गृहस्थ और सन्यासी में श्रेष्ठ कौन है?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
गौरव मित्तल जी अजमेर से राधे-राधे गुरु जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी सन्यासी सब कुछ त्याग देता है घर परिवार वस्त्र मोह और भक्ति में लीन रहता है लेकिन एक भक्त अपने जीवन परिवार और कर्तव्यों के बीच में रहते हुए भगवान को याद करता है कौन बड़ा है दो मार्ग है बड़े छोटे का नहीं है इसमें कोई बड़े छोटे का नहीं है दो मार्ग एक है निवृत्ति मार्ग एक है प्रवृत्ति मार्ग दोनों मार्ग भगवान तक जाते हैं जैसे बिहारी जी के दो मार्ग है एक आप सीधे पकड़ो अटल्ला चुंगी होती जाओ एक परिक्रमा मार्ग साथ जाओगे तो बिहारी जी कौन बड़ा छोटा रहा मार्ग है दो मार्ग हैं अपने अपने धर्म से चलो अपनेप मार्ग से चलो और प्राप्ति उसी परमात्मा की होनी पर ऐसा नहीं कि गृहस्थ होकर व्यभचार करो नशा करो बेईमानी करो गंदे आचरण करो बोलो गृहस्थ है भगवत प्राप्ति हो जाएगी नरक में डंडा चलेंगे भगवत प्राप्ति तो नहीं होगी ऐसा नहीं कि बाबा जी बन गए हो मनमानी तुम आचरण कर रहे हो खूब रुपया पैसा दुनिया संसार नरक में जाओगे हर शिष्य धन सोक ना हर सो गुरु
घोर नरक मा पर चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त अपने अपने धर्मानुसार चले और भगवान का भजन करें और समाज की सेवा करें चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त तब वो भगवान की कृपा को प्राप्त होता है और जब भगवान मिलते हैं तो पूरे के पूरे मिलते हैं जैसे एक सन्यासी को मिलते हैं ऐसे गृहस्थ को मिलते हैं पर अपने अपने धर्म से चले चले अधर्म से चलने वाले में दोनों को नहीं मिलेंगे। धर्म से चले तो जो धर्म से चले वही बड़ा चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो। बात समझ रहे हैं? महाराज जी धर्म की सेवा कैसे करें?
धर्म की सेवा धर्म का आदेश होता है। आज्ञा का पालन करना ही शास्त्र आज्ञा का पालन जो धर्म है वो शास्त्र आज्ञा है। संत आज्ञा है। जो भगवत प्राप्त महापुरुष है उनकी जो वाणी है वो आज्ञा है। उसका हम पालन करें वो धर्म का पालन हो जाएगा। उनकी आज्ञा के विरुद्ध चलना अधर्म है और उनकी आज्ञा का पालन करना धर्म है।
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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