॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

आप जब नहीं रहोगे तो हमारा क्या होगा ?

▶ YouTube

श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

दीपक जी जबलपुर से हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में दंडवत प्रणाम महाराज जी मैं पिछले दो वर्षों से आपका सत्संग एकांतिक वार्तालाप सुन रहा हूं। आपकी कृपा से भजन करने का भी प्रयास करता हूं। विगत दो वर्षों से आपकी कृपा से जीवन सही मार्ग पर चलाने का भी प्रयास कर रहा हूं। फिर भी मन में एक डर सा बना हुआ है कि जब आप प्रत्यक्ष रूप में विराजमान नहीं होंगे तो हमारे जैसे लाखों युवाओं को कौन संभालेगा कि हम किनकी वाणी का सहारा लेकर इस जीवन की भगवान की ऐसी लीला है कि इसका नाम है मृत्यु लोक।

यहां मरना तो पड़ेगा भैया। चाहे हम हो, चाहे आप हो, समय आने पर शरीर छूटेगा। तो हमें लगता है कि संतों की वाणी हमारा सहयोग करती है। जो संतों के वाक्य हैं वही हमारे गाइड हैं। अगर हम संतों के वाक्यों को माने तो संत के चले जाने पर वाक्य तो रहेंगे ना। हम उन वाक्यों के अनुसार चले। शरीर तो नाशवान है। आज है कल नहीं रहेगा। यह पक्का है हमारा तुम्हारा या किसी का भी जब जहां जिसका आया उसको शरीर छोड़ के जाना पड़ेगा। लेकिन उनके वाक्य उनके आदर्श उनके सिद्धांत हमारे जीवन में पूरे जीवन साथ रह सकते हैं।

तो हमें लगता है हमें जैसे हम बचपन से भगवान के मार्ग में चले ना तो हमारा थोड़ा तार्किक दिमाग था। था। इसलिए कह रहा हूं कि पहले अब तो श्रद्धा से संपन्न हो गया क्योंकि प्रिया प्रीतम की उपासना पहले सन्यास मार्ग में तो बच्चापन से हमारा तार्किक दिमाग था। किसी व्यक्ति का सानिध्य स्वीकार करना हमारे स्वभाव में नहीं था। दूर से उसका परीक्षण करना अगर लग रहा है कि हमें है तो फिर तो हम आदर्श किसको माने? तो पूज्यपाद उड़िया बाबा की वाणी उसको हम जीवन भर अपने पास रखा है।

आज भी हमारे पास विराजमान है। जीवन भर पास रखा है। संत को ऐसा चलना चाहिए। ऐसे चलना चाहिए। बाबा ने जो जो उपदेश किए बस उन्हीं का बाबा के चरणों का आश्रय लेकर के उन्हीं को गुरु मान करके उन्हीं के बात मानकर आज भी उन्हीं के वचनों के अनुसार चलने की चेष्टा कर रहे हैं। तो संत वाणी हमें कभी अनुभव में नहीं आया कि उड़िया बाबा नहीं है। क्योंकि उनकी बात बाबा ने ये कहा बाबा ने कहा ऐसा करना चाहिए। ऐसी परिस्थिति में ऐसा करना पूरा इतना मोटा ग्रंथ है बाबा का उपदेश ही उसमें है साधक के लिए ज्ञानी के लिए भक्त के लिए स्त्री के लिए पुरुष के लिए बच्चा के लिए सबके लिए उपदेश है तो वही जीवन भर आदर्श माना तो हमें लगता है अगर हम संतों की वाणी को अपना मित्र बना ले तो वियोग का दुख नहीं अनुभव होगा अगर हम शरीर को अपना मित्र मानेंगे तो ये मरण धर्मा है इसका नाश होगा आज नहीं तो कल जरूर नाश होगा।

यह नाशवान का नाश होगा। मुझ अविनाशी का कभी नाश नहीं होना। तो अविनाशी की वाणी को मानो तो अविनाशी पद में आ जाओगे। विनाशी शरीर तो इससे प्यार ना करो। यह नाशवान शरीर है। इसकी महिमा बिल्कुल कुछ नहीं है। पानी का बुलबुला अभी दिखाई दे रहा है। एक मिनट में फूट गया। कहो बोलते बोलते रा बोल पाए, धा ना बोल पावे। ऐसा सिस्टम है कि हम राधा उच्चारण करना चाहते। राय ही बोल पाए। धा तक पहुंच ही नहीं पाए। चले गए। यह बहुत विचित्र खेल है। इसलिए हमें किसी भी शरीर धारी से आसक्ति नहीं करनी चाहिए।

व्यवहार भगवत स्वरूप मान के करना चाहिए और आसक्ति अविनाशी से करना चाहिए। ये विनाशी शरीर वियोग को प्राप्त होने पर हमारा हृदय व्यथित हो जाता है। फिर हम सत धर्म का निर्णय नहीं कर पाते। व्यथित हृदय वो सही नहीं होता। अशांतस कुता सुखम जब चित्त अशांत हो गया तो ये लगेगा बाबा चले गए। फिर मनमान नहीं आचरण शुरू हो जाएंगे। और ये कि बाबा तो चले गए लेकिन बाबा ने जो कहा वो हमें करना है। उनकी आज्ञा के खिलाफ नहीं चलना। तो आप देखोगे यही दिमाग में बैठा मिलेगा। जैसे हम उड़िया बाबा का चिंतन तो हमें लगता है उड़िया बाबा यहीं बैठे हुए हमारे ऐसे से ऐसे करो ऐसे से बाबा ने कहा ऐसा तो हर समय बाबा का चिंतन बाबा की वाणी का चिंतन तो उनका सानिध्य हमें निरंतर अनुभव में आता रहा।

महाराज जी जब कभी मन परेशान होता है तो ना आपके आगे धाम में दर्शन कर ले सब शांति मतलब क्या एक वो डर रहता है हां ये अब इसमें हमारा भी बस नहीं कि हम बने रहे अब वो भगवान के बल से चल रहे हैं। भगवान का एक आध्यात्मिक बल है। उसी आध्यात्मिक बल से भगवान चला रहे हैं। नहीं तो जो शरीर की हालत है, जो किडनी की हालत है। बिल्कुल वो क्रिया रहित हो चुकी है। बिल्कुल क्रिया रहित है। पर हमको आपको सही बताया बच्चा बिल्कुल कोई कष्ट नहीं। शारीरिक कष्ट होने पर भी हमारे मन में प्रसन्नता रहती है।

हमारा मन आनंदित रहता है। अच्छा मरने का भय इसलिए नहीं है कि हमें जाना है अपने प्रभु के पास। तो भय तब हो जब इससे हमने राग नहीं किया। प्रभु से प्यार किया तो आज छूट जाए। चाहे 100 वर्ष बाद छूटे। प्रभु के पास ही जाना है। जितने दिन उनको सेवा लेनी है ले ले। हम ना रहेंगे पर हमारा वचन रहेगा। हमारे भगवान आपके साथ रहेंगे। यह बात मान लो। शरीर तो नाशान शरीर तो जाएगा।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

संबंधित