आखिर मोक्ष का क्या अर्थ होता है ?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
डॉक्टर आदित्य शुक्ल जी राधे-राधे महाराज जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा श्रवण से श्राप ग्रस्त राधा परीक्षित को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी इस प्रसंग में मेरे मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि हमारे लिए मोक्ष का वास्तविक अर्थ क्या है त्रिगुण माया से रचित त्रिगुण शरीरों में अहम बुद्धि करने के कारण हम बंध गए। वैसे हम कभी बंधे नहीं। गोस्वामी तुलसीदास जी बड़ी सावधानी पूर्वक वर्णन कर रहे हैं। बोले जड़ चेतन ही ग्रंथि पड़ गई। यद्यपि मृषा छूटत कठिनई बोले जड़ और चैतन्य में ग्रंथि पड़ गई।
अज्ञान के कारण पर लिखना पड़ा। यद्यपि मृषा यह ग्रंथि झूठी है। आत्मा कभी बंधन को प्राप्त हो ही नहीं सकता। जो आत्म स्वरूप है वो कभी बंधन को प्राप्त नहीं हो सकता। पर छूटति कठिनई यद्यपि गांठ झूठी है पर छूटने में बड़ी कठिनता है। क्या हो गया? मैं जो है शुद्ध में वह ब्रह्म स्वरूप है। वह अपने स्वरूप को भूलकर इन शरीरों में राग कर लिया। तीन शरीर है। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। अब देखो आपसे जैसे पूछा जाए आप कौन हैं? तो आपका विचार इसी शरीर पर आएगा।
नहीं मैं अमुक हूं, अमुक गांव में पैदा हुआ हूं। अमुक जाति में पैदा हुआ हूं। लेकिन यह स्थूल शरीर हमारा ढांचा है। मैं तो नहीं हूं ना। बस इसी भ्रम का नाश हो जाना मोक्ष कहते हैं। जो शरीर धर्म से हम युक्त हो गए हैं। इंद्रियों के विलास को हम अपना मानते हैं। जैसे मैंने इनको देखा लेकिन जब ज्ञान पूर्वक इसका अनुभव करो तो नेत्र इंद्री ने देखा मन ने प्रेरणा की। और मैं मन और नेत्रेंद्र दोनों का साक्षी हूं। मैंने नहीं देखा। मैं जो है उसने नहीं देखा। नेत्रेंद्र ने देखा और मन ने उसको संकल्प किया कि देखो ये कौन है?
और हम जो मैं तत्व है वो साक्षी है इनका। इनको पावर देता है और इनका साक्षी है। इसी से पावरवान है। सब कर परम प्रकाशक जो परम प्रकाश इन इंद्रियों मन बुद्धि को सबको जहां से मिल रहा है वो आत्मा है और वो निरपेक्ष है। जब यह अंदर ज्ञान हो जाता है कि ना मैं खाता हूं। जिसे पांचव अध्याय में गीता में लिखा है जो स्थित प्रज्ञ पुरुष है वो खाता हुआ भी खाता नहीं है पीता हुआ भी पीता नहीं है देखता हुआ भी देखता नहीं है चलता हुआ भी चलता नहीं वो सूंघता हुआ भी सूंघता नहीं मतलब कैसे सूंघ रहा है लेकिन कौन घणेंद्र इसका अनुभव कौन करा रहा है मन मैं तो हूं नहीं इसमें मैं नहीं है।
तो जहां वह अहंकार रहित देहा अभिमान रहित हुआ अपने स्वरूप में स्थित हुआ। मुक्त पुरुष था मुक्त पुरुष है और मुक्त रहेगा पर बंध गया। इसमें मैंने देखा मैंने किया मैंने भोगा। मैंने अहंकार विमूढ़ात्मा करता मनते वही अहंकार का बंधन है। साधना के द्वारा इसी भ्रम को मिटा दिया जाता है। वो जीवन मुक्त पुरुष होकर अखंड आनंद का परमानंद का अनुभव करता है अपने स्वरूप में पर छूटती कठिनाई बिना गुरु कृपा के बिना साधना के ये बात नहीं आएगी। गुरु कृपा से साधना मिले और खूब हो तब धीरे-धीरे खुद अनुभव होने लगता है।
मैं देह नहीं हूं। यह देह हमारी पोशाक है। जैसे आप कुर्ता पहने हो तो आप कुर्ता तो नहीं हो। कुर्ता पहनने वाले हो। ऐसे मैं शरीर नहीं हूं। शरीर को स्वीकार करने वाला हूं। अस्वीकृति कर दो। खत्म हो जाएगा। अब मैं शरीर नहीं हूं। एक चांटा लगा मानो तो दुख तो होगा ना पर ज्ञानी को चाटा का दुख नहीं होगा दर्द होगा पीड़ा होगी दुख नहीं होगा क्योंकि पता है ये शरीर है इसका प्रारब्ध भोग है तो इसको थप्पड़ पाला तो थप्पड़ पा लिया और पूजा पा ली तो पूजा पा लिया ना उसको दुख है ना सुख है वही जीवन मुक्त महापुरुष है एक चंदन लगा रहा और एक अपमान कर रहा है।
दोनों के प्रति समबुद्धि है। वही महात्मा है। वही जीवन मुक्त पुरुष है। तो मोक्ष का तात्पर्य है। जैसे काम वेदना आई तो किस पर आए? आप पर आप पर कभी नहीं आ सकते। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इनका प्रभाव आत्मा पर नहीं है। हां, इनका प्रभाव अंतःकरण पर है। सूक्ष्म शरीर जो सूक्ष्म शरीर है उसमें जो अहम है सूक्ष्म शरीर में चार अंतःकरण के मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार उस अहंकार में बैठे होते हैं। मैं भोगू, मैं देखूं, मैं चखूं। यह जो इच्छा प्रकट होती है उसमें होती है।
तो जो ज्ञान का साधक होता है वह देखता है कि अंतःकरण में स्फूरणा हो रही विषय की वो उसे देखने वाला बनता है। तो उस पर वो ना सह गया। अब जो जलन हुई वो भी अंतःकरण में हुई। अपने में नहीं हुई। यहां हम सब अपने में मानते हैं। जैसे मेरा मन कहता है यह चीज खाऊं और वह ना दूं तो जलन पैदा करेगा। अशांति पैदा करेगा। तो हमें लगता है यार खा लेते हैं तो शांति हो जाएगी। बस यही बंधन है। यही बंधन है। अब वो मन बलवान हो गया। अब दूसरी बार दूसरी चीज कहेगा तीसरी बार तीसरी ऐसे जन्म के जन्म होते चले जा रहे हैं हमारे।
हम ना मन को शांत कर पा रहे हैं, ना इच्छाओं को मिटा पा रहे हैं, ना शरीर राग मिटा पा रहे हैं। यही बंधन हमें पुनरप जननम पुनरप मरणम में डाले हुए है। अब गुरु की शरण लेकर जब हम भजन करते हैं और अंदर ज्ञान विज्ञान उत्पन्न होता है। विवेक तो होए विवेक मोह ब्रह्माभागा तब रघुवीर चरण अनुरागा तो फिर सब बात बन जाए तो भजन करो भजन करो और संतों का संग करो शास्त्रों का स्वाध्याय करो और सहना सीखो गर्मी सर्दी बरसात भूख प्यास काम क्रोध लोभ मोह मदमत्सा जो सहन कर गया वो महात्मा हो गया जो टूट गया वो विषय हो गया यही खेल चल रहा है सहन कर जाओ मन की पीड़ा को सहन कर जाओ यम ही व्यथते पुरुषम पुरुष सम दुखा सुखाधरम स्वत कल्पते जो सह गया व्यथित नहीं हुआ मन की पीड़ा से हारा नहीं सुखदख में समान भाव रखा वो अव्यय पद का अधिकारी परम पद का अधिकारी हो जाता है वो अमृत पद में स्थित हो जाता है और सही पूछो तो स्थित नहीं हो जाता वो स्थित था हां अनुभव केवल होता है।
भ्रम हट गया अनुभव हो गया। वो तो मुक्त था ही। उसे कभी कोई नहीं बांध
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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