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जब महाराज जी ने बताया कैसे बड़े महाराज जी ने पहले ही बता दिया था जो आज हो रहा है?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

शिवंद यादव जी जय हो राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मेरा प्रश्न है कि गुरु कृपा परिपक्व कैसे होती है? यह नाम जपने से कितनी सहायक है? गुरु कृपा हां गुरु कृपा नाम जपने से तो सहायक है ही लेकिन उनकी आज्ञा पालन जरूरी है। उनकी आज्ञा पर प्रधानता होनी चाहिए। नाम जप तो उनके द्वारा दिया हुआ करुणामय कृपा प्रसाद है। वह तो हमारी उन्नति करता ही है। पर इसमें आज्ञा प्रधान है। जैसे कोई हमारी कभी आज्ञा उल्लंघन नहीं करता और उस समय हम भजन में बैठे और उस समय ध्यान आया कि यार कितनी कठोर कठोर बातें कही कैसी-कसी हमने आज्ञाएं दी लेकिन कभी दोष दर्शन नहीं किया कभी आज्ञा उल्लंघन नहीं हृदय शीतल हुआ ट्रांसफर हो गया गुरु के हृदय से कृपा ट्रांसफर हो गई उसका उत्थान शुरू हो गया लौकिक पारलौकिक दोनों उत्थान शुरू हो गए तो गुरु कृपा प्राप्त करने के लिए गुरु आज्ञा के लिए ललचाए कि कभी गुरुदेव हमको कोई आज्ञा दे दे।

सत्संग सार्वजनिक होता है। उपदेश पर्सनल होता है। आज्ञा गुरुदेव की पर्सनल होती है। उसमें उपदेश आपके लिए पर्सनल होता है। आज्ञा गुरुदेव के लिए पर्सनल होती है। गुरुदेव अपने मन चाहिए बात कहे कि ऐसा तुम करो। बस हमको प्राणपन से उनकी आज्ञा पे लग जाना चाहिए। तो आज्ञा सम सु साहिब सेवा आज्ञा का पालन करना ही अपने साहब की सेवा है। एक बार किसी महापुरुष से उनके बेटे ने कहा कि एक शिष्य भी थे तो बेटे ने कहा कि हम आपके पुत्र हैं। पर आप हमें उतना प्यार नहीं करते जितना आप शिष्य को प्यार करते हैं।

अच्छा ऐसा आपको तो आप क्यों करते हैं इतना शिष्य को प्यार? क्या बात है? उन्होंने कहा इस बात का उत्तर तो फिर देंगे। तुम ऐसा करो हमारे बैठने के लिए चबूतरा बनाओ। और शिष्य से कहा तुम इस पेड़ के नीचे चबूतरा बनाओ। दोनों के चबूतरे बनाए। प्रयास करके शाम तक। कहा बिगाड़ दो हमारे मन का नहीं। बिगाड़ दिया। दूसरे दिन फिर आदेश किया। बनाओ। फिर बनाया अच्छे से अच्छा एक सेट करके कहा बिगाड़ दो हमारे मन का नहीं तीसरे दिन फिर आदेश किया फिर बना कहा बिगाड़ दो हमारी पुत्र ने कहा आखिरकार आप चाहते कैसा है रोज बनवाते हैं बिगाड़ देते ये क्या है क्या चाहते हैं आप शिष्य से पूछा तुम्हारे अंदर कोई बात बोले भगवन जीवन भर बनवाते रहिए बिगाड़ते रहिए जीवन भर बनाते रहिए, बिगाड़ते रहिए और हम तो आपके सेवक हैं।

आप जीवन भर बनाते रहिए, बिगाड़ तो पुत्र से कहा समझ में आई है बात? इसलिए प्यार करता है। तो गुरु कृपा पात्र वही हो सकता है जो आज्ञा पर समर्पित है। जी वचनम कर पात्रता भी तो होनी चाहिए उतनी जैसे गुरु कृपा कर रहा है। पात्रता आ जाती है ना। पात्रता बनाई जाती है। पात्रता बनाई जाती है। जैसे आपको 100 ग्राम रस देना है तो 100 ग्राम की पात्रता आपको बनाई जाती है। वह स्वयं में थोड़ी होती है। स्वयं में थोड़ी होती है। पात्रता बनाई जाती है। जिस समय गुरुदेव कृपा दृष्टि से देख ले कि इसको यह बनना है।

बस वो बन जाएगा। उसमें वो सारे गुण जागृत हो जाएंगे। दैवी संपदा जागृत हो जाएगी। हम आपको अपने गुरुदेव की बात बताते हैं। एक बार गुरुदेव ने हमें लगा कि मजाक कर रहे हैं, हंसी कर रहे हैं। तो उन्होंने कहा जब तुम चलो तो तुम्हारे सामने फूलों की वर्षा हो। लोग वाहवाह करें, लोग दंडवत करें, भीड़ पीछे घूमे। खूब संत एकत्रित हो। ऐसा नहीं ठीक रहेगा। गुरुदेव ने कहा तो हमें लगा हमारे अंदर कोई मान की इच्छा है सम्मान की तो उसी को गुरुदेव कह रहे हैं। महाराज जी ये कभी नहीं चाहिए।

सत्य आपसे कहता हूं। मुझे कभी मुझे प्रिया प्रीतम का प्रेम चाहिए। यह नहीं चाहिए। तो उन्होंने कहा नहीं हमारी भी इच्छा है कि एक दो ऐसे स्थान होने चाहिए जिसमें साधक रहे क्योंकि साधकों की बड़ी अव्यवस्था है। आश्रमों में भजनानंदी साधकों के लिए व्यवस्था नहीं है। महाराज जी यहां खाने को तो है नहीं। मांग कर खाते थे और आप कहते आश्रम बनवाइए। उनका सब श्री जी कर देते। जो जो शब्द निकले थे वो वो शब्द महाराज जी के पूरे जो जो श्री मुख से निकला था वो सब वो सब योग्यता वो सब व्यवस्था उनके वचनों से हुई है।

हम हम बोल रहे हैं। हमारी बोलने की सामर्थ्य नहीं है। ये हमारे गुरुदेव बुलवा रहे हैं। हमारे गुरुदेव प्रश्नों का उत्तर दे रहे हैं। साउंड प्रेमानंद है लेकिन अंदर जो चिप लगी है ना वो गुरुदेव है। महाराज अहंकार क्यों बना रहता है साधक में कि उसे पता है मेरा नाम सब कुछ गुरु ही करा रहे हैं तो अहंकार ये निवृत्ति कैसे होगी इसकी? अहंकार तभी चला जाएगा जब वास्तविक पता है कि मेरे गुरुदेव का है। अब जैसे हम आपको ₹500 दें तो आपको ₹500 का अहंकार होगा क्या? कोई पूछेगा आपसे कि आप तो ₹500 लिए हो तो आपके भले बोलो ना आपके मन में आगे यह तो गुरुदेव का मेरा तो है नहीं।

तो अब आपको ₹00 का कभी अहम नहीं होगा कि ₹00 मेरे आपको लगे तो गुरुदेव की धर है। ऐसे ही जब यह दिखाई दे कि भजन, साधना, वैभव, सम्मान, कीर्ति यह तो सब गुरुदेव की है। मैं तो किसी काम का नहीं हूं। उन्होंने तो मुझे स्वीकार किया है। यह सब गुरुदेव तो अहंकार कैसे आ सकता है?

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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