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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1023 · 5 सितंबर 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की श्री वृंदावन धाम की जय सतगुरुदेव भगवान की जय शिवम जी हरियाणा से राधे राधे महाराज राधे राधे महाराज जी महाराज जी राधा कृष्ण के नाम में इतना बल है कि सब कुछ मिल जाता है लेकिन नाम जप करते वक्त मन में असली प्रेम और अनुभव कैसे जगाएं और नाम जप करते वक्त इसी से हो जाएगा।

सब इसी से ठीक हो जाएगा। प्रेम मूल यह नाम है। अगर जड़ मिल गई तो सब मिल जाएगा ना। मूल माने होता है जड़। प्रेम की जड़ क्या है? नाम। अगर हम राधा कृष्ण राधा कृष्ण राधा कृष्ण तो इससे प्रेम भी प्राप्त हो जाएगा। और जब मन को प्रेम आनंद मिलेगा तो विषय आनंद में जाएगा नहीं। उसका भटकना बंद हो जाएगा। हमारा सारा प्रयास होना चाहिए। हर समय नाम का सुमिरन करने का वो नाम जैसे हम दवा खाते हैं और विश्वास करते हैं कि इससे हमारा रोग ठीक हो जाएगा। महीना भर खाया थोड़ा भी फायदा नहीं हुआ।

फिर भी डॉक्टर कहता है यही दवा खाओ ठीक हो जाओगे। फिर भी हम खाते हैं और कालांतर में हम ठीक हो जाते हैं। तो यह नाम है। अब जैसे हम सोचे कि दो चार 10 दिन महीना दो महीना चार महीना जपे हमारा मन निष्काम हो जाए ऐसा नहीं। भगवान की माया के द्वारा बनाए हुए जो दोष है जब तक भगवान का दर्शन नहीं हो जाता तब तक ये घसीट सकते हैं। मतलब 10 पांच वर्ष भी भजन करो तो ये कम हो जाएंगे। नष्ट नहीं होंगे। भगवान मिल गए तब ये बात हो गई कि अब अब नहीं गिरा सकता। नहीं तो माया का आकर्षण बहुत प्रबल है।

तो नाम जप करने से उसका आकर्षण कटता है। धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे जब प्रेम प्रकट होता है तब और कुछ अच्छा ही नहीं लगता है। सब नष्ट हो जाता है। अब जैसे घड़ी दीवाल घड़ी है ना उसका सेल खच लो तो सेकंड की सुई सेकंड की मिनट की मिनट में घंटे की घंटे में ठप ऐसे ही जब प्रेम प्रकट होता है तो जो मन की चालबाजी है ना चंचलता है वो ठप है शांत पूछा जाए क्या चाहिए आपको भी खोजो तो आपको पकड़ भी नहीं आएगा कि क्या चाहिए अब? कैसे हो? जैसे प्रभु रख रहे हैं। क्या चाहिए?

कुछ ये स्थिति हो जाएगी अंदर की। लाखों करोड़ों अरबों रुपए आ जाए तो आपको कोई हर्ष नहीं होगा और सब छीन जाए तो आपको कोई शोक नहीं होगा। लाखों लोग प्रणाम कर रहे हैं तो आपको कोई सम्मान नहीं प्रतीत होगा। और लाखों लोग निंदा कर रहे हैं तो आपको कुछ बुरा नहीं लगेगा। ऐसी स्थिति आ जाती है। पर यह सब भजन करने से आती है। अब जैसे हमारे पाप है 500 ग्राम हमारा भजन है 25 ग्राम तो कैसे असर कैसे हमें समझ में आएगा? जब हमारा भजन 500 ग्राम के ऊपर चढ़ बैठे तब समझ में आएगा।

वो मिटिया मेट कर दिया पाप को और हृदय निर्मल आनंद तो हमें लगे रहना चाहिए। लाभ दिखाई दे या ना दिखाई दे शांति मिले ना मिले दवा सही है अचूक है बस चलाते रहो नाम चला एक भी नाम व्यर्थ नहीं जाएगा भागवत में आता है कि जैसे भूखा आदमी हो और एक एक कवल पावे तो या तो पेटे में रहा लेकिन पांच कवल पाने के बाद रोक दो आप और कहो कैसा लग रहा है अब भोजन नहीं मिलेगा तो वो यही कह गया इससे तो अच्छा ना देते तो ठीक था। जब वह आधा पेट हो जाएगा तब उसे समझ में आएगा खीर कैसी है और सब्जी कैसी है।

आधा पेट तो केवल भरने में लगेगा। ऐसे ही एक एक नाम जा रहा है। संसार से वैराग्य भगवान के चरणों में प्रेम और स्वरूप का ज्ञान ये करवा रहा है। पर बहुत जन्मों से भूखे हैं हम आनंद के। तो हमें समझ में नहीं आएगा। भी जब कम से कम आधा पेट 12 घंटा भजन हो 24 घंटे में 12 घंटा भजन हो तब समझ में आएगा कि स्वाद क्या है नाम का अभी नाम का स्वाद थोड़ी मिला है राधा राधा राम मन भाग रहा है संसार में और संसार के भोगों में भाग रहा है कोई स्वाद जो स्वाद मिलेगा तो भागेगा नहीं फिर यहीं लग जाएगा राधा राधा एकदम हृदय आनंद से भर जाएगा पर सत्य बात कि नाम परम आनंदमय है।

परम ज्ञान प्रदान करने वाला है। सब दुख मिटाने वाला है। तो हमको इसमें लगे रहना चाहिए। घाटा तो होता नहीं है। लाभ ही लाभ होना है। अरुण कुमार जी राधे-राधे। राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी हम सांसारिक भोगों को भोगते हैं। पता होता है कि ये हमारे मार्ग में बाधा डालते हैं। तो क्या यह हमारे नाम जप में भी विघ्न डालते हैं? तो इससे हमारे कर्म बनेंगे या भोगों में फंसे रहेंगे या विघ्न रहेगा? अगर हम भोगों में रहेंगे तो नाम में रुचि ही नहीं रहेगी और भोगों में सुख लगेगा तो भगवान प्यारे ही नहीं लगेंगे भोगेश्वर प्रसक्त नाम तप प्रत चेतसा व्यवसायात्मिका बुद्धि समाध विधते जिसका भोगों ने चित अपहरण कर लिया है वो भगवत प्राप्ति का संकल्प भी नहीं बना सकता सोच भी नहीं सकता वो भगवान की आराधना करेगा लेकिन चाहेगा यही कि मुझे भोग मिले संपत्ति मिले ऐश्वर्य मिले सम्मान मिले भगवान मिले ऐसा नहीं चाहेगा जब भजन के बल से नाम जप जल जबरदस्ती किया जाता है मन थोड़ी लगता है जबरदस्ती किया जाता है तो जब नाम जैसे कड़वी दवा आंख मूंद के खाई जाती है कि अब खाना ही अब ये तो दवा है कड़वी है पर खाना है तो अभी हमें नाम कड़वा लग रहा है जबकि अमृत है नामामृत है लेकिन कड़वा लग रहा है।

अगर हम यही नाम जप करते रहे तो धीरे-धीरे भोगा शक्ति मिटा देगा। महाराज जी फिर हमें क्या संसार का जो घर ग्रस्त है उससे थोड़ा सा अलग रहना चाहिए? नहीं संसार से अलग नहीं रहना चाहिए। संसार में रह के संसार का स्वाद नहीं लेना चाहिए। स्वाद भगवान का इनमें स्वाद है कहां? हमें बताओ। अगर स्वाद होता तो तृप्ति हो जाती। आप लोग तो गृहस्थ हैं। कहीं आपको ऐसा लगा कि हम कछु नाथ ना चाहिए मोरे मन में कुछ कमी थी हां वही वह कमी भगवान से ही पूरी होती तभी कहा कहीं भी कुछ करो ना एक अधूरापन रहता है और मन हमको दिखाता है कि इस वस्तु में नहीं इस वस्तु से शायद इस व्यक्ति से नहीं शायद इस व्यक्ति से मन हमको गलत रास्ते में ले जाकर भटकाता रहता है और बाद में जब एकांत बैठते हैं तो फिर वही तृष्णा फिर वही भोग तो क्योंकि इसमें सार वस्तु नहीं है इसलिए हम भटकते रहते हैं।

अगर भगवान से हमारा चित्त जुड़ जाए तो ठोस वस्तु आ जाए। महाराज जी हर टाइम हैरानी परेशानी सी रहती है। उसके नाम जप जब तक हम नाम जप नहीं करेंगे तो ये है जो हमें चंचलता मन की परेशान करती है ना वो तब तक रह जाएगी। ये सारा खेल मन का है। चिंता, भय, शोक, उद्दीग्नता यह मन ही पैदा करता है जब भगवान से विमुख होता है। और भगवान के सम्मुख जब होता है तो निर्भय, निश्चिंत, निशोक एक आनंद आता है। तो नाम जप में कोई बाधा भी नहीं है। कोई पैसा भी नहीं खर्चा हो ना। और ऐसा नहीं कि इसमें कोई दिखावा हो।

आप अंदर अंदर नाम जप करते रहो। अपने काम करते रहो। जब बात करना है तो भगवान को हां बिल्कुल हम सबसे प्रार्थना करते हैं कि नाम जप करो इससे बहुत लाभ आपको मिलेगा आपके पाप नष्ट होंगे आपको आगे सुख मिलेगा आप देख लेना माना भारी विपत्ति आने वाली है सबके जीवन में आएगी आज तुम सुखी हो तो कल दुखी होना पड़ेगा आज तुम दुखी हो तो कल सुख आएगा ऐसा क्रम है माया का तो सुख स्थाई नहीं है जैसे रात है तो दिन आएगा। दिन है तो रात आएगी। तो जैसे हम दिन में रात की व्यवस्था कर लेते हैं।

लाइट है, व्यवस्था सब फिट है तो हमें रात अखरती नहीं है। ऐसे यदि हम भजन के बल से विपत्ति की व्यवस्था कर लेंगे। ज्ञान विज्ञान पढ़ा लिखा शास्त्री शास्त्रों का स्वाध्याय सत्संग तो हमें पता है फिर हम निपट लेंगे विपत्ति से। और अगर हमने व्यवस्थाएं दिन में नहीं की रात्रि की तो रात्रि आकर अंधकार में होकर के हमें भय प्रदान करेगी। इसलिए सुख के समय हम भगवान का इतना सुमिरन करें कि हम दुख से निपट पावे क्योंकि आएगा दुख सबके जीवन में आता है। जब भगवान राम और भगवान कृष्ण के जीवन में आया जो अवतार थे तो हम तुम तो मनुष्य हैं।

हमारे तो जीवन में तो आएगा ही आएगा। नैतिक गुप्ता जी अजमेर से राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी मेरा सवाल है कि आपने बताया था कि षड विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर रूपी पेड़ की जड़ कट जाने के बाद भी ये कुछ दिन तक हरे-भरे से प्रतीत होते हैं। प्रभु ये कैसे पता चले कि इनकी जड़े कमजोर हो चुकी हैं या कट चुके हैं? जब हमारे हृदय में मात्र हो संकल्प ना बनने पावे क्रिया ना होने पावे और भगवान का भजन साथ में चलता हो समझे इनकी सत्ता नहीं रह गई अगर भजन नहीं चल रहा तो फिर भजन चल रहा है और काम की स्पुरणा हो रही तो इनकी जड़े कट गई अब नष्ट हो जाएंगे और भजन नहीं चल रहा तो फिर वह सड विकार तो मायाकृत है वो फिर अपना प्रभाव दिखाते रहेंगे तो जैसे बड़े पेड़ हो उखड़ जाए तो महीनों हराभरा दिखता है तो हम भगवान की शरण में हो गए अब विकारों की जड़ तो उखड़ गए हैं और हरेभरे दिखते

रहे आकर्षण होता रहेगा जब तक भगवत प्राप्ति नहीं हो जाएगी तो हम नाम जप चलाते रहे इनका आकर्षण आएगा चला जाएगा इनमें दम नहीं रह जाती और जब भजन नहीं होता तो इन्हीं का तो सारा खेल चल रहा है पूरी सृष्टि में कहीं काम कहीं क्रोध कहीं लोभ कहीं मोह कहीं मद कहीं यही सब तो नचनी नाच नचाए हुए हैं सबको उमा दारू जोत की नाई सब नचावत राम गोसाई भगवान की माया के द्वारा सब नाच रहे हैं विजय लक्ष्मी गॉड जी छत्तीसगढ़ से श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी क्या तत्व ज्ञान की प्राप्ति के बाद कालांतर में भगवत प्रेम की प्राप्ति होती है या दोनों चीजें साथ-साथ चलती हैं।

तत्व नहीं साथ नहीं होती। दोनों अलग-अलग है। तत्व ज्ञान जो होता है वो सब में आत्म तत्व का दर्शन होता है। सब जगह एक आत्मा विराजमान है। दूसरा कोई नहीं है। और जो प्रेम होता है वह सब में श्री कृष्ण विराजमान है। श्री राम विराजमान। श्री राम में सब जग जानी। तो जब हम साकार भावना से सब में अपने भगवान को देखते हैं तो हम प्रेम मार्ग में जाते हैं। और जब हम तत्व रूप से आत्मा रूप से देखते हैं तो हम ज्ञान मार्ग में जाते हैं। आत्म तत्व का सब जगह दर्शन करने वाला मोक्ष को प्राप्त होता है।

और श्री कृष्ण का सब जगह दर्शन करने वाला प्रेम को प्राप्त होता है। वह आत्म प्रेमी है। वह श्री कृष्ण प्रेमी है। लेकिन ऐसा नहीं कि वह दिव्य लीलाओं में डूबेगा क्योंकि वह ज्ञान मार्ग का है तो मोक्ष को प्राप्त होगा और जो भक्ति मार्ग में प्रेम से युक्त होकर भगवान की रसमय दिव्य लीलाओं का रस आस्वादन करेगा। तो इसलिए सहज भाव है कि सब में भगवान का दर्शन करें तो वह तत्व भी हो गए और प्रेम भी प्राप्त हो जाएगा। शुभम जी सीतामढ़ राधे-राधे महाराज जी राधे-राधे महाराज जी सब पूज्य जनों से सुना है कि इस जन्म के अच्छे बुरे कर्मों का फल अभी नहीं तो अगले जन्म में जरूर मिलता है परंतु हमें जो पिछले जन्म या अगले जन्म का कोई ज्ञान नहीं है।

तो क्या इस इस कारण बुरे कर्मों का भय ना होने ही संसार के पाप और अधर्म का कारण है महाराज जी हां वैसे हमें भयभीत रहना चाहिए कि हमसे कोई गलत काम ना बन जाए। कानून का डर, भगवान का डर, समाज का डर और अपनी इज्जत का डर। अगर यह डर बना रहे तो हमसे कोई गलत काम नहीं होंगे। डर ही तो खत्म हो जाता है। तभी हमारा मार्ग गलत हो जाता है। अगर भगवान का डर हो कि देख रहा है वो। समाज का डर हो, लोग क्या कहेंगे? कानून का डर हो कि यार पकड़े जाएंगे। इज्जत का डर हो कि सब नष्ट हो जाएगा।

तो किसी से कोई गलत काम ना हो। गलत काम होते ही हैं। जहां ये डर खत्म हो जाते हैं। भगवान का डर, कानून का डर, समाज का डर, सम्मान, इज्जत का डर जहां खत्म हो जाता है तो आदमी राक्षस हो जाता है। उसके अंदर आसुरी प्रवृत्ति आ जाती है और वो कुछ भी कर सकता है। तो हमें लगता है डर होना अच्छी बात है। यही डरह डरप हरिवंश हित जिनो भ्रम गुण सलील पर जिमन मंगल लोक तों सु हरि पद भज न विलंब कर जिनका नाम तीनों लोकों का मंगल करने वाला है ये डरते रहो कि हमसे कोई गलती ना हो जाए और उन भगवान का नाम जप करते रहो तो आपको सही रास्ता मिलता रहेगा गलत की तरफ जाने में आपको जलन पैदा होगी और भगवान बचा लेंगे करो सदा तिन रखवारी जिन बालक राखे महातारी इसलिए हमें में भगवान की शरण होना चाहिए और भगवान का नाम जप करना चाहिए और गलत कामों से डरना चाहिए क्योंकि आज नहीं तो कल वो मुझे दंड देंगे जो कर्म हो गया भले वो गुप्त हो गया कोई नहीं जानता लेकिन वो हमें आगे चलकर रोग के रूप में विपत्ति के रूप में निष्फलता के रूप में हार के रूप में यह हमको दंड देंगे हम बहुत पढ़ाई पढ़े हैं लेकिन नौकरी नहीं मिल रही अब प्रारब्ध भोग है वो हमें बहुत व्यापार में पैसा लगाया असफलता हो रही पीछे का कर्म है तुम्हें आगे नहीं बढ़ने दे रहा तो हमें बुरा कर्म जो है विपत्ति दुख संकट चिंता शोक भय और मृत्यु यह हमें प्रदान करता है।

इसलिए हमें बुरे कर्मों से डरना चाहिए। पक्का डरना चाहिए। जो डर गया वो अभय हो गया। और जो डरा नहीं वो फंस गया। यह बात है ज्ञानदेव मिश्रा जी श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव भाग्य से मिलते हैं अथवा अपने प्रयास से महाराज जी गुरुदेव गुरुदेव तो कृपा से मिलते हैं ना भाग्य से मिलते हैं ना प्रयास से मिलते हैं गुरुदेव कृपा से मिलते हैं अब मोह भाव भरोस हनुमंता बिनु हरि कृपा मिले नहीं संता जब भगवान कृपा करते हैं तो गुरुदेव रूप से मिल जाते हैं। भगवान की कृपा गुरुदेव की कृपा बन्नो गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि महामोह तम पुंज जासु वचन रविवकर निककर जो अपने वचन रूपी सूर्य का प्रकाश करके जीवों के अज्ञान अंधकार का नाश कर देते हैं वो स्वयं भगवान सद्गुरु देव रूप से विराजमान है और वो कृपा से मिलते हैं अपने प्रयास से नहीं आप जैसे यहां आए हो तो भगवान की जब कृपा हुई लाडली जो की कृपा हुई तो आप उनके महल में आए हो।

यह वृंदावन लाडली जी का महल है। जिनको वृंदा विपिन है। कृपा तिर की होए। जब उनकी कृपा होगी तभी यहां कदम रख सकते हो। नहीं मन से भी नहीं सोच सकते कि कैसा होगा वृंदावन। प्रथम यथामति प्रणो श्री वृंदावन तिरम्य श्री राधिका कृपा बिनु सबके मननगम्य। तो आप वृंदावन आए कृपा से आप साधु संग कर रहे हैं कृपा से। इसमें अपना प्रयत्न नहीं है। इसमें कृपा ही है जो हमको घसीट लाई है। जी अखिल मित्तल जी राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मार्गदर्शन जीवन में कैसे प्राप्त करें?

गुरु किसे बनाएं? मुक्ति का रास्ता क्या है? भगवान गुरु भगवान है। भगवान ही गुरु हैं। शास्त्रों का स्वाध्याय करो। संतों की वाणी सुनो। उसके अनुसार चलो। भगवान को गुरु मानो सही रास्ता मिल जाएगा। भगवान ही गुरु है। गुरु ही भगवान है। इंसान कभी गुरु हो नहीं सकता। क्योंकि इंसान की इतनी बड़ी बुद्धि होती है और परमात्मा समुद्र है। तो जैसे शीप समुद्र में नहीं समा सकता। ऐसे ही इंसान की बुद्धि इस माया से पार होने का रास्ता नहीं बता सकती। वही बुद्धि में बैठकर के रास्ता बताते हैं।

अगर किसी को इस माया से मुक्त होने का रास्ता मिला तो भगवान से मिला। भगवान ही बुद्धि में बैठकर के उसका कल्याण करवाते हैं। भगवान से कल्याण होता है। इंसान से नहीं कल्याण। अनंत ब्रह्मांडों का जो स्वामी है जिसने ऐसी प्रचंड माया फैला रखी है। कोई व्यक्ति हमें पार करा सकता है। आप विचार करो इस माया से हमें कोई व्यक्ति पार करा सकता। नहीं विश्वेश्वर भगवान पार कराते हैं। वही गुरु है। गुरु ही भगवान है। भगवान ही गुरु है। तो हम भगवान को गुरु मानकर संतों की वाणी सुनकर के सतार्ग में चलें।

विश्व बंधु जी अंबाला से राधे-राधे गुरु जी। राधे-राधे महाराज जी। मैं भारतीय वायु सेना में राष्ट्र सेवा हेतु तैनात हूं। मैं राष्ट्र सेवा के कर्म को धर्म मानकर पूर्ण निष्ठा से सेवा करता हूं। पर पूजा पाठ और नाम जप इतना समय नहीं दे पाता। ऐसे में कर्म योग से प्रभु की प्राप्ति हां पर नाम जप जरूर चलना चाहिए। नाम जप में कोई बाधा नहीं है। नाम जप में कोई बाहरी जरूरत भी नहीं है। आप जूता पहने हो तो आप शौचालय में हो तो आपका खानपान जैसे भी चल रहा है वैसे चलाओ। नाम जप करते रहो।

राधा राधा कृष्ण कृष्ण राम राम हरे हरि जो नाम प्रिय हो क्योंकि नाम से सद्गति प्राप्त होती है। पूजा पाठ तो समय है तो कर लीजिए नहीं तो पूजा ही है। हम ज्यादा इस पक्ष को पुष्ट नहीं करते कि आप एक घंटा बैठकर के आरती पूजा करें। आप ड्यूटी में तैनात है। अपनी ड्यूटी में जाइए। जो समय मिले उसमें तो जो मनोरंजन में संसार में लगाते हो वो भगवान में लगा दो अच्छा है लेकिन सबसे बड़ी पूजा है कर्तव्य का पालन करना और वो पूजा भागवतिक हो जाए भगवान को समर्पित हो जाए इसलिए नाम जप जरूरी है उठते बैठते चलते फिरते नाम जप करने में क्या जाता है हर समय हम बात ही थोड़ी करते रहते हैं जब हमारी वाणी मौन है तो अंदर से राधा राधा चल रहा है अपने कर्तव्य का पालन करो बिल्कुल बिल्कुल निश्चित भगवान कृपा करेंगे।

महाराज जी जरूरी नहीं है कि तिलक कंठी और ये सब बांधा या मंदिर जा रहा है वही भक्त है। अपने कर्म क्षेत्र में भी धर्म ये आचार्य परंपरागत दिए हुए भेष हैं। ये भगवत मार्ग के चिन्ह हैं। जैसे हम तिलक लगाए हैं, जटा रखाए हैं, कपड़ा पहने। यह हमारे सांप्रदायिक वेश हैं। साधु के वेश हैं। लेकिन अंदर से साधुता ना हो और वेश हो तो भगवत प्राप्ति तो होने वाली नहीं। और वेष ना हो और अंदर से वो साधुता हो तो निश्चित उसको भगवत प्राप्ति हो जाएगी। तो ये जरूरी नहीं है। जरूरी है यह अपने कर्तव्य का पालन करते हुए भगवान का नाम जप करना।

बोले आप क्यों धारण किए हो? हमारे भाग्य में लिखा है। हमारे भाग्य में लिखा है कि तुम्हें बचपन से बाबा जी बनना पड़ेगा। तो बचपन से बाबा जी है। हमारे भाग्य में भैंस ये लिखा हुआ है। इनके भाग्य में लिखा हुआ है। जटाजूट तुम्हें पहले धारण करना पड़ेगा। बाबा जी बनना पड़ेगा। खास बात है भगवान का भजन करना। खास बात है भगवान के द्वारा प्राप्त कर्तव्य कर्म का पालन करना। वैसे हम सही बताएं। बहुत बढ़िया जीवन है यदि गृहस्थ धर्म से सही चला जाए तो क्योंकि साधु भी गृहस्ती से ही पैदा होते हैं और साधुओं का पोषण भी गृहस्ती से ही होता है और भगवान का अवतार भी गृहस्ती में ही होता है।

गृहस्थ धर्म बहुत बढ़िया धर्म है। यदि धर्म से चला जाए। पर इतना प्रपंच है कि भजन करना कठिन है। नहीं इतना मतलब एक चैप्टर हो तो निपटा ले। इतने चैप्टर हैं कि दिमाग जो है उसी में बटा रहता है। भजन करना, माला जपना सब ये तो बहुत पीछे की बात है। कैसे बिटिया का ब्याह हो, कैसे लड़का की पढ़ाई को दे और लड़का पढ़ता नहीं। बड़ी उदंडता करता है। कित इतनी मतलब इतनी बातें हैं कि वो निपटा ही नहीं पाता। थक के सो जाता है। फिर सुबह जब उठा तो फिर सुबह से शुरू हो जाता है। गृह कारज नाना जंजाला ते अति दुर्गम शैल विशाला।

तो यही सर आवत अति कठिनाई राम कृपा बिन आई न जाई नहीं तो बहुत बढ़िया धर्म है आप अपने धर्म का पालन करते हुए नाम जप करो आप एक संत हो गंदा भोजन मत करो गंदे आचरण मत करो तो आप संत हो और संत होकर रुपया पैसा खानपान नाना प्रकार के भोग सामग्री तो भाई भगवत प्राप्ति नहीं होगी वेश से भगवत प्राप्ति नहीं होती उद्देश्य से भगवत प्राप्ति होती वेश तो प्रारब्धानुसार जन्म जन्मांतरों का सुकृत उदय होता है तब विरक्त मार्ग मिलता है कि एकांत में भगवान का चिंत अब हमारे पास एक ही चिंतन है भगवान का चिंतन करो कोई और ना लड़का ना बच्चा ना परिवार और ना स्वयं खाने की चिंता स्वयं खाने की चिंता नहीं भगवान दे रहे हैं ना दे तो भूखे भी रहे हैं जैसे भगवान रखे वैसे कोई चिंता नहीं केवल भगवान का भजन ये भगवान ने दिया है लेकिन आप दूसरों की चिंता करते हुए भजन कर रहे हैं।

यह बहुत बड़ी बात है। एक कोई काम गृहस्ती का दे दो तो हम परेशान हो जाएंगे। तुम्हारे पास 100 काम है फिर भी राधा राधा कर रहे हो। विचार करके देखो। 100 काम है। फिर भी आप समय निकाल के राधा राधा कर रहे हो। बहुत बड़ी बात है। एक बार किसी संत ने कहा कि आप गृहस्थ भक्त को प्रभु श्रेष्ठ मानते हैं या विरक्त भक्त को? तो भगवान ने कहा गृहस्थ भक्त को विरक्त तो रात दिन हमारे में लगे हुए हैं लेकिन तो उन्होंने कहा प्रभु विरक्त तो सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि सब कुछ त्याग कर आपके लिए भी था तो उन्होंने कहा एक काम करो इस प्रश्न का उत्तर बाद में देंगे एक बड़ा सा कटोरा दिया और घी भरा और कहा हमारे इसके राउंड मत लगाओ आसन के और एक बूंद अगर घी गिरा तो सुदर्शन चक्र पीछे है।

और बोले प्रभु समस्या में डाल दिया। बोले एक राउंड लगाओ पूरा राउंड लगा के आए। बोले कई बार हमारा भजन किए। बोले भजन वो पीछे सुदर्शन चक्र ये हमारा पूरा चिंतन था कि एक बूंद ना गिरे। तो बोले सोचो तुम्हें एक काम दिया है कि घी एक बूंद गिरने ना पावे तो तुम एक बार नाम नहीं जप किए और गृहस्थी में सैकड़ों काम है और वो सब काम निपटाता हुआ भी राम राम कृष्ण कृष्ण हरी हरी रचता है इसलिए गृहस्थ धर्म से ही सब धर्मों का पालन होता है। सब धर्मों का पालन होता है। पर आप अगर भगवान का भजन कर ले तो सर्वश्रेष्ठ संत हैं।

क्योंकि संतों की भी सेवा, परिवार की भी सेवा, समाज की भी सेवा और भगवान का भी भजन कितनी बड़ी बात है। हमारे पास एक ही काम है केवल भजन दूसरा काम नहीं। तुम्हारे पास सैकड़ों काम होते हुए भी भजन है। यह बहुत बड़ी बात है। बस चलते रहो। गलत आचरण मत करो। गंदा खानपान मत करो। नहीं तो बुद्धि फिर भजन में नहीं लगेगी। महाराज जी गृहस्थ की बात हो रही है तो मतलब एक सदगस्त को जो अभी तक तो ठीक है संसार में बट अभी उसको प्रारंभिक अवस्था में उसकी दिनचर्या क्या होनी चाहिए दिनचर्या में क्या उसको मतलब अपने सारे गृह कार्य और अपनी जॉब आदि करते हुए भी कैसे भजन को प्राप्त देखो कोई समय नहीं दे सकते इसलिए कि कोई कोई नाइट ड्यूटी करता है कोई कोई रात की ड्यूटी करता है अब हम कह दे सुबह 4:00 बजे उठना ही चाहिए वो 2:30 बजे 3:00 बजे 4:00 बजे आया है अब वो उठेगा कि स्नान करेगा कि सोएगा जाके हमें लगता है जब हमें समय मिले गृहस्ती में अब सुबह से कई ऐसे कार्य होते हैं अब रात में पानी लगाना है किसान को अलग-अलग कई ऐसे कार्य होते हैं।

व्यापार में उसको विदेश जाना है। ऐसे कई कार्य होते हैं जिनसे गृहस्ती में एक दिनचर्या नहीं रह सकती। एक दिनचर्या नहीं रह सकती। तो सबसे बड़ी गृहस्ती की साधना है कि हमारे दरवाजे से कोई भूखा ना जाए और हमारे अंदर नाम चलता रहे। बस सबसे बड़ी साधना है। आप जो कर्म कर रहे हो वो कर्म करो और नाम को पकड़ लो। नाम अगर चलता रहा तो आप जीत जाओगे माया पर। कलयुग केवल नाम आधारा सुमिर सुमिरन। हम ये नहीं कहते कि 4:00 बजे उठकर के पूजा में बैठ जाओ। क्योंकि बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जो 4:00 बजे उठने वाला समय नहीं मिल पाएगा।

जब आप उठ पाओ भगवान का स्मरण करो। नाम जप शुरू करते हुए अपने अपने कार्य प्रणाली में लग जाओ। अब गृहस्ती में माताओं बहनों को जैसे सुबह उठिए और यह देखिए कि पति कई बजे ऑफिस जाएगा। बालक कई बजे स्कूल जाएगा। पति और बालक को तैयार कीजिए। उसको स्कूल भेजिए। उसको ऑफिस भेजिए या अपने काम में जा रहा है। उसको तैयार करके टिफिन सबके फिट कर दिए। अब कोई काम नहीं है। पर्दा ठाकुर जी का खोला उनकी पूजा की। वो चाहे 10:00 बजे हो चाहे 11:00 बजे हो। अब पति को ऑफिस जाना है। बच्चे को स्कूल जाना और तुम पूजा का विस्तार कर रहे हो तो सब बिगड़ जाएगा।

नहीं बिगड़ जाएगा। वो तो हमें लगता है गृहस्थ धर्म में अपने संबंधों का निर्वाह करना ही सबसे बड़ी पूजा है। अपने पति को भगवान मानना पुत्र में भगवान को देखना सुंदर भोग बनाकर उनको पवाया टिफिन लगा दिया उनको भेज दिया। ये गृहस्ती में ये नहीं कि भाई हम तो कर लो तो तुम्हारा मन हो करो नहीं हम पूजा वो तो हमें लगता है अपने कर्तव्य का पालन करना सबसे बड़ी पूजा है। अपने कर्तव्य में चूक गया तो पूजा पूजा नहीं है। हम एक पूजा पूजा शब्द से हमारे दिमाग में एक बात आ जाती है।

ठाकुर जी की छवियां, आरती, अगरबत्ती लगा ये हमें लगता है कि यही पूजा नहीं है। यही पूजा नहीं है। अगर यही पूजा होती तो श्री कृष्ण कर्मण वाधिकारस्ते मा फलेशु कदातन भगवान ने आदेश किया कर्म के लिए भगवान कहते हैं अपने कर्म को करो फल की आकांक्षा मत करो सबसे बड़ी पूजा है और भगवान ने कहा मा मुनिश्वर मेरा स्मरण अनन्य सत चेता सततम यो माम स्मरते नित्यसा जो निरंतर मेरा स्मरण करता है ये सबसे बड़ी बात है राधा राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण कृष्ण ये तो चलते फिरते उठते बैठते वो तो सब ठीक हो जाएगा।

राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी एक नए साधक की साधना बहुत बार टूटती है जिससे मन कमजोर और निराशा का अनुभव करता है। मतलब साधना का कोई नियम बनाते हैं तो टूट जाता है महाराज जी। मन को दोबारा साधना में लगाना कठिन हो जाता है। ऐसे में क्या करूं? उस वक्त मन को कैसे समझाऊं? मैं वहां लंदन में रहती हूं। वहां केवल सत्संग ही है मेरे पास। देखो इसमें सबसे कमी जो है दो पॉइंटों की है। एक ब्रह्मचर्य एक आहार हमारा आहार अपवित्र होगा तो जैसा खाए अन्न वैसा बने मन और हमारा ब्रह्मचर्य ठीक नहीं होगा तो स्मृति पर प्रभाव पड़ेगा।

स्मृति दृढ़ता संकल्प पूर्णता यह ब्रह्मचर्य से संबंध रखते हैं। अगर हमारा ब्रह्मचर्य है तो दृढ़ संकल्प स्मृति का प्रवाह उसी ब्रह्मचर्य से पुष्ट होता है। ब्रह्मचर्य है एक उत्साह। ब्रह्मचर्य है हर नियम पालन। नियम टूटना दो कारण। आहार अशुद्धि और ब्रह्मचर्य ठीक ना होना। चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो एक गृहस्थी में एक सीमा तक ब्रह्मचर्य है और विरक्ति में आजीवन ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य जरूरी है। जो ब्रह्मचर्य है वो शरीर को पुष्ट रखता है। अध्यात्म की तरफ हमें प्रेरित करता है।

उत्साह बढ़ाता है। ब्रह्मचर्यहीनता स्मृति विहीनता बार-बार कसम टूट जाना नियम तोड़ देना शरीर में एक प्रमाद स्थिति बने रहना ये सब रहता है तो आप दो चीजों में सुधार कर लीजिए आहार शुद्धि कर लीजिए और ब्रह्मचर्य पर दृष्टि रखिए और नाम जप कीजिए देखो अभी ठीक हो जाएगा सब ठीक हो जाएगा पल्लवी जी अलीगढ़ से प्रणाम महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी मंत्र जाप से वर्तमान जीवन के दुख तकलीफ कम होती है या अगले जन्म के अरे पूछो मत इसलिए कह रहे हैं कि अगर कहेंगे तो

विश्वास नहीं होगा तो इसलिए हम कहा पूछो मत अगर हम कहते हैं कि दुख मिट जाता है तो आप उंगली हमारे ऊपर उठा दोगे तो अगर कहो कि मंत्र जपने आ दुख मिट जाते हो अगर हम कह दे हां तो आप कहोगे आप ही भोग रहे हो अभी तक क्या मंत्र नहीं जप पाए क्या बात यह है कि पूर्व जो प्रारब्ध निश्चित हो गया है उसे भोगना पड़ेगा जिसे प्रारब्ध कहते हैं उसे भोगना पड़ता है जो नया कर्म है और जो पुराने संचित कर्म है ये दोनों नष्ट हो जाते हैं भजन से प्रारब्ध नष्ट नहीं होता प्रारब्ध भोगना पड़ता है राम कृष्ण परमहंस जी के गले में कैंसर था।

बड़े-बड़े संतों के शरीर में पीड़ाएं देखी गई। अगर भजन से सब पीड़ा नष्ट हो जाती तो भजन करने वाले को किसी को पीड़ा ही ना मिलती। आप विचार करके देखो जितने बड़े-बड़े संत या कोई भी भगत है पीड़ा से युक्त पाया जाता है क्योंकि उसके प्रारब्धों का नाश होता है। पूर्व संचित कर्म भस्म कर देते हैं भगवान और क्रियमाण माने वर्तमान में जो हमसे गलती होती है उसे क्षमा कर देंगे। लेकिन जिस समय हमारा शरीर बनाया गया था उस समय जो रखा गया है कि 20 वर्ष में तुम्हारा हाथ टूट जाएगा 25 वर्ष में तुम्हारा सर फूटेगा तुम्हें कैंसर वो सब होगा वो सब होगा चाहे भजन करो या ना करो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता तो यह बात हिम्मत करके हां यह जरूर है कि भगवान थोड़ा सहने की सामर्थ्य दे देते हैं सहने की सामर्थ्य देते हैं कि उसी को हम रो के काटे या उसी को हंस के काटे तो जब हम भजन में चित्त जोड़ते हैं तो थोड़ा आनंदमय जीवन होता है लेकिन भोगना पड़ता है।

अवश्य में भोक्तव्यम कृतम कर्म शुभाशम भोगना पड़ता है। इसीलिए सबको भोगना पड़ता है। इसीलिए कहा जाता है डरो पाप कर्म मत करो क्योंकि कर्म बन गया तो भोगना पड़ेगा। अभी मनुष्य जन्म है तो नाम जप करके भगवान का आराधन करके तीर्थ याटन करके दूसरों की सेवा करके आप मिटा सकते हो और मनुष्य जन्म छूट गया फिर नहीं मिटा पाओगे फिर तो भोगना ही भोगना है इसलिए खूब नाम जप करो और जो कष्ट आवे उसे भोग लो भगवान का प्रसाद मान के निकल चलो बहुत भयाव संसार है बहुत कष्टमय संसार है पता नहीं लोग कैसे जीते हैं यहां तो हर क्षण किस किस की शरण में जाए।

सब असमर्थ है। कोई भी बताओ ऐसा है जिसकी गोद में सर रखकर रोया जाए और हमको निश्चिंत कर दे। क्योंकि जिसकी सर में हम गोद रखकर के रोना चाहते हैं वो भी असमर्थ है। वो भी बेचारा काल के अधीन है। वो भी मृत्यु के अधीन है। वो भी भय युक्त है। वो पूर्ण समर्थ तो नहीं है। और जो पूर्ण समर्थ वो दिखाई नहीं दे रहे। है यही है सबके अंदर है सबके बीच में है हमारी सुन रहे है लेकिन हमें लगता है प्रगट में कोई हो ना जिसके गले लग के हम अपने दुख को वर्णन कर सके हम रो सके कोई हमें प्यार से कि आप निश्चिंत रहिए हम है ना वो ये करते नहीं है छुपे छुपे डोलते हैं पर्दे में रहते हैं माया के देखो एक सीमा है जहां तक तुम्हें भजन आनंद और जब असीम आनंद की तरफ बढ़ोगे तब तुम्हारे तन मन प्राण सब पर भगवान का अधिकार होगा और उस समय राम का किया मीठा लागे यह बात आना बहुत कठिन है।

हरि नाम जपने वाले महापुरुष को 22 बाजारों में कोड़ों से मारा गया। क्या अपराध था? 22 बाजारों में कोड़ों से मारा गया। हरि बोल हरि बोल मार कोड़े उनके सुकुमार शरीर की धज्जियां उड़ा रहे थे 22 बाजारों में मार मरा जानकर गंगा जी में फेंक दिया यह है जब श्री कृष्ण से प्यार करोगे बैलेंस बना के चलोगे तो ठीक से रहोगे भजन भी किया और भोग भी भोगे और संसार में है और अगर उनके चिपकना चाहे प्रीतम प्यारे अरे तो फिर वो फिर वो वो जो लीला करते हैं देखो प्रह्लाद जी बड़े-बड़े भक्तों के चरित्रों में देखो प्यार करते हैं पर फिर परीक्षा लेते हैं।

तुम्हें तन से प्यार है या मेरे से प्यार है? प्राणों से प्यार है या मेरे से प्यार है? परिवार से प्यार है या मेरे से प्यार है? यश कीर्ति से प्यार है या मेरे से प्यार है? उनकी परीक्षा में वही पास करवा दे तो करवा दे नहीं तो पास होना बहुत कठिन है। तो हमें लगता है कि भगवान की शरण में होकर भगवान का नाम जप करते हुए आए हुए दुख सुख को भोग ले और भगवान से प्रार्थना करें कि मुझे इतनी क्षमता दो कि मैं आपके विधान को जान करके हम इस दुख सुख को सुख में फूले नहीं और दुख में भूले नहीं।

आपको निरंतर याद करें। बकाया है बहुत कठिन मार्ग। कोई सरल मार्ग नहीं भक्ति बहुत कठिन मार्ग है। मतलब आप कदम कदम पर कांटे बिछाओ और इसके बाद आपकी हम जय बोले। ऐसा मार्ग है। हम चल रहे हैं और आप कदम कदम पर हमारे कांटे बिछाओ और हम आपका मंगल मनाएं कि तुम सुखी रहो। तुम्हें कभी दुख ना हो। भगवान तुम पर यह है संत का मार्ग करत जे अनहन निंदक ति अनुग्रह कियो जो तुम्हारी निंदा करें जो तुम्हारा अपमान करें जो तुम्हें दुख दें उनका मंगल मनाओ कैसे हो सकता है कितना कठिन है संत मार्ग भक्त मार्ग कितना कठिन है कह रहे कि अगर तुम्हें कोई गाली दे रहा है अगर तुम्हारा कोई अपमान कर रहा है तो तुम उसका मंगल मनाओ स्वस्थ रहो तुम्हारे ऊपर भगवान की कृपा रहे तुम्हें कभी कभी कोई दुख ना मिले किसको जो हमें दुख दे रहा है जो हमें कष्ट दे रहा है यह बड़ा मार्ग जो भक्त इसीलिए तो कहा गया मोरे मन प्रभु विश्वासा राम ते अधिक राम कर दासा भगवान का भक्त भगवान से भी बढ़कर है क्योंकि ये वास्तविक भक्ति आना ये बहुत कथित बात है थोड़ा माला घुमा लेना आरती पूजा कर लेना मौज मस्ती से जीना ये तो ठीक है लेकिन पूरा का पूरा जीवन भगवान के लिए अर्पित कर देना फिर वो वो थोड़ा कठिन है फिर कठिन है।

गुरुदेव जी अगर किसी के पास गुरु मंत्र नहीं है तो हर कोई राधा नाम का जाप कर सकता है। बिल्कुल कर सकता है। बिल्कुल कर सकता है। सब कोई कर सकता है। महाराज जी आप सुप्रीम कोर्ट के जज हैं। अच्छा आपने जो सरल भाव में भक्ति क्या है वो बताया। धन्यवाद महाराज जी। जी प्रयास यही रहता है हमारा तो कि जी कार्य करते-करते स्मरण होता रहे। हां बिल्कुल अपने कर्तव्य को ही पूजा समझे। कर्तव्य में भय और प्रलोभन का त्याग करके अपने वही है वही अपने कर्तव्य का भय और प्रलोभन से यदि हम हट के तो हमारी कर्तव्य पूजा हो जाएगी।

अगर भयवश कुछ हुआ या प्रलोभन वश कुछ हुआ तो हमारी पूजा में बाधा पड़ जाएगी। हमें समय मिले तो और भी पूजा करेंगे। सबसे बड़ी पूजा है अपने कर्तव्य का पालन करना जो भगवान ने हमें कर्तव्य दिया और नाम जप कर अंदर ही अंदर भगवान का स्मरण करता रहे उनका प्रश्न है बाबा झंडा अपमान ईर्षा इसको कैसे मैं सहन और कर सकूं क्योंकि जब तक जब तक सब में अपने हम प्रभु को नहीं देखते तब तक कहीं ना कहीं कभी गुण दिखाई देते हैं तो हम प्रशंसा कर देते हैं और दोष दिखाई देते हैं तो निंदा कर देते हैं लेकिन जब हम प्रभु को देखते हैं तो फिर गुण दोष नहीं दिखाई संसार में रह रहे हैं तो ये थोड़ा सा हमें फेस करना पड़ता है।

हां हां संसार पर बाहरी करो अंदर से सब में प्रभु को देखो तो बढ़िया रहेगा। बाहरी में तो जरूरत पड़े तो डांट भी देना है। लेकिन अंदर से यही मानना है कि प्रभु आपने सेवा दी है। सब में प्रभु विराजमान है। यह भावना के बिना राग द्वेष जाता नहीं है। और राग द्वेष जब तक रहता है तो जन्म मरण बना रहता है। सब में लाडली जी विराजमान है। सब में ठाकुर जी विराजमान है। पर अब अगर चोर रूप से ठाकुर जी आएंगे तो डंडा रूप से पूजा तो होएगी। नहीं उसमें परेशान नहीं होना। फेस करना पड़ता है।

हां बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा आपकी आंख को देख के बस ये समझो के हृदय गदगद जावे लगे कि साक्षात वृंदावन अब जागृत कर दियो आपने एक समय पे जी एस ग्राउस महाराज जी यहां कलेक्टर थे ब्रिटिश शासन काल में तो वो काऊ ठाकुर जी को मानते ही नहीं है उन्होंने गए वो गोपीनाथ मंदिर उन्होंने घड़ी दी जो वहां से चले तो जैसे ही ठाकुर जी को घड़ी पहराई तो घड़ी चलने लगी जो पल्स से चलने वाली घड़ी है तो गोपीनाथ जी को घड़ी वाला मंदिर भी बोले राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा इतनो तो कबहु हसी हो इतना तो कबहु हस दे सुनहु कृपा किशोरी राधे सुनहु कृपाल किशोरी राधे राधे राधे राधे राधे सुनहु कृपाल किशोरी राधे अवसी कृपा की कोते हूं इतनो तो अबहु हस हो तुम मोहि मिलो मिलो ना कृपाानिधि मो को ढूंढत तो भटके हो तुम मेरी सुनो सुनो किशोरी मो को तो नित दीन रटे हो तुम मेरी बाह मेरी बाह आ तुम मेरी बाह कहो ना गहो हंसी भुज पसार मोसो विनय करे हो तुम मेरे दृग पहुंचो मत पहुंचो पे सो नित दृग नीर धरे हो अति नीच कहा मांगो इतनी तो त आस पूजे हो भोरी नेम बढ़े तुम ही सो भोरी नेम बढ़े तुम ही सो सब जग सो संबंध छुड़े हो इतना तो अब हस गए हो राधा राधा राधा राधा

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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