अगर अपने अधिकार के लिए अपने करीबी जनों से ही लड़ना पड़े तो क्या करें?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
प्रवीण तिवारी जी गुरुग्राम से श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव भगवान अगर अपने अधिकार के लिए अपने निजी जनों से ही लड़ना पड़े और हमारे मन में उनके प्रति कोई रोष उत्पन्न हो तो क्या इससे राधा नाम रूपी धन में हानि होगी मेरा स्वभाव ऐसा है कि मैं किसी को कष्ट में नहीं देख सकता नहीं मेरा नुकसान नहीं जैसे कई जगह ऐसा होता है कि रोष करना होता है स्वाभाविक जैसे गुरु को शिष्य पर दोष दर्शन करते हुए उसको निर्दोष बनाने के लिए कड़ा स्वरूप प्रकट करना पड़ता है।
जैसे माता-पिता को अपने पुत्र पर उसके दोष को देख के उसे निर्दोष बनाने के लिए उसे शासन में लेना होता है। ऐसे अधिकारी को अपने अनुयायियों पर जो उसके नीचे कर्मचारी हैं उनको काम में लगाने के लिए निर्दोष काम करने के लिए उनकी प्रमाद स्थिति ना बढ़ पावे इसलिए थोड़ा रोष प्रकट करना होता है। पर वह स्वांग माने अभिनय मात्र होना चाहिए। हृदय से क्रोधित नहीं होना चाहिए। थोड़ी देर के लिए अभिनय हुआ। अभिनय होना चाहिए ना कि क्रोधित होना चाहिए। क्रोध का अभिनय और क्रोध में अंतर है।
निजी जनों से महाराज जी जैसे कोई जमीन संवाद हो गया या घर परिवार का उसमें महाराज जी कैसे हां तो क्रोध का अभिनय करना होगा। महाराज जी लेकिन मैं उनका दिल भी नहीं दुखाना चाहता। मतलब मैं खोना नहीं चाहता हूं लोगों की छोटी सी जमीन के लिए या फिर किसी और हां तो छोड़ देना चाहिए फिर उस विषय को ही छोड़ देना चाहिए कि आपको जो लेना है आप ले लीजिए और शांति से रहिए आनंद से रहिए पर कहीं-कहीं ऐसा होता है कि अगर ज्यादा छोड़ते चले जाओ तो आपको ज्यादा परेशान कर सकते हैं तो थोड़ा ऐसा भी स्वरूप दिखाना चाहिए कि मतलब मरदित जीवन चला जाए ज्यादा ज्यादा दया भी ठीक नहीं होती और ज्यादा कठोरता भी नहीं ठीक होती तो उचित कठोरता के साथ दया का प्रयोग करें तो अच्छा रहता है।
जैसे आप छोड़ दिए। अब वह अगले पॉइंट पर आपको कृपालु नहीं मानेंगे कि आपने कृपा की। वह अगला कदम उठाएंगे। फिर छोड़ दिया तो फिर अगला कदम उठाएंगे। और जब पहले ही कदम पर कि न्याय पूर्वक आप अपनी संपत्ति को ले सकते हैं। जैसे पांडवों ने कहा यद्यपि एक क्षत्र राज्य मुझे मिलना चाहिए। क्योंकि शर्त थी 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास पूरा होने पर पूरा चक्रवर्ती सम्राट पद आपको दे दिया जाएगा। तो हमें पूरा राज्य मिलना चाहिए। लेकिन यदि आप नहीं देना चाहते हैं तो हम बिना युद्ध किए राजी हैं।
आप आधा राज्य दे दीजिए। हस्तिनापुर का राज्य आप कीजिए और इंद्रप्रस्थ का राज्य हम करते हैं। उनका नहीं देंगे। आखरी में करुणा करके इस बात पर बात आई कि यदि वह पांच गांव दे देंगे तो हम पांचों भाई काम चला लेंगे लेकिन युद्ध नहीं करेंगे तो दुर्योधन ने कहा सूजी के आगे की नोक पर नहीं दूंगा तो कहा फिर महाभारत पक्का तो भगवान संधि कराने गए थे लेकिन भगवान की भी बात नहीं मानी तो जब ऐसी जहां मूर्खता हो वहां फिर ज्यादा दया नहीं दिखानी ानी चाहिए नहीं आपका भी परिवार है तो फिर वो फिर परेशानी आ जाएगी एक मर्यादा तक एक मर्यादा तक है खाओ पियो आनंद से रहो परिवार के हो या निजन हो इसके बाद मर्यादा से अगर अतिक्रमण तो फिर ऐसा भी होना चाहिए कि अगर हम बहुत सीधे बन जाएंगे तो बहुत हानि होती है।
एक बार एक गांव में सांप बहुत परेशान किए हुए था। कोबरा नारद जी निकले तो लोगों ने प्रार्थना की। तो नारद जी तो सर्वज्ञ हैं। सब भाषाओं का ज्ञान है। उन्होंने सांप से कहा आज के बाद इस गांव के किसी भी व्यक्ति को काटोगे नहीं। आज्ञा मान ली नारद जी की। तो दो दिन बाद लौट के आए तो सांप घायल पड़ा था। तो उन्होंने कहा अरे तुम्हारी ये दशा कैसे हुई? बोले आपने करवाई। बोले क्यों? बोले आपने कहा काटना नहीं तो जो आया ईंटा मार के चला जाता है। बोले फुसकारने को थोड़ी मना किया था।
काटो मती फुस्कार मारो लंबी तो बस काटो मत फुस्कार मारो। फुस्कारने मारोगे तो तुम्हें घायल कर देंगे लोग। हां फुस्कार ए अगला कदम नहीं तो बस फिर ठीक हो जाएगा। फुस्कार की जरूरत होती है। अगर फुस्कार की जरूरत ना हो तो आपको लोग बेवकूफ मानेंगे। आपको लोग पागल मानेंगे। आपको आपकी दयालुता कृपालुता को आपको बुद्धू मानेंगे लोग। संसार का ऐसा क्षेत्र है। इसमें ज्यादा कृपालुता और दयालुता नहीं दिखाई जाती। इसमें धर्म पूर्वक निर्णय किया जाता है। हां कहीं ऐसे ठीक है। आप ले जाओ खाओ पियो।
लेकिन अगला कदम अगर उनका बढ़े तो फिर उसका विरोध होना चाहिए क्योंकि परिवार है। अगर ऐसे होगा तो तो बहुत ही विचित्र है। वो चाहते हैं हमारा विरोध करो। तो जो ऐसे चाहने वाली क्रिया करें तो फिर उनको फुस्कार वाली वही नारद जी वाली बात दिखा देनी चाहिए कि फुस्कार करना चाहिए। अंदर से क्रोध नहीं करना चाहिए। देखो भगवान ने बचाने की कोशिश की कि दोनों भाइयों में युद्ध ना हो। दोनों भाई ही तो हैं। पांडु और धृतराष्ट्र के ही तो पुत्र हैं। तो बिल्कुल एक घर ही तो है। लेकिन फिर विनाश हुआ।
पूरे कौरवों का विनाश हुआ। तो अगर हमें जरूरत पड़े तो दया करना चाहिए और जरूरत पड़े तो कठोरता भी करनी चाहिए।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
संबंधित
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1400 — श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान…
- भगवत् मार्ग पर चलना चाहते हैं, पर हर दिन असफल हो रहे हैं। — आस्था बोरा जी जयपुर से श्री हरिवंश महाराज राधे-राधे महाराज जी 2 साल पहले जब आपको सुनना शुरू किया तो जानना हुआ कि हम कितना अज्ञानता और अंधकार में जीवन जी रहे हैं। आपको सुनने से यह…
- भगवान मिलेंगे या नहीं कैसे पता चलेगा? — भगवत दर्शन का सर्वोत्तम उपाय क्या है? भगवान के दर्शन करने का सर्वोत्तम उपाय क्या है? भगवत दर्शन का सरल और सर्वोत्तम उपाय दिन रात उनके नाम का जप करो और एकांत में रो भगवान मिल जाओ।…
- अगर एक नाम का इतना बड़ा फल है, तो निरंतर नाम क्यों जपें? — निखिल जी मुंबई से राधा वल्लभ श्री हरिव श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी एक नाम का फल पूरा त्रिभुवन से भी बड़ा है तो फिर निरंतर नाम जप क्यों कहा जाता है क्योंकि एक नाम जिसको कहा…
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1399 — जय प्रकाश प्रजापति जी गौरव जी गुरुदेव भगवान आपके चरणों में प्रणाम महाराज जी पिछले दो सालों से प्रतिदिन आपको सुन रहा हूं नाम जप भी कर रहा हूं परंतु कुछ महीनों से संसार की बनावटी…
- जिसका लक्ष्य भगवत् प्राप्ति होता है उसके क्या लक्षण होते हैं? — रस शेखरी शरण जी वृंदावन से महाराज जी जिसका दृढ़ लक्ष्य भगवत प्राप्ति हो गया है उस साधक के क्या लक्षण है नारायण हरि भजन में पांचो न सुहात विषय भोग निद्रा हंसी जगत प्रीत बहु बात ये…