भगवद दर्शन और भगवद तत्व के साक्षात्कार में क्या अंतर है?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
अभिषेक मिश्रा जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी भगवत तत्व क्या है और भगवत तत्व का साक्षात्कार और भगवत दर्शन में क्या अंतर है? पहली बात तो भगवत तत्व के लिए वेद भी जितना वर्णन करते हैं इसके बाद नेति नेति कह देते हैं वो असीम अनंत रसो वै रसम हया लब्ध आंदी भत वो तत्व कैसा है बोले रस स्वरूप है जो उसे प्राप्त हो जाता है महा आनंद में डूब जाता है। जो अव्यक्त है, व्यक्त है, चराचर जगत के रूप में है, चराचर जगत से परे है। कितना भी वर्णन करो वो असीम अनंत है। इसलिए बस इतना जान लेना है कि जब सृष्टि नहीं थी तब भी वही था।
जब सृष्टि नहीं रहेगी तब भी वही रहेगा और बीच में जो कुछ भास रहा है वह सब वही है उसके सिवा कुछ है ही नहीं सर्वम खलमिदम ब्रह्म ने नाना नास्त कििंचन उसके सिवा किंचिन मात्र कुछ नहीं जो कुछ भी देख रहे हो सुन रहे हो सोच रहे हो वो सब वही है उसके सिवा कुछ नहीं है भगवत साक्षात्कार साकार उपासना में जब हम भगवान के किसी एक नाम रूप का आश्रय लेते हैं और समस्त शरीर शरीर संबंधी भोग शरीर संबंधी रिश्ते नातों से ममता और आसक्ति हटाकर केवल श्री भगवान में समर्पित करते हैं तो हमारी प्रियता हो जाती है।
भगवान के नाम से, भगवान के रूप से, भगवान की लीला से, भगवान के धाम से नाम रूप लीला धाम में प्रीता होने पर एक व्याकुलता पैदा होती है जिसे विरह कहते हैं। कि जिसका मैं गुणगान कर रहा हूं, जिसका मैं नाम जप कर रहा हूं, जिसकी लीला स्थलियों का दर्शन कर रहा हूं। पर वो तो मुझे दिखाई नहीं दे रहा। हाय कब वो मुझे दिखाई देगा? कब मिलोगे? दरस बिन दुख न लागे नैन भारी व्याकुलता। प्राण छटपटाने लगते हैं मिलने के लिए। अनुराग से भरा हुआ हृदय। जब मानस नेत्रों में गुरुदेव की कृपा से रूप प्रकाशित होता है।
तो हृदय में भी और बाहर भी सर्वत्र भगवान को देखता है। जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में जान हृदय में भी बाहर भी इसे भगवत साक्षात्कार कहते हैं। ये रूप का साक्षात्कार है। तत्व बोध होने पर उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। रूप साक्षात्कार होने पर लीला में प्रवेश होता है। भगवान की लीला का पात्र बनकर सदैव सदैव के लिए भगवान की समीपता प्राप्त करके वो महा सुख का अनुभव करता है और तत्व ज्ञानी तत्व स्वरूप होकर मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। बात समझ में आई? अमित जी राधे-धे महाराज जी महाराज जी जब मन में कोई भी प्रश्न जो उठे वह खत्म हो जाए और अंतिम मौन आ जाए तो उस अवस्था में क्या बचता है केवल अस्तित्व या पूर्ण शून्य यार पहले स्थिति तो लाओ पहले स्थिति लाओ तब बात समझ में आवे केवल प्रवचन करने से या सुनने से तत्व बोध तो हो नहीं जाता प्रश्न खत्म तो करो पहले पहले साधना तो करो कि प्रश्न खत्म हो जाए।
जहां प्रश्न खत्म हुआ कोई ना सोच है ना कोई चाह है तो ब्रह्म बोध हो जाएगा। ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचति न का समा मक्ति लते पराम कह देना बहुत साधारण बात बच्चा लेकिन कामनाओं का पूर्ण रूप से नाश होना कोई सोच ना रह जाना कोई चाह ना रह जाना ये जन्मजनम रगड़ करने पर भी बिना भगवान की कृपा के बात नहीं आती ये बातें बनाने से नहीं आती। यह स्थिति होती है। कह देना अलग बात है। प्रश्न का उत्तर दे देना, प्रश्न का उत्तर सुन लेना अलग बात है। लेकिन यह स्थिति धारण करना ना सोचति न कांक्षति एक मिनट भी नहीं रह सकते हो।
इस स्थिति में एक मिनट भी नहीं टिक सकते हो। जब तक ब्रह्म भूत नहीं होगे। न सोचति न का समाते पराम कोई सोच नहीं कोई चाह नहीं एकमात्र अपने स्वरूप में स्थित ब्रह्मानंद में छका हुआ वो महापुरुष परा भक्ति का लाभ प्राप्त करता है तो बच्चा पहले चलो उस वस्तु को प्राप्त करो उस वस्तु को प्राप्त करने के लिए ही मानव जीवन मिला है गुरु की शरण में हो पहले कामना करो कि मेरा मेरा भजन मने असत चिंतन छूटे फिर भजन के प्रभाव से तब हम इन तीनों शरीरों के राग का नाश करके स्थूल सूक्ष्म कारण फिर वो परमात्म तत्व की तरफ हमारी गति होती है।
बड़ी मंजिल है। खूब नाम जप करो पवित्र भोजन करो। शास्त्रों का स्वाध्याय करो। संतों का संग करो। आचरण पवित्र करो। तब यात्रा प्रारंभ हो। अभी न सोचत का तो बहुत दूर की बात है बच्चा
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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