॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

मन बार-बार छोड़ी हुई आदतों की ओर ले जाए और परेशान करे, तो क्या करें?

▶ YouTube

श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

गौरव पांडे जी लखनऊ राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपसे सत्संग में सुना कि हमको सिर्फ नाम जप करना है और इसके सिवा हम कुछ कर भी नहीं सकते अगर कुछ कर सकते हैं तो सिर्फ अपना बुरा कर सकते हैं अगर छूट हो जाए तो हम कहां गिरे ये हमारा चिंतन कहां हमारे हृदय की मांग क्या है हमारी दृष्टि कहां अगर हम रुके हैं तो कृपा की बाढ़ हमें रोके रखिए महाराज जी आपकी कृपा से सब अच्छा चल रहा है पर कभी-कभी मन जो पुराने व्यसन छूट चुके हैं सांसारिक प्रतिकूलता आने पर बहुत जोर से उधर ले जाता है मन मन जिससे परेशान हो जाता हूं और इस मन से इसी से तो बचना है।

नवीन कुसंग से और पूर्व संस्कार से हमारा युद्ध होता रहता है। जैसे नवीन कोई हमने दृश्य देखा कोई बात सुनी कोई भोग सानिध्य हुआ तो भोगने की इच्छा हुई। नवीन कामना भोगे हुए भोगों की तृष्णा यही से तो युद्ध होना है। वो भोगा था अच्छा लगा था। यह मन चिंतन करवा के उधर ले जाना चाहता है। उसी समय ना अब नहीं अब लो नशान यद्यप बहुत बुरा लगेगा मन को बहुत बुरा लगेगा वह आपको जलाएगा और उस जलन को सह जाना ही अध्यात्म है यम ही न व्यथते पुरुषम पुरुष जो मन के द्वारा दी हुई व्यथा से परास्त नहीं होता व्यथित नहीं होता का मतलब है परास्त नहीं होता जैसे हम आपसे मिलना चाहते हैं और कोई हमें सुख मिला है आपसे अब मन विवश करेगा आपके पास चलना नहीं अगर गलत है नहीं मुझे जाना नहीं अब वो जलाएगा ना भजन में लगेगा ना कहीं नहीं लगे वो बस वो बार-बार वही प्रश्न करेगा वही चलो वहीं चलो वो बार-बार वही भोग मांगेगा हमको बार-बार कर नहीं तू चाहे मार डाल मैं नहीं जाऊं कुछ भी कर राधा राधा राधा वो थोड़ी देर जलन देगा शांत हो जाएगा फिर दोबारा जब उठेगा तो पहली बार 15 मिनट जलन दी थी।

अब अब की बार 10 मिनट जलन देगा। फिर पांच मिनट फिर दो मिनट फिर सदा सदा के लिए राधे-राधे हो जाएगा। पर इतनी क्षमता रखनी पड़ेगी कि उसके इस वार को सहना पड़ेगा। उसका स्वभाव है प्रमथन। मन को मत डालना। एकदम यार सब बाद में देखेंगे। पहले यह खा लेते हैं। पहले ये भोग लेते हैं। पहले ये पी लेते हैं। पहले ये देख लेते हैं। उसका ऐसा स्वभाव है। मन के स्वभाव को सह जाना यही साधुता है। सहित सहित बाढ़ है भगत गृह तन गुरु हितगार। जब ना सहन हो तो रो पड़ो भगवान को साक्षी करके।

हे नाथ आप देख लो हमारी दुर्दशा होने के लिए। ये क्या मन कर रहा है। प्रभु आप संभालो। मुझे सामर्थ्य दो। प्रभु उस समय प्रभु को पुकारे। उस समय नाम कीर्तन करने लगे। उस समय सत्संग सुनने लगे। उस समय किसी साधक से बातचीत करने लगे। एकांत में तो फिर टिक पाना बड़ा मुश्किल है। जब हमारा मन किसी विषय पर अरज गया हो और हम एकांत ना एकांत में तुम्हारा बार-बार तुम्हें परास्त करेगा। उस समय हमको खोजना है कि किस विषय से शांत होगा। कोई शास्त्र स्वाध्याय कोई सत्संग सुनना किसी साधक के पास बैठ जाना कुछ नहीं है तो जोरजोर से भगवान को पुकारना राधा राधा किशोरी जु हे लालू हे प्रभु मुझे बचाओ मेरा मन ऐसे क्योंकि इसको सहना बहुत कठिन है बातें बना लेना उपदेश दे लेना उपदेश सुन लेना सब सरल है लेकिन जब यह हठीला मन किसी विषय पर हट कर लेता है कि मुझे यह चाहिए मुझे ये भोगना है फिर बड़ा मुश्किल हो फिर तो मतलब घबराहट पैदा कर देगा।

भारी जलन पैदा कर देगा। व्यथा पैदा कर देगा। कहीं लगेगा नहीं तो आपको भी बुद्धि सलाह देगी। अरे कर लो। आज के बाद कभी नहीं करेंगे। पर आज कर लेते। शांत तो हो जाएगा मन। बस मर गए। अब फंसा लिया। फिर शांति जब होगी ना तो कहेगा कि नहीं करूंगा। पर पुनः जब संकल्प भरेगा तो तुम लड़ नहीं पाओगे। तुरंत वही करना पड़ेगा। फिर दो चार बार हारने के बाद मन क्या कहेगा? अब तुम जीत सकते ही नहीं। लगे रहो इसी में फिर वह जीव कि यार साल भर तो हमने छोड़ा था फिर यार हम नहीं छोड़ पाए फिर हम गिर गए ये पहला जो विषय छोड़ा है उसको चांस मत दो अगर चांस दिया तो फिर तुम्हें चांस नहीं देगा वो जीतने का ये पक्का समझ लो पूरा जीवन का जीवन निकाल देगा और आपकी हिम्मत नहीं पड़ेगी कि उससे आप लड़ सको और एक बार लड़ना सीख गए हो एक बार परास्त कर दिया तो आपके अंदर आनंद उठेगा कि यार वो बात से हम बच गए वो बात से हम बच गए तो आप हर बात जो बुरी है उसको आप परास्त कर देंगे।

यह अध्यात्म की बात है। थोड़ा इसमें सहन करना सीखना पड़ेगा। तितु भगवान आज्ञा करते हैं मात्रा स्पष्ट कौनते शीतोष्ण सुख दुखदा ये जो है आगमा पनो अनित्यास्ता तितस भारत ये आगमा पना आने जाने वाले हैं इनको ताक्षस भारत इनको स मात्रा स्पस्तु कौनते शीतोष्ण सुख दुख यह जो गर्मी, सर्दी, अनुकूलता, प्रतिकूलता, लाभ, हानि ये नाना प्रकार की यह आने जाने वाली है। काम, क्रोध, लोभ ये वृत्तियां आने जाने वाली टिकने वाली नहीं। इसलिए हे अर्जुन तुम इनको सहन करो। ये भोगने से नहीं शांत होंगे।

और हमारी इंद्रियां चंचल है और मन इंद्रियों के अधीन है और बुद्धि मन के अधीन है तो वह भी सलाह देती है। भोग लो। और अगर बुद्धि भगवान में लगी हुई है तो वह कहेगी नहीं गलत है हम नहीं करने देंगे तो अगर बुद्धि ना कर दे तो मन कुछ नहीं कर सकता फिर लेकिन मन इतना बलवान है कि वो बुद्धि को अपने अधीन करा के दस्तखत करवा लेता है और इंद्रियों के साथ भी मनमानी विचरण करता है इसलिए खूब नाम जप करो सत्संग सुनो और सहन करना सीखो जो सहन कर गया वही आगे बढ़ गया जो टूट गया वो बिखर गया है संसार में अभी छ सात दिन पहले ऐसे ही हुआ था कि मतलब जो वैसे छूट चुके हैं पूरी तरीके से तो कुछ

ऐसी चीजें हुई किसी से बातचीत कहासनी हो गई तो मन बार-बार उसी चीजों में ले जा रहा था नहीं तो मतलब जैसे आप कहते हैं कि विचार आएगा फिर संस्कार बनाएगा फिर संकल्प होता है तो वो हो ही गया था फिर मुझे लगा अब मैं भ्रष्ट हो जाऊंगा तो भगवान से प्रभु अब नहीं हो पा रहा है हम भ्रष्ट हो जाएंगे उसी समय कुछ ऐसा प्रभु ने कृपा की कि हुआ तो क्रिया नहीं हो पाई किसी तरीके से तो बच गए अब जैसे महाराज जी मन में आता है कि अब जैसे दीक्षा अब कृपा हो रही है आपकी कृपा से ही सब हो रहा है वरना हम तो किसी लायक नहीं थे हम तो कहां कहां पड़े तो हमको ही पता है आपकी कृपा प्रभु कृपा अभी तो अब तो जो उपासना मिली है वो आपकी कृपा से कर पाते हैं कर हो रही है फिर मन में ये अब डर लगने लगा है कि दीक्षा ले ली उसके बाद आगे चलके फिर ऐसा हुआ कहीं कुछ क्रिया यही डर वो तुमको गिराएगा यही डर गिराएगा तुम्हें डरना नहीं मैं मर जाऊं लेकिन पिऊंगा नहीं मर जाऊं गाऊंगा नहीं मर जाऊं भोगूंगा नहीं तू कर तू कितना भी बार-बार कर मैं नहीं कभी करूंगा कभी

हट करके देखो तुम इतना डरपोक क्यों हो गए इतना डर क्यों डरोगे तो मार डालेगा। बिल्कुल बात पक्की समझो। दुश्मन से डरना नहीं है। अगर डर गए तो फिर तुम फिर तो मार डालेगा। फिर तो मार डालेगा। फिर आपको देखो ना दीक्षा के लिए घबराहट पैदा कर देना। वो आपको सतमार्ग से रोकेगा। आपको कहना है मर चाहे जाऊं। अंदर ही तो है वह। अंदर ही सुन रहा है। आप संकल्प करो कि मैं मर मर चाहे जाऊं कभी पूंगा नहीं। मरना बर्दाश्त करूंगा पीना नहीं। गलत आचरण नहीं करूंगा। बिल्कुल नहीं करूंगा।

वो अंदर एक सॉफ्ट जगह रखता है। हां कभी तो हो सकता है। उसी जगह में प्रहार करो। नहीं कदापि नहीं। कदापि नहीं। नहीं नहीं बस हट करो। नहीं नहीं वो आपसे बिरजेगा। कमजोर करेगा। बस यही तो युद्ध चलता है और सही पूछो तो आप पर केवल प्रभाव दूर से दिखाता है अपने में मिलाने के लिए कुछ नहीं कर सकता वो आपका आपकी स्वीकृति के बिना कुछ नहीं कर सकता वो आपको डरा के धमका के सुख का प्रलोभन देकर के निश्चिंतता का प्रलोभन आराम का प्रलोभन देकर वो फंसा देता है आप दस्तखत कर देते चलो यार बद मर गए नहीं बच गए अब ये नाम जप करो इसी यही कला आ जाएगी अध्यात्म की कला आ जाएगी।

आप चिंता ना करो फिर भगवान सबके रक्षक हैं। पर जो गलती छोड़ी अब लो नसानी अब नान से उसे पुनः मत करो। नहीं तो बार-बार फिर ये भ्रष्ट करता रहेगा और एक बार आपके मन में आ जाएगा कि मैं नहीं चल पाऊंगा। अध्यात्म में मैं नहीं चल पाऊंगा। मैं योग्य नहीं हूं। अब जो होगा सो होगा तो हम बस ऐसे मार देता है भगवान के आश्रित

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

संबंधित