो हमारे आश्रम में नाम जप नाम कीर्तन में बैठो तुम जितना रुपया कमा लेते हो उतना रुपया देंगे और तुम्हारे पूरे परिवार का भोजन देंगे केवल तुम्हें बैठकर नाम कीर्तन करना है।

अब ले गए वहां ढोल मजीरा के बीच में बैठ के नाम थोड़ी देर में भाग गए। थोड़ी देर में भाग गए कि भैया हमको वो मछली मारना अच्छा है। नाम कीर्तन अच्छा नहीं तो यह जो भगवान का भजन है आप इसे खिलवाड़ समझते हो। मन को भगवान में लगाना बहुत कठिन कार्य है। और जब भगवान हमारे हो गए तो सारा विश्व ब्रह्मांड हमारा हो गया। कौन सा ऐसा वैभव है जो साधु के चरणों में ना लूटता हो। क्यों? क्योंकि विश्वात्मा भगवान से उनका संपर्क हो चुका है। अब महालक्ष्मी उनकी मां है। मां की तरह पालन पोषण होता है।

हम यही लोगों से कहते हैं कि तुम दोद चारचार परिवार के लोग हो। अशांत हो ईर्ष्यादेश करते हो। लड़ाई झगड़ा करते हो। अरे अगर भगवान का भजन करो तो देखो कितना आनंद है। 500 लोग एक साथ रहते हैं। खानपान संयम नियम सब और सब जवान। ऐसा थोड़ी कि थोड़ी भी गंदगी नहीं। इतना भी गंदा आचरण नहीं हो। सब जवान है। अपने लड़का बच्चा को मोबाइल हटवाना मुश्किल पड़ जाएगा। अपने बच्चा से अगर कह दो कि मोबाइल दो दिन के लिए रख दो तो नहीं मानेगा तुम्हारी बात और यहां जीवन अर्पित किए हुए हैं।

तो भगवान के नाम में अकर्मण्यता है या सच्ची कर्मण्यता है? विचार करके देखो भगवत मार्ग में चलने में सच्ची कर्मण्यता यही है। आपने खूब रुपया कमाया, खूब परिवार, खूब मकान हो जब मरे तो क्या आपके साथ गया? और जब भगवान का नाम जापक मरता है तो संपूर्ण वैभव उसको प्राप्त होता है। भगवान का दिव्य लीलाएं, दिव्य वैभव, दिव्य सेवा, दिव्य आनंद प्राप्त होता है। यहां तो चार दिन की जिंदगी है प्यारे। पानी का बुलबुला कब मर जाओ कोई पता नहीं। कब फूट जाए पानी का बुलबुला कुछ पता नहीं है।

इसलिए भगवान का नाम अकर्मण्यता नहीं है। और कोई भी भक्त भगवन नाम जप करने वाला अकर्मण्य दिखाई दे तो हमें बताओ। लाखों का कल्याण होता है उससे जो भगवान का भजन करता है तो अकर्मण नहीं हुआ या सच्चा कर्म हुआ लाखों की बुद्धि शुद्ध होती है आप विचार करो हम तरे औरों को भी तारे हम खुश रहे औरों को भी खुश रहे हम सच्चे मार्ग में चले औरों को भी सच्चे मार्ग में चलाएं तो ऐसा भावना ना किया जाए हावड़ा चलाने में उतनी मेहनत नहीं जितनी मेहनत भगवान के भजन में करके देखो पांच मिनट करके देखो पांच मिनट मन को भगवान में लगा के देखो हाहाकार मचा बता देगा ये इस विषय से उस विषय उस विषय से उस विषय लगेगा धरो यार माला झंझट है बहुत कठिन है भगवान का भजन करना कोई खिलवाड़ नहीं है संपूर्ण वैभव का स्वामी उसके अधीन हो जाता है जो भगवान का नाम जप करता है सुमिर पवन सुत पावन नामो अपने बस कर राखे रामो जब श्री कृष्ण अधीन हो जाते हैं भक्ताधीन वन पूज्यो गोपाल सहस्त्र नाम में आता है भक्ताधीन वन पूज्य भक्त के अधीन हो जाते हैं तो फिर वही वैभव तो एक बहुत छोटी बात ये तो माया है।

कभी अकर्मण्यता का उपदेश नहीं होता। मैंने कहा था जैसे परिवार के प्रति भी हमारी उत्तरदायित्व है। कभी एकांतिक सुना है? हां मैं कई बार सुना। तो कभी ऐसा सुना है क्या कि परिवार के भाग जाओ। नहीं नहीं बिल्कुल नहीं। तो अपने हमने उपदेश किया है कि तुम किसी के भाई हो, तुम किसी के पति हो, तुम किसी के पिता हो। तुम्हारा एक धर्म है। उस धर्म का निर्वाह करते हुए परम धर्म का पालन करो। मास्मर युद्धच अपने कर्तव्य को करते हुए भगवान का नाम स्मरण करना। कभी ऐसा नहीं कहा कि तुम घर परिवार छोड़कर बाबा जी बन जाओ और बन भी नहीं सकते।

हैं। बहुत कठिन है। हां। बैलेंस बना के चलना तो सरल है बैलेंस बना के कि आपके सामने हम साधु और ये सब और पीछे इसके बाद मनमानी आचरण मनमानी खानपान मनमानी भोग वो बात अलग है लेकिन जो समाज में वही एकांत में बहुत कठिन जीवन है यम ही नथते पुरुषम पुरुष सब सम दुखा सुखाधीम स्वता कल्पते जो इन वेदनाओं को सह कर राधा राधा कृष्ण कृष्ण कृष्ण वो निकल बहादुर है वो बहादुर पुरुष है जो मार मारता है काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर इन सब की मार को सह कर राधा राधा राधा और आगे निकल जाता है फेल हो गए तो

संसार पास हो गए तो भगवान तो बहुत कठिन मार्ग है देखो दम नाटक और पाखंड ये ज्यादा पूज सकता है हमारी बात समझना ज्यादा पूज सकता है क्योंकि बहुत परफेक्ट रोल अदा करेगा लेकिन वो साधु नहीं हो सकता साधुता जो कैमरे कैमरे के सामने और कमरे में एक है वही साधु है जो कैमरे के सामने कुछ दूसरा रूप होता है और कमरे में कुछ दूसरा रूप होता है अपने फ्लैट में अपने कमरे में अपनी कुटिया में कुछ दूसरा रूप होता है कोई बिरला एक होगा जिसका मन एक वचन एक कर्म एक एकांत एक और समाज एक जिसमें डुप्लीकेट नहीं दम नहीं पाखंड नहीं सच्ची भक्ति तब होती है और यह सबसे कठिन बात है कि एकांत में तो हम आपसे प्रवचन कर रहे हैं।

यहां सब बैठे हुए और जब हम अकेले हुए तब रो रहे हैं भगवान के लिए। यह सबसे बड़ी बात होती है। अकेले हुए तो भोगों का चिंतन कर रहे हैं। टीवी देख रहे हैं, गेम खेल रहे हैं। समय संसार में व्यतीत कर रहे हैं। तो डुप्लीकेट जीवन जीना बात अलग है। लेकिन वास्तविक भगवान के प्रति जीवन अर्पित करना बहुत कठिन बात है। हम भगवान के नाम के बल से भगवान के चरणों के बल से इस माया पर पार पाते हैं। नहीं तो शिव विरंचिका मोह शिव विरंचिका मोह को है बपुरान। और बेचारा कौन हो सकता है?

जब ब्रह्मा और शिव को भी माया मोहित कर ले तो अपने लोग तो जीव है। अपने लोगों को मुच्छता कि हम माया पर विजय प्राप्त कर लेंगे तो बेवकूफी ही है। भगवान की शरण में और भगवान के नाम बल से हम माया पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। जी आपकी कृपा से करोड़ों युवा जी भक्ति के मार्ग पर चल चुके हैं और से प्रेरित हो के और मैंने ओसा से हैं हम लोग तो बहुत लोग बोलते हैं हम प्रेमानंद महाराज जी के मिले हैं कभी आप तो हम वहां के उनके लेक्चर सुनते हैं। हम प्याज लहसुन नहीं खाते हैं।

महाराज जी आपकी साधना के और आपके भक्ति के प्रभाव है। नहीं इसमें हमारे भगवान की विशेष कृपा है। भगवान ये सब कर रहे हैं। करे करा करावे आप सब और जन बढ़ाई दे। आप करते हैं और अपने भक्त का यश करवाते हैं। क्रांति महाराज जी इस समय जो है नहीं भगवान सबका मंगल करें। भगवान सबको सुख दें। हमारी यही प्रार्थना है क्योंकि उन्हीं की तो ये प्रचंड माया है। वही कृपा करें तो सब शांति हो जाए। उनहीं से है। जी प्रियांंशु सिंह जी जौनपुर से श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी क्या हमारे भाग्य में पूर्व से लिखा है कि हमें कौन से गुरुदेव भगवान से शरणागति मिलेगी और कब मिलेगी या सिर्फ श्री जी के और भाग्य में सिर्फ दो चैप्टर है एक पाप कर्म का फल दुख एक पुण्य कर्म का फल सांसारिक सुख संत मिलना गुरुदेव मिलना धाम आना भजन में प्रीति होना ये सब कृपा कृपा से होता है।

जब द्रवह दीन दयालु राघव तो साधु संगति पाई जिस पर भगवान कृपा कर देते हैं उसे साधु संगति प्राप्त होती है। बिना हरि के संत गुरुदेव मिलना बहुत कठिन है। हरि कृपा करते हैं। अब मोहभा भरोस हनुमंता बिनु हरि कृपा मिले नहीं संता। यह कृपा का क्षेत्र है। एक कर्म का क्षेत्र नहीं कि हमारे कर्म से रचे हुए भाग्य के द्वारा हमें गुरुदेव मिले। नहीं अब हमारे भाग्य सराहनी हो गए क्योंकि भगवान की कृपा से हमें गुरुदेव मिल गए। भाग्य की सराहना तब हुई जब गुरुदेव मिल गए। हमारा भाग्य इतना बड़ा नहीं था कि हम वृंदावन आ सकते हैं।

श्री राधिका कृपा बिनु सबके मनन अगम में किशोरी जी की कृपा के बिना वृंदावन नहीं आया जा सकता। भगवान की कृपा के बिना मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता। भगवान की कृपा के बिना संत जन नहीं मिलते। भगवान की कृपा के बिना सतमार्ग नहीं मिलता। यह सब कृपा से मिलता है। इसीलिए अहतु की कृपा भगवान की जय हो। जिन्होंने मुझे सौभाग्य प्रदान किया। मानो देह दिया, भगवत मार्ग दिया, संत सदगुरु देव दिए। इसीलिए भगवान की हम जय बोलते हैं। भगवान की शरण में है। क्योंकि ये मेरे भाग्य से नहीं ये कृपा से है।

समझ पा रहे हैं आप? स्मृति जी। राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी सादर प्रणाम। महाराज जी मेरा प्रश्न है कि अगर अधिकांश समय राधा नाम का संकीर्तन मानसिक रूप से करते रहे पर दैनिक दिनचर्या की पूजा औपचारिकता ना करें। केवल मानसिक रूप से पूजा करते हुए राधा नाम जप करें तो क्या कोई गलती है? नहीं नहीं बहुत ठीक है। बहुत ठीक है। चलते रहो। बाहरी पूजा क्रिया से सर्वोत्तम पूजा क्रिया मानसिक है। और हर समय भगवान का सुमिरन करते हुए भगवान का चिंतन अंदर करना यह बहुत श्रेष्ठ बात है।

बहुत उत्तम बात है। लगो ऐसे ही लगो अंदर ही अंदर खूब भजन करो। इसी से परम कल्याण हो जाएगा। बाहरी हम पूजा कर रहे हैं और अंदर से संसार का चिंतन हो रहा है तो वह पावरफुल पूजा नहीं हो रही। बाहर से हम पूजा नहीं कर रहे। अंदर से भगवान का चिंतन कर रहे हैं। बड़ा पावरफुल कार्य हो रहा है। यह बात समझना है। खास बात है समस्त बाहरी चेष्टाओं से हमें अंतर्मुख होना है। हमें अंदर चिंतन करना है। जो लाभ मिलता है वो चिंतन का मिलता है। आप जैसे बैठे हैं रामलीला में और चिंतन संसार का हो रहा है तो आपको राम लीला देखने का फल नहीं मिलेगा।

आपको उसका फल मिलेगा जो आप चिंतन कर रहे हैं। ऐसे एक कथा में ऐसे आता है कि दो मित्र थे। एक ने कहा हम तो नौटंकी देखने जा रहे हैं और एक ने कहा हम रामलीला देखने जा रहे हैं। तो जो रामलीला देखने गया उसका चित्त लगा कि यार नौटंकी में बड़ा मजा आता होगा उसको। अब वो पूरी रात इसी बात में रहा कि नौटंकी में क्या-क्या होता होगा। और वो जो नौटंकी में गया उसने कहा दुर्भाग्य है हम रामलीला देखने नहीं गए। भगवान राम कैसे होंगे? लक्ष्मण कैसे हो? उसका चिंतन वह बना। वह बैठा रामलीला में लेकिन उसको फल उसका नहीं मिला।

और वह बैठा नौटंकी में लेकिन फल उसको रामलीला का मिला। तो जो फल की अनुभूति होती है वो चिंतन से होती है। हमारा चिंतन कहां है? अगर हमारा चिंतन भगवान में है और हम सांसारिक कार्य कर रहे हैं तो हम भगवत मार्ग के पथिक है। और यदि हम पूजा कर रहे हैं और चिंतन संसार का है तो भगवत मार्ग के पथिक नहीं। यह बात समझ लो। बाहरी पूजा करना और अंदर से सांसारिकता बनी रहना। आप बाहरी पूजा बिल्कुल नहीं करते लेकिन गंदे आचरण नहीं करते। अपना कर्म करते हैं और नाम जप करते हैं तो आप भगवान को प्राप्त होंगे।

और बाहरी पूजा करें। बढ़िया बात है। भगवान की बाहर और भीतर दोनों जगह पूजा करें। पर केवल बाहरी पूजा कर रहे हैं और सांसारिकता है तो उससे लाभ अंदर का बात है। बात तो अंदर के चिंतन की है। संचित सिंघल जी श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी राधे-राधे महाराज जी आप कह रहे हैं कि आपके दादा जी मतलब विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्र सेवा करते थे और उसके जनक थे मतलब विश्व हिंदू परिषद के ये कह रहे हैं कि जो सेवा कार्य हेतु ईश्वर ने दायित्व दिया है पूर्ण निष्ठा से सेवा भारती का कार्य करते हुए समाज में उन बालकों का पालन करना चाहता हूं पालक बनना चाहता हूं जिनके माता-पिता नहीं है महाराज जी और अधिक से अधिक लोगों को निशुल्क भोजन कराना चाहता हूं मेरे को ऐसा सामर्थ दो और इसके आजकल वृद्धों की और बच्चों की दोनों की दुर्गति हो रही है।

ऐसे 700 बच्चे हमने अभी गोद लिए हुए हैं। हां और आगे भी और बढ़ाना चाहिए। बहुत सुंदर आप ऐसा कीजिए। बिल्कुल कीजिए और जो वृद्ध जन हैं जिनका कोई नहीं है जिन बच्चों को लोग अनाथ मानकर के तिरस्कृत कर देते हैं तो ऐसे भगवान के स्वरूप हैं। इनकी सेवा करने से भगवान की प्रसन्नता प्राप्त होगी और लौकिक ये सब भगवान ही है। सिया राम में सब जग जाने हमको बस अपना कार्य करना है। परोपकार बहुत बड़ा कार्य है। जब हम सुनते हैं कि ये समाज सेवी हैं। ये बूढ़ों की सेवा करते हैं।

ये बच्चों की सेवा करते हैं। ये अनाथों की सेवा करते हैं। तो हमारा मन ललचाता है कि इनको हम क्या दे दें? जिससे इनकी बुद्धि शुद्ध हो और शुद्ध भाव। देखो एक होता है दिखावा। एक होता है ना कि बड़ा भारी पोस्टर, बड़ा भारी दिखावा और उसके पीछे कुछ और हो रहा है। वह चीज नरकगामी है। वास्तविक हम अगर वृद्ध सेवा, बाल सेवा, समाज सेवा कर रहे हैं तो भगवान की सेवा है। अलग से कोई पूजा पाठ करने की जरूरत नहीं। उन वृद्धों में उन बालकों में भगवान ही विराजमान है। खूब नाम जप करो और ईमानदारी से करो।

हम कह रहे हैं आपकी क्षमता यदि 10 वृद्धों की सेवा करने की है तो आप 10 ही रखो 100 मत रखो लेकिन उन 10 की अच्छे से सेवा करो कि वास्तविक सेवा का स्वरूप आए तो आपको भगवान सद्बुद्धि दिए हैं आपको भगवान स्वास्थ्य दिए हैं आप ऐसा करो जितने वृद्ध मिले जितने बालक मिले उन अ नाथों की सेवा करना दीनाना की सेवा है भगवान की सेवा बहुत अच्छा बहुत अच्छा है महाराज जी इस सवाल मैं एक बात कहना चाहता हूं कि जैसे उन्होंने कहा कि माता-पिता से हम अनुमति चाह रहे हैं यदि किसी कार्य को करने के लिए जी और वो ना मिले तो मैं ऐसे पिछले दो वर्षों से अपने माता-पिता से एक अनुमति चाहता हूं।

मेरी धर्मपत्नी भी यहां मौजूद है। जी और मैं राष्ट्रभक्ति के कार्य में और जो बच्चों के कार्य में लगा हूं तो मैं जगह-जगह जाकर ऐसे बच्चों को तलाश करके लाता हूं। बस्तियों में जाकर और उनके साथ में हमें पूरा समय अगर चाहिए होता है तो मैं चाहता हूं कि मुझे राष्ट्रभक्ति और बच्चों के समर्थन के लिए पूर्ण समय सहयोग दे दिया जाए और मैं परिवार से अलग रहकर भी उस कार्य को करूं समय-समय पर परिवार में भी आकर तो उसके लिए मुझे अनुमति माता-पिता से और मेरी धर्मपत्नी से नहीं मिल पा रही।

हां पर इनको भी आपके सानिध्य की जरूरत है। जैसे समाज को जरूरत है ऐसे इनका भी अधिकार है। इनको भी आपके सानिध्य की जरूरत है। तो आप इनकी भी सानिध्य की पूर्ति करते हुए समाज सेवा कीजिए ना कि इनके ये अगर अधूरे रह गए तो एक पक्ष अधूरा रह जाएगा। आप परोपकार रूपी पक्ष तो पूरा कर रहे हैं लेकिन अपने निज धर्म रूपी कर्तव्य को छोड़ रहे हैं। आपके जैसे पत्नी है उसका पोषण करना। आपके जैसे माता-पिता हैं उनकी आज्ञा का पालन करके उनको सुख देना यह एक पक्ष है। इस पक्ष को संभालते हुए उस पक्ष को कीजिए।

यही आपकी बुद्धिमानी रहेगी। राकेश कुमार वर्मा जी गुरुग्राम से जय जय श्री राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपने बताया था कि जब कलयुग से ब्रह्मा जी ने पूछा कि आपके युग में प्राणियों की क्या गति होगी? तो उन्होंने बोला कि मैं तो हाउसफुल ही रखूंगा ऐसा-ऐसा करके। तो महाराज जी पिछले कुछ समय से बहुत जनसंख्या बढ़ रही है तो क्या उधर हाउसफुल हो गया क्या? नहीं जनसंख्या बढ़ने का क्रम होता है। आप थोड़ी सी जगह में देखो लाखों दीमक हैं। छोटी सी जगह में लाखों दीमक मिलेगी ना और वो लाखों जब मनुष्य रूप में आएंगे तो प्रदेश बस जाएगा।

बस जाएगा कि नहीं बस जाएगा? तो ऐसे अन्य जीवों का ट्रांसफर होता रहता है। जैसे अन्य जीव हैं बहुत छोटे-छोटे जीवाणु है। अब उनको मनुष्य बनाया गया तो मनुष्य का तो एक घेरा होता है। एक घर होता है एक तो वही बढ़ोतरी होती चली जा रही है। और जब विनाश लीला होगी तो मिनट में समिट जाएंगे ये सब। इतने लोग हैं बूढ़े हैं या जवान है। वो क्या अभी यहां पर अभी वो भागवती कानून तो अभी लागू नहीं हुआ। अभी तो जैसे आप बोलते हैं कि पुलिस स्टेशन में डंडे लग रहे हैं। जी उसके बाद में अभी ऊपर जाके नरक में अलग भागवती कानून लगेगा।

तो ये लोग सब इंतजार कर रहे हैं। हां अगर भजन नहीं कर रहे और पापाचरण कर रहे तो इनकी आयु जितनी दी गई थी शुरू में उतनी आयु तक इनको दे भोगना पड़ेगा और फिर जाकर के वहां हिसाब तो वहां होता है। सारे बूढ़े हैं। दवाइयां खा के जी रहे हैं। लेकिन 20 साल जीना है। हां तो हां तो जीना पड़ेगा। जीना पड़ेगा। अगर वह भजन कर ले तो बच जाए। जितने बूढ़े हैं या जवान हैं क्या पता हम लोग बूढ़े हो कि ना हो बीच में मर जाए। मृत्यु लोक तो बड़ी भयावह है। बड़ी भयावह है। इसलिए हमें नाम जप करना चाहिए जिससे हमारे पूर्व पाप नष्ट हो जाए और हमें नरक ना जाना पड़े।

नरक बहुत बड़ा यंत्रणा ग्रह है। बहुत बड़ा यंत्रणा ग्रह है। जैसे दुनिया में हम रहते हैं। हमें ऐसे लगता है कि मुश्किल से 5 से 10% भगवान का नाम ले रहे हैं। हां। बाकी 80% लोग जो है वो नरक में फुल हो चुका है वहां इसलिए नहीं नरक इतना बड़ा वो फूल कभी नहीं होता है अच्छा वहां इतना बड़ा देह थोड़ी मिलता है छोटा सा मिलता है भोगना पड़ता है यातना देह उसे अब भोगना पड़ता है जैसे एक केचुआ में है 100 चींटी लिपटी हुई है अब सोचो एक चींटी अपने इतने बड़े शरीर में काटती है तो अपने को परेशानी महसूस होने लगती है और वह 100 चींटी उसके कोमल शरीर को वो नरक ही तो भोग रहा है।

नरक ही तो भोग रहा है। बड़ी योनिया है। बड़े तो इसलिए बहुत अंगुल मास्ट मात्र का शरीर और भोग भोगने होते हैं। अति प्रिय दया सिंधु दास जी राधे-राधे महाराज राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जिस प्रकार देखने में आता है कि आजकल भौतिक संसार में विशेष रूप से युवा युवती जो हैं वह सब आधुनिकता में फंसे जा रहे हैं। अगर उनको शास्त्र या ग्रंथों के बारे में बताते हैं या पढ़ाने को बोलते हैं तो वह इंकार कर देते हैं महाराज जी परंतु वे मूवी देखना ये सब व्यस्त रहते हैं महाराज जी इसको देखते हुए हमारे कुछ भक्तों ने भागवत श्रीमद् भागवतम के आधार पर एक विशेष मूवी को एक प्रदर्शनी के रूप में बनाया है और प्रयास किया है कि जो युवा गंदा चलचित्र देखते हैं उस सिनेमा में जाते हैं।

अच्छा प्रयास है। अच्छा प्रयास है। पर हम आपको आंतरिक रहस्य की बात बताएं कि संसार का परिवर्तन कैसे हो सकता है? जब हम एकांत में डट के भजन करेंगे और हम कस के तपस्या पूर्वक जीवन व्यतीत करेंगे और फिर हम कहेंगे सर्वे भवंतु सुखिना सर्वे संतु निरामया सर्वे भद्राण पश्यंतु मा कश्चित दुख भाग भवेत बिल्कुल गोली जैसा काम करेगा देखो मूवी तो रामानंद सागर जी ने बहुत अच्छा प्रयास करके रामचरितमानस का दर्शन कराया बी आर चोपड़ा ने महा महाभारत का बहुत अच्छा मतलब बहुत अच्छा प्रशंसनीय क्योंकि शास्त्र सम्मत उन्होंने दिखाने की कोशिश की थोड़ी देर के लिए हमारा मन भावुक हो सकता है

लेकिन वास्तविक हमारे मन का जो कलमश है जो पाप भाव है जो हमारी गलत बातें हैं वो हम तपस्या से दूर होती है जब कोई तपस्या करेगा भजन करेगा और फिर संसार को देगा संसार का मंगल हो वो परिवर्तन होगा वो गोली जैसा काम करेगा एकदम दिमाग अरे नहीं मैं ऐसा नहीं करूंगा आज तक किया अब नहीं करूंगा संत वाणी का यही प्रभाव होता है क्योंकि वो जीवन तप में भजन में जीवन किया गया उससे यह अच्छा प्रयास है समाज को सतार्ग में लाने का अच्छा प्रयास है पर परिवर्तन होगा आपके भजन से जब आप डट के भजन करोगे देखो आचार्यों का जो दिया हुआ नाम मंत्र है ना उसमें हमें सिद्ध करने की जरूरत नहीं वह सिद्ध है बस उसका गान करना बस उसका जप करना है।

तुम्हें छू लेगा कोई उसका परिवर्तन हो जाएगा। तुम्हें देख लेगा कोई उसका परिवर्तन हो जाएगा। तुम बोल दोगे उससे परिवर्तन हो जाएगा। क्योंकि तुम्हारे पास भजन है। अगर भजन नहीं है तो मुझे लगता है कि हमारा प्रयास थोड़ी देर के लिए तो सफल हो सकता है। लेकिन स्थाई परिवर्तन नहीं आ सकता। स्थाई परिवर्तन भजन से आएगा। जी जैसे महाराज जी छोटे बच्चे होते हैं आजकल सोशल मीडिया का टाइम है तो बच्चे बहुत ज्यादा इन्वॉल्व रहते हैं Instagram YouTube वगैरह में तो वो बचपन से ही गलत चीजें देखते हैं तो उसी तरह का उनका चेतना डेवलप होता है तो क्या ये मूवी जो हम हमारे एक भक्त ने बनाई है तो जैसे उसमें प्रह्लाद महाराज का वर्णन किया है उनकी भक्ति के बारे में बताया है तो अगर बच्चे उसको देखेंगे बचपन से ही तो कुछ उनकी चेतना हमें असल बात क्या है कि मूवी देखने तक पहुंचने के पहले ही उनका गलत बच्चों से संग होता है स्कूल में तो उनके संस्कार ऐसे बन जाते हैं कि अगर देखेंगे भी ना थोड़ी देर तो रजोगुणात्मक वृत्ति से देखेंगे उसे सतोगुण की वृत्ति तो आ नहीं पाई अब बच्चे खानेपीने में सात्विक वस्तुओं का सेवन शायद ही करते हो अगर ये चीजें खाई जाएंगी तो ना नाम में प्रीति होगी ना भगवत लीलाओं के दर्शन में प्रीति होगी दर्शन कर लेना और उसमें प्रीति होना देखो देखो दर्शन तो दुर्योधन भी भगवान श्री कृष्ण के कर रहा है।

क्या भगवान श्री कृष्ण में उसकी प्रीति है? वो भगवान से स्पष्ट कहता है कि मुझे धर्म का ज्ञान है पर मेरी रति नहीं और मुझे अधर्म का ज्ञान है पर उसमें रति है। तो जैसे वो साक्षात हम तो भगवान की लीला का अनुकरण करेंगे। वो तो साक्षात भगवान को देख रहा है लेकिन घोर तमोगुणी स्वभाव होने के कारण उसकी भजन वृत्ति ना होने के कारण वो भगवान में प्रीति नहीं कर पा रहा है तो जब तक हम घरघर जाकर के बिल्कुल प्रयास या हमारे तपोबल से हमारी वाणी जाकर के उनको जगाएगी नहीं भजन बल से जगाया जाता है एक बात पक्की गांठ बांध लो नाम में वो बल है कि हम 1000 नाम जप किए इन भाई को दे दिए इनका परिवर्तन पक्का हो जाएगा पक्का हो जाएगा।

तो जब हम ऐसे बने कि भूख, प्यास, गर्मी, सर्दी सह कर खूब नाम जप कर रहे हैं और हम अपने प्रदेश को, अपने देश को, अपने परिवार को, अपने मोहल्ले को मंगलमय बनाना शुरू करें। एक एक तो सबका मंगल हो जाएगा और यह बहुत अच्छा प्रयास है। इससे काफी परिवर्तन भावात्मक पड़ेगा। लेकिन स्थाई परिवर्तन नाम से पड़ेगा। भगवान महाप्रभु कृष्ण चैतन्य देव जी ने कहा जीवे दया नामे रुचि वैष्णो सेवा इससे बढ़कर के कुछ नहीं है स्वयं उनके वो भगवान है नामे रुचि वैष्णो सेवा और जीवे दया ये दो हमारे पास होंगे ना तो तीसरा पूर्ण हो पाएगा नामे रुचि और वैष्णव सेवा ये बल है हमारा और जीवे दया यह परोपकार है तो ये दो चीजें होना बहुत अनिवार्य है।

नाम में रुचि होना और वैष्णव सेवा होना। जी जब भक्ति वेदांत स्वामी प्रभुपाद ने जो ईस्ट के संस्थापक आचार्य अमेरिका गए थे तो वहां टमकिन स्क्वायर बाइक में बैठ के हरि नाम कीर्तन ही किया। क्या हुआ? देखो एक भारतीय महात्मा ने नाम के बल से लाखों विदेशियों का परिवर्तन कर दिया। लाखों विदेशियों का। एक दो का नहीं। जो जानते ही नहीं थे कि रामकृष्ण हरी क्या होता है। जिनका कोई परिचय नहीं था वो आज बहुत बड़ा सौभाग्य है कि हमारे देश के ऋषि हमारे देश के महात्मा इतने पावरफुल है कि ऐसे जनों को जिनके अंदर केवल भोग वृत्ति केवल भोग वृत्ति के सिवा और कोई वृत्ति ही नहीं थी।

उनका परिवर्तन कर दिया। उनको हरे कृष्ण बुला दिया जो अफीम खाने वाले ड्रग्स पी ले। उनसे हरि बोल बुलवा दिया। उनसे उनको नचा दिया नाम जो भगवान का कृष्ण नाम है हरे नाम है राम नाम है नचा दिया सब और आज भी बहुत अधिक मात्रा में विदेशियों का समुदाय हरे कृष्ण नाम मंत्र से खूब झूमता है बड़ा सुख मिलता है जी छोटा सा महाराज जी हमने प्रभुपाद जी के दर्शन नहीं किए कभी भी लेकिन उनका गुणगान सुनाया कि उन्होंने किस प्रकार प्रचार किया लेकिन हां हम आज देख सकते हैं कि नाम की महिमा में कितनी शक्ति है वो साक्षात आप जो है उसको कर दिखा रहे हैं तो आप भी जो है हमारे लिए उसी समान है।

नहीं हम तो आप सब वैष्णवों के चरण रज के बल से हम तो बीमार आदमी किडनी फेल किसका हो गया प्रभुपाद जी तो विदेश गए आपने वृंदावन में बैठकर के पूरे संसार को जो है इस मार्ग में लगाया है तो ये बहुत बड़ी बात है महाराज आप सब संत आप आशीर्वाद दीजिए हम भी जो है थोड़ा आपके आपके अंदर जितना भी जो है 1% हमारे अंदर नाम की श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी दृढ़ भरोसा ना होने के अक्सर चूक हो जाती है। हर छोटी बात श्री जी का आश्रय लेने का प्रयास करते हैं। पर जिसके कारण जलन होती है।

महाराज जी इनका कहने का भाव है कि माता-पिता जरूरत पड़ने पर उनका सहयोग लेना पड़ता है। तो ये भगवत आश्रय में बाधा तो नहीं है। नहीं माता-पिता भी तो भगवान है। मातृ देवो भव पितृ देवो भव मातापिता यदि माता-पिता भगवान से विमुख हो गंदे आचरण वाले हो और आपका भगवत मार्ग का विरोध कर रहे हो तो फिर नहीं लेना चाहिए। जाके प्रिय न राम वैदेह तजिए ताह कोटि बैरीशम यद्यपि परम सनेह जो भगवान का विरोध करने वाले हो फिर ऐसे माता-पिता का सहयोग नहीं लेना चाहिए नहीं तो मातृ देवो भव पितृ देवो भव माता-पिता साक्षात भगवान का स्वरूप है महाराज जी इनका एक और प्रश्न था कि घर में जैसे अगर माता-पिता रोकते हैं महाराज जी हर चीज के लिए मतलब विरोध करते हैं तो महाराज जी कृपया मार्गदर्शन करें उन चीजों में उन चीजों में बुरे आचरणों के लिए माता-पिता जी रोकते हैं तो उनका कर्तव्य है यदि अच्छे आचरणों के लिए रोकते भक्ति मार्ग पे ना दृढ़ हो इसके लिए रोकते हैं तो ऐसे में तो फिर और क्या करेंगे गर्लफ्रेंड बनाएंगे बॉयफ्रेंड बनाएंगे गंदे आचरण करेंगे भक्ति मार्ग ही तो सिखाता है संयम से चलना अगर आप ब्रह्मचर्य से नहीं रहेंगे अच्छे आचरण नहीं करेंगे तो बुरे आचरण करेंगे पीयूष शर्मा जी राधे-राधे महाराज राधे-राधे महाराज महाराज जी मैं अपने माता-पिता का अकेला पुत्र हूं और उनकी निरंतर सेवा करना चाहता हूं।

साथ ही साथ मुझे गुरु और संतों की रहनी तथा उनका प्रेम और दुलार भी चाहिए। महाराज जी ऐसे में दोनों में कैसे क्यों नहीं हो सकता? घर गृहस्ती में रह के अपने माता-पिता की सेवा करते हुए सच्चे आचरण से चलो। गृहस्ती में रहते हुए केवल अपनी पत्नी से प्रेम करो। काम भाव किसी दूसरी स्त्री से ना करो। कोई नशा ना करो। किसी की चोरी हिंसा ना करो। बढ़िया महात्मा हो। घर में रहते हुए महात्मा हो। महात्मा का मतलब केवल लाल पीला कपड़ा पहन लेना थोड़ी होता है। आचरण होते हैं। अगर आचरण नहीं है तो काल नेम ही है।

कालनेम ने भी तो साधु रूप धारण किया। जिसके जीवन में आचरण सही नहीं है। जिसका उद्देश्य सही नहीं है, जो पवित्र नहीं है, तो फायदा क्या? पट शर्ट में रहता है लेकिन अपनी पत्नी से केवल अनुराग रखता है। समस्त जगत की स्त्रियों के प्रति काम भाव नहीं। अपनी कमाई पर विश्वास रखता है। वो किसी दूसरे के धन को नहीं छूता। नाम जप करता है। परिवार की सेवा करता है। वो महात्मा ही है। वो महात्मा ही है। गृहस्थ में रहते हुए वो महात्मा है। और महाराज जी साधु संतों का सेवा सेवा करने के लिए धाम आदि आना पड़ेगा या जैसे भी कर अब तो साधु संत मिलना बहुत कठिन है।

पहले तो गांव में भ्रमण करते हुए आ भी जाते थे। अब तो ऐसा कलिकाल चल पड़ा है कि साधु महात्माओं को लोग मार डालते हैं। नहीं पालघर में नहीं मार डाला था कि चोर बच्चा चोर करके मार डाला तीन लोगों को तो भ्रमण लायक तो समय नहीं रह गया अपने लोग तो गंगा किनारे भ्रमण करते रहे पूरा जीवन व्यतीत हो गया लेकिन अब समय नहीं रह गया है कि कोई जवान साधु अकेले घूम रहा है किसी गांव में भिक्षा मांग रहा है ऐसा तो साधु संतों की सेवा कैसे की जाए महाराज जी इसका जब भाव शास्त्रों में वर्णित आता है गुरुजनों के श्री मुख से सुनते हैं तो भावता है कभी यदि अर्थ बढ़े तो पूरी ियों में धामों में संत जन निवास करते हैं।

चाहे उनको भोजन पवा दे, वस्त्र आदि की सेवा कर दे। क्योंकि अब संत मिलना भी तो कठिन है। संत मिल जाए तो है नहीं तो संत मिलना कठिन बात है। जिसने भगवान के चरणारविंद में अपनी चित्तवृत्ति जोड़ ली। समस्त कामनाएं शांत हो गई। जो ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा सोचका ऐसे एक संत का सेवन हो जाए ना तो लाखों भंडारे के बराबर है। एक संत का वो एक टुकड़ा पाले तो लाखों भंडारे का पुण्य एक तरफ और ऐसे संत का पाना एक तरफ तो वो एक एक कहां ढूंढे महाराज जी अब भगवान ही मिलाएंगे बिनु हरि कृपा मिले नहीं संता अब मोहि भाव भरोस हनुमंता बिनु हरि कृपा मिले नहीं संता जो प्रभु मोहि अनुग्रह कीना तो तुम्हारी दरसठ दिन जब भगवान कृपा करेंगे तो संत मिल जाएंगे।

संत सेवा का फल है सीधा भगवत प्राप्ति। इसीलिए देवर्षि नारद जी ने अपने सूत्रों में लिखा है महा संगस्त दुर्लभो महापुरुषों का संग मिलना दुर्लभ। फिर लिखा अगम्यो उनका निर्वाह कर पाना कठिन। अगर निर्वाह कर ले गए अमोघस निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी। संत मिलन का मतलब होता है जन्म आखिरी हमारा। क्योंकि अब संत मिल गए। अब उनका दर्शन उनका संभाषण उनके उपदेश वो हमारे मायामल का नाश करके भगवान की प्राप्ति करा दे जी आपने कहा कि उनका निर्वाह कर पाना कठिन महाराज इसका निर्वाह कर पाना मतलब उनकी आज्ञा उनकी आज्ञा पर चल पाना कठिन है अब जैसे कोई संत मिले आज के बाद तुम शराब नहीं पियोगे मांस नहीं खाओगे परा स्त्री की तरफ गंदी दृष्टि नहीं रखोगे आप दूसरे का धन अपहरण नहीं करोगे अब ये बात मान लो तो मानना कठिन है संतों की आज्ञा पर चलना कठिन है और यदि यदि चल गए तो आनंद ही आनंद है।

संत मिलना बहुत कठिन है। धन के लिए, सम्मान के लिए, भोजन के लिए, वस्त्र के लिए तो लाखों मिल जाएंगे। लेकिन भगवान के लिए जिन्होंने जीवन अर्पित किया है वो मिलना कठिन है। रुपए के लिए भष धारण कर लेना। अब तो बहुत समस्याएं हैं कि संत को मिलना और पहचानना बड़ा कठिन है। जो धर्म विरुद्ध आचरण करें, जो धन की आकांक्षा रखे, जो शरीर मान की आकांक्षा रखे, वो संत है। सवाल नहीं उठता। संत तो बहुत अलग चीज होते हैं। पर भगवान की कृपा से संतों का मिलन होता है। सबसे सरल पहचान संतों की है।

जिनके पास बैठने से दुर्वासना का नाश होने लगे। जिनके दर्शन से हृदय में शांति मिलने लगे। और जिनके पास बैठने से हमारे हृदय में भगवान से प्यार उत्पन्न होने लगे। यही बाहरी लक्षण संतों का है और तो शास्त्रीय लक्षण तो बड़े दिव्य दिव्य है। निर्माण मोहा जित संग दोषा अध्यात्म नित्या विनिवत्त कामा द्वंद विमुक्त सुखदख संग संत कभी ऐसे मांगते हैं कभी नहीं मर जाएगा लेकिन ऐसे नहीं करेगा रुपए के लिए रोटी के लिए आज्ञा है भिक्षम औषधम शास्त्रों में आदेश किया गया छुद व्याधि चिकित्सताम छुधा रूपी व्याधि की चिकित्सा के लिए बैरागी संत पांच घरों में दरवाजे के बाहर से एक एक रोटी मांगकर अपने उदर का पोषण करें।

इतना तो आदेश है लेकिन रुपया के लिए हाथ पसार दे। यह हमारे सिद्धांत में संतों के सिद्धांत में नहीं और यदि ऐसा है तो वह संत नहीं है। अध्यात्म कभी बिकता नहीं और जो बिकता है वो अध्यात्म होता नहीं। अध्यात्म का नाटक होता है। कभी ऐसा नहीं। 888000 ऋषि एक साथ बैठकर के कथा सुन रहे हैं। श्री सूत जी कथा सुना रहे हैं। शौनक जी 88000 ऋषि बैठकर के सुन रहे हैं। सबका भरण पोषण हो रहा है। सब कहीं कोई याचना शब्द नहीं रखा गया। कहीं अध्यात्म में कहीं याचना शब्द नहीं रखा गया।

हां गुरुकुल में भर्ती हुए। गुरुकुल की पूरी शिक्षा हो गई। अब गुरु दक्षिणा के लिए उन्होंने गुरु से प्रार्थना की। गुरु जी ने जो आदेश कर दिया उसका पालन किया। आदेश ही गुरु दक्षिणा होती थी। कहा ऐसा कभी यह कभी यह कभी नहीं संत कभी ऐसे नहीं अगर ऐसे है तो सच्चाई पे है सच्चाई पे नहीं सच्चाई पे जो होता है लुटता है वैभव उसके चरणों में क्योंकि महा वैभव पति भगवान का चित्त में चिंतन कर रहा है चाहे वो भिक्षा मांगते हुए नजर आवे चाहे वो राजा महाराजा की तरह रह रहा हो दोनों में समान अमरीश जी चक्रवर्ती सम्राट है और महान भगवान के भक्त हैं ज्ञानी ियों में श्री सुखदेव जी के गुरु हैं।

जनक जी और राजा हैं। तो यह नहीं है कि वो केवल भिक्षुक रूप में ही हो। वो एक राजा रूप में भी परम ज्ञानी महात्मा हो सकता है और भिक्षुक रूप में भी कपट हो सकता है। इसलिए भगवान ही मिलावे तो संत मिलन हुए नहीं तो संत मिलन अति जैसे धाम की महिमा सुनते हैं, संतों की महिमा सुनते हैं तो जो गृहस्थ जन होते हैं वो दर्शन के लिए आते हैं धाम आदि में तो वहां जब क्योंकि वेश देखा अगर दोष दृष्टि रखते हैं तो फिर गड़बड़ हो जाती है महाराज जी अगर वो एक को ढूंढने चले तो वो एक मिलेंगे ही नहीं मतलब अगर इसीलिए भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि मुझे संत मिला दो।

जब द्रव दीन दयालु राघवो तो साधु संगति पाए। भगवान जब कृपा करते हैं तो संतों से मिलन हो। भगवान से वो तो जानते हैं ना कौन उनका निजी जन है तो भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे भगवान यदि संतों के ही मिलन से कल्याण होता है तो आप हमें संतों का संग करा दीजिए जिनके संग से हमारा कल्याण हो हमारे अज्ञान का नाश हो जिनकी सेवा से हमें भगवत प्राप्ति हो ऐसे संतों का दर्शन करा दीजिए आप सभी राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा आ

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

संबंधित