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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1096 · 17 नवंबर 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की जय समस्त संत हरि भक्तन की वृंदावन धाम की सगुरुदेव भगवान की जय हो कल चर्चा हुई थी कि नाम जप करते हुए भी यदि द नाम अपराध बन जाएंगे तो नाम का फल गुप्त हो जाएगा। वो प्रकाशित नहीं होगा। नाम अविनाशी होता है।

नाश तो नहीं होता पर गुप्त हो जाएगा। और अपराध के कारण भजन में प्रवृत्ति नहीं बनेगी। कल के एकांतिक में प्रथम बिना प्रश्न के अपनी तरफ से चर्चा हुई थी। आज चर्चा हो रही है। यदि आप भगवत सेवा करते हैं, भागवत धर्म को धारण करते हैं, भजन करते हैं तो 32 सेवा अपराधों से बचिए। बहुत सूक्ष्म सूक्ष्म है। इनसे क्या होता है? मन में उत्साह भंग हो जाता है। भजन का अरुचि हो जाती है। अविश्वास हो जाता है। फिर साधक डगमगा जाता है। काम क्रोध आदि के आवेश में आकर गलत आचरणों में उतर जाता है।

यदि हम 10 नामा अपराध और 32 सेवा अपराध से बचकर श्री भगवान के शरणागत होकर भजन करें तो हमें एक नवीन उत्साह होता है भजन का। आज इतना कि आज और करें और वह नवीन उत्साह हमारे समस्त भोगों के उत्साह का नाश करके जो भोग भोगने की हमारी उत्साह प्रवृत्ति रहती है उसका नाश करके उसे उदासीन बनाकर भगवान का प्रेमी बना देते हैं। तो अब सुनते हैं 32 सेवा अपराध से जिनको हमें सुनकर के अपने आचरण में धारण करके इन सेवा अपराधों से बचना है। पहला भगवान के मंदिर में जब हम दर्शन करने जाएं तो यदि हम किसी भी सवारी से हैं तो 100 कदम पहले उतर जाए।

यह नहीं कि सीढ़ी तक हम कार में यदि अस्वस्थ हैं, आपके पैर खराब हैं तब तो कोई बात नहीं है। यदि आपके पैर ठीक हैं तो 100 कदम कम से कम मंदिर से दूर उतर जाए गाड़ी से और वहीं से नमन करें और पादुका उतार दें अपनी नंगे पैर वहां जाएं। अगर आप मंदिर में चढ़ते हैं पादुका पहन के और कहीं प्रभु के आंगन तक पहुंच जाते हैं तो पहला अपराध सेवा का बन जाएगा। सवारी पर चढ़कर पैरों में पादुका पहनकर भगवत दर्शन के लिए जाना यह सेवा अपराध है। भक्ति एक विशुद्ध समर्पण का भाव है।

भरत जी महाराज जब चित्रकूट में पहुंचे तो अत्यंत सुकुमार श्री चरण भरत जी के पैदल चल रहे थे तो छाले पड़ गए थे चरणों में यह देखकर के वशिष्ठ जी ने कहा भरत ये बड़े बड़े राजवाहन चल रहे हैं आप घुड़सवारी कर लीजिए। आप रथ में बैठ लीजिए। आपके चरणों की हालत क्या या पादुका पहन लीजिए? तो भरत जी ने जो उत्तर दिया सिर भर जाऊं उचित अस मोरा सबसे सेवक धर्म कठोरा प्रभु जहां मेरे प्राण प्यारे भगवान श्री राम सियाजू के चरण चिन्ह है वहां मैं पादुका पहन कर जाऊं सवारी पर बैठ के जाऊं उचित तो ऐसा है प्रभु कि जहां मेरे सियाराम के चरण है वहां मैं सिर के बल जाऊं सिर भर जाऊं उचित मोरा मैं अपने स्वामी के दर्शन करने जा रहा हूं चल नहीं पा रहा हूं लेकिन मुझे मुझे सिर के बल जाना चाहिए।

चरणों से नहीं क्योंकि चरण चिन्ह मेरे स्वामी के बने हुए हैं। भक्ति एक विशिष्ट भाव है जो भगवान को भी अधीन कर लेती है। इसीलिए भक्त उपासक वैष्णव भजनानंदी को चाहिए कि अपने प्रभु के श्री विग्रह के दर्शन करने के लिए जब हम मंदिर में जाएं तो कम से कम 100 कदम पहले उतर जाए और नंगे पैर जाए। अगर आप सवारी में चढ़कर जाते हैं, जूता पहनकर मंदिर के ऊपर चढ़ते हैं, तो पहला सेवा अपराध आपका बन जाएगा। दूसरा भगवान के उत्सवों को मनाएं। हमारे सनातन धर्म में उत्सवों का बड़ा महत्व है।

उससे कृपा की प्राप्ति होती है। जैसे रथ यात्रा है, जन्माष्टमी है, राधाष्टमी है, राम नवमी है। ये जो हमारे उत्सव हैं आराध्य देवों के इसमें यह नहीं देखना चाहिए कि मैं कृष्ण उपासक हूं तो राम नवमी क्यों मनाऊं? मैं राम उपासक हूं तो जन्माष्टमी क्यों मनाऊं? ऐसा भेद नहीं है। हम आनंदित होकर के जब कभी भगवान शिव के उत्साह पूर्ण उत्सव आते हैं। महाशिवरात्रि आदि माता भगवती अंबाजी के नवदुर्ग आदि तो हम उत्सव मनाएं। सनातन धर्मावलंबी इन उत्सवों की अवहेलना ना करें। उत्सव ना मनाना एक अपराध है।

हम चार लोग मिलकर के रात भर नाम कीर्तन करें। तो हमारी कृष्ण जन्माष्टमी हो गई। भगवत कथा सुने रात में रामनवमी के दिन खूब उत्साह पूर्वक भगवान श्री राम के पावन चरित्रों का गायन श्री राम जय राम जय जय राम कीर्तन करें। शिवरात्रि नवदुर्गा आदि ये जो हमारे सनातन धर्म के उत्सव हैं इनको करना चाहिए। ना करना या उत्सवों में शामिल ना होना आपके सामर्थ्य नहीं है कि आप कर सके। तो जहां उत्सव हो रहा है वहां घंटा दो घंटा के लिए शामिल हो जाइए। यदि शामिल नहीं होते तो एक अपराध है।

इस सेवा अपराध का दूसरा अपराध है। तीसरा भगवान के श्री विग्रह के सामने जाकर प्रणाम ना करना। भगवान के सामने गए आप ऐसे खड़े हैं। भगवान साक्षात विराजमान है। अर्चा अवतार भगवान के जैसे और अवतार हैं। ऐसे भगवान जो विग्रह में विराजमान है यह अर्चावतार हैं। तो भगवान के सामने जाकर के सबसे पहला काम होना चाहिए साष्टांग प्रणाम करें। पंचांग प्रणाम करें। साक्षात भगवान विराजमान है। आप बिल्कुल संशय मत कीजिए कि ये तो मूर्ति है। जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूर्ति देखी तिन तैसी।

अगर आप भावना करेंगे मूर्ति है तो मूर्ति है नहीं तो साक्षात बिहारी जी विराजमान है किसी मूर्तिकार की रचना नहीं साक्षात राधा वल्लभ लाल साक्षात राधा रमण जी ये हम पर कृपा करके विराजमान है हमारी सामर्थ्य नहीं कि हम इनको देख सके तो ये अर्चा विग्रह के रूप में विराजमान है। एक बार भगवान श्री कृष्ण को साष्टांग प्रणाम करने वाले को 10 अश्वमेद यज्ञ के अवत स्नान का फल प्राप्त होता है। एकोप कृष्ण कृत प्रणामो दशास्व मेधा अवन तुल्य दशासमेध जो द अश्वमेध करने वाला है वो पुनरेप जन्म बड़ी बात है लेकिन कृष्ण प्रणाम न पुनर्भव जो एक बार श्री कृष्ण को साष्टांग लेट कर प्रणाम करता है द अश्वमेध यज्ञ के अवत स्नान का फल मिलता है।

लेकिन 10 अश्वमेध यज्ञ करने वाले में और श्री कृष्ण के प्रणाम करने वाले में अंतर है कि 10 अश्वमेध यज्ञ करने वाला स्वर्ग में जाएगा पुण्य छण मृत्यु लोक भी संती लेकिन कृष्ण प्रणाम न पुनर्भवायए इसलिए भगवान के श्री विग्रह के सामने जाते ही साष्टांग लेट जाए या पंचांग प्रणाम करें कम से कम इतना देहाभिमान ना पुष्ट हो कि हम भगवान के सामने अवहेलना पूर्वक खड़े हैं। देखते ही हाथ जुड़ जाए, नेत्र झुक जाए, साष्टांग लेट जाए, यह वैष्णवता है, यह भक्ति है। अगर आप प्रणाम नहीं करते तो तीसरा सेवा अपराध है।

चौथा असौच अवस्था में मंदिर में दर्शन करने जाना। आप जैसे कपड़ा सहित लैट्रिन गए हैं तो आपका अधिकार नहीं कि आप मंदिर में जाकर दर्शन करें। पहले जाइए स्नान कीजिए वस्त्र परिवर्तन कीजिए। वस्त्र पवित्र हो और आपका शरीर पवित्र हो और कोशिश करो कि भाव भी पवित्र हो तब हम भगवान के दर्शन करने के लिए जाए। एक एक कदम में आनंद का उल्लास होता है अपने प्रभु के दर्शन करने की भावना में। यदि आप खड़ेखड़े लघु शंका करते हैं। आपके वस्त्रों में पेशाब के छींटे पड़ते हैं। आप अपवित्र हैं।

मंदिर जाने के योग्य नहीं है। इसीलिए बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। कोई भाव नहीं आता। कोई अनुभव नहीं आता। मैं आपसे सच्ची कहते हैं। प्रभु के जो श्री विग्रह है। हमने अब वो सब बातें नहीं बताई जाती। मतलब ये साक्षात हैं। आपको हम ये कह रहे साक्षात हैं। एक एक बात आपकी सुनते हैं। एक एक बात देखते हैं। हम कैसे तुम्हें बताएं? ये प्रभु जो श्री विग्रह में आप केवल भाव करके देखिए। वो हमारे भावों को वो हमारे भावों को ग्रहण करते हैं। जो प्यार से उनसे बात करो ना सेकंड में उत्तर आता है।

सेकंड में ऐसे बात करो और हो गया। उत्तरित हो गया। ये प्रभु विराजमान है तो हम अपने प्रभु के असौच अवस्था में मंदिर दर्शन करने ना जाए जब हमारा शरीर अपवित्र हो हमारे वस्त्र पवित्र हो हमारा मुख अपवित्र हो मुख में तीन बार आचमन करें कृष्णााय नमः गोविंदाय नमः अचुताय नमः दाहिने अंगूठे से ऐसे करके हाथ पैर धो के पवित्र हो के भगवान के दर्शन करने जाए अपवित्र दिशा में वस्त्र अपवित्र शरीर अपवित्र मुख अपवित्र ऐसी दशा में भगवत दर्शन करना अपराध माना जाता है। मंदिर में जाकर के पांचवा एक हाथ से भगवान को प्रणाम करना।

ये शास्त्री पद्धति नहीं है। संत या भगवंत को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किए जाते हैं। दोनों हाथ जोड़कर संतों को प्रणाम करते हैं और भगवान के सामने दोनों हाथ ऐसे भगवान को नहीं किया जाता। ऐसे करना एक 32 सेवा अपराधों में एक अपराध है। एक हाथ से भगवान को प्रणाम नहीं करना चाहिए। यह पांचवा अपराध है जो एक हाथ से प्रणाम करते हैं। छठा जब हम भगवान की परिक्रमा देते हैं तो हमारे श्री ठाकुर जी महाराज की चार परिक्रमा होती है। तो परिक्रमा में आप ऐसे जब चारों तरफ घूमते हैं तो श्री विग्रह के सामने जब आते हैं तो प्रत्येक परिक्रमा में रुकना चाहिए और रुक कर प्रणाम करना चाहिए और फिर परिक्रमा देनी चाहिए।

जैसे हम ठाकुर जी की ऐसे परिक्रमा दे रहे हैं तो ऐसे परिक्रमा करके आए फिर प्रणाम किया फिर दूसरी परिक्रमा फिर प्रणाम फिर तीसरी परिक्रमा फिर प्रणाम फिर चौथी परिक्रमा प्रणाम बहुत महत्वशील है भगवान की परिक्रमा करना विश्व ब्रह्मांड के समस्त पुण्यों में सर्वश्रेष्ठ है पृथ्वी की परिक्रमा कर लो सब तीर्थों की परिक्रमा कर लो तो तीर्थ पात तो भगवान है भगवान की परिक्रमा कर ली सब की परिक्रमा हो गई। अगर चार परिक्रमा श्री भगवान के मंदिर की कर ली पूरी पृथ्वी की परिक्रमा हो गई।

क्योंकि जितने तीर्थ है वो संत और भगवंत के द्वारा ही प्रकाशित है और संत भगवंत से हैं और भगवान स्वयं प्रिया प्रीतम विराजमान उनकी जब परिक्रमा कर ली तो सबकी परिक्रमा हो गई। चार परिक्रमा और ऐसे रुक करके जो बिना रुके हुए ऐसे घूमते रहते हैं वो 32 सेवा अपराधों में ये छठा सेवा अपराध है। सातवां श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने पैर फैला के बैठना। मानो आपकी गांठों में दर्द है। आप मंदिर में बैठे तो भगवान के सामने ऐसे पैर फैला दिए। ये अपराध है। आपके पुण्य नष्ट हो जाएंगे।

अगर आपके पैर दर्द करते हैं तो आप खड़ेखड़े या बैठे-बैठे जैसे बने दर्शन कर लीजिए। हट जाइए सामने से उनके सामने ऐसे जो नहीं जानते हैं वो और पैर ऐसे सामने फैला दिए वो अपराध है। भगवान के श्री विग्रह के सामने ऐसे पैर करके फैलाना ये 32 सेवा अपराधों में सातवा सेवा अपराध है। आठवां भगवान के श्री विग्रह के सामने घुटने लपेट कर हाथों से बांध कर बैठना। ऐसे जो घुटने ऐसे कर लेते हैं ना लोग ऐसे ऐसे वो 32 सेवा अपराधों में आठवा यही सब हमारी बुद्धि को भ्रष्ट कर देते हैं।

बोले मंदिर गए लेकिन कोई लाभ नहीं ले पाए तो ये सावधानियां है। नौवा श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने बैठ गए और जपना चाहिए मंत्र धीरेधीरे आलस्य प्रमाद सोना अगर आप श्री विग्रह के सामने सो रहे हैं तो आपका अपराध बन रहा है। मत सो एक सेकंड भले ही दर्शन करो निकल जाओ मंदिर से तो अपराध तो नहीं बनेगा एक सेकंड के दर्शन का तो लाभ मिलेगा दसवा श्री भगवान के शिव विग्रह के सामने कुछ भी पाना जैसे आपको कुछ भी मिला तो विग्रह के सामने से हट जाइए और फिर प्रणाम करके प्रसाद है जो भी चरणामृत है जो भी वो सामने से हट जाइए उनको देखते हुए ऐसे सामने ऐसे नहीं पाना जो भी मिला है सामने से हट जाइए एकांत होकर पा लीजिए हाथ प्रक्षालन कीजिए।

फिर दर्शन के लिए आ जाइए। 11वा भगवान के विग्रह के सामने झूठ बोलना कभी नहीं। एक तो वहां बात ही ना करें अगले में आएगा लेकिन भगवान के सामने कभी और गुरुदेव के सामने। ये दो जगह कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। ये महत्व अपराध है। हमें चाहे जितना बड़ा दंड मिले यदि हमने गलती की है तो अब की है। अब चाहे मुझे क्षमा कर दो चाहे दंड दो। वैसे तो कहीं झूठ नहीं बोलना चाहिए। पर अगर कहीं हमसे झूठ बोल जाता है तो हम जब भगवत आराधना करते हैं तो भस्म हो जाता है। लेकिन भगवान के सामने अगर हम झूठ बोले मंदिर में गांव में भी किसी बात का प्रमाण लिया जाता था तो बोला जाता था आप मंदिर में चढ़ के बोल दो हम मान जाएंगे।

तो अगर मंदिर में आप हैं तो झूठ कदापि मत बोलिएगा। इतना ध्यान रखिएगा नहीं वो अपराध बन जाएगा। भगवान के श्री विग्रह के सामने झूठ बोलना। 12वा श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने किसी को जोर से पुकारना। अरे ऐसे क्योंकि सरकार विराजमान है। अगर किसी को भी बुलाना है तो सामने से हट जाइए और उसको छू कर बुलाइए या धीरे से उसको स्पर्श करके कोई बात कहनी आवाज जोर देकर के मंदिर में नहीं आवाज जोर देकर के बुलाना भगवान की अवहेलना होती है वो अपराध बनता है। भगवान के श्री विग्रह के सामने आपस में प्रपंच की बात करना 13वा अब बैठे हैं बातचीत कर रहे हैं भगवान के श्री विग्रह के सामने पंखा चल रहा है बड़ा आराम से और भगवान की श्री विग्रह के सामने व्यर्थ की गांव की रिश्ते नातों की आने जाने की प्रपंच की बातें कर रहे हैं।

ये अपराध है। भगवान के सामने बैठकर अगर कुछ करना है तो पद गायन करो। भगवान की महिमा आज देखो ठाकुर जी कैसी सुंदर पोशाक पहने। आज उनके चरणों में पायल कितने सुंदर है। उन्हीं की शोभा का वर्णन करो। प्रपंच की बात नहीं। या तो मौन होकर नाम जप करो और या तो भगवान की चर्चा करो। हमें लगता है मौन रहकर नाम जप करना सर्वोत्तम बात रहेगी। श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने चिल्ला चिल्ला कर उलूल जुलूल बात करना। बेमतलब ऐसे ऐसा वैसा ऐसा मंदिर में बहुत सावधान 15वा श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने किसी को दंड देना मान लो आपकी जेब ही काट ली है आपकी जेब काट ली माना उस आदमी को पकड़ लिया ठाकुर जी के सामने दंड नहीं देना है इतनी मर्यादा रखी और 16 श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने किसी को पीड़ा भरे कट वचन बोलना मतलब गाली गलौज ऐसे गंदे वचन बोलना या ऐसा शापित वाली बात कहना ऐसा कुछ भी बोलना या श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने किसी पर कृपा करना नहीं सरकार विराजमान है वो मान लो कोई कह रहा है कुछ भी आशी वो प्रभु विराजमान उनसे बात करो इस समय चुप रहो शांत श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने निष्ठुरता भरा व्यवहार करना 19वा श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने कंबल ओढ़ के जाना।

सर्दी का समय है तो मानो एक लोहे एक चद्दर ऐसे डाल लिया। वहां मार कंबल ओढ़कर भगवान के सामने जाना। निषेध करता है। शास्त्र निषेध करता है। श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने किसी की निंदा करने लगना। भगवान के विग्रह के सामने मौन बहुत जरूरी है। जब आप दर्शन करने जाए तो सीधे आंख मिलाया और दर्शन करते रहो। आंख नीचे किया मंदिर से बाहर बच गए। कोई अपराध नहीं लगेगा। श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने किसी को स्तुति भरे वचनों से बोलने लगना। अरे भाई आप क्या गाते हैं?

आप तो बहुत ऐसा वैसा बातचीत करने लगे। उसकी बाई करने लगे। स्तुति का मतलब होता है किसी की बाई करना। वह दोष है। श्री भगवान के सामने अश्लील शब्द बोलना। श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने अधो वायु छोड़ना। अब जैसे ये एक शारीरिक प्रक्रिया है। आप मंदिर में हैं आपको अधो वायु अधो वायु का मतलब समझ रहे हैं ना? तो उस वायु को जब वेग आता है तो कहीं भी वो छोड़ देता है ना तो भगवान के श्री विग्रह के सामने नहीं सीधे निकलो मंदिर से बाहर। यानी श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने छोड़ दिया तो 32 सेवा अपराधों में है श्री विग्रह के सामने आधे वायु का त्याग करना और 24वा शक्ति रहते हुए भगवान की साधारण वस्तुओं से सेवा करना जैसे आपके पास खूब भगवान ने दिया है तो उत्तम उत्तम भोग लगाइए उत्तम पोशाक पहनाइए उत्तम आभूषण पहनाइए ऐसा नहीं कि आप खा रहे हो हलवा और चाय और पकड़ी और भगवान के सामने ने चिरौरी रख दिया।

यह ठीक नहीं है। प्राय लोग इस बात को नहीं समझते हैं। चिरौरी बिस्कुट ये भगवान के सामने आप गरम गरम हलवा पकड़ी खा रहे। नहीं भाई पहले गरम गरम बने ठाकुर जी के सामने अर्पित करो। तो उत्तम उत्तम पदार्थों से उत्तम उत्तम पोशाक आभूषणों से श्री ठाकुर जी की सेवा करनी चाहिए। 25वा भगवान को निवेदन किए बिना अगर आप जल भी पीते हैं तो आपके सुकृतों का नाश होता है। गीता में भगवान ने कहा मुझे अर्पित किए हुए बिना जो भोजन पाता है वो पाप पाता है। तो कोशिश करो भगवान को भोग लगा के ही पाओ।

अपने घर में जो ठाकुर हैं और आप जहां नौकरी करते हैं या आप व्यापार करते हैं, ऑफिस में जाते हैं तो एक मिनट के लिए आप धैर्य रखिए। अपना टिफिन खोलिए और आंख मूंदिए और भगवान का चिंतन कीजिए और कह हे प्रभु आप भोग लगाइए और बस अपने ठाकुर की जयकार बोलिए जो भी आपके इष्ट है जैसे अपने लोग राधा वल्लभ लाल की जय धीरे से बोला और बस फिर प्रसाद पाने लगे मानसिक भगवान को तो भोग लगाए जल है अंदर से राधा वल्लभ लाल की जय प्रभु हमारे हृदय मंदिर में बैठे हो आप पाओ बिना जयकार किए बिना अर्पित किए हुए एक बूंद पानी भी ना पियो।

देखो आपकी बुद्धि कितनी निर्मल हो जाएगी। कितना भजन में रुचि बढ़ेगी। जो लोग कहते हैं ना भजन में रुचि नहीं बढ़ती है। तो मनमानी चाट पकड़ी ऐसे दुकानों में खाते घूमोगे भजन बढ़ेगा। बिना भगवान को अर्पित किए हम कह देखो तुम्हारा मन है। आज हम चलो ठीक है। आप ले लो। मान लो वही दुकान पर ही खाना है। आंख मूंद दिए और भाव में आए कि हे प्रभु मेरा मन मतलब आप आप गोलगप्पा पालना चाहते हैं। राधा राधा राधा वल्लभ लाल की जय। हर गोलगप्पा में राधा बोलिए। आइए देखो आपकी बुद्धि शुद्ध रहेगी।

बुद्धि भ्रष्ट नहीं होगी। ऐसे तो फिर मनमानी करने से बुद्धि अपवित्र हो जाती है। 26वां ऋतु का जो फल है वो जरूर भगवान को भोग लगाना चाहिए। अलग-अलग ऋतुओं में फल आते हैं। अलग-अलग ऋतुओं में शाक आते हैं। तो शाक, फल आदि उत्तम ये ऋतुओं में आज ठाकुर जी बहुत ठाकुर जी प्रसन्न होते हैं। एक बार चोखा मेला जी महाराष्ट्र के थे तो ठाकुर जी के आराधना में तो बड़े उच्च कोटि के भाव युक्त महापुरुष थे। तो बाजार जा रहे थे घर की वस्तु लेने। तो देखा केले का ऋतु था। नए-नए केले इतने बड़े-बड़े पके तो उन्होंने कहा कि सामान क्या लेना आज ठाकुर जी के लिए केला ले लेते हैं और केला लिए और मंदिर में दरवाजे पर जाकर के आवाज लगाई और भगवत पार्षदों को कहा विट्ठल भगवान को भोग लगा दीजिए आज उन्होंने हमें प्रेरणा की कि केला बोले तेरे केला कौन भोग लगाएगा तो उन्होंने एक तरह से अपमानित करके उनको उनको बड़ा दुख हुआ।

आपने हमें प्रेरणा क्यों की? और प्रेरणा क्यों की? अगर प्रेरणा की तो आपने मुझे ये धक्का देकर बाहर क्यों? ये क्या लीला है आपकी? मैं तो घर की वस्तु लेने गया था। प्रेरणा आपने की किला मुझे चाहिए। मैंने केला खरीद कर जब आपको दिया तो आप अपमानित करवा के मन। मुझे अपमान का दुख नहीं। लेकिन मैंने तो सुना है आप केवल भाव ग्राही है। किसी का भी हो। आप सबके भाव ग्रहण करते हैं। मैं अपने प्राण त्याग दूंगा और जाके घर में सिटिकनी लगाई बस कि ना खाऊंगा ना पऊंगा। क्योंकि ऐसा क्या जे ठाकुर जी को वहां रात्रि में सहन कराया गया दरवाजा खटखटाया चोखा मिला जी चोखा वो अमृत भरी आवाज रह ना सके तुरंत जो खोला और श्याम कांत और भगवान मधुर मधुर मुरली निवादन करने वाले श्री कृष्ण देखा चरणों में लौट गए प्रभु प्रभु प्रभु आए और उनकी गोद में बैठ गए बोले बोले केला खवा और वो वैसे ही केला रखे थे।

बोले प्रभु मैं चतुर अरे बोले छोड़ो मैंने कब कहा चतुर वर्ण का मैं तो भाव का भूखा हूं। मैं किसी वर्ण या किसी पद प्रतिष्ठा में नहीं बिकता। मैं भाव में बिकता हूं। गोद में बैठकर के चोखा मेला जी की भगवान ने केले और बोले सुनो ये दो केले दे दो रुक्मणी जी को भी पवाएंगे। वहां विट्ठल भगवान और रुक्मणी जी महाराष्ट्र में विराजमान है तो दो केले पीतांबर में लिए अंतर्ध्य हो गए और अंदर से जाके मंदिर की सिटिकनी बंद कर ली और दो केले रुक्मणी जी को प के छिलके आंगन में फेंक दिए अब जब सुबह हुआ दर्शन के लिए तो बाहर से ताला खोला अब अंदर से बंद है मंदिर अब सब परेशान हो गए कैसे खुला अंदर कैसे बंद हो गया तो स्तुति की बड़ी प्रार्थना की भगवान से विनय की तो आवाज आई जाओ चोखा मेला जी को पालकी में बैठाल करके जब लाओगे और वह हमसे

प्रार्थना करेंगे तो मंदिर का दरवाजा खुलेगा नहीं तो नहीं खुलेगा ऐसा ही करना पड़ा पालकी में बैठा के चोखा मेला जी को लाए और जब चोखा मेला जी ने प्रार्थना की प्रभु दरवाजा खोल दीजिए फटाक से दरवाजा खुल गया जो पुजारी जन थे उन्होंने देखा छिलके पड़े बोले प्रभु छिलके कैसे बोले चोखा मेला जी के केला के तुम क्या समझते हो मैं किसी जाति से बिकने वाला हूं नहीं विद्या रूप महत्व कुल धन जोन अभिमान ये सब सच कंटक रहे ना भक्ति निदान जहां ये छह प्रकार का अभिमान होता है वहां मेरी भक्ति नहीं रहती तो मैं कैसे रह सकता हूं तो भगवान को अच्छी वस्तु देखा अरे ये तो प्रभु के लिए बहुत अच्छी रहेगी चलो आज ये ले चलते हैं अपने ठाकुर को भोग लगाते हैं ऐसा भाव रखना किसी साख या फल आदि के अगले भाग को तोड़ करके अच्छा अच्छा अपने लिए रख लेना और फिर ऐसा भगवान को अर्पित करना ऐसा नहीं होना चाहिए।

श्री भगवान के श्री विग्रह के सामने पीठ नहीं दिखाना चाहिए। ऐसे रहना चाहिए। जैसे भगवान के विग्रह के सामने इसीलिए जब परिक्रमा करते आते हैं तो घूम के तुरंत प्रणाम करके फिर दाहिने करके चले आते हैं। भगवान की तरफ पीठ करके नहीं बैठना चाहिए। पीठ भगवान को नहीं दिखानी चाहिए। श्री विग्रह के सामने किसी को प्रणाम नहीं करना चाहिए। अब यहां सावधानी की जरूरत है। जैसे गुरुदेव भगवान आ जाते हैं। हम दर्शन कर रहे होते हैं। हमारी दृष्टि गई। गुरुदेव भगवान आ गए। तो हमको फिर भगवान से दृष्टि हटाकर गुरुदेव भगवान को प्रणाम करना चाहिए।

मोते अधिक गुरु ही जी जानी। अगर कोई संत भगवान दिखाई देते हैं तो ऐसे नेत्रों से किया ऐसे प्रणाम किया फिर ठाकुर जी के दर्शन करने लगे और जब वह श्री विग्रह से दूर हुए तो उनको फिर प्रणाम नमस्कार लेकिन गुरुदेव को तुरंत गुरुदेव गुरुदेव आ गए तुरंत ठाकुर जी से दृष्टि हटा के गुरुदेव के चरणों में प्रणाम करें फिर ठाकुर जी के दर्शन करें बकाया श्री विग्रह के सामने किसी और को प्रणाम ना करें सीधे बस ठाकुर जी के दर्शन करता रहे जब गुरुदेव मिले जय बार गुरुदेव मिले। यह 30वा अपराध बता रहे हैं।

गुरुदेव आए और आप उठकर के खड़े नहीं हुए। मतलब एक बार प्रणाम कर तो क्या बार-बार प्रणाम करें? नहीं अभ्यर्थना बार-बार उनकी वंदना गुरुदेव आए खड़े हो गए। मान लो आप 10 बार आए तो 10 बार खड़े हो गए। जय बार हमारे सामने आए गुरुदेव गुरुदेव की अभ्यर्थना और गुरुदेव की आज्ञा का पालन अवज्ञा नहीं जो आज्ञा हो गई बड़ा फल है आज्ञा पालन में पर कभी-कभी गुरुदेव की बड़ी प्रतिकूल आज्ञा हो जाती है। जैसे एक बार श्री रामानंदाचार्य जी एक बगीचे में भ्रमण करते हुए पहुंचे। ठाकुर का सिंहासन विराजमान हुआ।

वहां समीप पर कुआं था। कुआं से पानी मंगाया तो कुआं के पानी में हल्की सी बदबू थी क्योंकि उसके ऊपर एक पेड़ की डाल आ रही थी और सारे पत्ते कुएं में जा रहे थे। तो आचार्य चरण ने देखा और बहुत से शिष्य थे। सबसे कहा यह डाल हट जाए तो कुएं का पानी ठाकुर जी की सेवा के लिए ठीक हो जाए। तो पूरा हमें पेड़ नहीं काटना। पूरी हमें डाल नहीं काटनी। हमें उतना ही सिर्फ काटना है जो कुएं के ऊपर है। तो चलो कुल्हाड़ से काटो। तो विज्ञ शिष्य जनों ने कहा जय जय जो काटेगा वह तो कुएं में चला जाएगा क्योंकि लंबी डाल आई है अगर पेड़ के पास से काटनी हो तो सुविधा है नहीं तो बैठकर के तो इधर ही काटेगा और काटेगा तो कुल्हाड़ सहित कुएं में बोले इससे मुझे कोई मतलब नहीं डाल कटनी चाहिए एक खड़ा हुआ कि जीवन तो गुरुदेव के लिए मर जाऊंगा तो क्या गुरुदेव की आज्ञा में खड़े बोले गुरुदेव मैं काटता हूं और गए काटा जो ही काटा सो डाल और कुल्हाड़ और वो सब कुएं में चले गए।

अब सबसे और जो शिष्य थे गुरुदेव गुरुदेव तो कुएं में चले गए। गुरुदेव एकदम निरपेक्ष बैठे हैं। 10 मिनट हो गया। बोले गुरुदेव तो मर गए होंगे। बिल्कुल निरपेक्ष बैठे हैं। थोड़ी देर में नमो नमः जय हो जय हो। ऐसे शब्द हुए और कुएं से ऐसे बाहर वो शिष्य आए और आकर गुरुदेव को प्रणाम किया और कहा ये सियाराम जी ने प्रसाद दिया है। तो उनका कहां गए थे? 10 मिनट हुए। बोले जे ही कुलहार से काट कर मैं नीचे गया तो भगवान राम जी के पार्षद मुझे साकेत धाम ले गए और वहां सियाराम जी के दर्शन कराए और सियाराम जी ने आपके लिए प्रसाद भेजा सब शिष्य सोचने लगे हाय मैंने ये क्यों नहीं किया काम बहुत प्रतिकूल है लेकिन ये आज्ञा कि मेरे गुरुदेव की आज्ञा में प्राण दे दूंगा बस बात बन तो गुरु की अभ्यर्थना जय बार गुरुदेव मिले त बार सर झुका कर नमस्कार किया और जय बार आवे त बार खड़े हो गए और उनका का कुशल प्रश्न उनकी आज्ञा का पालन करना उनका स्तवन करना यदि हम ऐसा नहीं करते तो यह 30वा अपराध बनता है 31वा अपने मुख से भक्तों के बीच में अपनी प्रशंसा करना अपनी बाई की बात करना इससे पुण्य नष्ट हो जाते हैं।

जो अपनी प्रशंसा करता है, दूसरों की निंदा करता है, उसके सारे सुकृत नष्ट हो जाते हैं। 32वां किसी भी देवता या किसी भी भगवान की निंदा कानों से ना सुनना। ये 32 अपराधों से यदि हम बच जाए तो हमारा भजन और उन्नतिशील हो और बहुत जल्दी भगवत प्राप्ति कराने वाला हो। किसी चीज को हम प्राप्त करने के लिए स्ट्रगल कर रहे हैं और हमने इतना स्ट्रगल कर लिया कि हम उसे प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। तो मतलब हम क्या करें? फिर उसके लिए तो आपका आपका जो पूर्व का बुरा प्रारब्ध है ना वो आपको बाधा पहुंचा रहा है।

अगर हम भगवान का भजन करें तो तप और भजन के द्वारा हम अपने प्रारब्ध को रोक सकते हैं। नए प्रारब्ध की रचना कर सकते हैं। मनुष्य जन्म मिला है। पर वो बिना भगवान से जुड़े वो प्रारब्ध का संबंध नहीं हो सकता। भगवान सेित को जोड़ रहा हूं। जैसे मैं चार्टर्ड अकाउंटेंट हूं। मैं सीए जब परीक्षा पास की थी तो मैं फाइनल में करीबन छह बार फेल हुआ था। एक बार ऐसा लगा कि अब सीए छोड़ देनी चाहिए। लेकिन मैंने निहारी और मैं चार्टर्ड अकाउंटेंट बना। लेकिन कभी-कभी लगता है कि जब जो बच्चे चार्टर्ड अकाउंटेंट कोर्स छोड़ देते हैं तो फिर उन्हें क्या करना चाहिए कि जो चीज नाम जप भगवान का नाम जप करते हुए अपने कार्य की प्रवीणता के लिए तन्मयता पूर्वक अपने विषय पर ध्यान देना चाहिए।

जैसे आपने कहा छह बार फेल हुआ इसके बाद पास तो हमें प्रारब्ध कई बार गिराएगा। अगर हम भगवान का आश्रय लेंगे और प्रयत्न करते रहेंगे तो हमें सफलता प्राप्त होगी। निराश नहीं होना चाहिए। नाम जप करना चाहिए और अपने कार्य को बड़े मनोयोग से जो मान लो सीए का कार्य है उसे बड़े मनोयोग से क्योंकि प्रश्न आएंगे तो उसी के अंतर्गत आएंगे ना तो हम बड़े मनोयोग से उस पर ध्यान दें और खूब भगवान का नाम जप करें अच्छे आचरण करें ब्रह्मचर्य का पालन करें पवित्र भोजन करें तो हमारा लौकिक पारलौकिक दोनों अच्छा हो जाएगा खुशी जी लंदन से राधेधे महाराज जी राधेधे महाराज जी महाराज जी अगर रिश्तों में और आत्मसम्मान में किसी एक को चुनाव करना करना हो तो किसका करें?

भावनात्मक और अति विचारक स्वभाव होने के कारण फिर अपने आप को आत्मनिर्भर कैसे बनाएं? महाराज जी आत्मसम्मान का अर्थ आप क्या लेते हैं? महाराज जी आत्मसम्मान की अपनी अपनी अपने अपने आप अपना सम्मान भी बना रहे और और रिश्ते भी खराब ना हो। नहीं। अपने सम्मान को मिटा के रिश्तों का पोषण किया जाता है। अगर हम अपने सम्मान की बात रखेंगे तो रिश्तों में खटास आ ही जाएगी। आत्मसम्मान तो भगवत स्वरूप होता है। लेकिन आप देहाभिमान की बात कर रहे हैं। जिसे आप आत्मसम्मान कह रहे हैं उसे देहाभिमान कहा जाता है।

देहाभिमान को ठीक नहीं कहा गया है। देहाभिमान को मिटा के हमको अपने रिश्तों का पोषण करना चाहिए। अपने जो भी रिश्ते हैं उनमें भगवत भाव रख के अपने सम्मान को देखो शास्त्रीय आदेश है सबह मान प्रद आप अमानी जब आप मान रहित होकर सबका मान करेंगे तो रिश्ते अपने आप उज्जवल हो जाएंगे और सब रिश्तों में भगवान ही विराजमान है। अमानीना मान देनो कीर्तिनिया सदा हरी स्वयं अमानी रहकर दूसरों को मान देना और हम अपने सम्मान की बात अगर ध्यान रखेंगे तो खटास तो रिश्तों में आ ही जाएगी और आप जलेंग आपका हृदय जलेगा आपका हृदय असंतुष्ट होगा वो ठीक नहीं सिद्धांत से ठीक नहीं है सिद्धांत से आप अमानी बनिए दूसरों को सम्मान दीजिए दूसरों से सम्मान लेने की भावना ना रखिए दूसरों को सम्मान देने की भावना रखिए तो आपका हृदय उदार हो जाएगा और वास्तविक आत्मसम्मान आपका होगा।

वास्तविक आत्मसम्मान आपका होगा। जब आपसे कोई कटु व्यवहार करें, आप उससे प्रेम का व्यवहार करें तो भगवान देख रहे हैं। वो आपको प्यार करेंगे और जिसको भगवान प्यार करते हैं उसे सारा संसार प्यार करता है। जहां पर कृपा राम की हुई ता पर कृपा करे सब कोई तो हमें लगता है आप आत्मसम्मान की भाषा को देहाभिमान में बदल नहीं है। देहाभिमान आत्मसम्मान नहीं होता। सबका सम्मान ही आत्मसम्मान होता है। क्योंकि आत्मा सब में विराजमान है। ऐसे तो रिश्तों में खचास आ जाएगी, कड़वाहट आ जाएगी।

आपका हृदय संतप्त हो उठेगा। सो ठीक नहीं है। स्वाति जी भानपुरा से राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव। नाम जप के उपरांत भक्ति की अगली सीढ़ी कौन सी है? महाराज जी यही पूर्णता है। पहले नाम जप वैखरी से होता है। राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा फिर उपानुश से होता है। फिर मानसिक होता है। ये तीन पद्धतियां हैं। परा वाणी से जब नाम चलने लगता है तो भगवान का स्वरूप सामने होता है और उनकी दिव्य लीलाएं होती हैं। यह नाम ही प्रारंभ है और नाम ही पूर्णता है। नाम में ही सब कुछ छुपा हुआ है।

वैखरी मध्यमा पश्यती और परावाणी ये चार वाणं हैं। जब परावाणी से नाम चलने लगता है जिसे कहते हैं रोम रोम और रग रग बोले तब कछ स्वाद नाम को पावे। नस नाड़ियों तक में नाम समा जाता है। शरीर परम पवित्र हो जाता है। हृदय परम पवित्र हो जाता है। स्वभाव परम पवित्र हो जाता है। और वो भगवत स्वरूप हो जाता है। तब नाम ही प्रारंभ है और नाम ही पूर्णता है। नाम की अगली सीढ़ी नाम ही है। पर वो उतरता चला जाएगा। अभी नाम में मन नहीं लगता। नाम जप कर रहे हैं। संसार भूत भविष्य की बातें गंदी बातें यह सब आ रहे हैं।

धीरे-धीरे नष्ट हो जाएगी। अब नाम ही दिखाई दे रहा है। नाम ही सुनाई दे रहा है। संपूर्ण लोक से वैराग्य हो गया। नाम जप करते करते भगवान से अनुराग हो गया। भगवान का रूप भगवान की दिव्य लीलाएं उसके सामने छा गई। वह सिद्ध पुरुष हो गया। नाम ही साधना है और नाम ही सिद्धावस्था है। पूजा आलोक जी राधे राधे राधे-धे महाराज जी महाराज जी मैं ये जानना चाहती हूं कि गुरु और शिष्य के बीच का नाता कैसा होना चाहिए शिष्य ऐसी कौन सी बातें हैं जिससे गुरुदेव प्रसन्न होते हैं शिष्य के नाता सेवक स्वामी का प्रधान होता है गुरु स्वामी होता है और शिष्य सेवक होता है सेवक वही है जो स्वामी की अक्षरश आज्ञा का पालन करें।

गुरु को साक्षात परम ब्रह्म मान के उनकी आज्ञा का पालन करें। उनकी आज्ञा जो हुई है वह हमारे लिए परम कल्याण के लिए है। ऐसी भावना करके प्रत्येक छोटी से छोटी भी आज्ञा का पालन करें और गुरु की आज्ञा के अनुसार जब हम जीवन चलाते हैं और जब हम ऊंचाई पर पहुंचते हैं तो हम गुरु स्वरूप ही हो जाते हैं। हमारा गुरु का संबंध स्वामी सेवक का संबंध है। माता पिता का संबंध है, मित्र का संबंध है। सब कुछ संबंध है तुम माता च पिता तुमव बंधुस सखा तुमव तुम विद्या द्रविण तुमव सर्वम मम देव देव सर्वदेव गुरुदेव हमारी संपत्ति गुरुदेव हमारी माता गुरुदेव हमारे पिता गुरुदेव हमारे सखा गुरुदेव गुरुदेव अब जैसे ये लोग सब हमारे पास रहते हैं तो कभी हंसी खेल होता है तो हम साथी हंसते भी हैं विनोद भी हो रहा है तो हम सखा भाव में उस समय हंसी विनोद भी करते हैं।

माता की तरह इनका पोषण करते हैं। पिता की तरह इनकी संरक्षता करते हैं। स्वामी की तरह इनकी हर कामनाओं को देखते हैं। और शिक्षक की तरह गुरु की तरह इनको उपदेश देते हैं। तो सारे संबंध गुरुदेव से जिसके हैं वही सच्चा सेवक है। वही सच्चा शिष्य है। और गुरु और शिष्य दोनों समान एक स्थिति को प्राप्त हो जाए तब शिष्यता की पूर्णता है। जो गुरु में चल रहा है वही शिष्य में चल रहा है। जिस रस में गुरु मगन है उसी रस में शिष्य मगन है। तब वह एक रस्ता आ गई। तब वो सच्चा शिष्य हो गया।

अब जैसे अपने गुरुदेव की नाभा जी सेवा करते थे। हर समय गुरुदेव की सेवा में ही रहते थे। तो गुरुदेव ध्यानस्थ थे। नाभा जी पंखा कर रहे थे। तो पूज्य उनके गुरुदेव श्री अग्र देवाचार्य जी थे। तो अग्रदेवाचार्य जी के किसी शिष्य का जहाज जो है वह भंवर में फंस गया समुद्र में। अब ये हुआ कि तो डूब जाएगा। तो उन्होंने पुकारा गुरुदेव गुरुदेव गुरुदेव रक्षा करो। तो अग्रदेवाचार्य जी सियाराम जी को माला पहनाने जा रहे थे। बस अचानक एकदम वो पुकार एकदम चिंतन खींचा तो माला ऐसे तो नाभा जी पंखा में से हवा कर रहे थे उन्होंने ऐसे कर दिया और गुरु जी से मानसिक स्थिति में जाकर कहा कि आप माला पहनाइए जो हमारे गुरु भाई का जहाज अटक गया था वो तो निकल गया तो उन्होंने कहा कौन बोला यहां आकर कौन बोला मानसिक सेवा में वो वो ऊपर से सब मौन है।

बोले कौन बोला? बोले जिनको जूठन दे देकर पाला है वो सेवक ने बोला आपकी जूठन का बल कि ये शिष्य गुरु की महिमा को जानकर गुरु के समान हो गया। पर दासता ऐसी ही कि आपकी जूठन के पोषण से हुए। यह है गुरु शिष्य का संबंध कि शिष्य जब गुरु की महिमा में युक्त होकर गुरु स्वरूप हो जाए तभी शिष्य की पूर्णता है कि जो गुरु के हृदय में चल रहा है वही शिष्य देख रहा है वही शिष्य आनंद ले रहा है राधे राधे महाराज जी हम आप में गुरुदेव देखते हैं हमारा हाथ कभी नहीं छोड़ना श्री जी के देखो गुरुदेव कभी नहीं छोड़ते शिष्य छोड़ देता है गुरु का स्वभाव छोड़ना नहीं जैसे आपसे आपसे कोई अपराध बना हमें पता चला।

हमने कहा चल निकल भाग दिखाई मत देना। आप शाम के वही रोड के किनारे बैठे। मान लो कभी हम जब निकले क्यों बैठे? दिखाई क्यों दिए? प्रभु आपके सिवा हमारी ठोर ही नहीं तो मैं जाऊं कहां? खत्म खेल। सारे अपराध माफ हो गए। प्रभु हमारी ठोर ही नहीं है। कोई और कोई नहीं और ठोर कोई नहीं। आपके सिवा और कोई नहीं। हमारी कोई ठौर नहीं। तो नाथ अब हम जाए तो कहां जाएं? आपकी शरण में है। चाहे दंड दो चाहे क्षमा करो। पर प्रभु हम आपके चरणों को छोड़ के नहीं जा सकते। यह है गुरु भक्ति।

गुरु कभी नहीं छोड़ते। आप लोग ही गुरु को छोड़ देते। उनकी आज्ञा का उल्लंघन करके मनमानी आचरण करते हैं। गुरु कभी नहीं छोड़ते। गुरु का बड़ा उदार हृदय होता है। जो परम बह्म परमात्मा को दे दे आपकी गोद में वो गुरु नाराज कैसे हो सकते हैं? वो आपको सुधारने के लिए नाराज का नाटक कर सकते हैं। तो आपकी निष्ठा होनी चाहिए कि गुरुदेव को छोड़कर ये मारे या प्यार करें गुरुदेव को छोड़कर और हमारी कोई गति नहीं। पवन जी जय जय श्री हरिवंश। हरिवंश महाराज जी महाराज जी क्या गुरु की आज्ञा में रहना ही सर्वोपरि साधन है?

क्या केवल नाम जप में सारी मेहनत लगा दें? करने में तो गुरु की यही तो आज्ञा है। गुरु की यही तो आज्ञा है। भगवान के चिंतन में मेहनत लगा दो। यही गुरु की सर्वोपरि आज्ञा है। जितना भजन करोगे उतना गुरु प्रसन्न होंगे। गुरु प्रसन्न होंगे। इष्ट अनुकूल हो जाएंगे। सारी बात लग तो हम पूरी मेहनत लगा के पूरी जान की ताकत लगाकर आठों पहर नाम जप करें तो गुरु प्रसन्न हो जाएंगे। इष्ट प्रसन्न हो जाएंगे। सब सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। ज्ञान, वैराग्य, भक्ति सब प्राप्त हो जाएगी।

नाम में पूरी सामर्थ्य है। विराजमान है। जितना शास्त्रों में लिखा है वो सब नाम में भरा हुआ है। ब्रह्म राम ते नाम ब वरदायक वरदान। ब्रह्म भगवान राम से भी बढ़कर प्रभु का नाम है। वह वर देने वालों को भी वर देने की सामर्थ्य रखता है। जैसे हम लोग नाम के बल से ही वरदायक प्रियाल को भी आशीर्वाद देते हैं। चिरजीवो भूतल यह जो जी चिरंजीवी भ प्रिया प्रीतम को हम आशीर्वाद देते हैं। तो किसके बल से? नाम के बल से आचार्य को आशीर्वाद देते। चिर जीवो तारंदन अपने आचार्य को अपने गुरु को आशीर्वाद देते हैं।

स्वस्थ रहो सुखी रहो आनंदित रहो। किसके बल से? उन्हीं के द्वारा दिए हुए नाम के बल से। ब्रह्म राम ते नाम बल वरदायक वरदान। वरदान देने वालों को भी वर देने की सामर्थ आ जाती है। नाम जापक में। इसलिए नाम से बढ़कर के कोई नहीं है। खूब नाम जप करो। इसी से सब प्राप्त हो जाएगा। कुलदीप सिंह जी चंडीगढ़ से। राधे-राधे महाराज जी महाराज जी इस अंतिम पड़ाव में गुरु वाणी के शब्द हैं जप तप संयम धर्म ना कमाया सेवा साध ना जानिए हरि राया कहूं नानक हम नीच कर्मा शरण परे की राखो शर्मा कुमार जी याद करके बहुत पछताता हूं कृपया मार्गदर्शन करें कि बची हुई सांसों को कैसे संभालो नानक साहब तो बता तो दिए ना शरण गए की शरण परे की राखो शर्मा हां आपकी शरण में इस बात को आप देखिए।

मेरे से तो ना साधु सेवा बनी, ना मेरा भजन बना। हे नाथ बस मैं आपकी शरण में हूं। इस बात की लाज रख लीजिए कि मैं आपकी शरण में खास बात है जब जीव हृदय से भगवान की शरणागति हो जाता है तो सारी जिम्मेवारी भगवान स्वीकार कर लेते हैं। हमें चाहिए मन वचन और कर्म से अब जब से जागृत हुए तो हम अपने गुरु वाणी की शरण में हो जाए। हम अपने वाहेग गुरु की शरण में हो जाए। परमात्मा की शरण में हो जाए, अकाल पुरुष की शरण में हो जाए जिससे हमारा काम बन जाए। शरणागति हृदय से होती है।

यह आर भाव है कि ना मेरे से कोई जप तप बना, ना मेरे से साधु सेवा बनी। अब तो प्रभु मेरा जीवन व्यर्थ ही है। मैं आपकी शरण में हूं। हे वाहगुरु हे परमात्मा आप खुद शर्मा मतलब आप खुद इस बात की लाज रखो कि मैं आपकी शरण में हूं। अब मेरी गति और दुर्गति आपके हाथ में है। जी संगीता जी दिल्ली से श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मेरा यह पापी मन ना तो वाणी पाठ में लगता है ना ही माला जप में लगता है। श्री जी की सेवा में तो बिल्कुल नहीं लगता। बस सांसारिक राग द्वेष प्रपंच और भोगों में ही भटकता रहता है।

इस पापी मन हम देखो मन को एक कोस करके अपने को छूट दे रहे हैं। गलत बात है। अगर आप केवल मन को कोसेंगे और अपने को छूट दे देंगे तो दुर्गति हो जाएगी। हम बोले राधा बोलो राधा राधा राधा राधा क्या करेगा मन? क्या करेगा मन? अब जब हम राधा राधा राधा की रट लगा रहे हैं तो हमारा मन क्या करेगा? अपने आप पवित्र हो जाएगा। अपने आप ठीक हो जाएगा। अब हम कहें कि मन से नाम जप हो तो सिद्धों का होता है। मन से नाम जप सिद्धों का होता है। साधकों को नाम जप वाणी से करना होता है। इसलिए वाणी से खूब नाम जप करो।

अब मन लगे ना लगे। नाम जप चल रहा है वाणी में आपका परम कल्याण हो जाएगा। देखो मन की चक्कर में मत फंसो। अगर मन की चक्कर में फसोगे तो दुर्गति कर देगा। ये हमको नाम पकड़ना है। जबरदस्ती पकड़ना है। नियम पूर्वक जप इसीलिए हम काउंटर को बहुत अच्छा समझते हैं। जो काउंटर आज चला है आधुनिक ना कि भाई आज हमने 10,000 नाम जप किया। आज हमने 12,000 नाम जप किया। आज हमने 500 नाम जप किया। करना चाहिए। इससे उत्साह बढ़ता है और कैसे भी हो नाम तो जिभ्या से चल रहा है ना। इसलिए तुम्हारा परम मंगल हो जाएगा।

काउंटर आदि ये बहुत उत्साह पैदा करते हैं कि आज हमने इतना नाम जप किया। आज हमने इतना नाम जप किया। इसलिए करना चाहिए। सबको करना चाहिए। 5000 नाम रोज जपना शुरू कीजिए। फिर आगे बढ़िए। शुरू करेंगी। हां ऐसे राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा 5000 बार राधा राधा कहो मन लगे ना लगे फिर आप देखो कैसा आनंद आने लगेगा धीरे-धीरे। सुमन जी पंजाब से महाराज जी दुख में भजन छूट जाता है तो महाराज जी ऐसे में कैसे दुख में भजन तो अधिक होता है इसका मतलब आपका भजन में अभ्यास नहीं है इसीलिए है ऐसा जो दुख में भजन नहीं कर पाता वो सुख में क्या भजन करता है अनुकूलता का कहीं भजन होता है भजन तो हमें तो लगता है दुख में ज्यादा होता जब प्रतिकूलता, अपमान, निंदा, विपत्ति, दुख यह घेरे हो तो हमारा चित्त भगवान में स्थित होना चाहिए।

तभी माना जाएगा वो भजन करता है। नहीं तो फिर भजन क्या दुख में आया और भजन भूल गए, प्रभु का सुमिरन भूल गए। इसका मतलब भजन ठीक नहीं है। अभी भजन ठीक नहीं है। भजन को ठीक करो। अभ्यास ठीक करो। भजन का। दुख में भी हमारी चित्तवृत्ति भगवान में लगनी चाहिए। अधिक लगनी चाहिए। कुंती जी ने तो भगवान से दुख ही मांगा कि हर समय दुख एक ऐसा है जो भगवान का स्मरण कराता है। तो कुंती जी ने भगवान से कहा मुझे सदैव दुख प्रदान कीजिए। भगवान से कहा विपत्ति दीजिए। पग पग पर विपत्ति दीजिए जिससे मैं आपका स्मरण कर सकूं।

तो अभ्यास ठीक करो। दुख में तो और भजन होना चाहिए। जी जब दुख आता है ना तो फिर हम बहुत झगड़ा करते हैं उनसे और नहीं तो ऐसा प्रेम थोड़ी प्रेमी से अपने सुख थोड़ी मानते हैं। प्रेमी का सुख देखते हैं। अगर भगवान से प्यार है भगवान को अपना मानते हो तो जोई जोई प्यारो करे सोई मोह भावे। जिसमें प्रभु राजी है उसमें हमें राजी होना चाहिए। हम लोग सुख के गुलाम हो चुके हैं। इंद्रिय सुख के गुलाम हो चुके हैं। तो हम भगवान से इंद्रिय सुख मांगते ना दे तो हमारी अश्रद्धा हो जाती।

ये गलत सिद्धांत है। कोई भक्ति का सिद्धांत नहीं है। ये कोई अध्यात्म का सिद्धांत नहीं है। मनमुखी बात है। ऐसा ठीक नहीं बच्चा। मनुष्य जीवन इसलिए नहीं मिला है। मनुष्य जीवन मिला है। दुख सुख में सम होकर भगवान का भजन किया जाए। भगवान से प्रार्थना की जाए। इतनी प्रार्थना तो की जा सकती है नाथ दुख में हमको दुख सहने की सामर्थ्य दो और सुख में दूसरों को सुख प्रदान करने की भावना दो अगर हमारे पास सुख है तो हम परोपकार करें दूसरों को सुख प्रदान करें और दुख है तो मुझे सहने की क्षमता दो जिससे मैं आपके द्वारा प्रदत्त दुख को सहकर आपका स्मरण कर सकूं तब तो ठीक है नहीं तो फिर वो ठीक बात नहीं है यह सांसारिक बात है राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जिस समय जीवात्मा शरीर छोड़ता है वह अपने सभी शरीर संबंधियों को भूल जाता है और कर्म अनुसार अन्य योनियों को प्राप्त होता है तो उसके लिए जो पूजा पाठ धार्मिक अनुष्ठान जैसे तर्पण इत्यादि किए जाते हैं तो उसका क्या महत्व महाराज जी जीवात्मा को प्राप्त होता है क्या हां वो प्राप्त होता है ये भागवती संस्कार जैसे आपने पंडित लोग संकल्प कराते हैं ना जिसके नाम से तो संकल्प करा करके जो ही मंत्र पढ़कर उसको पिंडदान किया या उसके निमित्त भंडारा किया गया या उसके निमित्त पुण्य दिया गया तो वह पुण्य जो है वहां पहुंच जाएगा।

जिस देवता को साक्षी करके किया गया वो देवता उसको पहुंचाएगा। चाहे जिस योनि में हो उसकी उन्नति होने लगेगी। वो पुण्य उसको बढ़ा देगा। वो पुण्य उसकी तृप्ति करने लगेगा। उसकी उन्नति कर देगा। तो ये हमारे धर्म शास्त्रों का जो नियम है ये कोई व्यर्थ नहीं कि वो मर गया तो वो कौन नहीं ट्रांसफर होता है। हम जब इधर से भेजेंगे तो हम इसीलिए तो भगवान को साक्षी किया जाता है। देवता को साक्षी किया जाता है। मंत्र जो है देवताओं के ही तो होते हैं। तो वो देवता वो भगवान के पास भगवान उसको वहां पहुंचाते हैं।

जो जीव जहां होता है उसकी उन्नति हो जाती है। ये पक्का समझो इसमें अविश्वास नहीं करना चाहिए। खूब नाम जप करना चाहिए। खूब उनके लिए संत जवाने चाहिए पवाने चाहिए तीर्थ याटन करना चाहिए पिंडदान करना चाहिए तो हमारे माता-पिता या जो सगे संबंधी हैं उनकी उन्नति हो जाएगी उनका कल्याण हो जाएगा उनका मंगल हो जाएगा पितरों में और पूर्वजों में क्या डिफरेंस होता है एक ही बात है वही पूर्वज जाकर पितर बनते हैं जाके वही पूर्वज जो हमारे हैं ना वही पितर होते हैं वैसे पितर लोक है पितरों के स्वामी आर्यमा है जितने हमारे पूर्वज होते हैं वो जाकर के पितर लोक में तो पितर लोक अगर अगर वो कहीं अन्य जगह गए हुए हैं तो पीतालोक से वहां ट्रांसफर हो जाएगा।

पूर्णिमा पहुंच जाएगा। ये डिपार्टमेंट अलग-अलग बना हुआ है। पंकज जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी YouTube के माध्यम से काफी वर्षों से आपको सुन रहा हूं। आपकी बातों को जीवन में उतारने का प्रयास भी कर रहा हूं। महाराज जी मेरा प्रश्न है कि जब आपने सन्यास लिया और घर रिश्ते नाते त्याग दिए तो शुरू के कुछ महीनों में आपको अत्यंत प्रतिकूलता का सामना करना पड़ा होगा। उन विश्वास पूरे जीवन भर प्रतिकूलता ही प्रतिकूलता सहता रहा हूं। आज क्या आप हमें अनुकूल समझ रहे हैं।

दोनों किडनी खराब है। कोई अंग ऐसा नहीं जो हमारा दर्द न कर रहा हो। तो बचपन से लेकर अभी तक प्रतिकूलता ही प्रतिकूलता। तो प्रतिकूलता मेरी अनुकूलता बन गई है। समझ रहे हो ना? दुख सहते सहते दुख मेरा साथी बन गया है। इसलिए मुझे अब दुख से परेशानी नहीं रहती। अब दुख अपमान निंदा इनसे मुझे प्यार हो गया है। पूरे जीवन भर चलते चलते मुझे इनसे प्यार हो। अब और कष्ट बढ़ता है तो मुझे और सुख मिलता है। जाना है। शरीर को छूटना है। मैं शरीर नहीं हूं। ये नाशवान है। मैं भगवान का दास हूं।

वो अविनाशी स्वरूप हमारा है जो चिदानंदमय सेवा में भगवान की जाता है। इसलिए हां पहले दिन हमारे विश्वास को भगवान शंकर ने पुष्ट किया। जब मैं 13 वर्ष का शरीर था तो शाम के माताजी से केवल बताया। पिताजी से तो हिम्मत नहीं थी क्योंकि बहुत कठोर स्वभाव के थे। तो उनसे डर लगता था बात करने में तो माताजी से कहा कि माता जी हम कल बाबा जी बन जाएंगे। बाबा जी बन जाएंगे। उन्होंने विनोद समझा और हमारी बात बन गई क्योंकि उन्होंने विनोद समझा। अगर सीरियस समझती तो रो देती या कुछ हमको आदेश करती और उन्होंने विनोद समझा तो ध्यान ही नहीं दिया भगवान ने हमारी बात बना दी सब सो रहे थे उठे पिताजी को मानसिक प्रणाम किया सैया पर थे माताजी को प्रणाम किया भाई बहनों को हाथ जोड़ा और एक छोटी सी गीता और एक ब्राह्मण कुल में जन्मे थे इसलिए चटाई और वो एक लोटा क्योंकि गायत्री यज्ञपित हो जाता है ना तो गायत्री के लिए उतना लेकर बस वो तो फिर घर से भागे पैजामा कुर्ता या ऐसा पट शर्ट आधा पट या शर्ट या पैजामा कुर्ता क्या था मुझे ध्यान नहीं है उस समय मतलब गृहस्ती वेस में ही भागे और 15 किलोमीटर चलने के बाद थक गए तो एक शंकर जी का मंदिर आता है नंदेश्वर सरसोल में सरसोल ब्लॉक में नंद नंदश्वर महादेव वहां जंगल में जाकर के रुके अब जब 12:00 बजे भूख लगी क्योंकि सुबह से कुछ ना कुछ घर में मिल जाता था।

अब सुबह तो मिला नहीं चलते चले आए। अब दोपहर के 12:00 बज गए भूख लगी। तो पहली बार हमारे मन में प्रश्न उठा कि कैसे जीवन निर्वाह होगा? जीवन निर्वाह कैसे होगा? कहां रहेंगे? कहां जाओगे? तुरंत हमका ये तो हमको परास्त कर देगा प्रश्न। तुरंत हमका भगवान जैसे रखेंगे। हम भूखों मर जाएंगे लेकिन घर नहीं जाएंगे। हर कष्ट सहेंगे। इतने में एक आदमी आ गया। हमारे विश्वास को भगवान ने तुरंत पुष्ट किया। एक आदमी आ गया। उसने कहा बच्चा यहां एक सुर स्वामी रहते थे। जानते हो क्या?

तो हम कहा हम यहां नए आए हम जानते किसी को नहीं। तो कमंडल खुला और एक लीटर दही होगा। मीठा दही गांव के दूध गढ़वा का लाल लाल दही लाल रंग का हो गया। उन्होंने कहा तुम पी लो। अब हम वापस नहीं ले जाएंगे। उनके लिए लाए थे। वो है नहीं तो आप पी लो। वो संत कहीं चले गए होंगे। तो हमें सब कुछ लगे। हम कहा हम क्यों पी ले? बोले नहीं पी लो। महादेव जी की ऐसी इच्छा है। तो उसी लोटे में डाल के तीन चार लोटा निकला। छोटा लोटा था और जब वो गए तो एक लीटर दही में खूब छक गए ना। बस जो ही गए सो शंकर जी के ऐसे पिंडी को पकड़ के खूब रोए कि हमें विश्वास हो गया कि हमारे जीवन का आप पार करेंगे आप स्वीकार करेंगे बस वो दिन कि आज दिन कभी घर नहीं याद आया कभी घर नहीं गए कभी परिवार से एक रोटी नहीं खाई आज तक अपने जन्मभूमि की एक रोटी आज तक नहीं खाई जब से घर से निकले भगवान की कृपा से बहुत बड़ी जीवन यात्रा कट गई।

अब मतलब हम किसी आश्रम या ऐसा हमारा उद्देश्य नहीं रहा। इसलिए हम कहीं रुकते नहीं थे। एक दिन रुके, दो दिन रुके, चार दिन रुके। कोई विरक्त स्थान और भजनानंदी संत तो फिर साल दो साल रुक जाते। जैसे सेनपुर में रुके, निबुआ घाट में रुके। ऐसे ऐसे स्थानों में रुके, घटिया घाट में रुके। नहीं तो ऋषिकेश से लेकर बनारस तक यही हमारा रोड था। बस यही घूमना गंगा के किनारे और जो प्रारब्ध वसात मिल जाए वही खा लेना किसी से कुछ कहना नहीं मांगना नहीं कभी स्वेटर नहीं पहनना कभी साल नहीं उड़ा कभी कंबल नहीं उड़ा इतने दिनों में अब जैसे शरीर रुग्ण है तो अब ये सब सुविधाएं स्वीकार नहीं तो इन सुविधाओं से बता रहे हैं ना हमें सुविधा सुख और सम्मान और प्रशंसा इससे हमें परहेज है ये सब हो रहा है अंदर आपको सच्ची बता कोई हम मतलब अहंकार या सफाई की बात रही है।

इसका कोई महत्व नहीं ये सब मायाकृत लीला हो रही है। तो जो हमें दुख की बात रही तो पहले हमें कष्ट लगता था। जब कष्ट लगता तो मुझे भगवान प्राप्त करना है। हे चुप शांत सह लो चुपचाप सह लो हम दो श्लोक गीता जी के ये बहुत हमें काम दिए पहला मात्रा स्पते शीतोष् सुख दुखदा आगमा पनो अनित भारत और दूसरा यम ही नथते पुरुषम पुरुष सब सम दुखा सुखाध स्वत कल्पते जहां हमारा मन हमको विचित करता सो श्लोक इनका अर्थ विचार करने लगते भगवान ने कहा हे चुप शांत सह सहते सहते सहते सहते भगवान ने श्री धाम वृंदावन का वास देकर अब यहां पूर्णता कर दी।

अब हमें कुछ नहीं चाहिए। अब हमारे अंदर की कोई सांसारिक मांग नहीं रह गई कि अब हमको यह सुख सुविधा मिले या कुछ बस एक ही बात रह गई कि मैं प्रभु को कहीं भूल ना जाऊं। एक डर बना रहता है। मैं कहीं इस बाजार में अपने प्रभु को ना भूल जाऊं। इसलिए उनसे यही प्रार्थना करते रहते हैं कि पूरे जीवन आपके चरणों में गया। अब कहीं आखरी में लाकर ऐसी खंदक में मत डाल देना कि आपको भूल जाए। यश कीर्ति प्रशंसा सब वैभव कहीं ऐसा ना हो नाथ आपको भूल जाए क्योंकि हमारा लक्ष्य ये नहीं है।

हमारा लक्ष्य आप है। आपको कभी भूलूं नहीं। तो दुख तो हमारे जीवन का मित्र रहा है और वही मित्र हमको भगवान से जोड़ दिया। तो यह जीवन कथा है हमारी पीछे से लेकर के अभी तक की महाराज जी हम पर भी दया कीजिए कि हम भी भजन नहीं छूटे हमारा हां यही सबसे बड़ी बात है भजन ना छूटे यही सार बात है सार बात यही है कि महाराज जी सांसारिक जीव जो हम जैसे हैं उनको तो एकांत काटने को दौड़ता है महाराज जी हमें समाज काटने को दौड़ता है। आपको हमारा मन जो है वो सही पूछो तो आज हमारा मन उस बात को लेकर के ललचाता है जिस बात को भगवान ने हमें पहले दिया था।

जो गंगा किनारे का जीवन था उस बात को लेकर ललचाता है लेकिन अब हम असमर्थ हैं। अगर हमारा शरीर स्वस्थ होता तो आपको सही कहते ये सौभाग्य आप लोगों को ना मिलता। हमको ये सब अच्छा नहीं लगता है। पूरे भारतवर्ष के जो गृहस्थ और ब्रह्मचारी हैं उनके संशय मिट जाए। पूरे भारतवर्ष के लाडली जो ऐसी कृपा करें कि उनके जो गृहस्थ हैं या ब्रह्मचारी भी हैं उनके सबके संशय मिट जाए जो आप कर रहे हैं। प्रयास आप संतों की कृपा से यही है कि हमारे सब समाज अध्यात्म से जुड़े व्यभचार और व्यसन से विलग रहे।

जो आज हमारे समाज में व्यभचार बढ़ रहा है। बॉयफ्रेंड, गर्लफ्रेंड, लिविंग रिलेशन जो व्यसन बढ़ रहे हैं। नए-नए बच्चे गंदे आचरणों में लग रहे हैं। तो प्रार्थना यही करते हैं कि सब हमारे देशवासी विदेश का आचरण ना करें। विदेशी लोगों का अनुकरण ना करें। हमारा धर्म प्रधान देश है। हमारे देश को समझो। चार आश्रम चार वर्ण व्यवस्था बनाई गई है। पहला आश्रम ब्रह्मचर्य है सबका। सबको ब्रह्मचर्य का आज उसी पहले आश्रम को ही अगर नष्ट कर दिया गया तो हमारी कैसे धर्म व्यवस्था कैसे चलेगी?

धर्म व्यवस्था का पहला आश्रम ब्रह्मचर्य पहले आश्रम में ही व्यभचार प्रवेश कर गया तो फिर कैसे चलेगा? इसलिए आप सब संतों की कृपा से लाडली जो के द्वारा ये ऐसा हो रहा है कि कुछ लोग बदल भी रहे हैं। सुनसुन के लोग बदल भी रहे हैं। संत तो बदलेंगे। उनकी सीमाएं हैं। जी बदलने तक की सीमाएं वैसे संत तो असीमित है। जी उसकी बदलने की सीमा है। जी लेकिन सर्वेश्वर के लिए तो बदलने के लिए असीमित है। क्या इस कलिकाल से क्या करें? इससे निवेदन करने से मानेगा। क्या करेंगे? बड़ा त्राहतराई है।

बहुत वैसे वैसे युग धर्म का प्रभाव होता है इसलिए भगवान छूट दिए होते हैं और अपने संतों को पावर देकर रोकने का काम करते हैं। वो कहा युग धर्म से के लिए नहीं अगर वह चाहे तो एक संकल्प मात्र से अनंत ब्रह्मांडों का एक मिनट में परिवर्तन हो जाए। अब हम लोग तो दीपक की तरह हैं। तो अपना अपना उजाला प्रकाश का कोई 10 को संभाल रहा है, कोई 100 को संभाल रहा है, कोई हजार को संभाल रहा है। लेकिन पूरी सृष्टि को संभालना तो सिर्फ सर्वेश्वर भगवान के ऊपर है। पर युग धर्म के अनुसार वो भी छूट देते हैं।

क्योंकि शास्त्रों में लिखा हुआ है। जैसे कलयुग का प्रभाव है तो शास्त्रों में लिखा हुआ है। तो इसीलिए उसका प्रभाव अपना पड़ेगा। पर संत जन लड़ते रहते हैं। उसके प्रभाव को दबाते रहते हैं और भगवान की जय और अध्यात्म की जय बुलवाते रहते हैं। अध्यात्म का संस्कार प्रकाशित करते रहते हैं। सबको देख के बड़ा आनंद आता है। ठीक है। लेकिन ये सब संशय रहित कैसे हो पाएंगे? कलिकाल में बहुत मुश्किल है। सो कलिकाल कठिन उलगारी पाप परायण सब नर सब नर कल्पित कर अचारा जा वरन अनीति अपारा जी तो क्या सर्वेश्वर की लीला है हां सर्वेश्वर की लीला ही मानी हम लोगों के जो पुराने प्रारब्ध के भोग बाकी है वो हम भोग रहे नहीं महाराज जी युग धर्म का भी प्रभाव है कोई कितना भी बड़ा प्रतापी हो युग धर्म का प्रताप उसे युद्ध करेगा उसको परास्त करने की कोशिश करेगा अगर वो तपस्या और भगवत शरणागत है तो फिर कोई परास्त नहीं कर सकता है।

कलयुग का प्रभाव वही रहता है जहां भगवत नाम नहीं भगवत लीला कथा नहीं भगवान से चित्त नहीं जुड़ा वही कलयुग का प्रभाव पड़ता है। नहीं तो हमारी वाणी जी में लिखा हुआ है जो रसिकाचार्यों ने वाणी लिखी है राधा वल्लभ भजत भज भली भली सब होए जितते विनायक शुभ विघ्न करे नहीं कोई विघ्न करे नहीं कोई डरे कलिकाल कष्ट भय हरे सकल संताप हरस हरि नाम जपत जय कलयुग डरता है जहां भगवत नाम कीर्तन भगवत कथा भगवत वार्ता भगवत चिंतन होता है वहां कलयुग डरता है जैसे संकलो संघ शक्ति हम 100 साधक मिलकर नाम कीर्तन करते हैं तो हम हजारों को पवित्र कर देंगे।

हजार 2000 को पवित्र कर देंगे। ऐसे चलता है। लेकिन उसका प्रभाव तो चलेगा। जैसे गर्म हवा चलती तो सबको लगती है। प्रभाव मिट नहीं सकता। नहीं प्रभाव नहीं कल कल का प्रभाव नहीं मिटाया जा। नहीं। हम एक कोने से मिटाएंगे दूसरे कोने में परास्त कर देगा। इसीलिए संत जन तो लगे ही हैं। कल जो युग प्रभाव युग धर्म है यह भी क्या हमारे पुराने जन्मों के प्रारब्ध से ही हम लोगों को जन्म लेना पड़ा क्या? हां हां हां हां बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल ये तुम्हारा कलयुग में जन्म होगा।

हम तो इसके जब यह भोगना निश्चित है जी तो यह पूरा भोगना पड़ेगा या भजन से यह नष्ट प्रारब्ध नष्ट हो सकता है। भजन से हम इसको नष्ट कर सकते हैं। भजन मिटा सकता है। जो तप करे तुम्हारी कुमारी तो भाभी मेट सके भाभी मेट सके त्रिपुरारी इसके आगे एक निवेदन है। जी हरि इच्छा भावी बलवाना हृदय विचारत समजा तो हरि हरि इच्छा का जो स्वरूप होता है वो भक्तों की इच्छा से होता है भगवान की स्वयं की कोई इच्छा नहीं होती भगवान की स्वयं की कोई इच्छा नहीं होती अमना है भक्तों की इच्छा होती है अगर हम 10 मिलकर के तो भगवान का अवतार हो सकता है हां अगर हम 10 संत मिलकर के उस जाएंगे तो भगवान का ऐसा कृपा अवतार हो सकता है जो परिवर्तन कर सकता है।

जैसे हम जहां सैकड़ों साधु विराजमान है। आपको कलयुग का वहां कोई प्रभाव नजर नहीं आएगा। जो झूठ है, व्यभचार है, व्यसन है, जुआ खेलना है, परास्त्री से व्यभचार है। ये सब उसका प्रभाव नहीं आएगा। वहां आपको सतयुग, त्रेता का ही वातावरण मिलेगा। भगवन नाम कीर्तन भगवत कथा वार्ता कोई ध्यानस्थ है कोई मौन है कोई तप परायण है ऐसा आनंद बरसता है तो हम सब मिलकर के एक भगवान की शक्ति से जितना बचा सकते हैं लोगों को बचा सकते हैं बका युग धर्म अपना प्रभाव करेगा हां ये जो नारायण है सर ये भक्ति करते हैं जी तो माया जो है जी याद रहो मां ब्रह्मांड में माया कटु प्रचंड सेना सेनापति कामाद भट दंभ कपट पाखंड अंदर जी इन पे ज्यादा चोट कर रहा है या जो सामान्य है उन पे ज्यादा चोट कराए माया का प्रभाव महाराज जी जैसे गर्म हवा चलेगी तो समान रूप से सबको लगती है समान रूप से सबको लगती है पर जिसका कोमल शरीर होता है उसे विशेष लगती है तो ऐसे ही माया का प्रभाव तो चल रहा है समान रूप से पर जो संतों का हृदय बड़ा कोमल होता है उस पर विशेष प्रभाव पड़ता है उस उस पर विशेष प्रभाव पड़ता है।

विशेष प्रभाव हां क्योंकि जैसे जो गिरा हुआ है वो क्या गिरेगा? जो चल रहा है वही गिरेगा। अब इन पर अगर माया का प्रभाव पड़ेगा तो सीम की चाप सकर को तासु बफ रमापत जस सीम की चाप हम ताल ठोक के कहते हैं सीम की चाप सके कोतासु बल रखवाल रमापति अपने बल से नहीं अपने स्वामी के बल से कहते हैं कि आपकी एक शक्ति माया है और एक शक्ति भक्ति है। आप माया को अधीन करके रखते हैं और भक्ति आपको अधीन करके रखती है। हम इस बल से हैं इसलिए सीम की चाप से बड़े रखवा अच्छा ये कार्य कारण कार्य कारण जी कर कारण से ऊपर कैसे पहुंचा?

स्वरूप ही है। कारण हां स्वरूप ही है। जो हमारा स्वरूप है वो कार्य कारण से परे है। जब तक स्वरूप बोध नहीं होता तब तक कार्य कारण में सेवक स्वामी में यह सब भाव बने रहते हैं। जब स्वरूप बोध हो जाता है। फिर द्वैत है ही नहीं। ना कोई कार्य है और ना कोई कारण है। वही एक है स्वरूप बोध। जी यहां जिनके पास बिल्कुल धन नहीं है पहुंच नहीं सकते क्या जिनके पास बिल्कुल भी धन नहीं है जैसे धाम आदि में पहुंच नहीं सकते जी तो ये सब नारायण को आपके समान सामर्थ्य देके उनके पास भेजा जाए तो कैसा रहेगा हां पर अब समस्या यह है कि आग में झोंकना हम समस्या यह है कि आग में झोंकना ये किसी गृहस्थ स्त के घर जब रुकेंगे तो गृहस्थ के हावभाव और उससे यह प्रभावित हो जाएंगे।

जब तक ब्रह्म बोध नहीं होता या जब तक भगवत साक्षात्कार नहीं होता तब तक हम प्रचार का मतलब अधिकार नहीं समझते। बहुत अच्छा। प्रचार का अधिकारी वही है जो स्वरूप बोध संपन्न वही प्रचार का अधिकारी है। अभी इसके मतलब सब नारायण पूर्ण रूप से तैयार नहीं। बच्चे हैं। हां तो आप बैकुंठ से ज्यादा मजबूत स्थिति में इससे ज्यादा कुछ और नहीं ठीक है मजबूत स्थिति में होगी अपने को जीतना है कुछ नहीं जीतना कामना करनी है तो कामना को जीतने की कामना कर लोगे तो फिर जो महाराज बता रहे हैं कहीं भी सो जाओ सब मिट्टी है ठीक है ऐसी कृपा करो और ये सब नारायण तैयार हो जाए और ये ये आप संतों के चरण रज के प्रभाव से हो सकते हैं।

हमारी सामर्थ्य तो क्या है हम तो ला के खड़ा कर दिया अब तैयार आप सब संतों को करना भगवंत को करना सामर्थ्य वही सामर्थ साहब निमित्त मात्र दोतीस 98 97% ये सब युग धर्म का हम लोगों को कोई क्षमता नहीं हम क्षमतावान भी है तो वही कुछ भी कुछ भी लेकिन प्रभु सत्य बना रहे धर्म बना रहे धर्म नष्ट हो रहा सत्य नष्ट हो रहा है जिससे चेतना में प्रवेश करना चाहिए वो अंधकार में प्रवेश हम विश्व गुरु कैसे बने जब मेरे सब बच्चों में समान क्षमता है तभी हम किसी को कुछ बता सकते हम विश्व के गुरु बस आप ही कृपा करो और भगवान कृपा करे तो बस हो सकता है आप गुरु है आप परबह्म है आपकी कृपा महत्वपूर्ण है हम तो बस बहुत ही मांग और बहुत प्रसन्न हूं मैं बहुत आप सब लोग ऐसे ही शंकराचार्य भगवान की तरह पूरे विश्व को आलोक करो यही शुभच्छा है ओम जय हो जय हो विश्वनाथ जय हो विष्णु जय हो विश्वनाथ शुभम को ज्ञान ज्ञान भक्ति वैराग ज्ञान भक्ति वैराग सब भक्ति मनुष्य करता है गृहस्थ आश्रम में और सन्यासी आश्रम में भी तो क्या भक्ति में जैसे मन विचलित

होता है और भक्ति आती है फिर विचलित हो जाता है इसका क्या कारण अनेक जन्मों के भोग संस्कार जी दुर्वासना मम सदा परिकर्षयती जो अनेक जन्मों से हम भोगों को भोगते आए हैं वो संस्कार हमारे मन पे हैं। भक्ति के संस्कार तो आगंतुक है नए लेकिन जो भोगों के संस्कार हैं वो छुपे हुए हमारे मन में है। तो जैसेजैसे हम सतोगुण बढ़ता है तो ज्यादा देर मन भक्ति में लगेगा। रजोगुण बढ़ेगा तो भोगों में जाएगा। तमोगुण आएगा तो निद्रा आलस्य प्रमाद में जाएगा। जब हम सतोगुण को बढ़ाते चले जाए और हमारा अधिक समय सतोगुण रहे तो हमारा भक्ति का भाव बढ़ता चला जाएगा।

रजोगुण तमोगुण नष्ट हो जाएगा और जब भक्ति अपना रंग लाएगी तो सतोगुण भी शांत हो जाएगा और गुणातीत हो जाएगा तो फिर मन जाएगा ही नहीं अभ्यास करते रहना चाहिए प्रत्यक्ष रूप से आराम से इतना बड़ा कष्ट है कहीं भटक जाने का भी कष्ट नहीं। प्रकट रूप में महापुरुषों का सानिध्य नहीं मिल रहा इसलिए उसका कष्ट है और कहीं भटक ना जाऊं इसका भी डर है अंदर। ये बिल्कुल डरते रहोगे तो बच जाओगे। बहुत आकर्षण है माया का। बड़े-बड़े ज्ञानियों के चित्त में छोप पैदा कर देती है। बचा जा सकता है।

तो संतों की बावंडरी हो और उसके अंदर रह रहे हो तो बच सकते हैं। संत समुदाय के बीच में महाराज जी व्यक्त रूप से नहीं रह पा रहे तो अव्यक्त रूप से संतों का सानिध्य नाम जप से नाम जप करो। बड़े-बड़े संत स्वप्न में आकर उपदेश करने लगेंगे। नाम जप डट के नाम जप करो। उठते बैठते चलते फिरते हर समय नाम जप करो। फिर हमारी बात का आप अनुभव करना। हम क्या कह रहे थे नाम जप करो जो भगवान का नाम प्रिय हो हर समय नाम जपो पर जी फिर एक प्रश्न आता है कि नाम जब जप करते हैं 10 माला कर ली 12 माला तो क्या निरंतरता लानी पड़ती हां ना ये 10 12 वाला वाली बात नहीं ये हर श्वास वाली बात है कोई भी सेवा कर रहे हैं कोई भी सेवा कर बहुत सारे कार्य बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल आप कुछ दिन निरंतर नाम चला कर देखो फिर आपको कैसा लगता है आप खुद बताना हमें महाराज थोड़े दिन होता है फिर वापस नहीं व्यवहार में उतरना हां व्यवहार में उतरना साधक को बहुत घातक है।

बहुत घातक है। मतलब हम कैसे तुम्हें बताएं साधक को बहुत घातक है। व्यवहार में संभल पाना बड़ा कठिन है। हमें लगता है कुछ दिन एकांत का सेवन अगर करो तो ज्यादा अच्छा रहेगा। अगर कहीं ऐसा मिले कि संत समागम मिलता रहे और एकांत में खूब अच्छी साधना हो। भगवत साक्षात्कार हो जाए। फिर व्यवहार में उतरे तो कोई परेशानी नहीं होती। यह महाराज जी द्वंद चलता है। व्यवहार छोड़ के वापस जाते तो वह लोग कहेंगे गौ सेवा छोड़ के चले गए। इधर छोड़ के चले गए। वह भी वापस समाज का भय और नाम जप करो गौ सेवा करते रहो बचते रहो।

भक्ति पथ पे चलने के लिए क्या रास्ता है? गुरुदेव के चरणों का सुदृढ़ आश्रय। जी गुरुदेव के चरणों का सुदृढ़ आश्रय अगर गुरुदेव के चरणों का सुदृढ़ आश्रय नहीं है तो मन मुखी आचरण करने से हम भगवान की भक्ति नहीं प्राप्त कर सकते 64 भक्ति के अंगों में सबसे पहला अंग है गुरु पादाश्रया गुरु के चरणों का आश्रय और वैसे भी भक्ति का प्रारंभ भी जो होता है प्रथम भगत संतन कर संगा तो संत महापुरुषों के संग से गुरुदेव का वर्णन और गुरुदेव के श्री मुख से निकले हुए नाम मंत्र का निरंतर जटन और वैसा ही आचरण तब हम भक्ति पथ पर चल पाएंगे।

नहीं कल का प्रभाव ऐसा है कि पाखंड और दंभ में परास्त कर देगा। युग धर्म इतना प्रबल है कि पाखंड और दंभ की इतनी प्रबलता फटाक से घुस जाएगा और हम भक्ति समझ नहीं पाएंगे। समझ पा रहे रहेंगे कि भक्ति कर रहे हैं और हम पाखंड और दंभ में अपना समय व्यतीत करने लगेंगे। जब आंतरिक वस्तु की प्राप्ति की लालसा खो जाए और बाहरी वस्तु की लालसा लग जाए तो समझ लो दंभ और पाखंड का प्रादुर्भाव हो गया। तो हम लोग चलते तो हैं भगवान की प्राप्ति के लिए लेकिन बीच में कलयुग ऐसी टांग मार देता है कि हम कंचन कामिनी कीर्ति में ही फंसकर गिर जाते हैं और भगवान की प्राप्ति की लालसा खो बैठते हैं।

नहीं तो जिस वैराग्य से हम घर से निकले थे उसी वैराग्य से हमारा वैराग्य प्रतिफल बढ़ना चाहिए और समस्त लोकलों के भोगों से वैराग्य प्राप्त करके भगवान के अनुराग में डूब जाना चाहिए। यह होता है गुरु कृपा से। इसलिए गुरु पादाश्रया बिना गुरु के चरणों का आश्रय लिए कोई भी साधक सिद्ध नहीं हो सकता। जी महाराज जी आप सब गस्थ में रहते हैं पर गस्थ की बहुत सारी ऐसी जिम्मेदारियां होती हैं। परिवार की जिम्मेदारियां होती हैं। गृहस्थ कार्य होते हैं। ऑफिस जाना होता है। ऐसे में भजन बहुत बाधित होता है और करना भी चाहे तो हो नहीं पाता।

महाराज जी ऐसे में आपका महाराज जी करना चाहे तो हो नहीं पाता। ऐसी बात तो नहीं है क्योंकि युद्ध से बढ़कर के कोई कर्तव्य कर्म मुझे तो समझ में नहीं आता। जब भगवान ने अर्जुन जी से कहा मामुन स्मरण युद्ध च मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो तो हमें लगता है कि हर कार्य भगवान का भजन करते हुए हो सकता है। यदि हम सावधानी रखें तो अब जो कार्य एकाग्रता पूर्वक ऑफिस में व्यापार में या जिस भी डिपार्टमेंट में है कि आप बहुत एकाग्र हो जाते हैं तो भगवान का नाम भूल जाते हैं। तो हमने एक उपाय बताया है उस कर्म को भी भगवान को समर्पित कर देना।

जो कर्म भगवान को समर्पित कर दिया जाता है वो भगवान की प्राप्ति कराने योग्य हो जाता है। तो जब हम एकाग्र होकर अपना कार्य कर रहे हो भगवान को भूल गए हो तो वो कर्म भगवान को समर्पित कर दें और शेष समय बार-बार आप ऐसा प्रयास करें कि राधा राधा राम राम कृष्ण कृष्ण हरि हरि शिव शिव जिसको जो प्रिय लगे वो नाम बराबर जपने का प्रयास करें। ऑफिस जा रहे हैं नाम जप कर रहे हैं। बैठ गए नाम जप कर रहे हैं। लैपटॉप में काम कर रहे हैं। एक घंटा काम किया कृष्णपणमस्तु। एक घंटे को कृष्ण अर्पणमस्तु कर दिया।

फिर नाम जप कर रहे हैं। फिर समय को भगवान को अर्पित कर दिया। ऐसे आठ घंटे या 12 घंटे जो हम ड्यूटी करते हैं, जो काम करते हैं, वो सब भगवान को समर्पित कर दें और बीच-बीच में नाम जपने का प्रयास करें तो जरूर सफलता प्राप्त होगी। क्योंकि जब युद्ध जैसा भयानक कर्म भगवान का नाम जप करते हुए किया जा सकता है तो और भी कर्म भगवान का नाम जप करते हुए किया जा सकता है। इसलिए सबसे प्रार्थना है आप प्रयास कीजिए हारिएगा नहीं उत्साह बढ़ाइए और हर कार्य के बीच में राधा राधा बोल लीजिए।

फिर कार्य करते रहिए तो आपका परम मंगल हो जाएगा। सारे दुख नष्ट हो जाएंगे। भगवान के नाम में पाप नाशक शक्ति है। जब पाप नष्ट हो जाएंगे तो दुख ही नहीं रहेगा। इसलिए हमें लगता है खूब नाम जप करो। मन के चक्कर में मत पड़ो। मन लगे ना लगे तुम खूब नाम जप करो। तुम्हारा मंगल ही होगा। भाव कुभाव अनलसहु नाम जपत मंगल दश राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की वृंदावन धाम की सगुरुदेव भगवान की जय

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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