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कब सहन करें और कब किस बात का जवाब दें?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

अरुण कुमार जी राधे-धे महाराज जी महाराज जी हम आपका सत्संग सुनते हैं बट जब कोई हमसे छल कपट करता है तो आपके आदेशानुसार हम उसको जवाब नहीं देते लेकिन मन ही मन मायूस होते हैं जिससे नाम जप में रुकावट आती है ऐसी स्थिति में महाराज जी क्या करें महाराज जी उस समय छल कपट कोई करे तो उस समय विचार करना चाहिए कि कोई हमारा प्रारब्ध जैसे हमारी कोई ₹1 की बेईमानी कर ली हमारा प्रारब्ध भोग है पूर्व का ₹1 कर्जा था इसलिए उसने बेईमानी करके ले लिया निपट गए हमको किसी ने गाली दे दिया हमारा प्रारब्ध था गाली सुनकर जो हृदय में जलन हुई हमारा पाप नष्ट हो गया निपट गए हमको ऐसे विचार करना है अध्यात्म दूसरे पर दोषारोपण ना करके अपने को देख के बचा लेता है ये मेरा प्रारब्ध था जिस प्रारब्ध ने मुझे कष्ट दिया अगर मेरा प्रारब्ध ना होता तो जो व्यक्ति छल कपट कर रहा है वो मेरे से अच्छा व्यवहार करता।

मेरा ही प्रारब्ध कर्म उसके ऊपर सवार होकर उससे छल, कपट, निंदा, अपमान, तिरस्कार आदि करवा रहा है। इसलिए इसमें इसका दोष नहीं। मेरा ही कर्म है। इसलिए मुझे सह लेना चाहिए। अगर हम विवेक का प्रयोग करेंगे तो बच जाएंगे। मायूस होने की जरूरत नहीं है। लड़ने की जरूरत नहीं है। विचार की जरूरत है। पॉजिटिव विचार ही हमको बचा सकते हैं। और वो भजन से प्राप्त होते हैं। प्राय लोग नेगेटिव विचार के अधीन होकर क्रोधा आदि कर बैठते हैं। तिरस्कार कर बैठते हैं। लेकिन नहीं सकारात्मक विचार हमारे बढ़े इसलिए हमें अध्यात्म से जुड़ना चाहिए और खूब नाम जप करना चाहिए।

महाराज जी एक अन्य सिद्धांत में आपने बोला था कि फुस्कार ना छोड़ना मतलब डसना नहीं बट फुस्कार भी ना छोड़ना इसका भाव दोनों का इसमें एक बात ये है कि शरीर के अनुसार और पद के अनुसार अब जैसे स्त्री शरीर है वो कोई बार-बार चंचलता कर रहा है कोई बार-बार अभद्र फिर हमें क्षमा नहीं करना चाहिए अगर वो ज्यादा उपद्रव कर रहा है तो हमें कानून का सहारा लेकर उसे दंड दिलाना चाहिए। क्योंकि अगर उसको हम क्षमा करते रहे तो वह उपद्रवी उपद्रव बढ़ाकर वो कहीं गलत आचरणों पर ना उतर जाए।

अब पदाधिकारी है वो अपने निज जनों को शासन में रखना चाहता है। तो अंदर से क्रोध ना रखते हुए भी यदि वो क्रोध नहीं करेगा तो उसके अनुशासन में उसके नीचे वाले नहीं रहेंगे। इसलिए पदाधिकारी जो राष्ट्र सेवा में है जैसे शिक्षक है, पिता है, पदाधिकारी है। इनको ना चाहते हुए भी क्रोध का नाटक करना पड़ेगा। विरोध का नाटक करना पड़ेगा। अब ऑफिस में आया टाइम से नहीं आता। आता है अपना काम नहीं करता है। अब वो बड़ा अधिकारी है। अब उसे हाथ जोड़ के थोड़ी बोलेगा। उससे टाइट होकर बोलेगा तो अगले दिन वो समय से आ जाएगा और अपना कार्य करेगा।

तो अधिकारी को, शिक्षक को, माता-पिता को, गुरु को ना चाहते हुए भी विरोध भाव क्रोध भाव प्रकट करना पड़ता है। अब बच्चा गलत आचरण प्यार से नहीं समझ रहा है तो डांट लगा दी। अब ये सोचे कि अध्यात्म के विरुद्ध है तो नहीं। अध्यात्म को समझना होगा। हां। अब हम जैसे जा रहे हैं कोई गाली छोड़ दिया। लेकिन कोई किसी को सता रहा है। हम नहीं छोड़ेंगे। हम बीच में कूद पड़ेंगे। उसकी रक्षा करेंगे। ये सब विचार इसीलिए कहते हैं हमें पॉजिटिव विचार के लिए भजन चाहिए। भजन करो राम भजे चतुर नर जितना भजन करोगे उतनी बुद्धि विशाल विवेकवती होती जाएगी और आपको बचा लेगी और दूसरे को भी बचा लेगी।

प्रियम मिश्रा जी छत्तीसगढ़ से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी कृपा क्या है? एक साधक अपने जीवन में कृपा की अवहेलना ना करे इसके लिए उसको क्या सावधानियां रखनी चाहिए? सबसे बड़ी बात है मन को बार-बार जो भोगों में संसार में नाना प्रकार के व्यक्ति पदार्थों में जा रहा है इसे हटाकर प्रभु में लगाएं। जितना मन प्रभु में लगेगा उतना ही कृपा का अनुभव होगा। उतना ही हम शास्त्रज्ञा का पालन कर पाएंगे। प्रभु से मन हटा कि का हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई जब तो सुमिरन भजन ना होई जब भगवान का स्मरण नहीं होता भगवान का भजन नहीं होता तो मन भोगों में फंसा देता है भोगों में फंसना ही विपत्ति है।

भोगों का अधर्म पूर्वक भोग भोगना ही कृपा की अवहेलना है। इसलिए कृपा का आदर करने के लिए मन को प्रतिपल प्रभु में लगाए रखें जिससे वह गलत आचरणों की तरफ ना जाए जिससे हमारी बुद्धि शुद्ध बनी रहे। हमें शास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिए। सत्संग सुनना चाहिए। पवित्र भोजन पाना चाहिए और सावधानी पूर्वक प्रतिपल भगवत स्मरण करना चाहिए। इससे हमारे ऊपर कृपा और बढ़ेगी और कृपा का अनादर या अहिलना हमारे द्वारा नहीं होगा। पर जी कृपा का वास्तविक अर्थ क्या है? निरंतर भगवत स्मृति में तन्मय हो जाना।

जाकी कृपा लवलेश ते मति मंद तुलसीदास हो पायो परम विश्राम राम समान प्रभु ना कहो कृपा का स्वरूप है भगवान के चरणों में मन का निरंतर लग जाना साव मन कृष्ण पदारविंद एक एक वृत्त एक एक वृत्त कृष्ण गित मानसा कृष्ण ने हमारे मन को ग्रहण कर लिया, आकर्षित कर लिया, एक एक वृत्त कृष्णाकार हो गई। यही भगवान की कृपा है। यही कृपा का स्वरूप है कि निरंतर भगवान का मन कर्म वचन छाण चतुराई और भजत कृपा कर है रघुराई। मन वचन कर्म से सांसारिक कपट चतुरता का त्याग करके भजन किया जाए तो कृपा ही कृपा है।

यही कृपा का स्वरूप है। कृपा का स्वरूप धन संपत्ति या पद प्रतिष्ठा या शरीर स्वस्थ रहना या मन चाहे भोग भोगना नहीं है। क्योंकि सब नाशवान है। शरीर छूटने के बाद तुम्हारे साथ कुछ नहीं रहेगा। तो कृपा का स्वरूप है भगवत स्मरण। भगवन नाम जप भगवत लीला कथा कथन और श्रवण नाम कीर्तन पवित्र आहार ये सब कृपा का स्वरूप

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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