बेटा और बहु दोनों अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं मन दुखी हो जाता है क्या करूँ?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
महाराज जी ये प्रश्न काफी सारे ऐसे माता-पिताओं का है। इन्हीं का नहीं है कि जैसे बेटे का शादी किया। अभी बहू आई और फिर बहू बेटे के पक्ष में हो गई या बेटा बहू के पक्ष में हो गया और माता-पिता से एक रूखापन फिर कह रहे हैं कि ऐसी स्थिति में जिसको पाला पोसा बड़ा किया और जब उसकी तरफ से कटुता होती है तो महाराज जी जब बड़ा हृदय वृद्धि आपकी समस्या नहीं है बहुत माता-पिताओं की समस्या है क्योंकि बच्चे अध्यात्म से जब तक नहीं जुड़ते तब तक उनको ये समझ में नहीं आता कि मातृ देवो भव पितृ देवो भव हमारे माता-पिता हमारे अरे भगवान है ऐसा भाव नहीं आता तो स्वार्थ में
बुद्धि मलन हो जाने के कारण अभी तो आप चल पा रहे हैं तो रूखापन है और जब चल नहीं पाएंगे तो एकदम विरोधी भाव आ जाएगा जब आप खाट पर पहुंच करेंगे ना उनको फेंकनी पड़ेगी ना तब गालियां खानी पड़ेगी कोई विशेष श्रद्धावान अपने ऐसे माता-पिता की सेवा कर पाता है नहीं तो बहू सास को पीट रही है बेटा मां-पिता को मार रहा है लादंडों थप्पड़ों से तो यह जो अध्यात्म विहीन हैं जिन्होंने शास्त्र स्वाध्याय नहीं किया जिन्होंने भजन नहीं किया तो उनके अंदर एक आसुरी बुद्धि पलती रहती है।
आसुरी माने राक्षसी बुद्धि और वह समय आने पर राक्षसी स्वरूप प्रकट यह आसुरी बुद्धि है जो अपने माता-पिता को मारे पीटे कष्ट दे उनको गालियां दे दैवी बुद्धि है कि उनके चरण छुए उनको भगवान की दर्जा दे और उनका पोषण करें अवस्था जैसेजैसे ढलती जाए तो वैसे दुलार करें जैसे हमारा दुलार माता-पिता ने किया बेटा और बहू भी तो एक दिन बूढ़े होंगे हां देखो अगर हम अपने माता-पिता पिता को कष्ट देते हैं तो हमारे जो पुत्र होंगे वह हमको उससे 100 गुना बढ़ के कष्ट देंगे क्योंकि वह ब्याज भी तो मिलेगा तो इसलिए नए बच्चों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह भी किसी दिन माता-पिता बनेंगे और वो किसी दिन वो भी बूढ़े होंगे तो अपने माता-पिता के साथ असभ्य व्यवहार नहीं करना चाहिए।
आसुरी व्यवहार नहीं करना चाहिए। यार जिस कोख से पैदा हुए हो उसको तुम लात मार रहे हो उसकी आरती उतारनी चाहिए। माता तो देवी है और पिता भगवान का स्वरूप है। ऐसा भाव पर ये भाव तभी आएंगे जब सत्संग सुनोगे अध्यात्म में चलोगे। अगर अध्यात्म की बात नहीं सुनोगे तो राक्षसी भाव ही आएगा कि चलो किसी अनाथालय में छोड़ आते हैं। फुटपाथ में छोड़ आते हैं। ऐसे तो हमें लगता है आज हमारे नौजवानों को अध्यात्म श्रवण करने की आवश्यकता है। शास्त्र श्रवण करें संतों की बात सुने जिससे समझे तो माता-पिता कौन है?
माता-पिता की आराधना से भगवान विट्ठल आज जो महाराष्ट्र में विराजमान है वो माता-पिता की आराधना से ही प्रकट हुए। पुंडरीिक नाम के एक भगत अपने माता-पिता को भगवान मानकर आराधना करते थे तो भगवान स्वयं चलकर दर्शन देने आए। जो विट्ठल रूप में है ना वो स्वयं दर्शन देने आए। माता-पिता की आराधना भगवान की आराधना है। पर कलयुगी बच्चे नहीं समझ पा रहे हैं। वो अपने माता-पिता को दुख दे रहे हैं तो उनके बच्चे उनको दुख देंगे। पक्का समझो ब्याज सहित मिलेगा। यहां सब कुछ ब्याज सहित मिलता है।
तो गुरुदेव ये कर्म तो छूटेगा ही नहीं। बच्चों को उनके किए का कर्म मिल रहा है। फिर उनकी तो यही तो कर्म परंपरा हम आज तक भोग रहे हैं। जब से सृष्टि हुई तब से यही तो भोग रहे हैं। बार-बार जन्म बार-बार मरण बार-बार जन्म बार-बार मरण कहां मुक्त हो रहे हैं हम? ये कर्म परंपरा चली आ रही है। वैसे दुष्ट होते चले जा रहे हैं। अब ये अध्यात्म शिक्षा बचपन से दिए होते। गलती इनकी भी है। आधुनिक शिक्षा ही केवल दी। अध्यात्म की शिक्षा नहीं दी तो वो क्या जाने अगर यह शुरू से कहते हैं छुओ पैर प्रातः काल उठकर के रोज मम्मी के पैर छुओ हाथ जोड़ो बड़े से बड़े भाई से हाथ जोड़ो यह सिखाया गया है जैसे हम लोग छोटे थे ना करा वस्ते लक्ष्मी कर्म सरस्वती बोले हाथ छुओ धरती के पैर छू चलो अम्मा के पैर छू जाके पिताजी के पैर छूओ बड़े भाई जैसे ऐसे शिक्षा तो अब वो रोज की दिनचर्या बना दी उठे ऐसे ऐसे करते हुए अम्मा के पैर छू बोले खुश रहो।
अब जिनके रोज पैर छू रहे हैं तो हमारी सद्भावना बन रही है ना। उनका आशीर्वाद बन रहा है। अब कौन बच्चा रोज माता-पिता के पैर छूता है? कोई बिरला ही नहीं बिरला ही होगा। हमें लगता है जो रोज सुबह उठकर अपने माता-पिता के पैर छुए वो सत्संगी होगा। बिना सत्संगी के तो माता-पिता के पैर माता-पिता को माता-पिता मान ले। भगवान ना माने कम से कम माता-पिता मान इतनी बड़ी बात है। वैसे तो भगवान का दर्जा दिया गया है माता-पिता को। वेद कहता है मातृ देवो भव पितृ देवो भव इसलिए अरे जी पूर्व के कर्मों को तो हम देख नहीं पाते कि क्या आने वाला है।
बट कभी-कभी परिवार में जैसे माता जो माता-पिता हैं वो अपने बुजुर्गों के पांव छू रहे हैं। तो यह प्रभाव बच्चे पे पड़ रहा है। पड़ोस के चाचा लगते तो चाचा दंडवत क्या जाता है? सब में भगवान विराजमान है। सब में भगवान विराजमान है। अगर हम अपने भगवान को चाचा ताऊ कह के दंडवत करते तो वही तो विराजमान है। तो इसलिए हमें लगता है कि नम्रता विनय ये हमारे समाज में कम होती जा रही है। नहीं होती जा रही है। जो पढ़े लिखे बच्चे हैं उनको विनय होना चाहिए। विद्या विनयम ददाति विद्या विनय सभ्यता सिखाती है और आज का पढ़े लिखा बच्चा असभ्य होता जा रहा है।
माता-पिता से कहा तुम अपना देखो हम देख लेंगे। कुछ तो पेरेंट्स भी अभी ना मतलब बच्चों को मॉडर्न स्टाइल से चलना चाहते हैं थोड़ा बच्चों को ही क्योंकि खुद अध्यात्म नहीं है महाराज जी इसलिए वो चाहते हैं कि जैसे हम है वैसे ही बच्चे बने और क्योंकि बिल्कुल महाराज जी दिशा विहीन उनका ही खुद का ही जीवन है तो फिर कैसे हां मॉडर्न लाइफ जीने के चक्कर में होते तो फिर वो मॉडर्न बच्चे टट्टी नहीं उठाएंगे फिर तुम्हें पड़े रहना पड़े महाराज जी अगर सबको गुरु के चरण कमलों में समर्पित कर दिया जाए फिर कर्म बंधन में देखो देखो जब तक कोई समर्पित होना नहीं चाहेगा तो किसी को समर्पित करने से कोई समर्पण नहीं होता।
मनुष्य शरीर कोई फल फूल नहीं है। वो समर्पित नहीं होना चाहता तो हमारी ताकत नहीं कि हम उसको बदल दें। आप बदलना चाहो तो हमारी बात मान के आप अपने को बदल सकते हो। बच्चों को विवेकवान बनाने के लिए उनको सत्संग सुनाओ। उनको आप आचरण सिखाओ। और वो धीरे-धीरे चाहे कि हम संत वाणी सुनकर के सुधरे तो वो संभल जाएंगे। पर जी इसीलिए शायद पहले गुरुकुलों का निर्माण था कि कुछ समय के लिए बच्चे हां माता-पिता से अलग हो हां तो वो बहुत अच्छे बहुत अच्छे परिवार को चलाने वाले बनते थे क्योंकि गुरुकुलों में सब आध्यात्मिक और आधुनिक दोनों शिक्षाएं दी जाती थी तो इसलिए वो बहुत विवेकवान होते थे।
गृहस्ती को भी चलाते थे और संयम से भी रहते थे। अब आज की पढ़ाई में आधुनिकता तो है लेकिन आध्यात्मिकता नहीं है। तो आध्यात्मिक पढ़ाई ना होने के कारण विनय की बहुत कमी होती जा रही है। नहीं पढ़े लिखे बच्चे विनय से बहुत दूर होते जा रहे हैं। नहीं जितना ग्रेजुएट उतना अहंकार है उतना जबकि जितना ग्रेजुएट उतना सरल होना चाहिए कि आप बहुत पढ़े-लिखे व्यक्ति की पहचान यही सभ्यता सरलता आप गाड़ी में बैठे बस में जा रहे हैं। कोई बड़ा बूढ़ा खड़ा है। आइए दादा जी आप बैठ जाइए।
हम तो खड़े भी रह सकते हैं। आप तो लगा पढ़ा लिखा है। नहीं लगा कि पढ़ा लिखा है। सभ्य आदमी है तो पढ़ा लिखा का सम संबंध सभ्यता और विनय से है। और आज सभ्यता और विनय दोनों गायब हो जा रहे हैं। पढ़े लिखे तो बहुत लोग हैं। सभ्यता और विनय जा रहा है। तो हमें लगता है आध्यात्मिक शिक्षा ही सुधार सकती है। गुरुदेव भगवान हम बच्चे तो नादान है। उनको समझ नहीं है। उनके कल्याण के लिए कहीं ना कहीं हम नाम जप करके समर्पित करें तो क्या होगा? हां हो जाएगा परिवर्तन होगा हां बिल्कुल परिवर्तन होगा और उनको बैठाल करके राधा राधा बुलवाओ 10 मिनट 10 मिनट राधा राधा बुलवाओ और नाम जप करके उनको दो तो निश्चित परिवर्तन होगा निश्चित होगा महाराज जी बट उनको भी ऐसा लगता है कि हमारे जान पे आ रहा है ये सब कुछ करना कि मतलब बता भी रहे हैं कि हम कि ये इतना करो तब आप करो आपको नाम जब करना पड़ेगा बट वो फिर भी नहीं करना चाह रहे एकद दिन करेंगे फिर हफ्ते बाद फिर फुसला दे फिर फुसलावे हफ्ते में अगर एक दिन भी करने
लगे ना तो हम हमारी बात तो मानने लगे ना हम दो दिन करवाएंगे फिर हफ्ता भर कहने के बाद तीन दिन करवाएंगे हम धीरे-धीरे उनको सतार्ग में देखो बच्चों को खिलवाड़ में भजन कराया जाता है देखो तुम्हारे लिए हम बाल भोग बना रहे हैं तब तक तुम राधा राधा अगर राधा राधा बोलना बंद किया तो नहीं मिलेगा राधा राधा राधा राधा राधा राधा शुरू हो जाएंगे बच्चे हैं और इसके बाद फिर खेलने लगे ऐ राधा राधा राधा राधा राधा ऐसे मतलब प्यार से दुलार से आओ हम सब बैठते हैं देखो भगवान जी की कथा सुना रहे सुनो चुपचाप बैठो।
देखो ये क्या संत कह रहे हैं। सुनो धीरे धीरे धीरे वो अनजाने में उनका सुधार हो रहा है। वो ना जाने तो भी सुधार हो रहा है। जब गर्भस्थ शिशु प्रह्लाद को नारद जी ने उपदेश किया तो समझ में आ गई ना अभिमन्यु को उपदेश किया अर्जुन जी ने तो चक्रव्यूह तोड़ना गर्भ से जान गए। तो गर्भस्थ शिशु को कितना ज्ञान? वह तो अब बाहर आ चुका है। अगर हम सुनाएंगे तो उसके संस्कार बदलेंगे। उसके भाव बदलेंगे।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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