॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1075 · 27 अक्टूबर 2025

▶ YouTube

श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की श्री वृंदावन धाम की सगुरुदेव भगवान की जय विनोद कुमार जी हरियाणा से श्री हरिवंश महाराज जी श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपने सत्संग में संध्या के समय कुछ भी खाने को निषेध बताया था।

आपसे निवेदन है कि संध्या का समय क्या है और इस समय हमें क्या करना चाहिए? क्या नहीं करना चाहिए? हां 45 मिनट आगे और पीछे सूर्य भगवान के अस्त होने के उसको 48 समझ लीजिए। दो घड़ी 24 24 मिनट 24 * 2 = 48 दो घड़ी का समय संध्या का समझ लीजिए कि जैसे इस समय पौ:45 बजे डूबता होगा दिन पौ:45 बजे तो पौ:45 बजे के 24 मिनट घटाइए 5:21 5:20 हां तो मान लो 520 से संध्या लागू हो गई 61 24 मिनट इधर और फिर अस्त होने के बाद 24 मिनट पौ:45 के बाद 24 मिनट जोड़िए 10 610 610 मतलब 610 के ये 5:20 से लेकर और 610 तक बीच में जैसे भोजन है, स्वाध्याय है, सहवास मैथुन है।

ये सब क्रियाएं मना की गई है। उस समय शांत भाव में भगवान सूर्य को अर्घ देकर गायत्री जप है, गुरु मंत्र जप है, नाम जप है। उस समय जप प्रधान रहना चाहिए। संध्या काल में यह 48 मिनट का समय बीच का 24 मिनट इधर 24 मिनट इधर दोनों को छोड़ के फिर इसके बाद पाले या पहले पाले लेकिन संध्या के समय भोजन मना किया गया है। एक घंटा की बात है। छोटा-मोटा 48 मिनट मतलब अगर हम कार्य कर रहे हैं कोई और नाम जप करते हां हां बिल्कुल वो उस समय नाम जप जरूर करना चाहिए। अब मान लो किसान है तो अपना काम तो करेगा।

व्यापारी है तो अपना काम करेगा। पर उस समय जैसे संध्या का समय तो ध्यान आ गया ना संध्या का समय अब भगवान का स्मरण प्रारंभ कर दे अपने कार्य करते हुए क्योंकि जीवन में कार्य कभी समाप्त होने वाले हैं नहीं। तो हम भगवान का भजन थोड़ी छोड़ देंगे। भगवान का भजन तो करना ही चाहिए। जी संजय यादव जी राधे-धे महाराज जी महाराज जी जब भक्त भगवान से कुछ नहीं चाहता तो भगवान क्या देना चाहते हैं फिर क्या देंगे अपने आपको अपने आप को यह बड़ा पावरफुल चिंतन है जब हम किसी का भजन करें या सेवन करें कुछ चाहे ना इसमें बड़ा पावर है जैसे आप कोई सेवा किए तो हमारा मन होगा आप क्या लेंगे?

कुछ नहीं। फिर आप सेवा करें। फिर पूछे क्या लोगे आप? कुछ नहीं। तो जितना आप कहोगे कुछ नहीं उतना ही हम आपके प्रति समर्पित होते जाएंगे। आपके प्रति हम यहां तक समझ लो कि कमजोर होते जाएंगे। हम इतना कमजोर हो जाएंगे कि एक दिन आपके सामने हम सकुच जाएंगे। जब आप कुछ नहीं लेंगे तो आपकी अधीनता हो जाएगी। आपकी अधीनता हो जाएगी। देखो सर्वलोक महेश्वर अखिल ब्रह्मांडों के स्वामी भगवान श्री राम हनुमान जी से कहते हैं कितनी सकुच है इस बात में देखना प्रति उपकार करो का तोरा सनुख होए ना सकत मन मोरा मैं आपकी सेवा के बदले में क्या करूं मतलब इतना मन सकुच गया है कि तुम्हारे सामने नहीं हो रहा है।

सन्मुख हो न सकत मन मोरा सुन सुत तात पुरिन मैं ना कर विचार देखा मन मा हे तात हे पुत्र हे वत्स मैं तुमसे कभी उ नहीं हो सकता भगवान अधीन हो गए निष्कामता में जब हम सेवा करते हैं किसी से और कुछ नहीं लेते तो वो अधीन हो जाता है वो सब कुछ जाता है। यही सबसे बड़ी बात है। सेवा का स्वरूप यही है कि स्वामी प्रसन्न होकर के ऐसा सोचे कि मैं क्या दूं और सेवक मुझे कुछ नहीं चाहिए। यह सेवक और ऐसे स्वामी बिरले हैं। ऐसे स्वामी सिर्फ भगवान है और ऐसे स्वामी सिर्फ भक्त हैं।

जो अकिंचन और निष्काम भक्त हैं। तो भगवान अपने आप को दे देते हैं। जो कुछ नहीं मांगते हैं उनको भगवान अपने आप को दे। उन भक्तों के पीछे पीछे भगवान डोलते हैं। कहीं कोई विपत्ति कहीं कोई कष्ट ना हो जाए। जहां मेरा भक्त चरण रखे वहां रखूं मैं हाथ। पीछे पीछे मैं फिरूं कभी न छाणू साथ भक्तन पाछे यो फिरत जो बछरा संग अगर थोड़ा भी कोई संकट का अवसर आता है वहां भगवान तुरंत भक्त का सहयोग कर देते हैं भक्त क्योंकि वो निष्काम भक्त है ना जहांजहां भक्तन को कछु परत है संकट आए तहां अपुन बीच होए उस संकट में तुरंत उसकी रक्षा करते हैं तो बहुत उत्तम भक्त भक्ति है जिसमें भगवान से मांगा ना जाए पर हम लोग ऐसे मांगता है कि भक्ति थोड़ी है और मांग बहुत ज्यादा है मतलब बहुत विचित्र संसार का स्वरूप है और भगवान ने 10 बार आपकी बात पूर्ण कर दी है और 11वीं बार पूर्ण ना करें तो श्रद्धा खत्म ऐसी भक्ति है 11वीं बार अगर हमारी बात ना पूर्ण करें तो श्रद्धा खत्म हो जाए ऐसी ऐसी बहुत नाजुक भक्ति है।

भक्ति बहुत बलवान और पुष्ट होनी चाहिए। वो निष्काम भक्ति होती है। हम आपसे प्यार करते हैं। आप हमारी तरफ ना देखें। आप हमको कभी सुख ना पहुंचाए तो भी मैं आपसे प्यार करूंगा। यह बलवान भक्ति है। और यह दे दो भगवान ये दे दो भगवान यह दे दो। और जब भगवान ने देखा कि यह चीज इसके लिए ठीक नहीं है और नहीं दिया तो भगवान से अश्रद्धा हो गई। हमारी पत्नी बहुत मांगते रहती है भगवान से। वैसे हमें लगता है मांगे क्योंकि पिता है, सर्वेश्वर है, सर्वलोक महेश्वर है। पर उन पर यह छूट दे दे कि तुम्हारी इच्छा हो तो पूर्ण कर देना और तुम्हारी इच्छा ना हो तो पूर्ण मत करना।

हम मांगते रहे हमारा मांगने का स्वभाव है। लेकिन जिससे हमारा मंगल हो वही बात पूर्ण करना। तो हम भगवान को छूट भी तो दे दे। अब यह होना ही चाहिए। तो ऐसा भी नहीं भगवान सेवक थोड़ी है वो स्वामी है वो देखेंगे जैसे छोटा बच्चा मां से कहता हम चाकू से खेलेंगे तो चाकू से थोड़ी वो बहुत विरज जाए क्योंकि वो जानती है कि चाकू से खेलना चलेगा अपने मार लेगा ऐसे ही भगवान से यदि हम माया मांगे और भगवान देख रहे हैं कि इससे इसका मंगल हो जाएगा तो फिर देंगे नहीं चाहे जितना रो क्योंकि भगवान मंगल भवन है वह अपने भक्त का मंगल ही करते सर्वशक्ति उपाध्याय जी राधा वल्लभ श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव जब मेरे जीवन में प्रतिकूलता थी तब नाम जप निरंतर चल रहा था परंतु जब से जीवन में अनुकूलता आई है एवं माया के प्रभाव से समाज में प्रशंसा रूपी सम्मान मिला है कभी-कभी तब मेरा भजन नहीं बन पा रहा महाराज जी इसीलिए सम्मान को विष कहा गया है।

अपमान को अमृत कहा गया है। अनुकूलता को और प्रतिकूलता को दोनों को समान करके भजन किया जाए तो बात बन जाएगी। देखो अनुकूलता रहेगी नहीं। जब प्रतिकूलता नहीं रही थी तो अनुकूलता कैसे रह जाएगी? जैसे दिन है तो रात आएगी। रात है तो दिन आएगा। ऐसे हमको अनुकूलता में डट के भजन करना चाहिए कि प्रतिकूलता को सहने की सामर्थ्य आ जाए और प्रतिकूलता में भजन तो होता ही है भक्त का क्योंकि वो भगवान के सिवा और कोई आश्रय नहीं रहता अनुकूलता में थोड़ा मन मनोरंजन में लग जाता है तो उसी को संभाल लो अनुकूलता में संभाल लो तो बढ़िया बात अगर हमारा अनुकूलता में भजन बन रहा है डट के तो प्रतिकूल ूलता में स्वाभाविक भजन बनेगा।

कुछ लोगों का कहना होता है कि अनुकूलता में भजन होता है। प्रतिकूलता में छूट जाता है। पर सिद्धांत है यदि अनुकूलता में भजन करोगे तो प्रतिकूलता में और गाढ़ भजन होगा। क्योंकि भगवान के सिवा कोई हमारा आश्रय दाता है नहीं। तो हम और भगवान का भजन करते हैं। तो जहां सुख सामग्री आती है वहां भगवान को भूल जाते हैं। तो ऐसी असावधानी ना करें। सुख में और भजन करें। नियम पूर्वक भजन करें तो हम विपत्ति पर विजय प्राप्त कर लेंगे। जो कल आने वाली है उस पर हम विजय प्राप्त कर लेंगे।

गुरुदेव भगवान कृपा करें कि मेरा नाम जप होना चाहिए। आप खूब नाम जप में जी जतिन सैनी जी श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मैं पिछले 4 साल से एकांतिक वार्तालाप सुन रहा हूं। नाम जप से जीवन में बहुत परिवर्तन आया है। पर जब दूसरों के मन की बात सुनने को मिलती है कि उनके हृदय में गंदे विचार आ रहे हैं। मेरे मन में तो आते नहीं है महाराज जी। कहीं मैं गलत मार्ग पर तो नहीं हूं। यहां अहंकार मत करो। अहंकार अहंकार मत करो कि मेरे मन में गंदे विचार नहीं आते।

ऐसे अहंकार ना करो। अलग-अलग धरा है। मानो जैसे ये भजन कर रहे हैं। इनको चार साल हुए लेकिन आप 10 साल पूर्व जन्म में भजन कराए हैं। और इस साल में अभी सुनाव जागृत हो गया। भजन शुरू हो गया। तो आपका 10 साल पीछे का है ना? तो जुड़ गया ना तो आप आगे चलोगे तो आप आज से आगे थोड़ी चल रहे हैं। पीछे भजन हुआ है वही जागृत हुआ है। तो पीछे जो लड़ाईयां लड़ी वो आज लड़ रहा है। तो वो जब आज का अनुभव बताएगा तो आपको लगेगा कि हमारे तो आपका 10 साल का पीछे का स्टॉक है। समझ पा रहे हैं आप?

तो अहंकार ना करें। दैन्य भाव से रहे कि भगवान की बड़ी कृपा है जो हमारे अंदर कोई विकार नहीं आ रहे और नाम जप में बड़ी प्रीति हो रही शांत भाव से चले और जो जप रहा है और जिसके मन में विकार आ रहे हैं भगवान उन पर भी कृपा करेंगे आज नहीं तो कल उनका भी हृदय निर्मल हो जाएगा क्योंकि नाम जप चल रहा है तो निर्मल तो हो ही जाएगा तो ऐसे अहंकार कभी ना करें कि मेरे हृदय में कोई दोष नहीं है। ममता रानी जी राधे राधे राधेधे महाराज जी महाराज जी मनुष्य जीवन में आने वाली परिस्थितियों के समय भी जब उसे चारों तरफ अंधकार ही दिखाई दे तो नाम सुमिरन भजन आदि उस समय कैसे संभव है महाराज क्यों नहीं उस समय तो बिल्कुल ऐसे संभव है जैसे तूफान आ जाए पहाड़ का आश्रय ले ले तूफान आ जाए और पहाड़ का आश्रय ले ले तो ऐसे ही जब कोई आश्रय नहीं दिखाई दे रहा तभी तो चकाचक आश्रय भगवान का होता है तभी तो समस्त शद्र दृढ़ आश्रय होता है कि हे भगवान हे नाथ अब आपके सिवा कोई नहीं है।

हे नाथ आप संभालना हे भगवान आप संभालना वही तो शरणागति के लिए ठीक अवसर है जब कोई सहयोग ना दे तब सच्ची शरणागति होती है भगवान की कोई अब नहीं है ना चारों तरफ अंधेरा आपके सिवा कोई नहीं तो ऐसा कैसे हो सकता है कि संसार हमें साथ नहीं दे रहा और भगवान की याद हमें ना आवे ऐसा कैसे हो सकता है हम भक्त हैं कहीं ना कहीं सत्संग सुन रहे हैं कहीं ना कहीं संतों से मिल मिल रहे हैं तो हमारे हृदय में एक बात तो है कि जब कोई सहारा ना देगा तो भगवान तो है ना तो भगवान का आश्रय विपत्ति में बहुत जोर का होता है हे नाथ अब आप ही बचाओ हे प्रभु अब आप ही इज्जत रख सकते हो हे भगवान अब आप ही हमारा सहयोग कर सकते हो उस समय तो ऐसी प्रार्थना प्रतिपल होती है और एकदम तदात्म हो जाता है भगवान में जीव जब संकट आता है जब विपत्ति आती है पर वो जो भगवान का भजन कर रहा है जो भजन नहीं करेगा मारा घूमेगा उससे फोन मिलाएगा उससे बात करेगा उससे बात करेगा निराश हो जाएगा ज्यादा निराश हो जाएगा तो की सोच लेगा वो भगवान की तरफ जाने की नहीं सोचेगा जिसने

भजन नहीं किया जो भगवान से नहीं जुड़ा है उसको रास्ता नहीं पता है भगवान का नहीं तो जो थोड़ा भी भजन करता है तो जहां विपत्ति आई तो एकदम समिट गया और एकांत होकर भगवान का सुमिरन करता है और उसके विपत्ति का नाश निश्चित होगा जो विपत्ति के समय भगवान का सुमिरन करता है। हरि स्मृति सर्व विपद विमोक्षणा भगवान की स्मृति समस्त विपत्तियों का नाश कर देती है। पक्का खूब नाम जप करो और कभी भी संकट आवे तो केवल भगवान का आश्रय लो। केवल भगवान से प्रार्थना करो। केवल भगवान को पुकारो।

कर्नल रूपेंद्र पाठक जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी लाइफ में सब अच्छा चल रहा है भगवान की कृपा से मुश्किल वक्त में भी भगवान निकाल देते हैं पर एक भावना रहती है कि समय निकला जा रहा है बहुत कुछ करना बाकी है और ऐसा ना कर पाए और अंतिम समय आ गया तो क्या होगा ऐसा क्या किया जाए कि सब खुशी से समाप्त हो देखो ये लाइफ सुख पूर्वक कट रहिए। यह कोई खास बात नहीं है क्योंकि शरीर छूटेगा और आप जिस कार्य के लिए प्रधान आए हैं उस कार्य को यदि कर नहीं रहे हैं तो बड़े भाग्य से मनुष्य शरीर मिला है।

अभी शरीर छूट जाए इसके बाद हमको किस योनि में जाना पड़ेगा। कोई हमें पता नहीं है। पशु पक्षी कीड़ा मकोड़ा सूअर कुत्ता गधा क्या बनाया जाए कुछ पता नहीं है। तो हमको साधन धाम मोक्ष कर द्वारा पाई न जे परलोक समारा सो परत्र दुख पावे सिर धुन धुन पछताए मनुष्य शरीर से ऐसा साधना किया जाए कि कम से कम मुझे अगला जन्म फिर मनुष्य का तो मिले अन्य योनियों में तो न जाना पड़े कितना इतना दुख है अन्य योनियों में बहुत दुख है। अपने तो थोड़ा कहीं दर्द हो जाए, पीड़ा हो जाए तो डॉक्टर से मिल सकते हैं।

लेकिन जंगलों में पशु पक्षी हैं। घाव हो जाता है, कांटा लग जाते हैं, बीमारियां आ जाती हैं। उनको कौन देखता है? मान लो पालतू पशु की तो औषधि पालने वाला करवा दिया। लेकिन जो जंगलों में है जो बहुत सी ऐसी योनियां हैं। बहुत अच्छा हम खानपान रुपया पैसा मकान एकत्रित सब कर लिए लेकिन जब शरीर छूटेगा तो कुछ साथ नहीं जाने वाला तो जो साथ जाने वाला है उस पर हम ध्यान दें कि वह भी हमारे जीवन में होना चाहिए जैसे यह भी आवश्यक है तो वह भी अति आवश्यक है। हमारा परिवार है उसके पोषण के लिए धन चाहिए।

धन के लिए हमें राष्ट्र सेवा रूपी नौकरी मिली है। उससे हमें धन मिलता है। परिवार का पोषण होता है। और एक सम्माननीय नौकरी है। कोई साधारण नौकरी नहीं है। जो आर्मी की है। यह बहुत सम्माननीय है। जो सैनिक अपने प्राणों को बलिदान करके बॉर्डर पर हर कष्ट सह रहा है। उससे बड़ा हम दो ही को सम्मान करते हैं। अधिक संत और सैनिक जो संत तपस्या पूर्वक जीवन व्यतीत करके अपने जीवन की तपस्या समाज को देते हैं। ऐसे ही सैनिक अपने परिवार का प्रेम छोड़कर राग छोड़कर सुख सुविधा छोड़कर वो बॉर्डर पे हम चैन से सोते हैं।

वह रात में जगता है। वो गोली खाने के लिए तैयार है। इसलिए हम उसका सम्मान करते हैं। तो बहुत शानदार आपकी नौकरी हुई है। बहुत सम्माननीय नौकरी है। बस नाम जपना शुरू कर दीजिए। अगर नाम चल जाए तो परलोक संभल जाएगा नाम से और इस लोक में तो भगवान ने बना ही दिया। अब अगला हमारा जो जन्म हो एक तो होना और अगर हो तो फिर मुझे भारत में मनुष्य शरीर मिले और फिर मैं साधना करके भगवान को प्राप्त हो। अपने राष्ट्र की सेवा करूं। इसलिए नाम जप जरूर कीजिएगा। भगवान का नाम जप केवल अगर चल रहा है तो और पूजा पाठ ना भी होगा तो सब ठीक हो जाएगा।

नाम जप से सब ठीक हो जाता है। नाम जप से अंतिम समय अपने पुत्र को पुकारा अजामिल ने नारायण तो उसका कल्याण हो गया। हम जानबूझकर नारायण नारायण जपेंगे हमारा कल्याण नहीं हो जाएगा। पक्का हो जाएगा। इसलिए नाम जप कीजिए। जो आपको नाम प्रिय हो भगवान का वो नाम जप कीजिए। आयुष जी नेपाल से राधे-धे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मेरा स्वभाव थोड़ा हास्य प्रिय है। मुझे लोगों को हंसाना और उन्हें खुश देखना अच्छा लगता है। इसलिए मैं उन्हें हंसीज़ाक की बातें बताता हूं। लेकिन कई बार लोग मेरे इस स्वभाव को हल्के में ले लेते हैं।

वे मजाक में कुछ भी कह देते हैं और मैं कुछ नहीं कहता क्योंकि मुझे लगता है कि अगर जब तुम मजाक करके हंसाते हो वो मजाक कर दे तो क्या परेशानी है? तुमको भी हंस देना चाहिए। नहीं बुरा नहीं मानना चाहिए। देखो अगर हमारा विनोदी स्वभाव है तो हम किसी ना किसी का उपहास करेंगे ना तभी तो हंसी होगी। किसी न किसी वस्तु व्यक्ति स्थान उसका उपहास करेंगे। अगर कोई हमारा उपहास कर देता है तो महाराज जी मैं किसी का उपहास नहीं करता हसाने के लिए बातें में जो वो सिचुएशन के अनुसार हूं।

ये कह रहे हैं मेरी बातों को फिर वो हल्के में ले जाते हैं। उन कोई वेदांत की बात थोड़ी कि आपकी बहुत गहरी बात है। हल्की बात तो है ही हंसाना हल्की बात तो है ही ना। वेदांत की बात जो शास्त्र की बात है वो हल्की बात नहीं है। उसे गहराई से समझना चाहिए। हंसी मजाक की बातों को गहराई से थोड़ी लेना चाहिए। आप गहराई से ले रहे हो। इसलिए आपको लगता है सामने वाला हल्की बात हमारी करके हमको नीचा समझ रहा है। आप गहराई से ले रहे हो। आपको नहीं लेना चाहिए। सामने वाला यदि हमारा विनोद कर रहा है।

हमारा मजाक उड़ा रहा है तो हमको भी हंस देना चाहिए। अपने को अपनी मस्ती में रहना चाहिए। दूसरा हमें क्या कह रहा है ऐसा देखोगे तो मस्त नहीं रह पाओगे। दूसरा उसकी मति है। उसकी बुद्धि उसकी खोपड़ी है। वह अपना काम कर रही है। हमारी खोपड़ी जो काम कर रही है, हमको अपने में मस्त रहना चाहिए। ठीक है ना? नाम जप करते हो? हां बहुत सुंदर है। प्रभात राय जी वाराणसी से। राधे-राधे महाराज जी। राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी मैंने पुलिस की सेवा में आने से पूर्व श्री रामचरितमानस पर हाथ रखकर कसम ली थी कि जीवन में रिश्वत नहीं लूंगा।

अभी तक निर्वहन भी कर रहा हूं। परंतु अनेकों लोग समझाते हैं कि अगर कोई व्यक्ति खुशी से दे रहा है तो लेने में क्या जाता है? हम एक सैनिक है जो समाज के सुरक्षा के लिए हमें हमें सरकार वेतन देती है। खुशी से कोई हमको दे दे तो कोई हम तीर्थ पुरोहित थोड़ी कि कोई खुशी से दे दिया। हम एक सैनिक हैं। खुशी से वही देगा जो दोषों को छुपाना चाहता है। और निर्दोष को फंसाना चाहता है। वही खुशी से देगा। निर्दोष कभी आपको पैसा नहीं देगा। देगा तो दोषी ही देगा। क्यों? आप विचार करके देखो।

जब हम निर्दोष हैं तो हम आपको पैसा क्यों देंगे? लेकिन जो दोषी होगा ना वो आपको वो आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर देगा और वो आपके परिवार में बड़ा कुप प्रभाव लाएगा। कभी नहीं। जैसे आप बोले ना ऐसे एक ऑफिसर थे पुलिस ऑफिसर तो उन्होंने कहा कि मैंने जब से आपका सत्संग सुना तब से मैं कसम ले लिया हूं कि कभी घस नहीं लूंगा और मेरे अधिकारी मेरे ऊपर जोर डालते हैं तो हम कहा ये वीडियो पड़ जाएगा आपका जैसा बोले मुझे इसकी कोई परवाह नहीं कहा सस्पेंड कर दे जाओ बोले तीन बार हो चुका हूं सस्पेंड बोले मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है अब मैं कसम खाता हूं कि आजीवन कभी घस नहीं लूंगा तो ऐसे हमारे वंदनीय राज कर्मचारी होते हैं जो ऐसा नियम लेते हैं।

जैसे आपने कहा रामचरितमानस पर हाथ रखकर बहुत धन्य है। जीवन धन्य है। आप अपना जो कर्तव्य कर्म कर रहे हैं ना यही पूजा है। पर ऐसे लोगों को प्यार बहुत कम मिलता है। क्योंकि संसार में आप जैसे लोग बहुत कम पाए जाते हैं। आप लोगों को उपहास ज्यादा मिल सकता है। नीचापन दिखाया जा सकता है। आजकल जैसा हवा चल रही हो वैसे बहो तब तो लोग सम्मान करेंगे लेकिन ऐसी स्थिति में लेकिन ऐसी स्थिति में भगवान सम्मान करेगा और जिसको भगवान प्यार देता है वही वास्तविक प्यार है ये छल कपट लोग कपटी लोग प्यार करें तो उससे क्या फायदा भगवान प्यार करें यही एक सबसे बड़ी बात है तो आप अच्छे से चलिएगा कोई खुशी से देवी तो नहीं लेना छोटे अधिकारी जो होते हैं उनको बड़े अधिकारियों से बहुत दबना पड़ता और बड़े अधिकारी जैसा आदेश करते हैं और ना चाहते हुए उनको पालन करना पड़ता है।

लेकिन वह बहादुर होते हैं जो स्वयं कभी घस नहीं लेते। स्वयं कभी अधर्म का पैसा नहीं लेते। धन्यवाद है। ऐसे बहुत से ही होंगे। हम उनको धन्यवाद देते हैं जो धर्म से चलते हैं। कभी घस नहीं लेते। कभी निर्दोष को दंड नहीं देते और दोषी को बखशते नहीं। यह बहुत अधिकार अपने अधिकार के अनुसार चले तो बहुत समाज की सेवा हो सकती है। बहुत दोनों के फल में क्या अंतर होगा? एक नहीं ले रहा खुशी से दे रहा है और एक ले रहा है। इसका और इसका क्या होगा? हां जो ले रहा है अब हम कैसे तुम्हें बताएं?

चलो के परिवार के पूरे सदस्यों के फोटो लीजिए और उनके परिवार की जानकारी कीजिए कैसे चल रहे हैं और जो नहीं ले रहे हैं आप उनके परिवार की जानकारी कीजिए। परिवार के लिए ही तो अर्थ लिया जाता है। हम प्राय देखा है बड़े-बड़े अधिकार के पदों में अगर आपने घस अधिक ली है तो आपको अंत में रोना पड़ेगा और अंत में आपको विनाश अपनी आंखों से देखना पड़ेगा। अपनी आंखों से सब कुछ नष्ट होते हुए आपको दिखाई देगा। इसलिए बहुत होश में रहना चाहिए। घस बेईमानी अधर्म का पैसा परिवार को बहुत हानि पहुंचाता है और अपने तो जलेंगे ही क्योंकि अपना कर्म है इसलिए बहुत धन्यवाद है आप नमक रोटी खाओ भले साइकिल से चलो लेकिन जो हमारी सरकार फीस देती है पेमेंट देती है उसी से अपना गुजारा करो अन्य पैसे लेने की कोशिश मत करो तो आजीवन तुम बादशाह रहोगे अपने मन के बादशाह रहोगे तुम्हें कभी अपना मन तुम्हें ग्लानी में नहीं लाएगा तुम्हें में रहेगा।

ठीक है। हम अपने बच्चों की कामनाएं पूर्ण नहीं कर सकते। हम अपने परिवार को वीआईपी नहीं दे सकते भोग सामग्री। लेकिन मैं धर्म से चला हूं। तो यह आपको एक अंदर पुष्टता प्रदान करेंगे और भगवान आपके सहयोग में रहेंगे और जिसके सहयोग में भगवान रहते हैं उसका मंगल ही होता है। महाराज जी इनका भी सेम सिमिलर प्रश्न है। ये कह रहे हैं कि अनैतिकता से अर्जित धन प्राप्त करता हूं। पता होते हुए भी कहीं ना कहीं गलत कर रहा हूं। लेकिन मन संकेत देता है कि सब कर रहे हैं वह तो सही सही चल रहा है।

नहीं नहीं ऐसा ऐसा नहीं है। सब कर रहे हैं तो सब भोग भी तो रहे हैं। तो मुझे लगता है थोड़ा अपनी आवश्यकताओं को कम करके यदि हम धर्म पूर्वक चले तो ज्यादा अच्छा रहेगा। हम बेईमानी का धन ना लें। हम अनैतिकता का धन ना ले तो अच्छा है और जो आ चुका हो उसको गौशाला है बीमारों की जहां फ्री दवाएं दी जाती हैं ऐसी जगह में उसको दे देना चाहिए अपने को धर्म पूर्वक कमाना चाहिए धर्म पूर्वक खाना चाहिए जिससे आपके बच्चों का भविष्य बड़ा उज्जवल हो आपका परिवार सुख पूर्वक जी सके आज आपका माहौल बहुत बढ़िया हो सकता है कल जब इसका परिणाम आएगा वह ठीक नहीं रहेगा।

इसलिए हमें सबसे प्रार्थना है कि आप अपने धर्म की कमाई पर नजर रखिए। अधर्म से बचने की कोशिश कीजिए। पहले पता नहीं था लेकिन एक साल से आपका सत्संग सुन रहा हूं। फिर पता चला तब तक देरी हो चुकी थी। यह पता चला कि जो घटनाएं मेरे साथ घट रही है ना वो कहीं ना कहीं ये अनैतिकता से आए हुए पैसे से कहीं ना कहीं हो रही है। जी लेकिन आप एक बार भी बोल दो नहीं लूंगा अभी कभी नहीं लूंगा। हां हम तो बार-बार प्रार्थना करते हैं कि आप बस अब निशानी अब नाशय अनैतिक धन को बिल्कुल विष समझो।

जैसे विष है ना वो वो मार ही देता है मार ही देता है विष है उसका स्वभाव प्रभाव मार ये तो 100% आप समझ लो अधर्म की कमाई विष है वो मार ही देगी पक्का मार देगी एक रास्ते में कुछ असशफियां की थैली पड़ी हुई थी तो एक संत जा रहे थे तो वो रज से ढकी हुई थी ऐसे तो उनका पैर लगा तो उन्होंने देखा कि ये तो अशरफी है तो शिष्य ना देख ले इसलिए ऐसे फिर से ढका तो उन्होंने कहा गुरु जी यह तो कुछ है दौड़ के उसने खोला दो अशरफी कहा इससे जख्म दे ये जहर है मत उठा ऐसे तो उन्होंने कहा गुरु जी जहर है इसमें क्या बोले मार डालेगी ये ये माया अपवित्र है तो गुरु जी हमें इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा मार कैसे डालेगी तो उन्होंने कहा इसको यहीं रखी रहने दो चलो उधर झाड़ी में चुपचाप बैठो चल के हम तुमको दिखाते हैं कि माया कैसे मार डालेगी अपवित्र माया है जहां जाएगी उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर देगी अपवित्र माया का अधर्म का स्वरूप यही होता है तो चार राज सैनिक घोड़ों पर चढ़े हुए उस समय वहां से निकले तो एक की दृष्टि पड़ी अरे बोले यार

इसमें तो सैकड़ों सर्फियां है बोले यार ये तो आज हमारे भाग्य खुल गए चारों पेड़ के नीचे बैठ गए कहा चार हिस्से लगा लिए जाए। बोले चार हिस्से बाद में लगाएंगे। पहले इससे चार अशरफे निकालो। जाते हैं बढ़िया भोजन बनवा के लाते हैं और अपने चारों लोग पाते हैं और फिर इसके चार हिस्से कर लिए जाएंगे। तो नजदीक में ही बाजार थी। चार अशरफी लेकर बाजार में गए। उन दोनों ने विचार किया जो बाजार गए कि यार उसके चार हिस्से क्यों हो? दो हो हम और तुम बोले तो बोले भोजन में विष मिला दो और फिर ले चलते हैं दोनों मर जाएंगे दो हिस्से हो जाएंगे ठीक है वो स्वयं तो अच्छा भोजन पाए और दो के लिए जहर युक्त भोजन बनवा के लाए उधर दोनों ने विचार किया ए इसके चार हिस्से होंगे बोले तो बोले आते ही गोली मार दो दो को और इसके दो हिस्से कर लेते बोले ठीक है।

जो ये दोनों भोजन लेकर के आए सो दोनों को सूट कर दिया। उन्होंने कहा यार मार तो दिया ही भोजन पा लेते हैं आराम से। फिर हिस्सा करके चलते हैं। भोजन निकाला दो पाए दोनों मर गए। बाबा जी ने अपने शिष्य से कहा देखा मार डाला ना। भाग यहां से इसको मत उठाना। जो अधर्म का पैसा है वो बुद्धि दूषित ही कर देता है। अगर बुद्धि दूषित ना करते चारों लोग बढ़िया भोजन पाते। चार हिस्सों में बांट लेते लेकिन अधर्म का पैसा तो बुद्धि को दूषित कर दिया चारों मर गए किसी के हाथ में नहीं थैली वही पड़ी रही ये अधर्म का पैसा कभी सुख प्रदान नहीं करता पत्नी पुत्र परिवार में कहीं ना कहीं अशांति कहीं ना कहीं विक्षेप कहीं ना कहीं विच्छेद प्रेम विच्छेद ये सब करता है इसलिए हमें लगता है नमक रोटी खाए और बिना टेबलेट के सोना सीखे चैन से सो जाए और अधर्म का पैसा लाए और मानसिकता विक्षिप्त रहे सो ठीक नहीं आप सभी को अमन जी दिल्ली से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी नाम जप केवल भगवत प्राप्ति के लालच से किया जाए तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

भगवत प्राप्ति की इच्छा बहुत जन्मों की पवित्रता के बाद होती है। या तो किसी महापुरुष का सानिध्य मिल जाए तो इसी जन्म में भगवत प्राप्ति की इच्छा प्रबल हो जाए। भगवत प्राप्ति की इच्छा नहीं होती। भोग और ऐश्वर्य प्राप्ति की इच्छा होती है। मान सम्मान की इच्छा होती है। भगवत प्राप्ति की इच्छा तो किसी बिरले के हृदय में होती है। बहु नाम जन्म ना मनते बहुत जन्मों के बाद कहे उसको यह मुमुक्षता प्राप्त होती है कि मैं मुक्त हो जाऊं मैं संसार से मुक्त हो जाऊं मैं भगवान को प्राप्त हो जाऊं ये अनेक जन्म संसिद्धि अनेक जन्मों से जिसकी साधना होती रहे नहीं तो भोगेश्वर प्रसत्ता नाम तया परत चेतशा व्यवसायत्मिका बुद्धि समाधो न विधते जो भोग और ऐश्वर्य नेित का अपरण कर लिया है वो वह कभी संकल्प ही नहीं कर सकते कि मुझे भगवत प्राप्ति हो।

उनकी बुद्धि में आता ही नहीं कि मैं भगवत प्राप्ति करूं। मरना है तो सबको एक दिन लेकिन मौत से जी लेते हैं। उनकी बुद्धि ऐसी रहती है और जो पवित्र बुद्धिमान होते हैं कि एक दिन मरना है। मरने के बाद पता नहीं किस योनि में जाना पड़े। मुझे इसी योनि में अपने उद्धार का उपाय कर लेना चाहिए। क्योंकि अन्य योनियों में साधना नहीं हो सकती। केवल मनुष्य योनि में होती है और भगवन नाम से निश्चित परम पद की प्राप्ति हो जाएगी। निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी। यदि हम कुम मनो योग से नाम जप करें।

एकमात्र नाम का आश्रय ले लो सब पार हो जाएगा। कलयुग केवल नाम आधारा सुमिर सुमिर भव उतर पारा केवल नाम आधार है। कृतयुगे धते विष्णु त्रेताया यजत मख द्वापर परिचर्यायाम कल धर कीर्तन कलयुग में सिद्ध बात है कि भगवान के नाम कीर्तन और नाम जप से भगवत प्राप्ति हो जाती है। खूब नाम जप कर अरिजीत जी हिमाचल से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी राधा नाम जब हम जोर-जोर से बोलते हैं राधा राम जब हम होठ बंद करके जीभ से बोलते हैं और राधा नाम हम जब मन से बोलते हैं कौन सा सर्वश्रेष्ठ है?

देखो पहले साधक को सर्वश्रेष्ठ के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। हम राधा नाम ले रहे हैं। यही हमारे सौभाग्य की बात है। चाहे हम जोर से बोल के ले रहे हो, चाहे हम उपांशु ले रहे हो, चाहे मानसिक ले रहे हो। यह तो पहला उत्तर। दूसरी बात यह है कि जब हम मन से जपते हैं तो हमें आनंद की धीरे-धीरे अनुभूति होने लगती है। जैसे हम राधा राधा राधा राधा राधा तो मन कहीं भाग रहा है। वाणी से नाम उच्चारण कर रहे हैं या उपांश में जप रहे हैं। मानसिक जब जब वास्तविक मानसिक होने लगता है तो सामने राधा नाम लिखा है और उसी राधा नाम में तो उसको एक आनंद मिलता है।

जब आनंद मिलने लगेगा तो फिर वो डूबने लगेगा और जब डूबने लगेगा तो स्थिति आने लगेगी। तो मानसिक जब तो सर्वश्रेष्ठ है ही। उसको कहना ही क्या है? पर अपने को अभी इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। अपने को अभी यह देखना है कि नाम चल रहा है कि नहीं। कभी मानसिक चल रहा है, कभी उपांश चल रहा है, कभी वाचिक चल रहा है। क्योंकि हमारी एक जैसी स्थिति नहीं रह सकती। हमारी स्थिति अभी नवीन साधक हैं। माया मलिन स्वभाव है तो कहो पांच मिनट मन लगे और फिर हट जाए। जब हट गया तब हम जबान से शुरू किया राधा राधा राधा राधा राधा तो हमें नाम में रहना है हठ पूर्वक हमको नाम जप करना है ये बात पकड़नी है हमें ये नहीं देखना है चाहे मन से जपना पड़े उपांश जपना पड़े वाचिक जपना पड़े चाहे जैसे हो हमें नाम में लगे रहना है पहला अगर ऐसा स्वभाव बना लोगे तो आगे फिर मानसिक तो स्वाभाविक चलने ही लगेगा प्रतिमा जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी चाहे कितनी भी प्रतिकूल परिस्थित स्थितियां हो कितनी बड़ी समस्या हो उसे कैसे अनुकूल बनाएं ताकि हम उस परिस्थिति से बाहर निकल पाए।

भजन जब तक भजन नहीं करोगे तो बातों से विपत्तियों पर विजय प्राप्त नहीं किया जा सकता। उसके लिए अध्यात्म बल चाहिए। धैर्य चाहिए। जब चित्त भगवान से जुड़ा होता है तो हम सब कुछ सह सकते हैं। और जब चित्त संसार से जुड़ा होता है तो हम सह नहीं पाते। हम व्यथित हो जाते हैं। हम व्याकुल हो जाते हैं। बड़े से बड़े दुख को सहने की सामर्थ भगवान के भजन से मिलती है। देखो गुरु अर्जुन देव जी ने भजन का प्रताप दिखाया। उनको तपते हुए तवे पर बैठाला गया। ऊपर से तप्त बालू डाली गई।

फफोले पड़ रहे हैं। पूरा शरीर जल रहा है। और वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु वो कह रहे तेरा किया मीठा लागे तेरा किया जल रहे हैं कष्ट सह रहे हैं और जय हो आपकी जय हो। वाह गुरु वाह कहीं शिकायत नहीं भगवान से कोई रोष नहीं ना मारने वालों का जो उनको कष्ट दे रहे उनके प्रति भी रोष नहीं भारी से भारी दुख में भगवान की कृपा का अनुभव होना तेरा किया मीठा लागे आपका किया अच्छा है वाहगुरु का विधान मीठा ठाकुर हरिदास जी यवन कुल में प्रकट हुए थे और हरे कृष्ण हरे कृष्ण ये नाम महामंत्र जपते थे।

इसी से वहां का काजी नाराज हो गया और बादशाह से शिकायत की उनको बंदी बना के ले जाया गया। प्रश्न उत्तर हुए तो उनका मैं भगवान के नाम को नहीं छोड़ सकता। आप दंड दे दीजिए। तो दंड हुआ 22 बाजारों में बेत मार मार के मार डालना। 22 बाजारों में बेत माल मार जहां बेत लगता तो कोड़े पर कोड़े बेत पे बेत तो हरि बोल हरि बोल हरि बोल उस महापुरुष के मुंह में शिकन नहीं आई वही हरि बोल हरि बोल फिर मरा हुआ मानकर गंगा जी में डाल दिया तो गंगा जी के पावन जल से उनको चेतना आई और धीरेधीरे वो कुलिया नामक ग्राम में जाकर उनका शरीर लगा तो वहां के लोगों ने देखा यह तो जिंदा है।

मतलब कितना बड़ा से बड़ा कष्ट अब समझो इस कोटि का कष्ट और हरि बोल हरि बोल तो भक्तों के जीवन में देखा गया भारीभारी विपत्तियां भारीभारी कष्ट अब देखो चीदर चिदरानी जी नाम के एक महान भक्त थे। पीपाजी राजा थे। उन्होंने वैराग्य धारण कर लिया था। उनकी पत्नी थी रानी सीता सहचरी। बड़े सिद्ध महापुरुष हुए। द्वारिकाधीश के साक्षात दर्शन किए। जब द्वारिकाधीश के दर्शन करके तो उनके मन में भगवान के महान भक्त प्रशंसा सुनी थी चीदर चिदरानी जी की तो उनके दर्शन के लिए गए। वह ऐसे महान भक्त थे कि संत कभी दरवाजे से वापस नहीं लौट सकते।

कुछ ना कुछ खवा और धीरे धीरे धीरे धीरे इतनी गरीबी कि दरवाजे और खिड़की भी बिक गई थी संत सेवा में। मतलब घर में कुछ नहीं था जिससे बेचा जा सके। और इतने बड़े संत पीपा जी और सीता सहचरी पहुंची। चदर जी घर गए चिदरानी जी से कहा कि बाजार में कोई हमको उधार देता नहीं हमारे पास कुछ वस्तु है नहीं और आज बहुत बड़े संत आए हैं कि आज भूखे चले जाएंगे और आज तक ऐसा नहीं हुआ कि संत दरवाजे से भूखे जाए क्या किया जाए उनकी पत्नी ने कहा श्रीधर जी की कि हमारे अरे शरीर का जो वस्त्र है एक एक वस्त्र धारण किए थे साड़ी अच्छा है ये इसको बेच लो एक रुपए का तो बिक ही जाएगा तो कुछ दाल चावल मिल जाएंगे उसी को बांध करके संत को पवा देंगे ऐसा ही किया शरीर का वस्त्र भी

पत्नी ने तो रेशम का था पहले जमाने में तो एक बिका ऐसे बिका तो कुछ दाल चावल मिला बनाया बना के चीज जी बाहर ले गए बैठे थे पीपा जी सीता सहचरी तो सीता सहचरी जी इनका भक्ता है इनको भी बुलाओ यहां पा लें तो उनको वही ठीक है आप पा लो तो वो रानी थी बहुत प्रवीण थी तो उनका ऐसा क्यों भक्त है इनको तो लाना चाहिए और स्वयं गए तो वो वो उनकी जो दशा थी आंसू चल रहे थे भगवान का नाम चल रहा था वो कह रहे थे भगवान आप कितने कृपालु हो देखो ऐसी परिस्थिति में कृपा का अनुभव कर रहे कितने कृपालु हो कि आज संत को भूखा नहीं जाने दिया आपने व्यवस्था कर दी समझो वो भगवान की कृपा सीता सहचरी जी गई उन्होंने कहा भक्त जी भगवान के प्रेम में डूब रहे तो कहा आप रसोई में निर्वस्त्र बैठे हैं।

तो उनका हमने सोचा था कि जब आप मिलोगे तो श्री कृष्ण की चर्चा करोगे क्योंकि द्वारिकाधीश का साक्षात दर्शन करके आ रहे हो। क्या स्मरण धर्मा शरीर की बात कर दी। सीता सहचरी जी पीपा जी के पास गए। बोले इनके यहां एक दाना अन्न खाने के लिए नहीं वस्त्र बेचकर हम लोगों को भोजन पढ़ाया है। देखो एक है कि कोड़ों की मार बेतों की मार सहकर भी हरि नाम बोल रहे हैं। एक है कि एक तरह से उनके शरीर को भयानक पीड़ा देकर के तो भी वह भगवन नाम बोल रहे हैं। एक है कि खाने को नहीं है।

संत आ जाते हैं तो भी वह अपने शरीर के वस्त्र बेचकर इतनी भयानक विपरीत परिस्थितियों में भी जो आनंदित हैं भगवन नाम जप कर रहे हैं वो केवल भगवान से ही है। अगर हम भगवान का भजन नहीं करेंगे तो विपत्तियां दुख नाना प्रकार की विपरीत भावनाएं ये हमें नष्ट कर देंगे। भगवान ही हमें बचा सकते हैं। भगवान ही हमें ताकत देते हैं। हर दुख सहने की ताकत देते हैं। तो हमें लगता है हमें भगवान का भजन करना चाहिए। नाम जप करना चाहिए। इसमें भी राजी है बहुत शरीर इस समय क्रश हो गया है।

आप ही नहीं रहे क्या एकदम शरीर अब मुंडा आ गए बुला रहे हैं। अभी पहले हम जाएंगे वहां जाकर व्यवस्था करेंगे। श्री जी श्री जी के सखियों से मिलकर व्यवस्था करेंगे। तब फिर आप आना स्वयं श्री जी का बरसाने की लाडली है। एक बार और इच्छा थी। एक इच्छा थी। जी बस क्या इच्छा है? एक बार देख ले आप। अच्छा वात्सल्य है आपका। आपकी कृपा है कि आप दर्शन देने आए हैं। हमारे पूज्य बाबा और पूज्य बाबू जी दोनों की कृपा पात्र आप हैं। दोनों पर हां ये लाडली जी का बरसाना के लाडली जी का लहंगा है।

शादी में रखिए। श्री पूछ बाबूजी की अच्छा उनके चरण लगाना चाह रहा है। मेरे पास कुछ नहीं है। इससे बड़ी कोई वस्तु हो सकती है क्या? इससे बड़ी कोई वस्तु हो सकती बहुत कृपा के आप दर्शन दे आ के मैं तरसती हूं लेकिन अब मैं आ नहीं सकती बहुत कृत शरीर हो गए बहुत कृत शरीर हो गए आप तो पास ही रहते पास रहते दूर थोड़ी नहीं जहां बाबूजी है बाबा है उनके उनहीं का प्यार अब हमें मिल रहा है उनहीं का बड़ा प्यार बड़ा दुलार मिला अद्भुत अद्भुत प्रकृति से अतीत मेरी कृपा से आपके दर्शन जी बस अंत में उनको देखती देखती यही आपसे कामना करती आपको देखने से ऐसा लगता है कि भाई जी और पूज्य राधा बाबा की कृपा ही मूर्तिमान आपके रूप में विराजमान है।

इस समय इस धरा धाम में पूज्य बाबू जी और बाबा की कृपा का आप साक्षात स्वरूप हैं। जो भागवतिक स्थिति महापुरुषों में देखी जाती है, वह आप में विद्यमान है। इस समय वर्तमान में विद्यमान है। जीवन में ऐसे महापुरुषों का जो आश्रय और दुलार मिला ना उसी से भागवती की स्थिति ऐसी जागृत होती है। महाराज जी 17 18 साल की आयु से लेकर जी जी उन्होंने जी 71 तक तो पूज्य बाबू जी जी विराज और 92 तक पूज्य बाबा विराजमान अपने आसपास से रखते धन्यवाद 24 घंटे 24 घंटे खुला दरबार हंसते खेलते उनकी गोद के बच्चों की तरह जी सब साधकों को श्री जी का प्रसादी वस्त्र दीजिए।

एक चुनरी अरे जी आप निकुंजरा जी हैं। भाई जी का एक पद सुनाना चाहते हैं। सुना राधे जो मुंह पे आज डरो हां मुंह पे आज ढरो राधे जो मुंह पे आज ढरो निज निज प्रियतम की पद रज रति निज निज प्रियतम की पद रज रति मोह प्रदान करो राधे जो मोह पे आज डरो भक्ति मुक्ति की सकल कामना भक्ति मुक्ति की सकल कामना सतवर नाश करो राधे जो मोह पे आज धरो निज चाकर चाकर चाकर के निज चाकर चाकर चाकर की सेवा प्रदान करो मोह पे आज डरो श्यामा प्यारे मोह पे आज डरो राखो सदा निभत निकुंज में राखो सदा निभत निकुंज में झाड़ूदार बरो राधे जो मोह पे आज ढरो श्यामा प्यारी मोह पे आज ढरो बहुत कृपा करी।

बहुत कृपा करी। अब हम इस कृपा के ऋणी हैं। आप क्यों क्या कहूं कौन हूं आपकी सेवा में रहते हैं बहुत संभालते हैं जी की विशेष कृपा पात्र हैं जो आपकी सेवा में साल से बहुत-बहुत सौभाग्य है जो अभी सेवा का फल लूट लो बस जितने दिन सानिध्य का है बहुत आपको छूने भाई बड़ी मुश्किल में अनंत नदियों का जहां संगम होता है। सोमनाथ का जल मां गंगाजल है। अच्छा मां नर्मदा जी का जल है। माता सीता जहां पे त्रिभुज रूप में तीन खंड में भूमि वितरी है। वहां का उनके चरण सदा सुहागन के चरण का राज्य है।

बहुत श्री कृष्ण जी की बहन जो थी अष्टभुजा स्वरूप लेकर वहां गई थी। जी तो ये माता वासनी का यह प्रसाद है। आदि शक्ति माता सती इस हवन कुंड में 96 हजार बीघा जमीन तो वहां हवन कुंड था दक्ष प्रजापति का वो उन्होंने अपने योग अग्नि से अपने आप को स्वाहा किया था। ये उसके भस्म है। अच्छा जी तो ये लोगों द्वारा जिस स्थान पर हनुमान जी को बांधा गया था वो वो स्थान और ये उसी वृक्ष का पत्र है। बहुत और यह वाल्मीकि जी ने जहां बैठकर रामायण लिखी है उस वट वृक्ष के नीचे की मिर्ची और यह उसका ये पीछे पत्र है।

बहुत भगवन नाम स्मरण करते रहिएगा। मनुष्य जीवन की सार्थकता सेवा और सुमिरन से है। तो बहुत बड़ी सेवा भगवान ने आपको दी। राष्ट्र की सेवा सुमिरन करते रहिए। सेवा और सुमिरन यह निश्चित भगवत प्राप्ति करा देते हैं। और मनुष्य जीवन में यदि भगवत प्राप्ति ना हुई तो साधन धाम मोक्ष कर द्वारा यह मनुष्य शरीर है। तो लौकिक कर्मों से माया पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। अध्यात्म के द्वारा ही माया पर विजय प्राप्ति की जा सकती है। तो माया में यह पद मिला है और माया के द्वारा ही सेवा है।

पर मायापति का अगर स्मरण बनता रहा तो दोनों काम बन जाएंगे। इसलिए स्मरण करते रहिएगा। राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा मेरे बंगाल में एक कहावत है संत लोग कहते हैं गंगा पर जो पश्चात पावन दर्शन पवित्र करो में कि गंगा को हम पर्स करते हैं तो हम पवित्र होते हैं और संत के दर्शन से हम पवित्र आपके दर्शन से हम पवित्र होते कृपा जो आपने दर्शन दिए आकर राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा इतना तो कबहु

हसी हो इतना तो कबहु हस दे सुनहु कृपालु किशोरी राधे सुनहु कृपा किशोरी राधे राधे राधे राधे राधे सुनहु कृपा गोपाल किशोरी राधे अवसी कृपा की कोल चित हो कितनों को तुम ही मिलो मिलो ना कृपा मोह को ढूंढत तो भटक्या राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की जय संत हरि भक्तन की जय वृंदावन धाम की जय बोलिए भगवान की जय जय श्री राधे श्याम जय जय श्री राधे श्याम जय जय श्री राधे श्याम जय जय श्री वंश

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

संबंधित