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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1109 · 30 नवंबर 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की श्री वृंदावन धाम की सदगुरुदेव भगवान की जय राहुल कुमार जी दिल्ली से महाराज जी अगर हम भगवान के अंश हैं तो वे हमारे अगर शब्द हटा हटा दीजिए ना। इसमें संशय प्रकट होता है।

हम भगवान के अंश हैं। किसका प्रश्न है? हम भगवान के अंश हैं। अगर लगा देते हैं तो मतलब महत्व खत्म हो जाता है ना। फिर संशय प्रकट हो जाता है कि अगर है मान लो तो ऐसा नहीं भगवान की वाणी पर पहले हम विश्वास करें क्योंकि हम आस्तिक है गीता में भगवान ने कहा मम वशो जीव लोके जीव भूता सनातन इस बात पर हम विश्वास करें ना विश्वास ही तो इस मार्ग की जड़ है अगर विश्वास हिल गया तो फिर रह क्या गया तो अगर हम भगवान के अंश ऐसा लगा देते हैं तो इसमें एक संशय प्रकट होता है तो तो हम अगर शब्द पहले वापस करते हैं हम भगवान के अंश हैं।

अब आगे बात महाराज जी हम भगवान के अंश हैं। वे हमारी मनोस्थिति हमसे बेहतर स्वरूप में जानते होंगे। फिर आपके जीवन में कोई अगर ऐसी परिस्थिति आती है जिसे आप सुलझा ना पा रहे हो तो हमें बोलकर उनसे मांगने की आवश्यकता होनी चाहिए या फिर उन पर भरोसा बोलकर मांगने की आवश्यकता है। जैसे अल्पज्ञ मां भी रोने का इंतजार करती है। बच्चा रोए ऐसे ही सर्वज्ञ भगवान भी हम प्रार्थना करें। हम भगवान से याचना करें और साथ में नाम जप करें। केवल याचना से बात नहीं जाए। हमारे पास नाम रूपी धन होना चाहिए।

तभी हमारी कामनाओं की पूर्ति होगी। केवल मांगने से नहीं होगी। अगर आप भजन नहीं करते हैं तो केवल मांगने से भगवान प्रसन्न होने वाले नहीं। जिन लोगों को ऐसा लगता है कि मन दो मन लड्डू पवा के भगवान को अपने पक्ष में कर लेंगे तो अनंत ब्रह्मांडों का भरण पोषण वही कर रहे हैं। इतना तो समझो। वह तो केवल आपके भाव को स्वीकार कर लेते हैं। तो हम नाम जप करें और भगवान से अपनी कामनाओं की अगर पूर्ति चाहे तो अच्छा ही है। हम उसे बुरा नहीं मानते क्योंकि भगवान से वो जीव जुड़ा खास बात है कि वो भगवान से जुड़ा।

भगवान से जुड़ना ही मंगल हो जाता है। जो भी हम भगवान से जुड़े चाहे सकाम हो या निष्काम हो तो हमारा मंगल उसी दिन से शुरू हो जाता है जिस दिन से हम भगवान से जुड़े भगवान का नाम जप किए क्योंकि अभी तक हम भूल में रहे कि हमारा स्वामी कोई और है। हमारा मित्र कोई और है। आज हम भगवान को भूल मिटाकर अपना मानना शुरू किया। मान लो कि हमारे प्रभु बहुत धनी है, लक्ष्मीपति हैं तो हमें धन की जरूरत है तो धन दे देंगे। तो हमने प्रभु को अपना मानना शुरू किया कि मेरे स्वामी, मेरे नाथ, मेरे प्रभु बस यहीं से जीव का मंगल प्रारंभ हो जाता है।

यहीं से जीव का कल्याण शुरू हो जाता है। उसी दिन को परम मंगल मानना चाहिए जिस दिन से हम भगवान को अपना मानना शुरू किया। और उसी दिन से परम मंगल मानना चाहिए जिस दिन से हमने नाम जप शुरू किया भगवान का। उस दिन से हमारा परम मंगल शुरू हो गया। अबकि अनंत जन्मों के हमारे पाप है इसलिए हमको अनुभव में नहीं आता है। लेकिन उसी दिन से हमारा परम मंगल शुरू हुआ। जिस दिन हमने राधा बोला जिस दिन हमने कृष्ण बोला जिस दिन हमने राम बोला। जी नितिका अग्रवाल जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपने एकांतिक वार्तालाप में एक बार कहा था कि भगवान कभी भी अपने भक्त का भरोसा नहीं तोड़ते ये उनकी करुणा और प्रेम की सबसे बड़ी महिमा है।

महाराज जी कृपा करके हमें ये मार्गदर्शन प्रदान करें कि हम अपने जीवन में कौन से भाव आचरण और साधन अपनाएं जिससे हमारा विश्वास भगवान के प्रति इतना दृढ़ हो जाए कि कभी भी पूरे वैसे तो सब शास्त्र भरे हैं इन्हीं बातों का वर्णन करने के लिए लेकिन हम सार बात नहीं बताते कि प्रभु जैसे इस बच्चे ने कहा हमसे अच्छा आप हमें जानते हैं। हमसे अच्छा आप हमें जानते हैं। क्योंकि कल क्या होने वाला है मुझे पता नहीं। आपको पता है नाथ जैसे हमारा मंगल हो भाव हमारा ही होना चाहिए।

जैसे हमारा मंगल हो मैं आपकी शरण में हूं। आप हमको वही सद्बुद्धि दीजिए। वही हमसे आचरण करवाइए। वही हमसे बात बुलवाइए जिससे हमारा मंगल हो। प्रभु हमारी वाणी में बैठ जाइए। हमारे हृदय में बैठ जाइए। आप हमारे द्वारा कोई अमंगल कार्य ना करवाइए। कोई गलत कार्य ना होने पावे। नाथ आपकी मैं शरण में हूं। सबसे बड़ा भाव यह है। आचरण यदि गृहस्थ हो स्त्री शरीर है तो अपने पति पर पुरुष शरीर है तो अपनी पत्नी पर शेष सब में पवित्र भावना गलत आचरण करने वाला भगवान की भक्ति में अग्रसर नहीं हो सकता।

इसलिए चरित्र पावन रखो। अपने चरित्र को ठीक करो। यह जो पराई माताओं बहनों की तरफ गंदी दृष्टि है या पराए पुरुषों की तरफ हमारा जो आकर्षण है यह नहीं होना चाहिए। अगर यह बना रहा तो अध्यात्म का मतलब क्या रह गया? फिर तो मतलब एक ड्रामा है, एक पाखंड है, एक नाटक है। आज तक हमने किया। आज सत्संग मिला। अब नसानी अब ना नई हो। ठीक हो जाएगा। सारे पाप नष्ट हो जाएंगे। लेकिन जान के पाप करो तो नरक में धुलाई होगी तुम्हारी क्योंकि तुम जान के पाप कर रहे हो अब उसको तुम्हें भोगना पड़ेगा तो इसलिए भाव तो हमारा हो सर्वभाव सब कुछ भगवान हमारे हैं और वह हमसे ज्यादा जानते हैं।

मैं उनकी शरण में हूं। वह वही करवाएंगे जिससे हमारा मंगल होगा। और आचरण चरित्र पवित्र होना चाहिए। भोजन पवित्र होना चाहिए। अगर भोजन अपवित्र है तो बड़ा भजन में प्रभाव पड़ता है कि जैसे रोटी दाल पवित्र भोजन पाके और भंडारे का गुलाब जामुन हो अच्छे-अच्छे पदार्थ पा के और बासी कुशी भी पा के जैसा मिला वैसा तो भजन में अंतर पड़ता है। जैसे बासी भोजन कई दिन का है और वह मिला तो प्रमाद स्थिति लाएगा। वो भजन नहीं होने देगा। जैसे प्याज है, लहसुन है, यह जो त्याज्य वस्तुएं हैं।

अगर इनको खाते हो आप तो आपके भजन में वृद्धि नहीं हो पाएगी। भजन पवित्र नहीं हो पाएगा। सात्विक भोजन चाहिए। सतोगुणी भोजन चाहिए और जितना पवित्र भोजन होगा उतने ही हमारे पवित्र विचार बनेंगे। तो हमारा भोजन पवित्र, हमारा चरित्र पवित्र, हमारा चिंतन पवित्र और भगवान का नाम जप करें। इसी से सब हो जाएगा। इतनी बात समझ लो। इसी से सब हो जाएगा। कई बार आप समय नहीं दे पाते हो प्रभु को दिनचर्या हां। तो हमारा हमारा हमारा कथन है कि आप जो दिनचर्या कर रहे हो उसमें जो आपका खाली समय है आप उस समय नाम जप कर लीजिए।

मान लो आपका पांच बार खाली समय मिला। राधा राधा राधा राधा फिर लैपटॉप में लगे हैं। व्यापार में लगे हैं। अपने कार्य में लगे। फिर हमको दो मिनट बाद टाइम मिला एक बार बोलने राधा फिर तो हमारा भजन बन जाएगा आप करके तो देखो करके देखो हमने एक बार बाहर कहा था कि अगर पांच मिनट में एक बार राधा नाम बोलोगे तो आप ले के देखो पांच मिनट कोई खाली ना जाए हर पांच मिनट में एक बार राधा बोलो आप फुर्सत पांच मिनट के लिए फिर एक बार राधा बोल देना पांच मिनट में आप देख लो अगर महात्मा ना बन जाओ तो बताना गृहस्ती में रहते हुए एक महापुरुष बन जाओगे आप नाम जप करके करके तो देखो तो जैसे हम लोग एक बहानेबाजी मार देते हैं कि हम बहुत बिजी हैं लेकिन गलत आप ईमानदारी से जितने में बिजी हो वो कर्म भगवान को समर्पित कर दो और खाली समय में नाम जप करो तो हम कह रहे हैं लैपटॉप चला रहे हैं एक सेकंड के लिए हमारी अंगुली रुकी राधा फिर हम चला रहे हमारे पास बहुत समय है भजन का अगर हम ईमानदारी से भजन करने के लिए सोचे तो बहुत समय है भजन करने का।

वैसे भी हमने गणित लगा के देखा कि आप 12 घंटे काम करते हो। 12 घंटे काम करते हो तो आपके पास 12 घंटे बचते हैं। 24 घंटे होते हैं ना। छ घंटे आप सो लेते हो तो आपके पास छ घंटे बचते हैं। दो घंटे आप भोजन में कर लेते हो तो आपके पास चार घंटे रहते हैं। एक घंटे मनोरंजन में दे देते हैं तो आपके पास तीन घंटे बचते हैं। अब ये तीन घंटे कहां व्यतीत करोगे? हमने एक घंटा मनोरंजन दिया, दो घंटे भोजन के लिए दिए, छ घंटे सोने के लिए दिए, 12 घंटे कार्य करने के लिए तो आपके पास फिर भी समय तो हम कहीं ना कहीं व्यर्थ में समय नष्ट करते हैं।

यदि हम व्यर्थ में समय नष्ट ना करें, जो व्यर्थ का समय है, जो खाली समय है उसमें भजन कर ले तो हमारा मंगल हो जाएगा। जैसे खाली समय में प्रभु नाम जप करते हैं अगर माला से करते हैं तो पहली मन के अगर हम 28 नाम का नाम जप करें और बाकी राधा राधा जपे तो ये विधि सही है क्या हां किसी तरह भगवान से हमें जुड़ना है हमारा मन प्रभु से जुड़े वो चाहे 28 नाम चाहे सहस्त्र नाम चाहे सतनाम कैसे भी भगवान से हमारा जुड़े नाम में जुड़ना परम मंगल है माधुरी जी महाराष्ट्र से राधे राधे महाराज जी महाराज जी भगवान ने खुद सृष्टि निर्माण की है।

तो हर इंसान को पाप और पुण्य करने की बुद्धि भी तो वही देते हैं। किस आत्मा को अब इस जीवन मृत्यु के चक्कर से निकालकर अपने में विलीन करने का निर्णय भगवान खुद लेते हैं या उस आत्मा के कर्म के प्रभाव से। देखो जैसे एक किसान को खेती दे दी जाए और बीज दे दिया जाए। बुरे और अच्छे दोनों बीज दे दिए गए। अब वह किसान की मति है बंबूल बोता है या गन्ना बोता है दागरा बोता है या वह चना बोता है ये उसके ऊपर है। ऐसे ही भगवान ने हम भगवान के अंश हैं। भगवत स्वरूप ही है। हम अपने को भूलकर मनुष्य देह में आ गए।

मनुष्य देह को अपना मैं मान लिया। अब हमारे पास दो बीज है। पाप और पुण्य। आप कर्म भूमि में पाप बोते हैं या पुण्य बोते हैं। यह आपकी छूट है। भगवान ने आपको सत्संग भी सुनवाया कि पाप और पुण्य से ऊपर भगवत प्राप्ति का भी मार्ग है। आत्म बोध का भी मार्ग है। अब आप चयन करो पाप मार्ग या पुण्य मार्ग या भगवत मार्ग। यह स्वतंत्रता आपको दे दी गई है। आपको नहीं रोका जाएगा। आप पाप कर्म करो रोका नहीं जाएगा। परिणाम उसका आपको भोगना पड़ेगा। पुण्य कर्म करो रोका नहीं जाएगा। उसका परिणाम आपको भोगना पड़ेगा।

आप अच्छे कर्म करो या बुरे कर्म करो आपको ही भोगना पड़ेगा। यह भगवान ने छूट दी है मनुष्य योनि में। और किसी 8399 योनियां हैं। वह केवल पाप और पुण्य के कर्म का फल भोगेंगे। वो पाप और पुण्य नहीं कर सकते। जैसे सिंह बलात गाय को मारकर खा जाता है। अब उसको हत्या का पाप थोड़ी लगेगा क्योंकि वही उसका आहार है और जो गाय निश्चित हो चुकी आहार वही उसके सामने पड़ेगी और वो उसी को मारेगा। हजारों के लक्ष्य में एक गाय के पीछे पड़ जाता है। तो उसी गाय का प्रारब्ध भोजन बना उसका तो वह खा गया।

उसको कोई पाप नहीं लगता। पाप और पुण्य मनुष्य योनि को लगता है। अन्य योनियों को नहीं। तो भगवान ने आपको पूरी छूट दी है। आप पाप कर्म मत कीजिए। अच्छे कर्म कीजिए। आप नाम जप कीजिए। आप तीर्थ याटन कीजिए। आप भगवत आराधना कीजिए। अब यह आपके ऊपर छूट दी गई है। इसमें भगवान नहीं। इसमें आपके ऊपर छूट दी गई। जब आप शरणागत हो जाते हैं, अपने प्राण, अपने तन, अपने मन, अपनी बुद्धि सब कुछ समर्पित कर देते हैं, तो ऐसा आपको अनुभव होने लगेगा कि हमारे जीवन की बागडोर भगवान ने पकड़ ली।

अब वो चला रहे हैं। अहंकार भगवान के जो ही शरण में गया तो अनुभव होने लगता है कि अब भगवान चला रहे हैं। देखो भगवान ने ये प्रेरणा की। देखो भगवान ने यह कर्म करवाया। उससे बुरे कर्म होने बंद हो जाते हैं। क्योंकि अहंकार में ही बुरे कर्म होते हैं। देहाभिमान में ही मैं पुरुष हूं। मैं स्त्री हूं। इसी से पाप या पुण्य कर्म बनते हैं। जब अहंकार भगवान के चरणों में समर्पित हो जाता है तो भागवत कर्म बनते हैं। पाप पुण्य कर्म नहीं वो भागवत कर्म बनते हैं। श्री कृष्ण प्रीत्यर्थ कर्म बनते हैं।

उससे वह भगवत प्राप्ति कर लेता है। तो अब यह आपको देखना है भगवत प्राप्ति करना है या पाप पुण्य कर्म करके इसी संसार के आवागमन चक्र में फंसे रहना है। आप यह नहीं कह सकते मुझे पता नहीं था। क्योंकि आपको सत्संग सुनवा दिया। बड़े भाग पाई सत्संगा। सत्संग भी सुना दिया। आपको कीमत भी बता दी कि इस कर्म का यह फल है। इस कर्म का यह फल है। इसका यह फल है। अब आप देखो क्या आप लेना चाहते हैं संसार रूपी बाजार में या इस भारत रूपी कर्म भूमि में क्या बोना चाहते हैं? ये आपके ऊपर छूट है।

शोभित जी गुरुग्राम से श्री हरवेंश महाराज जी महाराज जी हम ये कैसे पहचाने कि हम जो भी पूजा पाठ और भक्ति करते हैं क्या वो वास्तव में भगवत प्राप्ति के लिए है या केवल अपनी व्यक्त और अव्यक्त सांसारिक मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए है कोई बात नहीं है। अगर मनोकामना की पूर्ति के लिए है तो भी भगवान ने भक्त ही कहा है। अर्थार्थी अर्थ की प्राप्ति के लिए अर्थ संकट निवृत्ति के लिए जिज्ञासु भगवान को जानने के लिए और ज्ञानी जो भगवान को जान चुका है। तो यदि हम किसी कामना की पूर्ति के लिए भी भक्ति करते हैं तो मंगलमय भगवान से हमारी वृत्ति जुड़ी तो हमारा मंगल हो जाएगा।

कामना की भी पूर्ति हो जाएगी और भगवान की भी प्राप्ति हो जाएगी। अगर हमारे अंदर यह जानकारी करनी है कि मैं निष्काम हूं या सकाम तो पता तब चलेगा जब हमारे अंदर वृत्ति अंतर्मुख होगी। तभी हम जांच पाएंगे कि हमारे अंतःकरण की वृत्ति निष्काम है या सकाम। हमारी भक्ति भगवत प्रीतर्थ है या कामनाओं की पूर्ति के लिए। यदि हमारी कोई कामना है और हम उसे पकड़ पाए। हमारी ये कामना है और उसकी पूर्ति नहीं हो रही और हमें जलन हो रही तो हम अपनी साधना कामना की पूर्ति के लिए कर रहे हैं और जब उस कामना की पूर्ति नहीं हुई तो मुझे खुशी होनी चाहिए।

बड़े कृपालु भगवान हमारी कामना की पूर्ति नहीं की। आप अपनी इच्छा की पूर्ति की इसलिए मैं निष्काम धर्म के मार्ग में चलने लायक बन रहा हूं। बड़ी कृपा है। प्रभु मेरी कभी कामना पूर्ण मत करना। आपकी जो इच्छा हो वही करना तो आप निष्काम धर्म में चले जाएंगे। इसके लिए अंतर्मुखता चाहिए। अंतर के अंतःकरण की जांच चाहिए कि हमारे अंदर कौन सी कामना है और उसकी पूर्ति में भगवान से श्रद्धा बढ़ती है और उसकी आपूर्ति में श्रद्धा घटती है तो वो कामना से संबंधित है और यदि कामना की अपूर्ति में कामना की ना पूर्ति में हमें खुशी होती है तो हम निष्काम भाव से चल रहे हैं।

रवि गांधी जी दिल्ली से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी संसार में नश्वर है फिर भी हम क्यों भौतिक चीजों की तरफ भागते हैं यही तो हमारा बहुत सबसे बड़ा जाल है कि कि जानते हैं कि यार मर जाना है जालते हैं कि शरीर भी छूट जाएगा जानते हैं कि ये सब छूट जाएगा फिर भी इसी के लिए फंसे हुए हैं एक प्रसंग आता है मार्कंडेय पुराण में कि एक व्यापारी उसका सब कुछ परिवार वालों ने लूट लिया, छीन लिया और उसको पीट करके घर से भगा दिया और एक राजा सूरत जिसका सब कुछ छीन गया था राज्य तो दोनों मिले और दोनों ने आपस में बातचीत की तो दोनों ये कह रहे हैं कि मैं करूं तो क्या परिवार वालों ने मेरा सर्वस्व छीन लिया।

वो वैश्य कहता है व्यापारी वो वैश्य कुल का था। मेरा सब कुछ छीन लिया लेकिन मेरा मन उन्हीं के प्यार में फंसा है। लगता है वो राजी हो जाए और मुझे रख ले। मुझे वैराग्य नहीं हो रहा। उस राजा ने कहा मेरा सब कुछ छीन गया है। फिर भी मैं राज्य चाहता हूं। अब क्या करूं? तो उनका आद्या शक्ति ये माया का प्रभाव है। आध्या शक्ति भगवती दुर्गा की आराधना की जाए। मार्कंडेय ऋषि के दुर्गा जी की आराधना की जाए। देवी की आराधना की जाए। वो अपनी माया को हटावें। हमारे अंदर ज्ञान प्रकट करे तो यह बात आवे।

एक बार श्री स्वामी वामदेव जी महाराज अपनी मंडली के साथ भ्रमण कर रहे थे। अभी कुछ ही सब वर्षों पहले की बात है। तो एक जवान आदमी बूढ़े को जूते से पीट रहा था। तो उन्होंने भ्रमण करते हुए देखा तो मंडली को रोका और उसके पास गए जो वो जवान घर के अंदर चला। बोले कौन था ये? उनका बेटा था। बोले जूतों से पीट रहा था। तुम्हें बुरा नहीं लगता है। चलो हमारी मंडली में चलो। हर समय तीनों टाइम भोजन मिलेगा और भगवान नाम कीर्तन सुनो। भगवान की कथा सुनो। वृद्ध शरीर क्यों ऐसी पीड़ा सहते हो?

तो उनका लड़का हमारा पीठ हमे रहा है। तुम काहे को परेशान? वासुदेव जी महाराज ने कहा इतनी प्रबल माया है कि वो जूतों से पीट रहा है। फिर भी वो उसी का पक्ष ले रहा है। मंडली में नहीं आ रहा है। वो विरक्त नहीं हो रहा। यही भगवान की प्रचंड माया है। हम जानते हैं कि हमारा जीवन व्यर्थ जा रहा है। हम सच्चिदानंद भगवान की प्राप्ति के लिए मानो जीवन प्राप्त किया। गर्भ में भगवान से वादा करके आए हैं कि हम जब मां के गर्भ से निकलेंगे तो ऐसा भजन करेंगे कि दोबारा मां के गर्भ में ना जाना पड़े।

लेकिन वो सब बातें हम भूल गए। गर्भ की भी बात भूल गए। इसी जन्म में हम 9 महीने गर्भ में रहे। कितना कष्ट रहा। हमको कोई ज्ञान नहीं है। पर हम ऐसा फंसते चले गए। अब देखो निकलने की कोशिश करो तो निकल नहीं सकते। और कोई हमें बांधे नहीं। हम ही बंधे हुए हैं। पत्नी का मोह, पुत्र का मोह, पुत्री का मोह, मकान का मोह, परिवार का मोह, रिश्ते नाते का मोह, बैंक बैलेंस का मोह और ये सब एक सेकंड में छूट जाने वाला है। लेकिन ये जानते हुए भी जो हम नहीं छोड़ पा रहे हैं। यही अज्ञान है।

यही माया का बंधन है और यही साधना से कटता है। जब हम साधना करते हैं, भजन करते हैं तो एक एक चीज स्पष्ट दिखाई देती है। हम लोगों ने काम को ऐसे देखा जैसे आपको देखा है। यह काम, यह क्रोध, यह लोभ, यह मोह, उसकी वृत्ति, उसकी वृत्ति को कैसे नष्ट करना है वो सब भगवान ज्ञान प्रदान कर देते हैं। तब जब साधना करें। तो इसीलिए सबसे कहते हैं ज्यादा कलयुग है। कोई अन्य साधनाएं बन नहीं सकती। इसलिए नाम जप करो। कलयुग केवल नाम अधारा जितना तुम अधिक राम कृष्ण हरि नाम जप करोगे राधा राधा नाम जप करोगे तुम्हारी बुद्धि शुद्ध हो जाएगी और तुम भगवान को प्राप्त हो जाओगे नाम में बहुत बड़ी सामर्थ्य है ब्रह्म राम ते नाम ब अब ध्यान दीजिए इस बात पर ब्रह्म राम ते नाम ब वरदायक वरदान रामचरित शतकोटि महेश जी जान 100 करो करोड़ रामायणों का जब मंथन किया भगवान शंकर ने 100 करोड़ रामायण तब उसमें सार निकला कि ब्रह्म राम से भी बढ़कर के भगवान का नाम है।

100 करोड़ ग्रंथों का अवगाहन करने के बाद सार बात निकली कि ब्रह्म राम ते नाम बढ़ वरदायक वरदान। वरदान देने वालों को भी वरदान देने की सामर्थ्य नाम जापक में है। इसलिए नाम जप करो। कलयुग में नाम का ही एकमात्र आश्रय है जो हमारा उद्धार कर सकता है। नहीं तो प्रचंड माया मोह इसी को कहते हैं कि हम लोग सब जानते हैं। जब फूंक के आते हैं ना किसी को तो जब फूंकने ले जाते हैं तो एक गीत गाया जाता है। राम नाम सत्य है। देखो सब लोग जोर-जोर से गाते हैं। सुनाई दिया देता है।

क्या कह रहे हैं? राम नाम सत्य है। सत्य बोलो मुक्ति। तो अब अब आप विचार करो जब जानते हैं कि सत्य है फूंकने जा रहे हैं तो फूंक के आते हैं तो कोई तंबाकू खा रहा है कोई बीड़ी पी रहा है उसको ज्ञान नहीं है कि हमको भी फूंका जाएगा आज नहीं तो कल हमारी भी गति होगी यही प्रचंड माया है अतिशय प्रबल देव तौ माया छूट राम करो जब दाया भगवान जब दया करे कृपा करें तो कब कृपा करेंगे कृपा हो चुकी है हम लोग खूब नाम जप करें भगवान का स्मरण करें नाम कीर्तन करें। भगवान की कथा सुने।

अपने कर्मों को पवित्र करें और भगवान को समर्पित कर दें। तो हमारे अंदर ज्ञान प्रकट हो जाए तो इसी संसार में रहते हुए हम भगवान को प्राप्त हो जाएंगे। भागने की जरूरत नहीं। कहीं भागने की जरूरत नहीं। सत्यजीत जी राधे राधे। श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मैं अमेरिका में रहता हूं और आपका सत्संग रोज सुनता हूं। तो ऐसा आभास होता है कि मैं नर्क तो नहीं जाऊंगा परंतु पुराने कर्म ऐसे हैं कि स्वर्ग भी नहीं जा पाऊंगा। अब मैं बीच में खड़ा हूं। क्या करूं मैं? बिल्कुल चिंता मत कीजिए।

हमारी बात को गंभीरता से सुनिएगा। एक दिया सलाई एक मुट्ठी रुई को जलाने के लिए काफी है। तो एक दिया सलाई रुई के पहाड़ को भी जलाने के लिए काफी है। क्यों? उसके लिए हमको पहाड़ जैसी दिया सलाई लेनी चाहिए। एक ही दिया सलाई चाहिए ना। बस एक नाम पकड़ लो आप। चाहे पहाड़ जैसे पाप हो सब भस्म हो जाएंगे इसी जन्म में। हमारी बात पर विश्वास करो। अपने कर्मों की तरफ मत देखो। भगवान की कृपा की तरफ देखो। भगवान कृपा करें तो बहुत जल्दी हमको निर्मल कर सकते हैं। और उनकी कृपा तभी होगी जब हम नाम जप करें।

आप नाम जप पर विश्वास रखिए। नाम जप कीजिए। पहाड़ के पहाड़ जैसे पाप नष्ट हो जाएंगे। पर नाम के बल से नए पाप मत कीजिए। फिर दोष हो जाएगा। फिर नाम अपराध लागू हो जाएगा। क्योंकि आप नाम अपराध कर रहे हैं। नाम के बल से पाप करना यह नाम अपराध है। नाम को अब जैसे हमने महिमा सुनी और हमने लगा कि अभी तक मैं पाप करता रहा तो आज से नियम ले ले अब नसानी अब नान नश हो। आज तक तो किया अब नहीं करेंगे। तो नाम भगवान विश्वास करो सारे पाप नष्ट कर देंगे। नाम संकीर्तनम यस सर्व पाप प्रणाशनम सब प्रकार के पापों का नाश करने की सामर्थ्य भगवान के नाम में भगवान के नाम कीर्तन में है।

आप अमेरिका में रहो चाहे जहां रहो हमारे भगवान ने जब एक पैर बढ़ाया तो ब्रह्मलोक तक गया अमेरिका तो बहुत नजदीक है। ज्यादा दूरी नहीं है। आधा घंटे रोज नाम कीर्तन करो। हर समय नाम जपने का प्रयास करो। गंदे भोजन का त्याग करो। गंदे आचरण का त्याग करो। निश्चिंत रहो। पीछे के सारे पाप भस्म हो जाएंगे। भगवान के नाम के प्रताप से। राधिका शर्मा जी इंदौर से। राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी अभी कुछ समय पहले कह रहे हैं कि आपकी माता जी का दाहिका शक्ति से चपेट में आ गई। आरती कर रहे थे।

जलते समय भी महाराज जी उनकी बड़ी अच्छी स्थिति थी कि हरिवंश नाम भी ले रहे थे। राधा वल्लभ श्री हरिवंश, राधा वल्लभ श्री हरिवंश। और जब उनको होश आया बेहोशी की स्थिति में भी राधा नाम ही ले रहे थे और 84 जी करते-करते इतना 25 दिन ऐसे निकाले उन्होंने ब्रज दक्ष लगाके और पूरा एकदम आश्रित और नाम फिर महाराज जी वो पंच तत्व में विलीन हो गए तो कह रहे हैं कि पर महाराज जी कुछ लोग कहते हैं कि 25 दिन तक इतनी पूजा पाठ करते थे फिर भी वो उन्होंने नहीं वो लोग क्या वो लोग क्या जाने वो लोग क्या जाने हां अंतिम स्थिति बहुत बढ़िया थी कह रहे केवल नाम और अंतिम स्थिति इसका कोई इससे कोई महत्व नहीं रखता कि उनका शरीर जल गया इससे कोई महत्व नहीं रखता बड़े-बड़े संतों की बड़ी-बड़ी विचित्र लीलाएं हुई।

हम तुम्हें कहां तक सुना पूज्यपाद उड़िया बाबा ब्रह्मलीन महापुरुष हर समय ब्रह्माकार वृत्त गड़ासे से काटे गए हैं वृंदावन में ध्यानस्थ बैठे हुए थे तो उन्हीं के आश्रम में एक रहता था। वो आया तो दो शिष्य मोर छल डुड़ा रहे थे। बाबा ध्यानस्थ बैठे थे। नीचे प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की भागवत कथा हो रही थी। तो बाबा ऐसे ध्यानस्थ बैठे थे। वो आया बोला लाओ मैं मोरछल डुलाऊंगा भाई सबको अधिकार थोड़ी है संतों की सेवा का तो तुम कैसे अधिकार होता है ना देखा तो उन्होंने मना कर दिया अब वो गुस्सा के गया चारा काटने वाला गड़ासा जो होता है हाथ से देहात में चारा काटा जाता है वो गड़ासा होता है वो गड़ासा ले आया और कंबल में लुका के लाया और पांच छह गड़ासे महाराज जी के मारे छछ इंच घुस गए खून के फव्वारे चलने लगे अब इतना बड़ा हादसा हो गया।

ओम इतना उच्चारण किया और शरीर छोड़ दिया। अब सोचो जीवन भर भजन किया ऐसे महापुरुष और अंतिम समय ऐसा उनका व्यतीत हो रहा है। बक्सर के मामा जी बहुत बड़े संत थे। कथा कहने जा रहे थे। एक्सीडेंट हुआ। जोर से चिल्लाए राधा और बस खत्म। गाड़ी का एक्सीडेंट कितनों के हम आपको बताएं। अच्छा अगर उनको मान लो 20-25 दिन व्यतीत हुए। मुझे 20 साल हो गए किडनी का कष्ट भोगते हुए। हमें पूरे जीवन भर कष्ट भोगना है। अब जितने जीवन है अब आप कहो बचपन से भजन में लगे। अगर ये तारतम्य देखा जाए भोगने का तो इसका भजन से कोई तारतम्य नहीं है।

यह पूर्व के कर्मों का परिणाम है। हमें इस पर नहीं जाना चाहिए कि लोग क्या कहते हैं। मतलब कितने ऐसे पापी लोग हैं जिनको जुखाम नहीं होता। यहां बचपन से बाबा जी का किडली खराब तो अब यह चीजें थोड़ा भगवान की बात समझनी होगी कि हमारा अंतिम जन्म है। अब हमारे जितने भी पाप कर्म है संचित तो भस्म हो गए। अब जो प्रारब्ध रहा उसे हम भोग लेते हैं और कृमाण भगवान की शरण में जा रहा है। अब हम भगवान को प्राप्त हो जाएंगे। तो आखिरी जन्म जिन संतों का होता है तो उनकी थोड़ा बड़ी विचित्र लीलाएं होती है।

थोड़ा-थोड़ा करके भोग भुगवाया जाता है। तो ये ये रहस्य रघुनाथ कर वेग ले जा कोई जो जाले रघुपति कृपा तो सपने मोह न होए नहीं तो भ्रम हो जाता है कि यार भजन करने वाला जो है दुख पा रहा है और पाप करने वाला मौज उड़ा रहा है। ऐसा लोगों को भ्रम हो जाता है। प्रियंकल जी करनाल से राधे राधे महाराज जी महाराज जी भगवत सत्संग में सुना है कि पर निंदा से भजन नष्ट होता है। प्रभु शरीर का कोई रिश्ता ऐसा हो जिसकी बात सुननी पड़ती हो और उसकी उम्र भी ऐसी हो कि हम कुछ उसको बोल ना पावे तो ऐसे में सुनने में अपराध लगेगा या उस स्थिति में हम उस समय अंदर अंदर राधा राधा रटो ये पक्की बात भजन नष्ट नहीं होता।

भजन तो किसी भी कारण से नष्ट नहीं होता। भजन अविनाशी है। पुण्य नष्ट होता है। पुण्य जो है जो आप दान पुण्य करते हैं, जो आपके पुण्य है, वह नष्ट हो जाते हैं। भजन नष्ट नहीं होता। यह पहले भ्रम हटा दो। किसी भी कारण से कभी भजन नष्ट नहीं होता। आपने एक बार राधा कहा यह कभी नष्ट नहीं हो सकता। यह आपको फल दे के रहेगा। हां, अब आपने अपराध किया तो ऐसे रुक जाएगा। राधा नाम जप नहीं पाओगे और उसका फल अभी नहीं मिलेगा। पहले आप दंड भोगो फिर वह फल प्राप्त होगा। तो हम किसी की निंदा करें या निंदा सुने तो हमारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं।

भजन नष्ट नहीं होता। भजन रुक जाएगा। भजन नष्ट नहीं होगा। तो हमें ऐसी परिस्थिति में मानो घर में है और अपने बुजुर्ग जन है या पति ही है या परिवार का सदस्य है और वह संतों की निंदा करता है या किसी की भी निंदा करता है तो अंदर अंदर जलन महसूस होनी चाहिए और राधा राधा राधा अगर ऐसा है तो फिर आपको पाप नहीं लगेगा। वैष्णवी जी राधेधे महाराज जी राधे-धे महाराज जी महाराज जी मैं पेशे से डॉक्टर बन रही हूं जब हमारी ड्यूटी ऐसी जगह लगती है जहां पर वार्ड में कई मरीजों की मृत्यु हो जाती है तब मन अशांत और विचलित सा हो जाता है महाराज जी कैसे हम अपने आप को शांत रखें नहीं पहली बात तो यह है इस लोक का नाम है मृत्यु लोक मरना यहां स्वाभाविक है अब अगर कोई मरीज ऐसा आता है जो आपकी उपचार वृत्ति से बच जाता है तो उसको बचना था इसलिए बच जाता है और यदि वह आपके पूर्ण प्रयास के बाद भी वो शरीर त्याग देता है तो उसका मृत्यु का राइट टाइम है उसे कोई ना डॉक्टर टाल सकता है ना कोई ऋषि मुनि टाल सकता है जो मृत्यु का टाइम है उसी समय वह मरेगा मानो अगर अस्पताल में जाकर के मृत्यु कई की हो रही है तो उनकी मृत्यु होनी है जैसे बहुत अच्छे डॉक्टर होते हैं।

सफलता पूर्वक ऑपरेशन करते हैं। फिर भी असफलता हाथ लगती है और वह मरीज मर जाता है। तो उसको मरना ही था इसलिए मर जाता है और बहुत जगह ऐसा होता है सफल हो गया और जीवित हो गया तो उसको जीवित होना है इसलिए वह जीवित हो जाता है। उसमें डॉक्टर का कोई दोष नहीं देना चाहिए कि डॉक्टर ने कोई प्रयास कम किया। हर डॉक्टर चाहता है। उसको दो उद्देश्य होते हैं। एक तो उद्देश्य होता है कि मैं कितने मरीजों को स्वस्थ करूं। मेरी जो विज्ञान दृष्टि है, डॉक्टरी दृष्टि है, उसके द्वारा मैं कितनों को सफलता पूर्वक ऑपरेशन कर सकूं, कितनों को सुख पहुंचा सकूं।

और एक होता है धन वृत्ति। तो जिनकी धन वृद्धि है उनसे चूक हो सकती है। उनसे चूक हो सकती है क्योंकि वह मरीज के दर्द को महसूस नहीं कर रहा। वो केवल अपना व्यापार मानकर डॉक्टरी का धन लेने। लेकिन जिनको अपनी डॉक्टरी का प्रयोग करके दूसरों को सुख पहुंचाने वो कभी ऐसा नहीं कर सकते कि वह चूक कर दें। ऐसे डॉक्टरों से भी असफलता हो जाती है कि मृत्यु हो जाती है तो उस समय मानना चाहिए कि इस व्यक्ति की मृत्यु ही निश्चित थी उसी टाइम पर मृत्यु हो गई है और जो लोग प्रमाद करते हैं डॉक्टरी में फिर भगवान उनको क्षमा नहीं करते क्योंकि आप डॉक्टर हो मरीज आपको समर्पित है अगर आप प्रमाद स्थिति करते हैं तो उस प्रमाद स्थिति में आपको दंड का भागी बनना पड़ेगा जब समय आएगा तो यह कर्म आपको फिर दंड देगा भोग तो आप आप उसमें निश्चिंत रहिए।

आप अपना प्रयास सफलता पूर्वक करते रहिए। और अगर मृत्यु हो जाती है तो वो तो मृत्यु होना ही है। इस लोक का नाम ही मृत्यु लोक है। तो हमें उसको बचाने की कोशिश करना है। 100% जब नहीं बचता है तो भगवान की विधान मृत्यु विधान है इसलिए वो मर गए। इसलिए ज्यादा शोक करने की जरूरत नहीं क्योंकि इस लोक का नाम ही मृत्यु लोक है। सीमा सोनी जी राधा श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी यदि कोई स्त्री अपने ग्रस्त कर्तव्यों और ऑफिस के कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाते हुए यथासंभव भगवत स्मरण करते हुए जीवन यापन करे तो क्या उसे इसी जीवन में भगवत प्राप्ति का संयोग?

हां बिल्कुल बिल्कुल हो सकता है। यदि वह पापा आचरण ना करें। अपने पति को भगवान माने। किसी से द्वेष ना करें। शरीर पवित्र, मन पवित्र, विचार पवित्र और भगवान का नाम जप कर रहे तो निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा। तो निर्मल मन हुआ तो भगवान की प्राप्ति हो ही जाएगी। जो हमसे कोई गंदे आचरण नहीं होते। नाम जप करते हैं। अपने कर्म को भगवान को समर्पित करते हैं। अपने पति को भगवान का स्वरूप मानते हैं। तो निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी। गोकुलेश त्रिपाठी जी बनारस से राधे राधे जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी क्या सद्गुरु हमें दीक्षित करके ही प्रभु के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं या हम बिना दीक्षा लिए भी उनकी वाणी में विश्वास कर भगवत प्राप्ति के मार्ग पर प्रशस्त हो सकते हां दोनों बातें हैं।

अगर हमारी श्रद्धा इस कोट की नहीं बनती कि हम दीक्षा आदि के रूप उसमें तो उनकी वाणी पर चले तो वो शिष्य ही माना जाएगा। जो संत वाणी का अनुसरण करता है तो संत वाणी में सब कुछ व्यक्त हो जाता है। कुछ गुप्त नहीं रहता। संत इतने उदार होते हैं जो अपने हृदय की साधना के गुप्त से गुप्त रहस्य को भी समाज को दे देते हैं। तो अगर हम उनकी वाणी को गौर से सुने और उसी के अनुसार चले और नाम जप करें तो बिना दीक्षा लिए भी कल्याण हो जाएगा। क्योंकि हमने गुरु तो मान ही लिया ना।

उनकी वाणी का अनुसरण कर रहे तो गुरु मान के तो कर रहे हैं। तभी हमारी श्रद्धा पुष्ट तभी होगी जब हम गुरु भाव रखेंगे। तो हम उनकी वाणी का अनुसरण करें और उनके द्वारा दिया हुआ नाम जप करें। जैसे जो संत है कोई कह रहा है राम राम जपो कोई कह रहा है राधा राधा जपो। तो उनके मुंह से हमने राधा राधा पकड़ लिया। यह हुआ गुरु मंत्र और उनकी वाणी को सुनकर हम अनुसरण कर रहे हैं। यह हमारा मार्ग हो गया। तो गुरु मंत्र और मार्ग से भगवत प्राप्ति हो जाएगी। नित्या जी श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मैं श्री जी और ठाकुर जी को माता-पिता के भाव से मानती हूं।

मेरी इच्छा है कि इस जन्म के बाद अगले जन्म में जैसा मैं चाहती हूं और श्री जी की इच्छा मिलाकर जिसमें मैं और अच्छे से इस मार्ग पर चल पाऊं। भगवत प्राप्ति कर सकूं तब मुझे सदा के लिए तो अगले जन्म के लिए क्यों सोचते? इसी जन्म में क्यों नहीं कर लेती? अगला जन्म पता नहीं पशु- पक्षी का मिले। गारंटी थोड़ी कि हम मनुष्य ही बनेंगे। कोई गारंटी नहीं। इसलिए हमको इसी जन्म में काम करना चाहिए। जो हमें अन्य जन्म के लिए सोच रहे हैं वो इसी जन्म में कर लेना चाहिए। ये तो बहुत गलत धारणा हो गई कि अगले जन्म में करेंगे।

नहीं नहीं इसी जन्म में अभी से शुरू करो। काल करे सो आज कर। आज करे सो अब पल में प्रलय होएगी। बोर करोगे कब? अभी जपो राधा राधा अभी जपो। नरेश उपाध्याय जी श्री राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मेरे मन में एक विडंबना है कि किसी साधु महात्मा को या कोई घर में मांगने के लिए आता है तो आटा चावल दाल या कुछ भी भिक्षा देते हैं तो अगर उसको बेच के अगर मदिरापान करता हो तो हां तो गलत है गलत है आप भी गलत फल के भागी बनेंगे इसीलिए हम प्राय सबसे प्रार्थना करते हैं कोई मांगने आता है कुछ संत ऐसे हैं कुछ संत ऐसे हैं जो आटा मांग लाते हैं।

15 दिन के लिए अपना बनाया खाया। फिर 15 दिन के लिए मांग लाते हैं। ऐसे हैं हमारे ब्रज मंडल में संत जो चून आटा को चूर्ण कहते हैं और चुटकी मतलब इतना आटा ऐसे वो 10 15 20 घरों से मांग लिया। दो चार किलो हो गए। वो भजन करते हैं तो हमें लगता है कि अगर हमारे घर कोई प्रार्थना मतलब मांगने आवे तो हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि आप बैठकर रोटी दाल भर पेट चाय पा लीजिए या आपकी इच्छा है तो दो रोटी ले लीजिए और ऐसी प्रार्थना कर देनी चाहिए अन्न है रुपया है बहुत देख समझ के देना चाहिए अगर बोले तुम्हें श्राप लगेगा अगर इतनी सामर्थ होती तो घरघर भटकते काहे को श्राप और वरदान देने की सामर्थ होती तो दरवाजों पे भटकना नहीं होता समझते हो काफी सारे ऐसे हैं वो पैसे मांगते हैं कि ₹500 दे दो हमें।

घोर पाखंडी होते हैं जो ऐसा कहते हैं। यही वृंदावन में दर्शन हुए थे। किसी ने एकदम से हमसे अपशब्द बोला मतलब कि अगर नहीं करोगे तो ये आपके साथ कष्ट होगा। और जीवन में उसी अगले साल हमारा नया पुत्र हुआ तो उसको बहुत पीड़ा हुई। तो हम लोगों को लगा कि हम नहीं नहीं नहीं। ऐसा कभी नहीं। वो संयोग है। देखो वो संयोग है। कि आपका प्रारब्ध बुरा आ गया। और आपको लगा कि उस महात्मा ने कह दिया तो ऐसा हो गया। बिल्कुल कदापि नहीं। ऐसा कदापि नहीं वो बुरा प्रारब्ध आना ही था। उसके लिए महात्मा का कोई उसमें वाक्य नहीं है।

कोई तो आप निश्चित समझ लो कोई ऐसा साप और वरदान देने वाला समर्थ महात्मा वो यह नहीं कह सकता कि अगर आप यह नहीं दोगे तो आपको ऐसा हो जाएगा। ऐसा कभी नहीं कह सकता। मांग सकते हैं। वो भिक्षावृत्ति से आते हैं। ऐसे भी महापुरुष भी होते हैं जो भिक्षावृत्ति से आते हैं। तो वो बहुत संतोषी होते हैं। अगर आप ना कह दीजिए तो अच्छा बेटा वो चले जाएंगे क्योंकि वो इतनी क्षमता प्राप्त कर चुके हैं और जो ये कि हम तुम्हारा अहित हो जाएगा तो ऐसा नहीं। ऐसे कोई नहीं ऐसा कोई नहीं।

तुम्हारा अहित नहीं कर सकता। हम तुमसे वादा वादा करते हैं क्योंकि इतनी सामर्थ उसमें नहीं है कि तुम्हारा अहित कर सके। हां रोटी दाल पा लो आप ठंडी लग रही है आपके पास कपड़ा नहीं तो लो हमारी जैकेट ले लो पहन लो आप अगर बीमार हो तो चलो मैं औषधि दिला दूं तुम्हें इतनी सेवा तो हम कर सकते हैं इसके आगे रुपया हमें जहां देना है वहां बहुत होश में देना है और यह बेच लेगा इसको भी बहुत होश में देना है क्योंकि वह शराब पीता है मांस खाता है तो उसके भागीदार हम भी तो बनते हैं ना इसलिए दान सुपात्र को देना चाहिए शास्त्रों में वर्णन आता है दान को सुपात्र को देना चाहिए।

कुपात्र को नहीं देना चाहिए। और प्राय जो अच्छे संत होते हैं जो भगवान में अपने जीवन को तो जैसे हम लोग मांग के खाए हैं आदेश शास्त्रों का आचार्यों का आदेश भिक्षा वृत्ति करें। उससे अभिमान नष्ट होता है। पांच घरों में जाके एक-एक रोटी दो-दो रोटी मांग ली अपना दिन भर के लिए भोजन ले आए वह चला और जैसे आटा मान लो गुरु जी हमारे स्वयं बनाते थे बना के लाडली लाल को भोग लगा के पढ़ाते थे तो उनके लिए जैसे गांव में गए आटा मांग लाए दो ढाई किलो 3 किलो 4 किलो जो मिला वो 8 10 दिन 15 दिन जो चला फिर मांग लाए जाके तो कुछ ऐसे संत हैं जो मांग करके आटा ले जाते हैं वो पहचान हो जाती है तो प्राय प्रार्थना कर दे कि हमारे हमारे यहां से बना हुआ भोजन मिल सकता है।

आपको लेना हो ले लीजिए। आप बैठकर पा लीजिए नहीं तो फिर और ले लीजिए। तो अगर वो कहता है कि सांप यदि कुछ ऐसा तो उस पर ध्यान ना दे। राधा राधा राधा राधेधे चलो। बस इतना है कि राधे-धे चलो। कोई भी सामर्थ्यशाली महात्मा ऐसा नहीं होता जो तुम्हें इस तरह का व्यवहार करे। हां अगर तुम मार भी दोगे तो तुम्हारा मंगल मनाएगा। अमंगल नहीं मना सकता। जो सच्चा संत है वो कभी अमंगल नहीं मना सकता। यह बात पक्का समझ लो। अगर किसी कारणवश वो नाराज हो जाता है। जैसे देवर्षि नारद जी विचरण कर रहे थे।

कैलाश के समीप ही अलकनंदा थी। अलकनंदा में कुबेर के नलकूबर मणिग्रीव नाम के दो पुत्र यह अब इतने बड़े धनाध्यक्ष त्रिभुवन के कुबेर जी अब उनके पुत्र तो वो देव मदिरा पान करके जो देवता लोग पान करते हैं वो मदिरा पान करके गंगा जी में निर्वस्त्र अप्सराओं के साथ जल क्रेल रहे थे तो अप्सराओं ने देखा देवर्षि नारद जी तो फौरन शर्माकर बाहर निकली और वस्त्र आदि धारण करके प्रणाम किया लेकिन वो वो वैसे ही मदिरा के नशे में गंगा जी में तो उनका तुम देवताओं में श्रेष्ठ कुबेर के पुत्र होकर इस तरह अभद्र व्यवहार करते हो तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है तुम श्री मतलब धन से मतवाले हो रहे हो इसलिए तुम्हें ज्ञान भी नहीं है कि कौन तुम्हारे सामने खड़ा है क्या है तुम इस तरह मधुर मत हो रहे हो जाओ मैं श्राप देता हूं तुम वृक्ष योनि को प्राप्त हो जाओ जब श्राप की बात कही तो घबरा गए चरणों में गिरे तो देवर्षि नारद जी ने कहा वृक्ष तो बनो लेकिन नंदालय के वृक्ष बनो।

तो नंद भवन के सामने यमार्जुन नाम के वृक्ष के रूप में यह दोनों भाई वहां प्रकट हुए और भगवान की जब उखल बंधन लीला हुई तो उखल बंधन से भगवान उखल को घसीटते हुए इन दोनों वृक्षों के बीच में आए और झटका मारा। दोनों वृक्ष उखड़ गए और दोनों अपने स्वरूप को प्राप्त हुए। तो देखो कहां मदिरा पिए निर्वस्त्र गंगा जी में खड़े और कहां देवर्षि की हम श्राप कहे या कृपा कहे कृपा कहेंगे साफ रूप से कृपा देकर भगवत साक्षात्कार करवा दिया श्री कृष्ण चंद्र जी जो का दर्शन और स्पर्श प्राप्त हुआ नलकूबर मणिग्रीव को और पुनः अपने स्वरूप को प्राप्त हुए तो सामर्थ्यशाली महात्मा मुनिन का क्रोधौ मुक्ति दातार अगर मुनि जन सामर्थ्यशाली संत क्रोध भी करें तो मोक्ष क्ष प्रदान कर देते हैं।

वो भगवान को प्रदान कर देते हैं। ऐसे घटिया बात नहीं। संत वही है जिसको तुम गाली दो और वो तुम्हारा मंगल बनाए उसे संत कहते हैं। उमा संत कह यह बाई मंद करत जो करे भलाई तो बिल्कुल मत डरना। कुछ नहीं होने वाला। राधा राधा ऐसे संतों से कहे राधे-राधे महाराज बैठ के मनो तो भोजन पालो नहीं तो पधारो कोई बात नहीं। महाराज जी क्या हृदय बहुत नाजुक होता है क्योंकि घर परिवार में मोह होता है तो वो बात भले हम ना दें भेज दें पर वो बात घर कर जाती है और जब भी कुछ बुरा होता है तो बार-बार याद आते हैं कि ऐसा बोला था मेरा अपराध बन गया ये बहुतों के बहुतों के प्रश्न भी होते हैं तो महाराज जी इस पे अपने कर्मों का ही माने बिल्कुल बिल्कुल अपने कर्मों का ही फल और सहयोग बन गया ऐसा तो बार-बार लगता है कि ऐसा नहीं किसी के गलत करने से ऐसा हो तो सब संसार को लूट लेना ऐसा नहीं ऐसा

बिल्कुल नहीं को ना राहु के सुखदख कर दाता निज कृत कर्म भोग सुनाता हां गृहस्थ धर्म में एक आतिथ्य धर्म है आए हुए अतिथि का सत्कार करना अपने दरवाजे पे जो मांगने आया है उसका आदर करना तो हम प्रिय वचन तो बोल सकते हैं पहला आदर होता है प्रिय वचन राधेश्याम हाथ जोड़ लिया राधेश्याम आइए आइए क्या सेवा करें हमें ₹5000 दे दो नहीं पानी पियोगे आप भोजन पाओगे नहीं फिर हम रुपया नहीं दे सकते खत्म खेल कोई अपराध आपको नहीं लगेगा क्योंकि आपने पहला आदर किया है उनका निरादर किसी के ऐसे नहीं किसी राधे भले वो भिक्षुक है किसी भी तरह का है राधेश्याम राधेश्याम आइए आप जल पिएंगे नहीं भोजन पाएंगे नहीं फिर आप पधारिए महाराज जी इसमें एक सावधानी और मांग रहे हैं महाराज जी जैसे संतों का आदर करना चाहिए तो उनको घर में तो ना घुसाए ना हां नहीं गेट के बाहर से पता नहीं वह संत है या असंत है।

संत है या असंत है। हमें तो पता नहीं है। तो हम दोनों का आदर करते हैं क्योंकि हमें पता नहीं। पर गेट के बाहर गेट के अंदर किसी को नहीं। भोजन भी पाना है तो आप गेट के बाहर बैठो। हम घर से ला करके देते हैं। और जो सच्चा संत होगा वो गेट के अंदर घुसेगा ही नहीं। क्योंकि आदेश होता है द्वार से भिक्षा मांगना। द्वार के अंदर घर में प्रवेश करने के लिए गुरुजन निषेध करते हैं कि किसी भी गृहस्ती के घर में प्रवेश मत करो। उसके दरवाजे पर जाकर राधेश्याम बोलो। जोर से आवाज बोलो।

वो जो दे दे भिक्षा वो ले चले आओ। ऐसा आदेश हो। सोहित कुमार जी दिल्ली से। राधे-राधे महाराज जी गुरु जी मुझे आपकी ओर श्री राधा रानी की कृपा से पांचवी बार वृंदावन आने का मौका मिला। मैं रामानंद संप्रदाय से दीक्षित हूं। महाराज जी आप कह रहे हैं कि सभी बड़े संतों के हजारों संख्या में ग्रस्त और विरक्त शिष्य होते हैं। उनमें से लगभग सभी गुरु प्रदत्त साधन प्रणाली का पालन भी करते हैं। उन सभी शिष्यों के मन में यही भाव रहता है कि हम गुरु प्रदत्त साधन प्रणाली का पालन करते रहे तो हमें इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

महाराज जी मेरा प्रश्न है कि क्या गुरु प्रदत्त साधन प्रणाली का पालन करने वाले सभी शिष्यों को भगवत प्राप्ति हो जाती है? केवल उन शिष्यों को होती है जिन्हें शरीर रहते हुए स्वरूप बोध अथवा भगवत साक्षात्कार प्राप्त नहीं जैसे प्रयत्नशील है प्रयास बहुत कर रहे हैं साधना में लेकिन सफलता नहीं मिल रही तो अंतिम समय जब उनका आता है तो उस समय भगवान उनको सफलता प्रदान करते हैं। क्या अंतिम समय भगवान स्वयं स्मरण बन जाते हैं और वो अंतिम समय में राधा और गया। अब वो भगवत प्राप्त हो गया।

तो जो लगा चाहे थोड़ा ही लगा हो भगवान का नाम जानते हो क्या मंगल भवन अमंगल हारे तो अब कितने सृष्टि में जीव हैं अगर वो माइक्रो क्या कहते हैं माइक्रोस्कोप हां आप जमीन के एक बीता में देखो तो लाखों जीव निकल आएंगे लाखों जीव तो अगर हम लाखों का कल्याण हो रहा है तो कोई खास बात थोड़ी है अनंत जीव है अनंत जीवों में लाखों का कल्याण हो गया तो कौन सी बात है अनंत ब्रह्मांड है केवल इसी मृत्यु लोक में कल्याण होता है अन्य लोकों में नहीं अन्य लोकों में यहां के किए हुए कर्मों का फल भोगना होता है जैसे तपस्या तो तप लोक और बड़ी तपस्या जनोक और बड़ा भजन महर लोक ब्रह्म लोक लेकिन भगवान को जो प्राप्त हो गया वो आवागमन से मुक्त हो जाता है तो जैसे हम लोग प्रयास कर रहे हैं हम मान लो कितने साधक प्रयास कर रहे हैं ना काम मिटा ना क्रोध मिटा ना लोभ मिटा सब वही बातें भरी है उनकी तो जय जय है जो जीते जी कामाद दोष रहितम कुरमान समछ जिन्होंने कामाद दोषों का त्याग कर दिया भगवान कहते हैं कामादिक मद दंभन जाके तात निरंतर बस में ताके

जो काम विजय है क्रोध विजय है लोभ लेकिन ये कहना बहुत सरल है का विजय कहना बहुत सरल है वो जाने मोरी छाती अब लोगों का हृदय जलता है कि मतलब कितनी मार पड़ती है तब वो सहन करते करते गुरु कृपा से भगवान की कृपा से लोग आकर प्रार्थना करके तब कहीं छुट्टी मिलती है नहीं ये जीवन भर सबको अपना गुलाम बनाए रखता है काम जो है ये जीवन भर गुलाम बनाए रखता है जो मन है वह सबको अपने अधीन किए रखता है चाहे जितना कोई बलवान हो तो जब हम प्रयास करते हैं और हम असफल भगवत प्राप्ति के योग्य नहीं।

लेकिन भगवान ने देखा किसने जीवन भर प्रयास किया तो अंतिम समय भगवान करुणा कर देते हैं क्योंकि प्रभु करुणामय है। रात ना प्रभु चित चूक किए की करत सूरत सह बारिए की। प्रभु उसके बाहरी गलती को नहीं देखते। देखते हैं उसके हृदय की बात कि वो मुझे प्राप्त करने के लिए प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हुआ तो भगवान सफल कर देते हैं। अंतिम समय उसको किसी भक्त का सानिध्य मिल जाएगा। वो उसको भगवान का नाम सुना देगा या उसके अंदर से भगवान का नामित हो जाएगा और वो भगवान को प्राप्त हो जाएगा।

पक्का भजन कभी बेकार नहीं जाता। अच्छा जैसे मानो भगवत प्राप्त ना भी हुआ। तो अब उसका अगला जन्म अर्जुन जी ने यही प्रश्न किया कि मानो जो आपका भजन करते अभी उनका भजन सिद्ध नहीं हुआ और किसी कारण योग भ्रष्ट हो गए। दो योग भ्रष्ट होते हैं। एक भोगों में योग भ्रष्ट होते हैं और एक हमारे पास समय नहीं रहा। हम योग में तो सही चल रहे हैं लेकिन लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर पाए। मर गए तो हम भी योग भ्रष्ट माने जाएंगे। और एक वो योग भ्रष्ट माना जाएगा जो विषयों में भ्रष्ट हो गया।

कंचन काबिनी कीर्ति में भ्रष्ट हो गया। अपने मार्ग को सही नहीं संभाल पाया। तो दोनों प्रकार के योग भ्रष्टों का वर्णन किया कि वो छिन्नभिन्न बादलों की तरह नहीं हो जाते। वो नष्ट नहीं हो जाते। उनको फिर अवसर मिलता है। जो पहला विषयों के भोग में भ्रष्ट हुआ था। उसको ऐसे श्रीवान धनी कुलों में जन्म मिलेगा जहां सब विषय की बहुतायत होगी और हर विषय उसे मिलेगा और हर विषय वो भोगेगा और वो पूर्व जो भजन है वो उसका वैराग्य दिलाएगा उसको घृणा हो जाएगी विषयों से और उसी जन्म में वो भगवान को प्राप्त होगा और दूसरा जो योग भ्रष्ट हुआ वो ऐसे पवित्र योगियों के कुल में जन्म लेगा जहां जन्म से भगवान की साधना मिलेगी और बचपन से साधना करके फिर वो अपनी साधना को पूर्ण कर जैसे अपने लोगों का जो जन्म था ना ऋषि कुल में जन्म हुआ।

पिताजी ने कभी सिलेले वस्त्र नहीं पहने, कभी जूता नहीं पहने और किसान आदमी थे और हम लोगों को बचपन से भगवान नाम सुनना, भगवत गीता सुनना, भगवत रामायण सुनना, भगवत भागवत सुनना ये सब सौभाग्य बचपन से जब से सुधि हुई तब से सुनने को मिलता है। बड़ा भाई शाम के बैठ के एक घंटा रोज इस बात की चर्चा रामायण की चर्चा भागवत लालटेन जला के तो अब वो संस्कार पूर्व के 13 वर्ष की अवस्था में प्रबल हो गए और घर से बाहर निकाल दिया पीछे योग भ्रष्ट हो गए साधना पूरी नहीं हुई उसे निकाल दिया पूरा जीवन भगवान के मार्ग में व्यतीत हो गया तो भगवान का भजन कभी व्यर्थ नहीं जाता जैसे श्री राज ऋषि भरत जी भगवान ऋषभदेव जी के पुत्र हैं।

बड़े योगी महात्मा हैं। अपने भगवान की प्राप्ति के लिए राज्य को त्याग दिया। रानियों को, पुत्रों को, परिवार को त्याग दिया और गंडकी नदी के किनारे एकांत में भजन कर रहे थे। एक दिन वो गंडकी नदी में भगवान सूर्य को अर्घ दे रहे थे। तो एक घटना घटी। एक मृगी गर्भवती थी जो प्रसव होने ही वाला था। वो पानी पीने के लिए आई। इतने में पीछे से सिंह ने दहाड़ की अब वो भयभीत होकर के छलांग मार दी गंडकी नदी में तो वो बच्चा योनि से धारा में गिर गया और वो गिरी और मर गई भरत जी ने दृश्य देखा मां तो उसकी मर गई और ये बच्चा बहता हुआ जा रहा दौड़ पड़े उस बच्चे को उठा के लाए ऐसा कोई भी दयावान करेगा अब उसे कुटी में रखा तो बड़ा दुलार करने लगे धीरे-धीरे हरी हरी धूप तोड़ के लाते अपने गोदी में लिए रहते अब जो ममता अपने पुत्रों में थी पूरी हिरण में हो गई।

बड़ा विचित्र भाव है। बड़ा विचित्र माया का खेल है। इतनी जोर की ममता हो गई कि भगवान का भजन छूट गया। और मरने का समय आया तो अंतिम समय हिरण का ही चिंतन किया। अगला जन्म हिरण का बना। फिर इतना भजन किया हिरण के शरीर में कि तीसरा जन्म ब्रह्म बोध संपन्न जड़ भरत जी के रूप में हुआ। तो भजन कभी व्यर्थ नहीं जाता। हिरण बने तो गंडकी नदी में ही खड़े होकर के रात दिन भजन करके भगवान का अगला जन्म उनका ब्रह्म बोध संपन्न जड़ भरत जी के रूप में हुआ। तो ऐसा नहीं कि भजन करने वाला कभी व्यर्थ हो जाएगा।

उसका जीवन जितना भजन हुआ है तो उसके अब ये तो निर्णायक भगवान है कि किसको इस जन्म में पास कर देते हैं या किसको अगला जन्म देते हैं ये तो निर्णय भगवान के हाथ में है। श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आप कह रहे हैं कि आप अधिवक्ता हैं महाराज जी एडवोकेट हैं। पहले ये कुछ मुकदमे ऐसे लेते थे जिसमें मतलब समू आरोपी आरोपित होता था फिर भी लेने पड़ते थे। पर इन्होंने डेढ़ साल से आपका सत्संग सुन के छोड़ दिए महाराज जी। बट अभी कह रहे हैं कि शराब और गांजा के मुकदमे लेने लग गए हैं।

बट इसमें भी इनको लग रहा है कि मेरा भजन छूट ना जाए। मेरे को धाम की कृपा में दिक्कत ना आ जाए। व्यवधान ना पड़े। तो क्या इनको देखो प्रधान चीज प्रधान चीज देखनी है वकालत में। वैसे सब लोग ये बात नहीं धारण कर पाएंगे। क्योंकि जिनका व्यापार ही वकालत है धन के लिए तो वह इस हमारी बात को नहीं मानेंगे। लेकिन अगर निर्दोष को बचाने के पक्ष में और दोषी को दंड देने के पक्ष में वकालत की जाए तो वकालत रूपी धर्म का पालन करने पर और नाम जपने से वो भगवत प्राप्ति के योग्य हो सकता है।

अब इसमें हमें वो आपका विषय है कि आप किस विषय में देखते हैं इस विषय को। वो नशेबाज है या व्यभचारी है या वह मर्डर किए हुए हैं। वह आपका विषय है। हमारा केवल इतना विषय है कि अगर दोषी है तो उसे दंड मिलना चाहिए। और निर्दोष है तो उसको बचाना चाहिए। आपकी विद्या, आपकी पढ़ाई लिखाई, आपकी वकालत इसी में सार्थक है कि निर्दोष को बचा दें। निर्दोष को बचावे और जो दोषी है अच्छा आपको अधिक धन दोषी देगा। निर्दोष नहीं दे पाएगा। अब वो बेईमानी का धन आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर देगा।

आपके परिवार को परेशान कर देगा और आपकी भागवतिक उन्नति में बाधा पहुंचा देगा। आधुनिक उन्नति जरूर बढ़ती नजर आएगी लेकिन वह आपको पतन की तरफ ले जाएगी। वो आपको सुख शांति प्रदान नहीं करेगी। अब इसमें शराब के नशे में क्या अधिकांशा मुकदमे फर्जी होते हैं। लेकिन उनका व्यापार वही है। हां जो उन पे केस लगाया जाता है वो फर्जी होते हैं। हां अब ये चीज तो आप वकील हैं। आप जानिए लेकिन हम इतना कहते हैं कि अधर्म से बचिए और धर्म का साथ दीजिए। चाहे वकालत हो या न्याय हो। न्यायाधीश हो आप दोनों का पक्ष होना चाहिए।

अधर्मी को दंड देना और धर्मात्मा को बचा लेना निर्दोष को बचा लेना वो किसी भी डिपार्टमेंट में किसी भी विषय से फंसे। श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मैं पहले बुरी संगति में फंसा था। ड्रग्स, शराब, मांस, मछली का सेवन करता था। डॉक्टर ने भी बोल दिया था कि 15 दिन ही जिओगे इस हिसाब से चलोगे। आपका इतनी छोटी अवस्था में सब कुछ छोड़ दिया महाराज जी आपका सत्संग सुन के और और भाई धन्यवाद है और पहली बात तो इतनी छोटी अवस्था में इतने बड़े ड्रग्स शराब ये सब ये चीजें तो ये अवस्था तो पढ़ने लिखने की होती खेलने कूदने की होती इसमें इतने गंदे नशों में कैसे फंसे कल परसों एक आए आजकल राजस्थान यहां उस साइड में कह रहे पूरे गांव में वो हां कुछ ऐसा बता रहे थे वो चिट्टा नशा पता नहीं ऐसे कुछ कह रहे थे वो कह रहे वो पूरे गांव में बच्चे बच्चे बच्चे कह रहे छ साल

हो गए महाराज जी ऐसा ही बच्चा था और छ साल से ले रहा और इतना तगड़ा वाला बन गया था कि मतलब वो बाहर ही नहीं आना चाह रहा कह रहा उसी में मस्त और पूरा गांव का गांव और कह रहे पूरे गांव में और पूरे इलाके में ऐसा फैला हुआ है बच्चों को थोड़ी से स्टार्ट होता है और इतने बड़े स्तर पर पहुंच जाते हैं कि वो ना घर के ही धान आदि बेच दिए कह रहे मेरे आभूषण चुरा के ले गया वो सारा बेच दिया घर में खाने के लिए कुछ नहीं है पिता है नहीं है इसके और ये इस काम में लग गया तो मतलब ऐसी स्थिति नए बच्चे वैन में ज्यादा फंस गए कह रहे पूरा गांव ही है उससे पूछा तो कह तरफ सारे दोस्त नहीं हमारे जो नई पीढ़ी है थोड़ा गलत मार्ग में जा रही है।

व्यसन और व्यभचार ये दो बहुत जोर कस रहे हैं। व्यभचार में भी बहुत प्रवत्त हो रहे हैं। विविध प्रकार से ब्रह्मचर्य नष्ट करना और व्यसन करना नशा करना इसमें ज्यादा नए बच्चे फंस रहे हैं। अब भगवान बचावे कलयुग का बड़ा कुप्रभाव है। युग धर्म का भी प्रभाव है। अब जैसे इसका दोस्त कोई बनेगा मान लो तो वह नशा सीखेगा क्योंकि वह कहेगा थोड़ा सा आप देखिए तो वह भी नशा सीखेगा जब वो उसका दोस्त बनेगा तो वह भी नशा सिखाएगा अब जैसे इसने छोड़ दिया तो ये दो चार को छुड़वा सकता है अपने साथियों को तो छुड़वा सकता है पर बहुत अच्छा बच्चा किए जो नशा मुक्त हो गया अब कभी दोबारा मत करना हां ठीक क्या जानना चाहते हो बस कह रहे थे कि ये इसने बोला कि अगर मैं ठीक ठीक हो गया पूरी तरह महाराज जी इस पे भी एक चक्कर है महाराज जी उसका भी उस उसने छोड़ दिया 15 20 दिन हो गए हैं बट कह रहे हैं कि पहले भी दो-तीन बार छोड़ चुका हूं नहीं 90 दिन तक कोई 90 दिन तक छोड़ा हुआ नहीं माना जाता अगर आप 90 दिन क्लास नहीं करते तो छोड़ा हुआ नहीं माना जाएगा आप 40 दिन बाद 50 दिन बाद भी कर सकते हैं।

90 दिन तक आपको उस नशे से बिल्कुल दूर रहना है। किसी भी तरह से उस नशे का सेवन 90 दिन तक नहीं करना है। अगर आप 20-25 दिन, 30 दिन, 40 दिन के बाद फिर शुरू कर दिए तो उसका प्रभाव आपको फिर वहीं ले जाएगा और उससे बुरा गिरा देगा। दोबारा छोड़ने की हिम्मत नहीं रहेगी। तो 90 दिन तक तो टच नहीं करना चाहिए जो विषय छोड़े। 90 दिन तक महाराज जी जब मतलब उसकी लत सी एकदम उफान मारती है तो उस समय क्या करें? महाराज राधा राधा राधा और चुपचाप सहन करो तभी सहन करने से होगा। नहीं तो फिर मर जाओगे।

ऐसे नशा है कि मार डालेंगे। सब अंग भंग कर देंगे। किडनी फेल हो जाएगी। लीवर फेल हो जाएंगे। ज्यादा डोज लेते जाओगे तो शरीर की एक क्षमता है। उसके बाद जब डोज जाता है तब वह अपने जो प्रधान अंग है उन पर प्रभाव डालता है। अब वो कह रहे थे कि इतना हो गया कि उस उस मात्रा से नीचे नशा ही नहीं होता। उस मात्रा का लेना पड़ता है। नहीं वैसे हर नशे का यही है। यह बहुत हानिकारक है। लोगों के खाने के लिए नहीं लेकिन नशा करते हैं। परिवार को भूखा मार रहे हैं और नशा करते हैं। बहुत कमाने इसलिए जाता है कि उसकी पूर्ति कर सके।

₹1000 कमाया तो उसमें हजार लगाने हां लगा देते हैं। बिल्कुल नहीं बड़ा अच्छा किए बच्चा तुम नशा छोड़ दिए। जी ये श्रीमद् भागवत है हमारे गुरु जी ने लिखा है पूरा बहुत सुंदर किया बहुत सुंदर किया आगे गुरु जी का फोटो ये गुरुदेव बहुत सुंदर देखो कितनी सुंदर व्याख्या की है। तव नामोण नार्या तपो मति था दीना फलम लभते अति एव भूतम तव नाम या उच्चारति सा चांडालो श्रेष्ठ तमो भवती कोई तीर्थ याचन या कोई भी अवगान नहीं किया केवल जबान से नाम उच्चारण कर लिया तो चांडाल भी परम पवित्र हो गया उसे किसी तीर्थों के अवगान की नहीं जरूरत नामोच्चारण मात्र से नाम उच्चारण नार्या तपो मती नाम तीर्थ तपस्या यज्ञ आदि कुछ नहीं किया केवल नाम उच्चारण किया तो कह रहे हैं लभते फलम लभते क्या एवतम तव नाम या उच्चारत सा चांडालो श्रेष्ठतमो भवती श्रेष्ठतमो

भवती चांडाल भी श्रेष्ठतम हो गया स्वयं प्रकाश जीवे चिंतनीयम तेजसा दस्त गुण प्रवाह वेद गर्भम कपिलम परम पुरुषम तम वंदे बहुत सुंदर बहुत सुंदर व्याख्या की तू वृंदावन में आयो तूने राधा नाम गायो तू वृंदावन में आयो तूने राधा नाम गायो तेरे जीवन को कार जपे जा राधे राधे राधे अलबेली सरकार जपे जा राधे राधे ये प्रेम की अखत कहानी नहीं समझे ज्ञानी धानी ये प्रेम की अखत कहानी नहीं समझे ज्ञानी धानी वाह जाने बिरज की नार जपे जा राधे राधे राधे अलबेली सरकार जपे जा राधे

राधे हम सबका मनुष्य जीवन में आना ये भगवान की विशेष कृपा से हुआ है। 84 लाख योनियों में भटकते भटकते भगवान ने कृपा की। देखा कि ये जीव दुख पा रहा है। तो दुख से छूटने के लिए हमें मनुष्य शरीर दिया। अब मनुष्य शरीर में हम सुख और शांति की खोज गलत दिशा में प्रारंभ कर दी। हमारी मान्यता है भोग मिल जाए, मान प्रतिष्ठा मिल जाए तो हम सुखी और शांति को अपने हृदय में देख सकते हैं कि सुख है और मैं शांत हूं। लेकिन जिनके पास धन भी है, मान प्रतिष्ठा भी है, बहुत सुंदर मकान भी है, जो जो तुम सुविधाएं चाहते हो वो सब है लेकिन ना उनके पास शांति है और ना उनके पास सुख है।

यहां तक कि त्रिभुवन पति देवराज इंद्र जो देवताओं के स्वामी है, अप्सराओं के स्वामी हैं, वो भी सुख की खोज में बहुत बड़ा गलत कार्य कर दिया। एक महात्मा गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ गलत। इसलिए लगता है कि चाहे त्रिभुवन पति का ऐश्वर्य क्यों ना प्राप्त हो जाए। जब तक भगवान की शरण में जीव नहीं होता तब तक उसे सुख शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए सबसे प्रार्थना है भगवान सर्वत्र है लेकिन हम अज्ञान के कारण उनका अनुभव नहीं कर पा रहे और भगवान का अनुभव ना होना ये माया का बहुत विचित्र खेल है इसी से हम चिंता भय शोक मृत्यु इनको प्राप्त हो रहे हैं बार-बार ये करोड़ों जन्म हो गए हमको इसी माया ने हमें रोना है इस बार हमें निकल करना है।

हमको दृढ़ निश्चय करना है कि इस बार हमको परम शांति और परम सुख प्राप्त करना है और वो होगा राधा नाम से। स्वयं भगवान श्री कृष्ण राधा नाम जप करते हैं। ये वृंदावन की कृपा से ही राधा नाम का परिचय मिल सकता है। अन्यथा आगम निगम पुराणोचर सहज माधुरी रूप निधि ये जो राधा नाम राधा रूप है इन आगमों में है। राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

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जय जय श्री

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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