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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1270 · 19 मई 2026

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा हे राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की वृंदावन धाम की सतगुरुदेव भगवान की जय मनीष तिवारी जी हैदराबाद से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी क्या आत्मा सच में होती है अगर हां तो उसका स्वरूप क्या है तुम कौन कौन हो?

कौन हो तुम? मनीष मनीष तिवारी। हां मनीष तिवारी तो इस ढांचे का नाम है। इस ढांचे का नाम है। तुम्हारा नाम थोड़ी है। तुम्हारे ढांचे का नाम मनीष तिवारी है। इतना काट दिया जाए तो तुम कट गए क्या? तुम्हारा हाथ कटा। तो जिससे हमारा संबंध होता वह मैं नहीं होता। समझ पा रहे हो हमारी बात? मैं और मेरा मेरा अलग होता है और मैं मैं होता है। ठीक है? अब हम आपको ले चलते हैं। मेरा सर, मैं सर हूं ऐसा तो नहीं। मेरी आंख, मेरा कान, मेरा मुंह, मेरी छाती, मेरा पैर, पूरे ढांचे को मेरा शरीर।

कभी ये तो नहीं बोलते हो मैं शरीर हूं? मेरा शरीर बोला जाता है या मैं शरीर बोला जाता है? मेरा बोला जाता है। मेरा माइक, मेरी तकिया, मेरा टेबल। इतनी दूर है हमसे वो। ऐसे ही दूर है हमसे जैसे ये अज्ञान के कारण हम समेटे बैठे हुए हैं और इसे मैं माने हुए हैं। लेकिन ये मैं नहीं है। ये मेरा है। ठीक है? अंदर चलो। ये बाहर का ढांचा हो गया। मन आज मेरा मन लग नहीं रहा। मेरा आया ना? मैं मन तो नहीं आया ना तो मेरा चित्त आया ना अहंकार मेरा अहंकार आया ना मैं अहंकार तो नहीं आया ना मेरी इंद्रियां मेरा मन बुद्धि चित्त अहंकार मेरा मैं तो नहीं आया और अंदर चलते हैं तीसरा शरीर कारण शरीर उसे स्वभाव कहते हैं।

मेरा स्वभाव है कि मैं तो तीनों शरीर मैं नहीं हुए तो मैं कौन है इसके अंदर? वही आत्मा मैं मनीष तिवारी नहीं है। मैं शुद्ध ब्रह्म आत्मा है। मनीष तिवारी इस ढांचे का नाम है। अब इतना ज्ञान हो गया तो मोक्ष को प्राप्त हो जाओगे ना। तो खिलवाड़ है इतना ज्ञान होना। अब साधना में लगना पड़ेगा। जब साधना में लगोगे और एक-एक शरीर का त्याग होता चला जाएगा तब अनुभव होगा। और जब मैं का अनुभव हो गया तो मुक्त हो गए। पर जी अभी तो सुन लिया अभी ज्ञान भी हो गया तो यह ज्ञान काम नहीं करता अभी तो कहा नकली ज्ञान और असली ज्ञान में अंतर होता है नकली ज्ञान होता है पढ़ सुनकर और असली ज्ञान होता है भजन करके अनुभव करके हलवा का पूरा हां आपने कंठस्थ कर लिया इतने ग्राम आटा होना चाहिए इतनी बार कल आना चाहिए वैसा रंग हो जाना चाहिए इतना घी इतना चीनी सब पानी और सब पूरा लेकिन खाया कभी नहीं तो मतलब क्या रहा?

खाना है आत्मबध होना और ज्ञान है आत्मा का या हलवा का बनाने की प्रक्रिया पूरी सीख सुनकर के बोलना अनुभव करना हलवा बनाकर खाना यह साधना साधना करो साधना से तब आत्म बोध होगा। किसी गुरु का आश्रय लेकर उसके अनुसार बताई हुई साधना में चले तो आत्म बोध आत्मा तो तुम हो देखो यह चल रहा है। हमारी आवाज कवर कर रहा है। तो इसमें पावर बिजली का है कि नहीं? अगर करंट ना हो दिखाई नहीं दे रहा। लग नहीं रहा लेकिन करंट है इसमें। अगर पावर ना हो तो यह चलेगा नहीं। अच्छा वही पावर इसमें आवाज खींच रहा है।

वही पावर हाइड्रोजन में लाइट दे रहा है। वही पावर एसी में ठंडा कर रहा है। वही पावर हीटर में गर्म कर रहा है। पावर है। जब पावर नहीं रहेगा तो इस शरीर को जला दिया जाएगा। गाड़ दिया जाएगा। फेंक दिया जाएगा। पावर है। उसी पावर का नाम शास्त्री शब्दों में आत्मा कहते हैं। समझ रहे हो? हां। तो है ना पावर है उसी पावर को जिस पावर से आप हाथ जोड़ रहे हो जिस पावर से आप बोल रहे हो जिस पावर से आप सुन रहे हो जिस पावर से आप देख रहे हो उसी पावर का नाम आत्मा है अब उस पावर का जिसको हम वर्णन कर रहे हैं वो मैं है वो मैं ही हूं और मैं हूं मैं शीशा में देखो मैं हूं तो ये लगेगा मैं हूं बस यही भ्रम है यही माया है इससे हटो करो और फिर अंदर देखो जो मैं है वही पावर है वही ब्रह्म है वही आत्मा है वही परमात्मा है वो है उसके बिना सत्ता ही नहीं है जब आदमी मर जाता है तो ढांचा तो यही रहता है ना लेकिन जो गया वो पावर बिजली ऑफ हो गई पावर खत्म बोले मर गया पावर आ गया अरे बोले जी गया बिजली का पावर है जैसे बिजली है तो प्राकृतिक पावर है।

आत्मा है तो चिदानंद पावर है। उसी पावर से अनंत ब्रह्मांड जड़ चैतन्य सब चल रहे हैं। पावर वही है। अब जैसे बिजली करणों में करण माने समझते हो ना ये सब करण है। करणों के प्रभाव से अनेक दिखाई देती है। नहीं दिखाई देती। अब मान लाल है तो लाल लाइट है। हरी तो हरी लाइट है। अब लाइट उसका केवल एक प्रयोजन नहीं है। उसके लाखों प्रयोजन है। अगर लाख करण है तो बिजली लाख प्रकार से दिखाई देगी। मोटर में पानी खींचते हुए अलग-अलग सब है ना। लेकिन बिजली तो एक ही है ना। क्यों? बिजली 10 20 प्रकार की तो होती नहीं।

बिजली तो एक है। 10 20 प्रकार से उसका प्रयोग है। अलग-अलग उसका प्रभाव है। वही बिजली एक जगह ठंडा कर रही। वही बिजली एक जगह गर्म कर रही। वही बिजली जीवन है। वही बिजली मरण है। नहीं है। मार देगी आपको जला के राख कर देगी। तो बिजली तो एक है। ऐसे ही परमात्मा एक है। कहीं जन्म लीला कहीं पालन लीला और कहीं विनाश लीला उसी एक की हो रही। जब ज्ञान हो जाता है तो जीव शांत और आनंदित हो जाता है। अभी हमें यह वाचिक ज्ञान केवल सुनने में आया। अनुभव में तब आएगा जब भजन करोगे, साधना करोगे तब अनुभव और जब अनुभव में आएगा तब मुक्त हो जाओगे।

यह केवल बोल लेने से या सुन लेने से मुक्त नहीं हो जाता। उसका अनुभव करें तब जैसे हमारी भूख केवल भोजन की प्रक्रिया सुन लेने से भोजन के प्रकार सुन लेने से भोजन का स्वाद सुन लेने से हमें स्वाद नहीं आएगा हमारी भूख नहीं मिटेगी हमें खाना पड़ेगा ऐसे ही इसके श्रवण मात्र से काम नहीं चलेगा हमको साधना करनी पड़ेगी हमको गुरुदेव का आश्रय लेकर साधना के द्वारा ये अनुभव करना होगा महाराज जी कितने सरल ढंग से महाराज जी जो वेदों का सार है एकदम ऐसा लग रहा था कि एकदम क्लियर क्लियर क्लियर ये परत ये परत ये परत हां तो अब ये जब अनुभव में आ जाएगा तब कितना अच्छा लगेगा दुख सुख से परे जन्म मृत्यु से परे कोई चिंता नहीं कोई शोक नहीं एक परम आनंद वही तो परमहंस स्थिति होती है साधना की शुरुआत कहां से होती है गुरुदेव के चरणों से गुरु का जैसे आप इस विषय को जाने तो शुरुआत संत समागम से हुई ना संत समागम से इसकी शुरुआत संत समागम से हुई और इसकी पूर्णता भी संत समागम से ही हो जाती है।

जब हम संतों का आश्रय ले लेते हैं। अब जैसे अगला प्रश्न हो तो इसकी प्रथम साधना क्या है? फिर इसकी द्वितीय साधना क्या है? अब मुझे इतना ऐसा अनुभव हो रहा है। अब इसके आगे क्या है? इसलिए पूरे जीवन को समर्पित करके गुरुदेव के आधार पर चला जाता है। तो धीरे-धीरे क्रम बाय क्रम स्थिति आने लगती है। अनुराधा गोयल जी राधे राधे राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी जैसे कि हम कथाओं में पढ़ते हैं कि साधु संत जन महापुरुष जन अपने द्वारा अर्जित किए हुए सत्कर्मों को प्रेमवश या करुणावश किसी को दुख या दर्द हो रहा है तो उसको दान कर देते हैं।

वह ऐसा क्यों करते हैं महाराज जी क्या उनके द्वारा दान करने से उनके सत्कर्म समाप्त हो जाते हैं? फिर उसका डबल फल मिलता है। हमने आपको 100 ग्राम दिया तो इसका भी तो फल होगा। तो हमको 200 ग्राम मिल गए। कभी घाटा थोड़ी होता है। जैसे हमने 10 माला भजन किए और किसी जीव को दे दिया कि इसका मंगल हो तो 10 माला भजन के दान का भी तो फल हुआ नहीं हुआ उसका फल हुआ भगवान प्रसन्न हुए संत जन और कोई फल नहीं चाहते जे विधि प्रभु प्रसन्न मन होई करुणा सागर कीजे सोई जिसमें हमारे प्रभु का मन प्रसन्न हो तो हम जो भी कार्य करते हैं वो जब हम दूसरों को सब में प्रभु विराजमान है तो जब हम दूसरों को सुख देते हैं जिससे जिससे हमारे प्रभु प्रसन्न होते हैं।

तो उस क्रिया का फल हुआ प्रभु की प्रसन्नता और प्रभु प्रसन्न हो गए तो दुर्लभ क्या रह गया? बात समझ में आ रही है? इसलिए संत महात्मा जन अपनी साधना अपनी तपस्या अपना भजन सर्व लोक को देते हैं। सर्वे भवंतु सुखिना सर्वे संत निरामया सर्वे भद्राण पश्यंतु मा कश्चित दुख भाग भवेत सब सुखी रहे सब निरोग रहें किंचिन मात्र किसी को दुख ना पहुंचे यह संतों के हृदय की धारणा होती है तो वो अपने भजन को तपस्या को व्रत को नियम को संयम को सब में बांट देते हैं इससे भगवान प्रसन्न हो जाते हैं और वो भगवान को प्राप्त हो जाते हैं जब भगवान प्रसन्न तो जहां पर कृपा राम की हुई ता पर कृपा करे सब कोई परमानंद की अनुभूति हो जाती है।

महर्षि एक सिद्धांत में आप ही के श्री मुख से सुना है कि मतलब आशीर्वाद के रूप में किसी को दे दिया भजन या कोई मतलब क्रोध वृत्ति आई तो उससे भजन नष्ट हो जाता है। हां वो भजन का भाव अलग है। जब हम भगवान का भाव करके दे रहे हैं कि मेरे भगवान सब में है और सुखी हो जाए और जब हम पर्सनल आशीर्वाद देंगे किसी एक को कि हमारा शिष्य हमारी बहुत सेवा की तो फिर वह जो भजन जाएगा वो उसका लाभ करेगा लेकिन देने वाले का लाभ नहीं होगा क्योंकि उसने सेवा स्वीकार कर ली है। हां क्या जाओ तुम्हारे पुत्र होगा जाओ तुम्हारे वो फिर वो भजन तो इन दोनों में उसका जो भजन जाएगा वो भगवत प्राप्ति कराने वाला नहीं होगा आशीर्वाद और शाप ये दोनों है तो इसमें हमारी प्रक्रिया क्या होनी चाहिए जैसे हम किसी दूसरे को भजन दे रहे हैं अपना 10 जैसे आपने बोला भगवान सामने देखते हुए कि हमारे भगवान इस रूप में आए हैं और उन्हीं के सुख के लिए भजन कर रहे हैं तो हे भगवान ये भजन आपको सुख प्रदान करें तो उससे होता है या अगर हम ऐसा भाव ना देख पावे तो ये जीव सुखी हो जाए और इसका फल ये हो कि भगवान प्रसन्न हो जाए तो वो हो जाएगा।

उसमें मतलब स्वार्थ बुद्धि नहीं है कि इसने हमारी बहुत सेवा की वो आपका पर्सनल राग द्वेष हो गया। तो इसलिए उससे भगवत प्राप्ति वाली बात नहीं होगी। इसीलिए जो सिद्ध महापुरुष होते हैं वो पर्सनल ना किसी को आशीर्वाद देते हैं ना किसी को श्राप देते हैं। वो सार्वजनिक आशीर्वाद देते हैं। सबका मंगल हो। सब सुखी हो सब आनंदित हो ऐसा आशा जी कानपुर से राधेधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी हमारा मन हमारा मित्र है या शत्रु क्योंकि कभी-कभी ये भजन या नाम जप में सहयोग करता है अथवा करने के लिए प्रेरित करता है तो कभी बिल्कुल भजन से विमुख कर देता है कहता है कि आज भजन करने का बिल्कुल ही मन नहीं है तो हम क्या और कैसे इसे दो विभाग मन के हैं।

एक सत विभाग है एक असत विभाग है। जब सत विभाग वाला मन सतोगुण होता है तब वह जोर पकड़ता है। भजन करो, दान करो, तीर्थ याटन करो, शास्त्र स्वाध्याय करो, चलो देव दर्शन करते हैं, सत्संग करते हैं। वैसे भागवती और जब असत मन वाले को रजोगुण या तमोगुण का संग मिल जाता है तब वह भोग वासना द्वेष हिंसा ऐसे प्रमाद आलस्य ऐसी स्थितियां लाता है तो दो विभाग है मन के सत विभाग और असत विभाग एक ही मन की दो स्फूर्णनाएं हैं तो हमें चाहिए कि उसकी असत स्फुरणाओं को नष्ट कर दें असत प्रेरणा को ना माने।

जब हम सात्विक भोजन करेंगे, शास्त्रों का स्वाध्याय करेंगे, नाम जप करेंगे तो यह हम में विवेक जागृत हो जाएगा कि यह असत है और हम उसको नकार देंगे। जब हम मन को नकारते हैं तो वह हमें जलाता है। उस जलन को जो सह जाता है वही परमात्म प्राप्ति के योग्य हो जाता है। इसलिए मन की असत वासनाओं को, असत स्फुरणाओं को, असत चिंतन को, असत संकल्प को हमें त्यागना होगा। धीरे-धीरे हमें पहचानना होगा कि यह सत्य है और यह असत है। यह सत असत की पहचान विवेक से होती है और यह विवेक शास्त्र स्वाध्याय और सत्संग से प्राप्त होता है।

बिन सत्संग विवेक ना हो। जहां विवेक हुआ तो वो सत असत की पहचान बता देगा कि गलत है। यह सही है। जो सही है वह बात हम मान लेते हैं। और जो मन की स्पना गलत है वह हम बात नहीं मानते। अब हमें चाहे जितना जलाए हमें अशांत करेगा हमें जलाएगा लेकिन हमें उसकी जलन को सहना होगा जो सह गया वही परमात्म प्राप्ति के योग्य हो गया जो टूट गया वही भोगों में फंस गया समझ में आया बबीता जी गुरुदेव भगवान मेरा प्रश्न है कि आप ही में अपने प्रभु को देखा है तो यदि मरते वक्त यदि स्मरण शक्ति बनी रही तो इष्ट का स्मरण करें या श्री सदगुरुदेव भगवान कम अगर इतनी स्मृति बनी रही कि मुझे निर्णय क्या करना है तो फिर अभी प्रेम ही कहां होगा?

अगर हमको यह भेद बना रहा कि इष्ट और गुरुदेव अलग-अलग है तो अभी स्थिति ही क्या आई? गुरु साक्षात परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः जो परम ब्रह्म परमात्मा इष्ट है वही गुरुदेव के रूप में है ध्यान मूलम गुरु मूर्ति पूजा मूलम गुरु पदम मंत्र मूलम गुरु वाक्यम मोक्ष मूलम गुरु जब गुरु में हमारी तदात्म भाव हो जाता है तो इष्ट का दर्शन होने लगता है। इष्ट ही गुरुदेव है। गुरुदेव ही इष्ट है। ऐसा अनुभव हो गया तो जीवन मुक्त हो गया। अब यह कि हम निर्णय करें उस समय कि गुरुदेव का चिंतन करें कि इष्ट का मतलब दो दो तो मतलब द्वैत द्वैत तो मतलब अज्ञान अज्ञान में फिर ये चिंतन का समय ही नहीं रहेगा मृत्यु ले जाएगी चिंतन का समय तो गाढ़ प्रेम में होता है कि अपने गुरुदेव के चिंतन करते हुए शरीर को छोड़ा तो गुरुदेव साक्षात परम ब्रह्म तो परमात्मा को प्राप्त हो गया वही परमात्मा गुरुदेव है कोई दूसरा थोड़ी है मंजू जी राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी ऐशोराम की लाइफ जीना क्या गलत है क्या रोग को बढ़ाना क्या सही है रोग को कोई रोग हो और उसके बढ़ाने वाले पदार्थ हम खाएं तो क्या अच्छा कहा जाएगा क्या तो भव रोग हमारे ऊपर लगा हुआ है बार-बार जन्म बार-बार मरण बार-बार विपत्ति बार-बार दुख बार-बार नाना प्रकार के प्रपंच और इसको बढ़ाने वाला है भोग विलास एशो आराम विलासिता तो गलत हुआ कि नहीं हुआ कि हम एशो आराम में मन लगाकर और भोगों में बढ़ रहे हैं।

और गंदी बातों में बढ़ रहे हैं। देखो धीरे-धीरे अपवित्रता बढ़ती जा रही है। यह भोग विलासिता ही धर्म का नाश कर रहे हैं। जब हम अपनी पत्नी से या अपने पति से संतुष्ट होकर धर्म पूर्वक चलते हैं तो हमारा मार्ग दूसरा हो जाता है। और जब हम भोग विलासिता में चलते हैं तो हम अपने पति में संतुष्ट नहीं होते। फिर और पुरुषों में हम अपनी पत्नी से संतुष्ट नहीं होते। फिर और स्त्रियों में तो यह मार्ग नरक की तरफ ले जा रहा है और भव बंधन को पुष्ट करने वाला है। भोग विलासिता को भोग विलासिता मानकर ना भोगा जाए।

उसे भगवान की आराधना मानकर किया जाए और भजन किया जाए तो मार्ग दूसरा हो जाएगा। जैसे कुछ संपत्ति है तो हम मंदिर बनवा देते हैं, गौशाला खुलवा देते हैं, अस्पताल बनवा देते हैं और फ्री दवाएं देते हैं। अब है तो भोग विलासिता लेकिन वह स्वयं सादगी से रहता है। धर्म से चलता है। कोई गलत आचरण नहीं करता। तो रुपया होते हुए भी धन होते हुए भी वो नरक वाला मार्ग नहीं पुष्ट हुआ। वो भगवान की प्राप्ति वाला मार्ग पुष्ट हुआ। और जब ऐसे रुपया बढ़ता है तो फिर शराब पीना, पर स्त्री गमन करना और चोरी करना, झूठ बोलना, हिंसा करवाना यह सब बढ़ जाता है।

ये भोग विलासिता ही तो नरक की तरफ ले जाती है। भोग विलासिता ही तो गंदे आचरणों में ले जाती है। ये भोग विलासिता ही तो दुर्गति करवा देती है। इसलिए हमें लगता है कि हम भव रोग को बढ़ाएं ना इसको मिटाएं। जास नाम भव भेषज हरण घोर त्रिशूल जिन भगवान का मंगलमय नाम इस भव रोग को मिटाने वाला है उनका नाम जप करें पैसे का सदुपयोग किया जाए अब वही विलासिता में एक पार्टी में गए 50 हजार खर्चा कर आए शराब पिए चार दोस्त और वैसे मगर अब वो नरक का रास्ता बन गया और एक बार गए और 50 गौओं को भोजन पवा के प्रणाम करके उनके खुरकी रज मस्तक पे और हे भगवान यह सत्कर्म आपको समर्पित लोक परलोक सब बन गया तो भोग विलासिता तो हमें लगता है ठीक नहीं है भोग विलासिता का यदि आपके पास साम्राज्य है तो दूसरों को बांटिए दूसरों को सुख दीजिए और स्वयं ठीक से रहिए धर्म से रहिए तो वही भगवान की प्राप्ति का हेतु हो जाएगा तो हमें लगता है भोग विलासिता बुद्धि को भ्रष्ट कर देती है और नरक का बिल्कुल पथ पुष्ट कर देती है।

अगर हमें भोग विलासिता मिले तो हमें धर्म में लगाना चाहिए। दूसरों के कार्यों में लगाना चाहिए। अपने भोग में उचित भोगे और धर्म पूर्वक चले तो मनुष्य जीवन सार्थक है। नहीं तो बिल्कुल बेकार है। महाराज जी इसमें दो पक्ष हैं महाराज जी। एक तो जो है उसमें अभी कूदे हुए हैं। भोग विलासिता में अंध हो चुका। उनको हमारी बातें नहीं समझ में वह समझना भी नहीं चाहते और वह समझेंगे भी नहीं। एक है जो उनको देख के ललचाल रहे हैं कि यार हमारी भी ऐसी लाइफ होती तो ठीक था। हां इसीलिए तो दुर्गति ज्यादा होती है।

सद्गति किसी एक की होती है। सद्गति किसी एक दो की होती है। दुर्गति ज्यादा हो ज्यादा होती है। क्योंकि भगवान के मार्ग में चलने में इंद्रियों को समेटना है और उन पर विजय प्राप्त करनी है और भोगों में इंद्रियों की विलासिता है। इंद्रिय सुख है तो तत्काल सुख के लिए मन लालायित हो जाता है। किसी को हम देखते हैं भोग भोगते हुए लेकिन नहीं। वह सुंदर जीवन नहीं है। यह केवल माया की चमकाहट है जो आपको अपनी तरफ खींच रही है। आपको धर्म से चलना है। आपको अपने पास जो भी भोग सामग्री धर्म पूर्वक भोगते हुए दूसरों की सेवा में लगाना है।

इससे आपका मंगल होगा। बात मान लो। यदि मनमानी आचरण करोगे तो मंगल नहीं होगा। वो विलासिता में ही सब तुम्हारा धन और समय और जीवन नष्ट हो जाएगा। ये पक्की बात है। श्रेया सिंह जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मुझे जानना है कि मेरा इस धरती पर पैदा होने का उद्देश्य क्या है? भगवत प्राप्ति नर्तन कर फल विषय न भाई भज राम सब काम बिहाई। इस मनुष्य शरीर का फल है समस्त कामनाओं का त्याग करके भगवत प्राप्ति करना। बचपन में यही बात हमको भगवान ने दी। हमारे अंदर एक प्रश्न खड़ा हो गया।

जब हम पांच छ में पढ़ते थे तो हमारे अंदर अम्मा को बहुत प्यार करते थे। मां को बहुत प्यार करते थे। तो जब स्कूल से आते मां को देखते तो एकदम दिमाग में आता मरेगी। तो हमारे दिमाग में आता फिर मैं कैसे रह पाऊंगा? मां के बिना कैसे रहूं? पिताजी की तरफ देखते यह भी मरेंगे क्योंकि मृत्यु लोक है सब मरे यार जब सबको मरना ही है तो मेरा कौन ऐसा है कि जो मेरे साथ रह सके बस दिमाग में एक ही बात आई भगवान ऐसे हैं जो अविनाशी हैं वही हमारे सच्चे माता-पिता हैं वही हमारे मित्र हैं।

बस इसी बात ने मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है? मनुष्य जीवन में प्रियता किससे करनी चाहिए? बस इसी बात को ढूंढने के लिए निकल पड़े थे। बच्चापन से निकल पड़े थे। तो अब तो जीवन की शाम होने जा रही है। धीरे धीरे धीरे धीरे तो जीवन का परम लक्ष्य भगवान की प्राप्ति है। अगर मनुष्य जीवन में आकर भगवान को नहीं भजा गया तो बहुत बड़ी हानि हो गई। इससे बड़ी कोई हानि नहीं है। ये मान लो आज मान लो नहीं कल पछताओगे। सूअर कुत्ता चिलिया नाली का कीड़ा बिठा का कीड़ा क्या बना दिया जाए कर्म के अनुसार कुछ पता नहीं आज बड़ा सुंदर रूप है आज बढ़िया बढ़िया कपड़ा पहने हो गाड़ी में चलते हो हर व्यवस्था है लेकिन पाप कर्म करोगे तो कल नाली का कीड़ा बना दिया जाएगा फिर क्या होगा फिर तुम कैसे अपने को उबार पाओगे उस दुख से कल तुम्हें ऐसी जीव जंतु बना दिया जाएगा जो लोग उबाल उबाल के खाएंगे।

फिर क्या आप अपने को बचा पाओगे? आज आपको यहां पीड़ा है तो अस्पताल जाकर दवा लेते हो। कल पशु पक्षी बनोगे। आपके शरीर में पीड़ा होगी। आपको दवा मिल पाएगी। आपको सुरक्षा हो पाएगी। क्या कर सकता है? कितने ऐसे जीव हैं जो सामने अपने परिवार का नाश देखते हैं वो बेचारे तो हमें लगता है इन सब बातों पर विचार करके मनुष्य शरीर में धर्म पूर्वक विषयों को भोगते हुए भगवान का नाम जप करते हुए पापाचरण से बच जाए यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है मनुष्य जीवन का लक्ष्य है भगवत प्राप्ति आशिका जी मुंबई से राधे-राधे गुरु जी राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव निरंतर भक्ति भाव समय के अनुसार बदलते रहते हैं।

कभी शिव जी हनुमान जी तो कभी राधा रानी जी के प्रति भक्ति आती है। तो क्या यह भाव भक्ति बदलाव आना सही है? यह प्रारंभिक है। इसका कोई महत्व नहीं है। यह शुरुआत है भक्ति की। भक्ति का तो तब रंग होता है जब एक भरोसो एक बल एक आश विश्वास एक राम घनश्याम हित चातक तुलसीदास एक भगवान के नाम में भगवान के रूप में आसक्ति हो जाए हमारे राम जी हमारे श्याम जी हमारी किशोरी जी हमारे भगवान शंकर एक जगह आ जाओ अब यह प्रारंभ में सबका ऐसा होता हनुमान चालीसा पढ़ ली, शिव चालीसा पढ़ ली, राम रक्षा स्तोत्र पढ़ लिया, यह सब ऐसे चलता है।

प्रारंभ में सबके चलता है। लेकिन जब भक्ति रंग लाती है तो फिर एक है मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई। जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। भक्ति रंग लाए तो फिर एक में अगर शिव तो बिल्कुल अनन्य शिव। जैसे पार्वती मैया कहती कोटि जन्म लग रगर हमारी बरहु शंभ नऊ कुंवारी करोड़ जन्मों तक बार-बार जन्मूंगी और हर बार तपस्या करके यही वरदान मांगूंगी कि भगवान शंकर मेरे पति हो तो हम जहां लगे वहां अनन्यता से लगे थोड़ी देर राम जी की पूजा थोड़ी देर श्याम जी की पूजा थोड़ी देर माता जी की पूजा थोड़ी देर अन्य देवी देवताओं की पूजा यह प्रारंभ में हम भी करते थे।

प्रारंभ में सब कोई करता है। फिर जब उसका रंग आता है तब एक में हो जाता है। फिर अनन्य भक्त कहलाता है। वही अनन्य ये कोई दोष नहीं है। ये सब कोई करता है। क्यों? सबके यहां सब माता जी हो, भगवान शिव जी हो, राम जी हो, गणेश जी हो, लक्ष्मी जी सब सब विराजमान रहते हैं। फिर जब भक्ति रंग लाती है तब एक में अनन्यता आ जाती है। जगीता जी मुंबई से जी महाराज जी इत व्यवहार ना उत परमार्थ बीच ही बीच जो जन्म गवायो जो धर्मिन सो प्रीति करत नहीं कहां भयो धर्मी जो कहा गुरुदेव इसमें संसार और परमार्थ दोनों का क्या स्वरूप है गस्थ आश्रम में रहते हुए दोनों को बैलेंस करके चलना पड़ता है व्यवहार को जो गृहस्थ धर्म है इसमें परमात्म प्राप्ति के लिए समस्त कर्मों को शास्त्र के अनुकूल फूल करते हुए श्री भगवान को समर्पित करते हुए और भगवान का स्मरण करते हुए यदि हम समय व्यतीत करें धर्म पूर्वक धन

कमाना कमाए हुए धन से कुछ हिस्से में परमार्थ करना और कुछ हिस्से में अपने परिवार का पोषण करना अगर हम बहुत सावधानी से चले तो गृहस्थ धर्म में भी परमात्म प्राप्ति हो जाए पर ऐसी मूढ़ता छा जाती सेवक जी ने कहा कि ऐसे ना वैसे रहे मजरे ढो ना इधर के रहे ना उधर के रहे ना व्यवहार निर्वाह कर पाए ना परमार्थ अब गृहस्थ में है पापाचरण करते हुए धन कमाते हैं और पापाचरण मनमानी गंदे आचरण करते हैं व्यभचार मानुष मदिरा ये सब खानपान तो ना गृहस्थ धर्म का निर्वाह कर पाए विरक्त धर्म तो बहुत ही कठिन है तो नरक की प्राप्ति ही ना इत व्यवहारत ना उत परमार्थ बीच ही बीच जन्म गमायो जो धर्मन सो प्रीति करत नहीं कहा भयो धर्मी जो कायो यदि भागवत धर्म प्रेम धर्म को धारण करने वाले संत महापुरुषों से संग नहीं किया और अपने आचरणों का परिवर्तन नहीं किया वही गंदे आचरण वही गंदे विचार तो सेवक जी महाराज कह रहे हैं ना व्यवहार के रह गए ना परमार्थ के रह गए फिर नरक भोगो फिर पुनरप जननम पुनरप मरणम पुनरप जननी जठरे सैयनम तो गृहस्थ धर्म ऐसा नहीं

है। गृहस्थ धर्म बड़ा महान धर्म है जिसमें विरक्त पैदा होते हैं। विरक्त विरक्तों का पोषण होता है। विरक्त उनके दरवाजे आकर भिक्षा लेते हैं। कितना महान गृहस्थ धर्म है। जितने भी संत महात्मा हैं गृहस्थों के यहां तो पैदा हुए प्रकट हुए और जितने संत महात्मा हैं सबका भिक्षावृत्ति गृहस्थों से ही तो होती है। अगर गृहस्थ धर्म से चले तो वह अपने धर्म से भगवत प्राप्ति कर सकता है। पर धर्म से चलना बड़ा कठिन है। हमारे यहां चार पुरुषार्थ है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। जब धर्म से अर्थ कमाया जाए और धर्म पूर्वक कामनाओं की पूर्ति की जाए तो मोक्ष पदवी की तरफ हमारी गति हो जाए।

यदि अधर्म से हम धन कमाएंगे तो कामनाएं मनो पूर्ण करने के लिए मनोकामनाएं पूर्ण करने के लिए हम मनमानी आचरण करेंगे और आज सब प्राय मनमानी आचरण करना चाहते हैं। शास्त्र के अनुसार या संतों के कथन के अनुसार नहीं चलना चाहते। इसी बात को सेवक जी कह रहे हैं कि ऐसे ना वैसे ना इत परमार्थ ना उत व्यवहार ना व्यवहार के रह गए ना परमार्थ के रह गए बीच ही बीच जो जन्म गवायो बीच ही बीच ना धर्म और ना मोक्ष बीच में कामनाएं और अर्थ के पिशाच बनकर के नाना प्रकार के कुकर्म किए और परिणाम स्वरूप दुर्गति को प्राप्त हुए तो हमारा मनुष्य जन्म मिला है भगवत प्राप्ति करने के लिए चाहे हम गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो दोनों अपने अपने धर्म से चले तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

धर्म छोड़ दें तो विरक्त बनने पर भी भगवत प्राप्ति नहीं होगी। विरक्त भेष है और विरक्त धर्म का हम आचरण ना करें। भगवत भजन ना करें। त्याग वैराग्य से ना रहे। इंद्रियों पर विजय प्राप्त ना करें तो मोक्ष थोड़ी प्राप्त होगा। ऐसे ही गृहस्थ धर्म में दोनों अपनेपने धर्म से चले तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी। चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो सबको मनुष्य जन्म केवल भगवत प्राप्ति के लिए ही मिला है। साधन धाम मोक्ष कर द्वारा पाए न जे परलोक समारा सो परत्र दुख पाव सिर धुन धुन पछताए कालह कर्म ईश्वर मिथ्या दोष लगाए जो मनुष्य शरीर प्राप्त करके साधना करके मोक्ष प्राप्त नहीं करता उसे बड़ा दुख भोगना पड़ेगा सो परत्र दुख पाव सिर धुन धुन पछताए अब अन्य योनियों में जाने पर भजन तो बनेगा नहीं केवल भोग योनियां है भजन तो बन सकता है केवल मनुष्य योनि में अब मनुष्य योनि में आकर भोगों में लग गए भजन छूट गया तो फिर महानता क्या रही मनुष्य जन्म की इसलिए सेवक जी कहते

हैं कि इत व्यवहार न उत परमार्थ बीच ही बीच जो जन्म गवायो विनय गोयल जी राधे राधे-धे महाराज जी महाराज जी दैनिक दिनचर्या में कई बार संशय होता है दुविधा आती है तो सही चेतना और मार्गदर्शन कैसे प्राप्त अपने गुरु से अपने गुरु से अपनी दिनचर्या बनवा लेनी चाहिए जो सांसारिक कार्य हैं उनकी दिनचर्या तो आपकी है ही कि आपको 8:00 बजे ऑफिस जाना है और शाम के 4:00 बजे वापस सोना है लेकिन जो हमारी ऑफिस जाने के पहले दिनचर्या भागवतिक होनी चाहिए ऑफिस जाने के बात की भागवतिक दिनचर्या होनी चाहिए।

वो अपने गुरु से बनवा लेना। इतना पाठ, इतना भजन, ऐसे नियम, ऐसे धर्म तो हमारा डाउट खत्म हो जाएगा। क्योंकि गुरु आज्ञा में डाउट नहीं होता। बिन विचार कर शुभ जानी। अगर गुरुदेव आज्ञा कर रहे हैं आप ऐसे करो तो उसमें विचार की गुंजाइश नहीं। अगर विचार किया तो दोष है। गुरु आज्ञा में बिना विचार करके जैसा वो बोल रहे हैं वैसा किया जाए तो परम मंगल हो जाएगा। गुरु आज्ञा और उपदेश ही हमारे हर संशयों का नाश कर देगा। तो हमारी दिनचर्या में जो डाउट है उसको गुरु आज्ञा से निकाल देना चाहिए।

संशय नहीं रखना चाहिए। अगर संशय बना रहेगा तो दृढ़ विश्वास नहीं आएगा। हमारी पूर्ण श्रद्धा नहीं होगी। संशयात्मा विनश्यति अगर ज्यादा संशय बन जाए तो फिर विनाश की तरफ भी हमारी साधना नष्ट हो जाएगी। हमारी भावना नष्ट हो हर बात में संशय होने लगेगा। यह मंत्र दिया पता नहीं इसमें कल्याण होगा कि नहीं। यह नाम दिया इससे कल्याण होगा। यह बात कह रहे थे पता नहीं इसमें कल्याण होगा। तो संशयात्मा विनश्यति संशय का नाश कर देना चाहिए। नहीं संशय हमारा नाश कर देगा। अगर व्यवहारिक पक्ष हो तो ये काम करूं या ना करूं या इसमें संशय आए तो तो जब साधना करोगे तो आपकी बुद्धि इतनी पवित्र होगी।

वैसे तो हमने सबसे कहा है चाहे जितना पापी पुरुष हो जब वो पाप करने के लिए गलत आचरण करने के लिए संकल्प करेगा उसी समय अंदर से एक आवाज आती है सत्य की तुम गलत हो गलत जा रहे हो अगर उस आवाज को मान लो तो किसी को उपदेश की जरूरत नहीं अंदर परमात्मा बैठा हुआ सद्गुरु रूप से वो सबको उपदेश करता रहता है कोई भी आप गलत कार्य करने जा रहेगे तो आपको पहले अंदर से सद्गुरु उपदेश करेगा ए यह गलत है फंस जाओगे मारे जाओगे दुर्गति होगी लेकिन वह प्रमाद के कारण ध्यान नहीं देता और मनमानी आचरण कर लेता है यदि आप भजन करोगे तो आप उस बात को मानोगे तो आपका गलत आचरण रुक जाएगा प्रश्न ये है कि गुरु परध्याय से पास में कि राधा रानी के बारे में जानते थे और जो जितने भी देवी देवता देव देवता देवी है उनके रूप में जब जानते हैं उनके बारे में सोचते हैं तो जब बात आती है कि अद्वैतवाद सारे एक है तो हमें अच्छा लगता है जैसे मैं कभी दिक उपासना कर रहा हूं कभी राधा रानी की उपासना कर रहा हूं कभी जैसे नवरात्र रहता है तो की पूजा करने का मन करता है

ऐसे राधा रानी के बारे में प्रारंभ में सबकी ही उपासना होती है अभी पीछे वाले बैच में भी बताया कि प्रारंभ में कोई हनुमान चालीसा पढ़ता है, शिव चालीसा पढ़ता है, राम रक्षा स्तोत्र पढ़ता है। प्रारंभ में सबकी साधना सार्वभौम होती है। क्योंकि सब भगवान उसे प्रिय लगते हैं। गणेश जी भी विराजमान है। लक्ष्मी जी भी विराजमान सब पर जब उपासना का रंग आएगा तो एक में आएगा। क्योंकि एक ही बहुश्यामा वेद कहता है एकोम बहुश्यामा एक अहम बहुश्यामा वो परम ब्रह्म परमात्मा एक ही बहुत रूपों में व्याप्त है तो जो उपासना कर रहे हो गलत तो है नहीं क्योंकि सब रूपों में वही व्याप्त है वो गलत नहीं है।

पर जब प्रेम वाली बात आएगी तब फिर एक में होता है कि हमें माता जी से प्रेम है। हमें राधा रानी से प्रेम है। हमें हनुमान जी से प्रेम है। हमें राम जी से प्रेम है। जब प्रेम आता है तो प्रेम गलियत साकरी तामे दो न समाए। उसमें दो नहीं समाते। वो एक है और वह एक में लग जाता है। तो हमें चाहिए धीरे-धीरे अपने मन को समेट कर किसी एक प्रभु के नाम रूप में लगा दे। तो फिर हमारा भजन जो है वह उन्नतिशील हो जाएगा। अभी क्या है कि हमारी कामनाएं हैं तो जब जहां जैसा मनाया तभी कोई आराधना का नियम तो है नहीं कोई आराधना के प्रति आसक्ति भी नहीं है।

जब जहां जैसे मनाया ये प्रारंभिक भक्ति में होता है। आगे चलकर के वो जब साधक ठीक से भजन करता है तो फिर समिट जाता है। प्रारंभ में हम भी ऐसे करते थे। देवी जी को जल चढ़ाना, शंकर जी को जल चढ़ाना, हनुमान चालीसा पढ़ना, शिव चालीसा पढ़ना, राम रक्षा स्त्रोत, गजेंद्र मोक्ष, गोपाल सहस्त्र नाम, विष्णु शास्त्र ये सब एक होता है ना तो वो धीरे धीरे धीरे धीरे जाकर के वो जब पूर्णता को प्राप्त होता है तब एक होता है और एक में आसक्त हो जाता है। जैसे मीरा जी कहते हैं ना मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई ऐसे एक में स्थित हो जाता है।

प्रारंभ वाला कोई निंदनीय नहीं है क्योंकि एक ही परमात्मा तो बहुत रूपों में है। तो बहुत रूपों में भी जो आराधना कर रहा है वो एक ही परमात्मा की तो कर रहा है। वो जाने ना जाने अपने तो जान रहे हैं ना कि बहुत रूपों में जो आराधना कर रहा है वो एक ही परमात्मा की कर रहा है। क्योंकि एक ही बहुत रूपों में है और जब बहुत रूपों से मन पूर्ण होकर एक रूप में लग जाए तो उसे प्रेम कहते हैं। प्रेम में दो नहीं होते। एक प्रेम गलियती साकरीता में दो ना समाए एक एक होकर के गाया जाता है।

समझ रहे हैं? हां लक्ष्मीराम जी हैदराबाद से राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव मन हमेशा भविष्य की इच्छाएं, कल्पनाएं, आत्म संदेह और कुछ बड़ा पाने की बेचैनी में उलझा रहता है। कृपया मार्गदर्शन करें कि मैं इस चंचल मन को कैसे शांत करूं और पूर्ण रूप से वर्तमान में जीऊं। वैसे सबका मन जो है बड़ा बनने की चाह रखता है। नहीं रखता। सबका मन किसी का भी मन किसी से पूछो तुम छोटा बनना चाहते हो क्या तो सब बड़ा बनना चाहते हैं। मतलब अगर वो डकैत है तो वह भी बड़ा डकैत बनना चाहता है।

बुरा आदमी है तो बहुत बुरा बनना चाहता है। क्यों? ऐसा क्यों? क्योंकि हम बहुत बड़े के बच्चे हैं। भगवान सबसे बड़े हैं ना। हम भगवान के अंश हैं। तो हम जिस दिशा में जाना चाहते हैं उस दिशा में सबसे बड़ा बनना चाहते हैं। क्योंकि भगवान सबसे बड़े हैं। तो हम सबसे बड़े के अंश हैं। तो हमारे अंदर यही बात रहती है। केवल मन भविष्य की ही चिंता नहीं करता। भूत की बातों का भी चिंतन करता है। नहीं करता। बीती हुई बातों का चिंतन और व्यर्थ बातों का भी चिंतन करता है। यह भूत, भविष्य और व्यर्थ तीन बातों में ये हमको बर्बाद किए हुए हैं।

जो वर्तमान में हमारा समय सार्थक जाना चाहिए। ये वर्तमान की चिंता नहीं करता। यह भूत भविष्य की बातों में लग के हमारे वर्तमान को नष्ट कर देता है। हम वर्तमान को यदि संभाले तो हमारा भूत भी पवित्र हो जाएगा और भविष्य भी उज्जवल हो जाएगा। वर्तमान संभालना हम धर्म पूर्वक कार्य कर रहे हैं और राधा राधा नाम जप कर रहे हैं। कोई पाप नहीं कर रहे। आज वर्तमान में अभी हर समय हमारे लिए वर्तमान ही तो रहेगा ना। वर्तमान वर्तमान वर्तमान तो वर्तमान में हम कोई पाप ना करें वर्तमान में जो कार्य करें वह धर्म पूर्वक करें और नाम जप करें पवित्र भोजन पावे कोई नशा ना करें कोई व्यभचार ना करें तो आप जो बड़ा बनना चाहते हो सबसे बड़े बन जाओगे भगवान के भक्त से बढ़कर के कोई पद भी है क्या जिसके पीछे भगवान डोले जहां मेरा भक्त चरण रखे वहां रखूं मैं हाथ और पीछे पीछे मैं चलूं कभी न छाणू साथ भगवान ऐसा कहते हैं निरपेक्षम मुनिम शांतम निरम समदर्शनम अनुजाम्यम नित्यम पुतंग रेणु भी जो निरपेक्ष है सदैव मेरा मनन करते हैं शांत है कोई द्वंद उनको अशांत नहीं कर पाता समदर्शी है किसी से वैर नहीं करते।

ऐसे भक्तों के पीछे पीछे मैं डोलता हूं। उनकी चरण रज मेरे ऊपर पड़ जाए। इतना भगवान सम्मान करते हैं भक्त का। जब स्वयं भगवान करते हैं तो इससे बड़ा कौन हुआ? तो सबसे बड़ा कौन? भक्त। क्योंकि भगवान स्वयं अपने भक्त का सम्मान करते हैं। देखो अर्जुन जी ऊंचे में बैठे हैं और भगवान नीचे बैठे हैं। जहां अर्जुन जी के पैर हैं वहां भगवान का आसन है। सारथी का आसन कहां होता है? रथी के जूतों के पास। क्योंकि वो जैसे बैठा है ना तो उसके पैर के पादुका जहां होती है व सारथी को बैठने और है कौन?

धम सदा परिभष्ट दोहम तीस्पदम शिव चतम शरण्यम प्रणत पाल भवापोतम वंदे महापुरुष ते चरणारविंदम इतने बड़े महापुरुष भगवान श्री कृष्ण जिसकी शिव ब्रह्माद चरण वंदना करते हैं वो अपने भक्त के चरण के पास बैठे भक्त को ऊंचा बैठा ले इससे बड़ा सम्मान का क्या हो सकता है कि स्वयं भगवान नीचे नीचे बैठे हैं। अर्जुन जी ऊपर बैठे हैं। देखो अगर हमको वास्तविक सही में बड़ा बनना है तो हमें भजन करना पड़ेगा। हमें भगवान की लीला कथाएं सुनकर भगवान में प्रीति करनी पड़ेगी। और जब भगवान मिल जाए तो फिर बकाया क्या रह गया?

सब जितना माया है यह सब भगवान की है। तो इसलिए भगवान का भजन करो और इस इच्छा को भगवान के चरणों में समर्पित कर दो।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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