शादी ना कर ब्रह्मचर्य से रहें तो किन बातों का ध्यान रखें ? बच्चों से महाराज जी की प्रार्थना !
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
अंजलि जी गुरुग्राम से श्री हरिवंश प्रभु श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपके प्रवचन से इतना तो ज्ञान हो गया कि यहां से कभी भी जाना पड़ सकता है अंत में किसी भी प्राणी से मोह करने से कोई फायदा नहीं है तो केवल भगवान के मार्ग पे ही चले तो क्यों फंसे महाराज जी आगे संसार में ऐसा भाव आता है तो नहीं पर अगर संसार में भगवान ने हमें कर्तव्य दिया है तो कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिए जैसे मानो भगवान आगे हमारा ब्याह करा दे तो हमें अपने पति को भगवान मानकर सेवन करना चाहिए।
परिवार की सेवा करनी चाहिए। मनुष्य जीवन परोपकार के लिए मिला है। अब अगर ब्याह प्रारब्ध में नहीं है तो ब्रह्मचर्य रह के निर्वाह कीजिए। अगर ब्याह है तो विरोध नहीं करना चाहिए। हमको गृहस्थी में जाकर के परिवार का पोषण करना चाहिए। अगर विवाह में नहीं जा रहे तो ब्रह्मचर्य में चलना है तो गुरुदेव एक कलयुग है। आप ऐसा मुझे मार्गदर्शन करें कि मैं इस रास्ते पे कैसे प्रबल रूप से चल पा है कठिन पर असंभव नहीं है। यदि हम अपने पे स्थित रह और हम कुसंग ना करें। खानपान पवित्र रखें तो कुछ समय बाद मन शांत हो जाता है।
फिर मन संसार की तरफ नहीं जाता। पर है कठिन। मतलब असंभव नहीं है पर सरल भी नहीं है। ब्रह्मचर्य रहना कोई सरल नहीं है। बहुत कठिन कार्य है। महीना 15 दिन साल छ महीना इसके बाद जब मन अपना स्वरूप धारण करता है भागता है संसार की तरफ। देखो हम एक चीज बताएं आपको। हम सबके अंदर एक कमजोरी है। हमें कोई प्यार करे। आप सब कोई बताओ। सबके अंदर एक कमजोरी कि हमें कोई चाहे बेटा ही प्यार करे चाहे पत्नी प्यार करे चाहे मतलब हमें कोई प्यार करे पर यहां वो प्यार मिलता नहीं है वो प्यार केवल भगवान से मिलता है जो हम चाहते हैं कि निस्वार्थ कोई हमारा सहयोग करें हमें प्यार करें तो यहां सब स्वार्थ से प्यार करते हैं।
कोई निस्वार्थ प्रेम करने वाला तो है नहीं। वो केवल परमात्मा ही है और उनसे हमारा लगाव नहीं, भगवान से लगाव नहीं और संसार में हम प्यार चाहते हैं तो धोखा मिलता है। तो हमें चाहिए कि अपने मन को बचा के हरि के चरणों में साव मना कृष्ण पदारविंद भगवान के चरणों तक पहुंचा दें तो मनुष्य जीवन की सार्थकता हो जाएगी और यह कमजोरी बहुत गिराती है। हमें कोई प्यार करे यह कमजोरी कोई हम जो बात कहते हैं हम अपनी मन की पढ़ाई की बात कहते तो मन में अब जैसे मां पिता भाई बंधु परिवार सबको छोड़ा अब कोई हमारा नहीं बचपन से बाबा जी बने तो मन में एक जगह बची पर हमको आज तक कोई ऐसा नहीं मिला जो हमको प्यार करे वो अपने लिए हमको प्यार करना अपने लिए हमें प्यार करेगा हमारे लिए हमको कोई प्यार नहीं करता तो ये बात हम अनुभव की कह रहे हैं।
आप तो मान लो घर गृहस्ती संसार में हो। हम तो लाखों करोड़ों खोपड़ियां देख डाली। लाखों बचपन से लाखों करोड़ों को लेकिन भैया हमारा जो मन मांग रहा था वो कहीं नहीं मिला वो प्रिया जी के चरणों। तो इसीलिए हमें लगता है कि सबके मन में ऐसा होगा जब हमारे मन में है कि कोई तो अपना हो। यह ढूंढने पर केवल भगवान के ही चरण समझ में आए और कोई समझ में नहीं आया कि कोई अपना है या कोई हमें प्यार कर सकता है। सब अपने स्वार्थ के लिए प्यार करते हैं। हमारे लिए कोई प्यार करने वाला है तो भगवान तुम्हार सेवक असुरारी स्वार्थ रहित जग जुग उपकारी गोस्वामी जी ने लिखा है स्वार्थ रहित जग इस संसार में जुग माने दो उपकारी उपकार करने वाले हैं।
कौन? तुम और तुम्हार सेवक असुरा भगवान और भगवान का प्रेमी भक्त नहीं तो सुर नर मुनि सब ही की रीति स्वार्थ ला कर महाराज जी ये ये बात आप ज्यादा अच्छे से अनुभव किए हैं महाराज जी क्योंकि आप बचपन से अकेले रहे हैं महाराज जी घर गृहस्ती वाले जो घर गृहस्थ में हैं महाराज जी उनको तो लगता है मेरे पिता मेरे से बहुत प्यार करते हैं मेरे बेटा मेरे से प्यार करता है मेरी मां बहुत तो वो अनुभव ही नहीं हो पाता जीवन निकल जाता है महाराज जी और बाद में दुख पे दुख दुख पे दुख इतने झटके लग जाते हैं जब जब तक अनुभव होता है तो आप जो अनुभव कर पा रहे हैं कि है ऐसा ही है महाराज जी बट वो अनुभव की बात है महाराज जी कबीर दास जी का जो है ना मन भूला भुला फिरे जगत पे कैसा नाता रे मात कहे ये पुत्र मेरा वो हमारा बहन कहे ये वीरा हंस अकेला जाई मन भूला भला फिरे जगत जननी अनुभव करके बिल्कुल बिल्कुल जैसे आपने कहा है कि अगर विवाह नहीं करना तो गृहस्थ में रह के परिवार के संरक्षण में अपनी साधना कीजिए अब मान लीजिए विरक्त वेश नहीं ले सकते।
अभी समय ऐसा कलयुग का है। लेकिन गृहस्थ में भी ऐसा संरक्षण नहीं है। तो फिर क्या कहां जाए? नहीं समस्या ये है ना कि जैसे मान लो क्योंकि पिता मान लीजिए शरीर के बड़े भैया मान लीजिए नहीं मान अपने को ही सुरक्षित रखना पड़ेगा भगवान की कृपा से और परिवार में ही रहना पड़ेगा। अब समय ऐसा नहीं कि मतलब आप अन्यत्र कहीं अपने नाम जप से अपना संरक्षण स्वयं कीजिए। भगवान आपके संरक्षण में हैं। बड़े-बड़े साधियां हुई हैं जिनका संरक्षण भगवान ने किया है। देखो अगर हम फिसलने वाले नहीं है तो हमको कोई फिसला नहीं सकता।
और अगर हम में फिसलन है तो हमें कोई बचा नहीं सकता। दोनों बातें समझना पड़ेगा। आपको कट्टरता पूर्वक अपने संयम को बचाना होगा। तो कोई आपको गिरा नहीं सकता। भगवान रक्षक सीम की चाप सके को तासु ब रखवार रमापति जासु भगवान जिसके रक्षक उसको कौन छू सकता है लेकिन अगर हम ही फिसलना चाहेंगे तो भगवान फिर बचाएंगे नहीं यह भी बात है फिसलो तो फिर फिसलो अगर हम नहीं फिसलना चाहते तो फिर कोई माता-पिता कितने दिन रहेंगे परिवार कितने दिन रहेगा पूरा जीवन तो आपको ही निर्वाह करना है अच्छा कहीं मान लो किसी आश्रम में भी कहीं रहो तो वहां भी तो फिसल सकते हैं अगर आप घर में नहीं फिसल सकती तो आप कहीं नहीं फिसल सकती और घर में फिसल सकती तो कहीं भी फिसल सकती।
इसलिए अपनी फिसलन को रोकना है ना कि स्थान परिवर्तन करना है। मुझे लगता है स्थान परिवर्तन से ठीक नहीं उद्देश्य परिवर्तन ठीक है। उद्देश्य परिवर्तन करके अपने घर में रह जाए बहुत अच्छा है। दूसरे की सुविधा में और दूसरे के संरक्षण में रहने से अच्छा है। अपने परिवार में रहे। नमक रोटी खाएं। उनकी गालियां भी बर्दाश्त कर ले। अपने संयम से चले। अरे जी आपका भी प्रश्न था कह रहे कि बहुत सारे बच्चे बड़े छोटे मतलब आपकी वार्तालाप सुन के महाराज जी घर छोड़ के आ जाते हैं।
फिर मतलब उनको हम समझाते हैं कि भैया आप अपने घर में रहिए तो महाराज जी उनके लिए आपका क्या नहीं घर छोड़ने के लिए हम किसी को भी नहीं कहेंगे क्योंकि कलयुग है और पूरे जीवन भर संयम से चलना बहुत कठिन है। घर मत छोड़ो। कोई भी घर से मत भागो। घर में रहकर भजन करो। माता-पिता की सेवा हम क्या कह रहे हैं? अभी हमारी बात को समझो। हमारा मन खोजता है कि कोई हमारा हो। तो उसी परिवार के बीच में रहकर के यदि अपने मन को भगवान में लगा दो तो कितना बढ़िया हो। अब हम लोगों ने जो कष्ट सहा है तुम सोच भी नहीं सकते कि वो कष्ट ऐसे कैसे गर्मी, सर्दी, बरसात, भूख, प्यास, मार, गाली सब सहा है।
सब सहा है। अब जो हम लोगों की बाबागिरी हुई वो बाबागिरी आज की क्या है? तो हमें लगता है भागने से काम नहीं बनेगा। घर में रहकर भजन करने से काम बनेगा। अपने माता-पिता की आज्ञा में रहो। कभी कोई भी बच्चा बच्चे भाग के ना आवे। हमारी बात मान लो क्योंकि तुम्हारा गलत प्रयोग हो सकता है। तुम किसी गलत हाथ में पड़ गए तो तुम्हारा जीवन बर्बाद हो सकता है। तो तुम्हें चाहिए कि अपने माता-पिता के संरक्षण में रहो और भजन करो। सत्संग सुन लो। किसी से ज्यादा लगाव मत रखो। संत महात्माओं के वचन से लगाव रखो।
संत महात्माओं की बात सुनिए। दूरी होकर अपना भजन करो। आज का जो समय है वह भजन करने से बनेगा। कहीं किसी के आश्रम में जाने से या कहीं किसी भाग के जाने से बनने वाला नहीं। यह बात समझ लो। बिल्कुल कहीं किसी बच्चा बच्ची को घर छोड़कर नहीं भागना चाहिए। हमारी प्रार्थना है।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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