॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1101 · 22 नवंबर 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की जय श्री वृंदावन धाम की सदगुरुदेव भगवान की जय उमाकांत त्रिपाठी जी कानपुर राधेधे महाराज जी महाराज जी लगभग 11 महीनों से आपका एकांतिक वार्तालाप व सत्संग दोनों टीवी के पर सुन रहा हूं।

तब से मैं श्री शंकर जी व श्री राधा जी का नाम बराबर नाम जप करता हूं। जब से मैंने आपसे यह सुना है कि नाम जप किसी एक भगवान का ही करना चाहिए। मैं अपने मन से यह तय नहीं कर पा रहा कि मुझे किसका जप करें यह समाधान आप ही कर दें तो ठीक रहेगा। अगर आप हमसे कराते हैं तो भगवान शंकर की कृपा से ही हमको ये मार्ग मिला और राधा नाम जपने को मिला। तो मान लीजिए भगवान शंकर अब आप पर कृपा कर रहे हैं और राधा राधा नाम जप कीजिएगा। जी ऋतु जी राधे-राधे जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी शुभ और अशुभ कर्मों का फल तो इंसान को भोगना ही पड़ता है।

फिर नाम जप करने से अशुभ कर्मों का फल कम भोगना पड़ता है अथवा ना ही भोगना पड़ता है। या क्या इसका विधान है? नाम जप करने से संचित कर्म भस्म हो जाते हैं। जो हमारे गोदाम जमा है। संचित कर्म मतलब एक कर्मों का गोदाम जो अनेकों जन्मों के पाप पुण्य है। वो भस्म हो जाते हैं। उसी से हमारा बार-बार जन्म मरण होता है। तो जब हम नाम जप करते हैं दो चार नाम से नहीं खूब लंबे समय तक तो धीरे-धीरे वह नष्ट होने लगता है। नाम जप से प्रारब्ध भोगने की सामर्थ आती है। नाम जप से आगे पाप कर्म नहीं होंगे।

अगर हो जाते तो तत्काल भस्म हो जाते क्योंकि नाम जप चल रहा है तो नाम जप से क्रमाण पवित्र संचित भस्म और प्रारब्ध के भोगने के सामर्थ्य प्राप्त हो जाते हैं। जितेंद्र सिंह जी राधे-धे महाराज राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जो अनजाने में हुए पाप आचरण हुए हैं उसका इस जन्म के द्वारा कैसे दूर किया जाए कि अगला अनजाना अनजाना और जाना इसमें अंतर होता है। जैसे हम जा रहे हैं और अचानक पैर के नीचे चींटीची मर गई। हम चाह नहीं रहे थे। अनजाने में हो गया। जैसे हम गाड़ी में जा रहे हैं।

कितने जीव नीचे गाड़ी के पहहिए के नीचे मर रहे हैं। हम चाह नहीं रहे लेकिन हमें यात्रा करनी है तो अब चलना ही पड़ेगा। तो छोटे-मोटे जीव उसमें मर जाते हैं। जैसे किसान फावड़ा चला रहा है। वो चाह नहीं रहा पर कोई जीव कट जाता है। इसे कहते हैं अनजाने का पाप। तो यह जो अनजाने का पाप है यह स्वप्न आदि में नष्ट हो जाता है। जैसे स्वप्न में भयानक आपको पीड़ा दी जा रही है। आप भयानक दर्द से युक्त है और जगे तो कुछ नहीं। वह अनजाने के पाप स्वप्न में भोग ले। लेकिन जानकर जो हमसे पाप हुए उनको फिर शरीर का दंड भोगना पड़ता है।

फिर शारीरिक दंड से उसे भोगना पड़ता है। तो अनजाने में हमसे पाप तो जो होते हैं वो स्वप्न स्वप्न में सूक्ष्म शरीर के द्वारा भोग लिए जाते हैं और जाने में जो पाप होते हैं वो स्थूल शरीर को भोगना पड़ता है। तो अनजाना पन हम ऐसा नहीं कह सकते कि जो प्रगट में जानबूझकर पाप कह रहे हैं उन्हें अनजाना कह सकते हैं। अनजाना वही जिसे हमें पता नहीं है। वह अचानक घटना घट जाती है। हम गाड़ी से जा रहे हैं। कोई जानवर आया और लड़ के मर गया। अब वो कंट्रोल गाड़ी करतेकरते वो मर गया।

अब हमें पता थोड़ी था कि वो आ जाएगा। तो वह अनजाने का पाप है। लेकिन जानबूझकर गाय बैठी हुई है और हमने गाड़ी चढ़ा दी। यह जानबूझकर के पाप है। तो इसको आप देख लीजिए। अनजाने का पाप स्वप्न में नष्ट हो जाता है और जानबूझकर जो पाप किया जाता है शारीरिक दंड के द्वारा फिर पवित्र तो इस जीवन में ऐसा क्या करें कि आप जैसे महात्मा अगले जन्म में बन जाए हम भगवान का नाम जप करो भगवान के नाम जप से है पूर्व जन्म में हम कहीं ना कहीं भजन करने वाले ही थे तभी हमें बचपन से भजन मार्ग में लगा दिया गया 13 वर्ष की अवस्था थी उसी अवस्था उसके इसके पहले भी हम चालीसा पढ़ते थे।

छोटे बच्चे थे तब चालीसा और भगवान में शुरू से हमें याद है जब जितनी हमारी स्मृति है कि हमें बचपन से भगवान से अपनापन था और एक भयानक पीड़ा थी कि मुझे भगवत प्राप्ति होनी चाहिए। तो पूर्व का भजन था तभी तो ऐसा था। हमें किसी ने सिखाया नहीं है कि सत्संग मिला हो। सत्संग के बाद हमें ज्ञान हुआ हो। फिर हम बाबा जी बने हो। ऐसा नहीं। हमें आकर्षित किया गया है। मतलब पूर्व जन्म का भजन ही हमको भगवान के मार्ग में लगाया। तो अगर हम इस जन्म में भजन करें तो इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

अगर नहीं हुई तो अगले जन्म में फिर ऐसा अवसर मिल सकता है। ऐसा अवसर मिल सकता है। पर भजन करना पड़ेगा। भजन से ही ऐसा हो सकता है। भजन के बिना ऐसा रहेगा। डॉक्टर अपेक्षा जी राधे-राधे। राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आप कह रहे हैं कि जैसे हमें मोक्ष की प्राप्ति करनी है और हम किसी भगवान की विग्रह से प्रीति कर लेते हैं या उनके प्रति राग उत्पन्न हो जाता है तो फिर यह कहीं मोक्ष में बाधा तो नहीं बन पाएगा। अरे नहीं नहीं नहीं भगवान से प्रेम कहीं बाधा पहुंचा सकता है।

अरे मोक्ष प्राप्त ही भगवान की कृपा से होता है। बिना भगवान से प्रेम किए मोक्ष प्राप्त हो ही नहीं सकता है। वही भगवान गुरुदेव हैं। देखो मोक्ष मूलम गुरु कृपा ध्यान मूलम गुरु मूर्ति पूजा मूलम गुरु पदम मंत्र मूलम गुरु वाक्यम मोक्ष मूलम गुरु कृपा हरि कृपा ही तो मोक्ष प्रदान करती है तो भगवान से प्रेम भगवान के विग्रह से नाम से प्रेम धाम से प्रेम यही तो मोक्ष प्रदान करता है या शुद्ध ब्रह्म ज्ञान हो जाए तो मोक्ष प्राप्त हो या हरि की कृपा से मोक्ष प्राप्त हो अगर मोक्ष की अभिलाषा रखकर भगवान का भजन किया जाए तो भगवान मोक्ष प्रदान कर देते हैं।

लेकिन जहां भगवान का भजन शुद्ध रूप से होता है तो प्रेम की अभिलाषा जग जाती है। मोक्ष की चाह मिट जाती है और लगता है ऐसे सुंदर भगवान से प्रेम करें। ऐसे कृपालु भगवान से प्रेम करें तो फिर हृदय प्रेम की तरफ जब बढ़ता है तो फिर मोक्ष मार्ग बंद हो जाता है और वो भगवान के दिव्य धाम में जाकर भगवान के साथ रहता है। भगवान की दिव्य लीलाओं में सम्मिलित हो जाता है। प्रांजलल पांडे जी राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं एक विद्यार्थी हूं तो मुझे क्या सरस्वती जी का नाम जप करना चाहिए या गायत्री जी का?

हनुमान जी का या शिव जी का? क्योंकि उनके नाम में मुझे ज्यादा प्रेम किसका है? यज्ञपित हो गया है। हां तो गायत्री अनुष्ठान करो। प्रातः काल अर्घ देते हो सूर्य को कभी-कभी नहीं नई अवस्था है। प्रातः काल उठो स्नान करो। आधा घंटे व्यायाम करो और इसके बाद भगवान सूर्य को अर्घ देते हुए गायत्री अनुष्ठान करो। गायत्री मंत्र जप करो। मान लो ना त्रिकाल संध्या सही तो दो काल की संध्या तो कर ही लो प्रातः काल और शायम की फिर देखो ज्ञान प्रकट होता है कि नहीं हां गायत्री जप करो और बीचबीच में नाम जप करो गायत्री जप पवित्र अवस्था में होता है स्नान आदि करके और शेष समय भगवान का नाम जप करो जो नाम प्रिय हो स्वामी करुणानंद जी रामकृष्ण मठ प्रयागराज महाराज जी प्रणाम महाराज जी मैं रामकृष्ण मठ प्रयारा से हूं।

रामकृष्ण मिशन में सेवा कार्य साधना का एक अंग है। महाराज जी इस सेवा कार्य के बीच अनवरत भगवत चिंतन बना रहे। इसके लिए हमें क्या प्रयास करना चाहिए? पहला तो लक्ष्य बनना चाहिए कि मुझे इसी जन्म में भगवत साक्षात्कार करना है। जब लक्ष्य बन जाता है तो उसमें दृढ़ता होती है। दूसरा हमारा आहार पवित्र होना चाहिए। तीसरा हमारा विचार पवित्र होना चाहिए। चौथा निरंतर नाम जप चलना चाहिए। पांचवा किसी महापुरुष की वाणी का नित्य स्वाध्याय होना चाहिए। श्री रामकृष्ण परमहंस जी है या विवेकानंद जी हैं।

इन्हीं की वाणी का नित्य स्वाध्याय होना चाहिए। विचार शुद्धि में यह ध्यान रखना है कि जैसे रामकृष्ण मिशन में सेवा मिशन है तो इसमें मरीज आते रहते हैं। तो इनमें भगवत भावना मरीजों में करते हुए और उनकी जो सेवा अच्छे से अच्छे हो सके दवा डॉक्टर आदि की सुविधा जुटाना और उनकी सेवा करवाना और वह सब सेवा भगवान को समर्पित कर देना और निरंतर नाम जपने का अभ्यास करना। यदि हम निरंतर नाम जप करेंगे तो हमारी वृत्ति भगवदाकार हो जाएगी। भगवत जैसे जैसे भजन बढ़ता है वैसे वैसे वैराग्य बढ़ता है।

जैसेजैसे वैराग्य बढ़ता है वैसे वैसे शुद्ध ज्ञान होता है और शुद्ध ज्ञान के द्वारा ही माया का नाश करके अविद्या का नाश करके जीव आत्म बोध प्राप्त करता है। आत्म स्वरूप का बोध ही मोक्ष पद प्रदान करता है। तो हमारा लक्ष्य होना चाहिए भगवत प्राप्ति या मोक्ष तब हमारे अंदर वो प्रबलता आती है भजन की दृढ़ता आती है भजन की जो हमारा लक्ष्य निश्चित हो जाए तो ऐसे ही जब हमारा लक्ष्य भगवत प्राप्ति हो जाता है तो हमारा मन और इंद्रिय जो भोगों की तरफ जा रहे हैं यही सबसे बड़ा विघ्न है।

साधक का सबसे बड़ा विघ्न है। इंद्रिय और मन का भोगों की तरफ जाना और अगर कहीं भोगों को भोगने लगा तब तो साधना ही नहीं रह गई। फिर किस बात का साधक वो तो मनोरंजन कर रहा है माया में जो इंद्रिय और मन को अपने अधीन करके शास्त्र सद्गुरु देव के बताए हुए साधना मार्ग में बहुत काल तक चलता है। वह सिद्धावस्था को प्राप्त हो पाता है। तो यह ध्यान रखें कि इंद्रिय और मन भोगों में ना जाए। निरंतर नाम जप करें। महापुरुषों की वाणियों का स्वाध्याय करें। पवित्र आहार करें और पवित्र विचार रखें तो सेवा करते हुए भी भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

समझ पा रहे हैं आप? जी आशुतोष विक्रम सिंह जी लखनऊ से। राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आप हमेशा भगवत प्राप्ति का उल्लेख करते हैं तो महाराज जी कृपया करके बताएं कि भगवत प्राप्ति का असली अर्थ है क्या? आवागमन से मुक्त होकर के भगवान में लीन हो जाना या भगवान के समीप पहुंच जाना। जैसे अपना मृत्यु लोक है ना इसमें बड़ा दुख है। यह जन्म, मरण, लाभ, हान, सुख, दुख इसमें दुख ही दुख है। जो सुख भी है वह भी दुख रूप है। भगवान का धाम है। जैसे वृंदावन, चिदानंद धाम, वैुंठ धाम, साकेतपुरी धाम, कैलाश धाम इनमें मरना नहीं है।

इनमें बुढ़ापा नहीं है। इनमें रोग नहीं है। इनमें सुख ही सुख है। परम आनंद है। तो हम भजन करके ऐसे लोक में पहुंचे, ऐसे धाम में पहुंचे जहां ऐसा नाशवान शरीर ना मिले। अविनाशी शरीर मिले और दिव्य भगवान के नाम रूप लीला गुण का आनंद लेते हुए वहां जीवन हम अनंत काल तक व्यतीत करें। एक तो यह है साकार उपासना और निराकार उपासना में भगवान में समा जाना। लीन हो जाना, मोक्ष हो जाना, अपना अस्तित्व मिट जाना यह होता है। तो यह जरूरी है। अगर नहीं करते तो फिर बहुत कीट पतंगा, पशु पक्षी 84 लाख योनियां हैं।

इन योनियों में हमें जाना पड़ेगा। आज हमें कोई परेशानी तो हम डॉक्टर को दिखा सकते हैं। लेकिन पशु पक्षी योनियों में हम डॉक्टर को तो नहीं दिखा सकते। अच्छा मरना निश्चित है। पता नहीं जवानी में मर जाए और मर गए तो मनुष्य जीवन में कर क्या पाए। अगर नाम जप नहीं किया, अच्छे कर्म नहीं किए तो फिर हमें 84 लाख योनियों में भटकना पड़ेगा। इसलिए हम सबसे प्रार्थना करते हैं क्योंकि सब कोई भगवत प्राप्ति नहीं कर सकता। का अधिकार है कर सकता है पर रुचि नहीं है। भोगों में इतनी रुचि हो गई है कि अगर भगवान भी चाहे तो वो उसको भोग दे दे वो याचना करेगा।

वो भगवान से नहीं मांगेगा कि आप मिल जाओ या मेरा मोक्ष हो जाए। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो भगवान के मार्ग में चलकर भगवान को प्राप्त करना चाहते हैं। देखो कितने लोग एक एकांतिक में आए हो। आप विचार कीजिए। बहुत कम लोग होते हैं जो अच्छे मार्ग का अनुसरण करते हैं और गंदे मार्ग का अनुसरण करने वाले लाखों लोग हैं। शराब की पार्टी हो फिर देख लो आप कितने लोग एकत्रित होते हैं। कोई ऐसी पार्टी हो जिसमें गंदा खानपान शराब हो यह सब मनमानी मनोरंजन हो देखो लाखों की भीड़ हो जाएगी और भगवान का प्रवचन होना है तो वही आएंगे जिनके अच्छे विचार हैं जो पवित्र भावना वाले हैं जो अपना कल्याण चाहते हैं अपना मंगल चाहते हैं इसलिए संतों का कार्य है जीव के अंदर भगवत प्राप्ति की जागृति करना कि मुझे भगवान चाहिए बुरे आचरणों का त्याग करवाकर अच्छे आचरणों में लगाना इसीलिए हम दो काम ज्यादातर कहते हैं नाम जप करो और पवित्र आचरण रखो और भगवत प्राप्ति का लक्ष्य बना लो।

समझ रहे हैं? जी ईशा जी लखनऊ से राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी व्यतिरेक पद्धति के अनुसार ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या तो फिर जगत में रहते हुए लोक व्यवहार सीख के अनुसार आचरण करना सीखना क्यों आवश्यक है? क्योंकि हमें एक नाटक मिला है ना। नाटक भी तो मिथ्या होता है। जो नाटक होता है मतलब जैसे फिल्म है कोई या कोई नाटक होता है तो वो भी तो झूठा होता है। लेकिन उसमें रोल परफेक्ट किया जाता है कि नहीं किया जाता? परफेक्ट रोल नहीं होगा तो निकाल दिए जाओगे। तो इस जगत नाटक में तुम्हें एक परफेक्ट रोल करना है।

पर हम तो इसी को असली मान के ही चल रहे हैं। इसीलिए तो दुर्गति हो जाती है। इसीलिए दुर्गति हो जाती है। इसके डायरेक्टर हैं भगवान। आपको रोल दिया है। किसी को पत्नी का रोल दिया, बहन का रोल दिया, मां का रोल दिया। बहुत से रोल दिए हैं। तो जो जो जहां जैसा हमें रोल मिला है, स्वांग मिला है, वैसा हम परफेक्ट करें तो हमें डायरेक्टर की प्रसन्नता प्राप्त हो जाएगी और वो हमको इस रोल से बाहर कर देगा। अपने साथ रख लेगा। अपनी दिव्य लीला में ले जाएगा। दिव्य आनंद में ले जाएगा।

तो हमको यहां रोल करना ही पड़ेगा। झूठा है पर हमको रोल करना पड़ेगा। जो स्वांग मिला है, जो नाटक मिला है, पति का नाटक, भाई का नाटक, गुरु का नाटक, शिष्य का नाटक, जो नाटक मिला है, उसमें परफेक्ट आप रोल अदा कीजिए तो भगवान प्रसन्न हो जाएंगे। जगत नाटक वैभवा गोपाल शास्त्र नाम में एक भगवान का नाम आता है। जगन्नाटक वैभवा। ये जगत रूपी नाटक का वैभव वो स्वयं प्रकाशित किए हुए हैं। तो तुम्हें जो नाटक मिला है जो रोल मिला है वैसा कीजिए। उसको अगर ठीक से निभा ले गए तो बढ़िया और अगर गलत कर गए तो फिर नरका आदि की प्राप्ति होगी।

वीना पंडित जी पुणे राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी घर में के मंदिर में विराजमान देवी देवताओं की पूजा अर्चना करने और उन्हीं देवी देवताओं के तीर्थ स्थलों पर जाकर पूजा अर्चना करने में क्या अंतर है? भावना का अंतर है। घर की देवी जब विराजमान है तो उतनी भावना नहीं बनती जितना हम कष्ट सहकर जब वैष्णो देवी जाते हैं। तप करना पड़ता है। तप उसमें होता है। कष्ट होता है। आप पहाड़ पे चढ़ के धक्कामुक्का खा के और नाना प्रकार के श्रम कष्ट सहकर जब गए तो आपकी भावना बनी।

वो भावना घर में नहीं बनेगी। जैसे आप ठाकुर जी विराजमान कर लो घर में तो वही मुरली मनोहर ललित त्रिभंगी ठाकुर जी घर में विराजमान है वही बिहारी जी विराजमान है जब आप चल के पैसा लगा के और यहां वृंदावन आए और यहां जब दर्शन करेंगे तो आपके भाव कुछ और हो जाएंगे और दूसरी बात है कि घर में उतनी पवित्रता नहीं है जितनी धाम में पवित्रता है। घर के ठाकुर तुम्हारे भाव के अनुसार है और यहां ठाकुर जी साक्षात रूप में विराजमान है। बिहारी जी कोई मूर्तिकार की रचना नहीं स्वयं प्रकट ठाकुर विराजमान है।

तो कई कारण होते हैं जिससे हमको जाना चाहिए और दर्शन करने चाहिए। पहला कारण होता है कि हमारे शरीर के पाप नष्ट होते हैं। क्योंकि हमें कष्ट मिलता है। तप होता है हमारे द्वारा पवित्र। दूसरी धाम आदि का वातावरण अलग है। आप अपने घर का वातावरण देखिए और हरिद्वार जाइए। वहां का वातावरण देखिए। वृंदावन का वातावरण देखिए। काशी का वातावरण देखिए। जो भगवत धाम है जो तीर्थ है वहां का एक भागवतिकता आपको दिखाई देगी। एक दिव्यता दिखाई देगी। हृदय में एक उल्लास होगा। एक-एक कदम चलने पर बड़े भीड़ है, धक्का लग रहा है।

लेकिन आपके हृदय में आनंद है और उचक करके एक झांकी हुई तो आपको लगा आज मैंने भगवान के दर्शन कर लिए। आज ठाकुर के दर्शन कर लिए तो अति उत्तम है। अपने घर के ठाकुर के भी दर्शन करें, सेवा करें लेकिन अवसर मिले तो तीर्थों में भी जाए। उससे महान लाभ प्राप्त होता है। एक एक कदम जो आप तीर्थ के लिए चल रहे हो, ठाकुर के दर्शन के लिए चल रहे हो, वो विशेष लाभदायक वो विशेष पुण्य प्रद है। उससे आपका पाप नष्ट होगा, आपका मंगल होगा, आपके दुखों का नाश होगा, आपको सुख की प्राप्ति होगी।

ऐसा करना चाहिए। नीरा प्रधान जी भुवनेश्वर जय जय श्री महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी आपके प्रवचन सत्संग व एकांतिक सुनकर जीवन को एक अर्थ और एक उद्देश्य मिल गया है। आपका बहुत-बहुत आभार। महाराज जी एक बात आपसे जानना चाहती हूं कि वाणी का मौन ही काफी कठिन लगता है। अगर वह थोड़ा भी कर लूं तो मन का मौन कैसे संभव है? मतलब वाणी से तो चुप है बट अंदर तो विचार चले जा रहे हैं महाराज। उसको रोकने के लिए पहली अगर ब्रेक हमारी सही लग जाए ना तो दूसरी सही लग जाएगी।

वाणी का मौन अगर सही ढंग से हम निर्वाह कर पावे। वाणी का मौन का मतलब एकदम मूख हो जाना नहीं होता है। विचार पूर्वक बोलना भी मौन के अंतर्गत ही आता है। जैसे हम भगवत चर्चा कर रहे हैं। ये मौन से बढ़कर लाभदायक है। बोधता परस्परम कथयंत च माम नित्यम तष्यंत च रमंत च भगवान के रूप की लीला की भगवान की गुण महिमा की चर्चा हम कर रहे हैं वाणी के द्वारा तो मौन से भी पवित्र है। हम किसी से बात कर रहे हैं। उसके हित की बात कर रहे हैं। मृदु बात कर रहे हैं। उसके हृदय को शीतलता पहुंच रही।

ये वाणी से मौन से भी बढ़कर के है। हम भगवान का नाम कीर्तन कर रहे हैं। नाम जप कर रहे हैं। सत्य बोल रहे हैं। ये सब जरूरी है। वाणी है तो बोलने के लिए तो हमें लगता है बोलना चाहिए। राधा राधा बोलो, भगवन नाम कीर्तन बोलो, भगवत चर्चा करो, अच्छा बोलो। तो इसकी सार्थकता है। अधिकतर मौन रहे और जब बोले तो विचार पूर्वक बोले और इससे धीरे-धीरे क्या होगा कि जो हम बोलते हैं उसका प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है। मन धीरे-धीरे जब हमारा पवित्र होने लगेगा तो पवित्र मन शांत और स्थिर होता है।

अपवित्र मन चंचल और अशांत होता है। तो धीरे-धीरे एक एक इंद्रिय अगर हमारी पवित्र होती जाए तो मन हमारा पवित्र हो जाएगा। क्योंकि इंद्रियों में ही मन आ सकता है। इंद्रियां विषयों में आसक्त है और मन इंद्रियों में आसक्त है और बुद्धि मन में और जब उल्टा हो जाए बुद्धि मन को अधीन कर ले। मन इंद्रियों को अधीन कर ले तो साधना बन जाती है। अभी उल्टा है। विषय इंद्रियों को अधीन किए हुए इंद्रिय मन को अधीन किए हुए मन बुद्धि को अधीन किए हुए हैं। इसलिए हमारा मन चंचल है। धीरे-धीरे हम नाम जप करें।

भगवन नाम कीर्तन करें और भगवान से प्रार्थना करें। प्रार्थना से बहुत जल्दी लाभ होता है कि हे नाथ अगर हम मन को रोकना चाहते तो और भागता है। आप कृपा करो। आप ऐसी कृपा कर दो कि आप में मन लग जाए। तो गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं हरि जो मेरो मन हठ ना तजे मैं तो प्रयास करता हूं हठीला मन विषयों में भाग जाता है हो हारो कर जतन विविध विधि अतिशय प्रबल अजय तुलसीदास बस होए तब जब प्रभु पेरक बरजे हरि जो मेरो मन हट न तजे हे हरि हमने बहुत प्रयास करके देख लिया मेरा मन शांत और अचल नहीं हो पा रहा इसलिए अब आप कृपा कृपा करें।

इसकी डोरी आपके हाथ में है। आप इसको रोक दें। आप इसकी चंचलता को नष्ट कर दें। यह शांत और स्थिर हो जाए। आप में लग जाए। तो वाणी के मौन से और भगवान की प्रार्थना से नाम जप नाम कीर्तन भगवत लीला कथा श्रवण से हमारा मन धीरे-धीरे शांत होने लगता है। अनिल कुमार जैन जी उज्जैन से महाराज जी शुभ और अशुभ कर्म फल भुगने की अवधि का निर्धारण पूर्व जन्म में कैसे होता है कि कोई व्यक्ति अपने अच्छे बुरे कर्म कितने समय तक भुगतेगा इसको केवल विधाता जानते हैं दूसरा नहीं जानता सुनो भरत भावी प्रबल बिलख कहो मुनि हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधात तो जो हमारा प्रारब्ध भोग है वह क्या-क्या है?

कितने समय में कैसा है? इसे पूरा विधाता जानता है और यह इतना ही नहीं है। गोदाम भरा हुआ है जिसे संचित कर्म कहते हैं। संचित कर्म से कुछ हिस्सा निकाला जाता है शुभशुभ का जिससे शरीर की रचना होती है उसे प्रारब्ध कर्म कहते हैं। और जो नया कर्म किया जाता है उसे क्रियामाण कर्म कहते हैं। तो गोदाम तो अभी पूरा भरा ही है। जब तक भजन बल के द्वारा, ज्ञान बल के द्वारा, तप बल के द्वारा उसको नष्ट नहीं कर दोगे तब तक भोगना पड़ेगा। बार-बार जन्म, बार-बार मरण और मनुष्य योनि में ही नहीं सूअर, कुत्ता, गधा न जाने किन-किन योनियों में हमें जाना पड़ेगा।

तो इसीलिए मनुष्य योनि की महत्ता है कि हम इस जन्म में इतना भजन करें कि हमारा संचित भस्म हो जाए और प्रारब्ध को भोग लें और क्रमाण पवित्र अच्छे आचरण हो और भगवत समर्पित हो तो हमें इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाए। हमारा आवागमन चक्र रुक जाए। लेकिन लोग जहां संसार में चकाचौंध माया की देखा तो भगवान को भूल जाते हैं और अपना मनुष्य जन्म पूरा का पूरा इसी माया में व्यतीत कर देते हैं। अब ये हो जाए अब वैसा हो जाए वैसा हो जाए पूरा जीवन इसी में चला जाता है। महाराज जी जैसे किसी का उदय तीन महीने का है।

कर्म तीन महीने तक उसको परेशान करेगा। किसी का छ महीने तो ये एक कर्म कारण कौन सा करा हुआ? किस कारण से ये इसकी अवधि की कौन कितना भुगते है? हां उसी उसी अपराध के अनुसार है। ये अपराध के अनुसार है ना। जैसे अपराध बड़ा है। अब जैसे किसी को बुखार आया तीन दिन में ठीक हो गया। अब प्रारब्ध छोटा था निपट गया। तो यह प्रारब्ध भोग होता है। अब बड़ा प्रारब्ध है तो आजीवन भोगना पड़ेगा। छोटा प्रारब्ध है तो थोड़ा सा आया और निपट गया चला गया। अब इसको तो ना हम जानते हैं और ना कोई ज्योतिष आचार्य जानेगा।

यह ब्रह्मा जी ही जानते हैं। जिन्होंने रचा है कि इसको कितने दिन क्या कितने मिनट कहां कैसा भोगना होगा वो वही जानते हैं। मयंक तिवारी जी राधा वल्लभ श्री श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव सूरदास जी के पद में आता है कि भरोसो दृढ़ इन चरणन के रो। महाराज जी इस पद में अत्यंत अद्भुत एवं महिमा में अह महिमा का वर्णन किया प्रभु की पर महाराज जी इसमें भरो किस भरोसे की बात कर रहे हैं वो भरोसा कैसे हो और कैसे हमारे अंदर आए जब आन कोई ठोर नहीं और नहीं तब भरोसा एक होता है कहीं हमें ठौर नहीं कोई हमारा और नहीं भरोसो दृढ़ इन चरणन केरो श्री वल्लभ नख चंद्र छटा बिन सब जग मा अंधेर उसी में उत्तर लिखा हुआ है श्री वल्लभ माने वल्लभाचार्य जी के लिए वो कह रहे हैं आचार्य गुरु के लिए कह रहे हैं और श्री वल्लभ भगवान

को भी कहते हैं राधा वल्लभ श्री वल्लभ श्री वल्लभ वैसे वो आचार्य वल्लभाचार्य जी के लिए कह रहे हैं गुरुदेव के लिए कह रहे हैं कि श्री वल्लभ नख चंद्र छटा बिन सब जग माह अंधेरो भर करो सो दृढ़ इन चरणन केरो यह कलिकाल ऐसा मलिन है कि बोले इसमें और दूजा कोई साधन नहीं है जिससे हम मुक्त हो सके माया से मुक्त हो सके और सूरदास जी कहते हैं सूर कहा दुविध आंधरो बिना मोल को भगवान में बिक जाना कोई कामना ना होना भगवान के सिवा हमारा कोई है नहीं ऐसा इन महापुरुषों ने जो भगवान को प्यार किया वो हम लोग जान ही नहीं सकते क्योंकि मायाकृत मलिन मन है और वो निरंतर देखो शब्द देखो कह रहे सूर दास दुविधा धरो बाहर से तो अंधा हो अंदर से भी अंधा हो मेरे तो और कोई साधन ही नहीं जिसका भाव बड़ा गंभीर भाव है सूरदास दुविधा धरो बाहर से आंखें तो पहले से जन्म से ही अंधा हूं और अंदर ज्ञान ज्ञान की आंखें भी नहीं है।

दोनों तरह से अंध में तो बिना मोल का बिका हुआ आपका दास हूं। सूरदास दुविधा धरो बिना मोल को चेरो भरोसो दृढ़ इन चरण के हमारे कोई और साधन नहीं। केवल आपके चरणों का भरोसा हमारा कोई और नहीं प्रभु केवल आपके सिवा और कोई नहीं। जब यह भाव होता है तो दृढ़ भरोसा भगवान बस यही साधना का फल है भगवान में दृढ़ भरोसा हो जाना जैसे हमारे यहां हरिराम व्यास जी कह रहे हैं काू के बल भजन को काहू के आचार व्यास भरोसे कुंवर के श्री जी के भरोसे व्यास भरोसे कुंवर के सोवत पाव पसार अब हम तो लाडली के भरोसे होकर निश्चिंत हो रहे हैं किसी को भजन का बल है, किसी को पवित्र जितेंद्रियता का, पवित्रता का बल है।

हमें तो श्री लाडली जी के गोरे चरणारविंद का बल है। यह भक्ति की चरम अवस्था है। जब भगवान के सिवा कोई अपना नहीं होता। तो वो जो आनंद होता है उसका वर्णन वाणी के द्वारा नहीं होता। भरोसो दृढ़ चरणन के जैसे गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास एक राम घनश्याम हे चातक तुलसीदास जैसे चातक स्वाति के बूंद के सिवा और कोई जबान पर अपना पानी नहीं रख सकता चाहे मर जाए ऐसे ही अपने इष्ट के नाम इष्ट के रूप इष्ट के आश्रय में जो है उसका दृढ़ भरोसा हो जाता है।

यह सिद्ध पुरुषों की बात है। भरोसा दृढ़ हो जाना मतलब सिद्ध हो गया। यही तो सब खास बात है। हमें प्रभु पर विश्वास नहीं है। प्रभु से भरोसा दृढ़ नहीं है। अगर दृढ़ भरोसा हो गया तो भगवान दास बन जाते हैं। देखो ना जितने भरोसे वाले बड़े-बड़े भक्त हुए भगवान उनकी सेवकाई में लग गए। भगवान उनके सेवक बन गए। प्रेरित जी राधे-राधे महाराज जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी भगवान और देवी देवताओं का अलग-अलग मान्यता मानी गई है पर बचपन से ऐसा सुनते आए हैं कि देवताओं की भक्ति से सांसारिक सुख मिल सकते हैं पर भगवान की भक्ति से असली आनंद की प्राप्ति होती है।

पर मेरा मन एक देवी देवता के भक्ति में लगा हुआ है। ऐसे में क्या मुझे वो आनंद या उस मौज की प्राप्ति नहीं उसी में भगवान की भावना कर लीजिए क्योंकि कोई कारण ऐसा नहीं जहां भगवान ना हो तो क्या देवी देवता में भगवान नहीं है क्या जब हम चराचर जगत में भगवान देख सकते हैं तो देवी देवता में भी भगवान देख सकते हैं। यदि हमारे अंदर यह भावना आ जाए कि ये देवता साक्षात भगवान है तो आनंद की प्राप्ति होने लगेगी। किसी भी देवता या किसी भी देवी में यदि हमारा भगवत भाव हो जाए जैसे राम कृष्ण परमहंस जी ने मां काली में ही भगवान का भाव कर लिया कि परम ब्रह्म परमात्मा ही मां काली के रूप में तो सब साक्षात्कार हो गया।

सब कुछ प्राप्त हो गया। ऐसे ही यदि हम किसी भी देवता में भगवान का भाव कर लेते हैं तो भगवान ही तो देवता बने हुए हैं। मूल में तो सबके भगवान ही विराजमान है इसलिए भगवान पर हमारी श्रद्धा भगवान में होनी चाहिए। जैसे हम सूर्य भगवान, चंद्र भगवान, इंद्र भगवान हम भगवान में लाए कि ये स्वयं भगवान इंद्र बने हुए हैं। स्वयं भगवान चंद्र बने हुए हैं। स्वयं भगवान सूर्य बने हुए हैं। स्वयं भगवान ही गणपति बने हुए हैं। स्वयं भगवान ही समस्त देवी देवताओं के रूप में। ऐसी हम भावना करें तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

महाराज जी हमारे इसमें जैसे नाकोड़ा भैरव मणिभद्र वीर ऐसे देव देवी देवताओं को हम पूजते हैं और तीर्थंकर उसे बताते हैं कि उनको पूजने से ही मोक्ष होता है। उन्हें भगवान की भावना के बिना तो फिर अगर देवी देवताओं को भगवान की भावना के बिना पूजोगे तो मोक्ष नहीं प्रदान कर सकते। मोक्ष प्रदान करने का अधिकार या परमानंद प्रदान करने का अधिकार सिर्फ भगवान श्री हरि और भगवान शंकर को है। दूसरे को नहीं है। श्री हरि और भगवान शंकर ही मोक्ष और परमानंद प्रदान कर सकते हैं।

और समस्त जितने भी देवता आदि हैं ये एक सीमा तक आपको सुख दे सकते हैं। लौकिक परमानंद नहीं। अगर उन्हीं में हम भगवान की भावना कर ले तो वह आपकी वृत्ति भगवान तक पहुंचा देंगे जिससे परमानंद की प्राप्ति हो जाएगी। भगवान की प्राप्ति तो देखो एक भूत से हो गई तुलसीदास जी को काशी में गंगा पार करके सोच जाते थे तो जो शौच का बचा हुआ पानी होता था ऐसे फेंक देते थे और उस पेड़ पर एक प्रेत रहता था और प्रेत अपवित्र पानी पीता है तो कई दिन पीने के बाद वो तृप्त हुआ और प्रकट हो गया तुलसीदास जी से कहा कि अब आप जो चाहो हमसे मांग लो।

तो उन्होंने कहा आप कौन हो? उन्होंने कहा मैं प्रेत हूं। तो बोले मैंने तो आपकी आराधना की नहीं। तो उन्होंने कहा आराधना नहीं हुई पर अनजाने में आराधना हो गई। आपने जो अपवित्र पानी फेंका उससे मेरी तृप्ति हो गई। अब आप बताओ क्या? तो उन्होंने कहा सियाराम के दर्शन करा दो। तो कहा इतनी सामर्थ नहीं। हमारी इतनी सामर्थ्य नहीं है कि मैं सियाराम के दर्शन करा दूं। उपाय बता सकता हूं। उपाय से पक्का सियाराम के दर्शन हो जाएंगे। तो उनका बताओ तो बोले तुलसी घाट में जब रामचरित्र का गायन किया जाता है भगवान की कथा होती है तो उस समय महावीर परम महाभागवत बजरंगबली हनुमान जी महाराज आते हैं उनके चरण पकड़ लो वो सियाराम जी के दर्शन करा देंगे तो उनका हम पहचानेंगे कैसे बोले सबसे पहले आते हैं और सबसे बाद के जाते हैं और मलिन वस्त्र होता है वृद्ध स्वरूप होता है तुलसीदास जी उस दिन गए तो जे कथा कथा सुनी तो सबसे पहले आकर हनुमान जी महाराज बैठ गए।

मलिन कपड़ा पहने ऐसे वृद्ध रूप में तुलसीदास जी दृष्टि रखते रहे और जब सब चले गए तो वहां प्रणाम करके वो जो ही चले सो पीछे लगे पीछे लगे तो भागे वो तो तुलसी घाट से लेकर संकट मोचन जो काशी के हैं वहां तक हनुमान जी भागे तुलसीदास जी जाकर चरण पकड़ लिए उनका क्या चाहते हो तो उनका प्रभु इतने दिन हो गए भजन करते हुए मैं अपने प्रभु को देखना चाहता हूं। कैसे हैं मेरे सियाराम जी? तो उनका यहां काशी में नहीं चित्रकूट में चलो। तो फिर हनुमान जी की कृपा से श्री लक्ष्मण जी और श्री राम जी का साक्षात्कार चित्रकूट में श्री तुलसीदास जी को हुआ।

पर मूल प्रेरक प्रेत हुआ। तो अगर हम श्रद्धा और भावना भगवान की करें तो जब प्रेत भगवत साक्षात्कार करा सकता है कारण तो बना ना तो ऐसे कोई भी देवी देवता हो वो हमें तत्काल भगवान से जोड़ करके हमारा काम बना देगा तो हम ईमानदारी से संपूर्ण भावना से भगवत भावना से यदि सेवा करें तो कहीं भी सेवा करें वो भगवान को ही पहुंचती है क्योंकि मूल में सबके भगवान विराजमान है। जी जगन्नाथ अरोड़ा जी हरियाणा से रानी की शरीर की जय महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी परमार्थ पुरुषार्थ व प्रतीक्षा तीनों का संतुलन कैसे बनाएं ताकि अपने साधक जीवन व सांसारिक कर्तव्यों का अच्छे से पालन कर पाएं और तीनों को करते हुए परमार्थ ना आए प्रतीक्षा का तात्पर्य क्या आप ले रहे हैं गुरुदेव जब परमार्थ की ओर लगते हैं तो लगता है कि महाराज जी आप कह रहे हैं कि जब परमार्थ की ओर देखते हैं तो फिर ऐसा लगता है कि अभी व्यवहारिक कार्य कुछ देर प्रतीक्षा कर लेते हैं ताकि फिर एकदम परमार्थ में हो तो इसका संतुलन कैसे बनाया जा सकता है महाराज नहीं पूरे जीवन मन इसी तरह अटकाए रहता है कि यह काम हो जाए फिर हम भजन कर लेंगे यह हो जाए फिर हम भजन कर लेंगे ऐसा नहीं पहले भजन करो फिर काम होगा हम काम करते हुए भजन करें जो हमारा सांसारिक कार्य है उसमें हम भजन को पीछे नहीं टालते हैं क्यों क्यों?

क्योंकि कल हम जिएंगे कि नहीं हमें भरोसा नहीं है। हमारी आयु कितनी है मुझे पता नहीं है। मुझे हर श्वास भगवान का स्मरण करते रहना है। प्रतिपल परमार्थ में हमें स्थित रहना है। परमार्थ ही पुरुषार्थ है। अगर परमार्थ नहीं तो और पुरुषार्थ किस काम का? परमार्थ ही पुरुषार्थ है और परमार्थ पुरुषार्थ करते हुए भगवान के दर्शन की प्रतीक्षा ना कि किसी काम पूरी होने की प्रतीक्षा नहीं किसी काम पूरी होने सब काम ठीक है। जैसे प्रभु रख रहे हैं वैसे बहुत बढ़िया रख रहे हैं। मनुष्य जीवन इन लाभों के लिए नहीं मिला।

यह कोई लाभ है। आप पूरे जीवन 50 अरब कमाए और मर गए ₹ जाएगा क्या तो लाभ कहां मिला हानि तो हो गई इतना बढ़िया मनुष्य जीवन और ले जाने लायक कुछ कमाया ही नहीं जैसे सोचो किसी देश में आपको भेजा जाए और वहां आपको सब सुविधा दे दी जाए मकान दे दिया गया पत्नी दे दी पुत्र हो गए रुपया पैसा मान प्रतिष्ठा सब अब वहां से अपने देश में लौटना है लेकिन कुछ नहीं ला सकते वहां से तो बोलो ऐसे देश में जाना पसंद करेगा कोई जहां से हम कुछ वापस नहीं ला सकते अपने देश कुछ ला ही नहीं सकते ऐसे देश में रहना कोई पसंद करेगा वो यही देश है शरीर भी छोड़ा दिया जाता है शरीर भी हटा दिया जाता है कुछ अपना होता नहीं तो जो अपना है वह है परमार्थ।

तो हमें अपने पुरुषार्थ को परमार्थ में ही लगाना चाहिए और प्रतीक्षा करनी चाहिए परमार्थ के परिणाम की प्राप्ति की ना कि सांसारिक भोगों की ना कि सांसारिक लाभों की। यह तो अन मांगे आगे आवेगो जो पल लागे पल को जैसे पल के बिना प्रयास के चलती रहती है ऐसे ही प्रारब्ध भोग से सुख और दुख आता रहता है जैसे कोई दुख नहीं चाहता फिर भी दुख आता है ऐसे सुख ना चाहे तो भी सुख आ जाएगा इसके लिए ज्यादा प्रयास ना करें प्रयास करें भगवत प्राप्ति के लिए प्रयास करें परमार्थी की पूर्ति के लिए प्रतीक्षा करें भगवान के दर्शन की प्रतीक्षा करें भगवान की कृपा की प्रतीक्षा करें मोक्ष क्ष की ना कि सांसारिक भोगों की।

शशि कुमार जी मैनपुरी राधे-राधे गुरुदेव भगवान राधे-धे महाराज जी गुरुदेव भगवान कृपा और शरणागति में क्या अंतर है? एक ही बात है। कृपा से शरणागति होती है और शरणागति से कृपा का परिचय होता है। भगवान की कृपा से ही शरणागति होती है और शरणागति से ही कृपा का परिचय होता है। जब हम भगवान की शरण में होते हैं तो हमें पता होता है भगवान हमें कितना दुलार कर रहे हैं। भगवान हमें कितना प्यार कर रहे हैं। भगवान की हम पर कितनी कृपा है। तो कृपा से शरणागति और शरणागति से कृपा का अनुभव होता है।

भगवान बड़े कृपालु हैं। यह बात शरणागति से ही अनुभव में आता है। कशिश जी दिल्ली से राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव भगवान भगवान संत जन संत वाणी शास्त्र वचन पर साधक का विश्वास दिन प्रतिदिन बढ़ता जाए। इसके लिए साधक को क्या प्रयास? नाम जप करना चाहिए। नाम जप करने से हृदय पवित्र होता है। पवित्र हृदय में पवित्र श्रद्धा और दृढ़ विश्वास होता है। वह पवित्र श्रद्धा और दृढ़ विश्वास जब संत वाणी और शास्त्र में हो जाती है तो उसका परमार्थ पुष्ट होने लगता है और परमार्थ पुष्ट होता है तो भगवत प्राप्ति हो जाती है।

संत वाणी से ही भगवत प्राप्ति होती है। अगर संत वाणी और भगवत वाणी का श्रद्धा विश्वास पूर्वक सेवन ना किया जाए तो फिर भगवत प्राप्ति हो ही नहीं सकती। क्योंकि यही मार्ग बताते हैं। जब मार्ग ही में नहीं चलेंगे तो भगवत प्राप्ति कैसे हो पाएगी? तो संत वाणी और शास्त्र पर प्रगाढ़ श्रद्धा और दृढ़ विश्वास होना ही भगवत प्राप्ति का लक्षण है कि भगवत प्राप्ति कर लेगा। भवानी शंकरो वंदे श्रद्धा विश्वास रूपणो याभ्याम बिना न पसंत सिद्धा स्तामेश्वरम बिना श्रद्धा विश्वास के हृदय में विराजमान परमात्मा है पर कहां अनुभव हो रहा है तो हम संत और शास्त्र पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास कर पावे इसके लिए हमें खूब नाम जप करना चाहिए नाम जप करने से हृदय पवित्र हो जाता है नीतीश पंडित जी पुणे सोने से हां जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आत्मा मृत्यु के बाद क्या अनुभव करती है अगला जन्म कैसे तय होता है इस प्रक्रिया को तय करने वाली नियमावली क्या है महाराज जी हम वैसे जो आत्मा है इन सब बातों से एकदम अलग है उनका इससे कोई तात्पर्य नहीं कभी जन्म मरण ना आत्मा का होता है ना होगा ना है।

आत्मा निर्लेप निर्विकार सच्चिदानंद स्वरूप है। ये सूक्ष्म शरीर को होता है। जो मन है जो बुद्धि है जो चित्त है अहंकार है अंतःकरण चतुष्ट है। पांच ज्ञानेंद्रियां पांच कर्म इंद्रियां ये जो सूक्ष्म शरीर है इसी को जन्म मरण होता है। आत्मा तो इसमें अहम करके बार-बार जो जन्म मरण हो रहा है उस अहम करके इसमें वह भोगता कर्ता भाव से युक्त होने के कारण निर्लेप होने पर भी उसे भोगना पड़ता है। निर्लेप होने पर निर्विकार होने पर भी उसे भोगना पड़ता है। अंतःकरण पर ममत्व होने के कारण आम होने के कारण पर जन्म मरण जो होता है उस समय जन्म मरण का मतलब यही समझो जैसे सो गए गाढ़ निद्रा यह मृत्यु और जगे यह है जन्म ऐसे जन्म मृत्यु होती रहती है गाढ़ मूर्छा मृत्यु फिर अगली योनि में पहुंचा फिर चेतना जागृत हुई फिर उसमें खेलने कूदने लगा फिर वैसे सब फिर गाढ़ मूर्छा ऐसे ऐसे बहुत जन्म हो गए।

अब हम अपने को सुधार ले। मनुष्य जन्म मिला है जन्म मरण के चक्र को रोक कर परमात्मा की प्राप्ति के लिए। अब हम ऐसा भजन करें डटकर कि हम जन्म मृत्यु के चक्र को रोक दें। पर लोग इधर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं। इसी जगत की चीजें चाहता है। वो भगवान को नहीं चाहता है। क्योंकि बुद्धि हमारी मलिन हो चुकी है। इसीलिए हम सबसे कहते हैं नाम जप करो। नाम जप करने से जब बुद्धि पवित्र होगी तो सही निर्णय निकलेगा। अभी तो बड़ा धूल पड़ी हुई है बुद्धि पर माया की। जब हम नाम जप करेंगे तब निर्मल बुद्धि सही निर्णय कर पाती है।

अभी तो बहुत मलिन बुद्धि है इसलिए खूब नाम जप करें। यह बात समझ लो आत्मा का कभी जन्म नहीं होता। तो मृत्यु कैसे हो सकती है? आत्मा को कोई दुख नहीं व्याप्तता। नैनम छिनती शस्त्राण नैन दाति पावका न चैनम क्लेदो न शोषति मारुता आत्मा को अस्त्र छेद नहीं सकते। वायु सुखा नहीं सकती। कि जल गीला नहीं कर सकता। वो अकलेध्य है, अशोष है, अदाय है, वो भगवत स्वरूप है, चिदानंदमय है। पर ऐसा चिदानंदमय होने पर भी वो अंतःकरण में ममत्व रखने के कारण करता और भोगता भाव रखने के कारण वो ना जन्मने पर भी जन्मता है।

ना मरने पर भी मरता है। यही भगवान की माया है। आशा जी हरियाणा से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी यदि किसी मनुष्य में कोई गुण भक्ति भाव ना हो और जो सदा ही पाप कर्मों में लिप्त हो तो प्रभु क्या ऐसे मनुष्य को भी भगवत प्राप्ति या संत गुरु रूप में प्राप्त होकर उसे दीक्षा प्रदान कर सकते हैं सद्गुरु देव की प्राप्ति के लिए क्या प्रयास कर सकता है ऐसा जी भगवान से प्रार्थना करें और किसी सच्चे संत का संग मिल जाए तो घोर पापी भी महात्मा बन सकता है भगवान स्वयं कह रहे हैं अपिचेत सुदुराचारो भजते माम अनन्य भाग साधु समंतव्य सम्यक व्यवतासा घोर दुराचारी हो सांगो पांग पाप करने वाला हो अपचेत सु दुराचार मतलब खूब सुंदर ढंग से पाप करने वाला एक होता है कि पाप कर लिया नहीं खूब रचपच करके पाप करने वाला हो घोर पापी महापापी अगर वह भी साधु संग से या किसी घटना से प्रेरित होकर के भगवान की शरण में आ जाए तो भगवान कहते हैं मैं उसे साधु बना दूंगा।

भगवान कहते अप सुदुराचारो भजते माम अनन्य भाग साधु समंतव्या सम्यक विशिता ऐसा सबको उसे साधु ही मानना चाहिए क्योंकि वो कल पापी था आज मेरी शरण में आ गया अब मैं करूं सते साधु समाना छिपम भवती धर्मात्मा वो बहुत जल्दी धर्मात्मा महात्मा बन जाएगा तो अवश्य अवश्य घोर पापी भी भगवान की शरण में जाए और खूब डट के भजन शुरू कर दे तो महात्मा बन जाएगा। भगवान उसे महात्मा बना देते हैं। सेरे की निराश पे उतर आया चांद पावा माथे म मोर को केसर की भाव सुहाए कमल नयन काए गज चितवन चेत चुराए मकरा कुंडल का निहार सवा मानो धरती प्रेम उतारो सखी पावा बिना बुलाए संग गुरु के जनकपुरी में आए कब नैन के मार समाो पे उतर आया श्याम पाग सो पीतांबर जनता जन राम आए कमल नयन कर आए चित में दुलवा स पाो धरती पे उतर आया श्याम अरुण सखी पावा रूप जब से आए हैं रघुवर सरकार जब से आए हैं रघुवर सरकार कब से उत्सव ही उत्सव मिथिला जाने कब क्या जरूरत पड़ जाएगी कब क्या जरूरत पड़ जाएगी खुला रहता है हर दम बाजार में खुला रहता है हर किस चीज की भी होगी किसी की भी होगी जरूर है पूरा करने को हर द तैयार मिथिला पूरा करने को हर द तैयार सरकार और कुछ भी लेवे अथवा दे नहीं चाहे और कुछ ले अथवा दे नहीं शांति पाने को हरदम तैयार मिथिला शांति पाने को हरम तैयार मिथिला आए हैं रघुवर सरकार मिथिला वैसे मिथिलाज में पौना जी को सब कुछ पसंद है।

ऐसे मिथिला में भावना जी को सब कुछ पसंद है। लेकिन सबसे पसंदी की बौछार मिथिला सबसे पसंदी की बौछार मिथिला से आए हैं रघुवर सरकार मिथिला याद मिथिला भी सुनाते हैं वही याद भी सुनाते हैं वही याद दूल्हा जी उछले बारंबार मिथिला याद जी उछले बारंबार मिथिला जब से आए हैं रघुवर सरकारला उत्सव ही उत्सव लगातार मिथिला सरकार निवेदन का पद है सुधि मेरी भी लेना गिरधारी सुधि मेरी भी लेना गिरधारी गिरधारी तुमने गणिका जामि को तारा को तारा धन सेना गिरधारी धन सेना गिरधारी गिरधारी अपनी बगिया का कुछ भी बना लो फिर अपनी

बगिया का कुछ भी बना लो चाहे तो ताया मैना गिरधारी चाहे तो ताना गिरधारी सुधि मेरी भी लेना गिरधारी सुधि तेरी गिरधारी गिरधारी हम नारायण गुण गायक गिरधारी हम नारायण गुण गायक नहीं तुझ बिनु चैना गिरधारी नहीं तुझ चैना गिरधारी गिरधारी जाने श्रवण में कब तक पड़ेंगे श्रवण में कब तक अमृत से बहना गिरधारी अमृत से बहना गिरधारी सुधि मेरी भी लेना गिरधारी सुई मेरी लेना गिरधारी अब टन्ना लगली करो सब भाति मनोहर पियस का लगता बड़े नाजों से पाला है कुछ कसर अगर तो बस इतनी कि दूल्हा थोड़ा सा अब चन्ना लग के नाम बिना दूल्हा बा गई लेकरिया के अमावस्या के रात जैसे अधरिया के अमावस्या के सन्मान करेती समि केरिया हरि समरिया उतार उनकर पार देती फरिया लहंगा उतार उनकर पार देती फरिया पहरा उनके छोटी घगरघरिया है पहरा उनके छोटी सी गगरिया है अंगना में नचती उनके बना के बनरिया है अंगना में नच उन बन मिथिला के उबटन बांटे बड़ा चमत्कार कर आए मिथिला के उबन बाटे बड़ा चमत्कार कर आए क्षण भर में हरियर हो है दशरथ जी के हरिया में हर हर हो के हरिया

मोरी सियाजूई जनक के दुलरिया है मोरी सियाई जनक के दुलरिया है दूल्हा के गोर बन नहीं है बैठते गगरिया है दूल्हा के बन है बैठते है ऊपर से उनके चेला बनव ले बाबा जी बक्सरिया है चेला बनव ले बाबा जी बक्सरिया पहले से पक्का गुरु बाए पहले से पक्का गुरु पाए नेह निधि नारायण सुन सुन के मकरिया नेह निधि नारायण प्रभु सुन सुन बस कर मंद मंद मुस्के क के ती नजरिया आए मंद मंद मुस्के के ती नजरिया आए दुल्हा सरकार की जय पूज्य बाबा सरकार की जय महाराज नीति पांडे जी वाराणसी से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जैसे भक्त भगवान को पुकारता है क्या भगवान भी कभी भक्त को पुकारते हैं भगवान ही भक्ति की पुकार बनते हैं।

भगवान पुकारते नहीं भगवान ही भक्ति की पुकार बनते हैं। भक्त के हृदय में जो भगवान के प्रति भाव आता है वो भगवान ही बनते हैं। भक्त प्यार क्या कर सकता है? भगवान का प्यार ही भक्त का प्यार बनता है। भगवान की करुणा ही भक्त का हृदय बन जाती है। भगवान की प्रेरणा से ही वह यंत्रवत चेष्टा करता है। वह जो पुकारता है हा कृष्ण राधा तो सही मानो हृदय में वह बैठकर के पुकार रहे हैं। वही पुकार रहे हैं। वही भाव दे रहे हैं। वही करुणा कर रहे हैं। भक्त तो राई के समान प्यार करता है।

भगवान समुद्र के समान प्यार करते हैं। भगवान को जब कोई अपना मान लेता है तब ये परिचय जान पाता है। नहीं तो माया का ऐसा मलिन प्रभाव है कि शरीर शरीर संबंधी रिश्ते नाते यह सब प्रिय लगते हैं और भगवान पराए लगते हैं और जब भगवान का भजन किया जाता है भगवान की कृपा से शुद्ध ज्ञान होता है। फिर भगवान से जब प्रेम होता है तब हृदय की दशा बदल जाती है। वो भगवान ही उसके अंदर पुकार बनते हैं। आप एक बार कृष्ण बोलेंगे वो हजार बार आपका चिंतन करेंगे। उनके जैसा प्रेमी है कौन?

प्रीति की रीति रंगीलो ही जाने। आप विचार करके देखो। भक्तों के चरण चाप रहे। क्या अनंत ब्रह्मांडों के ईश्वर के पास इतनी शक्तियां है, इतना पावर है। वो किसी एक पार्षद को बोल सकते हैं जाकर के कि देखो मेरा भक्त कष्ट में है। उसका सहयोग करो। लेकिन नहीं स्वयं अपने हाथ से माधवदास बाबा की लंगोटी धो रहे हैं। स्वयं अर्जुन का रथ हाक रहे हैं। तो भगवान की करुणा और भगवान के प्यार को तो केवल भक्त हृदय ही जानता है। तो भगवान ही भक्त के हृदय की पुकार बनते हैं। और उसी पुकार में भगवान का साक्षात्कार होता है।

अब इस बात को समझना। भगवान ही भक्त के हृदय के पुकार बनते हैं। वह करुणा वह आर भाव भगवान ही देते हैं। और उसी पुकार में भगवान का साक्षात्कार होता है। तो भक्त और भगवान अभिन्न है। तस्मित जने भेदा अभाव भगवान और भक्त के बीच में भेद नहीं रहता। अगर बोल रहा है राधा तो श्री जी उसके हृदय में ही बैठे उसे प्यार कर रहे हैं। उसके हृदय में ही बैठे उसे दुलार कर रहे हैं। बाहर भीतर चारों तरफ वह अपने भगवान का सानिध्य अनुभव करता है। कोई प्रेम करके तो देखें पर हमारा प्रेम बिखर गया है।

संसार में बिखर गया, भोगों में बिखर गया, व्यक्तियों में बिखर गया, शरीरों में बिखर गया। अगर यही प्रेम समेट कर भगवान में हो जाए मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई तो अब अभी समझ में आवे कि भक्ति की पुकार ही नहीं रह जाती भगवान ही उसकी पुकार बन जाते हैं। भक्त तो भगवान में लीन हो रहा है। तन्मय हो रहा है। अब भगवान जैसा उसे नचा रहे हैं वैसा वो नाच रहा है। वो पुकरवा रहे हैं तो पुकार रहा है। रुला रहे हैं तो रो रहा है। हंसा रहे हैं तो हंस रहा है। खिला रहे हैं तो खा रहा है।

बुला रहे हैं तो बोल रहा है। चला रहे हैं तो चल रहा है। वो स्वयं में कुछ नहीं होता। स्वयं तो भगवान में लीन हो गया। भगवान में तन्मय हो गया। अब इस स्थिति को वही समझ सकता है जिसकी स्थिति है। अन्यथा केवल बातों से यह अनुभव में नहीं आ सकती। ये समझ में नहीं आ सकती। तो भगवान ही भक्ति की पुकार बनते हैं और भगवान ही उसको संपूर्ण रूप से चलाते हैं। भक्त का अहम तो भगवान में लीन हो जाता है। इसलिए भक्त केवल कहने मात्र को रहता है। वहां स्वयं भगवान का शासन रहता है। वहां स्वयं भगवान विराजमान रहते हैं।

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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