॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1278 · 27 मई 2026

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की जय समस्त संत हरि भक्तन की जय श्री वृंदावन धाम की जय सदगुरुदेव भगवान की जय प्रमोद दिल्ली से राधे राधेधे राधे-राधे गुरुदेव आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम गुरुदेव क्या हम बाथरूम में फोन लेकर जा सकते हैं उस फोन में आपके श्री वचनों को सुन सकते हैं बाथरूम में चला के रख सकते हो हां चला के रख सकते हो या आप अपना शौच स्नान आदि कर रहे हैं और सत्संग सुन रहे हैं उसको कहीं ऊंची जगह में रख दिया और पवित्र होकर फिर छुआ क्योंकि फोन ऐसी चीज है कि उसको हर जगह प्रयोग किया जाता है।

अगर वह सोच की स्थिति में आपने उसको स्पर्श किया तो फोन अपवित्र हो जाएगा। मतलब थोड़ा पवित्रता का ध्यान रखे तो उससे बहुत बुद्धि शुद्ध होती है। अब आजकल पवित्रता का ज्ञान नहीं रह गया लोगों को। अरे वो तो उसमें शौचालय में शौच में ही बोल रहे वो स्टैंड पर रखा रहता है। हां ऐसे ऐसे ठीक है। आप जब गए पहले उसे चला के रख दिया जो सुनना है और आराम से शौच स्नान हुए और पवित्र होकर फोन लिया बाहर आ गए कोई बात नहीं ऐसा किया महाराज जी मेरे व्यापार में जो कि रजिस्टर का प्रयोग होता है उसमें प्रतिदिन का लेखाजोखा कार्य लिखते हैं।

उसके ऊपर हम सर्वप्रथम भगवान का नाम लिखते हैं। क्या यह सही है? अब उस नाम को अगर बाद में अमनिया करके यमुना जी पहुंचावे गंगा जी पहुंचावे या पवित्र भाई जैसे वो काफी समय तक तो रखी रहती हैं दो साल चार साल पांच साल उसके बाद फिर अभी तो वैसे रखी हूं तो उनका मतलब आग लगा सकते हैं या फाड़ के हां ऐसा कर सकते हैं भगवान का स्वरूप है कि नहीं आप ऐसा क्योंकि हमारी प्रार्थना है कि आप लोग सावधान सब रहें भगवान के रूपों का भगवान के नाम का अपमान ना हो जैसे लोग नाम छपवा देते हैं ऐसे ऐसे गली कूचे में पड़े रहते हैं कार्ड ऐसे भगवान का नाम लिख दिया झोला में थैली में और वह सब ऐसे मान लो रद्दी कागज में आपने वही खाते बेच दिए तो फिर वो फिर अपमानित होगा ना इसीलिए ग्रंथ का आप सम्मान करो भगवान के रूप का सम्मान करो चित्र का सम्मान करो नाम का सम्मान करो तो भगवान देख रहे हैं ना उसी से मंगल होता है मंगल भवन की कृपा भगवान देखो हमारे यहां यही बहुत असावधानियां हो रही हैं कि अपने नाम रोशन के लिए भगवान की छवियां पोस्टर में लगाकर और अपनी दुकान चलाने के लिए भगवान के नामों का प्रयोग कर।

यहां तक कि जैसे छोटी-मोटी वस्तुएं खाने पीने की हैं। उनमें भी नाम भगवान जैसे कई तरह के ऐसे भगवान नामों का प्रयोग है। संभाल करके हमारे धर्म का विषय है। हम अपने धर्म को पहचाने। हम अपने धर्म को बहुत सस्ता ना समझे। अपने धर्म का अपमान स्वयं ना यह धर्म का अपमान है। हमारे मान लो पोस्टर में लगा दिया भगवान की छवि इसके बाद जब पोस्टर उखाड़ के फेंका तो गिर जाता है ना अब कोई उसे भगवान के रूप में थोड़ी देखता है तो हम ऐसे नहीं बहुत सावधानी रखें भगवन नाम भगवत रूप इनको संभालकर पूजनीय भाव से हम रखें जी हर्ष जी अहमदाबाद से राधे-राधे गुरु जी गुरु जी कभी-कभी हमारा मन नाम जप में नहीं लगता है तो हम खुद स्वयं से जोर-जोर से नाम जप करने लगते हैं फिर मन भी शांत हो जाता है।

महाराज जी हमारा प्रश्न है कि हम तो आत्म स्वरूप हैं और मन से भजन करवा नहीं रहे तो ये अंतःकरण चतुष्टय में से कौन नाम जप कर रहा है? हम देखो आपका जो स्वरूप है उसका अभी ज्ञान नहीं केवल सुना है। अंतःकरण का आपको अभी ज्ञान नहीं केवल सुना है। क्योंकि अंतःकरण में जब अंतर्मुख होकर के आप समस्त इंद्रियों से अनुभव करोगे तो जानोगे ये बुद्धि है, यह मन है, यह चित्त है, अहंकार है। इनका एक-एक का परिचय प्राप्त होता है। जब तक अंतःकरण विषयाकार है तब तक आत्म स्वरूप निर्विकार होते हुए भी जन्मोगे मरोगे दुखों शोक चिंता भय ये सब व्याप्त रहेगा आत्म स्वरूप तो पहले भी था अब भी आगे भी रहेगा अंतःकरण को सुधारना है हमको बुद्धि का निश्चय एकमात्र परमात्मा में सुख मन का निरंतर मनन करना एकमात्र परमात्मा में चित्त का निरंतर चिंतन करना एकमात्र परमात्मा का अहम का परमात्मा में पूर्ण समर्पित हो जाना।

तो जैसे हमने बताया निर्मल जल और एकाग्र जल शांत जल तो नीचे क्या दिखाई देने लगता है? ऐसे निर्मल और शांत अंतःकरण में भगवत साक्षात्कार होता है। अपनी आत्मा का आत्म बोध होता है। समझ पा रहे हो? अभी खूब नाम जप करो। जबरदस्ती करवाओ। मन से पहले तो जिभ्या करना चाहिए। ये वाक इंद्री है। इसको शुद्ध करना चाहिए। पवित्र शब्द बोलो। नाम जप करो। कभी किसी को कटु वचन परख वचन ना बोलो। एक-एक इंद्री को पावन करना है। नेत्रों से देखें। सम्य श्री भगवान को देखें। कान से सुने।

भगवान की चर्चा मंगलमय गुण सुने। किसी की निंदा किसी का पापाचरण नाम सुने। धीरे-धीरे हमारी इंद्रियां पावन होगी। अंतःकरण पावन होगा। तो हमें अपने स्वरूप का अपने आप से अनुभव हो जाएगा। बस वही मुक्त हो गया। जैसे भगवान हृदय में बैठे हैं। लेकिन सब दीन दुखी परास्त है माया के द्वारा। क्योंकि भजन नहीं है। अगर खूब भजन किया जाए तो अभी भगवान यहां हृदय में ही प्रकाशित हो जाए। तो जैसे सूर्य है इस समय भी सूर्य है और रात में भी सूर्य रहते हैं। जैसे हमारे यहां रात है तो कहीं दिन होती है।

तो मृत्यु में मृत्यु लोक में सूर्य तो है ही ना। ऐसा मृत्यु लोक के अंतर्गत है देश विदेश। तो कभी हमारे यहां रात होती तो कहीं सूर्य उदय होता है। कहीं सूर्य होता है। मतलब सूर्य कभी अस्त नहीं होता। पक्का है ना? सूर्य कभी अस्त नहीं होता। वह प्रकाशित होता ही रहता है। हमारे सामने अंधकार है। ऐसे ही हमारे सामने दुख, चिंता, शोक, भय, माया का अंधकार है। भगवान सर्वत्र व्याप्त है। भगवान सर्वत्र व्याप्त है। अब हमको भजन के द्वारा उसको जागृत करना होगा। जो परमात्म तत्व सोया हुआ है उसे जागृत कर जे भी जगा तो आनंद का अनुभव हो जाएगा।

आप और परमात्म तत्व दो नहीं रह जाएंगे। पर भजन रात आज का सत्संग सुना स्मृति हर समय अखंड स्मृति सबसे बड़ी साधना का स्वरूप है भगवत स्मृति एक तैल धरावत स्मरण सेवा करते हुए अपने कर्तव्य कर्म करते हुए भगवत स्मृति उसी से अनुभव हो जाएगा तो ये जो बंधन हुआ है यह मन को हुआ है कभी आत्म तत्व ना बंधा था ना बंधा है ना बंधा रहेगा इसी मन को सुधार लिया तो परमात्म स्वरूप रूप थे हैं रहेंगे और मन ना सुधार पाए तो जन्म मरण नाना प्रकार के दुख क्लेश चिंता और अन्य योनियों में भटकना ये सब भोगना पड़ता है।

समझ गए ऋषिकेश दास जी गुजरात से श्री हरिवंश राधे-राधे महाराज जी दंडवत प्रणाम महाराज जी किसी भी शास्त्र को पढ़ने समझने जीवन में उतारकर उस शास्त्र का साक्षात्कार करने के लिए आवश्यक बातें कौन सी हैं? पहला ब्रह्मचर्य दूसरा गुरुजनों का दृढ़ आश्रय तीसरा भगवत स्मृति परायण चौथा अभिमान नाना दन्यता पांचवा पूर्ण समर्पित होकर भगवत शास्त्र का स्वाध्याय करना मेरे में मति नहीं है आप स्वयं प्रकाशित होकर हमें समझाइए अगर ब्रह्मचर्य ठीक नहीं है शास्त्रों का अर्थ तभी तो उल्टा सीधा बोलते रहते हैं लोग प्रवचनों में उल्टा सीधा बोलते रहते हैं क्योंकि ब्रह्मचर्य ठीक नहीं है गुरुजनों का आश्रय दृढ़ नहीं है स्वयं गुरु बन बैठे गुरुजनों का आश्रय दृढ़ नहीं है अहंकार है

विद्या का अगर अहंकार है तो फिर शास्त्र का अर्थ उल्टा ही समझ में आएगा विद्या रूप महत्व कुल धन जोबन अभिमान टट कंटक देखे जहां रहे ना भक्त निदान रहा ना भक्त निदान स्वांग सब नगर नार के विषय हाथ बिकाए न रिझवन भतार के भगवत रसिक जी कहते हैं यदि विद्या का रूप का कुल का धन का यवन का अपना महत्व अभिमान है तो उसके अंदर ये छह बड़े-बड़े कांटे भक्ति महारानी प्रवेश नहीं करती और जब तक दैन्यता नहीं आएगी तब तक शास्त्रों का भाव समझ में नहीं आएगा शास्त्रों के लिए ब्रह्मचर्य अहंकार का त्याग करके दैन्यता और इसके लिए गुरुजनों का दृढ़ आश्रय कोई भी शास्त्र हम तभी समझ सकते हैं जब हम विज्ञ महापुरुषों से सुने प्रथम सुने भागवत भक्त मुख भगवत वाणी जो भगवत स्वरूप महात्मा जन है जिन्होंने शास्त्रों के एक एक शब्द का स्वाद लिया है और साक्षात्कार किया है वो जब बोलेंगे उनके मुख से सुनेंगे तब शास्त्र का रहस्य हमारे हृदय में प्रकाशित होता है।

तो अहंकार रहित होकर दैन्य भाव से गुरुजनों का आश्रय लेकर के शास्त्र को उस समय साक्षात भगवान का स्वरूप मानकर स्वाध्याय किया जाए तो शास्त्र ही तुम्हारी बुद्धि में बैठकर के अपना अनुभव करा लेगा। जब तक ब्रह्मचर्य नहीं, गुरुजनों का आश्रय नहीं, अहंकार का त्याग नहीं, दैन्यता नहीं और शास्त्रों में भगवत भाव नहीं तब तक नहीं। शास्त्रों में भगवत भाव देखना हो तो गुरु वाणी का कैसे सम्मान करते हैं सिख भाईजन यह देखिए आप अगर शास्त्रों का सम्मान देखना है तो वहां देखिए कैसे गुरु वाणी का सम्मान चवर डुलाते हुए हाथ जोड़कर ऐसे गुरु वाणी जी का पाठ करते हैं हाथ जोड़कर खड़े होकर और जब गुरु वाणी जी चलती है तो आप देखो कितना समुदाय उत्सव आनंद मनाते हुए हम अपने ग्रंथों को अपनी सदवाणियों को कैसे विचार करके देखिए कि मतलब कैसा आदर का ऐसे पढ़ा ऐसे रख दिया वस्त्र के द्वारा आवेष्टित भी नहीं है और किसी वस्त्र का आसन भी नहीं दिया तो भला शास्त्र उसके हृदय में स्पुरित होगा शास्त्र का भाव स्पुरित होगा तो शास्त्र तभी समझ में आते हैं श्री सुखदेव जी एक बार केवल भगवान व्यास देव जी ने पढ़ा सब याद हो गया क्योंकि बाल्यावस्था से बैरागी ब्रह्मचारी और भगवत स्वरूप में स्थित तो शास्त्र सब भगवत स्वरूप है।

आजकल जो त्रुटियां हो जाती हैं उसके यही कारण है। ब्रह्मचर्य की हानि, गुरुजनों के प्रति दृढ़ आश्रय नहीं, अहंकार का त्याग नहीं, दन्यता नहीं, शास्त्रों को भगवत स्वरूप ना मानना। इन कारणों से शास्त्रों का रा शास्त्र बहुत गुप्त है। शास्त्र जैसे कहता है कि आप उत्तर की ओर चलो। अब इसके बाद जो मुड़ना है वो नहीं बोलेगा। वो गुरु बोलेगा कि उत्तर की तरफ से पश्चिम की तरफ मुड़ना। फिर सामने जाकर पूर्व की तरफ चलना है। अब वो सीधा उत्तर की तरफ चलेगा नहीं पाएगा। शास्त्र का राशि जैसे पहले राजा लोग अपनी संपत्ति को छुपाने के लिए भूल भुलैया का मार्ग रखते थे और इसके बाद वो संपत्ति का स्थान रखते थे।

तो उस मार्ग को वही पार कर सकता है जो उसका ज्ञाता है। अन्यथा वो घूमता रहेगा। वह संपत्ति तक नहीं पहुंच पाएगा। तो जो रसमय ग्रंथ है जो भगवत स्वरूप ग्रंथ हैं इसके आचार्य और गुरुदेव ही ज्ञाता हैं। अगर उनके चरणों में उनकी आराधना करके तो आप संपत्ति तक पहुंच पाएंगे। शब्द ब्रह्म का अनुभव कर पाएंगे। नहीं तो आप केवल ऐसे बोलते रहिए ना आपको समझ में आएगा और ना दूसरों की समझ में आएगा। वो बैठे हैं बस सुन के चल दिए। आप सुना दिए और अंतर ना आप में पड़ा ना सामने वाले में पड़ा।

क्योंकि आपने अनुभव ही नहीं किया। अनुभव गम में भजे ज संता जब अनुभव करके बोला जाता है तो फिर ऐसे मौन रहे बोले ना जब बोले तो हृदय की ग्रंथ खोले तब माना गया कि शास्त्र का स्वाध्याय हुआ है वो तभी होगा जब हमारा निरंतर भगवत चिंतन दैन्य भाव से गुरु चरण आश्रय बहुत आवश्यक है और आजकल सबसे ज्यादा घाटा इसी बात का हो रहा है कि गुरु चरणों का आश्रय नहीं रखा जाता अहंकार इतना प्रबल हो जाता है कि हम स्वयं बहुत जल्दी अपना प्रचार प्रसार करते हुए सिद्ध बनना चाहते हैं।

इससे बहुत बड़ी हानि हो जाती है। गुरु चरणों की दासता के बिना ना पाई ना पाई है बिन स्वामी अकेल। यहां तक लिख दिया विपिन बसत वैराग्य जित जो लरकाई खेल अगर वृंदावन वास कर रहा है बड़े तपस्वी है। बड़ा वैरागी है लेकिन स्वामी जी महाराज के चरणों का आश्रय नहीं लिए। आचार्य गुरुजनों का आश्रय नहीं ले तो ना पाई ना पाई है। ना पाया है और ना आगे पाएगा। बिन स्वामी या इसीलिए गुरु चरण आप उपनिषदों को देखो पढ़ के 121 वर्ष केवल सेवा करवाई और इसके बाद एक शब्द बोल दिया तुम प्राण नहीं हो तुम मन नहीं हो छंद उपनिषद में देखो तब वो चिंतन किया तो ये 12 वर्ष सेवा क्यों करवाई अधीनता गुरु की अधीनता आई कि वस्तु का प्रकाश हो गया तो शास्त्र तभी समझ में आते हैं जब गुरु प्रसन्न हो गुरु की अधीनता हो यहां तक वर्णन आया कि पढ़ाया भी नहीं चारों वेद स्मृत हो गए आपने पढ़ा होगा महाभारत में आप पढ़कर देखिए ऐसे महापुरुषों के

चरित्र आते हैं कि पढ़ाया भी नहीं गुरु ने और सामवेद आदि जितने वेद है ऋग्वेद यजुर्वेद अथर्ववेद सामवेद ये चारों वेद उसके हृदय में प्रकट अरे गुरु महिमा बड़ी अमोग है गुरु चरण आश्रित होकर के सब बात बन जाती है अहंकार का भी नाश हो जाता है संयम नियम भी बन जाता है और आज का जो समय चला है ब्रह्मचर्य का लिए बहुत हानिकारक है इस समय ब्रह्मचर्य की सबसे ज्यादा हानि हो रही है और बिना इंद्रिय संयम के फिर नरसी मेहता जी कहते हैं काछ वाछ मन निश्चल राखे धन धन जननी तेरी

रे लंगोटी का पक्का जबान का पक्का और मन का पक्का तभी वो माया पर विजय प्राप्त करता है कांच वाच मन निश्चल राखे धन धन जननी तेरी रे बड़ नरसैया दर्शन पावा बोले ऐसे बड़े भाग्य जो ऐसे के दर्शन हो लंगोटी का पक्का जवान का पक्का और मन का पक्का ये तीन बात है ये तीन बात का सन्यासी है जो वाणी से मौन का आश्रय लिए शरीर से निष्क्रियता को प्राप्त हो रहा है और मन से संकल्प रहित वही परम सन्यासी है तो इसलिए हमें गुरुजनों का आश्रय लेकर शास्त्र का अर्थ समझना चाहिए वो शास्त्र स्वयं अनुभव में आ जाएंगे साक्षात्कार हो जाएगा जब हम ऐसे चलेंगे आप समझ पा रहे हैं जी डॉक्टर सत्य सारसत जी आगरा से राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि नमन गुरुदेव मैं 1997 से 2013 तक ध्यान योग मार्ग का अनुसरण किया।

2013 से 23 तक ज्ञान योग के मार्ग पर चला और वहां के मूल स्रोत तक पहुंचने की चेष्टा होती गई किंतु सफलता नहीं मिली। पिछले एक वर्ष से आपके बताए नाम जप का अनुसरण करने पर लाभ हुआ। मेरा प्रश्न है कि हम अविनाशी परमात्मा के अंश हैं जो कि स्वयं प्रभु श्री कृष्ण जी हैं और प्रभु की अल्हादनी शक्ति श्री जी हैं। तो हमें कभी-कभी आनंद का भाव नाम जप में मिलता है। क्या वो श्री जी का कृपा प्रसाद होता है? आप देखो सब जीव परमात्म स्वरूप है लेकिन कैसे तरंग के जैसे समुद्र जैसे नहीं समुद्र में करोड़ों असंख्यों तरंग हैं समुद्र करोड़ों असंख्यों तरंग प्रकट करता है पर एक तरंग समुद्र प्रकट नहीं कर सकती ऐसे हैं हम भगवत स्वरूप हैं तो भगवत स्वरूप ही भगवान के अंश हैं तो हम भी भगवत स्वरूप है लेकिन हम ऐसे भगवत स्वरूप हैं तरंग जैसे समुद्र है हमारे प्रभु और उनकी तरंग हैं हम।

अगर हमारे में वायु विकार नष्ट तरंग में वायु विकार नष्ट हो जाए तो समुद्र हो गया ना। अगर माया विकार नष्ट हो गया तो हम भगवत स्वरूप हो गए। लेकिन समुद्र से करोड़ों असंख्यों तरंग निकलेगी। लेकिन तरंग एक समुद्र को प्रकट नहीं कर सकती। इतना अंतर हमारे और परमात्मा में भगवत स्वरूप होने पर भी है। तो यह जो हमें प्रभु का नाम जपने पर प्रभु की शरणागति, प्रभु के लीला गुण गायन, प्रभु की सेवा से आनंद मिलता है। यह सच्चा आनंद है। यह विशेष कृपा है और आप खुद अनुभव कर रहे हैं कि आप अन्य मार्गों का अवलंबन करके जो अनुभव नहीं कर पाए वो आपको कुछ समय में ही नाम जप से आनंद का अनुभव।

और यह हम गारंटी लेते हैं कि आनंद के अनुभव की बात जाने दो। सीधे आनंद समुद्र में डूब जाओगे। यदि निरंतर नाम जब चलने लगा अभ्याव्रत भजनात एक विश्वास खाली ना जाए तो जो ज्ञान प्रयास करने पर आप नहीं समझ पाए वो ज्ञान आपके अंदर जागृत हो जाएगा जो ध्यान प्रयास करने पर भी नहीं सफलता प्राप्त हुई कुंडलिनी जागृत हो जाएगी वही ध्यान में आप निरंतर रमण करेंगे नाम में बड़ी अमोक्ष सामर्थ्य है ये हम केवल प्रवचन नहीं कर रहे ये हमारा जीवन हम आपको बता रहे हैं ये जो हम नाम की बात बार-बार करते हैं ना ये खूब दौड़ भाग करके सब मार्गों का अवलंबन करके तब हम बोल रहे में बैठकर कि भैया अगर समझ में आवे तो पकड़ लो हरि भज हरि भज छाण ना मान नर्तन को मति मछे मति मछे तिल तिल धल को बस जीवन का सबसे बड़ा कार्य हरि भज हरि भज अगर हरि भजन नहीं किया तो फिर अन्य सब साधन विश्वास योग्य नहीं आप खुद देख लीजिए हम बार-बार उदाहरण देते हैं अंतिम समय पुत्र को नारायण कह के पुकारा तो भगवत प्राप्ति हो गई और आप नारायण नारायण को नारायण करके हरि को हरि कह के राधा को राधा जान करके पुकारोगे आपको भगवत प्राप्ति नहीं हो जाएगी।

पूतना ने दूध में जहर मिलाकर पिलाया मारने के लिए तो उसे भगवत प्राप्ति हो गई। आप दूध में चीनी मिलाकर प्यार से पिलाओगे ठाकुर जी को ठाकुर जी आपको भगवत प्राप्ति नहीं करा देंगे। सेवा सुमिरन स्वाध्याय लीला गुण गायन निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाती है। आप लगो इसी में खूब ध्यान से लगो। श्री जी की हेतु की कृपा है जो उन्होंने घसीट लिया। नहीं तो जीवन का जीवन पूरा व्यर्थ हो जाते हैं। जीवन का जीवन वृताशी यज्ञ छंद तीर्थान यमा यमा यथा वरुंध सत्संगा सर्व संगोपमा भगवान कह रहे हैं बड़े-बड़े व्रत से नियम से संयम से तीर्थ याटन से शास्त्र स्वाध्याय से आदि आदि से मैं वश में नहीं होता जैसा सत्संग से वश में हो जाता हूं।

क्या हुआ? सत्संग सुना भगवन नाम में प्रीति हुई। देखो आनंद की अनुभूति और इससे भगवत प्राप्ति है। अभी आप राधा बोले अभी शरीर छूट जाए अभी आप भगवत प्राप्त हो जाएंगे। अभी आप श्यामा प्यारी कुछ बोले भगवन नाम बोले जो नाम आपको प्रिय हो आप देखो भगवत प्राप्ति हो जाएगी। पक्का विश्वास करो इस पर दृढ़ विश्वास करो और शास्त्री पद्धति भी है कृतयुगे धते विष्णु त्रेताया यत मखई द्वापरे परिचयाम कल तध कीर्तनात कलयुग में परम सिद्धि भगन नाम जप से भगवत कीर्तन से होती है बस इसमें एक थोड़ा सा अभ्यास कर ले अपने को दैन्य भाव में तणादप सुनीचे तर से सुनना अमानना मान देन कीर्तन या सदा जो दूसरों को मान देता स्वयं अमानी रहता है अपने को नीच समझता ता है और वृक्ष के समान सहनशील होता है।

ऐसा नाम जापक बहुत जल्दी भगवत प्राप्ति कर लेता है। और नाम जप कर रहे हैं। संतों की निंदा कर रहे हैं। वैष्णवों का अपराध कर रहे हैं। अहंकार कर रहे हैं। इधरउधर के प्रपंच फिर वो चलनी में गया धोए और दोष द को दे। हरि गुरु कहो माल अप। अब मान लो चलनी में गाय धोए कह दे हमें दूध पीने को नहीं मिलता। तो भैया पात्र आपका सही होना चाहिए तो उसमें दूध आ जाएगा। बोले हम नाम जप कर रहे हैं लेकिन आनंद नहीं मिल रहा तो कहीं ना कहीं छेद है भैया। उस छेद को बंद कर लो तो आनंद अभी उत्पन्न हो जाए।

जो पांच ज्ञानेंद्रियां मन सहित भोगों में जा रहे हैं उनको देखो कोई गंदा आचरण हो रहा है। कोई गंदा आचरण है उसको बंद कर दो आनंद आ जाएगा। बस नाम जप से ये सर्वोपरि बात हम आपको कह रहे हैं। हृदय से कह रहे हैं। नाम से बढ़कर कुछ नहीं है। जिसने नाम में लगन लगा दी वो सिद्ध हो गए। आप इतना समझो जिनको राम कहना नहीं आता था वो मरा मरा कहे वो सिद्ध हो गए तो तुम राम राम कह के कैसे सिद्ध नहीं हो सकते? तुम श्याम श्याम कह के कैसे सिद्ध ले हो सकते पर इस पर विश्वास नहीं होता खास बात है कि आप कठिन साधनों की तरफ तो आपको मन लगेगा लेकिन सहज सरल परमानंद प्रदान करने वाले नाम का निरंतर चिंतन करें ऐसा कोई भाग्यशाली होगा जिसको विश्वास हो जाए और विश्वास हो गया तो भगवत प्राप्ति हो गई खुली बात है नाम जप से भगवत प्राप्ति निश्चित अगर 100 बार नाम जप किया है और आपको भगवत प्राप्ति नहीं हुई किनहीं कारणों से तो अगली बार जो होगा वो 99 से नहीं शुरू होगा वो 100 के ऊपर शुरू होगा।

इतना महामहिम नाम है। एक तो नाम जप करने वाले को दुर्गति ही नहीं। नाम में भक्ता प्रणसति भगवान कहते हैं। पर अगर कोई ऐसी चूक भी हो जाए तो जहां से भजन रुका है वहीं से भजन उसका चलेगा। भजन कभी नाश नहीं होता। आप 10 वर्ष नाम जप किए हो। आपके भागवतिक बैंक में जमा हो वो आपको परम मंगल परम पद प्रदान करेंगे। हानि नहीं हो सकती। आपका कभी किसी भी तरह से अमंगल नहीं हो सकता। नाम जापक सदैव परमानंद को प्राप्त करता है। जितने बड़े-बड़े सिद्ध महापुरुष हुए हैं वो गुरु प्रदत्त मंत्र और नाम से ही हुए हैं।

जी महाराज जी आपकी कृपा से वाणियों का भी अध्ययन करता हूं। कभी-कभी वाणी पाठ विशेषक श्री चौरासी जी में अर्थ समझ ना आने पर भी आनंद का अनुभव होता है। हां हमें लगता है अर्थ समझने की अभी कोशिश ना की जाए। जैसे जो हमारे वृंदावन नित्य विहार के जो वाणी है जो सद ग्रंथ है इनको जब तक देह भाव है स्त्री पुरुष भाव है तब तक हमें लगता है गायन करना चाहिए अर्थ नहीं पढ़ना चाहिए अर्थ का चिंतन नहीं करना चाहिए क्योंकि यह चिदानंद का प्रेममय विलास है चिदानंद में पंच भौतिक शरीर नहीं होते जैसे आपके हमारे पांच भौतिक शरीर है स्त्री पुरुष चिन्ह है चिदानंद में नहीं होते।

अब चिदानंद को विलास को अगर हम पांच भौतिक देहधारी स्त्री पुरुष मान के देखें तो बहुत बड़ा दोष हो जाएगा। इसलिए वाणियों का गायन कर मात्र से वो स्थिति प्राप्त हो जाएगी। जैसे केमाल जी हैं, चतुरासी जी हैं। ये बड़े-बड़े महान आचार्यों ने जो एक वाणी जी रची एक-एक शब्द महान प्रिया प्रीतम की प्राप्ति कराने में समर्थ है। पर अर्थ ना पढ़ना चाहिए। जब तक हमारी भावना रसिक महापुरुषों की प्रसादी भावना से युक्त नहीं होगी मान लो उन्होंने जो स्वाद लिया प्रिया प्रीतम बिहारी बिहारी का और वो जो हमें भावना दे रहे हैं और हम फिर उसी दासी भाव सहचरी भाव से तब फिर हमें अगर हम ऐसे पढ़ेंगे तो फिर भाव में कमी आ जाएगी।

इसलिए पाठ करो। सिद्धांत के अर्थ पढ़ो। जो सिद्धांत है ना उसके अर्थ पढ़ो। कुछ लीलाएं ऐसी सहज सरल है जिनके अर्थ पढ़ने में कोई हानि नहीं। जो प्रिया प्रीतम के नित्य विहार की है उनके अर्थ मिल भी जाए तो नहीं पढ़ना चाहिए। क्योंकि प्रिया प्रीतम के दिव्य विलास को समझने के लिए हमारे पहले वनिता पुरुष भाव मिट जाए। सेव ललितादिक के भाए। पहले हमारा स्त्री पुरुष भाव मिटे और हमारी जो आचार्य स्वरूपा ललिता आदि सहचर्या इनके अनुगत हो फिर उनके प्रदत्त जो मंत्र आदि है उनके द्वारा जब हमारे भाव देह का निर्माण होता है जो स्थूल सूक्ष्म कारण तीनों से परे है वो आत्म स्वरूप भाव देह है ललिता स्वरूप सहचरी स्वरूप अपना जो भाव है उससे जब वो भाव जब आता है फिर अपनी प्यारी जो प्यारी जो की बात आती है तो आनंद की उमगन एकदम अभी क्या है लौकिक िक बुद्धि हमारी है नष्ट हुई नहीं पुरुष स्त्री भाव है तो मुझे

लगता है नित्य विहार रस के जो पद है उनका गायन करें उससे बड़ा मंगल होगा अर्थ में कहीं उसकी बुद्धि पार्थिव ना हो जाए पार्थिव बुद्धि ना हो जाए क्योंकि सच्चिदानंद में ये विलास है नहीं और पार्थिव विलास बुद्धि सच्चिदानंद में भी पार्थिव देखेगी तो उसमें दोष हो सकता है क्योंकि नित्य विहार रस तो बहुत ही ये सिंघिनी का दूध नित्य विहार रस के लिए भगवत रसिक जी ने लिखा है सिंघिनी का दूध है या तो बच्चा के पेट में या कुंदन में कहे बच्चा के पेट और घट करे विलासल या तो बच्चा आचार्य शरणागत होकर उनके अनुगत होकर और दूसरा ऐसा कोई है नहीं कि साधन बल से वो इन महापुरुषों के भाव को प्राप्त हो बिना महापुरुषों के शरणागत हुए उनके कृपा प्रसादी उनके चरण रज के बिना ये भाव तो दुर्लभ इसीलिए अंगुलियों में गिने जा सकते हैं रसिक रसिकों की भीड़ थोड़ी होती है।

रसिकों की भीड़ नहीं होती। तो आप देखो अंगुलियों में गिले जा सकते हैं। तो इसलिए बहुत कृपा है जो आप वाणियों में लग रहे हैं। पर अर्थ की तरफ से उतना अर्थ जहां विलासिता को समझ में ना आए तो छोड़ दो। पदों का गायन करो। आगे खुद श्री जी समझा देंगे। राधा नाम और राधा वल्लभ श्री हरिवंश नाम दोनों को नाम जप की दिलचर्या में एक साथ लगा सकते हैं। हां बिल्कुल कर सकते हो। बिल्कुल कर जैसे राधा वल्लभ श्री हरिवंश नाम जप कर रहे हैं। आपका मन भाग रहा है तो फंसा दिया राधा राधा राधा राधा राधा फिर भी भाग रहा है तो कोई पद उठा लिया चतुरासी जी का कोई पद गायन कर रहे हैं फिर लौटा के लाए राधा वल्लभ श्री कुछ इसको नवम नवम चाट पड़ी है मन को चतुर उपासक जो इसको फंसाना जानता है इसको जैसे एक में लगाओ राधा राधा राधा ये तो थोड़ी देर में उब जाएगा अब राधा राधा राधा में उब रहा है तो अब इसको पद पद में लगा दिया पद से उब रहा है तो मंत्र में लगा दिया मंत्र से उब रहा है तो राधा वल्लभ श्री हरिवंश में लगा दिया।

अच्छा कुछ नहीं यार तो आप कीर्तन कर रहे हैं। हमको फंसाना है। अभ्यास योग युक्त चेतसा ना निगामिना। हमें ऐसा अभ्यास करना है कि हमारा चित्त प्रभु से विलग होने ना पावे। कभी वाणी गायन कर रहे हैं। कभी नाम जप कर रहे हैं। कभी मंत्र जप कर रहे हैं। और कभी-कभी ठसक में भी बैठा करो। मैं प्रभु का हूं। मैं श्री जी का हूं। आश्चर्य अगर अंदर से हो गया तो ठसक आने लगेगी। जैसे हम लोगों में एक ठसक रहती है। हमारे मा श्यामा को राज एक ठसक रहती है, एक गर्व रहता है, एक अभिमान रहता है।

हम अपने आचार्य के, हम गुरुदेव के, हम प्रिया जी के, हम श्यामा जी के एक ठसक रहती है। है ऐसी ठसक हां तो ये आएगी अभी नहीं है क्योंकि अभी पूर्ण शरणागति भाव नहीं ये जैसे मीरा जी की ठसक है मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों ये ठसक आ जाए हमारी लाडली जो हमारे प्यारे जो हमारी प्यारी जो तो एक गर्व होता है आप हमारे ब्रजवासियों में और प्रेमियों में आप ये नजर डाल के देखना सब साधन एक तरफ उनके अंदर एक गर्व मिलेगा आपको श्यामा प्यारी कुंज बिहारी राधा वल्लभ श्री हरि एक ठसक मिलेगी एक अभिमान मिलेगा देगा उनको अपने इष्ट का अपने आचार्य का अपने गुरुदेव का यही अभिमान जो है सब अभिमानों को चूर करके श्री जी के नजदीक ले जाता है हां जैसे गोस्वामी जी कह रहे हैं अस अभिमान जाए जन भोरे मैं सेवक रघुपति पति मोरे ये अभिमान हर समय बना रहे कि मैं दास हूं मेरे स्वामी श्यामा श्याम है गर्व बना रहे जी श्रवण लाल गुर्जर जी राधे राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी एक साल से YouTube के माध्यम से आपकी वाणी सुन रहा हूं आपके कहे कहे अनुसार राम नाम जाप कर रहा हूं।

सुबह शाम हनुमान चालीसा भी पढ़ता हूं। गुरु जी मेरा प्रश्न है कि मैं एक गायक कलाकार हूं। मैं भगवान के भजन भी गाता हूं और आज के जमाने अनुसार लोकगीत और प्यार मोहब्बत के गीत भी गाता हूं। इस लोकगीत में जो भी शब्द लिखता हूं वो मेरी असल जिंदगी में तो नहीं है। लेकिन संगीत के माध्यम से मैं गाता हूं। क्या मुझे भगवत प्राप्ति होगी? देखो भगवत प्राप्ति लोकगीतों से नहीं होगी। भगवत प्राप्ति होती है भगवान के चिंतन से। अंदर ही अंदर आपके जो भगवत चिंतन होता है उससे भगवत प्राप्ति होती है।

ऐसे हम बहुत बढ़िया गा लेते हैं और हमारा अंदर से चिंतन भागवतिक नहीं है और हम पद भी गा रहे हैं जो भागवतिक है लेकिन चार को रिझाने का है तालियां सुनने का है रुपया लेने का है वो व्यापार है ना कि भगवत प्राप्ति की साधना आप हमारी बात को समझ रहे अगर हम कीर्तन कर रहे हैं पद गायन कर रहे हैं और एक पैसा नहीं लिया केवल ये है कि भगवान का नाम भगवान का जस गा रहे अब यह भजन माना जाएगा। अगर तालियों का शौक है, रुपए का शौक है तो फिर भजन तो नहीं हुआ। और भगवत प्राप्ति के लिए अंदर ही अंदर चिंतन करो और यह लोक व्यवहार जीने खाने के लिए यह करो।

कोई परेशानी नहीं। एक साल से मैं एक साल से पहले मैं गलत संगत में था। गलत दोस्तों के साथ था। फिर मैंने बजरंगबली की कसम खाई थी। सबका साथ छोड़ दिया। अकेला हो गया। छ महीने के लिए मैं छ महीने के मैदान से मैं अकेला हुआ था। फिर मैंने आपसे आपके YouTube पे देखने लगाया। फिर से वहीं से मैंने राम नाम जाप चालू कर दिया और सब संगत छोड़ दी। हां अब सब तो सुधर जाएगा। आप चिंता मत और अभी मैं ये ये जैसे भगवान का भजन ही गाऊं या ये छोड़ दूं। नहीं गाना मत छोड़िए। आप गाइए लोकगीत भी गाइए।

क्योंकि जैसे जीने के लिए हम फावड़ा चलाते हैं। जीने के लिए हम कपड़े की दुकान करते हैं। जीने के लिए हम नौकरी करते हैं। ऐसे जीने के लिए जीवन जीने के लिए अर्थ चाहिए। अर्थव्यवस्था के लिए हम कायर होकर थोड़ी बैठेंगे। वो बढ़िया-बढ़िया गाओ। लोक गीत गाओ, भजन गाओ पर वो अर्थ के लिए भगवत प्राप्ति के लिए अंदर ही अंदर जो नाम आप जप रहे हैं ये नाम भगवत प्राप्ति कराएगा। अंदर ही अंदर नाम जप करो क्योंकि उसका हम दाम लेते हैं। उसका हम प्रभाव तालियों का सुख लेते हैं। वाहवाही का सुख लेते हैं।

तो वो भगवत प्राप्ति में असमर्थ है। समर्थ है अंदर जो राम राम जप रहे हो यही भगवत प्राप्ति कराएगा। जब भी मेरे मन विचार में थोड़ा परिवर्तन आया मैं उपहास का कारक बना। अपने मित्रों में अपने परिवार जनों में मेरे अपने बच्चे भी यह मजाक करने लगे कि कहीं अभी अभी आज का एकांतिक पड़ेगा। पीछे वाले बैच में यही चर्चा हुई जो आप प्रश्न कर रहे हो ना कि हे भाई इस संसार में यदि तुम भगवत मार्ग में चलना चाहते हो तो तुम्हारी मजाक होगी। तुम्हारा उपहास होगा। तुम्हारी निंदा होगी।

जैसे आप शुरू अब शुरू किया ना सतमार्ग तो आपको दिखाई देने लगा कि परिवार के रिश्तेदार यहां तक कि आपके बेटे भी उपहास कर रहे हैं। अब आपका सोचो कैसा हृदय लगेगा पर नहीं आपको समझना मेरी भक्ति रंग ला रही है। अगर भक्ति में विरोध शुरू हो जाए तो समझो भक्ति रंग ला रही है। तो आपकी भक्ति रंग ला रही है। आपको मुस्कुराना है। उदास नहीं होना है। हां मगर आप ऐसे फिर गिर जाओगे। फिर तो गिर जाओगे। बहुत बहुत हिम्मती बनो हिम्मती बनो बहुत हिम्मत की जरूरत है इसमें निराश आपकी तो भक्ति रंग ला रही है तो आपको तो अच्छा अनुभव होना चाहिए प्रसन्न होना चाहिए आप नेगेटिव क्यों सोच रहे हैं कि मेरा उपहास हो रहा है अरे भाई नहीं नहीं नहीं ये उपहास हो रहा है आपकी भक्ति रंग ला रही है देखो गलत आचरण करो आप देखो कोई आपको नहीं रोकेगा कोई आपका उपहास नहीं करेगा लेकिन माला कंठी धारण करके के भजन शुरू करो भगवत आराधना करो तो आपके ही लोग आपका उपहास करने बड़ा भगत बनता है

ऐसा है वैसा है क्या क्या नहीं बोलने लगेंगे इसलिए किसी के बोलने से मत रुको भगवान का सत्य मार्ग है सच्चिदानंद मार्ग है बिल्कुल हारने की जरूरत नहीं अगर हमको ऐसीऐसी बातें कही गई तब अंदर से आता है ऐ टूटो नहीं टूटो नहीं एक शराबी का उपदेश हमें जीवन भर याद रहा है वो यही कहता था तिल तिल काटी गई मूर्ति कभी टूटी नहीं तू बाबा जी बना कभी टूटना नहीं हम उस समय बच्चे थे वो जीवन भर रखा मेरी पुत्री है वो यहां से कहीं पढ़ने के लिए उसे कुछ एक ऐसी दीक्षा उसको पकड़ा दीजिए जिससे वो आगे की तरफ देखो हम आपकी पुत्री की नहीं सबकी पुत्र पुत्रियों के लिए प्रार्थना है कि ये जो आज गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड रूपी जहर फैला हुआ है इससे बचा जाए।

पहली बात तो अपने चरित्र को पावन रखा जाए। अगर चरित्र पावन नहीं है तो आपकी उन्नति की लालसाएं बाधा में पड़ जाएंगी। आजकल कोई सही मित्र मिलना बड़े सौभाग्य की बात है। नहीं तो केवल अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए दोस्त बन जाने वाले सैकड़ों तैयार हैं। तो हम अपने फ्रेंड का चयन बहुत सोच समझ करके करें। जो हमारे से सुख भोगने की लालसा रखता है वह फ्रेंड नहीं हो सकता। फ्रेंड वही होता है जो अपने को बलिदान करके सामने वाले को सुखी करना चाहे। जो अपने को मिटा के दूसरे को सजाना चाहे उसे दोस्त कहते हैं।

लेकिन आज के दोस्त दूसरे सामने वाले को मिटा के अपने को सुखी करना चाहते हैं। तो हमारे भाई बहनों से प्रार्थना है पूरे भारत के पूरे विश्व के कि हमारी जो परंपरा रही है ये चरित्र पावन की रही है। चरित्र ना दूषित होने पावे। और दूसरी बात कोई व्यसन हमारे जीवन में ना होने पावे। चाहे वो पुत्र हो चाहे पुत्री। यह बात बिल्कुल समझ लो। हर व्यसन हमारे जीवन को नाश की तरफ ले जाएगा। जो भी जैसे आजकल स्कूलों में बच्चे ड्रग्स लेने लगे, धुआ फूंकने लगे, बीड़ी सिगरेट लेने कोई व्यसन ना करे।

कोई चरित्रहीनता के आचरण ना करे और भगवान का नाम स्मरण करता रहे तो भगवान इस संसार से विजय निश्चित दिला देंगे और जो हमारी कामनाएं हैं उनकी पूर्ति हो जाएगी। जब हमारी बुद्धि शुद्ध रहेगी तो हमारा स्मरण पवित्र रहेगा। स्मरण पवित्र रहेगा तो जो हम पढ़ेंगे हमें याद हो जाएगा। हम कभी फेल ही नहीं होंगे। जब हमारा चरित्रहीनता होती है नाना प्रकार के विषय घुस जाते हैं तो हमारी स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है। कामा संजयते क्रोधा क्रोधा स्मृति विभ्रमा स्मृति भ्रंसा बुद्धि नाशो बुद्धि नाशात प्रणसति तो इसलिए जीवन का केवल इतना ही उद्देश्य नहीं कि हम नौकरी पेशा करके रुपया कमाए भोग भोगे और मर जाएं जीवन का उद्देश्य है भगवान की प्राप्ति करना अध्यात्म पूर्वक जीना तो इसलिए चरित्र पावन रखें कोई व्यसन करें भगवत नाम की आराधना करें और माता-पिता को भगवान समझकर उनकी आज्ञा और उनकी सेवा में रहे अगर इतना स्वीकार कर ले तो सब कुछ बन जाएगा इतने से ही बन जाएगा और आप कभी निराश मत होइएगा।

मस्त रहिएगा। जैसे कोई आपका उपहास करे तो मुस्कुरा दिया और भगवान से प्रार्थना की कि इनको भी ज्ञान दीजिए। इनको भी विवेक दीजिए। हमें उनके प्रति द्वेष भाव नहीं करना है। द्वेष करने वालों के प्रति भी हमें मुस्कुरा के चलना है। यह साबित करना है कि भगवान का भक्त कितना मजबूत होता है। कितना पुष्ट होता है। हमें साबित करना पड़ेगा। हम भगवान के दास हैं तो हमें साबित करना वो हमें मारे तो हम उसका मंगल करेंगे। वो हमें गाली दे हम उसका मंगल करेंगे। करत जे अनसहन निंदक तीनों पे अनुग्रह वो हमारा उपहास कर रहा है।

हमें नीचा दिखाना चाहता है और हम हाथ जोड़कर उससे बात करेंगे। हमारी और सांसारिकता में अंतर है क्योंकि हम साधु मार्ग के हैं। हम भगवत मार्ग के पथिक हैं। तो साधु का मतलब केवल भेष से नहीं स्थिति से है। इसलिए आप प्रसन्न रहिएगा। सुदेश कुमार जी फरीदाबाद से। राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि नमन महाराज जी मैं आध्यात्मिक मार्ग में पिछले 40 वर्ष से लगा हुआ हूं लगभग 50 वर्ष तक गीता का प्रचार किया मैंने 13 14 साल तक बड़ी एकाग्रता से सत्संग किया महाराज जी मेरा प्रश्न यह है कि लगातार प्रयासरत रहने पर भी देहाभिमान चरम सीमा पर है और ऐसा लगता है कि जो अवस्था 40 साल पहले थी वह भी वही आज है।

आपके एकांतिक वार्तालाप में आपने बताया था कि देहाभिमान प्रकट गुरु की कृपा से ही जाता है। अब मैं आपकी शरण में हूं महाराज जी। आपको गुरु रूप में देख रहा हूं महाराज जी मेरा नाम जप जितना जोर का नाम अंदर से सुमिरन चलेगा तो ये झूठा जो शरीर का खेल है संसार का खेल जब तक ये सत्य भाषित होता रहेगा तब तक ज्ञान कैसा तब तक भक्ति कैसी है तो नाम जप में शिथिलता रही है देखो हम आपको बताएं गीता जी कंठस्थ कर लेना और गीता जी का प्रचार करना यह दो बातें अलग हैं और गीता जी को पीना आचरण में उतारना वैसे चलना यह बात अलग है।

देहाध्यास का नाश गीता जी के पीने से होगा। गीता अमृत का पान करोगे तो पान करना बड़ा कठिन है। दूसरे को उपदेश दे देना सरल है। कंठस्थ करके सुना देना सरल है। लेकिन आचरण में उतारना बहुत कठिन है। अगर हम एक श्लोक उतार ले तो भगवत प्राप्ति हो जाए। भगवान कह रहे हैं अनन्य चेता सततम योमा स्मरति नित्यसा तस्या सुलभा पार्थ नित युक्तस योगिना अब इतना समय हो गया 40 वर्ष और आपका खुद का अनुभव कह रहा है कि देहा अभिमान गलित नहीं हुआ तो पूज्यपाद उड़िया बाबा जी ने कहा जिसका देहा अभिमान गलित नहीं हुआ उसे अध्यात्म में अभी वह बात नहीं मिली जिसके मिलने के बाद कुछ मिलना बाकी नहीं रहता क्योंकि देहाभिमान जितना गलित होता है उतना ही भक्ति का रंग प्रकाशित होता है।

देह भाव ही तो जन्म मरण का हेतु है। तो देह ने हमें थोड़ी पकड़ रखा है। हमने देह को पकड़ रखा है। बंध कीर मरकट की नाई जैसे तोता नलिनी को ऐसे पकड़े हैं। अगर छोड़ दे तो उड़ जाए। पर वो सोचता है नलनी का मतलब समझते हैं ना जिससे पंखा घुमाया जाता है। वो पोला अगर रस्सी में डाल दिया गया। उसमें दाना चिपका दिया गया। चिपकाने वाले पदार्थ से तो तोता आके ऐसे बैठा जो बैठा सो घूम गया अब वो पूरा हिलक गया अब सोचता है मुझे पकड़ लिया गया अगर मैं छोड़ दूंगा तो मर जाऊंगा और अगर वो छोड़ दे तो उड़ जाए ऐसे ही हम फंसे कि अगर देह भाव छूट गया तो सुख कहां क्योंकि सुख तो इसी देह से मिलता है और जबकि सुख भगवान के चिंतन से मिलता है ना कि शरीर चिंतन से सुख मिलता है जो हमारी शरीर की स्मृति भूल जाए भगवान की स्मृति में जैसे आप दिन भर कुछ भी खाते पीते क्रिया करते रहो लेकिन आपको जो सुखानुभूति नींद में मिलेगी वो किसी में नहीं मिलेगी अगर नींद ना आवे तो सब कुछ खानपान होते हुए भी आप विक्षिप्त हो जाओगे दो दिन तीन दिन चार दिन नींद ना आवे तो आप देखो कैसा तो नींद का सुख सर्वोपरि वहां हुआ कि नहीं हर्ष तो नींद में सुख क्या है संसार को भूल जाना पांच घंटे छ घंटे संसार को भूल गए तो आप आप एकदम फ्रेश हो गए।

आपकी इंद्रियां बलवान हो गई। आपको चैतन्यता मिली। अगर जागृत अवस्था में एक घंटा के लिए भगवान को भूल जाओ और माया में रत हो जाओ तो कितना क्लेश अशांति है। और अगर एक घंटा के लिए माया को भूल जाओ और भगवान में रथ हो जाओ तो समाधि में स्थित हो गए। भाई यही दो क्षेत्र हैं। हर समय हमारा चिंतन माया घसीटती है। इस चिंतन को मोड़कर भगवान में हम इसे स्थित कर दे तो हम भक्त और माया में स्थित है। तो संसारी बस इतना अंतर है। सब शास्त्रों का सार ये है कि भगवान का सतत स्मरण और माया का विस्मरण।

यही सब शास्त्रों का सार है। पर देख लो स्मरण क्या होता है। व्यक्ति, वस्तु, स्थान, राग, सामग्री, भोग यही हमें भगवान का चिंतन तो करना कठिन है। तो समय व्यतीत करना भगवान की आराधना का फल नहीं है कि जैसे हमारा 50 वर्ष व्यतीत हो गया तो 50 वर्ष में अगर एक भी छेद रहा तो वो जितना हमने समेटा सब बह गया। अनुभव तो हुआ नहीं। तो अगर हम एक-एक बूंद डालें और छेद बंद कर दें तो एक दिन तो भर ही जाएगा ना। तो ऐसे ही कहीं ना कहीं हमसे त्रुटि होती रही। जो त्रुटियां हुई है ईमानदारी से वो आप जानते हो।

ऐसा नहीं है कि आप नहीं जानते हो। जिससे भी जो त्रुटि होती है उसको पता है। वो बहानेबाजी से भले छुपाना चाहे लेकिन जैसे हमसे जो गलती जीवन में हुई क्या हमको पता नहीं कि हमने अमुक जगह त्रुटि की। हमने अमुक जगह गलती की। ऐसे सबको पता है। अगर उन जानी हुई गलतियों को हम रोक दें तो अभी हमारे आनंद का सिंधु उमड़ने लगे। पर हम जानते हैं गलती पर हमें पता है कि इस गलती में सुख है। इसलिए हम नहीं छोड़ पाते। चाहे व्यसन हो, चाहे व्यभचार हो, चाहे कोई गंदी बात हो, चाहे कोई गंदा चिंतन हो।

यह संसार में जो हमारा चिंतन जा रहा है, उसका एक मूल कारण सुख। सुख मिलेगा। बस एक कारण है आप देख लीजिए। अगर यह आंतरिक बातें ठीक कर ली जाए तो पूरी गीता जी को आप पढ़ के देखिए। कहीं भी कुछ मांग नहीं है। कहीं कोई मांग नहीं है। एक मांग भगवान की है केवल। वो ये नहीं कह रहे कि मेरे लिए मंदिर बनवाओ। मेरे लिए आप ऐसा करो। मेरे लिए ऐसा करो। गीता में भगवान कह रहे हैं मन आदत म बुद्धिम निवेश भगवान की मांग है कि मेरे में मन बुद्धि लगा दो मेरे में ही निवास करोगे मन मना भव मद भक्तो मा्याद माम भगवान घुमा घुमा के बहुत जगह वर्णन किया कह रहे हैं कि सर्वधर्मान परित्यज मा के मामेकम शरणम कह रहे हैं देवी सा गुणमई मम माया दरत्या मामेव प्रपद्यते मायाता कहीं भी एक पैसे वाली बात भगवान ने नहीं की है।

भगवान की प्राप्ति में पैसे की जरूरत नहीं है। अध्यात्म की प्राप्ति में पैसे की जरूरत नहीं है। अध्यात्म सुख जिसको प्राप्त है उसे पैसे की जरूरत नहीं है। सांसारिक भोगों की जरूरत नहीं। हम कहीं उल्टा हो गए हैं। हम सुख का हेतु रुपया समझ रहे हैं। सुख का हेतु यश कीर्ति समझ रहे हैं। सुख का हेतु हम कहीं भोग समझ रहे हैं। और बात हम गीता जी की कर रहे हैं। तो गीता जी का जो भाव है वो हमारे अंदर नहीं आ पाएगा। एक श्लोक परम पद प्राप्त करा देगा। गीता जी का एक श्लोक।

एक श्लोक आपको भगवत प्राप्ति करा देगा। गीता जी का कोई एक श्लोक जीवन में आदर्श बना लो कि हमने तो यह श्लोक पकड़ा है। जैसे जब हम बाल्यावस्था से चले तो समस्याएं होती है ना संसार में अब जैसे गंगा किनारे घूम रहे कब भोजन मिला ना मिला संसार का तो बड़ा विचित्र स्वरूप तो ये दो श्लोक हमने जीवन में रखे मात्रा स्पर्शास्तु कौनते शीतोष्ण सुख दुखदा आगमा पनो अनित्यास तास भारत यम हीते पुरुषम पुरुष सुख दुखमा समानु भाव से हमने जीवन में दो श्लोक रखे कि जो किसी भी तरह से किसी भी दुख में व्यथित नहीं होता यथते पुरुषम पुरुष सम दुखा सुखाधरम स्वमत कलमते वो धैर्यवान पुरुष जो सुखदख में

समान भाव रखता है अमृत पद का अधिकारी होता है हे अर्जुन ये दुख सुख आने जाने वाले हैं ये अनुकूलता प्रतिकूलता आने जाने वाली है इनको सह जाओ सह जाने से तुम महान बन जाओगे दोष जहां कष्ट पड़ता जहां विपरीतता आती दो लोग वो आगे बढ़ जहां में कष्ट होता हम गुनगुनाने लगते मात्रा स्पते शीतो सुख दुखदा आगमा पनो अनित भारत इनको सह जा अर्जुन सह जा ये आने जाने वाले हैं ये टिकाऊ नहीं है ये अभी आए हैं अभी चले जाएंगे शांत भगवत स्मरण परायण रहो तो हमें लगता है हमारी जो त्रुटियां है उनको हम जानते हैं जो जानने में आने वाली त्रुटियां है उनको त्याग दें तो गीता भागवत संतों का उपदेश हमारे हृदय में प्रकाशित हो जाए जो अगर त्रुटियां बनी रहे तो जैसे हम छेद वाले पात्र में गाय धोए तो वह दूध सब बाहर ही निकल जाएगा।

अंतर में हमें पुष्टता प्रदान करने वाला नहीं बन पाएगा। इसलिए हम खुद सावधान हो। देखो संत महात्मा शास्त्र उद्धार करने का उपाय बताएंगे। लेकिन चलना आपको होगा। आप ना चलो तो कोई आपका उद्धार नहीं कर सकता। तो अब तक जो गलती हुई उनको देख लो आप और उनको हटा के एक शब्द में आप आ जाओ निरंतर नाम जप क्योंकि अब अवस्था भी वृद्धा निरंतर नाम जप तो आखिरी स्वास जो भी होगी उसमें नाम चल रहा है तो भगवत प्राप्ति पक्की जैसे हमारा अभी बोला राधा हमारे प्राण निकल गए तो हमें भगवत प्राप्ति पक्की यह पक्का समझ लो आखिरी श्वास जब हमारी भी होगी अगर हम निरंतर अभ्यास कर रहे हैं नाम का तो नाम चल रहा होगा तो हमें भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

देहाभिमान रहे और चाहे देहा अभिमान चला जाए। अब हमसे इससे मतलब नहीं। अब हमको एक बात पकड़नी है कि नाम ना छूटे और जहां नाम में स्मृति रही तो देह भाव पहले अब खत्म हो जाएगा। देह का चिंतन होना ही देह भाव को पुष्ट करना है और भगवत चिंतन होना ही देह भाव को नष्ट करना है। तो अब आप चिंतन पर ध्यान दीजिए। निरंतर जो नाम प्रिय हो आपको उस नाम को निरंतर जपिए।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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