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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1013 · 26 अगस्त 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की श्री वृंदावन धाम की सतगुरुदेव भगवान की जय दिव्यांश चौधरी जी श्री हरिवंश महाराज श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव सत्संग व भगवत कथा आदि में सुना है कि भगवान ब्रह्मा जी भगवान विष्णु जी और भगवान शिव जी हर समय ध्यान में लीन रहते हैं।

वो हर समय नाम जप करते हैं। गुरुदेव मैं ये जानना चाहता हूं कि ये सभी किसके धर्म ये लीला है वो अपना ध्यान करते हैं वो किसी और का कोई और है क्या जो शिव है वही हरि है जो हरि है वही ब्रह्मा है जो ब्रह्मा है वही शिव है शंकर सहज स्वरूप समारा लागी समाधि अखंड अपारा किसका ध्यान कर रहे हैं शंकर सहज स्वरूप संभारा अपने आत्म स्वरूप का अपने स्वरूप का लागी समाधि अखंड अपारा अखंड अपार समाधि और जब प्रकट हो भाव में बाह्य भाव में होते हैं तो भगवान राम जी रामेश्वर की स्थापना कर भगवान शंकर की आराधना करते हैं और भगवान शिव अस जपन लगे हरि नामा हनुमान जी बनकर के राम जी की सेवा करते हैं।

वो प्रगट लीला में एक दूसरे के प्रति भाव दर्शा रहे हैं। वही राम जी हैं। वही शिव जी हैं। वही ब्रह्मा जी हैं। कोई दूसरा नहीं है। वो जो ध्यान करते हैं अपने स्वरूप का ध्यान करते हैं। वो अपने आत्म स्वरूप का ध्यान करते हैं। वो किसी और का थोड़ी ध्यान एक ही आत्म तत्व है। वो किसी और का ध्यान नहीं करते। कोई और नहीं है। एक ही है। दो नहीं है। एक ही है। वही परमात्मा, वही आत्मा, वही भगवान, वही ब्रह्म। चाहे जिस नाम से पुकारो वो एक ही है। शिव ब्रह्म है। ब्रह्मा जी तो ब्रह्म है ही है।

और हरि तो ब्रह्म है ही है। तो वही ब्रह्म विविध रूप धारण किए और जब और ज्ञान हो जाएगा तो सर्वंम खलमिदम ब्रह्म सब कुछ ब्रह्म ही है। सब में ब्रह्म विराजमान है। कोई दूसरा थोड़ी विराजमान है। जब हम नाम जप करते हैं तो हम भगवत प्राप्ति के लिए नाम जप करते हैं। भगवान को नाम जप क्यों करना पड़ता है? समझ रहे हो? भगवान अपना स्मरण कर रहे हैं। एक होता है नाम जब भगवत प्राप्ति के लिए कहता है प्रेम के लिए प्रेम स्वाद है। नाम में स्वाद है। राम नाम में क्या स्वाद है यह पूरा राम जी भी नहीं जानते।

कहां कहां अलग नाम बढ़ाए और राम न सके नाम गुण गाए। इसलिए सब नाम का स्वाद ले रहे हैं। देखो भगवान ऐसी लीला करते हैं जिससे भगवान को कोई जान ना पावे। भगवान राम जब शिव जी को देखते हैं तो उनको प्रणाम करते हैं। शिव जी जब राम जी को देखते हैं तो उनको प्रणाम करते हैं। और राम जी से कोई पूछे जाए कि तुम्हारा इष्ट और गुरु कौन है? तो बोले शंकर शंकर जी से पूछो जाके तो बोले राम वो लीला कर रहे हैं वही राम है वही शंकर है वही है ये परस्पर खेल है वो अपना रूप धारण किए हुए विविध प्रकार की लीलाएं कर रहा है जैसे संसार में वही सब रमा है पर कहीं दुष्ट का रोल हो रहा है कहीं साधु का रोल हो रहा है सब स्वांग हो रहे हैं उसके उसी परमात्मा का तो स्वांग है ये सब समझ पा रहे हैं अजय जी मुरादाबाद से जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जैसे कि आपने अवगत कराया कि गीता जी में स्थित प्रज्ञ के बारे में बताया गया है।

मेरे प्रश्न यह है कि यदि साधक से जाने अनजाने में कोई पाप हो जाए फिर उसके बाद साधक कभी स्थित प्रज्ञ नहीं बन सकता क्या? नहीं क्यों नहीं बन सकता? कपड़ा गंदा हो जाए तो उसे धुला भी तो जा सकता है ना। ऐसा थोड़ी कि गंदा हो गया तो उतार के फेंक दे। हमसे गलती हो सकती है। बड़े-बड़ों से गलती हो सकती है। शिव बिरंच का मोह को है बुरा अस जान भजी मायापति भगवान ब्रह्मा शंकर आदि को भी मोहित कर ले। ऐसी भगवान की प्रचंड माया है। तो फिर हम तो जीव ठहरे। तो इसलिए अगर हमसे गलती हो जाती है तो हम अनुष्ठान करते हैं, नाम जप करते हैं और उस पाप का प्रायश्चित करते हैं।

आगे पुनः ना पाप हो जाए ऐसा दृढ़ संकल्प करते हैं और भगवान के मार्ग में चलते हैं। ऐसा थोड़ी बड़े से बड़े महत अपराध का भी जो हमसे दोष बन गया उसका प्रायश्चित है। उसके प्रायश्चित करके हम आगे चलते हैं। बड़े-बड़ों से गलती हो जाती है। बहुत प्रचंड भगवान की माया है। बहुत प्रचंड माया है। तो इसलिए घबराना नहीं चाहिए। इस मार्ग के साधक को घबराना नहीं चाहिए। किसी भी परिस्थिति में कदम लड़खड़ाना नहीं चाहिए। हमें आगे ही बढ़ना है। हमें आगे ही बढ़ना है। भगवान से प्रार्थना करता रहे।

ऐसी कोई गलती ना हो जाए जिससे मैं निराश होकर आपके मार्ग से हट जाऊं। तो बस उनका बल लेकर के ही आगे बढ़ा जाता है। नहीं तो माया है। समझ में थोड़ी आती कौन माया है। कहां माया है? कैसी माया है। कोई माया का रूप है क्या? वो तो जासु चरित्र लख काहु न पावा जो माया सब जगह नचावा और जास चरित लख काहु न पावा कोई जिसके चरित्र को समझ नहीं पाता कि ये माया वो बाद में यहां गिरते समय पता नहीं चलता गिरते समय नहीं जब गिर पड़ो फिर जो में गिर पड़ा वो भगवान ही है जो हाथ पकड़ ले गिरते समय और आगे निकल जाए इसीलिए एकमात्र मामे प्रपद्य ते माया मेंता तरते जो मेरी शरण में आ जाता है वही माया से मुक्त हो जाता है।

जो माया मुक्त है वही स्थित प्रज्ञ है। पुनीत गर्ग जी राधे-राधे महाराज श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी हमारे विचार हमारे दिमाग में अपने आप उत्पन्न होते हैं। इनमें से कुछ विचार देखो बड़ा विचित्र सिस्टम है कि आप सोचो या ना सोचो सोचुरित होती रहती है। मकड़ी का जैसे जाला नहीं मकड़ी अपने मुंह से निकालती रहती है। ऐसे ही मन जो है भूत का चिंतन, भविष्य का चिंतन, पॉजिटिव चिंतन, नेगेटिव चिंतन, शास्त्र सम्मत चिंतन, शास्त्र विरुद्ध चिंतन ये सब फेंकता रहता है। क्या प्रारब्ध से जुड़ा है?

नहीं प्रारब्ध से नहीं जुड़ा है। इस प्रारब्ध से सुख और दुख जुड़ा है। प्रारब्ध से सुख और दुख जुड़ा है। ये जो चिंतन है ये अज्ञान से जुड़ा है। जो चिंतन जिस समय ज्ञान हो जाएगा तो मन शांत हो जाएगा। अज्ञान की धरा में कभी नेगेटिव कभी पॉजिटिव कभी धर्म युक्त कभी अधर्म युक्त कभी गंदा कभी अच्छाई ऐसे कभी भूत कभी भविष्य। इसी में तो भटकता है। हमको क्या चाहिए? एक लक्ष्य बनाना चाहिए। नाम मंत्र बार-बार इसको नाम जपवाओ, बार-बार मंत्र जपवाओ। इसकी ओवरथिंकिंग पर कंट्रोल करो।

यह जो बहुत विचार कर रहा है इसको रोको। बार-बार राधा राधा राधा वो कहेगा हमारी बात सुनो। हमारी बात ये देखो ये देखो ये अच्छा बुरा सब फेंक राधा राधा राधा राधा। तब वो धीरे-धीरे कम होने लगेगा। वो धीरे-धीरे लगने लगेगा। 10 बार राधा कहोगे तो एक बार तो लग ही जाएगा। 100 बार कहोगे तो 10 बार लग ही जाएगा। और धीरे धीरे धीरे धीरे हम अपने पॉइंट बढ़ाते चले जाएं। दो बार, चार बार, आठ बार लगने लगा, 10 बार लगने लगा। पहले लग ही नहीं रहा था। अब तो लगने लगा है। फिर धीरे-धीरे हम उसको एकाग्र कर सकते हैं।

उसको वश में कर सकते हैं। और जो विचार आ रहे हो नाम जप कर रहे हो तो विचार नष्ट होते जाएंगे। जो अशुभ विचार है और जो सत विचार उनको ग्रहण कर लेना चाहिए। अब ये विचार बंद नहीं होंगे जब तक ज्ञान नहीं हो जाएगा। जब तक भगवत प्रेम नहीं हो जाएगा तब तक ये चलते रहते हैं। भोले पांडे जी श्री महाराज राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि नमन पूज्य महाराज जी जीवन हर क्षण अंत की तरफ बढ़ रहा है। कब अंत समय आ जाए कुछ निश्चित बस यही घबराहट यही घबराहट सबके अंदर जागृत हो जाए तो भजन होने लगे।

यही घबराहट होने लगे कि कब खत्म हो जाए। दुर्लभो मानुषो देहो पर देह नाम क्षणभंगुरा। बड़ा दुर्लभ मनुष्य शरीर है पर क्षणभंगुर है। पता नहीं कब कहां कैसे कौन सी घटना में समाप्त हो जाए। इसलिए राधा राधा राधा राधा राधा हर समय नाम जप करते रहो। तो अगर नाम जप किया राधा और शरीर छूट गया तो भगवान की प्राप्ति भय पता है बट फिर भी इंद्रिय वश हो जाते हैं। सही मायने में अभी पता नहीं लगा है। केवल अभी ऊपर ही पता लगा। जब अंदर ही लगता है ना तो भूख सी बैठ जाती है। एकदम अरे यार जाना है।

मरना है यार। सब छूट जाएगा। राधा राधा हे भगवान हे करुणानिधान मुझे इस दुर्गम संसार से पार करो। मैं बहुत भयभीत हूं। और जो सभी आवा शरणाई रखियो ताई प्राण की लाई। भगवान कहते यदि भयभीत होकर कोई मेरी शरण में आ जाए तो मैं उसे प्राण की तरह रखता हूं। तो हृदय में यदि ऐसे विचार उठने लगे तो भगवान की कृपा समझना चाहिए। नहीं जीव मतवाला होकर भोगों में लगा उसे मृत्यु का भय कहां है? यदि मृत्यु का असली भय जागृत हो जाए तो भजन होने लगे। भगवान में प्रीति होने लगे। संसार का त्याग होने लगे।

समझ पा रहे हो आप? रेनू जी महाराज जी धैर्य की क्या सीमा है? जनेंद्र और रस्द इन दो से जो विचलित ना हो शास्त्र में वही धैर्यवान है। जो जनेंद्रिय और रस्द इन दो से विचलित ना हो कभी उसी को धैर्यवान और दूसरों के द्वारा दी गई प्रतिकूलताओं से ये बहुत साधारण बात है। उन्होंने धैर्य की सीमा पूछी है। उनका शब्द धैर्य रखना चाहिए। ये बात नहीं पूछा। उन्होंने धैर्य की सीमा पूछी। धैर्य की सीमा है। रस्द और जनेंद्रिय दोनों से जो कभी विचलित नहीं हुआ वो धैर्यवान है। अब ये कि तो कोई घटना को या किसी लड़ाई झगड़े को सह जाना वो एक साधारण बातों में आता है।

धैर्यवान वही है। धीरज धैर्यवान वही जिसने रसेंद्रिय और जनेंद्रिय पर विजय प्राप्त कर ली है। रसेंद्रिय और जनेंद्रिय जिसे कभी पराजित नहीं हुआ वही धैर्यवान है। महाराज जी रसेंद्रिय और जनेंद्रिय का मतलब समझो। मतलब क्या मतलब प्रारंभिक स्थिति में हां रसेंद्रिय का मतलब अच्छे-अच्छे पदार्थ खाना और जनेंद्रिय का मतलब संभोग करना जो कभी जनेंद्रिय संभोग से नहीं परास्त हुआ और कभी रस्द कभी जिसने गलती नहीं की जनेंद्रिय से और कभी गलती नहीं की जबान से जो शास्त्र मर्यादित भोजन भगवान को अर्पित करके उचित प्रारब्ध अनुसार जो है उसका भोग इधर अब जैसे मुर्गा माल मछली ये तो अभक्ष पदार्थ है।

लेकिन भक्ष पदार्थ में भी वो जो प्रारब्ध और साथ मिल जाए उसी में स्थित है। उसकी रस्द कभी नहीं कि आज समोसा चटनी खाएं आज ये खाएं। और जनेंद्र अगर गृहस्थ है तो अपनी पत्नी में भाव धर्म पूर्वक कभी किसी माता बहन की तरफ या कभी किसी पुरुष की तरफ जिसकी दृष्टि नहीं गई वो धैर्यवान माना जाता है और ये बहुत बड़ा विषय है। कोई छोटा-मोटा विषय नहीं है। ये बड़े-बड़ों को परास्त करता है। सुभाष चंद्र जी महाराज जी मैं आपका शरणागत हूं। मेरा प्रश्न ये है कि एक शरणागत को काम, क्रोध, लोभ, मद आदि विकार कौन सी स्थिति तक प्राप्त होने तक गिराते हैं और उससे बचने का क्या उपाय है?

शरणागत कहां से हो? शरीर से हो, मन से हो, वाणी से हो, स्वयं से हो। कहां से शरणागत हो गए हो? मन कर्मच। अरे फिर तो काम क्रोध रह ही नहीं जाएंगे। क्योंकि काम क्रोध तो वही आते जहां अहंकार होता है। मैं पुरुष हूं। इसी अभिमान में दोष आते हैं जो देहाभिमान है। अब जब यही बार-बार अंदर दोहराने लगो कि मन कर्म वचन त्रिशुद्ध सकल मतम श्री हित हरिवंश उपासी मन से वचन से कर्म से मैं तो भगवान कहूं। अब मेरा अधिकार ना शरीर पर है, ना मन पर है, ना वाणी पर है। मैं तो प्रभु की शरण में हे नाथ जो कच्चाई हो आप पूरी कर लो।

मैं आपकी शरण में हो जाऊं। प्रभु आपसे एक ही उपाय है भगवान की शरणागति इन दोषों से बचने का। जब हमारा अधिकार खत्म हो जाएगा हमारी समझ वाला तो भी होगा कि हाथ तो प्रभु का है तन तो प्रभु का है मन प्रभु का है तो भोग इच्छा होती है देहा अभिमान में देहाभिमान गलित होने पर भोग इच्छा नहीं होती इच्छाएं ही खत्म हो जाती है जाह न चाह कबहु कछु तुम सन सहज सनेह बसो निरंतर तासुर सुरा निज के जिसे कभी कुछ नहीं चाहिए सहज भगवान से प्रेम होता है। उसके हृदय में भगवान निरंतर वास करते हैं।

प्रगट रूप हो के तो चाह मिटाना ही तो साधना है। तो हम बार-बार भगवान के नाम जप के प्रभाव से और विवेक के प्रभाव से भोगों से बचें और जब काम क्रोध आवे तो भगवान को पुकारे। आपको समर्पित हृदय है और ये काम क्रोध रूप दूषित विचार हमारे हृदय को दूषित कर रहे। नाथ आप बचाओ। हे शरणागत प्रतिपाल बचाओ वही कृपा करेंगे वही रक्षा करेंगे परम पूजनीय महाराज जी जीवन ऐसा ये भौतिक मोह माया से ऐसा लिप्त होकर पूरी बर्बादी हो रही थी संत जीवन जी के भी लेकिन आपके एक संदेश से और एक मार्गदर्शन से जब से हम श्री जी का शरण लिए तब से मोह माया ये सारा राग ममत्व भाव ये सारा भस्म हो गया ये कलयुग की घोर जो माया थी उसमें हम ऐसे बर्बाद हो रहे थे ये मंदिर निर्माण आदि 108 मंदिर निर्माण तो जब प्रयागराज से आए और आपने हमें संदेश दिया कि जन के लिए तो

आप मंदिर बनवा रहे हैं लेकिन आपके शुद्ध अंतकरण का है तो हमारे अंदर शुद्ध भक्ति नहीं थी लेकिन शुद्ध भक्ति जागी आपने और जब श्रीमद् भागवत का मुझे एक उस देवर्षि नारद का उस उन्होंने जैसे भक्ति ज्ञान वैराग्य जागृत किया था मेरे अकेले के लिए नहीं आपने जागृत नहीं किया है भक्ति असंख्य ब्रह्मांड के जितने भी युवा हैं जितने भी बच्चे वृद्ध सभी के अंदर जो कमियां थी गंदगी थी जो भटक गए थे रास्ता भटक गए थे धन्य हैं हम कि हमारे भारत में आपके जैसे संत और हमें मार्गदर्शन मिल रहा है श्री जी के कृपा से आज युवा कहां से कहां गए थे लेकिन ब्रह्मांड के विश्व के जैसे ऑस्ट्रेलिया के अमेरिका के जो माताएं हैं प्रभु जी हैं एक माता जी तो इतनी रोती है आपका नाम जैसा भी मैं लेता हूं।

तो वो बोलती है बस उनके कारण मेरे अंदर की गंदगी खत्म हो गई। चारित्रहीन मैं थी लेकिन मेरे अंदर से सारा पाप भस्म हो गया। केवल सत्संग सुन के। जैसे नारद पीपल के पेड़ के नीचे केवल सत्संग सुन के ही उनका उद्धार हुआ था भगवान का। बस ये युवा जो है मेरे मैं मुझे मेरे जीवन में संत जीवन बचपन से जीकर भी इतना भौतिक लोभ, लालच, माया, काम ये सारा था। लेकिन केवल आपकी शरण लिया श्री जी की शरण लिया और आज चातुर्मास यहां नित्य कर रहे सब छोड़ के सारा मोह माया छोड़ के मंदिर निर्माण यदि सब कुछ छोड़ के वृंदावन वास कर रहे और नित्य परिक्रमा और आपका चिंतन बस आपका आशीर्वाद यही रहे तो यही शरणागति है जब हम हृदय से भगवान को प्रियाजु को स्वीकार कर लेते हैं तो वही हमारे अंदर के सब मलिनता को दूर कर देती है तो हम पहले वचन के शरणागत फिर शरीर के शरणागत त फिर मन के शरणागत फिर स्वयं से शरणागत स्वयं से मैं तनवांग मनोभी रमले सोहम तव वासिता शरीर से मन से वाणी से और स्वयं से हे प्रियाजु मैं आपके शरण में हूं जब अंदर से शरणागति आ जाती है तो विकार खत्म होने लगते हैं।

हृदय आनंदित होने लगता है। स्वयं का अनुभव सत्य का दर्शन स्वयं का अनुभव सत्य का दर्शन हुआ। ये चमत्कार नहीं तो क्या है और आज युवा कहां से कहां जा रहे थे महाराज जी कैसे-कैसे प्रश्न पूछ रहे थे लेकिन एक एक वाणी से एक संदेश से आपके उस युवाओं का जीवन शुद्ध हो गया और भक्ति जागृत हुई उनके युवाओं के हृदय में वो आप ही की कृपा है श्री जी की कृपा है ऐसा भारत में ये जो कल्याणकारी जन कल्याण काम हो रहा है ये कैसे बताएं आपको हमें हृदय भर के आ रहा है कि आपके वार से ऐसा ऐसा काम हो रहा है भगवान केवल करवा निमित्त बनाते हैं।

करने वाले तो भगवान करें करावे आप सब और जने बई दे वो अपने जन को बढ़ाई देते हैं। करते तो स्वयं श्री भगवान ही है। उन्हीं का सारा खेल है। जी गणेश महाराज राधे-राधे महाराज जी महाराज जी सद्गुरु की सेवा करते-करते अगर कुछ प्रॉब्लम आ जाए तो वो प्रॉब्लम को कैसे देखें? कौन सा प्रॉब्लम? मानसिक, शारीरिक या मतलब दोष दर्शन ये देखना होगा। अपन जो सेवा कर रहे हैं सद्गुरु की सेवा करते-करते अभी 32 साल हो गए तो कुछ ऐसा कुछ आ जाता है क्या वही तो हम जानना चाहते हैं नहीं हम मुझे ऐसा कोई कुछ बोल जाता है तो ऐसा थोड़ा ये हो जाता है नहीं किसी किसी के बोलने से हमें नहीं सेवा में जब हम रथ है तो अभी गाली दे उससे कोई मतलब नहीं कोई विरोध प्रकट करे उससे मतलब नहीं गुरुदेव अगर हमारा सेवा छुड़ा रहे हैं तो उसमें समस्या फिर आ सकती वो तो नहीं छोड़ना तो बस फिर किसी से हमें मतलब नहीं।

हम सेवा करने जा रहे हैं। रोज हमको कोई गाली दे तो क्या फर्क पड़ता है? हमें रोज कोई विरोध करे तो क्या बस जिनकी हम सेवा करने जा रहे हैं उनसे विरोध नहीं होना चाहिए। बस और तो ये माया विरोध करती है भैया। कौन से भक्ति के चरित्र में ऐसा पाया गया कि पूरा जीवन वो आबाध निकल गया। बाधाएं पहुंचाई है। माया ने सहना पड़ा है। नाना प्रकार के प्रपंच और सब खटमंडल होते रहते। माया अपना जाल बिछाती रहती है। भगवान भक्त को निकालते रहते हैं। बस उन्हीं की कृपा से निकला जा सकता है।

दूसरा कोई उपाय नहीं। भगवान की कृपा ही भक्त को निकालती है। जब से आपका प्रवचन जो सुनने लगे तब से ऐसा सब नॉर्मल होगा। जो आपका जो सुनते हो वो तो बहुत उसमें आनंद में एनर्जी आ जाती है। ऐसी जी जी ऐसा वो भगवान की कृपा से महाराज जी एक घर गृहस्ती वाली समस्याएं अलग है। संत जीवन में भी मानसिक प्रतिकूलताएं कभी ऐसी आ जाती हैं काम, क्रोध, लोभ की। महाराज जी वो जब आप गुरुजनों के जब वाक्य सुनते हैं तो महाराज जी उससे एक बहुत एक सहायता मिलती है साधन में आगे बढ़ने के लिए महाराज जी।

भक्ति मार्ग जो एक रास्ता लेकर और एक लक्ष्य लेकर घर से निकले थे महाराज जी। बट बीच में माया के भी ऐसे पड़ाव आते हैं। उनमें जब आपके वचन या गुरुजनों के जो वचन है वो हमें एक मार्गदर्शक की तरह आगे लेकर जाते हैं। महाराज जी। देखो क्या है कि अगर हम कहां जा रहे हैं यह हमें ध्यान है और हम किनके हैं यह हमें ध्यान है तो हमसे छोटी-मोटी गलती हो जाने पर या बड़ी भी गलती हो जाए तो भगवान त्यागते नहीं है वो फिर उसको थोड़ा सा अंधकार सा लगता है मार्ग में फिर आगे प्रकाश मिलता है और वो जीव चलता है पर जिनको यह पता ही नहीं कि मुझे कहां जाना है लक्ष्य ही नहीं बनाया भगवत प्राप्ति थोड़ा धर्म कर्म वो बात अलग है लेकिन जिन्होंने लक्ष्य बना लिया है हम यह नहीं कह सकते कि गलती नहीं हो सकती किसी से भी गलती हो सकती है कभी भी हो सकती है भगवान की बहुत प्रचंड माया है जो आकर्षण करके चित्र को लुभाए लेती है हां तो इसलिए हम ऐसे रहे हर समय और अपने इष्ट के गुरु के सन्मुख रहें कोई भी व्यवधान आए उसे चुपचाप सहकर निपटाएं हम लड़ाई झगड़ा ना करें हम विरोध ना करें साध साधु का काम विरोध करना नहीं विरोध सहना है।

साधु का काम विरोध सहना है। विरोध करना नहीं है। मारपीट सहनी है। मारना पीटना नहीं है। अपमान सहना है। अपमान करना नहीं है। सब मान प्रदामानी और नाम जप करो भगवान बचाएंगे। भगवान निर्वाह करते हैं। गुरु ही भगवान है। भगवान ही गुरु है। पद्मेश शर्मा जी लखनऊ से। राधे-राधे महाराज जी। राधे-राधे महाराज जी महाराज जी हम भजन कीर्तन सब करते हैं किंतु हमसे जाने अनजाने में बहुत सी गलतियां और पाप हो जाते हैं तो क्या इस अवस्था में हमारे द्वारा किया गया भजन कीर्तन पुण्य क्या यह सब नष्ट पहली बात तो ये समझ लीजिए कि भजन कभी नष्ट नहीं होता पुण्य बात अलग है पुण्य नष्ट हो जाता है जैसे आपने किसी को खवाया पिलाया दान किया वो पुण्य के अंतर्गत आएगा वह तो नष्ट हो जाएगा लेकिन आपने राम कृष्ण हरि भगवान का नाम जप किया राधा राधा राधा ये कभी नष्ट नहीं होता किए गए गलती और पाप क्या हमारे भजन से नष्ट होते हैं हां भजन से नष्ट हो जाएंगे भजन कभी नष्ट नहीं की हुई गलती से भजन नष्ट नहीं होगा भजन उनको नष्ट कर देगा पर बार-बार हम गलती क्यों करें अगर हमें पता चल रहा है कि हमसे गलती हो रही तो हमें सुधार करना चाहिए मतलब अब हम भजन के बल से गलती बढ़ाते चले जाए तो नामा अपराध लागू हो जाता है।

मतलब जैसे दवा है और आप उसे नशे के रूप में लेने लगे तो फिर वो अपराध हो जाएगा कि नहीं हो जाएगा? तो यह दवा है भगवन नाम भव रोग की अचूक दवा है। अब इसका प्रयोग करने लगे आप पाप नाश करने के लिए और पाप करने लगे मनमानी तो नरक जाना पड़ेगा। क्योंकि नामा अपराध है। आप गलत प्रयोग कर रहे हो। मैं उत्साह पूर्वक पाप नहीं करना चाहता पर पाप हो गए हैं। वो सब नाम से भस्म हो जाएंगे। हमें भगवान की तरफ कृपा घसीटेगी पर हम पाप जानबूझकर ना करें। साध्वी सत्यप्रिया जी जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी युवाओं में राष्ट्रभक्ति कैसे जागृत हो?

देखो जब तक हमारा हृदय स्वार्थ की मलिनता से युक्त है तब तक वो भगवान के प्रति समर्पण या राष्ट्र के प्रति समर्पण नहीं होता। जब हमारा परहित की भावना जागृत हो जाए कि दूसरों का मंगल हो तो पहले घर का मंगल हो फिर पड़ोस का मंगल हो फिर ग्राम का मंगल हो फिर प्रदेश का मंगल हो फिर राष्ट्र का मंगल हो राष्ट्र के मंगल के लिए बहुत विशाल हृदय चाहिए बहुत पवित्र हृदय चाहिए प्राणों को बलिहार करने का जैसे हमारे पास आर्मी के जवान आते हैं वो अपनी समस्या रखते हैं कि जब मैं घर से छुट्टी से चलता हूं।

मेरे परिवार के जनों के आंसू होते हैं और बच्चा उंगली पकड़ के कहता है पापा कब आओगे? तो मुझे विश्वास नहीं कि दोबारा मैं आ पाऊंगा कि नहीं। तो महाराज जी हृदय फटता है। तो हम कहा फिर भी आप वो सेवा कर रहे हैं कि आप रात को जब जगते हैं तो हम चैन से सोते हैं। अगर आप ऐसे बलिदान ना करें तो हम सुरक्षित ना रहे। धन्य है आपका जीवन और हम एक सन्यासी का और एक सैनिक का जीवन समान कोटि से रखते हैं कि वह भी संसार का त्यागी और वो भी संसार को त्याग कर प्राणों को बलिहार करने के लिए खड़ा हो।

तो जब तक हमारे युवाओं में स्वार्थ बुद्धि का त्याग नहीं होगा। स्वार्थ बुद्धि में वासनाएं रहती हैं और परमार्थ बुद्धि में उपासना रहती है। जब हमारी परहित भावना जागृत हो और यह परहित भावना बिना अध्यात्म ज्ञान के नहीं जागृत होती। थोड़ा ना थोड़ा तो अध्यात्म ज्ञान होना चाहिए। अगर हमारी इंद्रियों की विलासिता, खानपान की विलासिता, व्यसन की वासनाएं ये बढ़ती गई तो युवा सब असमर्थ होते जाएंगे। वासना असमर्थ कर देती है, खोखला कर देती है और उपासना समर्थ करती है। देखो मुस्कुराते हुए फांसी के फंदे को चूम कर बंदे मातरम बोलकर झूम जाना और आज हम अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए किसी के चैन छीन रहे हैं।

किसी के रुपए काट रहे हैं। कहीं हम इधरउधर तो नशा इतना बढ़ता जा रहा है। वासनाएं इतनी बढ़ती जा रही हैं कि परहित की भावना ही गायब होती सी नजर आ रही है। दूसरे का हित हो। अब देखो एक जवान आदमी बैठा है और एक बूढ़ी मां खड़ी है। उसको इतना ज्ञान नहीं है कि ये वयोवृद्ध है। हम खड़े हो जाते हैं। हमें कोई परेशानी नहीं। लेकिन इसको खड़े होने में भी परेशानी। परी की भावना नहीं रह गई। जवान बेटा अपने माता-पिता को तिरस्कार कर रहे हैं। जब अपने माता-पिता को तिरस्कार कर रहे हैं तो राष्ट्र की भावना उनमें कैसे पुष्ट हो जाएगी?

पूरे राष्ट्र को सुख देने की भावना तो हमें लगता है शास्त्रों का स्वाध्याय, संतों का संग, पवित्र भोजन यही हमें राष्ट्र भावना को पुष्ट करेगी। यदि हम नशा करेंगे, गंदा भोजन करेंगे, गंदे आचरण करेंगे तो हमें अपनी सुरक्षा की भावना नहीं रह जाएगी। हमें अपने समाज की सुरक्षा की भावना नहीं रह जाएगी। फिर राष्ट्र की सुरक्षा अब शराब पीना, ड्रग्स लेना, हुक्का पीना ये सब अपने जीवन को नष्ट कर देने वाली बातें हैं। जिन भाइयों में है उनको छोड़ देना चाहिए। अपने कम से कम परिवार का तो हित देख लो।

अपना हित देख लो। फिर धीरे-धीरे ग्राम, नगर, प्रदेश और राष्ट्र तक पहुंचो। मनुष्य जीवन इस तरह व्यर्थ करने के लिए नहीं मिला कि हम किसी व्यसन के आधीन हो जाए। किसी वासना का शिकार बन जाए। हम भगवान के बल से बलवान होकर अपने पूरे देश को पूरे विश्व को आनंद प्रदान करें। यह तो आध्यात्म बल ही उनको पुष्ट कर सकता है। राष्ट्र सेवा के अंतर्गत क्या-क्या आता है? सब कुछ आता है। माता-पिता की सेवा राष्ट्र सेवा के अंतर्गत ही आती है। परिवार की सेवा राष्ट्र सेवा के अंतर्गत ही आती है।

पूरे ग्राम की सेवा राष्ट्र के अंतर्गत आती है। अपने को संभाल लेना राष्ट्र सेवा के हम भी तो राष्ट्र का एक हिस्सा हैं। हमारा शरीर भी तो राष्ट्र का एक हिस्सा है। अगर हम व्यसन नहीं करते। हम कोई पाप आचरण नहीं करते। धर्म से चलते हैं तो हम अपने राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं। हम एक समाज के एक अंग हैं। अगर हम एक गंदे हैं तो हमारा समाज के एक अंग गंदा है। हमारे राष्ट्र का एक अंग गंदा है। अगर हम अपना सुधार करते हुए दसियों को सुधार के मार्ग में ले चले तो हम राष्ट्र सेवा ही कर रहे हैं।

जरूरी नहीं कि बॉर्डर पे ही सेवा हुई राष्ट्र नहीं नहीं बॉर्डर और अंदर सब जगह सेवा होनी चाहिए। अंदर भी तो हमारे जो दुर्वासना रूपी शत्रु है उसको परास्त करना है ना। वो अध्यात्म के बिना परास्त नहीं होता। दुर्वासनाएं मम सदा परिकर्षती जो दुर्वासनाएं खींचकर हमारे द्वारा पाप कराती है। जैसे बहन बेटियों के साथ गलत आचरण करके उनकी हत्या कर देना या लूटपाट करना हिंसा करना छोटी-छोटी बातों में अपने भाई बहन के रिश्तों को नष्ट कर देना। भाई भाई की हत्या कर रहा है। पत्नी पति की हत्या कर रहे पति पत्नी की हत्या कर रहे।

ये सब जो दुर्वासनाओं का खेल है ये जो मतलब गंदी बातें अंदर आ गई जो हिंसात्मक वृत्तियां आ गई इनका त्याग हो तभी हमारी राष्ट्र सेवा होगी एक ग्राम में कोई घटना घटती है और वो पूरे राष्ट्र में फैलती है पूरे राष्ट्र को दुख मिलता है कि नहीं मिलता हुआ और एक ग्राम का बच्चा कोई फर्स्ट क्लास पास होता है या किसी अच्छे ग्रेजुएट पद पे जाता है तो हमारे राष्ट्र की उन्नति का वो एक हिस्सा बना तो हमें राष्ट्र सेवा का मतलब केवल बॉर्डर पर गोली चलाना ही नहीं है। हम पढ़ लिख के जो भी मास्टर डॉक्टर जो भी किसान जो भी बनते हैं वह राष्ट्र के अंतर्गत राष्ट्र सेवा के अंतर्गत मतलब तो जो जहां है जैसे है वो अपनी सेवा अच्छे ढंग से करे तो राष्ट्र सेवा ही बिल्कुल अगर एक किसान किसानी ना करे अन्न पैदा ना करे तो हमारे राष्ट्र की हानि हो जाएगी।

वो अपनी जगह अगर एक मास्टर बच्चों को शिक्षा ना दे तो हमारे राष्ट्र की हानि हो जाएगी। एक वकील, एक डॉक्टर, एक न्यायाधीश जो जहां है एक पत्नी, एक पति वह सब राष्ट्र के अंग है हमारे। अगर ये अपनेप कर्तव्य का निर्वाह करें तो सब राष्ट्र सेवा के अंतर्गत आता है। हमारा राष्ट्र सुशील, शांत, गंभीर, आनंदमय, प्रसन्न मुद्रा तो ये हमारी पूरी सेवा ये कब होगी? एक-एक सुधरे। एक-एक सुधरे तब हमारी बात बनेगी। पर हमें तो लगता है कि दूसरा सुधरे तो फिर ठीक रहेगा। यही यही हमारी बातें रहती है कि हम जैसे हैं तैसे बने रहे लेकिन दूसरा में कहा था कि श्री जी का एक महीना चारित्र्य शुद्ध रखो शुद्ध अंतकरण रखो और भक्ति करके देखो आपको कैसे चमत्कार हो गया आप देख लो सच्ची में हमने वो चमत्कार यहां पाए हैं वैसे मैं दीदी मां साध्वी ऋतमरा जी की शिष्या हूं यही वास्तविक ग्राम से तो भक्ति के ऊपर आपके बहुत सुंदर लोगों में अभी जैसे आपने भी बताया कि बहुत बड़ा तो आज हम तो आपके आपके चरणों में कृतज्ञता व्यक्त करने आए थे।

कारण बहुत बड़े समाज के अंदर बहुत कृतज्ञता तो आप सबके चरण रज का प्रभाव ही है और कुछ नहीं। सब संतों का आशीर्वाद सबके चरण रज। महाराज जी ये प्रश्न काफी सारे ऐसे माता-पिताओं का है। इन्हीं का नहीं है कि जैसे बेटे का शादी किया। अभी बहू आई और फिर बहू बेटे के पक्ष में हो गई या बेटा बहू के पक्ष में हो गया और माता-पिता से एक रूखापन। फिर कह रहे हैं कि ऐसी स्थिति में जिसको पाला पोसा बड़ा किया और जब उसकी तरफ से कटुता होती है तो महाराज जी जब बड़ा हृदय वृद्धि आपकी समस्या नहीं है।

बहुत माता-पिताओं की समस्या है क्योंकि बच्चे अध्यात्म से जब तक नहीं जुड़ते तब तक उनको यह समझ में नहीं आता कि मातृ देवो भव पितृ देवो भव हमारे माता-पिता हमारे भगवान हैं। ऐसा भाव नहीं आता। तो स्वार्थ में बुद्धि मलिन हो जाने के कारण अभी तो आप चल पा रहे हैं तो रूखापन है और जब चल नहीं पाएंगे तो एकदम विरोधी भाव आ जाएगा। जब आप खाट पर सोच करेंगे ना और उनको फेंकनी पड़ेगी ना तब गालियां खानी पड़ेगी। कोई विशेष श्रद्धावान अपने ऐसे माता-पिता की सेवा कर पाता है। नहीं तो बहू सास को पीट रही है।

बेटा मां-पिता को मार रहा है। लात दंडों थप्पड़ों से। तो ये जो अध्यात्म विहीन हैं जिन्होंने शास्त्र स्वाध्याय नहीं किया जिन्होंने भजन नहीं किया तो उनके अंदर एक आसुरी बुद्धि पलती रहती है। आसुरी माने राक्षसी बुद्धि और वह समय आने पर राक्षसी स्वरूप प्रकट यह रा आसुरी बुद्धि है जो अपने माता-पिता को मारे पीटे कष्ट दे उनको गालियां दे दैवी बुद्धि है कि उनके चरण छुए उनको भगवान की दर्जा दे और उनका पोषण करें अवस्था जैसेजैसे ढलती जाए तो वैसे दुलार करें जैसे हमारा दुलार माता-पिता ने किया बेटा और बहू भी तो एक दिन बूढ़े होंगे हां देखो अगर हम अपने माता-पिता पिता को कष्ट देते हैं तो हमारे जो पुत्र होंगे वह हमको उससे 100 गुना बढ़ के कष्ट देंगे क्योंकि वह ब्याज भी तो मिलेगा तो इसलिए नए बच्चों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह भी किसी दिन माता-पिता बनेंगे और वह किसी दिन वह भी बूढ़े होंगे तो अपने माता-पिता के साथ असभ्य व्यवहार नहीं करना चाहिए।

आसुरी व्यवहार नहीं करना चाहिए। यार जिस कोख से पैदा हुए हो उसको तुम लात मार रहे हो उसकी आरती उतारनी चाहिए। माता तो देवी है और पिता भगवान का स्वरूप है। ऐसा भाव। पर ये भाव तभी आएंगे जब सत्संग सुनोगे। अध्यात्म में चलोगे। अगर अध्यात्म की बात नहीं सुनोगे तो राक्षसी भाव आएगा कि चलो किसी अनाथालय में छोड़ आते हैं। फुटपाथ में छोड़ आते हैं। ऐसे तो हमें लगता है आज हमारे नौजवानों को अध्यात्म श्रवण करने की आवश्यकता है। शास्त्र श्रवण करें, संतों की बात सुने जिससे समझे तो माता-पिता कौन है?

माता-पिता की आराधना से भगवान विट्ठल आज जो महाराष्ट्र में विराजमान है वो माता-पिता की आराधना से ही प्रकट हुए। पुंडरीिक नाम के एक भगत अपने माता-पिता को भगवान मानकर आराधना करते थे तो भगवान स्वयं चलकर दर्शन देने आए। जो विट्ठल रूप में है ना वो स्वयं दर्शन देने आए। माता-पिता की आराधना भगवान की आराधना है। पर कलयुगी बच्चे नहीं समझ पा रहे हैं। वो अपने माता-पिता को दुख दे रहे तो उनके बच्चे उनको दुख देंगे। पक्का समझो ब्याज सहित मिलेगा। यहां सब कुछ ब्याज सहित मिलता है।

तो गुरुदेव ये कर्म तो छूटेगा ही नहीं। बच्चों को उनके किए का कर्म मिल रहा है। फिर उनके तो यही तो कर परंपरा हम आज तक भोग रहे हैं। जब से सृष्टि हुई तब से यही तो भोग रहे हैं। बार-बार जन्म बार-बार मरण बार-बार जन्म बार-बार मरण कहां मुक्त हो रहे हैं हम? ये कर्म परंपरा चली आ रही है। वैसे दुष्ट होते चले जा रहे हैं। अब ये अध्यात्म शिक्षा बचपन से दिए होते। गलती इनकी भी है। आधुनिक शिक्षा ही केवल दी। अध्यात्म की शिक्षा नहीं दी तो वो क्या जाने अगर यह शुरू से कहते हैं छुओ पैर प्रातः काल उठकर के रोज मम्मी के पैर छुओ हाथ जोड़ो बड़े से बड़े भाई से हाथ जोड़ो ये सिखाया गया है जैसे हम लोग छोटे थे ना करा ग्रे वस्ते लक्ष्मी कर्म सरस्वती बोले हाथ छुओ धरती के पैर छूओ चलो अम्मा के पैर छू जाके पिताजी के पैर छूओ बड़े भाई जैसे ऐसे शिक्षा तो अब वो रोज की दिनचर्या बना दी उठे ऐसे ऐसे करते हुए अम्मा के पैर छू तो बोले खुश रहो।

अब जिनके रोज पैर छू रहे हैं तो हमारी सद्भावना बन रही है ना। उनका आशीर्वाद बन रहा है। अब कौन बच्चा रोज माता-पिता के पैर छूता है? कोई बिरला ही नहीं बिरला ही होगा। हमें लगता है जो रोज सुबह उठकर अपने माता-पिता के पैर छुए वो सत्संगी होगा। बिना सत्संगी के तो माता-पिता के पैर माता-पिता को माता-पिता मान ले। भगवान ना माने कम से कम माता-पिता मान ले। इतनी बड़ी बात है। वैसे तो भगवान का दर्जा दिया गया है माता-पिता को। वेद कहता है मातृ देवो हो, पितृ देवो हो। इसलिए अरे जी पूर्व के कर्मों को तो हम देख नहीं पाते कि क्या आने वाला है।

बट कभी-कभी परिवार में जैसे माता जो माता-पिता हैं वो अपने बुजुर्गों के पाव छू रहे हैं। तो यह प्रभाव बच्चे पे पड़ रहा है। पड़ोस के चाचा लगते तो चाचा दंडवत। क्या जाता है? सब में भगवान विराजमान है। सब में भगवान विराजमान है। अगर हम अपने भगवान को चाचा ताऊ कह के दंडवत करते तो वही तो विराजमान है। तो इसलिए हमें लगता है कि नम्रता विनय ये हमारे समाज में कम होती जा रही है। नहीं होती जा रही है। जो पढ़े लिखे बच्चे हैं उनको विनय होना चाहिए। विद्या विनयम ददाति विद्या विनय सभ्यता सिखाती और आज का पढ़े लिखा बच्चा असभ्य होता जा रहा है।

माता-पिता से कहा तुम अपना देखो हम देख लेंगे। कुछ तो पेरेंट्स भी अभी ना मतलब मॉडर्न स्टाइल से चलना चाहते हैं थोड़ा बच्चों को ही क्योंकि खुद अध्यात्म नहीं है महाराज जी इसलिए वो चाहते हैं कि जैसे हम है वैसे ही बच्चे बने और क्योंकि बिल्कुल महाराज जी दिशा विहीन उनका ही खुद का ही जीवन है तो फिर कैसे हां मॉडर्न लाइफ जीने के चक्कर में होते तो फिर वो मॉडर्न बच्चे टट्टी नहीं उठाएंगे फिर तुम्हें पड़े रहना पड़े महाराज जी अगर सबको गुरु के चरण कमलों में समर्पित कर दिया जाए फिर कर्म बंधन नहीं देखो देखो जब तक कोई समर्पित होना नहीं चाहेगा तो किसी को समर्पित करने से कोई समर्पण नहीं होता।

मनुष्य शरीर कोई फल फूल नहीं है। वो समर्पित नहीं होना चाहता तो हमारी ताकत नहीं कि हम उसको बदल दें। आप बदलना चाहो तो हमारी बात मान के आप अपने को बदल सकते हो। बच्चों को विवेकवान बनाने के लिए उनको सत्संग सुनाओ। उनको आप आचरण सिखाओ। और वो धीरे-धीरे चाहे कि हम संत वाणी सुनकर के सुधरे तो वो संभल जाएंगे। पर जी इसीलिए शायद पहले गुरुकुलों का निर्माण था कि कुछ समय के लिए बच्चे हां माता-पिता से अलग हो तो बहुत अच्छे बहुत अच्छे परिवार को चलाने वाले बनते थे क्योंकि गुरुकुलों में सब आध्यात्मिक और आधुनिक दोनों शिक्षाएं दी जाती थी तो इसलिए वो बहुत विवेकवान होते थे।

गृहस्ती को भी चलाते थे। संयम से भी रहते थे। अब आज की पढ़ाई में आधुनिकता तो है लेकिन आध्यात्मिकता नहीं है। तो आध्यात्मिक पढ़ाई ना होने के कारण विनय की बहुत कमी होती जा रही है। नहीं पढ़े लिखे बच्चे विनय से बहुत दूर होते जा रहे हैं। नहीं जितना ग्रेजुएट उतना अहंकार है उतना जबकि जितना ग्रेजुएट उतना सरल होना चाहिए कि आप बहुत पढ़े-लिखे व्यक्ति की पहचान यही सभ्यता सरलता आप गाड़ी में बैठे बस में जा रहे हैं। कोई बड़ा बूढ़ा खड़ा है। आइए दादा जी आप बैठ जाइए।

हम तो खड़े भी रह सकते हैं। आप तो लगा पढ़ा लिखा है। नहीं लगा कि पढ़ा लिखा है। सभ्य आदमी है तो पढ़ा लिखा का सब संबंध सभ्यता और विनय से है। और आज सभ्यता और विनय दोनों गायब हो जा रहे हैं। पढ़े-लिखे तो बहुत लोग हैं। सभ्यता और विनय जा रहा है। तो हमें लगता है आध्यात्मिक शिक्षा ही सुधार सकती है। गुरुदेव भगवान हम बच्चे तो नादान है। उनको समझ नहीं है। उनके कल्याण के लिए कहीं ना कहीं हम नाम जप करके समर्पित करें तो क्या होगा? हां हो जाएगा हां बिल्कुल परिवर्तन होगा और उनको बैठाल करके राधा राधा बुलवाओ 10 मिनट 10 मिनट राधा राधा बुलवाओ और नाम जप करके उनको दो तो निश्चित परिवर्तन होगा निश्चित होगा महाराज जी बट उनको भी ऐसा लगता है कि हमारे जान पे आ रहा है ये सब कुछ करना कि मतलब बता भी रहे हैं कि हम कि ये इतना करो तब आप करो आपको नाम जब करना पड़ेगा बट वो फिर भी नहीं करना चाह रहे एकद दिन करेंगे फिर हफ्ते बाद फिर फुसला दे फिर फुसलावे हफ्ते में अगर एक दिन भी करने लगे ना तो हम

हमारी बात तो मानने लगे ना हम दो दिन करवाएंगे फिर हफ्ता भर कहने के बाद तीन दिन करवाएंगे हम धीरे-धीरे उनको सतार्ग में देखो बच्चों को खिलवाड़ में भजन कराया जाता है देखो तुम्हारे लिए हम बाल भोग बना रहे हैं तब तक तुम राधा राधा अगर राधा राधा बोलना बंद किया तो नहीं मिलेगा राधा राधा राधा राधा राधा राधा शुरू हो जाएंगे बच्चे हैं और इसके बाद फिर खेलने लगे ऐ राधा राधा राधा राधा राधा ऐसे मतलब प्यार से दुलार से आओ हम सब बैठते हैं देखो भगवान जी की कथा सुना सुनो

चुपचाप बैठो। देखो ये क्या संत कह रहे हैं। सुनो धीरे धीरे धीरे वो अनजाने में उनका सुधार हो रहा है। वो ना जाने तो भी सुधार हो रहा है। जब गर्भस्थ शिशु प्रहल्हाद को नारद जी ने उपदेश किया तो समझ में आ गई ना अभिमन्यु को उपदेश किया अर्जुन जी ने तो चक्रव्यूह तोड़ना गर्भ से जान गए। तो गर्भस्थ शिशु को कितना ज्ञान वो तो अब बाहर आ चुका है। अगर हम सुनाएंगे तो उसके संस्कार बदलेंगे। उसके भाव बदलेंगे। राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा इतना तो कबहु हसी दे इतना तो कबहु हंस देहु सुनहु कृपालु किशोरी राधे राधे सुनहु कृपाल किशोरी राधे राधे राधे राधे राधे सुनहु कृपाल किशोरी राधे अवसी कृपा की कोल चित्त इतनो तो अबहु हस हो तुम मोहि मिलो मिलो ना कृपाानिधि मोको ढूंढत तो भटके हो तुम मेरी सुनो सुनो ना किशोरी मो को तो नित दीन रटे हो तुम मेरी बा मेरी बा आ

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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