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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1279 · 28 मई 2026

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

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महाराज जी निरंतर नाम जप चलाने का प्रयत्न कर रहा हूं। जिसमें थोड़ा सफल भी हो रहा हूं। पर महाराज जी आपके द्वारा बताई गई विधि से जैसा आप बताते हैं कि ऊपर की तरफ दांत के जॉइंट पर जिया लगाकर मन ही मन नाम चलना चल रहा होता है और आंखों के सामने घर के मंदिर में नाम विराजमान है। उसको देखकर देखकर करता हूं। मन में लिखकर भी हो रहा है। परंतु फिर भी ऐसा महसूस होता है कि मन साधनाओं का कम समय में इतना लाभ ले लिए हो तो चुप रहो और धैर्य पूर्वक अभ्यास बढ़ाते रहो। कोई गलती ना हो तो आगे जो चाहत है वो पूरी हो जाएगी कि हमारा निरंतर भजन चलने लगे।

हम आनंद में डूब जाएं। हमारी मंत्राकार वृत्ति वो सब हो जाएगा। अगर 100% में 10% भी मन काबू में आ गया है तो बहुत बड़ा आपने युद्ध हासिल कर लिया, विजय प्राप्त कर ली क्योंकि अनंत जन्मों से सदैव मुझे हराता रहा है। आज वह 10% हमारे कब्जे में आ गया है। 10% भजन में लगने लगा ना बहुत बड़ी बात कर ली। धीरे-धीरे परसेंट बढ़ाते चले जाइए। और यह इतना प्यारा मन है कि इसे जो पकड़ा दो पकड़ लेता है। जैसे अभी हमने विषय पकड़ाए संसार के तो पकड़े ना गंदे से गंदी बातें पकड़े।

अब भजन पकड़ाएंगे तो पकड़ रहा है ना। जैसे आपने 10 मिनट भजन शुरू किया। अब उस 10 मिनट में कोई आपसे आकर बात करना चाहे तो आपको बुरा लगेगा कि यार 10 मिनट तो भजन करता हूं। कम से कम चैन से 10 मिनट भजन मतलब मन 10 मिनट के लिए राजी हो गया। तो हम धीरे-धीरे उसको समय से बढ़ाते राजी करते चले जाए। फावड़ा चलाते हुए व्यापार करते हुए नौकरी करते हुए धीरे-धीरे अंदर ही अंदर नाम जप कर रहे हैं। बाहर से शरीर से कर्म कर रहे हैं। बहुत बढ़िया भजन हो जाएगा। तो यह जो चल रहा है बहुत बढ़िया चल रहा है।

बस आहार शुद्ध रखो, संग शुद्ध रखो तो हमारे विचार शुद्ध रहेंगे। में रहते आहार में जैसे घर में लहसुन प्याज वगैरह खाते हैं तो फिर नहीं लहसुन प्याज और तमोगुण की वृत्ति करने वाला इसमें मंत्राकार वृत्ति तो इसके कारण अगर घर में बोले तो पत्नी है फिर वो कहती है हम भी नहीं खाए क्या तुम्हारे चक्कर में तो वो अमरवती है क्या कोई अमृत है क्या प्याज लहसुन यार बिना इसके कितना सुंदर सुंदर भोग बनता है वृंदावन में सब ठाकुरों को छप्पन भोग लगते हैं प्याज लहसुन केवल तमोगुण के कारण त्याग है।

अच्छा दुर्गंध नहीं आती है। आती है ना दुर्गंध मतलब एक आदमी अगर प्याज लहसुन खा के ऐसे बात करे तो सामने से दुर्गंध आती है। कौन सा स्वाद है यार प्याज लहसुन पता नहीं लोग कैसे प्याज लहसुन को इतना पसंद करते हैं। तमोगुणी चीज है। उसमें कोई लाभ थोड़ी है। कोई लाभ नहीं है। लेकिन गुरुदेव आयुर्वेद में लहसुन का बहुत ही योग है। देखो औषधि में संख्या का भी प्रयोग है। खाओगे मर जाओगे। अगर आयुर्वेद शोध करके वैद्य देता है तो वह हमारे लिए औषधि है। देखो बहुत सी औषधियां दूषित पदार्थों से बनती है लेकिन दूषित पदार्थ नहीं है उसे हम औषधि बोलते हैं।

हम औषधि पा रहे हैं। औषधि के रूप में तो औषधि के रूप में जैसे किसी के गठिया बात है, गठिया रोग है तो लहसुन बड़ा काम करता है। आप उसको कैप्सूल की तरह लेल जाओ। हमने देखा है लेकिन चटनी और सब्जी भोजन में नहीं डाल सकते। औषधि के रूप में वह बात अलग है। जब औषधि का नाम आता है तो औषधियों में क्या नहीं पड़ता हमें? क्या-क्या नहीं पड़ता? अगर उसकी बनाने की पद्धतियां देखो तो तुम्हें घृणा हो जाएगी। बहुत सी ऐसी औषधियां हैं जिनके बना। अब आप कह दो देखो संख्या जहर है ना।

हां दमा आदि बीमारियों में आयुर्वेद में शोध करके उसे दिया जाता है। सांप काटे तो जहर का इंजेक्शन लगाया जाता है। नहीं लगाया जाता। तो अब औषधि और ऐसे प्रयोग में देखो विश्व ब्रह्मांड में तीन बातें हैं। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण। अब हमको भजन करने के लिए सात्विक वृत्ति चाहिए। निर्मल मति चाहिए। तो हमको रजोगुणी या तमोगुणी आहार त्यागना पड़ेगा। बस बात इतनी है रजोगुणी तमोगुणी अच्छा वही जगह आलू होती है वही जगह प्याज होता है वही जगह मतलब गाजर होती है वही जगह लहसुन होता है खेती में अपने लोग किसान की तो सब देखा है ये खेत है आलू का ये खेत है प्याज लहसुन का ऐसे खूब खेती होती है बिल्कुल पवित्र भूमि में होती है लेकिन वो तमोगुणी है बस इस बात से वो केवल इसलिए कि तमोगुण पैदा होता है हमारे भजन में विरोधी इसलिए उसे नहीं पाया तो अब लहसुन प्याज के बिना भी बढ़िया यार जीवन जिया जा सकता है।

पूरी जिंदगी हो गई। तो अब ये कि जवान को जैसा आप स्वाद दे। अच्छा तंबाकू में कौन सा स्वाद है? जो नहीं खाते उनको पद उल्टी हो जाएगी। नहीं हो जाएगी। और वो बड़े स्वाद से आराम से रखे रहते और बातें करते रहते हैं। तो भाई देखो स्वाद अगर पकड़ लिया प्याज लहसुन का तो फिर कैसे बनेगा? बहुत से लोग ऐसे हैं जो भ्रम में फंस कर के अपने जीवन को नष्ट कर रहे हैं। अरे हम कह रहे पनीर खाओ प्रोटीन आए गाय पालो उसकी सेवा करो। थोड़ा दूध बछड़े को पिलाओ। थोड़े दूध का तुम प्रयोग करो।

देखो अपने आप स्वस्थ हो जाओगे। अब सेवा करनी नहीं ऐसे कह दो कि अंडे से प्रोटीन कौन प्रोटीन वाला कितने दिन बलवान बना रहेगा। शरीर तो नाशवान है। अपराध तो बन ही रहा है। जीव तो उसमें है ही है। चैतन्य तो है ही है। अब देखो छोटे-छोटे नहीं निकलते। चूजा उसके तो जीव नहीं उसमें। हां। तो क्या मूली में जीव नहीं है? क्या गाजर में जीव नहीं? क्या आलू में जीव नहीं? उखाड़ के फेंक दो सूख जाएगा। पर जीव आहार जीव बिना जीव नहीं। जो जिसके लिए निर्धारित कर दिया गया। हम मनुष्य हैं।

हमारे लिए निर्धारित किया गया। सब्जी फल फ्रूट अन्न विविध प्रकार के राक्षसों के लिए वो राक्षसी भोजन है। हिंसक पशुओं के लिए वो भोजन अपने लिए नहीं। तो अपने जब भगवत मार्ग में चल रहे हैं तो अपने को बचना चाहिए। समझाना चाहिए। पत्नी को समझाना चाहिए और ना समझे तो फिर जहां तक हो अगर नियमावली ले लो कि आप बनाओ सब्जी खाओ हम सब्जी नहीं पाएंगे हम नमक रोटी खाएंगे भगवान का भजन करना हम नमक रोटी खा के पूरी मेहनत अभी सब ठीक हो जाएंगे जब हम फिसल जाएंगे निष्ठा में तो सब फिसल जाएंगे नहीं हम नहीं पा सकते हम नमक रोटी पा लेंगे दही रोटी पा लेंगे दूध रोटी पा लेंगे लेकिन जिसमें प्याज पड़ा है लहसुन पड़ा है तो अलग बना के देने को तैयार है वो कहती तुम्हारे लिए अलग बना तो बढ़िया है फिर क्या अलग बनाओ खाओ बढ़िया है भोजन भजन करने के लिए थोड़ा सात्विक भाव तो चाहिए।

भजन मार्ग में तो थोड़ा दुख सहना पड़ेगा। जबान को संभालना पड़ेगा। एक तुम खुद नहीं चाहते हो कि लहसुन की चटनी और प्याज वाली चौक वाली सब्जी के क्योंकि जो ऐसी पाता है तो हम आपको बता ना चाहे जितनी बढ़िया दाल सब्जी हो फिर उसकी जबान में अच्छा नहीं लगेगा। क्योंकि शादी एकदम सात्विक होती है। अब अपने लोग सात्विक सादा भोजन एकदम तभी चिंतन बनेगा सात्विक। अब गंदा भोजन तो गंदा चिंतन रजोगुणी भोजन तो काम आदि दोष उत्पन्न हो जाएंगे। हम जैसा खाते हैं अन्न वैसा हमारा मन बनता है।

तो कोशिश करो जैसे विद्यार्थी हैं नौकरी पेशा वाले हैं। हम उनको ज्यादा इस बात पर जोर नहीं देते कि आप प्याज लहसुन मत खाइए। विद्यार्थी हैं कहां पढ़ने जाना पड़े? नौकरी वाले हैं। कहां-कहां जाना पड़े? अब आर्मी में है कोई कहीं है कोई कहे। लेकिन यदि आप रह सकते हो तो मत खाओ। प्याज लहसुन खाना पाप नहीं है पर दोष है। तमोगुणी है। उस तमोगुणी वस्तु का त्याग करके भजन में बढ़ा जाता है। अब नौजवान जैसे नौकरी पेशा वाले अब उनको यह शिक्षा दो तो घूमते ही रहेंगे भोजन ही नहीं मिलेगा।

प्राय हर जगह जहां भी किचन है वहां ये आजकल सब पड़ता है। तो इसलिए बढ़िया इतना ही है कि मांसवादी ना खाएं तो बहुत बढ़िया है। लेकिन जिनको सुविधा है कि वो बिना खाए चल सकता है तो फिर चला लेना चाहिए। हमारी राय यही है कि अगर ऐसा आपका जीवन है कि आप बिना खाए रह सकते हैं प्याज लहसुन तो फिर आप ऐसा करें क्योंकि वो सात्विक है और भगवान का भोग प्याज लहसुन डालकर नहीं लगता है और बिना भगवान का भोग लगाए हम वैष्णव जन कैसे पावे इसलिए जो भगवान के भोग में नहीं तो उसका हम जीवन भर के लिए त्याग करते तो ऐसे भाव से चला जाता है दीपक शर्मा जी कुरुक्षेत्र से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम गुरु जी क्या किसी दूसरे व अपने लाभ के लिए बोला गया झूठ अपराध है और दूसरे किसी व्यक्ति या प्राणी की रक्षा के लिए बोला गया झूठ हमें अपराध तो नहीं लगता ये कह रहे हैं किसी दूसरे या अपने लाभ के लिए बोला गया झूठ नहीं सांसारिक लाभ के लिए झूठ बोलना तो ठीक नहीं है लेकिन प्राण बचाने के लिए किसी के लिए किसी को मृत्यु जनित कष्ट होने वाला है आपके सत्य बोलने से तो अगर हम बदल जाते हैं।

उसका कष्ट दूर हो जाता है तो हमारे लिए सुकृत ही होगा। वह पाप नहीं माना जाएगा। लेकिन जैसे व्यापार आदमी है या ऐसी छोटी-छोटी बातों में तो हमें लगता है झूठ नहीं बोलना चाहिए। जैसे मान लो कपड़े का व्यापार है तो सबको पता है कि वो दुकान खोले हैं तो मुनाफे के लिए खोले हैं तो आपको मान लो ₹100 मीटर लगा। आप बोले ₹120 मीटर देंगे। वो कह रहा नहीं जी कम करो। नहीं बिल्कुल कम नहीं हो सकता। बस उसमें ऐसे बेचा जाता है कि हम कसम खा के कह रहे तुम्हारे लिए केवल कह रहे 120 का नहीं बिल्कुल मुनाफा नहीं पड़ता है।

अब 120 के नीचे तो नहीं उतरेंगे क्योंकि तो कसम खाने की जरूरत क्या थी? ड्रामेबाजी करने की जरूरत सीधे बोलो 120 का देंगे। लेना है तो ले नहीं चले जाइए। तो व्यापार में लोग कहते हैं बिना झूठ बोले चलेगा नहीं। हम कहते हैं ऐसा कैसे हो सकता है? क्योंकि सब कोई जानता है व्यापार मुनाफे के लिए किया जाता है। उसका परिवार है, बिजली है, नौकर है। सारा कार्य उसका उसी से चल रहा है। तो मुनाफा तो लेगा ही। तो झूठ बोलने की क्या जरूरत? सीधी बात है। इतने रुपया किलो, इतने मीटर, ऐसा ऐसा तो मुझे लगता है अगर हम झूठ बोलने का संकोच करने लगे।

धीरे-धीरे उसको संभालने लगे तो हम सत्य पे आ सकते हैं। पर इस तरह के झूठ बोलना नहीं असत्य संपातक पुंजा वो पाप ही है। लेकिन किसी की प्राण रक्षा के लिए या किसी का बेटी का ब्याह हो रहा है। कोई ऐसे मंगल कार्य किसी का बहुत बड़ा लाभ प्राप्त हो जाता है। गरीब आदमी अगर हम जरा सा बोल दिया तो उसका पूरा परिवार उसका प्राणों का पोषण हो जाएगा। कोई परेशानी नहीं है। ऐसी जगह जहां परहित हो रहा है वो तो बात चलेगी। जहां स्वार्थ की पूर्ति हो रही ये छोटा लौकिक लाभों की इसके लिए फिर सत्य का ही अब आजकल तो झूठा ही लेना झूठे ही देना झूठा ही भोजन झूठ चवेना सत्य तो बहुत पीछे रह गया है बोले आपसे बात करना था बोले इस समय तो हम आगरे में हैं बगले वाली गली में पूरा झूठ बोल रहे प्योर शुद्ध झूठ बोल रहे तो मोबाइल बहुत झूठ बोलवाता है नहीं बुलाता है हां तो हमें लगता है जो व्यवहारिक और जो व्यापारिक जो सामाजिक हमें सत्य पर ही चलना चाहिए क्योंकि हम भगवत मार्ग के पथिक हैं।

हमारा जीवन भगवान में है। तो अब सत्य भगवान का स्वरूप है। सच्चिदानंद रूपा है। तो कोशिश करता अभ्यास से सब ठीक हो जाता। हम सैकड़ों झूठ तो बेमतलब बोलते हैं। मतलब अगर हम सत्य बोलते तो कुछ नहीं बिगड़ता। पर हम सैकड़ों झूठ बोल देते। बहुत फ्री बोल देते हैं। हमें लगता है इस समय तो अब विश्वास करना मुश्किल है कि झूठ बोल रहा है कि सत्य बोल रहा है। सही बात है। कई बातें ऐसी चेक की गई जो बिल्कुल 100% झूठी। मतलब एक होता है कि 10% सही है। 90% झूठ लेकिन 100% झूठ बोल जाते हैं लोग।

और कुछ लोगों का तो ऐसा मतलब जबान फिसली हुई है कि विश्वास ही नहीं कर सकते आप कि ये बोल रहा है पता नहीं सत्य है कि नहीं। सत्य है। कुछ लोग ऐसे होते हैं आप में होते हैं आधे-आधे में कि कुछ सत्य है कुछ झूठा है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका सत्य का परसेंट ज्यादा होता है। कभी बाय चांस झूठ। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका सत्य का एकदम नामोनिशान नहीं। झूठ तो हमें लगता है झूठ से बचना चाहिए। क्यों झूठ बोले? झूठ को पाप कहा गया है। नहीं असत्य सम पातक पुंजा। तो हमें लगता है बचना चाहिए।

कोई ऐसी जगह हां अगर हमसे पाप हुआ गलती हुआ हमें झूठ बोलने का चांस है हम बच जाएंगे तो नहीं फिर हमें बताना चाहिए कि हमें दंड दे दीजिए हमसे गलती हो गई है वो पाप तत्काल नष्ट हो जाएगा और हमारा सुधार हो जाएगा पर हम लोग बहुत छलिया हैं कपटी हैं बहुत बातें छुपाते रहते हैं अंदर कुछ चल रहा है बाहर कुछ बोलते रहते इसीलिए भगवान कह रहे मोह कपट छल छिद्र न भावा निर्मल मन मन जन सो मोह पावा। इसलिए हमें भगवत आनंद की अनुभूति नहीं होती। तो हम लोग अगर छल कपट सुधार पावे थोड़ा झूठ बोलने पर शासन कर लें तो काफी लाभ मिल सकता है।

किसी के प्राणों को बचाने के लिए किसी के जीवन को संवारने के लिए अगर हमसे छोटा-मोटा झूठ हो जाता है वो कोई हानिकारक नहीं। अपने स्वार्थ के लिए नहीं होना चाहिए। अपने व्यवहार में झूठ नहीं होना चाहिए। दूसरे के लिए तो चलेगा। जी आकाश जी राधेधे राधे-धे प्रभु जी प्रभु जी बहुत समय से एक प्रश्न विचलित करता है कि यदि हम इस जीवन मरण के अनंत भंवर से निकलकर ब्रह्मांड नायक जो कि खुद भी अनंत है उनमें विलीन हो जाते हैं तब भी हम अनंत ही रहेंगे। यह अनंत का अलौकिक रहस्य क्या है?

नहीं अनंत नहीं रहेंगे। समुद्र की तरंग वायु विकार के कारण है। वायु विकार हट गई तो आपका अगाद समुद्र स्वरूप है। अगाद अथा ऐसे अनंत है। अनंत का मतलब ऐसे अनंत नहीं है। अगाद समुद्र जिसका अंत ना पाया जाए उसे अनंत कहते हैं। जिसकी था ना पाया जाए उसे अगाद कहते हैं। अथा कहते हैं। वो परमात्मा तत्व अथा अगाद अनंत है। इसमें भय क्या है? तरंग बन करके हम उस समुद्र में ही उछल रहे हैं। समुद्र ही हैं। वायु विकार हटा शांत समुद्र अगाद सम अपना अस्तित्व खत्म हो गया। क्योंकि अभी अज्ञान है।

वास्तविक ज्ञान हुआ नहीं इसलिए डर लगता है। इसलिए चिंता यार आखिरकार क्या कैसा ये सब आखिरी वाली बात मत सोचो। कदम वाली बात सोचो। तो जो आगे का कदम दिखाई दे रहा है अगर उस पे हम पैर रखते चले गए तो अगली मंजिल हमारे लिए बहुत सरल हो जाएगी। जैसे हम गिरिराज जी की परिक्रमा लगाना शुरू करें और थोड़ी देर के बाद फिर किलोमीटर गिने कितने किलोमीटर है? बोले अभी तो 19 किलोमीटर है यार 19 कि.मी. और ये गिनना बंद कर दो और राधा राधा राधा राधा मस्ती से डोलते चले जाओ पूरी गिरिराज जी की परिक्रमा लग जाएगी।

तो परमार्थ के अगर किलोमीटर गिरोगे तो बहुत कठिन है क्योंकि आगे की पता नहीं है ना अब जैसे आप अनंत पर विचलित हो गए अनंत का मतलब जिसका अंत नहीं है वो परमात्मा है उसी में आप हो गए तो आप परमात्मा स्वरूप हो गए ये ज्ञान की बात है और भक्ति की बात है उसके दास हैं हम उसके सेवक हैं हम तो उसके समीप हम सेवा में सुख का आनंद ले रहे हैं उसकी रूप माधुरी लीला माधुरी गुण माधुरी उसी के साथ नाना प्रकार की क्रीड़ाएं आनंद का अनुभव परमात्मा जैसे अच्छा दोस्त मिल जाए तो कैसा समय कटता है और अगर धनी मिल जाए और समर्थ मिल जाए और बलवान मिल जाए और सर्वज्ञ मिल जाए और सिर्फ हमारे मन के अनुकूल चलने वाला मिल जाए सिर्फ हमारे मन के अनुकूल तो कैसा रहेगा ये तो निहाल हो जाओगे ना ऐसे दोस्त हैं भगवान हमारे ऐसे पिता हैं भगवान हमारे ऐसी माता है भगवान हमारे ऐसे सर्वस्व हैं भगवान हमारे ये तो सुख दुख का विषय है।

डरने का विषय थोड़ी कि उस अनंत में मिलकर हम अनंत हो जाएंगे। हां इसे अनंत नहीं इसे नानात कहते हैं। महाराज जी दृश्य दिखता है बार-बार मेरे को सब जैसे एक ब्रह्मांड से हम दूसरे ब्रह्मांड में देखो देखो बच्चा स्वप्न असत्य है। स्वप्न असत्य है। जागृत असत्य है। साक्षात्कार जागृत और स्वप्न से अतीत है। जो ना स्वप्न है ना जागृत है। उस भगवत साक्षात्कार इस जागृत में जो देख रहे हो इसे भगवान शंकर कह रहे हैं उमा कहूं मैं अनुभव अपना शंकर जी का अनुभव सत हरि भजन ये जगत सब सपना ना ये रूप 50 60 वर्ष पहले नहीं था और पता नहीं कितने दिन बाद नहीं रहेगा बीच में केवल दिखाई दे रहा है इसका अस्तित्व है सपना है जैसे जगे तब सपना नहीं और जब सोने के लिए लेटे थे तब सपना नहीं बीच में सपना आया बच्चा ये स्वप्न है जागृत अवस्था और स्वप्न अवस्था से अति तुरी अवस्था भगवत आनंद की स्थिति में जब जाओगे फिर जो दिखाई दे हमसे बताना के तो बताने लायक नहीं रहोगे क्योंकि वो अनिर्वचनी आनंद होता है अभी जागृत में कोई झांकी आ गई जरा सी स्वप्न में कुछ ऐसी कोई महत्व नहीं।

छोटी मोटी अनुभवों को जब सोहनी लगा के हटा दो तब उस महानुभव का अभी कुछ नहीं। मतलब हमारे सामने भावात्मक झांकी भी आ जाए तो हम कोई जीवन मुक्त थोड़ी हो गए। उसके लिए तो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर सब पर विजय प्राप्त करके तब जीवन मुक्त अवस्था। इसीलिए क्या होता है कि छोटे-छोटे अनुभव छोटी-छोटी बातें, छोटी-छोटी मानसिकताएं हम उसको भगवत प्राप्त मान लेते हैं। हम उसको दिव्य मान लेते हैं। हमको दिव्य पाना है। अभी छोटे-छोटे भोग छोटी-छोटी कामनाएं छोटा-छोटा पोसला देना इससे मुझे क्या होगा?

मुझे उस परमात्मा का साक्षात्कार करना है। मुझे ये छुपा छुपी का खेल नहीं खेलना कि स्वप्न में आप झलक दे गए ऐसे दे गए। शर्माओ मत। सामने हमारे प्रकट हो। मैं देखना चाहता हूं कि आखिरकार परमात्मा कैसा है। आप चाहे जिस भाव में समझो आप मुझे दिव्य दृष्टि दो। मैं आपको देखना चाहता हूं। मैं आपका अंश हूं और भगवान ने दी है। जैसे अर्जुन को दी ऐसे भक्तों को दिव्य दृष्टि दी है। और उनको अनुभव हुआ। परमात्मा का अनुभव हुआ। बिना अनुभव के ऐसा नहीं कि संसार में भगवत प्राप्त महात्मा ही नहीं है।

ऐसा नहीं है। भगवान को आप प्राप्त करने का ये जो अवसर मिला है मानव देह ये छोटी मोटी बातों में मत सही ढंग से चलोगे तो वास्तविक भगवत साक्षात्कार हो जाएगा। जिसके प्राप्त होने के बाद कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा नसो चतिनाका अखंड प्रसन्नता अखंड आनंद की अनुभूति या भगवत साक्षात्कार प्रिया प्रीतम के रूप में जो जैसी भावना करता है तो अभी छोटे-मोटे प्रश्न जो अंदर उठते हैं जो जागृत अवस्था के छोटे-मोटे कुछ चकाचौंध आकर्षण और दिव्यता और स्वप्न की दिव्यता इनको सबको गुप्त कर दो हम साक्षात्कार करने के लिए निकले जिससे जन्म मरण का चक्र हट जाए भगवत स्वरूप हो हो जाए भगवद आनंद में वो भयाव स्थान थोड़ी उसका थोड़ा अनुभव होने पर अभय हो जाता है जीव आप कह रहे हो भय लगता है तो अभी वो वस्तु अज्ञानी हो महाराज नहीं हम आपको कह रहे हैं हम तुम सब अज्ञानी है हम तुम सब अज्ञानी पर्दा हटा ज्ञानी हो गए वही आप ज्ञान स्वरूप हो जो पंचभौतिक शरीर ये वो यह है और जो इसमें आत्म तत्व वही आप में है थोड़ा पर्दा लगा के भोगों में खेल रहा है वही अज्ञानी हो गया जो पर्दा हटा के भगवान को तो वही ज्ञानी हो गया।

पर्दा हटाने के लिए ही तो मानव देह मिला है। पर्दा हटाने के लिए साधु संग मिला है। तो अज्ञानी और ज्ञानी क्या? हम पथिक है प्रभु के मार्ग में। 1000 की लाइन लगी। आगे वाला जो साक्षात्कार कर रहा है उसी लाइन में तो हम भी लगे हैं ना। तो लाइन तो वही है ना हमारी सबकी भगवत मार्ग। इसलिए हम कोई नीच नहीं है। हम कोई कम नहीं है। हमें चलना है प्रभु की तरफ। हमें उत्साहित नहीं होना कि हम अज्ञानी है। हम नीच हम कैसे प्राप्त कर पाएंगे? नहीं। हम भगवान के अंश हैं। जैसे महापुरुषों ने प्राप्त किया उसी मार्ग पर हम चलेंगे।

हम उनको प्राप्त करेंगे। वो हमारे प्रभु हैं। हमारे स्वामी हैं। हमारे साहब हैं। समझ पा रहे हैं आप? रोली जी कानपुर से राधे-राधे राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी जब से आपका एकांतिक वार्तालाप सत्संग सुनना शुरू किया है जीवन में एक हल्कापन सा महसूस होने लगा है। महाराज जी मेरा प्रश्न है कि मूलता आप नाम जप की महिमा बताते हैं। आपसे कई बार अजामिल जी की कथा सुनिए जिसको अंतिम स्वास में नारायण कहने से भगवत प्राप्ति हो गई। किंतु भक्त भरत को उनके अंतिम समय में हिरण की आसक्ति हो गई।

क्या था कि भरत ने भग उसमें भागवत में पढ़ के देखना भरत जी का जहां प्रसंग हो बहुत पहले ही हिरण में इतने आसक्त हो गए मृत्यु के पहले ही कि ना आप सेवा करते थे ना भगवान का स्मरण करते थे पूरा चैप्टर बदल गया हिरण के ही स्मरण में तो अंतिम समय हिरण का स्मरण आया भगवान का नहीं इसलिए अगला जन्म हिरण का बने पर पहले भगवान का भजन करते थे इसलिए हिरण के शरीर में भी वही भजन वृत्ति प्रकट हुई। तो अगला जन्म ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष के रूप में जड़ भरत के रूप में प्रकट हुई।

आप समझ रहे हो? तीन जन्म लग गए क्योंकि अंतिम बिगड़ गया। अंतिम फाइनल बिगड़ गया। फाइनल के समय हिरण का ध्यान आ गया। हिरण के बच्चे में रति रही तो चला गया। इसीलिए एक अहमता ममता ये जग में है दुखदाई। ये जब श्री जी की ओर लगे तो होत परम सुखदाई। एक अहंकार और ममता यही हमें बांधने वाली है। अगर यह अहम और मम प्रभु के चरणों में लग जाए तो महा सुख की प्राप्ति हो जाए। अब राज्य परिवार रानी पुत्र सब छोड़ा था भगवान की प्राप्ति के लिए तो हिरण के बच्चे में ममता कर लेना।

चूक हो गई ना अपना बच्चा तो छोड़ के आ रहे हो तो क्या करें? दया ना करें। नहीं उसको निकाल देते। दो चार 10 दिन पास रखते। फिर इसके बाद हिरणों के झुंड में छोड़ देते। अब उससे इतना राग कर लेना कि गले में बैठाल के घूमना और पूरा का पूरा जैसे मानो पुत्र वियोग से तड़पा हुआ है हृदय हिरण के बच्चे में वैसे ही इतना आसक्त हो गए कि अब छोड़ा नहीं गया अपने ही समीप बस यही गलती हो गई और उसमें इतनी ममता हो गई कि अंतिम समय जब तो उसी हिरण का चिंतन तो अगला जन्म हिरन का बन गए समझ रहे हो बच्चा और नारायण का नाम भगवान का नाम भगवत भाव से नहीं लिया पुत्र पुत्र के भाव से लिया पर नारायण तो बोला तो ऐसा पापी परम पद में चला गया ऐसा

महात्मा चूक गया अंतिम समय ना राम कृष्ण हरि नारायण कुछ नहीं हिरण का चिंतन तो अगला जन्म हिरन का बन गया भाई फाइनल में है फाइनल में चूक फाइनल में उसका सौभाग्य उदय हो गया वो संतों के संग से एक बार संतों की मंडली आई तो अजामिल जहां गांव किनारे वैश्या के साथ रहता था कई पुत्र थे तो लोगों ने पूछा उत्तम ब्राह्मण का कोई भगवत भक्त ब्राह्मण का घर हो संतों ने तो हमें बता दे तो लोग कुछ ऐसे विनोदी टाइप थे उपहास करने बोले सबसे उत्तम ब्राह्मण वो अजामिल वहां रहता है

वहां जाओ तो बगीचा था सामने उन्होंने ठाकुर जी विराजमान किए आरती पूजा की तो सोचा जब ब्राह्मण आएगा तब और जब दे आया तो देखा कि तुम महापापी पशुओं का वध किए हुए और ऐसे तो उन्होंने कहा अच्छा तुम्हारा मिलना इसका मतलब किसी ने उपहास किया तो जे ही इतने संतों को देखा तो पूर्व में वह साधन संपन्न था। धर्मात्मा था। एक वैश्या को देखकर के गंदे आचरण मन फिसल गया। अब उसको याद आई अपने जीवन के चरणों में लौट गया। बोला महाराज हम तो आपके दर्शन करने लायक नहीं। इतने नीच पापी ऐसा क्या मेरा भी उद्धार हो सकता है।

उन्होंने कहा उद्धार हो। पानी तो तुम्हारे यहां नहीं पिएंगे। भोजन भी नहीं पाएंगे। रुकेंगे भी नहीं। अभी यहां से चले जाएंगे। उद्धार हो सकता है। हम देख रहे हैं कि तुम्हारे आखिरी संतान होने वाली है। इसका नाम नारायण रख देना उद्धार हो जाएगा। अब संतों के द्वारा उस पुत्र का नाम रखने के कारण विशेष प्रियता पुत्र से हो गई। अब वो जा जाता अपने छोटे पुत्र को साथ रखता। अब मरने का जब समय आया तो पुत्र बाहर खेल रहा था। तो प्रियता के कारण अगर नारायण की जगह कुछ और नाम होता तो नरक मिलता क्योंकि स्मरण पुत्र का था और नाम नारायण था इसलिए संतों का संग सदैव मंगलकारी होता है तो नारायण और इतने में भगवान के पार्षद आ गए मेरे स्वामी को पुकारा तो यमदूतों ने तर्क किया था कि स्वामी को नहीं पुकारा पुत्र का स्मरण करते हुए बोले नहीं मेरे स्वामी का नाम नारायण है किसी भी बहाने से सही स्वामी तो मेरे हैं।

उनका नाम पुकारा इसलिए तुरंत यमपास काटी और फिर उत्तर प्रतितुत्तर करके उनको हटा दिया। यमदूत जब गए यमराज के पास तो यमराज ने कहा वो कोई और नहीं भगवान के पार्षद थे नमस्कार करते अगर भूल से भी कोई अंतिम समय राम कृष्ण हरि नारायण राधा नाम बोल दे भूल कर मत जाना उनके पास। तो यह बात एक अलग हो गई और वो बात एक अलग हो गई। हम दोनों का तारतम्य नहीं मिला सकते। जिनका जीवन परम पवित्र भरत जी उनसे चूक हुई तो अगला जन्म हिरन का और जिसका जीवन अपवित्र और संत संग से एक बात बन गई पुत्र का नाम नारायण तो उसका परम गति मिल गई अंतिम समय नारायण पुकारने से समझ पाए बच्चा अंतिम समय में उनको जो गति मिली इसमें भी कोई पुनर्जन्म के कर्मों का ही योगदान रहा नहीं वर्तमान वर्तमान का जो चूक है वो हुआ पुनर्जन्म का नहीं यह वर्तमान की चूक है जब साधना के लिए भगवत मार्ग में चले हो।

अपनी पत्नी से ममता त्याग दी। अपने पुत्र से ममता त्याग दी। राज्य से ममता त्याग दी। जिस भगवान की प्राप्ति के लिए तो हिरण से ममता करने की क्या जरूरत थी? बस ये चूक हुई तो अगला जन्म हो गया। चूक नहीं। एक होती गलती और एक होती है प्रारब्ध। प्रारब्ध एक अलग चीज होती है। ये गलती थी। प्रारब्ध नहीं थी। ये चूक थी। जैसे दया करना कोई चूक नहीं है। उस हिरण के बच्चे को बचाना। दो चार 10 दिन उसकी सुरक्षा रखना। इसके बाद हिरण के झुंड में छोड़ देना। भगवान सबका पालन पोषण करते हैं।

विश्व के सब हिरणों का ठेका थोड़ी लिए थे। वैसे हिरण मंडली में छोड़ देते लेकिन आसक्ति वश नहीं छोड़ पाए। आसक्ति के कारण। अब फिर वही आसक्ति हमारे अगले जन्म का कारण बन जाती है। भगवान से आसक्ति तो भगवत प्राप्ति शरीरों में जैसे पुरंजन की आसक्ति स्त्री में हो गई तो अगला जन्म स्त्री का प्राप्त हुआ। ये अंतिम समय जो स्मरण आएगा वो अगला जन्म बन जाएगा। हम लोग इसीलिए रात दिन भजन करने का प्रयास सब कर रहे हैं कि अंतिम समय भगवान का स्मरण आ जाए। भगवान कहते हैं अंतिम समय जब महान दुख की स्थिति होती है जो जीवन भर मेरा भजन करता है उस समय अगर भजन भूल जाता है तो मैं भजन बनता हूं।

मैं उसके हृदय में स्पुरित हो जाता हूं। हमारा प्रयास भजन का है। देखो भजन तो कभी निष्फल नहीं होता। हिरण बनने पर भी भजन किया और अगला जन्म सिद्ध महापुरुष जड़ भरत जी के रूप में ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष के रूप में भजन कभी निष्फल नहीं होता लेकिन लंबी यात्रा हो गई ना तीन जन्म लग गए भरत जी का जन्म और हिरण का जन्म और जड़ भरत जी का जन्म नहीं तो एक ही में हो जाता काम हो जाता तो ये चूक बचाने के लिए ही सत्संग है। ये चूक बचाने के लिए ही भरत जी ने ये चरित्र करके दिखाया है।

हम लोग सावधान रहे इसलिए वो तो भगवान के पुत्र हैं। ऋषभ भगवान के पुत्र भरत जी उन्होंने लीला करके यह बताया है कि ऐसी चूक में ऐसा जन्म आगे हो सकता है और अगर चूक ना हो तो भगवान की प्राप्ति इसी जन्म में पर्याप्त हो जाएगा जितना समय इसी में भगवत प्राप्ति हो जाएगी कोई नए ढंग से नहीं चलना जो कर्म कर रहे हो भगवान को समर्पित कर दो नाम जप करते रहो भगवत प्राप्ति हो जाएगी बड़े-बड़े महापुरुषों ने इसी पद्धति से भगवान को प्राप्त किया है। उमादत्त शर्मा जी दिल्ली से राधा राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव मैं और मेरी पत्नी दोनों दीक्षित हैं।

तीन महीने पहले ही हमने दीक्षा ली है। गुरुदेव मेरा प्रश्न है कि हम पिछले कई सालों से कान्हा जी को पुत्र रूप से सेवा कर रहे हैं। अतः जब हमसे हमने दीक्षा ली है तब से हम जुगल जोड़ी की सेवा भी करते हैं। तो क्या हम वात्सल्य और सहचरी भाव से सेवा कर सकते हैं? पहली बात है कि हमको भाव भाव का मतलब होता है डिग्री। हमको डिग्री पे नहीं पहुंचना। पहले हमको देखना है हम कितना समय दे पा रहे हैं चिंतन में। देखो हम जब प्रारंभिक क्लास की पढ़ाई से परिपक्व होते चले जाएंगे तो भाव की दशा वो अपने आप ले लेंगे।

वो आपको मित्र बनाना चाहते हैं कि आपको वो पिता बनाना चाहते हैं। आपको क्या बना वो खुद आपके अंदर भाव आ जाएगा। अभी हमारे माने हुए भाव हैं। अभी कोई सिद्ध भाव थोड़ी है। कोई सिद्ध संबंध थोड़ी है। अभी हमको जरूरत है इस बात की कि हम प्रभु को कितना स्मरण करते हैं और कितना भूल जाते हैं। इस पर केवल सुधार करनी है हमें। अगर इस पर सुधार शुरू कर दोगे ना तो धीरे धीरे धीरे साधना हमारी बनने लगेगी। हृदय पवित्र जब हो जाता है तब फिर भाव का प्रादुर्भाव होता है। पहले भजन अनर्थ निवृत्ति साधु संग के द्वारा सत क्रियाएं और हृदय पवित्र होना फिर भाव फिर महाभाव वो सब आगे बढ़ता है।

तो पहले हम भजन पर देख ध्यान दें कि हम हर समय जो गुरु मंत्र मिला है जो गुरु नियम मिले हैं उन नियमों का पालन करते हुए हम हर समय भजन में है कि नहीं। बोले अभी पूरा समय नहीं तो हमें पूरा समय धीरे-धीरे लगाना है। उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते क्रिया रहित या क्रिया सहित हम हर समय भजन परायण पहली पद्धति है स्मरण भजन इसको संभाल लो फिर आगे भाव वाली बातें आ जाएंगी क्योंकि मन है अभी हम कह दे सहचरी भाव तो आप विचलित कर सकता है क्योंकि आपका मान लो पुत्र भाव तो विचलित हो जाओगे ना पहले मंत्र जपो नाम जप करो पाठ करो और जैसे प्यार कर रहे हो एन केन प्रकार प्रभु से चित्त जुड़ा तो है ना हम उनको लाला माने या उनको पिता माने या उनको मित्र माने पहले हम अपने मन को जोड़ना

सीखें प्रभु से बराबर मन जुड़ता रहेगा फिर वह हमको क्या पसंद करते हैं वो वो अपने आप आपके अंदर दृढ़ हो जाएगा फिर उसकी चिंता लेकर ले जी दीपक मिश्र जी इंदौर से राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में दंडवत प्रणाम महाराज जी मैं पिछले एक वर्ष से YouTube के माध्यम से आपसे जुड़ा हूं तब से नित्य आपके एकांतिक वार्तालाप एवं सत्संग का श्रवण करता हूं आपसे भगवत नाम जप की महिमा सुनकर पिछले एक वर्ष से प्रभु श्री राम जी के नाम का अधिक से अधिक जप करने का प्रयत्न कर रहा हूं।

महाराज जी मेरा प्रश्न यह है कि गुरुदेव भगवान की नाम जप में निरंतरता एवं प्रभु के नाम में प्रियता क्यों नहीं हो रही? कृपया उचित मार्गदर्शन करें। देखो प्रभु के नाम में प्रियता इसलिए नहीं हो रही कि भोगों में कहीं ना कहीं हमारी सुख बुद्धि बराबर बनी रही। पीछे से अभी अंदर से देखो सुन सुना के हमें लगता है कि भगवान के नाम से हमारा कल्याण हो जाएगा। हमारी कामनाओं की पूर्ति होंगी। लेकिन नाम का कोई स्वाद नहीं है। नाम का कोई आनंद भी नहीं है। और भोगों का आनंद मन अनुभव कर चुका है।

उसके लिए किसी के प्रमाण की जरूरत नहीं। हमारे शास्त्र कह रहे हैं कि भोगों में दुख है। पर मन अनुभव कर रहा है सुख। इसलिए भोगों का चिंतन तो स्वाभाविक कर रहा है और भगवान का चिंतन जबरदस्ती कराना पड़ता है। अगर भगवान का चिंतन जबरदस्ती ना कराओ छोड़ दो तो भोगों का ही चिंतन करेगा और आप जबरदस्ती कराने का प्रयास करो तो बीच-बीच में भाग भाग कर भोगों का चिंतन क्योंकि मन का स्वभाव बन चुका है कि भोगों का चिंतन करने से भोगों को भोगने से सुख मिलता है। यह बैठ गया है हमारी बुद्धि में।

एक ही है जिसे चार कहा गया है। निश्चय करने के कारण बुद्धि कहा गया। संकल्प विकल्प करने के कारण मन कहा गया और चिंतन करने के कारण चित्त कहा गया और क्रिया को स्वीकार करने के कारण अहंकार कहा गया। इसे अंतःकरण चतुष्टय कहते हैं। पूरे डिपार्टमेंट में खराबी हो गई है। अहम ने स्वीकार कर लिया कि मैं पुरुष हूं। मैं भोगूंगा। मन ने संकल्प कर लिया कि भोगों में सुख है। बुद्धि ने निश्चय कर लिया कि अवश्य तुम जो कह रहे हो वही है। तो अब चिंतन उसी का बन रहा है। अब पूरे डिपार्टमेंट को बदल दे।

सो महात्मा सो भगवत प्राप्ति। अब इसीलिए कठिन पड़ रहा है। पहले स्वीकृति बदले तो बात जल्दी बन जाए। स्वीकृति बन गई है कि जैसे मैं पुरुष हूं। तो पुरुष शरीर है ना कि मैं जो मैं तत्व है वह न जाने कितनी योनियों में भ्रमण करते हुए चला आ रहा है। ऐसे इस योनि में आए यह भी शरीर छूट जाएगा। अगला फिर शरीर आएगा फिर शरीर को मैं मान लेगा। बार-बार जन्म, बार-बार मरण। तो स्वीकृति एक बार ये हो जाए कि शरीर मैं नहीं हूं। यह शरीर मुझे प्रयोग के लिए मिला है। आप स्पष्ट देखिए आपके प्रयोग की यह वस्तु है ना कि आप हैं।

शरीर आप नहीं है। क्योंकि कहते हैं वो निकल गया जो इसमें रह रहा था। अब शरीर में क्या जैसे कोई पधार जाता है घर के लोग रोते हैं तो कहते हैं भाई अब मत रो। जो थे वो तो चले गए। तो मतलब शरीर नहीं था वो। वो कुछ था अलग। वही आप हैं जो आत्म तत्व है जो भगवत अंश है। अब यह ज्ञान जब तक नहीं होगा तब तक भजन में मन नहीं लगेगा। जब भजन में महत्व बुद्धि आ जाती है, भजन में सुख बुद्धि हो जाती है तो फिर चैन नहीं पड़ता। फिर रात दिन भजन होने लगता है। अभी प्रयास करके करना पड़ेगा।

जैसे दवाई कड़वी है लेकिन मुझे यह पता चल गया कि इस दवाई से मेरा रोग नष्ट हो जाएगा। तो हम डॉक्टर पर विश्वास करके दी हुई दवाई पर वो जैसा हमें बोला वैसा हम उसका प्रयोग करने लगते हैं। ऐसे सद्गुरु वैद्य वचन विश्वासा और संयम या ना विषय का आशा सद्गुरु रूपी डॉक्टर कोई बात मान ले परहेज जो वो बता रहे हैं वो परहेज कर ले और दवा खा ले तो निश्चित भरोग से निकल जाएगा। एक सांस में कई देवता याद आते हैं। कोई बात नहीं। एक प्रतिबल स्थिर कैसे करते? हां। तो पहली बात तो यह समझना है कि हमारा मलिन मन संसार का चिंतन छोड़कर कम से कम भागवतिक तो करने लगा ना।

वो हनुमान जी का करे, राम जी का करे, श्याम जी का करे, शिव जी का करे, देवी जी का करे, गणेश जी का करें। सत हैं सब भगवत स्वरूप है। गंदा चिंतन छोड़कर कम से कम अच्छा चिंतन तो बनने लगा। अब ये अच्छा चिंतन अपने आप आगे ठीक हो जाएगा। चलने दो। ऐसा सबके जीवन में होता है। ऐसा सबके जीवन में। तुम्हें कुछ नहीं करना। बस सत चिंतन करते रहो। जब मन आवे तब राम जी का भजन करो। जब मन आवे तब श्याम जी का भजन करो जब मन आवे पर इधर का दैवी संपदा का तो सत चिंतन के प्रभाव से जब असत चिंतन हटेगा तब आसक्ति होने लगेगी और आसक्ति कईयों से नहीं होती फिर एक कोई ऐसा उभरेगा उनमें से जिसमें आपका मन चपक जाएगा कि अब तो गणेश जी के सिवा हमारा कोई नहीं अब तो शिव जी के सिवा हमारा कोई नहीं अब तो राम जी को हम छोड़ नहीं सकते चाहे प्राण निकल जाए अब तो कृष्ण जी को हमने वो आएगा आगे चलकर अभी चलते चलते रहो।

जैसे चल रहा है ऐसे ही चलाते रहो। क्योंकि अगर युद्ध करना शुरू किया तो अभी विजय तो मिली नहीं उससे। वो यह भी छोड़ देगा। पीछे पीछे हट जाएगा। उसको बहुत प्यार से लगाना जाता है। देखो नाम जप की हम आपको पद्धति बताते हैं। जैसे हमें आदेश मिला कि आप ये नाम जप करो। अब मन उसमें लगता नहीं। मन की चाल है। अब मन कह रहा हम राधा बोलेंगे। हम कृष्ण बोलेंगे। हम राम बोलेंगे। हरि बोलेंगे। तो बोलो राधा कृष्ण हरे राम राधा कृष्ण हरी राम अब वो राजी हो गया ना अब उसको जपो अब आप एक दिन देख लेना वो राधा ही राधा में डूब जाएगा उस समय उसको काटना नहीं चाहिए कि नहीं उनको उन्होंने तो कहा राधा बोलो हम हरि जप नहीं बात समझो इस समय हमारी सबसे पहली शर्त है मन को संसार के चिंतन से हटा के प्रभु में लगाना फिर प्रभु के जिस नाम रूप में रुचि प्रकट करें प्रभु गुरुदेव आचार्य देव वो अपने आप हो जाएगा।

अभी पहले इसे फंसाओ। नहीं सोचना, नहीं सोचना। इस बात को बहुत गंभीरता से आप लोग पकड़ लीजिए। आना एक में है। लेकिन अभी हम अनेक में फंसे हैं तो इसको अनेक में फंसाते हैं। असत अनेक से हटाकर सत अनेक में फंसाते हैं। वो अनेक में भी एक ही है। इसको विविध नामों का येकि एक में लगना नहीं चाहता। तो इसको विविध नामों में फंसाते हैं। कभी स्तोत्र पढ़ रहे हैं, कभी यह नाम जप कर रहे हैं, कभी वह नाम जप कर रहे हैं। तो धीरे-धीरे पवित्र तो पहले हो और जहां पवित्र हो तो फिर एक जगह लग जाएगा।

और जैसा आप बोलते हैं गुरु जी एकांति में ये बहुत दुष्ट स्वभाव का है। कभी-कभी तो इतना प्रसन्न हो जाएगा कि ऐसा लगेगा कि पूरे सुबह से लेकर शाम तक भगवान नाम जप ही करते रहो। और कभी-कभी थोड़ी सी प्रतिकूल परिस्थिति आ जाएगी थोड़ी सी तो हृदय अंदर से एकदम जलन उठेगी फिर चिल्लाएंगे राम राम राम राम राम फिर धीरे धीरे पर इसमें ये देखना है कि उस जलन को सह जाना है अगर सह गए टूटे नहीं तो आपकी भूमिका बढ़ने लगेगी हृदय की और अगर टूट गए तो फिर आपको उसी क्लास में पढ़ना पड़ेगा सहना बहुत सहना बहुत बड़ी मतलब साधना है सहित सहित बाढ़ है भगत गृहतन गुरु हितगार जो सहने लगा उसके अध्यात्म की भूमिका बढ़ने लगती है।

बस यह बात हमारी ध्यान रखना विपत्ति, दुख, निंदा, अपमान, उपहास यह हमारी भूमिका बढ़ाने वाला पावर देंगे। अगर सह गए तो आपकी भूमिका बदल जाएगी। अध्यात्म की भूमिका की ऊंचाई पर आ जाओगे। और अगर टूट गए, बुरा मान गए, उसको गाली दे दी, लड़ गए तो चलेगी वही साधना पर अभी भूमिका नहीं बदलेगी। इसलिए हमको अगर अच्छे क्लासों में जाना है तो हमको तैयारी करनी है कि जब हमारी निंदा हो जब विपरीत परिस्थिति आवे जब कोई प्रतिकूलता आवे तो मुझे भगवान में स्थित होकर उसे सह लेना है जवाब नहीं देना है तो वो आगे आपकी भूमिका बदल देगा बस यह बात समझना है इसीलिए बड़े-बड़े समर्थ संत होते हुए भी अपमान निंदा मारपीट भी सह गए कभी हाथ नहीं उठाया क्योंकि अध्यात्म की ऊंचाई पर चढ़ना है ये शर्त है गुरु जी यही नहीं हो पा रहा है अभी नाम जब करते रहे हो जब लोभ बढ़ जाएगा

ना तब फिर बात बन जाएगी जैसे कि ये सब लोग आपको गाली देंगे अपमानित करेंगे विपत्ति आएगी तुमको परम पद प्राप्त करना है और चुपचाप सर झुका के निकल जाना है किसी से लड़ना नहीं किसी से झगड़ना तो जब परम पद का लोभ हो जाएगा भगवान के दर्शन का भगवत प्राप्ति का तो आप सह जाएंगे ये अगर मैं बोला तो फिर मेरी स्थिति नहीं बदलेगी मुझे स्थिति बदलना है मुझे काम क्रोध लोभ मद मोह से ऊपर उठना है तो मुझे सहना पड़ेगा इसलिए सहना है राधा राधा राधा राधा फिर सह जाएगा अभी लोभ नहीं

जगा है। भगवत प्राप्ति का लोभ नहीं जगा। अभी दिव्य आनंद की प्राप्ति का लोभ नहीं जगा। इसलिए हम ये बुरा मानते सह नहीं पाते हैं। हां तो इसलिए हमें सहना पड़े। बस परमार्थ में तो यही जहां आया हम देख लेंगे। तो तुम जो देखने निकले थे वो तो नहीं देख पाओगे और गिर जाओगे मार्ग से। और प्रश्न ऐसा आता है परमार्थ का कि प्रश्न बन के नहीं आता। वो ऐसी घटना बन के आता है कि हम यह समझ नहीं पाते कि हमारे सामने प्रश्न आया है। परीक्षा में पास होना है। यह बात विपत्ति, निंदा, अपमान, तिरस्कार ये इस मार्ग के प्रश्न है।

और इनका उत्तर मौन दिया जाता है। आपको जो गाली दे रहा है मुस्कुराया चल दिया। वो आदमी दिमाग से समझ पावे कि है क्या चीज? इसको गाली दे रहे हैं। अपमान कर रहे हैं। कुछ बोल ही नहीं रहा। बस बस आप पार हो गए और वह जो कर रहा है तो उमा क्षमा सापते भारी अपने कर्म जाए अपकारी जैसे ये सोचे कि कोई नीच पुरुष है वो गाली दे रहा है अगर हम नहीं बोले तो बढ़ता चला जाएगा ऐसा नहीं है ईश्वर है वो उसको संभाल लेगा तुम आगे बढ़ो तुम्हारे को संभालने की जरूरत नहीं तुम तो चलो ईश्वर की तरफ ईश्वर उसे संभाल लेगा उमा क्षमा सापहु ते भारी अपने कर्म जाए अपकारी अपकार करने वाला अपने कर्म से ही नष्ट हो जाएगा।

तुम्हें कुछ कहने की जरूरत नहीं। वो आगे नहीं बढ़ पाएगा। तुम आगे बढ़ो। तुम मत लड़ो। नहीं तो हमें उसके विषय में मंगल ही मनाना है। मंगल ही मनाना है। क्यों? क्योंकि भगवान उसके भी हृदय में बैठे हैं। और जब आप करत जे अनसहन निंदक तीनों पै अनुग्रह कियो जो अनसहन आपसे ईर्ष्या करते हैं। जो आपकी निंदा करते हैं। आप उनका जब भला मनाओगे तो आपकी भूमिका बदल जाएगी अध्यात्म की। और उसकी भूमिका बदल जाएगी अलग। और यह बुद्धि पवित्र होने से ही होगी। पवित्र बुद्धि और अच्छा अब जैसे आपने सुन रखा तो आपके दिमाग रूपी पॉकेट में ये बात तो आ गई है ना तो कहीं ना कहीं स्पुरित होगी जब आपको कोई गाली देगा तो आएगा बाबा कह रहे थे सहना है बहुत कठिन है सहना पर सहना है तो एक दिमाग में तो पहुंच गई ये बात सत्संग की ये आपको कहीं ना कहीं सपोर्ट करेगी एक बार हारोगे दो बार हारोगे तीसरी बार आप जीत ही जाओगे क्योंकि आप नाम जप कर रहे हो आप सत्संग कर रहे हो आप सद आश्रय लिए हुए हैं तो असद पर निश्चय विजय प्राप्त हो जाएगा जाएंगे।

गुरुदेव मेरा मन भाव है। मेरी माता जी हैं। मैं एक साल से उनको यहां पे आपके साक्षात दर्शन करवाना चाहता हूं और दो तीन बार मैंने उनको मतलब प्रार्थना भी करी। कल मैंने जस्ट अभी कल ही बात करी मैंने उनसे तो मेरी तबीयत ठीक नहीं है। अभी मैं नहीं चल पाऊंगी। तो मेरा मतलब ये हां ये तो आपका भगवत भाव है। अगर हां अगर उनकी रुचि ना हो ना तो राधा वल्लभ जी का चरणामृत और वृंदावन की रज ले जाओ। रज लगा दो चरणामृत पिला दो। ना कोई बात नहीं है। ठीक है? आपका कार्य महान है। लेकिन उनकी रुचि भी ना हो तो आप लाओगे भी तो वह लाभ नहीं मिल पाएगा।

रुचि से होता है। हां। संत मिलन को चालिए तज माया अभिमान जे पग आगे बढ़े कोटिन यज्ञ समान। अहो भाग्य आज मैं संत दर्शन करने जा वो एक उत्साह होता है। अब जबरदस्ती किसी को लाओ तो उस तयत ठीक नहीं रहती है। हां नहीं वैसे भी जिसकी तबीयत भी ठीक हो अगर जबरदस्ती लाया जाए तो विशेष लाभ नहीं मिलेगा और जब भाव जग जाए इसीलिए हमने कहा चरणामृत और रज लगा दो क्योंकि रज में सब संतों के चरण रज है और ठाकुर जी के चरणामृत का क्या कहना है? अकाल मृत्यु हरणम सर्वव्याधि विनाशनम श्री कृष्ण पादोदकम पित्वा पुनर्जन्म न विद्यते तो संत दर्शन का जो लाभ है ना वो चरणामृत और रज लगाने से प्राप्त हो जाएगा अगर उनका कभी भाव बन जाए देखो शरीर के से ज्यादा मन की स्वस्थता चाहिए शरीर अस्वस्थ है मन स्वस्थ है तो हिम्मत आ जाएगी और मन अस्वस्थ है, शरीर स्वस्थ है तो भी बात नहीं बनेगी।

तो उनके धीरे-धीरे मन को कभी उत्साह आ जाए कि चलो आज हम दर्शन कर दे तो बढ़िया बन जाएगा। आप कहते रहिए और चरणामृत और रज लगाते रहिए। रचना शर्मा जी पुणे महाराष्ट्र से राधे राधे राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी जब हम भक्ति मार्ग के पथिक होते हैं और प्रभु की शरणागति में होते हैं और जीवन का सत्य जानते हैं कि प्रभु और श्री जी के सिवा कुछ सत्य नहीं है। फिर भी कभी-कभी क्षणभ क्षण भर के लिए इस अधम के मन में अश्रद्धा का विचार आ जाता है और मन बड़ा घबरा जाता है कि प्रभु ने सुना तो ये वो क्या सोचेंगे कि कैसा दास है यह और इस अधम को स्वीकार नहीं करेंगे।

बिल्कुल नहीं सोचेंगे क्योंकि भूल भुलैया का मार्ग उन्हीं का बनाया हुआ है। यह भूल भुलैया का मार्ग उन्हीं का बनाया हुआ है। अपने ब्रह्मानंद रूपी भगवनंद रूपी संपत्ति भूल भुलैया के मार्ग में रख दिया है। इसीलिए हम सद्गुरु का आश्रय लेकर के उनके बताए मार्ग पर चलते हैं कि हम भूल भुलैया में ना फंसे। तो हमारी जैसे छोटी मोटी त्रुटियां हैं, अश्रद्धा है या प्रभु से उलहना है या प्रभु से कभी नाराज हो जाना है। प्रभु इन बातों पर ध्यान नहीं देते। जन अवगुण प्रभु मान न काऊ दीन बंधु अति मृदुल स्वभाव बड़ा मृदुल स्वभाव हमारे प्रभु का है वो अपने जनों के द्वारा अगर चूक हो जाती है तो इस पर ध्यान नहीं देते रहती न प्रभु चित चूक किए की करत सूरत सह बार ही की प्रभु उसके हृदय की बात देखते हैं।

चूक करना नहीं चाहता पर मेरी माया से विवश होकर इससे चूक हो गई। प्रभु उस चूक को गिनते ही नहीं है। बड़ा करुणामय स्वभाव नहीं भगवत प्राप्ति किसी को ना हो। सबके जीवन में ऐसी बात आती है। कभी वो प्रभु से नाराज हो जाता है। जैसे छोटा बच्चा गिरा मां दौड़ के उठाई तो मां से नाराज होता है कि गिरने पर उठाने आए हो। जब मैं गिरने जा रहा था उस समय मुझे क्यों नहीं पकड़ लिया? ऐसे भक्त नाराज होता है। कहां थे उस समय जब मेरे अंदर विकार आकर मुझे नष्ट कर रहा था मेरे स्वामी प्रभु से ही वो नाराज हो जाता है।

कभी प्रभु से लड़ जाता है। तो ये जो बातें हैं जैसे छोटा बच्चा मां के बाल पकड़ कर खींच रहा है। नाराज हो रहा है तो मां हंस देती है। नादान बालक है। मां हंस दे। ऐसे ही हम प्रभु के सामने तो नादान है ना। हम कभी प्रभु से नाराज भी हो सकते हैं। हम कभी प्रभु से मान भी कर सकते हैं। क्योंकि प्रभु के सिवा हमारा कोई नहीं। तो फिर हमारा जो भी व्यवहार होगा प्रभु से ही होगा। तो इसलिए यह सोचना कि हमारी थोड़ी अश्रद्धा हो गई या थोड़ी नाराजगी हो गई या थोड़ा हम प्रभु के प्रति कड़वे हो गए तो प्रभु नाराज हो जाएंगे।

नहीं ऐसा नहीं है। हमारे प्रभु का स्वभाव ऐसा नहीं है। बहुत करुणामय स्वभाव है। बहुत करुणा विमुख भए निमशहु ना अकपा जब चितए तब वैसे सूरदास जी महाराज कह रहे प्रभु की तरफ पीठ कर लिया संसार की तरफ कुछ गलती हो गई हमसे। अब डर करके जब प्रभु की तरफ देखा तो वैसे मुस्कुराते मिले। वो कभी नाराज नहीं मिले। विमुख भए निमशहु न अकपा जब चितए तब वैसे इसीलिए गोस्वामी जी कह रहे मुझे पता है प्रभु मूरत कृपा मई है कृपा के सिवा और हमारे प्रभु अरे दूध में विष लगा के मारने जा रही है बाल गोविंद को तो उसके ऊपर कृपा करके परम पद देते हैं तो हम तो कहीं ना कहीं प्रभु को दुलार कर ही रहे कहीं ना कहीं प्रभु के आश्रित है वो हमारी छोटी मोटी गलतियों पर नाराज होने वाले नहीं हमारे प्रभु को ऐसे रिस नहीं आता है जल्दी वो तो बहुत कृपालु है रिस करके जिन्होंने प्रभु पर प्रहार किया उनको तार दिया प्रभु ने परम पद दे दिया हम अपने प्रभु के स्वभाव को जाने उनकी करुणा को जाने तो गुस्सा भी नहीं आएगी और अश्रद्धा भी नहीं होगी जी

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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