॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1245 · 24 अप्रैल 2026

▶ YouTube

श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा [चीखने की आवाज़] वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की श्री वृंदावन धाम की सदगुरुदेव भगवान की जय राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपका एक द्वंदात्मक हृदय जल रहा है। कह रहे हैं कि एक बार किसी के प्रति इन्होंने झूठी गवाही दे दी जिसमें उनको धन की हानि हुई। अब मतलब वो मानसिक और शारीरिक समस्या में है तो अभी बहुत अंदर से जलन हो रही है तो क्या मदद के तौर पे हां जरूर कर दो कर दो बहुत अच्छा रहेगा।

आप थोड़ा आर्थिक की व्यवस्था उनकी अगर सहयोग कर दे प्रगति या गुप्त रूप से तो वो प्रायश्चित भी हो जाएगा और अच्छा भी रहेगा। अच्छा रहेगा। आप जरूर कर दीजिएगा। यश पटेल जी बरेली से राधे-राधे महाराज जी महाराज जीभ से नाम जप चल रहा है लेकिन भीतर का भाव शून्य सा लग रहा है महाराज जी एक यंत्र की भांति हो रहा है ऐसे में हृदय की पुकार से कैसे महाराज जी नाम जप हो इसके लिए क्या करें पहले नाम जप में ही दृष्टि रखिए नाम जप पहले वैखरी से होता है ये जो बाहरी वाणी है इसे वैखरी कहते फिर उपांश से होता है होठ बंद करके भगवत नाम का उच्चारण करते हुए जिभ्या से साथ में ध्यान करते हुए फिर मानसिक होता है संपूर्णत एकाग्र ध्यान युक्त होकर मन से अपने आप चल रहा है इसके लिए साधु दीर्घ काल निरंतर सत्कार सेवितो दृढ़ भूमि उस मंत्र को उस नाम को सातु दीर्घकाल बहुत लंबे समय तक निरंतर निरंतर सत्कार श्रद्धा आदर के साथ यदि जप किया जाए तो दृढ़ भूमि फिर निरंतर भजन होने लगता है।

फिर प्रेममय भजन होने लगता है। पहले वाचिक जप से अनर्थ की निवृत्ति होती है। जितना हमने पाप किया है अनेक जन्मों का वह सब भस्म होता है। तब तक साधक को आनंद की अनुभूति नहीं होती। कभी हृदय जलता है। कभी सतोगुण आया तो थोड़ा सुख शांति का अनुभव होता है। कभी रजोगुण आया तो कामा आदि दोषों का प्रादुर्भाव हो जाता है। कभी तमोगुण आया तो निद्रा आलस्य प्रमा गुणातीत स्थिति थोड़ी प्राप्त होती है। नाम जप करते करते जब मानसिक जब प्रारंभ होता है निरंतर तब वो गुणातीत स्थिति को प्राप्त होता है।

यमान सिद्धो भवती अमृतो भवती तृप्तो भवती वो सिद्ध हो जाता है वो अमृत पद का अधिकारी हो जाता है वो तृप्त हो जाता है न सोचति न काक्षति कोई चाह नहीं कोई सोच नहीं लगे रहो अब आज अभी थोड़े दिनों से भजन में लगे हो आप सिद्धावस्था की बात चाहो तो कैसे प्राप्त होगा साधु दीर्घ काल लंबे समय तक अभ्यास करो वाचिक से मानसिक में तक पहुंचना है हमारी स्थिति बिल्कुल रत रहो चाहे आनंद मिले ना मिले सुख मिले ना मिले लाभ मिले ना मिले श्रद्धा बने ना बने मुझे भजन करना है ऐसे दृढ़ भाव से भजन करो तो बात बन जाएगी कमल जुनेजा जी दिल्ली से राधे राधे महाराज जी महाराज जी भगवान शिव ने कहा है कि उमा कहूं मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत जगत सब सपना किंतु महाराज जी हमें तो ये जगत अपना सा लगता है और सपना नहीं महाराज जी ऐसे में कैसे अनुभव हो कि तो जब स्वप्निक पुरुष हो तो स्वप्न तो सत्य लगेगा ही स्वप्न में किसी को स्वप्न झूठा लगता है क्या स्वप्न में किसी को स्वप्न झूठा लगता है क्या नहीं जब वो जगता है तब उसे स्वप्न स्वप्न लगता है ना

कि स्वप्न के समय स्वप्न के समय तो सत्य लग रहा है जो सपने सिर काट कोई बिन जागे दुख दूर न होई तो जब तक तुम जगोगे नहीं जगने का मतलब है अपने स्वरूप का बोध या भगवान से प्रेम जेह जाने जग जाए राई जथा स्वप्न भ्रम जैसे जगने पर स्वप्न का भ्रम नष्ट हो जाता है। ऐसे जग नष्ट हो जाता है। नाना तो नष्ट हो जाता है। सिया राम में या सर्वम खलदम ब्रह्म जागे जथा स्वपन भ्रम जाए। जगने पर जैसे स्वप्न का भ्रम नष्ट हो जाता है। ऐसे जे जाने जग जाए। जिस परम तत्व का बोध हो जाने पर ये संसार खो जाता है।

केवल एक ब्रह्म मात्र दिखाई देता है। एक मात्र भगवान दिखाई देते हैं। तो अभी ये स्थिति तो है नहीं तो आप तो स्वप्न पुरुष हो। स्वप्नी पुरुष हो तो सत्य तो लगेगा ही। कोई आप जगे हुए हैं क्या? जानिस तब जीव जग जागा जब सब विषय विलास विरागा। अभी कहां हालत है? अभी तो स्वप्निक पुरुष हो। दिव्या जी उत्तराखंड से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी साधन को साध्य से बढ़कर माने ऐसा आपके श्री मुख से सुना था यह मान्यता महाराज जी दृढ़ नहीं हो पा रही अभी मन की वृत्तियां चिंताएं आदि हैं जिसके कारण हम साधन में आनंद ना लेकर किसी लक्ष्य तक पहुंचने की एक नई चिंता अपने ऊपर लिए हुए हैं।

अत नाम को प्रभु से बढ़कर माने ऐसा हां नाम ब्रह्म राम ते नाम बवरदायक वरदान राम चरित सत कोटि मा लिए महेश जिए जान भगवान शंकर ने 100 करोड़ रामायण का अवगाहन किया तो यह पाया कि भगवान राम के नाम को सर्वश्रेष्ठ राम से भी बढ़कर राम के नाम को पाया ब्रह्म राम ते नाम बढ़ वरदायक वरदान वर देने वालों को भी वर देने की सामर्थ नाम जापक में आ जाती है इसलिए अभी खूब जप करो पहले जप करो बुद्धि पवित्र हो हृदय पवित्र हो मन निर्मल हो तब शास्त्र की बातें स्वयं हृदय में अनुभव में आने लगेंग अभी तो भोगा विलासी मन है अभी दुर्वासना मन सदा परिकर्षती ये दुर्वासनाएं खींचती रहती है।

एकाग्र होने ही नहीं देती। तो कैसे परमानंद का अनुभव लगे रहो लगे रहो। करत करत अभ्यास के जड़ मत होत सुजान। रस्सी आवत जात ही सिल पर होत निशान। जब बार-बार रस्सी आती जाती है तो पत्थर में भी चिन्ह बन जाता है। तो हमारे हृदय में क्यों नहीं नाम का प्रभाव पड़ेगा? हम खूब नाम जपने का अभ्यास दृढ़ करें और लंबे समय तक जपे तो हमें अनुभव होने लगेगा। सौरभ जी राजस्थान से महाराज जी दुर्योधन भगवान श्री कृष्ण के सामने होते हुए भी उनको पहचान नहीं पाया। क्या हम भी आ अरे भाई भगवान इन सब रूपों में क्या तुम पहचान पा रहे हो?

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम मैं जानी सब रूपों में मेरा प्रभु विराजमान सिया राम में सब जग जानी कहा मैं जान रहा हूं कि मेरे सियाराम है राधे श्याम है मैं देख रहा हूं स्त्री है पुरुष है मैं देख रहा हूं अच्छा है बुरा है जड़ है चैतन्य है महात्मा है दुरात्मा है लेकिन एक ही परमात्मा ये कहां देख पा रहा हूं विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण हस्तपाचा पंडिता समदना वही परमात्मा एक को हम बहुत श्यामा बहुत रूपों में विराजमान है। कहां देख पा रहे हैं? हमारे देखने की दृष्टि नहीं और जब दृष्टि आई तो नामदेव जी ने कुत्ते में भगवान को देख लिया।

कुत्ते में भगवान को प्रकट कर लिया। देखने की दृष्टि गुरु से प्राप्त होती है। जो नाम मंत्र मिलता है खूब जप करो। हृदय के ज्ञान नेत्र खुल जाएंगे तो अपने आप सब तत्व बोध हो जाएगा। सर्वत्र भगवान विराजमान है। सर्वत्र वही है। उनके सिवा कुछ नहीं। जब सृष्टि नहीं थी तो केवल मैं था। जब सृष्टि नहीं रहेगी तो केवल मैं रहूंगा। तो बीच में केवल मैं ही मैं हूं। दूसरा कोई है नहीं। कहां हम समझ पा रहे? का सोच पा रहे यो माम पसति सर्वत्र सर्व तम पसति तस्याम न प्रणस्यामि सच में प्रणसति जो सर्वत्र मुझको देखता है और सबको मेरे में देखता है वो मेरे से कभी एक क्षण अलग नहीं होता मैं उससे कभी एक क्षण अलग नहीं होता कहां हमारी स्थिति है इसलिए भजन करो पहले भजन करो भजन बिना कुछ बात नहीं बनेगी खूब डट के भजन करो मयंक सिंह जी मध्य प्रदेश से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपके श्री मुख से दो बातें सुनी हैं।

संतों के प्रति किया गया मानसिक पाप भी दंड देता है। महाराज जी ये मन इतना मलन है कि गुरु एवं ईस्ट के प्रति भी गलत भावना करवा देता है। महाराज जी जबकि मैं हृदय से ऐसा नहीं चाहता कि मेरे मन में ईस्ट या गुरु के प्रति या संतों के प्रति गलत बात आए। बट फिर भी जब मन में आता है तो मुझे लगता है डर लगता है। क्या अपनी मां के प्रति गलत भाव आएगा? आएगा? नहीं आएगा ना? कभी नहीं आएगा ना तो क्या मां से बढ़कर गुरुदेव नहीं है गुरुदेव को पराया समझा गुरुदेव तभी तो कह रहे संतों से प्यार का नाटक होता है संतों से प्यार नहीं होता इसलिए दोष दर्शन इसलिए दुनिया के प्रपंच की बातें होती है यदि संत सतगुरु देव से प्यार करे तो अपने मां-बाप जैसा तो प्यार कर ले यार कोई मां-बाप जैसा अपने गुरुदेव से प्यार कर ले मेरे गुरुदेव गुरुदेव है बस केवल गुरुदेव है इतनी श्रद्धा अगर कर लोगे तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

गुरु पर दोष दर्शन, संतो पर दोष दर्शन क्या एक कदम भी नहीं चल सकते। पूरा जीवन चल के मर के आ रहे हैं। मर के आ रहे हैं। उनमें क्या दोष दर्शन देखोगे तुम? एक कदम भी नहीं चल सकते। जिस मार्ग में उसमें उन्होंने मरा है। अपने मन को मारा, अपने तन को मारा, अपने अहंकार को मारा, अपने जीवन को मिटा दिया। तुम क्या उन पर दोष दर्शन करोगे? क्या दर्शन करोगे? अरे अपने यहां दोष दर्शन को सुधार लो तो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। वहां कुछ बिगड़ने वाला नहीं। इसलिए हम तुमको उदाहरण दिया।

जैसे अपनी मां से प्यार करते हैं वैसे अपने गुरुदेव से प्यार करते हैं। मेरे गुरुदेव हैं। बस [गहरी सांस लेने की आवाज़] कैसे हैं ये मुझसे मतलब नहीं। मेरे गुरुदेव हैं। बस मेरे गुरुदेव हैं। मेरे प्रीतम है। मेरे प्राणनाथ है। मेरे स्वामी है। ये भाव लाओ तब तो बात बनेगी। नहीं तो ये ऐसे ही मन नचा के माया में फेंक देगा। ओम प्रकाश जी नागपुर से राधे-धे महाराज जी महाराज जी गुरु की डांट और कृपा में क्या अंतर है और कैसे वही कृपा है गुरु की दाट ही कृपा है गुरु की कृपा है गुरु का दुलार दया है गुरु की दाट कृपा है दया से बढ़कर के कृपा होती है दया तो द्रवित होकर करते हैं लेकिन कृपा स्वतंत्र होकर करते हैं।

जब जान लेते हैं कि मेरा शिष्य मेरा पक्का है तब वह कसौटी पर कसते हुए उसे गाली दे या उसे तिरस्कार करें उसको दंड दें या कुछ भी वो उन्हीं का होता है। यह कृपा होती है। जब कोई संत महात्मा अपने को डांटे तो नाच पड़ना चाहिए कि आज भगवान हम पर विशेष कृपा किए। इन संत ने आज मुझे अपना माना इसलिए डांटा। ऐसे संत नहीं डांटते। ऐसे तो गाली भी दो तो संत सुन के चले जाएंगे। जिनसे अपनापन मानते हैं उनको डांटते हैं। जिनको डांट देते हैं तो माया दूर भाग जाती है और भगवान के मार्ग में निक आगे बढ़ जाते हैं।

संतो का दुलार उनकी दया संतो की डांट उनकी कृपा हम कृपा और दुलार के सिवा कुछ ना देखें कि देखो उनसे तो ये बहुत प्यार करते हैं। हमसे कठोर व्यवहार करते हैं। ऐसा दोष दर्शन ना करें। उनका कठोर व्यवहार भी भगवत प्राप्ति कराने वाला है। उनका दुलार भी भगवत प्राप्ति कराने वाला है। नीतू जी राधे-धे महाराज जी महाराज जी गुरु कृपा क्या शिष्य के प्रति कम या अधिक भी होती है? जैसा समर्पण होता है वैसे ही कृपा का अनुभव होता है। गुरु की तो सब पर बराबर कृपा है। जैसे पिलाने वाला तो पिला रहा है लेकिन आप ऐसे किए हो तो कैसे पी पाओगे?

ऐसे किए हो और अगर अंदर छेद है तो भी नहीं पी पाओगे। कस के अंजुली बांधकर तो फिर पान कर पाओगे। सब पर मोरी बराबर दाया बराबर गुरु कृपा है। लेकिन अनुभव वही होगा जितना शरणागति जितना समर्पण उतना ही आपको अनुभव होगा। हमारे ऊपर गुरु कृपा है। तो इसलिए बराबर कृपा होने पर भी जैसे भगवान समदर्शी हैं सब पर बराबर कृपा है। लेकिन भक्तों को विशेष कृपा का अनुभव होता है। क्योंकि उन्होंने अपने तन मन प्राण भगवान को समर्पित करके निरंतर भजन का नियम लिया है। केवल भगवान का भरोसा, भगवान का बल, भगवान की आशा, भगवान की शरणागति तो उनको विशेष कृपा का अनुभव होता है।

यद्यपि भगवान कृपा बराबर करते हैं पर विशेष कृपा पात्र होने के कारण वो विशेष लाभ ले जाते हैं श्री भगवान से गुरुदेव से शालू जी दिल्ली से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण तीव्र भक्ति योगेन का वर्णन करते हैं तो महाराज जी ऐसी तीव्र भक्ति कैसे साधक के हृदय में प्रकट हो ताकि जल्द से जल्द उनकी प्राप्ति देखो इसमें सबसे मूल बात है पहले गुरुदेव की शरण फिर गुरुदेव के द्वारा बताई हुई उपासना पद्धति में रात दिन लगे रहना। उठते बैठते चलते फिरते हर समय भगवान की लीला कथा सुनना।

भगवान का नाम कीर्तन करना। जो भी कर्म कर रहे हैं भगवान को समर्पित कर देना। हर समय भगवान के प्रेमी भक्तों के संग की चाह करना। भगवान के भक्तों के चरित्र सुनना भगवान के भक्तों का संग करना यही तीव्र भक्ति योग प्रकट कर देगा यही मत मदत प्राणा बोधता परस्परम कथ माम नित्यम त रमनित नाम प्रीति पूर्वकम ददा बुद्ध योग तते भगवान ने गीता जी में कहा मत मेरे मेंित को लगाने वाला मद प्राणा एक एक स्वास में भगवान का नाम जप करने वाला बोधता परस्परम परस्पर बैठकर भगवान की चर्चा करना उसी में रमण करना उसी में संतुष्ट होना उसी का गान करना और सतत प्रेम पूर्वक भगवान का नाम जब करे तो ददा बुद्धि योगम तम तीव्र भक्ति योग भगवान प्रदान कर देते हैं।

बुद्धि योग प्रदान जब बुद्धि भगवान में स्थित हो गई तो वही तीव्र वही अनन्य है। वही निर्भरा भक्ति है। वही अविचल भक्ति है जहां बुद्धि भगवान में स्थित हो गई। मोहित अवस्थी जी राधे-राज महाराज जी महाराज जी सुंदरकांड की एक पंक्ति है प्रणत पाल रघुनायक सिंधु खगारी गए शरण प्रभु राखी है तब अपराध विसारी महाराज जी इन पंक्ति के अनुसार भगवान की शरण में आए व्यक्ति के भगवान अपराध भूल जाते हैं। तो महाराज जी सच्ची शरणागति महाराज जी क्या होती है और उसको अपने जीवन में कैसे उतारें?

हां पहले जबान से नाम जप करो थोड़ी थोड़ी देर में कहते रहो हे नाथ मैं आपकी शरण में हूं फिर शरीर से जितने कर्म करो भगवान को समर्पित कर दो हे भगवान इसमें जो त्रुटि हो मुझे बुद्धि प्रदान करो कि मैं गलत कर्म ना करूं फिर मन से भगवान का चिंतन करना प्रारंभ करूं भगवान की लीलाओं का भगवान की सेवा का घर में ठाकुर जी विराजमान करो अपने आप शुद्ध शरणागति तन मन वचन से हो गई तो आप देखोगे आपका हृदय आनंद से भर जाएगा। शरणागति बहुत जोर की भक्ति है। पहले भगवान की लीला कथा खूब सुनो खूब गाओ भक्तों का संग करो नाम जप करो।

इसी से बात बनेगी। मृदु भरवाल जी हिमाचल से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी गृहस्थ में रहकर सभी नियमों का पालन करते हुए क्या मैं विरक्त भाव से रह सकते हैं? हम आपका परिवार यदि अपने कार्य योग कार्यभार को संभालने लायक हो गया है तो आप अपना भार समर्पित करके विरक्त हो सकते हैं। वहीं रहते हुए विरक्त भाव से रह सकते हैं। अंदर से ऐसा भी कर सकते हैं। ऐसा भी कर सकते हैं। अंदर से विरक्त भाव से रहना तो और अच्छी बात है। इसके क्या लक्षण है कि हमारे हमारे अंदर विरक्ति का भाव आ रहा है।

इसके क्या लक्षण है महाराज? जैसे हम किसी के घर में जाएं और महीना भर रुके तो कैसे रुकेंगे? केवल भिक्षा से मतलब अपने भजन से मतलब घर में कलह हो रही है या क्या हो रहा है हमें कोई मतलब नहीं हानि हो रही है या लाभ हो रहा है हमें कोई मतलब नहीं जी रहा है मर रहा है हमें कोई मतलब नहीं हम वहां एक महीना के लिए रुके हैं भोजन मिल गया रात दिन भजन में लगे अगर हमें कोई सेवा बता दी जाए तो हम सेवा कर देंगे हमारा ना घर से संबंध है ना परिवार से संबंध है ऐसा हो नहीं सकता इसीलिए विरक्त होकर के धाम आदि का वास किया जाता है इसीलिए फिर घर परिवार छोड़ा जाता

क्योंकि ऐसा विरक्त घर में नहीं रह सकता तो कैसे रहे महाराज जी घर में हां घर में फिर रहो सबको भगवान का स्वरूप समझो नाम जप करो सेवा करो समता धारण करो शास्त्रों का स्वाध्याय करो महीना दो महीना घर के बाहर रहो हरिद्वार है काशी है वृंदावन है जहां तुम्हारी रुचि हो महीना दो महीना ऐसे गृहस्थ को घर के बाहर रहना चाहिए तब विरक्ति सीखेगा एक दो बहने अलग रह के देखो तब तुम्हें पता चलेगा मन की दशा क्या होती है विरक्तों की ना परिवार का दर्शन ना परिवार से संभाषण ना परिवार का सुख फिर देखो क्या होता है विरक्ति कलह हो जाएगी घर में हां तो फिर विरक्ति कोई खिलवाड़ है पूरा जीवन विरक्ति से निर्वाह करना ऐसे साधु महात्माओं को ऐसे खिलवाड़ समझते हैं क्या बहुत बड़ा जीवन होता है बहुत बड़ी तपस्या होती बहुत बड़ा कष्ट सहना पड़ता है तब जाकर के वो अपने मार्ग पर सफल हो पाते हैं कुछ समय समय तक ऐसा विरक्त भाव लाने के लिए रहना चाहिए।

किसी से कोई संबंध नहीं। केवल भगवान का चिंतन भिक्षा मांग कर पा लिया एकांत सेवन तब विरक्ति पुष्ट होती है। ऐसे विरक्ति पुष्ट थोड़ी होती है। लगता है हम विरक्त है लेकिन वो पुष्ट नहीं होती। नाती लड़का बनाती और घर परिवार इसी में आसक्ति बनी रहती है। नमोकार जैन जी जयपुर से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी भक्ति शिरोमणि मीराबाई अपने पदों में वर्णन कर रहे हैं कि जो मैं इतना जानती प्रीत किए दुख होए नगर ढिंढोरा पीटती अजी प्रीत ना करियो कोई महारा जी इसमें कौन से दुख का वर्णन जो ब्रह्मा को भी सुख नहीं है उस दुख का वर्णन है मीरा जी उस दुख का वर्णन कर रहे जो ब्रह्मा को सुख नहीं है वो इस दुख में सुख है अपने प्यारे के चिंतन में हृदय में जो पीड़ा होती है उस बात को मीरा जी कह रहे हैं।

कभी प्यार किया हो तो पता चले किसका प्रश्न है? किसी से प्यार किया है? किससे? हम संतों से तो दिखावटी का प्यार होता है। बनावटी का प्यार होता है। कोई बिरला ऐसा होता है जो सच्चा प्यार करता है। संतों से प्यार कर ले तो बस बेड़ा पार हो गया और कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। संत संग अपवर्ग कर कामी भव कर पंथ। लेकिन भाई जी हनुमान प्रसाद पोदार जी महाराज लिख रहे हैं शायद इसको ही इश्क कहते हो जैसे कोई दिल को मसला करे अपने प्यारे की याद में हां कृष्ण हां प्रियांजु वो एक पीड़ा हो रही है ऐसी असहनीय आनंद की पीड़ा हो रही शब्द समझना असहनी इतनी आनंद की पीड़ा तो कहती जो मैं ऐसा जानती प्रीत के दुख होए नगर ढिंढोरा पीटती जी प्रीत न करियो कोई तुमसे कह दे अब छोड़ दो तो कहती अब तो बेल फैल गई कहते छोड़ दो यदि अब जान गई हो कि गिरधर के प्यार में दुख का अनुभव होता है आप छोड़ दो तो बोले अब तो बेल फैल गई जाने सब कोई मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा लोग ये प्रेम की भाषा है दुख नहीं होता भाई [नाक से की जाने वाली आवाज़] वो आनंद असहनीय असहनीय आनंद की पीड़ा को मीरा जी कह रही जो मैं सा जानती प्रीत के दुख श्री कृष्ण से प्रेम करने से दुख होता है अरे श्री कृष्ण के प्रेमी को देख ले तो आनंद में मगन हो आए फिर श्री कृष्ण का आनंद प्राप्त किए हुए प्रेमी को सुख दुख स्पर्श ही नहीं कर सकते।

वो परमानंद की स्थिति में होता है। आनंद की असहनीय स्थिति मीरा जी की है। तब कहती है सहा नहीं जा रहा। प्रेम ऐसा उफान कर रहा है कि अब सहा नहीं जा रहा। अब सहा नहीं जा रहा। जिया नहीं जा रहा। उस स्थिति का वर्णन करें जो मैं सा जानती प्रीत के खोए नगर ढिंढोरा पीटती जी प्रीत न करियो कोई डरो मत कि उसमें दुख है दुख नहीं असहनीय आनंद हमारा दिल एक सीमा तक आनंद को सह सकता है क्योंकि प्राकृतिक है पर जब चिदानंद आनंद की बाढ़ आती है तब या तो फेल हो जाएगा और या तो दशा बदल जाएगी अवधूत स्थिति को प्राप्त हो जाएगा उन्मत्त हो जाएगा।

उसकी दशा बदल जाएगी। ये तो बहुत थोड़े आनंद के लिए बना हुआ है। ये जो बोर्ड है पूरे ट्रांसफार्मर की बिजली झोंक दोगे तो फूक नहीं जाएगा बोर्ड तुम्हारा। और बिजली के हाउस पावर से जोड़ दो तो छू एकदम। तो हाउस पावर श्री कृष्ण प्रेम का है। प्रेम समुद्र है। हमारा हृदय में बहुत छोटा बोर्ड है। थोड़ा सा माता-पिता भाई बंधु पत्नी मित्र यार इनके प्रेम को थोड़ा सा स्वाद लेने वाला है। परमात्मा के प्रेम के आनंद की जब उमंग आती है तो असहनीय हो जाती है। उसी असहनीय पीड़ा को मीरा जी वर्णन कर रही हैं।

कोई दुख नहीं है। ब्रह्मा को भी वह सुख नहीं है जो मीरा जी को सुख है। वो परमेष्ठी पद में सुख नहीं है जो मीरा जी को सुख में दुख का अनुभव हो रहा है। वह पीड़ा है आनंद की वह ऐसी नहीं

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

संबंधित