॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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मैं खुद को जानना चाहता हूं और सिद्ध पुरुष बनना चाहता हूं, क्या करूं?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राकेश कुमार जी बिहार से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं अपने आप को जानना चाहता हूं और सिद्ध पुरुष बनना चाहता हूं हां बच्चा बन क्यों नहीं सकते बैठ जाओ सिद्धों का संग करो तो सिद्ध पुरुष बन जाओगे नाम जप करो भगवत आश्रित रहो पवित्र भोजन पाओ संसार के राग का त्याग करो अगर सिद्ध पुरुष बनना है तो विवेकवान बनना होगा और विवेक होता है साधु संग में साधु संग का रंग साधु ही बना देता है नाम जप का अभ्यास करो जितना सावधानी से ब्रह्मचर्य की रक्षा कर पाओ ब्रह्मचर्य की रक्षा करो क्योंकि बिना ब्रह्मचर्य के स्मृति परायण या योग धारणा की क्षमता नहीं रहती ब्रह्मचर्य में वो क्षमता है कि वो योग धारणा चित्तवृत्ति को निरंतर रोक कर परमात्मा में लगाने की क्षमता ब्रह्मचर्य में है।

तो ब्रह्मचर्य धारण करो। यदि गृहस्थ में जाना है तो उचित ब्रह्मचर्य धारण करो। निरंतर नाम जप करो और संतों का सत्संग करो। तो इससे आपको पता चलने लगेगा कि संसार अविद्या का खेल है। उमा कहूं मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब सपना। ये संसार स्वप्निक है। जब ऐसा लगने लगेगा तो शरीर भी मृत लगने लगेगा। और शरीर से राग हटा वहां जो हम हैं उधर की तरफ हमारी पहुंच होने लगती है। हमारी अंतर्दृष्टि होने लगती है। अंतर्मुखता आने लगती है। तो स्थूल शरीर का राग त्याग सूक्ष्म शरीर के राग का त्याग कारण शरीर के राग का त्याग तब स्वयं जो हम हैं उसका अनुभव हो जाता है।

हम वही हैं जिसकी खोज कर रहे हैं। वही है दूसरे कोई नहीं है। वही है। पर यह है बड़ा काम और ये बड़ा काम बिना गुरु की शरण में हुए बिना संतों की शरण में हुए बिना संत स्वभाव लाए आप इस काम को पूरा नहीं कर सकते हैं। ठीक है अच्छे आचरण वाले बनो नाम जप करो उत्तम अभिलाषा है पर सिद्ध महापुरुष बनना भगवान कृपा करें तो हो सकता है मुम करोलम पंगम लते ग य कृपा त वंदे परमानंद माधव आप कोशिश करो ऐसी इच्छा आई है तो हम आपकी इच्छा की वंदना करते हैं आप आगे बढ़ो ठीक है महाराज जी सिद्ध महापुरुष का तात्पर्य क्या अपने स्वरूप में स्थापित हो जाना वो है यहां सिद्ध शायद इसी की आकांक्षा कर रहा है मैं अपने को जानना चाहता हूं तो जो अपने को जान गया वही सिद्ध हो गया और जिसके पास

सिद्धियां है वो भी सिद्ध है वो खास बात नहीं होती उस सिद्धि को हम मादर नहीं देते क्योंकि वो सब नाशवान सिद्धियां प्राकृतिक ही तो है भौतिक ही तो है चिदानंद तो नहीं है ये चिदानंद सिद्धि है अपने स्वरूप में स्थित हो जाना ये चिदानंद सिद्धि है और सब सिद्धियां प्राकृतिक ही है मायाकृति ही है उसका कोई वो जादू का तमाशा है कुछ नहीं है उनमें संतोष पाटिल जी कर्नाटक से राधे-धे महाराज जी महाराज जी कैसे पता करें कि हमारे बुरे कर्म कब समाप्त होंगे या हो गए हैं भगवान की जब प्राप्ति हो जाए तो जान लो अब खत्म हो गया सब कुछ नहीं तो बने ही रहते हैं देखो बचपन से बाबा जी भजन कर रहे हैं तो भी किडनी फेल है रोज डायलिसिस होता है।

ये बुरे कर्म का ही फल है। अब विश्वास हो गया है। अब इनके नाश का समय आ चुका है। अब हमारा जन्म नहीं होगा। यह हमें अपना अनुभव है। अब हमारा जन्म नहीं होगा। अब हम लाडली जी के पास जाएंगे। जितने दिन है उतने दिन शरीर से भोग लेते हैं। राधा राधा कहते फिर अपने श्री जी के पास जाएंगे। तो समस्त कटे कर्म बंधन संसारी सुख सागर पूरी तति भारी विधि निषेध श्रंखला छुड़ावे निज आलय बना बसावे। यह आचार्य और गुरु कृपा से होता है कि जन्म जन्मांतरों के संचित शुभ अशुभ कर्मों को भस्म करके प्रारब्ध को भोगवा करके क्रिमा को निष्फल करके जीव को मुक्त कर दिया जाता है।

भगवान की शरण में हो और खूब नाम जप करो। भगवान की लीला कथा सुनो। भगवान के भक्तों के चरित्र सुनो तो सब संस्कार भस्म हो जाएंगे। ये तब पता चलता है जब भगवान का साक्षात्कार होता है। इसके पहले नहीं। इसके पहले नहीं भगवत साक्षात्कार में ही कर्म परंपरा छिन्न भिन्न हो जाती

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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