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गर्भवती महिलाएँ क्या-क्या नियम धारण करें ताकि उत्तम संतान की प्राप्ति हो?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

डॉक्टर चंद्र प्रभा जी श्री हरिवंश महाराज श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आप कह रहे हैं कि आप चिकित्सक हैं श्री जी की कृपा से स्त्री रोगों और गर्भवती महिलाओं का उपचार करते हैं और धाम में ही सेवाएं दे रहे हैं तो कह रहे हैं कि काफी जने ऐसे आते हैं जो आपको सुनते हैं बट वो साधन परायण हैं गर्भवती हैं तो 2:00 बजे उठना कम से कम नींद लेना जैसे आप बताते हैं एक टाइम प्रसाद पाते हैं तो महाराज जी ऐसे में गर्भावस्था में जो शिष्य का प्रभाव पड़ता है शरीर के लिए आवश्यक है।

जैसे हमने छ घंटे सोने के लिए कहा है तो छ घंटे सोना चाहिए। क्योंकि अगर आप छ घंटे नहीं सोएंगे तो आपके जागरण के समय में जो भजन करेंगे उसमें आपको विक्षेप पड़ेगा। बार-बार आलस्य आएगा। छ घंटे सोना चाहिए। 24 घंटे में छ घंटे सोना चाहिए। और इसके बाद शेष समय अपनी दिनचर्या में रत रहना चाहिए। हां ज्यादा गर्भ बल जाने पर गर्भ की सुरक्षा के लिए हमको कठोर क्रियाएं नहीं करनी चाहिए। हमें ऐसी क्रियाएं नहीं करनी चाहिए जिससे गर्भस्थ शिशु को किसी भी तरह का क्लेश हो और हमको वही आहार लेना चाहिए डॉक्टरों से सलाह लेकर जिससे हमारे गर्भस्थ शिशु की पुष्टि हो।

हमको वैसे ही आचरण करने चाहिए। जैसे पहला आचरण तो है जो ही यह पता चले कि हमारे उदर में बालक या बालिका गर्भ का प्रादुर्भाव है अंदर आ चुका है प्रकट हो चुका है गर्भ अंदर बन रहा है तो उसी दिन से ब्रह्मचर्य रहना चाहिए पहला नियम क्योंकि अगर आप ब्रह्मचर्य नहीं रहेंगे तो आपके बच्चे पर फर्क पड़ जाएगा। आपके बच्चे में कोई ना कोई कमी पैदा हो जाएगी। इसलिए ब्रह्मचर्य धारण करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि गर्भ में शिशु पधार चुका है। इसके बाद हमें पौष्टिक आहार लेने चाहिए।

उचित नींद लेनी चाहिए और हमको भागवतिक कार्य करने चाहिए। भगवान की कथा सुनना, नाम कीर्तन करना, नाम जप करना और तो उससे क्या होगा? हमारे बच्चे के बहुत अच्छे संस्कार पड़ जाएंगे। तो ऐसा हमें लगता है जैसे 2:00 बजे जगना और कई बजे सोना ये देखना होगा कि सोते कई बजे हैं। 2:00 बजे तो हमारे यहां सब प्राय जग जाते हैं। 2:00 बजे जगने का तो एक मतलब नियम ही है एक तरह से पर सोते कई बजे हैं। मान लो चार घंटे रात्रि में सो गए तो दो घंटे दिन में विश्राम कर लिया तो चार दो छ घंटे जरूर और जिनको दिन में विश्राम करने को ना मिलता हो उनको रात्रि में छ घंटे आराम से सोना चाहिए और जो शरीर से श्रम करते हो उन्हें 7 घंटे विश्राम करना चाहिए।

अर जी वही कह रहे थे कि क्योंकि शब्दों को सही से पकड़ ना पाने के कारण नॉर्मल तो कोई दिक्कत नहीं है। बट जैसे उनके पेट में कब्ज भारी कब्ज थी। फिर जब उनको देखा तो बहुत कमजोरी तो जब पूछा गया तो उनके पतिदेव ने बताया कि ये मतलब बहुत साधन पर आए ना अष्टयाम श्री जी की इस इस अवस्था में भी कर रहे हैं वो तो ठीक है बट एक टाइम भोजन पाना और 2:00 बजे सुबह उठ जाना नहीं इसमें इसमें अब अपनी बात नहीं देखनी गर्भस्थ शिशु की बात देखनी है कि हमको अगर तीन बार पाना पड़े तो हमें तीन बार पाना चाहिए क्योंकि गर्भस्थ शिशु का पोषण होना चाहिए।

बट आप कहते हैं कि चिड़िया की तरह थोड़ी-थोड़ी देर में नहीं लेना चाहिए। बीमार और गर्भणी नारी इनको साधना में आप नहीं गिन सकते। बीमार आदमी है अब उसको दवा लेनी तो थोड़ा पा लीजिए तब आप दवा लीजिए। नहीं दवा बहुत गर्म होती है। स्वस्थ शरीर के लिए नियम है। अस्वस्थ शरीर के लिए नियम नहीं है। जैसे भी आपको बने जैसे स्वस्थ शरीर तो आसनों में बैठो। अब अस्वस्थ शरीर तो सोफा कुर्सी जैसे आप ऐसे बैठे हो राधा राधा जप आपका भजन बनना चाहिए। गर्भणी स्त्री का स्वयं का जीवन नहीं है।

उस बच्चे के लिए जीवन है। इसलिए यह बातें मत समझो कि हमको एक बार भोजन पढ़ना। एक बार भोजन पाओगे तो गर्भस्थ शिशु को पोषण शक्ति कम मिलेगी और वो कमजोर पैदा होगा। तो आपने एक जीवन को बर्बाद कर दिया। आपने उस एक जीव के प्रति अहित कार्य किया। इसलिए मां को चाहिए पौष्टिक है जो जो भी डॉक्टर आपको पास कर दे। जूस है, फल है, दूध है। यह दो-तीन बार लीजिए जिससे आपके गर्भस्थ शिशु का पोषण हो। मनमानी आचरण नहीं करना चाहिए। डॉक्टर के अनुसार आचरण करना चाहिए। और जब गर्भ प्रसव हो जाए और आप ठीक हो जाए फिर आप अपनी साधना में लगिए।

फिर आप अपने लिए कसिए कोई बात नहीं है। कोई परेशानी नहीं है। 24 घंटे में एक बार भोजन से भी शरीर बहुत अच्छा स्वस्थ रह सकता है। यदि ब्रह्मचर्य से रहा जाए तो हम लोगों को तो कई-कई दिन भोजन नहीं मिलता था लेकिन कभी निराशा नहीं हुई। कभी उदास नहीं हुए कभी हताश। तो इसलिए जब तक गर्भस्थ शिशु रहे तब तक हमें डॉक्टर के अनुसार चलना चाहिए। कि उसको क्या पोषण तत्व देना है? कौन-कौन से अब जैसे गर्भस्थ शिशु है और आप वजन वाली चीज उठा रहे हैं। आप झुक रहे हैं तो उसको परेशानी पड़ रही है।

उस समय आपको उसकी सुरक्षा के लिए आपको उन कार्यों को छोड़ देना चाहिए जिनको निषेध किया गया है। आप पोछा लगा रहे हैं। गर्भस्थ शिशु को बहुत परेशानी होगी। हानि हो जाएगी। आप नहीं लगाइए। आप उतना झुकिए। आप उतना कार्य कीजिए जिससे गर्भस्थ शिशु का पोषण हो उसको किसी तरह से हानि ना पहुंचे। ये डॉक्टरों से सलाह ले लेनी चाहिए। आपके चरणों में कोटि-कोटि नमन। जी प्रभु जो आत्मा हमारे कर्म में आती है वो उसका कर्म उसका आगे का जीवन निर्धारित होता है जो भगवान करते हैं। तो हमारे संस्कार उसकी चेतना को कैसे प्रभावित करते हैं?

पहली बात तो ये है कि आत्मा निष्क्रिय है। आत्मा कोई कार्य नहीं करती। आत्मा प्रभावित करती है। उसका पावर जैसे पूरे कपड़े के पीछे लोहे का चुंबक रख दे और सामने लोहे की सामग्री हो तो लोहे की सामग्री चढ़ है। लेकिन उस चुंबकीय तत्व के कारण उसमें हलचल पैदा हो जाएगी। उसमें चलन क्रिया पैदा हो जाएगी। ऐसे आत्मा एक चैतन्य प्रकाश है। उसमें स्वयं में कोई क्रिया नहीं है। शरीर जड़ है। अंतकरण जड़ है। कारण शरीर जड़ है। इन तीनों शरीर को प्रकाशित करता है। प्रभावित करता है।

सबक परम प्रकाश जोड़ी। तो ये जो हमारे संस्कार है ये हमारे मन से बनते हैं। आत्मा से नहीं। आत्मा दिव्य है, चैतन्य है, परमात्मा स्वरूप है। किसी भी प्रकार के किसी विकार का प्रभाव कभी आत्मा पर नहीं पड़ता। अंतःकरण पर पड़ता है। मन पर पड़ता है। हमारे मन पर दो प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं। एक असत और दूसरा सत। कभी-कभी सत मार्ग में चलने वाले भी असत प्रभाव से प्रभावित होकर फिसल जाते हैं। कभी-कभी असत मार्ग में चलने वाले भी सत प्रभाव का संग पाकर वो उच्च दशा को प्राप्त होते हैं।

अब हमको फाइनल करना है कि हमारा मार्ग क्या है? सत मार्ग है या असत मार्ग है। यदि हम इंद्रियों के भोगों में अपने मन को अपनी इंद्रियों को छूट देकर मनमा आचरण करते हैं तो हम असत मार्ग के प्रति हुए जिसका परिणाम पुन जनम पुन मरणम पुन जननी जयम बार-ब जन्म बार बार मरण बार बार मां के गर्भ में जाना और एक है सत मार्ग जिसमें हम अपनी इंद्रियों को गलत विषयों से हटाकर सही सभी विषयों का भोग देते हुए मन को भगवान के चरणों में लगा के स चिंतन करते हुए नाम जप करते हुए धर्म पूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं तो हमें परम पद की प्राप्ति होती है।

हमें उत्तम लोगों की प्राप्ति होती है। हमारे अंदर उत्तम संस्कार तभी आएंगे जब हम संत पुरुषों का संग करें और असत पुरुषों का त्याग करे। सत मार्ग को ग्रहण करे। असत मार्ग को छोड़ दे। सत्य विषयों का सेवन करें, असत विषयों का त्याग करें तो हमारे अंदर उत्तम संस्कार आते

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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