॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1177 · 6 फ़रवरी 2026

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [चीखने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [चीखने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [चीखने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा राधा राधा [चीखने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की श्री वृंदावन धाम की सदगुरुदेव भगवान की जय न्यायशा जी बागपत से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी यदि संत मार्ग पर चलने से भगवत प्राप्ति होती है तो गस्थ जीवन की क्या आवश्यकता और यदि गस्थ नहीं क्या आप समझते हो कपड़ा बदलने से भगवान की प्राप्ति होती है क्या संत क्या कपड़ा बदलने वाले को कहते हैं?

क्या संतों के लक्षण होते हैं। तो बोले फिर आप क्यों कपड़ा पहने हैं? क्योंकि हमारा स्वभाव निवत्त था। ये जितने बाबा जी हैं ये सब निवृत्त मार्ग के हैं। नहीं पसंद संसार का राग। नहीं पसंद संसार के कर्तव्य। मुझे एक परम कर्तव्य सच्चिदानंद भगवान में स्थित होना है। तो इसीलिए भगवान ने दो मार्ग बनाए। एक प्रवृत्ति मार्ग और एक निवृत्ति मार्ग। प्रवृत्ति मार्ग गृहस्थ धर्म। निवृत्ति मार्ग वैरागी मार्ग। वैरागी मार्ग में चलते हुए जो गति भगवान की प्राप्त करते हैं वही गृहस्थ में सत भाव से चलते हुए अपने कर्तव्य का पालन करते हुए हम चलते हैं।

अंतर इतना होता है गृहस्थ में भगवत प्राप्ति अपनी ही कर ले बहुत कठिन होता है। लेकिन अगर वैरागी भगवत मार्ग में सही ढंग से चल गया तो लोक के लोक को पावन कर देगा। सतरति सतर सा लोकति वो लोक के लोक को पावन कर सकता है। अगर बचपन से भगवान के मार्ग में ना चले होते तो आज आप जो सुन रहे हैं आप जो आनंद ले रहे हैं आप जो आकर्षित हो रहे हैं नहीं होते। संसार के भोग भोगे होते मनोरंजन किए होते। संसार का नाना प्रकार का राग रंग भोगे होते तो ये नहीं होता। बचपन से भगवान ने त्याग कराया और तैयार किया है।

जब तैयार हुए तो तुम हमारे बीच में बैठ के बोल रहे हैं। तुम्हारे बीच में बैठकर के जो प्रकाश हो रहा है उसे आप आंतरिक अनुभव करो। उसे आंतरिक अनुभव एक वैरागी यदि सच्चे मार्ग से चल जाए तो लोक के लोक को तार सकता है। गृहस्थ धर्म में सम्यक धर्म पूर्वक विषयों का भोग करते हुए भगवन नाम जप करते हुए अपना उद्धार किया जाता है। और वैरागी घोर तपस्या और इंद्रियों के विषयों का त्याग करके पूरे जीवन जगत मंगल के लिए तपस्या भजन करते हुए सर्वे भवंत सुखना सर्वे संत इसलिए हर गृहस्थ जो सद्भाव का है वो चाहे जो वैरागी हो चरणों में झुकता है गृहस्थ आश्रम का गुरु आश्रम है वैराग्य आश्रम तो यह नहीं है कि सबको बाबा जी बनकर ही भगवत प्राप्ति हुई बन नहीं सकते तो वैरागी बनना कोई खिलवाड़ नहीं है।

यह मत समझो कि केवल कपड़ा बदल लेना वैरागी होता है। साधना करके अपनी इंद्रियों को वश में करके मन को वश में करके जहां एक सेकंड के लिए भी मनोरंजन नहीं। पूरा जीवन पूरा जीवन आप विचार करके कांप जाओगे। केवल देख लिया कि बाबा जी है तो वहां बाबा जी हैं। लेकिन जीवन अगर देख लो तो कांप जाओगे कि यह जीवन है। एक सेकंड के लिए मनोरंजन नहीं है। एक सेकंड के लिए कोई डांड बनाने वाला नहीं। कोई छाती से लगा के बोलने वाला नहीं। शाबाश जिसको सब विरोध भाव में ही खड़े हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, आसक्ति, राग, द्वेष, ईर्ष्या इन सबको परास्त करके और तुम्हारा परम मंगल विधान करने के लिए भगवान एक वैरागी को तैयार करते हैं।

ये निवृत्ति मार्ग ऐसे नहीं है। अगर बैलेंस बना के चल रहे हैं तो पाखंड और दंभ की बात अलग है। लेकिन अगर ठीक मार्ग से चल रहे हो तो खांड की धार पर चलना है। चढ़ के मैन तरंग पर चलबो पावक माय प्रेम पत कठिन है सबको निभाता खिलवाड़ समझते हो वैराग्य का मार्ग तो गृहस्थ मार्ग में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए धर्म पूर्वक विषयों का सेवन करते हुए नाम जप करते हुए आपको परम कल्याण की प्राप्ति होगी लेकिन वैरागी वैरागी लाखों को भगवत प्राप्ति कराएगा लाखों का कल्याण होगा अगर सही ढंग से चल रहा है तो नहीं कपड़ा बदलने से भगवान की प्राप्ति नहीं होती।

महारा जी गृहस्थ जीवन में महाराज जी कहीं ना कहीं यह मान्यता बन जाती है कि खूब भोग भोगने की छूट है। तो इसलिए मतलब नहीं छूट तो कहीं नहीं दी गई है। छूट तो कहीं नहीं दी गई। अगर धर्म के अनुसार देखो तो पहला आश्रम गृहस्थ धर्म के या विरक्त धर्म के आश्रम के पहला आश्रम है ब्रह्मचर्य। चाहे वो विरक्त जाना हो या गृहस्थ जाना हो। दोनों के लिए पहला आश्रम ब्रह्मचर्य है। कम से कम 20 वर्ष की अवस्था तक ब्रह्मचारी इसके बाद यदि आपकी निवृत्ति परक वृत्ति है तो निवृत्ति मार्ग प्रवृत्ति परक है तो गृहस्थ अब 2025 तक ब्रह्मचर्य रहे इसके बाद एक पत्नी व्रत अपनी पत्नी में भी वो भी धर्म के अनुसार जो शास्त्र की आज्ञा है मासिक धर्म के एक सप्ताह बाद संतान उतत्पत्ति की भावना से महीने में एक बार ऐसा पर स्त्री स्त्री रमण घोर नर्क जाना।

पर पुरुष रमण घोर नर्क जाना। यहां मनमानी आचरणों को थोड़ी गृहस्थ धर्म कहते हैं। आए हुए अतिथि के लिए अपने प्राणों को भी समर्पित करने की भावना रखना। अतिथि ना भूखा जाए चाहे कुछ भी हो जाए। अतिथि सत्कार ना यहां कहां अतिथि दरवाजे पर भिक्षुक को देखते ही रोष भरी दृष्टि देखे। ये नहीं भगवान आए। नारायण किस रूप में आ गए? आओ आओ प्रभु भोजन पाइए जल पीजिए आसन में ग्रहण कीजिए अतिथि सत्कार गृहस्थ में माता-पिता की सेवा गृहस्थ में पूरे परिवार को भगवत स्वरूप मानते हुए धर्म पूर्वक कमाकर धन और उसकी सेवा करें और नाम जप करे भगवत प्राप्ति हो जाएगी गृहस्थ मनमानी भोगों के लिए थोड़ी चाहे बाबा जी हो चाहे गृहस्थ हो धर्म से नहीं चलोगे तो नरक जाओगे हर शिष्य धन सोकन हर सो गुरु घोर और नरक मा पर ये ऐसे थोड़ी है सिद्धांत है चाहे विरक्त हो चाहे गृहस्थ अगर धर्म पूर्वक चलता है तो भगवत प्राप्ति होती है अगर धर्म पूर्वक नहीं चलता है तो उसकी दुर्गति होती है कपड़ा नरक से नहीं बचा सकता चाहे जैसे पहनो धर्म से चलोगे तो बात बनेगी दोनों मार्ग तपस्या के हैं महाराज दोनों मार्ग सतार्ग है भगवान के द्वारा दोनों मार्ग स्थापित किए गए गृहस्थ और विरक्त दोनों धर्म से चलेंगे अपने अपने धर्म से तो कल्याण हो जाएगा जाएगा।

दोनों का परम कल्याण हो जाएगा। अजीत रंजन दास जी जौनपुर से। राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपकी आध्यात्मिक जीवन यात्रा में जो स्थान पूज्यपाद श्री उड़िया बाबा जी का रहा है। दास के हृदय में आपके चरण कमलों की उपस्थिति की वैसी ही दशा है। महाराज श्री दास के ऊपर आशीर्वाद से अभी सिंचित दृष्टि से शक्तिपात करने की महती कृपा करें जिससे आपके इस दास का कुछ भजन बनने लगे। महाराज जी नाम जप में उपांशु के बाद मानसिक और पश्यती में नाम जप के चलते ही की स्थिति क्या होती है महाराज जी मतलब नाम में उपांशु के बाद जब मानसिक और पश्यती में नाम जप चलने की स्थिति जानना चाह रहे हैं महाराज जी फिर चलाना नहीं होता करता नहीं रहता वो केवल देखता रहता है और स्वाद लेता रहता है जब वाचिक के बाद उपांश उपांश के बाद मानसिक और मानसिक जब परिपक्व अवस्था हो जाती है तो केवल सुनता रहता है, देखता रहता है।

सामने रूप होता है। अंदर मंत्र ध्वनि होती है। हृदय आनंद से लबालब भरा होता है। सुने ना काू की कहीं काहे ना अपनी बात। नारायण व रूप में मगन रहे दिन रात। ना काू सो बोलबो ना कोई व्यवहार अपनी कुंवर किशोरी को जयत निहार निहार बस उस अंतरवथा को कैसे बताएं जिस समय अव्यावत भजन प्रारंभ होगा अखंड चिंतन प्रारंभ होगा उस समय सब सुना सुनाना सा हो जाता है कोई उत्साह नहीं रह जाता उदासीनता बढ़ती चली जाती है। अंतर्मुखता बढ़ती चली जाती है। खानपान विषयक संबंधी, शरीर संबंधी, रिश्ते नाते संबंधी जितना भी राग हो सब भस्म हो जाता है।

बस जीवन केवल प्रभु चलाते हैं उसका। जिसका अव्यावत भजन चल रहा है, अखंड भजन चल रहा है। केवल प्रभु जीवन चलाते हैं। प्रभु भोजन पवाते हैं। प्रभु उससे क्रिया कराते हैं। प्रभु उससे बुलवाते हैं। प्रभु उसको हंसाते हैं। प्रभु उससे चेष्टा कराते हैं। वो स्वयं में तो खो गया। स्वयं में खो जाता है। ऐसी मानसिक भजन की स्थिति जब वही मंत्र जब रूप धारण करता है। ऐसा सौंदर्य है प्रभु का ऐसा सौंदर्य है प्रियाजु का कि मोक्ष सुख भी तुच्छकृत लगता है। उस सुख में उपासक जो निमग्न हो जाता है।

ये काम, क्रोध, लोभ, मोह, मधुम, मत्सर, नाना प्रकार की भोग वासनाएं ये तो बहुत पहले ही नष्ट हो जाती हैं। मानसिक बिना विक्षेप रहित निरंतर चलने के पहले ये नष्ट हो जाती हैं। जब मानसिक चलने लगता है तो भगवदाकार वृत्ति होती है। निरंतर मानसिक भजन चल रहा है। वो मम भक्ति भम पुन वो लोक के लोक को पावन करने की सामर्थ रखता है। बस वह होता नहीं है। होता प्रभु है केवल हृदय में। मैं खो जाता है। तभी निरंतर चलता है। जब तक मैं होता है तो कोई संकल्प विकल्प बना रहता है। संकल्प विकल्प रहता है तो विक्षेप पड़ता है।

जब मैं ही खो गया वो बस अब उस हृदय की स्थिति जिसका निरंतर भजन चलता है तो वही समझ सकता है जो घंटा दो घंटा कम से कम निरंतर ताला आए। घंटा दो घंटा में निरंतरता लाल आए तो समझ पाएगा कि जिसका 24 घंटे भजन होता है उसकी स्थिति क्या होगी। अद्भुत मादकता अद्भुत नशा और भजन के प्रति अद्भुत भूख रात दिन भजन होने पर भी भजन की भूख इतनी कि उसे चैन नहीं मिल रहा। उसे लग रहा है क्या करूं? कैसे करूं? कैसे मेरी भजन की भूख तृप्त हो। भजन की भूख बढ़ जाती है। किसी के विषय में सोचना, किसी के विषय में बोलना, किसी के विषय में सुनना ये तो बहुत दूर की बात रही।

इतनी सुधा भजन की बढ़ जाती है कि वो अपनी भी नहीं सुनता। वह अपनी भी सब जितनी शरीर संबंधी चेष्टाएं सब शिथिल हो जाती है और भजन में डूबा हुआ वह भगवान को अधीन कर लेता है। उसी के हृदय में प्रेम प्रकट होता है और उसी के हृदय में प्रेमाधीन भगवान प्रकाशित हो जाते हैं जो निरंतर भजन परायण रहता है। सविता जी राजस्थान से राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव कोई ऐसी बात जो हमें भगवत मार्ग से भ्रष्ट कर देगी और कोई ऐसी बात जो हमें भगवत प्राप्ति करा देगी संतों का संग एक बात जो तुम्हें भगवत प्राप्ति करा देगी और कुसंग एक बात जो तुम्हें भगवत मार्ग से भ्रष्ट कर देगी बस सत्संग और कुशंग बरहल वास नरक कर ताता दुष्ट संग जन दे दे विधाता भले नरक का वास मिल जाए लेकिन कुसंग ना मिले कुसंग मिलेगा तो परमार्थिक पथिक भ्रष्ट हो जाएगा।

सत्संग मिलेगा तो भ्रष्ट पुरुष भी महात्मा बन जाएगा। सत्संग का प्रभाव होता है। समस्त दुर्गुण दुराचारों को मिटा के सत्य सच्चिदानंद भगवान में स्थिति प्रदान करना ये सत्संग का प्रभाव होता है। इसलिए बड़े भाग पाइप सत्संगा जब बड़ा हमारा पुण्य पुंज एकत्रित होता है। भगवान की विशिष्ट कृपा होती है तब सत्संग प्राप्त होता है। संतों का संग प्राप्त होता है। और जब हमारा दुर्गति का योग लगता है, दुर्भाग्य प्रकट होता है तब कुसंग मिलता है और कुसंग सर्वनाश कर देता है। कुसंग एक वस्तु है, एक बात है जो नाश कर देती है।

सत्संग एक बात है जो उन्नति प्रदान करती है। लौकिक और पारलौकिक दोनों। इसलिए कुसंग से बचे और सत्संग का सेवन करें। नम्रता जी हरिद्वार से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी वाणियों में आता है कि एक दोई जो पाई है खोजी सब संसार हिज्जू की रीति कोई लाखन में एक जाने महाराज जी ऐसा आप लिख रहे हैं कि गुरुदेव इतनी दुर्लभ गति हमारे जैसे लाखों में हम लोग हैं ना असंख्यों जीव हैं। असंख्यों जीवो में कुछ मनुष्य हैं। उन मनुष्यों में कितने लोग बैठे हुए हैं? भगवत चर्चा में कितने लोग बैठे तो यह सब कृपा पात्र जन है।

जितने लोग बैठे हुए हैं एक हाथ की जमीन में उतनी दीमक होगी। वो भी तो जीव है। तो मनुष्य शरीर में पूरे ब्रह्मांडों में देखा जाए तो कितने भक्त हैं। अगर गणना लगाई जाए तो एक ही दो निकलेंगे। अनुपात लगाया जाए तो एक ही दो निकलेंगे तो एक ही दो की गणना में तो हम आप हैं। लाखों की गणना में है क्या? भक्त भगवत मार्ग में चलने वाला दुर्गुण दुराचार का त्यागी सद्गुण सतार्ग का पथिक तो कोई बिरला ही होता है ना। और उस सद्गुण सतार्ग में भी प्रेमी प्रिया प्रीतम का प्रेमी वो तो और भी दुर्लभ है।

बड़ा दुर्लभ विषय है भगवत प्रेम। क्योंकि कहीं ना कहीं लोक परलोक की जो कामना रहती है वो प्रेम प्रकाशित नहीं होने देती। जब लोक परलोक की समस्त कामनाओं का नाश हो जाता है तब भगवान को अधीन करने वाला प्रेम प्रकाशित होता है। जाह न चाह कबहु कछु तुम सन सहज सनेह बसो निरंतर तास सुर सो रा निज गेह प्रेम अत्यंत दुर्लभ वस्तु है। अत्यंत दुर्लभ वस्तु है। इसीलिए कहा गया जैसे यहां कहा गया कि कोई विरला ही एक दोई जो पाइए ऐसे ही भगवान की भक्ति के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे को एक पाव भगत जिमि मोरी कोई एक ऐसे ही ब्रह्म ज्ञान के लिए ब्रह्म बोध के लिए भगवान शंकराचार्य जी कह रहे शास्त्रों जन्मों की साधना जिसकी परिपक्व होती है उसके अंदर मुमुक्षुता जागृत होती और वह मोक्ष को प्राप्त होता है।

तो वो शास्त्रों जन्म की साधनाएं हम सबकी पूर्ण हुई। तभी हम भगवत धाम में संत समागम कर रहे हैं। भगवान के मार्ग में चलने के लिए हम उत्साहित हो रहे हैं। ये हमारे अनेक जन्मों की तपस्या का फल है। भजन का फल है। ऐसा मानो अब हमारा आखिरी जन्म है। ऐसा नहीं कि अब हमारा प्रारंभिक जन्म है। अभी हम अनेक जन्म साधना करेंगे तब हमें ज्ञान होगा। तब हमें भक्ति होगी। नहीं हम बिरले वालों में हैं जो कहा गया कोई एक पाओ तो उनको एक में हमारी गणना है एक दोई जो पाइए तो एक दोई में हमारी गणना है अनंत सृष्टि में अनंत जीवों में अनंत मनुष्यों में कितने लोग भक्ति कर रहे हैं नहीं तो 10 10 11 बजे तक सोते हैं कौन 4 बजे उठकर स्नान करके भगवन भजन त्रिकाल संध्या या सतार्ग की बातें ये तो बड़े भाग्य हैं आपके कि परम परम पावन वृंदावन में प्रातः कालीन वेला पर इस परम पवित्र भूमि में बैठकर आप भगवत चर्चा सुन रहे हैं।

ये तो बड़े भाग्य हैं। ये तो तभी हम कह रहे हैं जो एक दोई जो पाई तो वो एक ही दोई में हो तुम। इतनी बड़ी सृष्टि में अगर गणना लगाए तो एक ही दोई का अनुपात लगेगा। जो आप लोग बैठे हुए हैं तो ऐसा मानिए कि वो एक दो में हम हैं। अब हमारा अंतिम जन्म है। सत्संग मिल रहा भजन मिल रहा। अब मुझे भगवान जरूर मिलेंगे। यदि उनको मिलना ना होता तो हमें इस संसार रूपी दलदल से क्यों घसीटते? अगर उनको कृपा ना करनी होती तो जहां मैं विषयों में फंसा था वहीं फंसे रहने देते। मुझे क्यों घसीटा?

घसीटा है तो जरूर वो अब इतने पे नहीं छोड़ देंगे। वो हमको जरूर मिलेंगे। जरूर ऐसा साधन देंगे। जरूर ऐसी भावना देंगे कि हमारा भगवत साक्षात्कार रूपी परम फल हमको प्राप्त होगा। आकाश लाल जी पटना बिहार से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी हम सांसारिक अहंकार त्याग कर भक्ति में आते हैं। परंतु कुछ समय बाद एक सात्विक अहंकार आने लग जाता है भक्ति मार्ग में। महाराज जी मैं नियम पालन करता हूं और बाकी सब पापी हैं। इस नहीं यह बहुत निंदनीय है। यह बहुत निंदनीय बहुत निंदनीय बहुत होश में नहीं बहुत जल्दी नष्ट हो जाएगा परमार्थ।

बहुत होश में ये बहुत निंदनीय है। मतलब बहुत बहुत निंदनीय है। परमार्थ का स्वरूप तो यह है कि हृदय से बताऊं तो हम सबसे नीच है। सब में भगवान विराजमान है। मैं चराचर जगत का सेवक हूं। सब मेरे स्वामी है। परमार्थ का तो स्वरूप यह है। सो अनन्य गति जाके असमति न टरे हनुमंत मैं सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवंत ये चराचर जगत मेरे लाडले भगवान का स्वरूप है। सब पापी हैं। मैं महात्मा हूं। ये तो बड़ी दुर्गति की बात है। सब भगवत स्वरूप है। मैं नीच हूं। यह सद्गति की बात है। तणाद सुनीचे अपने को तण से नीच समझना है।

तण के समान नीच समझना है। ये तो बहुत गलत बात है। बहुत पतित करने वाली बात है। बहुत जल्दी इसको दूर कर दे साधक। नहीं भ्रष्ट हो जाएगा। नष्ट हो जाएगा। परमार्थ से पतित हो जाएगा। बिल्कुल ये खतरनाक बात है। ये मन में आते ही त्राहिमाम त्राहिमाम पुकारो भगवान को। हे नाथ करुणा करो। मेरे इस अहंकार को नष्ट करो। ये दोष दृष्टि रूपी नीच वृत्ति हमारा नाश करने पर तत्पर है। नाथ आप कृपा करो कृपा करो। त्राहिमाम रक्षा करो। भगवान संभाल देंगे। और अगर इस वृत्ति का नाश नहीं हुआ तो आपका पतन जरूर हो जाएगा।

लिख लो कागज में लिख लो। जो दूसरों पर हे बुद्धि रखता है, अपने में गुण बुद्धि रखता है, बहुत जल्दी नष्ट हो जाता है। जो दूसरों में भगवत बुद्धि रखता है, अपने में अधम बुद्धि रखता है, वो अध्यात्म की ऊंचाई पर चढ़ जाता है। वो महान पद को प्राप्त होता है। लेफ्टेंड कर्नल स्मिता गुप्ता जी मथुरा राधे-राधे महाराज जी महाराज जी सेना में एक जगह पे तीन-चार साल का ही ट्रांसफर होता है महाराज जी। तो महाराज जी अभी मथुरा में पोस्टिंग थी और कोलकाता जा रही हूं तो मन महाराज जी बहुत दुखी है कि मेरा मथुरा वृंदावन छूट जाएगा महाराज जी अब जाने का आपको इस बात के लिए दुखी नहीं होना चाहिए आप राष्ट्र रक्षा के परम धर्म में स्थित है।

राष्ट्र के आगे कुछ नहीं है। देखो ध्यान रखना राष्ट्र रक्षा के लिए हम अपने लौकिक धर्म का भी त्याग कर सकते हैं। प्राण का भी त्याग कर सकते हैं। सर्वस्व का भी त्याग कर सकते हैं। सो आप लोग करते हैं। आप अपने पारिवारिक संबंधों की जो प्रीति है उसका त्याग करके शरीर सुखों का त्याग करके अपने मन की जो वृत्तियां हैं उनको सह करके आप हमारे राष्ट्र सेवा में हैं। इसलिए राष्ट्र सेवा सबसे बड़ा धर्म है। आप उस सबसे बड़े धर्म का पालन कर रहे हैं। इसलिए आपको उदास नहीं होना चाहिए।

यदि आपका ट्रांसफर हो रहा है तो आप राष्ट्र सेवा में हैं। आप गर्व पूर्वक राष्ट्र सेवा का भाव लेकर जहां जाइए हमारे राष्ट्र सेवा के विधान के अनुसार आप चलिए और बन सके तो राधा राधा नाम जप कीजिए। आपका परम मंगल होगा। अब ये राष्ट्रीय सरकारी कार्य है। अब इसमें तो ऐसा नहीं हो सकता कि आप वृंदावन वास करें या मथुरा वास करें। जिस समय सरकार का जहां ट्रांसफर का आदेश होगा वहां जाना पड़ेगा। आपको तैयार रहना चाहिए मन से और जब रिटायर हो जाइए फिर आपकी स्वतंत्रता है। फिर आप चाहे वृंदावन वास करें, अयोध्या वास करें जहां आपकी भावना बने।

भगवत चिंतन करते हुए राष्ट्र सेवा में जो तत्पर है वो महावीर है। वो सम्माननीय है। वो प्रशंसनीय है। वो वंदनीय है। वो सद्गति को प्राप्त होगा। भगवत स्मरण करते हुए तुम जहां भी विराजमान हो राष्ट्र सेवा में तुम सद्गति को प्राप्त होगे। तुम अपने मन को संकोच में मत डालिए कि मथुरा छूट रही है। तुम मथुरा को छोड़ सकते हो। मथुरा तुम्हें नहीं छोड़ सकती। मथुरा वृंदावन ये चिदानंद धाम है। यदि भाव में रखोगे तो करोड़ों कोस दूर भी तुम मथुरा में ही वास माना जाएगा। क्योंकि आप राष्ट्र सेवा में राष्ट्र धर्म में स्थित है।

इसलिए आप चिंता ना करें। पुष्पा जी दिल्ली से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी भक्ति मार्ग में बाह्य स्वच्छता वो पवित्रता अनिवार्य है किंतु जब पवित्रता पर अधिक जोर देने के कारण भक्ति प्रभावित होने लगे तो क्या करना चाहिए महाराज जी बाहरी पवित्रता पर अधिक क्या कैसे कि अभी हाथ धोने हैं अभी नहाना है अभी ये करना है तो क्या इसमें परेशानी है इसमें परेशानी क्या इसमें भक्ति क्या बाधित होगी हमें बताइए क्या बाधित होगी क्या आपको ऐसा लगता है तो हम उसमें आपको बताएं कि यह नहीं करना चाहिए।

कैसे महाराज जी कुछ जनों का महाराज जी मतलब कहीं भी हाथ लगा दिया फिर हाथ धो फिर ताला नहीं अगर हम ठाकुर जी का भोग लगाने जा रहे हैं तो हम हाथ धो रहे हैं। हम हाथ धो के जाएंगे। चाहे कहीं हाथ लगाए हो या ना लगाए हो प्रक्षालन करके जाएंगे। ठाकुर जी के पात्रों का मार्जन करेंगे। ठाकुर जी के लिए अपने शरीर को पवित्र रखेंगे। अपने वस्त्रों को पवित्र रखेंगे। अपने मंत्र जपना है इसलिए आचमन करके मुख को पवित्र रखेंगे। अगर कुछ खाया है तो अच्छी तरह कुल्ला करके तीन बार आचमन करके हम रहेंगे क्योंकि हर समय हमें नाम मंत्र जपना है तो इसमें परेशानी क्या है?

भक्ति में बाधा क्या है? पवित्रता भक्ति की सहायक है। बाधक कहां है? हां। अब ये कि ये छू ना जाए। ये बात नहीं होनी चाहिए। ये नहीं होनी चाहिए। नहीं सब में भगवान विराजमान है और यह पवित्रता एक सीमा तक है। इसके बाद इसका भी महत्व खत्म हो जाता है। अवधूत स्थिति आने लगती है। इस शरीर से राग त्याग देना ही पवित्रता है। शरीर से राग रहित हो जाना ही परम पवित्र है। पर उस स्थिति तक पहुंचने के लिए बाहरी पवित्रता का निर्वाह किया जाता है। हां, पवित्रता में यह बात नहीं होनी चाहिए कि हे तुम हमें कैसे छू लिए?

अब हमें फिर नहाना पड़ेगा। ये नहीं ये नहीं होना चाहिए। सब में भगवान विराजमान है। भगवान का स्वरूप मान करके कोई छू ले तो हम उसे अपवित्र नहीं मानते। हां हम ठाकुर सेवा में जाते हैं तो वस्त्र शरीर आदि की पवित्रता भाव आदि की पवित्रता रखते हैं। बाहरी पवित्रता का तात्पर्य आंतरिक भाव पवित्र हो जाना। और जब भाव पवित्र हो जाता है तो बाहरी पवित्रता का विशेष महत्व नहीं रहता। आशीष जी मथुरा से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं जो भी भक्ति करता हूं उसका कारण मृत्यु के प्रति मेरा भय है।

अभी भक्ति करनी है कर लो पता नहीं कब मृत्यु आई लेकिन बहुत अच्छा बहुत अच्छा बहुत तुम्हारे ऊपर भगवान की बड़ी कृपा है। यदि यह बात तुम्हारे दिमाग में बैठ गई तो तुम बहुत अच्छे भक्त बन जाओगे। मृत्यु का भय बैठ जाए कि पता नहीं कब शरीर छूट जाएगा। दान पुण्य कर लो। तीर्थ याटन कर लो, परोपकार कर लो, मंगलमय भगवान का नाम कीर्तन कर लो, भगवत कथा सुन लो, भगवत भक्तों का संग कर लो, धन्य भाग हो जाएंगे। यही भय तो चाहिए। यही भय चाहिए। जो सभी आवा शरणाई रखियो ताह प्राण की नाई।

यदि मृत्यु से भयभीत होकर भगवान की शरण में गए तो अमर हो जाओगे। अविनाशी पद को प्राप्त हो जाओगे। और एक एक मिनट बहुत अच्छी तरह से कटेगा। यदि मृत्यु का भय रहा। जब मरना है तो पाप क्यों करना है? बुराई क्यों करनी है? नीच कर्म क्यों करना है? यह बहुत बड़े भाग्य की बात है कि किसी के हृदय में बात बैठ जाए कि मृत्यु तो होनी ही है। असतर्म नहीं करना। मुझे सत्कर्म करना है। यही मृत्यु का भय भगवान की स्मृति से युक्त कर देगा और भगवान की स्मृति भगवत प्राप्ति करा देगी।

रुद्राक्ष जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी साधक के जीवन का वह दिन कैसा होता है जब उसकी जन्मों जन्मों की प्रतीक्षा समाप्त हो जाती है और उसके प्रेमास्पद उसके सामने खड़े होते हैं। ऐसा प्रश्न किया है। इसका उत्तर हृदय से होता है। वाणी से नहीं। जब कोई भजन के प्रभाव से प्रभु से प्रेम कर पाता है और जब प्रभु मिलते हैं उस मिलन के सुख को वाणी वर्णन कर सके। इतनी सामर्थ प्राकृतिक वाणी में कहां है? सरस्वती जी में भी इतनी सामर्थ्य नहीं है कि भगवत मिलन की सुख वृत्ति को लिख सके।

नहीं भगवत मिलन कराने वाले प्रेम को ही कहा गया अनिर्वचनीयम प्रेम स्वरूपम प्रेम का स्वरूप वाणी के द्वारा वर्णन नहीं किया जा सकता। फिर प्रीतम सामने हो और बहुत काल से उनके विरह में व्यथित हृदय जो उनको देखता है तो हृदय में क्या होता है ये वाणी की सामर्थ्य नहीं कि वर्णन कर सके वह तो केवल हृदय जानता है केवल हृदय दूसरा ना वर्णन कर सकता है ना समझ सकता है। दो प्रेमियों के मिलन की बात केवल उनका हृदय ही जानता है। इसके आगे हम इस विषय में नहीं कह सकते। जैसे ब्रह्मानंद केवल एक ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष की अनुभूति विषय है।

वाणी का विषय नहीं। ऐसे प्रेमानंद यह केवल हृदय का विषय है। वाणी का विषय नहीं कि उसको ऐसा सुख मिलता है। जैसे हम प्राकृतिक सुख की बात आपसे पूछे आपको बहुत जो प्रिय वस्तु है वह जब आपको प्राप्त होती है तो कैसा लगता है? बोले अच्छा लगता है। कैसा अच्छा लगता है? बहुत अच्छा लगता है। कैसा बहुत अच्छा लगता है? फिर आपका उत्तर होगा कि आप उस वस्तु का सेवन करके देख लीजिए। इसके आगे प्राकृतिक वस्तु के आनंद का अनुभव प्राकृतिक वाणी नहीं कर सकती। फिर सच्चिदानंद स्वरूप परम प्राण प्रीतम प्राणाधार आनंद समुद्र प्रेम समुद्र ज्ञान समुद्र वैराग्य समुद्र ईश्वर समुद्र भगवान का मिलन हो रहा है और उस सुख का वर्णन वाणी कर सके असंभव वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती भी नहीं वर्णन कर सकती इस पांच भौतिक वाणी की तो बात ही जाने दो वो तो केवल हृदय जानता है केवल मिलन की चाह चाह में जो सुख है इशारे से इतनी बात कह सकते हैं कि उस चाह में भगवत मिलन की चाह में जो सुख है वो सुख ब्रह्मा के परमेष्ठी पद का भी

तिरस्कार कर देता है और तो और जाने दो जिसे भगवत मिलन की चाह प्रकट हो गई तो ब्रह्मादिक के भोग सब विषम लागत ताई नारायण बृजचंद की लगन लगी जाए ना पारमेष्ठम न महेंद्रम न सार्वभौम न रसाधिपत्यम न योग सिद्धि पुनरभ ना मोक्ष ना योग की सिद्धि ना ब्रह्मा का पद ना सार्वभौम सम्राट पद ना देवराज इंद्र का पद कुछ नहीं उस सुख के सामने कुछ नहीं अब उस सुख का वर्णन कैसे कर सके वो अनिर्वचनीय है वो तो जाने मोरी छाती उस प्रेमी का हृदय ही जानता है कि अपने प्रीतम जन्म के मिलन में क्या सुख है?

जिस सुख के आगे ब्रह्मा का पद भी फीका लगता है। उस सुख का कैसे वर्णन किया जा सकता है? जी न्यायाधीश राजेंद्र कुमार जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी सब सुख सुविधाएं होने के बावजूद भी मानसिक शांति ना होने का महाराज जी कारण भगवत विस्मृति भगवत विमुखता ममो जीवो जीव भूता सनातन भगवान कहते हैं तू मेरा अंश है अविनाशी का बच्चा अविनाशी आनंद समुद्र में ही शांति प्राप्त करेगा तब लग कुशल न जीव कह ध्यान से सुन लो तब लग कुशल न जीव कहूं सपने मन विश्राम जब ल भजत न राम कहूं शोक धाम तज काम जो चाहत है नित्य सुख और मन को विश्राम हित ध्रुव हित सो भजत रहो पल पल श्यामा श्याम पल पल श्यामा श्याम यदि शांति चाहते हो सुख चाहते हो तो आप देख लीजिए आपके पास पद है।

आपके पास धन है। आपके पास भोग है। लेकिन मन जो शांति चाहता है वो नहीं है। वो शांति परमात्मा में है। जब तक परमात्म प्राप्ति नहीं होगी तब तक शांति नहीं होगी। श्रद्धावान लते ज्ञानम ततराेंद्र ज्ञानम ल पराम शांति मरे गच्छति जब ब्रह्म बोध हो जाता है या भगवत साक्षात्कार होता है तो हृदय परम शांत हो जाता है अपार शांति हमारे भगवान का स्वरूप शाकारकारम शांत स्वरूप हम उनके अंश हैं उसी शांति को चाहते हैं वो भगवान से मिले मिलेगी माया से नहीं प्रकृति से शांति नहीं मिलेगी परमात्मा के अंश को प्रकृति से शांति नहीं मिलेगी परमात्मा के अंश को प्रकृति की वस्तुओं को साधन बनाकर परमात्मा से शांति मिलेगी हम भूल करते हैं अगर उपासना भी करते हैं तो भगवान को साधन बना लेते हैं और भोगों को साध्य मान लेते हैं।

यदि हम भोगों को साधन बना ले और भगवान को साध्य बना ले और भगवान का स्मरण करते हुए अपने कर्तव्य का भय और प्रलोभन त्याग करके ठीक निर्वाह करें तो हमें शांति प्राप्त हो जाएगी। कहीं ना कहीं हमसे भय या प्रलोभन से अपराध बन जाता है। गलती हो जाती है और वो गलती फिर जीवन भर अशांति प्रदान करती है। इसलिए समस्त गलतियों को मिटाने के लिए भगवान का नाम गरज रहा है। नाम जप करो। हृदय से भगवान की शरण में रहो और जो पद मिला है उसका ठीक निर्वाह करो। किसी भी प्रलोभन से, किसी भी भय से, कोई ऐसी गलती ना होने पावे जो नहीं होनी चाहिए।

निर्दोष को दंड देना, दोषी को बख्श देना यह हमारे लिए बड़ी अशांति का कार्य होगा। तो कोई भय या कोई प्रलोभन हमारे कर्तव्य को, हमारे न्याय निष्ठा को कहीं भी किसी भी तरह दबा ना पावे। ऐसे भाव में रहो और नाम जप करो। भगवान के आश्रित रहो। देखो शांति प्राप्त हो जाएगी। शांति नहीं परम शांति परम शांति परम शांति प्राप्त हो जाएगी। महाराज जी पूर्व में अज्ञानता वश ऐसा हो गया और अभी आपका सत्संग या महापुरुषों के वाक्य सुनने के बाद सचेत हुए कि अभी से हमें गलती नहीं करनी।

तो महाराज जी एक तो जो पूर्व का पाप बना है और अभी से नहीं करना। नाम जप से तो ठीक है तो नाम जप से वो जो पूर्व में पाप हुए हैं वो भी हां नाम संकीर्तनम यस सर्व पाप प्रणाशनम सर्व माने पीछे के अभी के और आगे के भी सर्व पाप प्रणाशनम लिखा है ना वर्तमान के पाप नष्ट हो जाएंगे या भविष्य के पाप नष्ट हो जाएंगे ऐसा नहीं लिखा नाम संकीर्तनम यस सर्व पाप प्रणाशनम समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं जो पीछे के भी किए हुए हैं जो अब भी हो रहे हैं या जो भूल चूक से आगे भी हो जाएंगे नाम जप के प्रभाव से नाम कीर्तन के प्रभाव से नष्ट हो जाते

हैं और भगवान की शरणागति से भी सर्व धर्म परित्यज मामेकम शरणमज तो अहम तम सर्व पापे सर्व लिखा है सर्व पापे भूत के पाप वर्तमान के पाप और भविष्य में भी जो गलती हो जाएगी मां सोचा मैं तुम्हें पवित्र करूंगा दूंगा हम तम स्वरपा मोक्ष्या माचा मैं तुम्हें सबसे मुक्त कर दूंगा इसलिए भगवान की शरण में होकर भगवान का नाम कीर्तन नाम जप किया जाए तो हमारा जीवन परम पवित्र हो जाएगा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा [गाना गाने की आवाज़] राधा राधा राधा [गाना गाने की

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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