हनुमान टेकरी से पधारे संतजनों और पूज्य महाराज जी की नाम-मंत्र पर विशेष चर्चा
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
आओ महाराज आओ आओ संतो संतों को ऊपर स्वास्थ्य महाराज जी कैसा स्वास्थ्य कैसा है महाराज जी कृपा है आपके श्री चरणों की कृपा है सब संतों की कृपा है आने में तो बीच में आने चाहते रहे लेकिन कोई हम इंतजार करते रहते हैं कि जब संत मंडली इकट्ठा हो जाएगी तो महाराज जी लिंके आ जाएंगे सबके दर्शन हो जाएंगे महाराज जी महाराज श्री का ये प्रश्न है जू जंबू से पधारे महाराज जी हरे राम राज महाराज जी बड़े साधक प्रवीण है सबसे पहले महाराज आपके शरण में साष्टांग दंडवत महाराज एक प्रश्न ये है कि ईमानदारी से मैं साधु कैसे बन सकूं ईमानदारी से मैं साधु कैसे बन सकूं हम बहुत सुंदर बात कही साधुता एक मेरे बड़े भाई थे साधु बनना है तो ईमानदारी से बनना।
बड़े भाई ने कहा था साधु बनना है तो ईमानदारी से बनना। पहली बात तो महाराज जी यह बिना साधु संग के साधुता आ ही नहीं सकती है। कोई भी साधन किया जाए उसमें अहम की प्रधानता होती है। अहम कर्ता भाव की प्रधानता होती है। कर्ता भाव की प्रधानता होने से विमूढ़ता जाती नहीं है। अहंकार विमूढ़ात्मा कर्ता मन्यते तो जब तक कर्ता भाव नहीं जाएगा अहम भाव नहीं जाएगा तब तक साधुता नहीं आती है परुख वचन अति दुशा श्रवण सुन तेह पावक न दहोंगो परहित निरत निरंतर मन क्रम वचन नेम निभो कबहु कहो या रहो श्री रघुनाथ कृपालु कृपात ते साधु स्वभाव गोंगो यह जो हमारे अंदर तितक्षा है, सहनशीलता है।
साधु का सबसे बड़ा गुण भगवान कपिल देव जी ने पहला गुण बताया। तितवाह कारुणिका तितवा सहनशील इसी में पूरी साधुता आ जाती है। सहनशील आशय उदार धीरज सहित विवेकी विवेकवान धैर्यवान और धैर्यवान उसे कहते हैं जो जनेंद्रिय और रस्द के वेग को सह ले। जनेंद्र रस्द के वेग को सहने वाला धैर्यवान और भगवान के प्रेमी जनों के आश्रय से सब सद्गुण आ जाते हैं। यदि गुरुदेव का और भगवत प्रेमी महात्माओं का संग है तो साधुता आ जाएगी। नहीं तो भजन करने से भगवान मिल सकते हैं। लेकिन उददंडता नहीं जाएगी।
साधुता नहीं आएगी। जैसे चित्रकेतु ने भजन के बल से भगवान संकर्षण से विद्याधर की पदवी प्राप्त की और विमान प्राप्त किया लेकिन उदंडता नहीं गई। विमान पर चढ़े चढ़े देवाधिदेव महादेव जी के समीप गया। जहां सनकाद उतर के हाथ जोड़कर बैठते हैं वहां विमान पर चढ़े चढ़े और भगवान शंकर से कह रहा है कि एक गृहस्थ पुरुष भी अपनी पत्नी से मर्यादा से मिलते हैं और आप देवाधिदेव महादेव होकर जगत गुरु होकर सभा में अपनी पत्नी को वामांग में विराजमान किए माता जी ने कहा अभद्र दृष्टि रखने वाला जातो राक्षस योनि को प्राप्त हो तो वृत्तासुर के रूप में वही चित्रकेतु तो देखो उच्च पदवी को प्राप्त हो गया लेकिन वो दंडता नहीं गई साधुता नहीं आई परम वैष्णवाचार्य भगवान शिव जो अभेद है जो अर्धनारेश्वर बनकर स्वयं दिखाया कि वो पार्वती जी और शिव अभेद है उनमें भेद दृष्टि करके और ऐसे ऐसे वचन बोले तो इससे यह पता चलता है कि यदि साधु संग मिले भगवत प्रेमी महात्माओं का निरंतर संग मिले तो साधुता हमारे अंदर आ जाए और दूसरी बाद भगवान का जो परम पावन नाम है वह जब हृदय में चलता है तो सब संतों ने इसका रसास्वादन किया है और सारी देवी संपदा नाम में विराजमान है।
सारे भागवतिक सद्गुण नाम में विराजमान है। भगवान को अधीन करने वाले सद्गुण नाम में विराजमान है। तो जब निरंतर नाम चले और साधु संग हो दो बातें हैं। साधन को हरि भजन है और कह सत्संग सहाय सहायता साधु महापुरुषों की और साधना हरि भजन की तो निरंतर भारी भजन हो और संतों का संग हो संत चरणामृत चरण रज वचनामृत का सेवन हो तो साधुता अपने आप आ जाएगी बिना महतद रजोभिषेकम के ये साधुता नहीं आने वाली चाहे कोई विद्वान हो जाए चाहे कोई बहुत तपस्वी हो जाए चाहे जितना जितेंद्र हो जाए पर साधु ुता आना बहुत कठिन है।
यह साधु के संग से ही आएगी। बिना साधु के संग और नाम जप किए साधुता नहीं आ सकती है। तो हम निरंतर नाम जप करें और संतों का संग आखिरी जीवन तक भगवान से मांगते रहे कि हे नाथ आप कृपा करके अपने प्रेमी जनों का संग देते रहिए। तो साधुता उनके दर्शन से आती है। उनके संभाषण से आती है। उनके संग से आने लगती है। जी। अच्छा जी जो गुरु प्रदत्त होता है जैसे छह अक्षर का आठ अक्षर का या 12 या 16 अक्षर या 18 दासत्व के लिए होता है कल्याण के लिए राम नाम ही समर्थ है लेकिन अब हमें भगवान का सखा बनना है अब हमें भगवान के दासत्व में जाना है अब हमें भगवान के सखी बनने अग्रदास नाभाद सखिए सब राम सीता की तो अब हमको संप्रदायाचार्य के द्वारा प्रदत्त मंत्र की आराधना करनी पड़ेगी तो हमारा जो भाव है उस मंत्र के आधार पर राम जी की सखी भाव आएगा।
राम जी का सखा भाव आएगा। राम जी का दासत्व भाव आएगा। हम जो भाव करना चाहते हैं वो भाव आचार्य प्रदत्त मंत्र के द्वारा होगा। मेरी सामर्थ्य नहीं कि मैं अपने को भाव देह में पहुंचा सकूं। भाव देह में पहुंचाने के लिए मंत्र है। तो जो गुरुजनों ने मंत्र दिया है उस मंत्र से भाव देह की रचना होती है। दास्य भाव की, सख्य भाव की, वात्सल्य भाव की, कांता भाव की, सहचरी भाव की। लेकिन नाम ये नाम कल्याण कर देगा। ये नाम भगवत प्राप्ति करा देगा। लेकिन भगवान का दासत्व भगवान का सखा भाव भगवान का सह इसके लिए आचार्य प्रकट हुए।
और आचार्यों ने जैसे अग्रदास आभा सखी ये सब राम सीता की सहचरी भाव से उपासना है तो अलग-अलग जो भाव की उपासना है उस भाव का मंत्र है और उस मंत्र के जपने से हमारे अंदर भाव देह का जागरण होता है और भाव देह के द्वारा ही हम भगवान का सेवन कर पाते हैं। प्रधानता किसकी रखें महाराज जी नाम की रखें या जप में? हां इसके लिए बात ये है कि जब हमारा शरीर पवित्र हो तब हम गुरु मंत्र का जप करें और जब हमारा शरीर अपवित्र हो जैसे शौचालय बाथरूम या अन्य कहीं हमें लग रहा है कि वातावरण तो हम नाम का जप करें नहीं तो निरंतर मंत्र के जप का अभ्यास करें।
जो गुरु मंत्र मिला है उसके जप का अभ्यास करें और अपवित्र दशा में भगवान के नाम का जप करें। महाराज जी काफी सारे साधक क्योंकि आपकी वाणी बहुत लाखों करोड़ों साधक सुनेंगे। महाराज जी काफियों की रुचि नाम में ज्यादा होती है तो वो कहते हैं कि हम 11 माला या गुरु प्रदत एक संख्या का जप करने मंत्र राधा नाम ठीक है बिल्कुल अगर गुरुदेव ने कहा 11 माला गुरु मंत्र होना चाहिए तो 11 माला गुरु मंत्र के कर लो और हर समय नाम जप करो महाराज जी जो मंत्र से भाव बनता है और मंत्र जिसने नहीं लिया है अथवा मंत्र में रुचि नहीं है तो नाम से भाव नहीं बनेगा वो भाव नहीं बन पाएगा मंत्र हां वो भाव नहीं बन पाएगा।
यह तो मतलब हृदय की दृढ़ता से कहते हैं। भाव में परिवर्तन आया। जब हरिवंश महाप्रभु प्रदत्त निज मंत्र का जप हुआ तो ये ठसक आने लगी। मैं श्री जी की दासी हूं। मैं श्री जी की सहचरी हूं। ये इसीलिए आचार्यों ने मंत्र बनाया है। आचार्यों ने इसीलिए गुरु मंत्र बनाया है कि हम भाव देह को प्राप्त करने के लिए गुरु मंत्र की प्राप्ति। आप राम राम जपिए और आप देखिए और चाहिए आप कि हमें भगवान का सख्य भाव चाहिए। हमें भगवान का दास चाहिए तो आपको जबरदस्ती उस मंत्र में ले जाया जाएगा और वहां तक पहुंचाकर आपको मंत्र जपवाया आचार्य भी मिल जाएंगे आपको सब विधान बन जाएगा सब विधान बल जाएगा ये पक्की बात है ये पक्की बात है जन्म से हो सकती है महाराज जी भगवान के साक्षात एक जन्म में हो जाएगी एक बार एक किसान जो है हल जोत रहा था तो एक आदमी ने पूछा कि हम स्टेशन कितनी दूर है तो उन्होंने बताया कि थोड़ा दूर है।
तो बोले कितनी देर में पहुंच जाएंगे? वो कुछ नहीं बोला। बोले कितनी देर में पहुंच जाएंगे? कुछ नहीं बोला। वो भाग पड़ा। बोले भैया 20 मिनट में पहुंच जाओगे। बोले पहले क्यों नहीं बताया? बोले चाल नहीं देखी थी। समझ रहे हैं ना? तो महाराज जी हमने चाल नहीं देखी इसलिए हम बता नहीं पाएंगे। किसी जल में तो अगर चाल देख ले तो पता चल जाए कि आपकी चाल क्या है देखो चाल भगवान से मिलन की चाल क्या है रुद सुरम राजन कृष्ण दर्शन लालसा भगवान के लिए जो रोना आ जाए कबीरा हंसना छोड़ दे रोने से कर प्रीति बिन रोए किन पया प्रेम प्यारा राम राम राम कहे और आंसू बहे और हृदय हदय पुकारे कि ठाकुर जी कब मिलोगे आप हृदय ऐसा भूख से व्याकुल हो जाए ठाकुर जी के दर्शन के लिए कि जैसे भूखे आदमी को कुछ सुहाई नहीं देता ऐसे और कछु न सुहाए तिन को जुगल सेवा सुख पगी युगल
सरकार की प्राप्ति के लिए हृदय ललक पड़े रो पड़े विचलित हो जाए कुछ अच्छा ना लगे नहीं खानपान ते भावे है नहीं कोमल वसंत सुहावे है सब विषय लगे ते खारा है हरि आशिक का मग न्यारा है तो फिर बताया जा सकता है किसी जन्म में हो सकती है और दूसरी बात यह है साधन पक्ष और एक है भरोसा अगर दृढ़ भरोसा तुम्हारे हृदय में हो गया किसी जन्म में भगवान की प्राप्ति होगी तो पक्का भगवान की प्राप्ति होगी क्योंकि भगवान कभी भरोसा नहीं तोड़ते और भरोसा होगा भी नहीं अगर हमारा साधन ठीक नहीं चल रहा तो हमारे अंदर आएगा कि अंदर ही आ जाएगा।
काम नहीं बनेगा और नहीं तो ठसक से कह सकते हैं कि इस जन्म में हमें श्री जी की प्राप्ति होगी। क्योंकि वो अंदर आ जाता है ना तो कि अब हमारा काम हो गया। अब हमें श्री जी की प्राप्ति हरस हनुमान जी अब मनति हरस जवल ते आज देख हो परम हां ये मुख्य तो यही हुआ है कि आचार्य संप्रदाय पुरण पद्धति और गुरुजनों में निष्ठा हो तब भरोसा बने भगवान हां बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल बिना बिना आचार्य के हमें लगता है कि भाव संबंधी विषय कल्याण तो हम कह रहे हैं कोई घोर पापी भी और राम कृष्ण हरि बोलेगा तो कल्याण तो गारंटी है कि एक बार बोला है राम कृष्ण हरि एक बार यह भारी पड़ेगा नरक हिसाब में नर्क के हिसाब में एक नाम भारी पड़ जाएगा और कल्याण तो नाम जपने से परम मंगल परम हो जाएगा लेकिन भाव देश से सियाराम जी की सेवा में जाना या राधेश्याम जी की सेवा में जाना इस पर संशय ये तो आचार्य परंपरा के द्वारा जो प्राप्त उपदेश है मंत्र है भाव साधना उसके द्वारा ही होगा।
नाम जप आप करो चाह करो आपको आचार्य मिला देगा, मंत्र मिला देगा, सब करवा देगा। हां भाव नहीं बन पाएगा। हां भगवान की सेवा में जाना बहुत कठिन बात है। भगवान की सेवा मिलना बहुत कठिन बात है। और वो जब गुरु प्रदत्त मंत्र जपते जपते उसका अभ्यास बन जाता है तो जैसे कहते हैं ना कि असौच अवस्था में इत्यादि तो कैसे उसका निदान उसमें जैसे अब हम कई बार अपनी बात बताएं। स्मरण होने लगता है तो तो उस समय जहां स्मरण आया कि हम सोच में तो हम रोक देते हैं। कोई अपराध नहीं है। लेकिन अब जैसे अब चल रहा है और एक दिन स्मरण के हम तो सोच में है तो उसे तुरंत रोक देते हैं और फिर नाम चलने लगता है।
सीताराम सीताराम अपना नाम चलाए सियाराम सियाराम सियाराम अपने आप जो चल रहा है देखो ये केवल साधन है। सिद्धावस्था में मल लपेटे पड़े। तो यह केवल साधन काल की बात है और परिपक्व अवस्था के लिए फिर यह सब बातें हट जाती है। उसी को अधूर्ति स्थिति कहते हैं। अपवित्र पवित्र वावस्था या स्मरे पुंडरी काक्षम सवाभ्यंतर सुचवा अभ्यंतर दोनों से परम पवित्रता भले मल में पड़ा हो क्योंकि वो भगवत स्वरूप हो चुका है। अब वहां तक पहुंचने के लिए अगर हम पवित्रता का निर्वाह नहीं करेंगे तो कामा आदि दोषों को अवसर मिल जाएगा और वह हम पर हावी हो जाएंगे।
इसलिए हम पवित्र भोजन, पवित्र शरीर, पवित्र व्यवहार, पवित्र आचरण तो उससे हमारी जो शरीर के प्रति ममत्व बुद्धि है ये नष्ट हो जाती है। शरीर से जो हम पवित्रता रखते हैं उससे हमारी ममत्व बुद्धि नष्ट हो जाती है। शरीर से वैराग्य हो जाता है और भगवान में अनुराग का सौभाग्य प्राप्त होता है। इसलिए शरीर से वैराग्य के लिए शरीर को पवित्र रखना अति अनिवार्य है। तो जब कभी ऐसी स्थिति में मंत्र चल पड़े तो जहां हम सावधान हो तो फिर रुक जाए। आचमन आदि करके पवित्र होके ही गुरु मंत्र का जाप करें।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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