एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #995 · 8 अगस्त 2025
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की जय समस्त संत हरि भक्तन की जय श्री वृंदावन धाम की जय सदगुरुदेव भगवान की जय अर्जुन कसाना जी महाराज जी किसी वस्तु से यदि मोह ज्यादा हो जाए तो उसे कंट्रोल कैसे करें भगवान से प्रार्थना करने पर जब हम कहीं आसक्त हो जाते हैं किसी वस्तु व्यक्ति व्यसन स्थान तो हमें सामर्थ्य की जरूरत होती है।
तो भगवान से प्रार्थना करें कि हमारी बुद्धि में ऐसा ज्ञान प्रदान करें जिससे हम मोहासक्त चित्त को बुद्धि को हटा सके और आप में लगा सके। इसलिए नाम जप करें और भगवान से प्रार्थना करें। भगवान से प्रार्थना करने से सामर्थ्य मिलती है और नाम जप मन बुद्धि को वहां से हटने पर स्थान तो मिलना चाहिए। हम कोई वस्तु अगर इस से अपना मन हटाना चाहते हैं तो लगाएं कहां? अगर इस वस्तु से हटा इस वस्तु में तो बात तो बराबर हो गई। तो वस्तु व्यक्ति स्थान से हटाकर भगवान के नाम में लगाएं और हटाने की सामर्थ्य भगवान से मांगे।
भगवान विवेक दे देंगे, ज्ञान दे देंगे। वो बड़े कृपालु हैं। प्रार्थना कीजिए और नाम जप कीजिए। दो काम कीजिए जिससे हमारा मोहाशक्त चित्त या मन या बुद्धि भगवान में लगकर परमानंदमय हो जाए। नहीं तो यह मोह ही बार-बार जन्म मरण का चक्र बुनता रहता है। हिरण से मोह हो गया। भरत जी को तो अगला जन्म हिरण का होना पड़ा। इसलिए अगर हमारा जिस व्यक्ति वस्तु स्थान से मोह हो जाएगा वो हमारे नए जन्म का हेतु बन जाएगा। जैसे मकान से मोह हो जाए तो छिपकली बनना पड़ेगा। उसी मकान में चिप के घूमो।
धन से मोह हो जाएगा, सर्प बनना पड़ेगा। स्त्री से मोह हो जाएगा, स्त्री बनना पड़ेगा। हमारा जहां मोह हो जाएगा, अंतिम समय जो चिंतन होगा, वही हमें मिलेगा। इसलिए हम भगवान से प्यार करें। भगवान का नाम जप करें। भगवान से प्रार्थना करें कि हमारा मन संसार में ना आसक्त होकर आप में आसक्त हो। शुभम जी श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी कुछ दिन तो दिनचर्या सही चलती है पर आलस्य व प्रमाद के कारण एक तार नहीं चल पाती दिनचर्या कभी ना टूटे महाराज जी इसके लिए क्या करना होता है इसमें ब्रह्मचर्य की कमी और आहार की अशुद्धि इन दो से दिनचर्या पे फर्क पड़ता है अन्यथा नहीं पड़ता महाराज जी जैसे पिताजी का कार्य कहीं बाहर जाते हैं तो उनके साथ चले जाते हैं तो उस हिसाब से कभी लेट आना होता है तो फिर लेट सोना होता है तो उस वजह से आहार आहार अगर पवित्र रहेगा ना तो हम लोग जैसे रात-रात भर भी नहीं सोते तो अपनी दिनचर्या में कमी नहीं होगी।
ब्रह्मचर्य की अगर वृत्ति ठीक है और आहार शुद्ध है तो सोना ना सोना उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। दिन में घंटा भर सो लिए तो रात्रि की अपनी दिनचर्या पूरी कर ली। जैसे महाराज जी पिताजी का कार्य ऐसा है कि कभी 3:00 बजे आते हैं कभी 1:00 बजे या कभी सुबह का कार्य होता है तो जल्दी जा तो हमें अपनी दिनचर्या पे फर्क नहीं पड़ना चाहिए। 3:00 बजे आए हम छ घंटे सो लिए छ घंटे सो लिए छ घंटा सोना होता ना 9:00 बजे उठे अब हमारा 9:00 बजे से प्रातः कालीन दिनचर्या शुरू हो जाएगी फिर महाराज जी वो मन पूरा कह देता है कि वाह चलो अब तो आज तो काम करके आए हैं आज थोड़ा नहीं नहीं यही यही मन को ठीक करने के लिए ब्रह्मचर्य और भोजन हमारी बात पर ध्यान दीजिए ब्रह्मचर्य और आहार शुद्ध है तो आपकी दिनचर्या ठीक चलती रहेगी और ब्रह्मचर्य ठीक ठीक नहीं आहार शुद्ध नहीं तो प्रमाद स्थिति आ जाएगी और आपकी दिनचर्या बाधित हो जाएगी।
शिल्पा शर्मा जी उज्जैन से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी नए साधक की ऐसी क्या दिनचर्या होनी चाहिए जिससे गस्त कार्य के साथ-साथ भक्ति के मार्ग पर भी चल सके जिससे भक्ति में कोई बाधा पहली बात नाम को पकड़े नाम को दूसरी बात व्यभचार को त्यागे अगर पराई माता बहनों की तरह या पराए पुरुष की तरफ गंदी दृष्टि है और आप गृहस्ती में है और गंदे आचरण करते हैं तो भूल जाओ कि आप अध्यात्म में चल पाओगे। पापवंत कर सहज सुभाव भजन मोर ते भाव न काऊ जो पे दुष्ट हृदय सोई मोरे सनुख आ सोए अगर आप गंदे आचरण करोगे पाप आचरण करोगे तो भगवान का भजन नहीं बनेगा बातें भले भगवान की कर लो आप भगवान के मार्ग में नहीं चल सकते तो पहले हमको चाहिए कि नाम जप करके नाम जप के प्रभाव से पापाचरण का त्याग करें जो अधर्म आचरण है जो पाप आचरण है उनका त्याग करें और नाम जप करें और जो हमें कर्तव्य मिला है वह भगवान की पूजा मान करके करें तो गृहस्थी में रहते हुए भी भगवान की प्राप्ति हो जाएगी।
गृहस्ती में रहकर जो पापाचरण होते हैं उनके कारण फिर भगवत प्राप्ति में बाधा पड़ जाती है और गृहस्ती में नाना प्रकार के कार्य होते हैं। इसलिए हमारा मन उसमें बटता है तो भगवान का भजन नहीं होता और गृहस्ती में धन की विशेष आवश्यकता होती है। इसलिए लोभ बढ़ जाने के कारण हम कुछ ऐसे कर्म कर बैठते हैं जो नहीं करने चाहिए। इन्हीं के कारण भगवान की कृपा से हम वंचित रह जाते हैं। नहीं गृहस्थ धर्म सबसे बड़ा धर्म है। देखो विरक्त जैसे अपने लोग हैं ना पैदा कहां हुए? गृहस्थों के यहां तो पैदा हुए आकाश से थोड़ी पैदा हुए।
गृहस्थ धर्मावलंबी किसी ना किसी गृहस्थ से हमारे माता-पिता गृहस्थ ही तो थे। अच्छा हमारे वस्त्र कहां से मिल रहे हैं? गृहस्थों से। हमारा भोजन कहां से चल रहा है? गृहस्थों से। गृहस्थ आश्रम पशु पक्षी विरक्त सबका पोषण करते हुए अगर वह भजन कर रहा है तो बहुत जल्दी भगवत कृपा पर गृहस्ती में ऐसे पाप होते हैं जो मानते ही नहीं कि हमसे पाप हो रहे हैं। जैसे गर्भ हत्या बड़ा भारी पाप है। भ्रूण हत्या बड़ा भारी पाप है। पराई स्त्री से व्यभचार करना या पराए पुरुष से व्यभचार करना बड़ा पाप है।
पतिवंचक परपति रति कर रौ नरक कल्प सत परई 100 कल्प तक ररो नर्क में उस स्त्री को जाना होता है जो अपने पति का त्याग करके दूसरे पुरुष मतलब पति को धोखा देकर दूसरे पुरुष से संभोग करती है या जो अपनी पत्नी को धोखा देकर दूसरी स्त्री से संभोग तो यह कुछ जो गलतियां हैं अगर हम इन गलतियों को सुधार लें और नाम जप करें और अपने कर्तव्य को ही पूजा समझे तो अलग से अगरबत्ती ना जलाओ अलग से आप आरती धूप बत्ती ना करो तो भी भगवान की प्रसन्नता आपको प्राप्त हो जाएगी। नाम जप करो और पापाचरण का त्याग करो तो नए साधक का सबका जीवन मंगलमय हो जाएगा।
प्रशांत कुमार जी राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जब हमारा मन विचलित होता है व्यापार या पारिवारिक या अन्य कारणों से तो हम अपने पास गंगा जी के श्मशान घाट पर जाते हैं और वहां चिताओं को जलते देखते हैं तो मन शांत हो जाता है महाराज ऐसा क्यों क्योंकि उस समय वैराग्य होता है। हमारी बुद्धि जब देखती है कि अंतिम निर्णय यह है तब लगता है सब बेकार है यार। अंतिम निर्णय जब देखते हैं इसी से तो महात्मा बुद्ध जी को वैराग्य हुआ था। जब उन्होंने देखा 100 तो उसको रुकवाया और कहा यह क्या है?
बोले मनुष्य ही है। इसकी अंतिम दशाएं होती है। बोले जब अंतिम दशाएं होती तो अपना जीवन बर्बाद क्यों करें? परमात्मा की प्राप्ति में लगाए। तो फिर उन्होंने सन्यास लेकर के भगवान के चिंतन के प्रभाव से ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष हो गए। तो ये शांति मिलती है। ऐसा चिंतन करने से वैराग्य बढ़ता है। तो वैराग्य ही शांति मिलती है। त्यागांतम जब हम विषयों का चिंतन त्याग देते हैं थोड़ी देर के लिए ही सही तो हमें शांति मिलती है। जैसे हम शयन में नींद में जो हमें सुख मिलता है ना वो विषय चिंतन त्याग का होता है।
कोई चिंतन नहीं होता। गाढ़ सो गए तो हमारी इंद्रियां फ्रेश हो गई। हमको एक नई ताकत मिली। तो ऐसे हम जब भगवत चिंतन करते हैं तो हमारी इंद्रियों में बल आ जाता है। हम प्रसन्नता को प्राप्त होते हैं। पर भगवत चिंतन होता कहां है? संसार का चिंतन देखो चुप बैठो तो संसारिक चिंतन चल रहा है। मकड़ी जैसे जाल बुनती है। ऐसे मन जाल बुन रहा है। कोई व्यक्ति कोई स्थान कोई विषय चलता दिमाग में नजर आएगा। भगवान नहीं आएंगे। बड़ा विचित्र खेल है। भगवान में मन को लगाना होता है। इसलिए नाम जप करो और जैसे ऐसे विचार है ऐसे विचार हमको शांति प्रदान करें।
किसी को शव में जाते हुए या किसी की बहुत रोग दशा देखकर या मृत्यु दशा देखकर इससे वैराग्य उत्पन्न होता है। सुनीता प्रदीप सौधा दिल्ली से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी हम हर महीने अपने व्यापार से कुछ धनराशि निकालकर महाकाल जी के लिए निकालते हैं। तो क्या यह राशि मुझे महाकाल मंदिर में ही भेंट करनी चाहिए या किसी और सात्विक कार्य में भी दान स्वरूप हां कर सकते हैं। सात्विक दान में भी कर सकते हैं। भगवान शिव सब रूपों में सब रूपों में विराजमान है। जैसे कोई बीमार आदमी गरीब आदमी अस्पताल में भर्ती है।
अब दवा के लिए बड़ी समस्या है। अगर ऐसी खबर मिलती है तो हम और पैसे मिलाकर के भगवान शिव के नाम से जो रखे थे वो को दे देते हैं। जैसे जहां गौशालाओं में गौओं की सेवा की अव्यवस्था है। हम वहां गौशाला में दे देते हैं। अगर हम ऐसी व्यवस्थाओं में दे देते हैं वो शिव पूजा ही मानी जाएगी। वो महाकाल की ही पूजा मानी जाएगी। वही सब रूपों में विराजमान है। सब चराचर जगत में माता, पार्वती और भगवान शिव ही विराजमान है। जितनी स्त्री स्वरूप हैं, सब देवी स्वरूप है और जितने पुरुष स्वरूप है सब शिव स्वरूप हैं।
अपने स्वरूप को ना जानने के कारण ही ये गंदे आचरणों में फंस गए। नहीं सब जीव ही शिवा शिव ही जीवा। वही है जो जीवा है वही शिवा है जो शिवा है वही जीवा है कोई अंतर नहीं है सिंह जी महाराज राधे-राधे महाराज जी महाराज जी यदि मैं किसी ज्यादा गरीब को देखती हूं तो रोना आता है और ज्यादा अमीर को देखती हूं तो रोना आता है तो महाराज जी इसका कारण क्या है तो वैसे सबको चाहिए दुखी को देखकर दुखी हो जाना इतनी मनुष्यता तो चाहिए कि किसी के भी दुख में हम दुखी हो और उपाय सोचे कि इसको हम कैसे सुख पहुंचाएं।
अगर इतनी बात है तो ये मनुष्यता है। यह राक्षसी पना है। किसी के सुख में हम उस दुखी होकर उसे दुख प्रदान करने की भावना करना और किसी के दुख में हम दुखी होकर उसे सुख प्रदान की मनुष्यता है। और सुखदख दोनों से परे उसे भगवान का स्वरूप समझकर सेवा करना यह भागवतिकता है। ये देवत्व है। तो हमें चाहिए कि कम से कम मनुष्यत्व तो ले आए। तो अच्छी बात है। जो दुख में हैं उनके दुख में द्रवित होकर होना चाहिए और उनके दुख की निवृत्ति के लिए उपाय सोचना चाहिए। मन वचन कर्म से यदि हम में कोई सामर्थ्य है तो हम उसकी दुख निवृत्ति जरूर करें।
यह हमारी मनुष्यता है। मनुष्यता का यही फल है कि हम दूसरों के दुख में दुखी हो जाएं और दूसरों के दुख निवृत्ति का उपाय करें। अजय जी राधे-धे गुरु जी राधे-धे महाराज जी महाराज जी मैं राधा कृष्ण जी का नाम जप करता हूं और जप करते समय रात को सो जाता हूं और सोने की अवस्था में भी जाप चलता रहता है मुझे ऐसा आभास होता है महाराज जी पर मैं अभिनय की लाइन में हूं महाराज जी एक्टिंग करता हूं तो स्क्रिप्ट को याद करना होता है और सोचना बहुत पड़ता है महाराज जी करैक्टर के लिए तो फिर नाम जप में व्यवधान आता है महाराज जी ऐसे में हमेशा नाम जलता चलता रहे दोनों ही उसे भी भगवान की पूजा मान लो जो अभिनय कर रहे हो वह भी भगवान की पूजा मान करके एकाग्रता पूर्वक अपना ठीक अभिनय करो।
चाहे वह जो भी अभिनय हो वो भगवान ने संसार रूपी रंग मंच पर सबको अभिनय दे रखा है और आपको भी दे रखा है। तो अपने अभिनय को भगवान की पूजा मान लो तो जैसे दो घंटे में अभिनय किया और दो घंटे बाद हे श्री कृष्ण करुणामय कृपामय ये दो घंटे का समय जो संसार की लीला में गया वो मैं आपको समर्पित करता हूं। तो कर्म समर्पण भी आपका भजन बन जाएगा। नहीं तो एकाग्रता तो अपने अपने कर्मों में करनी ही पड़ेगी। और जब एकाग्रता करेंगे तो नाम छूट जाएगा। जैसे पढ़ाई है या ऑफिस का कार्य है या कोई भी कार्य जब हम एकाग्रता पूर्वक करते हैं तो भगवान का नाम का विस्मरण हो जाता है तो उस समय हम उस कर्म को भी भगवान को समर्पित कर देते हैं जिससे वो भजन बन जाता है।
राहुल सोनी जी सागर जय गुरु जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी पिछले दो सालों से आपका सत्संग और एकांतिक वार्तालाप सुन रहा हूं और आपके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहा हूं। महाराज जी मेरे अंदर एक प्रश्न है कि गुरु से मिलना और गुरु में मिलना इन इनमें क्या अंतर है? गुरु से मिलना और गुरु में मिलना। गुरु से मिलने के बाद गुरु की आज्ञा का पालन करके गुरु के द्वारा दिए हुए मंत्र और नाम में तन्मय हो जाना गुरु से मिलना है। समझ रहे हो? और जब हम भगवदाकार स्थिति को प्राप्त हो जाते हैं तो जो गुरुदेव वही हम जो हम वही गुरुदेव वो गुरु में मिल गया।
वह गुरुमय हो गया। गुरु और शिष्य का भेद तब तक रहता है जब तक अज्ञान रहता है। और जहां अज्ञान निवृत हुआ तो जो गुरुदेव हमारी आत्मा है वही हमारे हृदय में स्पुरित हो जाते हैं। तो गुरु से मिलना और गुरु में मिलना। गुरु में मिलना का मतलब होता है सिद्ध पुरुष। और गुरु से मिलने का मतलब होता है साधक। साधक गुरु से मिलता है और जब गुरु के द्वारा बताई हुई साधना में परिपक्व अवस्था को प्राप्त होता है तो गुरु में मिल जाता है। वो गुरु में हो जाता है। वो गुरु स्वरूप हो जाता है।
किसका प्रश्न था? बात समझे आप? महाराज जी एक ये था कि मतलब साधना में इस साधना में चल रहे हैं और अपने इष्ट राधा वल्लभ जी की अपने गुरुदेव भगवान की और आचार्य महाप्रभु की छवि विराजमान किए। राधा नाम विराजमान की और योग सरकार की तो उसकी उपासना कर रहे हैं लेकिन अभी दीक्षा प्राप्त नहीं हुई है तो ये अपराध तो नहीं ये तो सौभाग्य है अपराध नहीं खूब सेवा करो खूब सेवा करो दीक्षा का मतलब होता है स्वीकृति अगर हम किसी संत भगवंत के भाव को स्वीकार करते तो हम शिष्य ही हैं।
उसमें कोई कंठी बंधे तभी दीक्षा मानी जाए ऐसी बात नहीं है। उन्होंने बात सुनी और मान ली तो उनका कल्याण हो रहा है। तो कल्याण के लिए मंगल के लिए हमें संत की बात मानना आवश्यक है ना कि दीक्षा लेना आवश्यक है। अगर हमने उनकी बात मान ली तो हमारे गुरु हैं वो चाहे संबंध बनाओ दीक्षा का या ना बनाओ वो गुरु हैं उसी से कल्याण हो जाएगा। जैसे बोले राधा राधा जपो राम राम जपो तो आप संत की बात मान लो हो गए। उनके मुख से निकला हुआ नाम आपका मंगल कर देगा। लता खत्री जी जयपुर से राधेधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी अच्छे कर्म का फल अच्छा और बुरे का बुरा तो महाराज जी कर्मों से मुक्ति कैसे मिलेगी ऐसे में भगवान की शरण में जाने से सर्व धर्मान परित्यज मामेकम शरणम ब्रज भगवान कह रहे समस्त अधर्मों का त्याग करके धर्म को स्वीकार किया जाता है और लोक धर्मों का त्याग करके भागवत धर्म स्वीकार किया जाता है लोक धर्म में जैसे आप किसी के पिता हैं किसी के पति हैं किसी के पुत्र पुत्र है सब अपनेप कर्तव्य भगवान कह रहे सर्व धर्मान परित्यज मामेकम शरणम ब्रज तो अहम तम सर्व पापभ्य मोक्ष्याम मासचा मैं तुम्हें बंधन से मुक्त कर दूंगा समस्त कर्म बंधनों से जो हमें पाप और पुण्य के बंधन बंधे हुए हैं।
यह भगवान की शरण में शुभ अशुभ दुर्ग विध्वंस बल तब जयत जयत जग उच्चरे ये संसार पर विजय वही प्राप्त करता है जिसके शुभ और अशुभ दोनों नष्ट हो जाते हैं और वो भगवान करते हैं। इसलिए भगवान की शरण में होकर भगवान की लीला कथा सुनो। भगवान का नाम जप करो। सब में भगवत भावना करो। बुरे आचरण ना करो। इसी से सब कर्म बंधन भगवान की कृपा से नष्ट हो जाएंगे। जय जय श्रीमन नारायण एक आज जगत गुरु रामानुज स्वामी आज से 1000 आठ वर्ष हो गए होंगे प्रगत उन्होंने दो ही संदेश दिया भगवत शरणागति कैंकर लक्षण विलक्षण मोक्ष भाजो रामानुजो विजयते यति राजा तो सिद्धांत पर हम सब चल रहे हैं।
तो आपका जैसा आदेश होंगे महाराज जी भगवत आश्रय भगवन नाम जप बस दो ही बातें हैं भगवत कैंकर का मतलब भगवत आश्रय भगवत आश्रय मन वचन कर्म से भगवान का आश्रय लेना और निरंतर भगवान का नाम जप करना बस दो में ही बेड़ा पार है दो में जैसे पंछी आकाश में दो पंखों से उड़ता है ऐसे हम परमार्थ की जोरदार साधना कर लेंगे भरोसा दृढ़ मम भरोस ही हरसना दृढ़ भरोसा भगवान का हो और नाम मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा खूब भगवान का नाम जप हो इसी से सब साधनाएं अपने आप आ जाएंगी सब मंगलमय जिनका नाम जप करते हैं उनकी चर्चा सुनना अच्छा लगेगा उनकी चर्चा करना अच्छा लगेगा उनकी उच्छिष्टामृत पाना अच्छा लगेगा उनका चरणामृत अच्छा सब साधनाएं आ जाएंगी दो बात पकड़ ले एक दृढ़ भगवत आश्रय अन्य आश्रय नहीं एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास एक राम घनश्याम हित चातक तुलसीदास चातक की टेक की तरह अपने इष्ट की अधीनता स्वीकार कर ले और वही कह कर और नाम जप बस इसी से सब हो जाएगा श्रीमद् भागवत महापुराण पूर्ण 18000 श्लोक विश्राम होने के बाद भी नाम संकीर्तन सर्व नाम
दुख सम आज बहुत-बहुत मंगल मंगला अनुशासन स्वस्थ रहवी रहें और सबको आनंद प्रदान करते रहिए हमारा मंगल अनुशासन जय जय जय हो पतित पावन धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद महिमा सिंह जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं ये जानना चाहती हूं कि जैसे सुबह-सुबह इतने लोग दर्शन के लिए आते हैं उनमें से कुछ यहां एकांतिक के यहां भजन के लिए आते हैं पर सब नहीं आ पाते तो क्या बाबा आप उन सब पर कृपा कृते हैं या जिनकी ओर आप देख लेते हैं केवल उन्हीं पर दया दृष्टि होती है क्योंकि बहुत
सारी भीड़ आप कृपा हमारी तरफ से नहीं होती कृपा हमारे इष्ट की तरफ से होती है। हम जिनके दास हैं वो कृपा करते हैं। आप जिनके दास से मिलने के लिए आए जिनके दास के दर्शन करने के लिए आए स्वामी हिसाब करता है। हम तो हाथ जोड़े जहां जिनको देख पाए देख पाए नहीं वह सबको देख रहे हैं। वो शास्त्रों नेत्र वाले हैं। सबको देख रहे हैं। एक क्षण में अनंत ब्रह्मांडों को देख सकते हैं। तो वह सबको देखते हैं और वह हिसाब करते हैं। हर जीव के कर्म का वह हिसाब करते हैं। तो आप जिस भावना से आए हैं जो भाव कर रहे हैं हमारे मालिक, हमारे ईश्वर, हमारे प्रभु वही आपको मंगल करते हैं।
वही आपको सुख प्रदान करेंगे। हमारी सामर्थ कहा है कि हम कृपा कर सके। हम तो खुद कृपा के भिखारी हैं। प्रिया लाल की कृपा के भिखारी हैं। उन्हीं की कृपा सब पर है। उन्हीं की कृपा से सबका मंगल होता है। हम किसी का मंगल कर सके। ऐसी हम में सामर्थ्य नहीं। हम खुद जिनके चरणों में अपने मंगल के लिए पड़े हैं उन्हीं मंगल भवन से सबका मंगल होता है और वो सबको देखते हैं और वो सब पर कृपा करते हैं। बबली रानी जी हरियाणा से राधेधे राधे-धे महाराज जी महाराज जी क्या हमारे जीवन में आने वाली अनुकूलता एवं प्रतिकूलता में हमारे निवास स्थान का विशेष महत्व रहता है नहीं कर्म कर्म कर्म निवास का कोई नहीं कर्म ऐसी कोई भूल में ना रहे ऐसा नहीं उसमें हमारा कर्म प्रधान होता है अगर हमारे कर्म अच्छे हैं ना तो श्मशान में भी बैठकर हम परमानंद में डूब जाएंगे अगर हमारे कर्म खराब है तो सोफा में भी बैठकर जलेंगे।
एसी रूम में भी बैठकर जलेंगे। तो हमको कर्म ठीक करने चाहिए। कर्म सुधारने चाहिए। ये सब बाहरी बातों पर नहीं लगना चाहिए। हमारे कर्म का आप देखो निवास स्थान कितना बढ़िया वृंदावन। इससे बढ़िया कोई निवास स्थान होगा। त्रिभुवन में इससे बढ़िया कोई निवास स्थान होगा। भगवान का धाम है। पर क्या यहां दुखी लोग नहीं है? क्या यहां परेशान लोग नहीं है? क्या यहां काम क्रोध की लीला नहीं हो रही? सब हो रहा है। सांसारिकता में सब हो रहा है। तो जो जैसे कर्म अब जो केवल प्रिया प्रीतम का भजन कर रहे हैं।
प्रिया प्रीतम में चित्त जुड़े उनको आनंद का अनुभव हो रहा है। जो संसार में चित्त जुड़े काम क्रोध लोभ से परेशान हो रहे हैं। चिंता शोक भय उदग्नता ये उनको परेशान कर रहे हैं। तो हमारी बात को समझना। अगर निवास स्थान के प्रभाव से दुख या सुख की प्राप्ति हो तो वृंदावन वास से सबको परमानंद की प्राप्ति होनी चाहिए। क्योंकि यह परमानंदमय धाम है। नहीं हो रही। आप देख लो बैठे तो रहो। तुम भी तो बैठे हो। परमानंद की अनुभूति होगी आपके चिंतन से। आपके कर्म से अच्छे कर्म करोगे सुख मिलेगा।
बुरे कर्म करोगे दुख मिलेगा। आज नहीं तो कल मिलेगा। और भजन करोगे तो परमानंद मिलेगा। यहां नहीं जो तुम्हें सबसे निकृष्ट गंदा स्थान बताया जाए कि यह स्थान वहां बैठ जाओ और राधा राधा राधा राधा अगर आपको परमानंद का अनुभव ना हो तो मुझे बताना। तो स्थान का थोड़ा सहयोग तो मान सकते हैं कि शांत वातावरण है। भागवतिक है तो हमारा भजन में ज्यादा रुचि होगी। लेकिन सुख दुख विपत्ति संपत्ति हमारे कर्मों के प्रभाव से इसका स्थान से कोई ताल्लुक नहीं है। ओम दीक्षित जी राधे-राधे गुरु राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मेरा प्रश्न है कि अगर हमारे अंदर भाव ना हो और केवल हम वाणी से कहें और रटते रहे कि श्री जी मेरे हैं।
श्री जी मेरे हैं तो क्या श्री जी हमें भाव आ जाएगा। यहां का एक जादू है। तुम करके देखना। किसी एक ऐसे व्यक्ति से जिससे बिल्कुल प्यार नहीं है और उसे रोज कहो मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं। तुम्हारे बिना जी नहीं सकता। रोज एक बार कहो और दो महीना के बाद देखो उससे हट के अगर ऐसा लगने ना लगे कि मैं उसके बिना जी नहीं सकता तो हमें बता देना। भृंगी कीड़ा एक कीड़े को लाकर अपने मिट्टी के घरौने में रखता है और ऐसे डंक मारता है और भ तो जो डंक मारने से उसकी पूरी एकाग्रता उस भृंगी की तरफ जाती है और भन वो उसी का चिंतन करने लगता है।
बिना शरीर छोड़े अन्य जाति का कीड़ा भृंगी कीड़ा बन जाता है। यदि हम यह कहते रहे कि हे प्रभु मैं आपका हूं। झूठी से कह रहा हूं तो सच्ची एक दिन महान भक्त बन जाएगा। करके तो देखें करके तो देखें ऐसा महाराज जी श्री जी लायक मतलब हम बन नहीं पा रहे भावनी और बहा नहीं सके श्री जी लोहा कभी मुकुट बन के देवताओं के नहीं लग पाता लेकिन पारस मणि छू जाए अगर पारस मणि छू जाए तो लोहा तत्काल सोना बन जाए और देवताओं के मुकुट पर तो ऐसे ही हम लोहा की तरह हैं। संत कृपा भगवंत कृपा से यदि नाम जब चलने लगे तो हम पारस मणि रूपी नाम का स्पर्श होते ही हम भगवान के योग्य हो जाएंगे।
जो पापी व्यभचारी नीच आचरण वाले थे जिनसे संभाषण भी करना पाप है। ऐसे ब्रह्म ऋषि बन गए। ऐसे महात्मा बन गए भगवान के नाम के प्रभाव से। तो हम भगवान का नाम जप करें। हम में कोई योग्यता नहीं। लेकिन नाम भगवान की कृपा से वो सब सद्गुण आ जाएंगे जिससे भगवान प्रसन्न होते हैं। हम खूब नाम जप करें। निमेश शाह जी मुंबई से राधे राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मेरा यह प्रश्न है कि क्या रोज की दिनचर्या ही जीवन है कि सुबह उठे खाए पिए रात तक काम किया फिर आए सो गए फिर आगे की जिंदगी का महाराज जी क्या मायने है क्या उद्देश्य है यही यही जब विचार करोगे तो आपको एक रास्ता मिलेगा जिसका नाम अध्यात्म है कि आखिरकार क्या है कब तक जिएंगे रोज की शाम हमारी आयु को तो नष्ट कर रही अब जो कल की शाम गई जितने मिनट जितने सेकंड हमारी आयु में थे माइनस हो गए।
अब आज फिर माइनस शुरू है। आखिरकार हम मृत्यु के नजदीक पहुंच रहे हैं। तो खा के कमा करके हम अब केवल अपनी केवल आयु ही तो नष्ट कर रहे हैं। लाभ क्या ले रहे हैं? वो लाभ है भगवान का भजन। वो लाभ है भगवान का चिंतन। यदि हम आज एक एक श्वास राम राम बोले, राधा राधा बोले, कृष्ण कृष्ण बोले, हरि हरि बोले तो आज की कमाई पक्की हो गई। अब यह त्रिभुवन में कभी नष्ट होने वाली नहीं। त्रिकाल में कभी नष्ट होने वाली नहीं। भगवान के नाम के प्रभाव से हमारी दुर्गति रुकेगी और हमारी सद्गति होगी।
अगर नाम जप नहीं चल रहा तो बिल्कुल आयु व्यर्थ जा रही। बिल्कुल आयु व्यर्थ जा रही है। ये दुर्लभ देह तभी सार्थक है। हमारा एक जैसे आपका चिंतन आया ना ऐसे ही गाढ़ चिंतन हो जाए तो आप भयभीत हो जाएंगे। कि आखिरकार जिंदगी है क्या? मतलब क्या रहा? इसके बाद मर गए। फिर कुछ योनि में गए फिर खाओ जियो मरो बस इतना ही क्या यही जीवन का लक्ष्य है तो जब यह बात आती है तब अध्यात्म का रास्ता निकलता है महानंद पूर्ण परमानंद इस शरीर के राग से रहित आवागमन से मुक्त समस्त कामनाओं से विनिवत्त कामा अध्यात्म नित्या विनिवत्त कामा द्वंद विमुक्त सुख दुख संग गच्छंत मूढ़ा पदम तत वो अव्यय पद परम पद को प्राप्त हो जाता है जो भगवान का नाम जप करता है भगवान की आराधना करता है तो बच्चा भगवान का सुमिरन करना ही जीवन की सार्थकता है नहीं कहे हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई जब तो सुमिरन भजन न होई सुमिरन भजन हो रहा है बहुत बढ़िया जीवन कट रहा है चिंता करने की जरूरत नहीं सुमिरन भजन नहीं हो रहा तो व्यर्थ जीवन जा रहा है किसी भी भोग को कितनी भी बार भोग लो बार-बार वही तृष्णा आप देखो ना भोगे हुए भोग को पुनः पुनः भोगने की वृत्ति का नाम तृष्णा सुने हुए भोगों को भोगने की इच्छा का नाम कामना है।
तो बार-बार वही कामना तृष्णा बस यह खा लो वो खा लो यह भोग लो वो देख लो वो देख तो हमारी आयु व्यर्थ जा रही है। राधा राधा राधा कहते हुए हम पा रहे हैं क्योंकि पाना पड़ेगा। जो भगवान ने दिया वो भगवान को अर्पित करके नाम जप करते हुए पा रहे हैं। जो भगवान दृश्य दिखा रहे हैं। सब में भगवान की माया भगवान की लीला देख रहे हैं। नाम जप कर रहे हैं। बढ़िया जीवन चल रहा है। आयु उसकी नष्ट नहीं होती। उसकी आयु सार्थक होती है। तभी हम कहते हैं जो लोग बर्थडे मनाते हैं उन लोगों को सोचना चाहिए कि एक वर्ष माइनस हुआ।
अब हमारा जीवन कितना है मुझे पता नहीं। और एक वर्ष माइनस हो गया तो मुझे विचार करना चाहिए कि इस एक वर्ष में मैंने क्या महत्वपूर्ण कार्य किया? हम अपने देश के लिए क्या किया? अपने माता-पिता के लिए क्या किया? अपने लिए क्या किया? तो हम उत्सव किस बात का मनाएं? लोग शराब पीते हैं। लोग मांस खाते हैं, पार्टी मनाते हैं। अज्ञानी भाव में करते हैं। नाम कीर्तन करो। 24 घंटे भगवान का नाम कीर्तन करो। आज जन्म दिवस अगर मनाना है तो भगवान का नाम कीर्तन करो। गौ से गौओं को हरा चारा डाल दो।
संत महात्माओं को भोजन पवा दो। किसी गरीब की बीमारी में लगा तो तुम्हारा जन्म होना सार्थक रहेगा। ये शराब और मांस और ये पार्टी भाजी ये हैप्पी नहीं है। हैप्पी तो तब है जब भगवान से जीव जुड़ा। धर्म से जुड़ा। हम कह रहे ना 24 घंटे कीर्तन बैठा लो तो एक घंटे नाम कीर्तन जरूर करो। भगवान का नाम कीर्तन करो और सबको भोजन पवाओ। पवित्र भोजन पवाओ। ये गंदी बातें गंदा आहार ये बहुत बुद्धि को भ्रष्ट करने वाला। अच्छा आज बढ़िया आप खीर, गुलाब जामुन, पूरी, कचौड़ी, सब्जी ये सब पवाओ और वो सब गंदी चीज ना हो।
बोले यार क्या पार्टी ही नहीं हुई वो मानेंगे पार्टी ही नहीं वो ऐसी भावना रखते हैं हां तो आज राक्षसी भाव की वृद्धि हो रही है पवित्र आहार स्वयं करो दूसरों को पाओ नाम जप करो इसी से जीवन सार्थक है हमारा जो मन है वो इस संसार में राजी हो गया है संसार के भोग संसार के धन संपत्ति रिश्ते नाते और इसमें राजी होकर भगवान को भूल गया है। यह सबसे बड़ा घाटा है। क्योंकि रोज का रोज हमारी आयु खत्म हो रही। माइनस में हो रही है। अब हमारी कितनी आयु है हमें पता नहीं। किस घटना से शरीर पूरा होगा यह भी पता नहीं।
तो क्या हमारे मनुष्य जीवन लेने का इतना ही फल था कि कमाओ खाओ जियो कमाओ खाओ भोगो क्या इतना ही फल है नहीं मनुष्य जीवन दिव्य जीवन है और इसमें दिव्यता है भगवान का स्मरण यदि हमने इस सेकंड में राधा कहा तो यह सेकंड का कहा हुआ राधा यह सेकंड समय सार्थक हो गया अगर हम अपने जीवन के रोज के रोज के दिन खोते चले जा रहे हैं और इनमें राधा राधा कृष्ण कृष्ण हरि हरि राम राम जो प्रिय हो वो नाम जप करें तो हमारे जीवन की सार्थकता हो जाए। कुछ ऐसे हमारे कर्म जो हमें दुख देने के लिए आते हैं उनको कौन मिटाएगा?
हमारे द्वारा ऐसे पाप कर्म पूर्व में हुए वर्तमान में भी हो जाते हैं। गलती हो जाती है। उसको मिटाने के लिए नाम राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण जो नाम प्रिय हो तो हम सबको चाहिए कि हम कोई गलत आहार ना करें। कोई गलत पेय पदार्थ ना पिए। भूलकर किसी को हम दुख ना पहुंचावे और नाम जप करते हुए जो कर्तव्य कर्म मिला है कोई मास्टर है कोई डॉक्टर है कोई वकील है कोई न्यायाधीश है जो भी जिसको जो कर्तव्य कर्म मिला है उसे अपनी पूजा समझकर करें तो यह हमारा जन्म सार्थक हो जाएगा हमारा जन्म लेना सार्थक हो जाएगा और नहीं तो फिर इस जीवन का कोई महत्व नहीं आपका बैंक बैलेंस आपकी पढ़ाई आपकी डिग्री आपका पद, आपके संबंधी, आपका मकान सब यही एक सेकंड में छूट जाना है।
दुनिया में लाखों का मेला जुड़ा और हंसा जब जब उड़ा तो अकेला उड़ा। उसका साथी कोई नहीं होता। उसका साथी सिर्फ भगवान का नाम होता है। इसलिए सब लोगों से प्रार्थना है पवित्र भोजन पाओ, पवित्र विचार वाले बनो, खूब नाम जप करो और जितना बन सके दूसरों का हित करो। इससे भगवान प्रसन्न होते हैं और भगवान प्रसन्न हो गए तो हमारा मनुष्य जीवन लेना सार्थक रहा। नहीं तो फिर व्यर्थ हो जाएगा। हम रोज मृत्यु के नजदीक पहुंच रहे हैं। 40 साल, 50 साल, 35 साल की स्वासे गई। अब कितने सेकंड या मिनट या महीना या वर्ष है हमें पता नहीं।
अगर हम नाम जप नहीं करते तो यह सब यही छूट जाएगा। फिर अगला जन्म हमारा होगा पशु पक्षियों में। फिर हम कुछ नहीं कर पाएंगे। अगर मनुष्य जीवन में हम कुछ ना कर पाए प्राय लोगों की बुद्धि केवल वर्तमान भोग में रहती है कि आज का जीवन हमारा सुखी है। कल किसने देखा है? नहीं बुद्धिमान वही है जो आज का भी सुख देखे और कल के सुख की व्यवस्था करें। आज आप जिस सुख में आ गए हैं मनुष्य जीवन में इससे बड़ा कोई सुख नहीं है। बड़े भाग मानुष तन पावा सुर दुर्लभ सद ग्रंथ देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
क्या हम सूअर कुत्ता बनकर के सुखी हो पाएंगे? जब हम मनुष्य बनकर सुख ना ले पाए तो सूअर कुत्ता बनकर ना तो भजन कर पाएंगे ना सुखी हो पाएंगे। तो अन्य योनियां जो 8399 योनियां है उनमें किसी में इतना विवेक जागृत नहीं जितना मनुष्य में जागृत है। तो हम भगवान का भजन करके तीर्थ याटन करके सत्कर्म करके ऐसे कमाएं कि हमें फिर अगला मनुष्य जन्म मिले और फिर हम अच्छा कार्य करें। अपने देश के लिए अपने समाज के लिए अपने विश्व के लिए मंगल विधान करें तो हमारे मनुष्य जीवन की सार्थकता है।
मनीषा जी राधे राधे गुरुदेव राधे-राधे महाराज जी महाराज जब आप स्वस्थ थे तब प्रभु ने कोई विशेष व्यवस्था नहीं की। अब जब उन्होंने सब व्यवस्था कर दी। हां वही बात है ना कि जब खाने के लायक थे तब खाना नहीं था और जब खाने लायक नहीं है तो सब व्यवस्थाएं कर दी है। पर बड़ी कृपा है भगवान की कि ऐसी परेशानियों के बीच में भी वो अपनी शरण में रखें अपने चरणों में रखें और चर्चा हो जाती है भगवान की ये बड़ी कृपा है। महाराज जी कह रहे हैं कि प्रभु जब इतना भारी प्रारब्ध महाराज जी हो सकता तो अपने बच्चों की जरूरतों के समय उनकी पूरी क्यों नहीं करते महाराज जी जब चाहिए था तभी दे देते आज उनका खेल ही ऐसे है कि बड़े लीला बिहारी है बड़े लीला बिहारी है उनकी हरि तेरी गति लख ना पड़े सोचो किसी के यहां बालक होता है तो उसको सुविधा दी जाती है और आप जिनके बालक बनने आ रहे हैं।
उनके हथकड़ी बेड़ियां जकड़ी कंस के कारागार में विशेष कष्ट विशेष कष्ट की परिस्थिति वहां कौन रहे? अखिल लोग ब्रह्मांडों के स्वामी आ रहे हैं और देवकी वसुदेव के हाथ पैर में बेड़ियां जकड़ी हुई है और दुष्ट राक्षसों का कड़ा पहरा है कंस का। किसी भी तरह की कोई सुविधा ना दी जाए। भारी कष्ट में छह बच्चे मार डाले गए। कितना भयंकर कष्ट आप सोचो। पत्थर में पटक के नवजात शिशुओं की हत्या कर दी गई और दुष्ट राजा कठोर शासन में और आ कौन रहे सकल जगत का मंगल करने वाले भगवान कंस के कारागार में प्रकट हो रहे देवकी जी देखकर अभी छक नहीं पा रहे हैं कि वो आदेश कर रहे हैं हमको गोकुल में छोड़ जाओ क्या इतने सुंदर त्रिभुवन मोहन पुत्र को जिसे एक क्षण भी अलग करना प्राण निकल जाए देवकी जी को तुरंत वसुदेव जी के गोद में और उस पुत्र की रक्षा हो इसलिए गोकुल पधरा देते हैं।
बड़ा विचित्र भगवान का लीला चरित्र है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा भगवान ने क्यों नहीं किया। शायद उस समय भगवान सुविधा दिए होते तो हम ये चढ़ाई ना चढ़ पाते। जो साधना की चढ़ाई चढ़े वो चढ़ाई ना चढ़ पाते। फिसल जाते। भगवान ने इसीलिए वो हमको कठोरताएं दी जिससे हम उन कठोरताओं के बल पर इस चढ़ाई को चढ़ पाए। और आज हम आप लोगों के सामने सेवा करने योग्य बने कि हम अपनी वाणी के द्वारा अपने आचरणों के द्वारा आपको सुखी कर पावे नहीं तो शायद है ऐसा ना हो पाता तो भगवान जो करते हैं वो बड़ा मंगलमय करते हैं।
उनका हर विधान मंगलमय होता है। महाराज जी क्या हर एक साधक के जीवन में ऐसा कष्ट आना जरूरी है या प्रतिकूलता आना जरूरी है? देखो जो जितनी ऊंचाई पर चढ़ना है तो फिर उतनी चढ़ाई तो चढ़नी ही पड़ेगी। तो जितना जो चढ़ पाया वह वही स्थिर है। अब तीनों टाइम बढ़िया भोजन मिल रहा हो और ऐसी व्यवस्था सब बढ़िया तो भजन में मन लगेगा क्या? जब ना खाने को ना पीने को ना रहने का ठिकाना ना कोई तो हर समय मंत्रकार वृत्ति कि भगवान के सिवा हमारा कोई नहीं। एक गंगा मैया का किनारा और भगवान का भरोसा भूख प्यास से लड़ने के लिए सर्दी गर्मी से लड़ने के लिए केवल चिंतन को शरीर से हटाकर भगवान में लगाना है।
निरंतर भगवदाकार वृत्ति वही कृपा आज मिली है। अगर उस समय हमें सांसारिक सुख मिलते तो शायद यह लाभ ना मिल पाता। तो हमें लगता है भगवान की विशेष कृपा है। दोनों पक्ष में विशेष कृपा है। जब हमें साधना की चढ़ाई पर चढ़ाना था तब सुविधा नहीं दी और जब सुविधा भोगने लायक ले रहे तो सुविधाएं दे दी। ये कृपा है उनकी। दोनों तरफ से हमें कृपा ही नजर आती है। और सांसारिक सुख कोई सांसारिक सुख पर मतलब परमानंद प्रदान करने वाले नहीं। भागवतिक सुख मिलना चाहिए। तो आज जो हम प्रसन्न मुद्रा में है यह भगवान की उसी कृपा का फल है।
अगर वो कृपा हट जाए तो भ्रष्ट होने में देर ना लगे। लेकिन भगवान ने कृपा की। जब हम भ्रष्ट होने योग्य थे तब सामग्री नहीं दी। जब सामग्री दी तो भ्रष्ट होने योग्य नहीं रखा। ये उनकी विशेष कृपा है। बहुत बड़ी कृपा है भगवान की। महाराज जी कोई फिर हल बता दीजिए क्योंकि आपको सुनने वाले बहुत सारे ऐसे भक्त जन हैं जिनके पास सब वैभव है मतलब सब सुख सुविधाएं हैं जिनको हमारी बात मान लो देखो जो लाखों को सुधारने लायक बनाया जाता है ना उसकी कड़ी परीक्षा होती है कि आप लाखों को लेकर के हमारे पास आओगे तो इसलिए भगवान ने हमको ऐसी कड़ी परीक्षाओं में ऐसे रखा कि तुम तैयार हो और लाखों को पकड़ो और हमारे पास ले आओ तो तुमको उतनी इतनी कड़ी परीक्षा नहीं करनी।
तुमको केवल हमारी बात माननी है। बात मान लो तो तुम जहां हो वहीं से भगवत प्राप्ति के योग्य हो जाओगे। इसीलिए भगवान ने इतनी कड़ी परीक्षाएं, ऐसी परिस्थितियां डाल डाल के पक्का किया है कि तुम हजारों का कल्याण कर सकते हो। हजारों को अपनी वाणी के द्वारा सुधार सकते हो। तो आप हमारी बात मान लो तो आपका कल्याण हो जाएगा। आपका मंगल हो जाएगा। आपको वो तपस्या आपको वो कष्ट नहीं झेलने पड़ेंगे। जो कष्ट झेलकर हमने अनुभव किया वो बात तुम मान लो तो उसी से मंगल हो जाएगा। तो सब सुख सुविधाओं में रहते हुए कैसे भजन?
बिल्कुल भजन होने लगेगा। हम कह रहे हैं हर सुख सुविधा को भगवान को समर्पित करो। जैसे हम ऐसे भोजन पाते हैं तो भोजन होता है। लेकिन जब हम भगवान को अर्पित कर देते तो प्रसाद होता है। और भोजन पाने से पुण्य क्षय होंगे। लेकिन प्रसाद पाने से पुण्य बढ़ेंगे। ऐसे नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी संपूर्ण परिवार को भगवान का अर्पण भाव करके और सब में भगवत भाव करके नाम जप करते हुए हम व्यापार नौकरी जो भी करते हैं ईमानदारी से करें तो गृहस्ती में रहते हुए हम संत हैं।
गृहस्ती में रहते हुए हम भगवत प्राप्त हैं। बात होती है आचरणों से चिंतन से वो आप भी कर सकते हो। अच्छा जैसे गृहस्थ आदमी को काम वेदना आई अपनी पत्नी है अपनी पत्नी से अगर दूसरे की पत्नी तो वही पाप हो गया ऐसे ही मोह सताया तो अपने पुत्र में गोपाल जी की भावना करो मेरे भगवान पुत्र रूप में आए तो आपका कल्याण है आपका मंगल है जैसे हम चराचर जगत में भगवत भाव कहते हैं आप अपने परिवार में भगवत भाव करके मुक्त हो सकते हो पर भाव करना पड़ेगा सब में भगवत भाव करना पड़ेगा तन मन धन सर्वस्व भगवान का मानना पड़ेगा, नाम जप करना पड़ेगा और कोई पाप आचरण ना हो यह सावधानी रखनी पड़ेगी।
तो गृहस्थ में रहते हुए सुख पूर्वक भगवान की प्राप्ति हो जाएगी। कर्मवीर जी आगरा से राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव आपको आनंद किस रस में ज्यादा था लगा? काशी वाले में या वृंदावन वाले में? एक दूध का खोया बुरा पेड़ा बर्फी कई पदार्थ बनते हैं। उसका स्वाद अलग-अलग होता है। लेकिन होता तो मेन पॉइंट दूध ही है। चाहे शिव कहो चाहे श्याम कहो वो ब्रह्म तो एक ही है ना। उसका रसास्वादन अलग है। नहीं दूध की बर्फी का और खोया को चीनी से बोर करके ऐसे पाना और पेड़े अलग-अलग उसके कई पदार्थ बनते हैं।
तो स्वाद विशेष बदल सकता है। लेकिन तत्व तो वही रहता है ना दूध ही। ऐसे ही परमात्मा एक है। चाहे राम कहो, चाहे श्याम कहो, चाहे शिव कहो, चाहे दुर्गा कहो, चाहे जो भी कहो परमात्मा एक है। उसका स्वाद। अब जैसे नाम कीर्तन कर रहे हैं इसका स्वाद अलग है। ध्यानस्थ होकर मंत्र जप रहे हैं इसका स्वाद अलग है। उसी परमात्मा का उसकी कथा सुन रहे हैं उसका स्वाद अलग है। उसकी सेवा कर रहे हैं उसका स्वाद अलग है। उनके सामने हम नाच रहे हैं उसका स्वाद अलग है। लेकिन है वो सब परमानंद भगवान का ही स्वाद।
अब भगवान शिव का जो स्वरूप है और भगवान श्याम सुंदर का जो स्वरूप है तत्व एक है लेकिन दोनों का अलग है। जब हम रसास्वादन की बात करते हैं तो स्वयं भगवान रास रस का रसास्वादन करने के लिए शिव जी गोपेश्वर बनकर वृंदावन में रास में प्रवेश करते हैं और चुनरी ओढ़कर रास का रसास्वादन करते हैं। तत्व एक है। लेकिन जब स्वाद की बात करते हैं तो जो रज शिव सनकादिक याचत सो रज शीश चढ़ाऊं किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊं। तो वही भगवान शंकर कृपा करके हमको भेजें और किशोरी किशोर जी की सेवा में तत्व एक है।
रसास्वादन अलग-अलग है। अब जैसे श्याम लीला रामलीला बड़ा अंतर है। बड़ा अंतर है। गंभीर मर्यादा बिल्कुल कहीं इतनी भी मर्यादा का वही राम है वही श्याम। प्रेम की एक अपनी मर्यादा होती है। यह प्रेम लीला अवतार लीला पुरुषोत्तम है और वो मर्यादा पुरुषोत्तम है। वहां एक पर लीला में बड़ा अंतर है। प्रेम लीला स्वक्षण प्रेम की एक अपनी मर्यादा होती है। बंसीनाथ की आई ब्रज नार सुनत बंसीरो गृहपति बंद बसारे दर्शन मदन गोपाल मनोहर मनस ताप निवारे हर्षित बदन बंक अवलोकन सरस मधुर धुन गावे मधुमय श्याम समान अधरधर मोहन बेणु बजावे रास रच वन माही विमल कलप तर छाही विमल कलप तर तीर सुपेशल शरद रेनवर चंदा शीतल मंद सुग सुगंध पवन बाय ता खेलत नंद नंदा अद्भुत ताल मृदंग मनोहर किनकिन शब्द करा यमुना पुलिन रसिक सागर रास रच वन माही देखत मधुकर केली मोहे खग मृग बेली मोहे मृग धेनु सहित सुर सुंदर प्रेम मगन पट छूटे उडगन चकित
थकित सश मंडल कोट मदन मन लूटे अधर पान परिरंभन अति रस आनंद मगन सहेली जय श्री हित हरिव रसिक सच पावत देखत मधुकर केली वो अद्भुत रस एक गोपी एक श्री कृष्ण एक गोपी एक श्री कृष्ण वो अद्भुत रास रस ये कहीं नहीं आप देखोगे तो ये इनका विचित्र प्रेम रस और उनकी विचित्र गंभीरता मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के पावन चरित्र में मर्यादा ही मर्यादा है और यहां प्रेम मर्यादा है तो तत्व एक है जब लीला की तरफ देखो तो अलग-अलग स्वाद है वही परमात्मा राम बना है वही श्याम बना है वही शिव बना है वही दुर्गा बना है वही काली बना है वही सब रूपों में है उसके सिवा कोई नहीं है जी संजय द्विवेदी जी कानपुर से राधे-राधे महाराज जी पहलगांव आतंकवादी हमला जो हुआ था उन इनके पुत्र उसमें शहीद हो गए महाराज जी कह रहे हैं कि हम धर्म से और श्रेष्ठ कार्य भी करते थे पर ईश्वर द्वारा ऐसी घटना हुई तो बहुत अंदर व्यथित मन है महाराज जी इसलिए हां मन तो व्यथित हो ही जाएगा।
बड़े-बड़े शूरवीों का हो गया। जब अभिमन्यु जी पधारे तो अर्जुन जी की हालत खराब थी। अर्जुन जी को भगवान स्वयं समझा रहे थे। फिर भी वह व्यथा को प्राप्त हो रहे थे। क्योंकि पुत्र प्रेम पिता के हृदय में जो होता है जब उसका पुत्र वियोग को प्राप्त होता है तो वही हृदय जानता है। अपने लोग तो सहानुभूति के वचन बोल सकते हैं लेकिन जिसके हृदय में होता है उसका हृदय जानता है। पर अब यह जो होना है वो होके रहेगा। तो अब आप देखिए उन्हीं उन्हीं जीवों का वहां पहुंचना हुआ जिनका प्रारब्ध संपन्न हो चुका था।
अब वह निमित्त कुछ भी बने आज तक कभी किसी ने काल को दोषी नहीं कहा। मारता सबको काल है। काल को कोई दोषी। अब काल वो विविध रूप धारण कर लेता है। एक्सीडेंट, हार्ट अटैक या कुछ भी जो भी लेकिन आयु जब पूरी है तो वह पूरी हो जाती है। तो हमें लगता है यद्यपि इस ज्ञान से हृदय का दर्द कम नहीं हो जाएगा। पर हमको यह ज्ञान धारण करना पड़ेगा कि जब जहां जिसके जैसी हो भवतव्यता तैसी बने सहाय आप ना आवे ताह पे ताई तहां ले जाए। अब आप देखो अगर एक दिन ना जाते एक दिन पीछे हो जाते घटना बच जाती।
लेकिन उसी समय जहां जो कुछ लीला होनी है वह लीला तो इसलिए धैर्यवान बनो हृदय को बहू है उनकी पत्नी महीने पहले नहीं हम व्यथित हैं हम भी कई दिन तक व्यथित रहे जब ये घटनाएं सुनी ना कई दिन तक तो आप तो वहां उपस्थित होगी जिसके आंखों के सामने तो सब पथियों के सामने तो पूछ पूछ के मारा था कि अगर हिंदू है बोल इसके बगल में सब पूरा ब्लड से नहा रहे हैं राधा राधा राधा राधा बड़ी वो तो दृश्य ही इतना भयानक होगा कि कैसे मतलब दो साल से हम भी आपके हम लोग भी वो 11 लोगों में से गए थे और पहले स्टेज पे पहुंच के आपका कृपा चाहे जो भी हुआ साथ में हम भी थे लेकिन हम आधे रास्ते से लौट आए थे अच्छा नहीं लग रहा था वहां जाने में तो हमने कहा हम बैठे हैं बेटा तुम लोग चल आने अब तो धैर्य धारण करना पड़ेगा बच्चा वो तो लेकिन तुमने वो दृश्य देखा है वो कितना भयानक दृश्य होगा जिस दृश्य को आपने अपने सामने देखा कि अपना जीवन साथ हम लोग के दिमाग से जाता ही नहीं है हमारे गुरु रमण तिवारी महाराज महाराज नाम जप करते हां बिल्कुल नहीं आप चर्चा
कर रहे तो हमारा हृदय व्यथित हो रहा है वो कई दिन व्यथित रहा जो हमने घटना सुनी कई दिन व्यथित रहा जैसे आप फिर ताजा हो गया आप तो दृश्य देखे हैं और आपके तो पति गए हैं पुत्र गए हैं अपने लोग तो केवल सुनकर तो भी हृदय व्यथित हो जाता है पर आपको धैर्यवान बनना चाहिए हम लोग का मन बहुत नहीं अब धैर्यवान बनो रोने से या व्यथित होने से डिस्टर्ब होने से अब हाथ तो कुछ लगेगा नहीं अपना स्वास्थ्य कमजोर होगा अपना चिंतन बिगड़ेगा इसलिए नाम जप करो धीरे-धीरे इस दुख को हटाने
की कोशिश करो। यद्यप बहुत कठिन है। हम फिर भी कह रहे हैं। बहुत कठिन है। बड़े-बड़े धर्मात्मा पुरुष व्यथित हो गए हैं इन कार्यों में। भगवान का 14 वर्ष का जो ही वनवास का कैकई जी ने दृढ़ तो भगवान के वियोग में दशरथ जी के प्राण चले गए। हां राम ह राम कह के अपने प्राण तो यह पुत्र प्रेम जब लक्ष्मण जी को वीर घातनी शक्ति लगी तो राम जी चिल्ला चिल्ला के रो रहे थे कि अगर मैं ऐसा जानता तो पिता के वचन ना मानता तो भ्रात प्रेम पुत्र प्रेम ये ऐसे प्रेम है जो हमारे हृदय को व्यथित कर देते पर हम भगवान से मनाएंगे कि आप लोगों को धैर्य दें आप लोगों को सुख प्रदान करें और आप सुख पूर्वक जिए आप इस तरह के चिंतन में अगर और बढ़ते चले गए तो डिप्रेशन में पहुंच जाएंगे, परेशान हो जाएंगे।
अब थोड़ा हिम्मत कीजिए, धैर्य कीजिए। हमें भी हृदय से व्यथा है पर अब उस व्यथा की पूर्ति कर नहीं सकते। अब वो ऐसी कोई सामान तो है नहीं जो बाजार से ला के दी जा सके। एक बार जो आकृति मिट गई वो सृष्टि में दोबारा चाहे लाख कोशिश करो वो मिलने वाली नहीं है। अब वो पुत्र मिलने वाला नहीं चाहे हम तुम दिन भर बैठकर रोएं या दिन भर बैठकर भगवान से प्रार्थना करें। अब वो दोबारा नहीं आ सकता तो हमें चाहिए धैर्य पूर्वक नाम जप करें और अपने हृदय को संतुष्ट करें। भगवान की बड़ी विचित्र लीला है।
बड़ी विचित्र लीला है। मतलब इसमें कुछ कहा नहीं जा सकता है। चुनरी लाकर के इस बच्चा को दो। इनकी मां को दो और धैर्य पूर्वक रहो। सुख पूर्वक रहने की चेष्टा करो। अभी तो तुम कल के नए बच्चा हो। पूरा जीवन पड़ा हुआ है तुम्हारा। धैर्य पूर्वक रहो। राधे राधे। धैर्य पूर्वक रहना। धैर्य पूर्वक रहना। अब ये ऐसी कि किसी के हाथ की बस की बात नहीं है ना। अच्छे से रहो। अच्छे से रहो। प्रसन्न रहने की कोशिश करो। गुरु महाराज की कृपा से आश्रम की जिम्मेदारी दे दी पांच साल पहले।
जी तो सेवा चलती है संत महाराज नाम जप नहीं हो पाता है। अभी नहीं नाम जप के बिना बात बनेगी नहीं। देखो गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है राम राम राम जी जो तू ना जपी है तो तू कहूं तीहु ताप तप है सब ठीक है संत सेवा सब बढ़िया है पर अंदर का सुधार नाम जप से होगा इसलिए नाम जप का अभ्यास करो नाम जप थोड़ा कठिन है पर नाम जप से ही काम बनेगा खूब नाम जप करो बाबा सद्गुरु और इष्ट में अगाड़ श्रद्धा कैसे नाम जप से क्योंकि नाम से हृदय पवित्र होता है और पवित्र हृदय ही भगवान या भगवत प्रेमी महात्मा के प्रति हमारा आसक्ति हमारी प्रियता जाती है।
मलिन हृदय की प्रियता संसार और शरीर में होती है और पवित्र हृदय की प्रियता भगवान और गुरुदेव में होती है। निर्मल मन जन सो मोहे पावा। नहीं तो हमें चाहिए कि खूब नाम जप करें। भगवान का जो नाम प्रिय हो नाम जप करें और गंदा भोजन ना करें जैसे मांस मदिरा शराब ये सब ऐसा ना करें और नाम जप करें इसी से राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा इतना तो कबहु हसी हो इतना तो कबहु हंस देय
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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