॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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साधक क्या सावधानी रखे कि वह निरंतर आगे बढ़ता रहे और उससे कोई चूक न हो?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

अतुल जी दिल्ली से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी साधक सांगोपांग ढंग से उपासना करता है तो पहले खिन्नता फिर प्रभु के मिलन के लिए रोना आता है तो महाराज जी स्थिति से लेकर विरह तक की स्थिति तक साधक कैसे संभले कि चूक ना होने पाए। सबसे पहली बात होती है बच्चा संसार का राग हमारे अंदर बना रहता है। जब तक भगवत साक्षात्कार नहीं होता तो जब हम प्रगट में विषयों का संयोग नहीं करते तो अंदर से विषय रस की लालसा रहती है। भजन बल से जब तक उस विषय रस की लालसा नष्ट नहीं हो जाती तब तक कोई आध्यात्मिक उन्नति नहीं मानी जाती।

अगर रस की अनुभूति के बल पर विषयों का त्याग हो रहा है। असली में उसका त्याग है। बाह्य त्याग कर दिया अंदर से सुख बुद्धि भोगों में है और मन हमारा भोगों में जा रहा है। वो कोई खास बात नहीं है। खास बात है। भोगों में सुख बुद्धि का नष्ट हो जाना। ब्रह्मादिक के भोग सब विष सम लागत ताई नारायण ब्रज चंद्र की लगन लगी है जब समस्त भोगों में सुख बुद्धि नष्ट हो जाती है तो एकदम हृदय की पूर्ण एकाग्रता प्रभु की तरफ होती है। ही प्रभु की सनुखता हुई प्रभु की एकाग्रता हुई बस फिर कुछ सुहाई नहीं देता और कछु न सुहाए लोक की पद प्रतिष्ठा मान भोग प्रशंसा कुछ नहीं अच्छा लगता कैसे प्रभु से मिलूं इसमें इतना सुख है कि ब्रह्मा के पद में भी सुख नहीं इस व्याकुलता में मुझे प्रभु मिले मुझे और कुछ नहीं चाहिए नहीं खानपान ते भावे है नहीं कोमल वसंत सुहावे है सब विषय लगे ते खारा है हरि आशिक का मग न्यारा है आशिकी हरी से लग गई अब कुछ अच्छा नहीं इस कुछ अच्छा ना लगने में वो सुख है जो ब्रह्म पद में सुख भी नहीं ब्रह्मा के पद में भी सुख नहीं अब उसके अंदर प्रेमाग्न धक उठती है।

जन्म जन्मांतरों की दबी हुई समस्त दुर्वासनाएं भस्म हो जाती है। हृदय निर्मल हो जाता है। भगवान की अद्भुत अद्भुत सौंदर्युर्य निधि जो भगवान है उनकी झांकी आने लगती है। अब वो भगवान से मिलना भगवान से बात करना भगवान के साथ खेलना ये उसके अंदर चाह प्रकट हो जाती है। ये चाह ही वो बल है जो यात्रा कराती है। चाह ही मिलन की चाह ही वो बल है जो बड़े-बड़े कष्टों को और बड़े-बड़े लौकिक सुखों को दोनों की परवाह ना करते हुए वो भगवान की तरफ दौड़ता है। उपासक इस चाह में बल है।

इस चाह में भगवत मिलन की चाह में इतनी सामर्थ है कि मृत्यु भी उसके लिए दुखद नहीं लगती। मरने से सब जगदा मेरो मन आनंद कब मरी हो कब भेट हो पूर्ण परमानंद। मृत्यु भी महोत्सव लगती है। और ब्रह्मादिक के सुख भी उसे विष के समान लगते हैं। तो ना कोई सुख और ना कोई दुख उसको रोक नहीं सकता। भगवत मिलन की चाह में इतना बल है। वो सबको रौंदता हुआ अपने लक्ष्य पर दौड़ता हुआ अपने आराध्य देव को हृदय से लगा लेता है। यहां किसी और सपोर्ट की जरूरत नहीं है। भगवत चाह में भगवत मिलन की चाह में ही इतनी सामर्थ है कि ब्रह्मादिक के भोगों का ऐसे वमन की भांति विष की भांति त्याग कर देता।

मृत्य लोक के भोगों की बात जाने दो। पर पहले वो प्रबल चाह तो प्रकट हो तो नारायण हरि भजन में ये पांचों न सुहाद विषय भोग निद्रा हंसी जगत प्रीति बहु बात इनको पहले छोड़ो इन्हीं के छोड़ने में समय है भगवान के मिलन में समय नहीं वो तो हृदय में बैठे इंतजार कर रहे हैं कि कौन कब हमसे मिलना चाहता है लेकिन लेकिन जो भगवान से मिलना चाहता है उसकी केवल एक चाहत होनी चाहिए। केवल श्री भगवान अगर कुछ और है तो पर्दा डाले त्रिगुण माया का हृदय में ही बैठे वो नहीं मिलेंगे। केवल श्री भगवान की चाह तो पर्दा हटाकर के प्रकट हो जाएंगे।

इसलिए भजन मार्ग को पुष्ट करो। भगवत मिलन की चाह में इतनी सामर्थ है। वह दुख और सुख दोनों का त्याग करके परमानंद की यात्रा कराता है। किसी और के सपोर्ट की जरूरत नहीं होती। उस चाह में स्वयं इतना बल होता है। महाराज जी जो आप चाह की बात कर रहे हैं महाराज जी लंबे समय तक साधना करने के बाद ये चाह आती है। हां ये ऐसे नहीं आती। जब सब विषयों का राग नष्ट हो जाता है तभी ये चाह पैदा होती है। पहले तो हम भगवत प्राप्ति के लिए जो विषयों का त्याग करते हैं अंदर से विषय भोग की इच्छा रहती है।

विषयों में सुख बुद्धि रहती है। पर हम भोगते इसलिए नहीं कि हमें भगवान की प्राप्ति करनी। इसे त्याग कहते हैं। फिर विषयों की सानिध्य की स्थिति में भी विषय भोग की इच्छा नहीं रहती। इसे वैराग्य कहते हैं। फिर विषय है ऐसा बोध भी नहीं रहता। इसे उपरति कहते हैं। त्याग वैराग्य उपरति इसके बाद चाह प्रकट होती है। अंतिम पड़ाव अंतिम पड़ा। चाह हो गई फिर क्या भगवत मिलन की लगन लग गई चाह हो गई तो सतर सतर सालोकति जिसके अंदर कोई चाह नहीं है केवल भगवत मिलन की चाह है कोई बहुत बिरला मा को एक पाव भगत मोरी कोई ऐसा बिरला भगत होगा जिसके अंदर भगवान की चाह अन्य चाह नहीं अन्य चाहों का नष्ट हो जाना जाह ना चाहिए कबहु कछु कभी भी कुछ कुछ भी नहीं तुम सन सहज सने सहज प्रेम भगवान से बसो निरंतर तास उ सो रा निज के वाल्मीकि भगवान कह रहे हैं वो तुम्हारा निज घर है वो हृदय जिसमें कोई चाह नहीं है कभी कोई इच्छा ही प्रकट नहीं होती हे नाथ आपसे जो सहज प्रेम करते हैं आप उनके हृदय में निवास करें क्योंकि वो आपका निज ग्रह है निज घर है आप निज निज घर की तरह निवास करे जाह न चाह कबहु कछु तुम सन साज सनेह बसहु निरंतर तास उर निरंतर तास उर सो रा निजगे हे नाथ वो आपका घर है आप निरंतर उस पर वास कीजिए

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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