॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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हम दोनों पति-पत्नी में बहुत झगड़ा होता है। हम अलग भी नहीं होना चाहते तो क्या करें?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी, हम दोनों पति पत्नी आपस में झगड़ लेते हैं और फिर एक दूसरे से द्वेष करते हैं। ऐसे में हमारा व्यवहारिक जीवन प्रभावित हो रहा है। हम अलग भी होना नहीं चाहते महाराज जी पर ये रोज लड़ाई भी हो जाती है महाराज जी ऐसे में। नहीं लड़ाई क्यों करते हैं? अनुकूलता और प्रतिकूलता यह दो ही सांसारिकता है। अनुकूलता में हर्षित होते हैं और प्रतिकूलता में शोकित हो जाते हैं। अनुकूलता में राग होता है। प्रतिकूलता में द्वेष होता है। अनुकूलता में सुख होता है।

प्रतिकूलता में दुख होता है। इसी को अध्यात्म के द्वारा समान बनाया गया है। अनुकूल प्रतिकूल में समान सुख दुखे समय कृत्वा लाभा लाभ जया जय जब वह नाराज होकर कोई ऐसी बात कहे तुम शांत होकर सुन लीजिए उत्तर मत दीजिए लड़ाई मत कीजिए अलग होना क्या जीवन का निर्णय है क्या जीवन इसी में आनंदित होगा क्या तुम ब्रह्मचर्य आजीवन रह सकते हो क्या वह आजीवन ब्रह्मचर्य रह सकते हैं तो क्या व्यभचार के द्वारा पाप करके नर्क जाने का रास्ता पुष्ट नहीं करते। अगर तुम दोनों पति पत्नी मिलकर प्यार से जीवन व्यतीत करते हुए भगवान का स्मरण करते हुए तो सद्गति हो जाएगी।

लड़ाई मत लड़ो उसको प्यार करो। एक कुत्ते को प्यार करें तो पूछ डुलाने लगता है। हम मनुष्य को प्यार करें तो क्यों नहीं अधीन कर सकते? प्यार में पशु को अधीन किया जा सकता है। तो हमें लगता है कि हम अपनी पत्नी को प्यार करें। पत्नी को चाहे अपने पति से प्यार करें या इधरउधर जो गंदी बातें हैं यह सब छोड़ दे। दंड भोगना जब पड़ता है तब फिर होश उड़ जाते हैं। अभी तो यहां कहां नरक है कहां स्वर्ग है। ऐसे बोलते हैं कहां नरक स्वर्ग है। देख लो नरक स्वर्ग है। देखो सारा खेल कर्मों का है।

तो हम लोग बहुत होश में चले। ये लड़ाई झगड़ा पति पत्नी में जैसे लड़ाई झगड़ा होता है। एक को गंभीर हो जाना चाहिए। जैसे आप सत्संग में आए हो भाग्यशाली हो अब आपको गंभीर हो जाना चाहिए वो नाराज हो तुम चुप हो जाओ ज्यादा नाराज नाराजगी की बात कह रही घर से बाहर निकल जाओ आधा घंटा बाहर बैठो चुपचाप फिर चले आओ लड़ाई झगड़ा करना उत्तम बात नहीं यही देखो अभी बात आई संबंध विक्षेपद की और यही बात हिंसा में आ जाती है जब ज्यादा उतर जाती है तो फिर हिंसा में आ जाती है थोड़ा खाओ पियो दंड बैठक मारो थोड़ा नियम से कभी-कभी अपने ढांचे की तरफ देख लिया करो तो गुस्सा गुस्सा कम हो जाएगी।

हां शरीर में पुष्टता और खाओ पियो ठीक से रहो भजन करो और बच्चा तुम भी लड़ा मत करो। क्या अपने पति को भगवान मानकर आराधना नहीं कर सकती? तो अब रोज पति से लड़ोगे तो ये कोई आराधना रही क्या? कभी कोई बात है तो बैठकर के मानते हैं गृहस्ती में ऐसी बातें होती हैं जिनमें एक दूसरे की मनमुटाव प्रतिकूलता बनती है लेकिन वो ज्यादा नहीं 10 पांच मिनट इसके बाद तुरंत उसको बुद्धिमान आदमी वही है जो अपने समस्या का समाधान कर पावे और समस्या बढ़ती चला जाए चली जाए समाधान ना हो तो फिर गृहस्ती ठीक नहीं ये गंदी बात है लड़ाई झगड़ा अच्छी बात नहीं है इसी से बड़ा दुर्व्यवहार होता है बड़ी हानि होती है कई कई बार ना चाहते हुए बड़े अपराध बन जाते हैं।

इसलिए बहुत शांति ज्यादा जैसे पति होकर के ज्यादा टॉर्चर करे, ज्यादा गुस्सा दिखाए, ज्यादा मारपीट करें तो अब वो पत्नी का मन प्यार के लिए तड़प रहा है। व्याकुलता है पति उससे बैर विरोध का वो इधरउधर फिर दृष्टि जैन का सिहानिया जी राधे-राधे महाराज राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं अपने पति से समय-समय पर 12 ज्योतिर्लिंग इत्यादि तीर्थों के दर्शन कराने के लिए बोलती हूं पर उनकी रुचि वृंदावन धाम में है। हम हर बार तीर्थ याटन में श्री धाम वृंदावन आ जाते हैं। तो क्या मेरी सब जगह दर्शन की आकांक्षा सही है?

एक धाम से पूरी हो गई। भगवान शिव जब कृपा करते हैं तब भगवान श्री हरि के नाम रूप लीला धाम में प्रेम देते हैं। तो धन्यवाद है आपके पति को जो जहां की चरण रज शिव भी चाहते हैं किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊं जो रज शिव सनकादिक याचत सो रज शीश चढ़ाऊं तो तुम जिस रज में आई हो ये ब्रह्मेश्वर आद सुदू पदारविंद श्रीमत पराग परमादभुत वैभवाया ब्रह्मा और ईश्वर भगवान शिव भी जिस भूमि की वंदना करते हैं जिसकी रज को अपने माथे पर लगाते हैं वही वृंदावन धाम यहां आ गए मतलब सब दुनिया के तीर्थ हो गए क्योंकि जितने भी तीर्थ हैं आप गौर से ध्यान दीजिए भगवान शंकर के सिर पर गंगा जी विराजमान

है और वो कौन है गंगा जी भगवान का चरणामृत है जब भगवान वामन रूप धारण किए और वो ब्रह्मलोक पद गया तो ब्रह्मा ने वो जल चरणों का प्रक्षालन करके कमंडल में रखा वही ब्रह्म कमंडल से भगीरथ ने तपस्या के द्वारा जब लाए तो वही भगवान शंकर के सिर पर विराजमान हुए गांगम वारी मनोहार मुरारी चरणचतम त्रिपुरार शरचारी जिन चरणों का धवन गंगा जी भगवान शंकर के माथे पर विराजमान है उन्हीं चरणों से यहां गाय चर आया उन्हीं चरणों से यहां खेले घुटनों के बल यहां खेले भगवान रास किए भगवान नित्य विहार किए तो ये भूमि की समानता त्रिभुवन में नहीं हो सकती जो ब्रज 84 को भूमि भूमि उसमें मुकुट मणि वृंदावन अगर आप वृंदावन आ गए तो सब तीर्थ हो गए सब पूरिया हो गई सब भगवान के विग्रहों के दर्शन हो गए ऐसी भावना करो ये परमधाम वृंदा विपिन है जैसे हम पीपल के मूल जल में जड़ चढ़ा चढ़ा दें तो डाल पत्ते सब जगह पहुंच गया ऐसे हम वृंदावन धाम का सेवन कर लिए तो सब तीर्थों का सेवन कर है।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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