एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1284 · 2 जून 2026
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की जय समस्त संत संत हरि भक्तन की श्री वृंदावन धाम की सदगुरुदेव भगवान की जय डॉक्टर ऊर्जा सचदेवा जी हरिद्वार से जी महाराज जी श्री हरिवंश महाराज जी हम सबका जन्म हरि नाम जपने के लिए हुआ है।
परंतु हमें अक्सर ऐसा महसूस होता है कि कुछ और भी कारण अवश्य होगा। उस कारण को कैसे ढूंढे? मेरी जिंदगी का पर्पस क्या है? केवल जगना है बस। स्वप्न का जो दुख सुख है वह केवल जगने से जाएगा। ना आप स्त्री हो ना यहां कोई पुरुष है ना यहां कोई कर्तव्य है। स्वप्न का कोई कर्तव्य होता है क्या? बड़ा मेहनत किया। स्वप्न में जगे तब तब सब झूठा हुआ ना। स्वप्न में आपने 100 लोगों को भोजन पवाया और 100 लोगों को जान से मार दिया। जो जगने के बाद आपको क्या पुण्य लगेगा कि पाप लगेगा?
कुछ नहीं लगेगा। क्यों किया तो था स्वप्न में भंडारा किया स्वप्न में मारा तो क्या उस समय क्या झूठा लग रहा था स्वप्न में नहीं लग रहा था ना जग गए तब लगा ना तो उमा कहूं मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब सपना तो अब आपको लग रहा है और कोई कर्तव्य है तो ये स्वप्न में लग रहा है अगर जाग के देखो तो स्वप्न में एक आप ही थे ना कोई वस्तु था ना कोई व्यक्ति था ना दुश्मन था ना कोई दोस्त था यह पता पता तब चला जब आप जगे स्वप्न में जैसे हम कई बार कहा समुद्र में डूब रहा हो कोई अब उसको कैसे बचाया जाए बहुत से तैराक बुला लिए जाए नौका बुला ली जाए सब व्यवस्था कर ली जाए तो क्या स्वप्नी पुरुष को बचाया जा सकता है क्या जो स्वप्न में समुद्र में डूब रहा है कुछ उपाय नहीं करेगा उपाय एक करेगा उसको पकड़ के जला जगा दो ए ना एक बूंद पानी है ना वो डूब रहा है ना कोई परेशानी है समझ रहे हैं ना लेकिन उस समय समय उसको परेशानी है जब डूब रहा है।
जब बिना जगे उसको यह दुख से दूर नहीं किया जा सकता। ऐसे ही हम लोग अपने को स्त्री मान लिए पुरुष मान लिए। ये स्वप्न है। अब हमारा कर्तव्य बन गया कि पति की सेवा, पत्नी की सेवा, पुत्र की सेवा सब। अब यह पूरा स्वप्न चल रहा है। और जब आखिरी में यहां से तो ना कोई पति, ना कोई पुत्र, ना कोई कुछ जीव अकेला उड़ा। दुनिया में लाखों का मेला जुड़ा और हंसा जब जब उड़ा तो अब तो क्या कर्तव्य था? अब वो भूल करके फिर नाना प्रकार की माया का चिंतन करके अगले जन्म की व्यवस्था कर ली।
हमारा तो उद्देश्य यह है कि अपने कर्तव्य का पालन करो स्वांग की तरह। स्वांग में जैसे नहीं थोड़ी देर के लिए आप किसी की पत्नी बने या थोड़ी देर के लिए आप मित्र बने। थोड़ी देर के लिए आप जो भी बने तो बढ़िया स्वांग करते हैं ना तो डायरेक्टर इनाम देता है। पैसा देता है। ऐसे हम हमें भगवान ने एक स्वांग भेजा है। मान लो हमें गुरु का स्वांग दिया किसी को शिष्य का स्वांग दिया, किसी को प्रश्नकर्ता का, किसी को उत्तर देने का बहुत से स्वांग है। तो अपने स्वांग को अच्छी तरह निभाओ।
लेकिन स्वांग को स्वांग रहने दो। नाटक को नाटक रहने दो। रोल को रोल रहने दो। अगर आप जो एक घंटा किसी की पत्नी बनी स्वांग में और इसके पीछे तो आप उसे यही कहोगे मर्यादा में रहना। ऐसे ही ये 60 70 वर्ष 50 वर्ष का स्वांग मिला है। पिता का, पुत्र का, पत्नी का, माता का अलग-अलग। हमको इस स्वांग में कमी नहीं रहने देना। जो स्वांग है उसको यथावत करना है। पर ये ध्यान रखना है। स्वांग करने वाले को याद रहता है कि मैं सब कुछ नहीं हूं। मैं कुछ और हूं। केवल थोड़ी देर मंच पर मैं कर रहा हूं।
तो जगन्नाटक वैभवा इस संसार रूपी मंच में हमें जो स्वांग मिला है वो हम करें। पर हम यह याद रखें कि मैं स्वांग नहीं हूं। मैं सत्य सच्चिदानंद का स्वरूप हूं। ना स्त्री हूं ना पुरुष हूं। पर अब यह बिना जाने अगर स्वांग में फंस गए तो अगला स्वांग तैयार है। वो चाहे सूअर का मिले, कुत्ता का मिले, गधा का मिले, कौन योनि में जाना पड़े और अगर जान गए अपने आप को बढ़िया स्वांग किया दो बातें स्वांग बढ़िया और अपने को याद रखा कि मैं यह नहीं हूं तो डायरेक्टर जो है परमात्मा वो इस तुम्हें स्वांग से हटा देगा और अपनी लीला में दिव्य लीला में सम्मिलित कर लेगा।
अपने स्वरूप में समाहित कर लेगा। हमारा जन्म हुआ है अपने को जगाने के लिए, अपने को जानने के लिए, अपने को पाने के लिए। हम पराए में फंसे हैं। यह शरीर अपना नहीं है। यह मन अपना नहीं है। ये इंद्रियां अपना नहीं है। जगत के संबंध अपने नहीं। हमारा पूरा जीवन पराए पे जा रहा है। अपने पे नहीं। हम अपने को पाने के लिए, अपने को जानने के लिए, अपने आनंद के लिए हमारा जन्म हुआ है। अब हम शरीर आनंद को अपना मान रहे हैं। रुपए के आनंद को अपना मान रहे हैं। नाना प्रकार के रिश्ते भोगों के तो पर में फंस गए ना।
प्रकृति में फंस गए ना मना कष्टान इंद्रियाण प्रकृति स्थान का अब इसी से जीतना है। अब मन की देखो तो ये बहुत चाहते हैं। सबसे बड़ी चाहत है कि कोई हमें प्यार करे। सब जीव में पशु पक्षी में सबके अंदर क्योंकि भगवत अंश है ना तो प्रेम स्वरूप है ना तो लगता है कोई मुझे प्यार करे और वो मुझे जो लगता है वो शरीर को लेके है देखना शरीर को लेकर है कोई मेरा ऐसा साथी हो जो आजीवन केवल मुझे प्यार करे और मैं कभी मरूं ना देखो हमारी जो चाहते हैं मैं मेरे को कोई प्यार करे मेरा साथी ऐसा हो जो कभी बिछड़े ना और मैं कभी मरू ना।
तीन बातों पर ध्यान देना। जो जिस डिपार्टमेंट में जहां है वह सबसे बड़ा बनना चाहता है। यही भगवान का स्वरूप है। क्योंकि सबसे बड़े भगवान है। मरुना अविनाशी भगवान है। प्रेम करे कोई भगवान प्रेम समुद्र है। तो हम भगवान से ही प्रेम करके भगवान को ही पाकर के भगवान को ही जानकर के तृप्त हो सकते हैं। जगत को नहीं। जगत में यहां अपने को जो लगता है कि सामने वाला प्रेम करता है तो उसके लायक कुछ है इसलिए प्रेम करता है और जिस दिन आपसे बढ़कर कोई मिल जाएगा आपकी तरफ देखेगा नहीं जिस दिन आपके पास जो वो देख रहा है वो नहीं होगा तो उस दिन वो आपसे प्रेम नहीं करेगा लेकिन सब त्याग दे तो भी भगवान कभी अपने जन का त्याग नहीं करते प्रेम का निर्वाह तो सिर्फ भगवान करते हैं जगत में तो रोना पड़ेगा और ठोकरें लगेंग यहां कोई किसी को प्यार नहीं करता।
जब तक स्वार्थ की पूर्ति तब तक प्यारे रे क्यों ऐसा लगता है कि हम बाबा जी हैं हम ही को लगता है। आप सही बताओ संसार में सबको एक प्रेम की भूख है और वो किससे पूर्ण हो रही है? आप देखो बोला कहीं प्रेम की पूर्ति हो पा रही है क्या? अब क्या चाह रहा हूं वो निर्णय तो नहीं कर पा रहा पर उसको लग रहा है कि नहीं यार मतलब जो मैं सोच रहा था वो नहीं है जो मैं चाह रहा वो तब मिलता है जैसे केवट भगवान के जब चरण धो रहा है तब वो कह रहा है बहुत काल में कीन मंजूरी आज दीन सब विधि भल पूरी अब कछु नाथ न चाही मोरे नाथ अब मुझे नहीं चाहिए जिसके लिए मैं तड़प रहा था वो मिल गया अति आनंद उमग अनुरागा चरण चरण सरोज पखार जब भगवान के चरण मिले तब हृदय से निकला अब कछु दाथ न चाहे मो गोस्वामी जी कह रहे पायो परम
विश्राम राम समान प्रभु ना ही कहूं आज मैं परम विश्राम प्राप्त कर लिया क्योंकि मुझे राम जी मिल गए तो मुझे लगता है कि हमारे अंदर जो ये रहता है कि कुछ प्राप्त करें वो लौकिक नहीं होना चाहिए वो श्री भगवान होने चाहिए नहीं तो आज शरीर स्वस्थ है कल हो सकता भयानक कष्ट से पीड़ित हो जाए तो यावत स्वस्थ कलेवर याव दूर जरा जब तक तुम्हारा शरीर स्वस्थ है तुम भजन कर लो नहीं अस्वस्थ होने पर भजन नहीं होता फिर तो चिंतन उन्हीं का कष्ट का होता रहता है यहां दर्द यहां परेशानियां यहां अब अपने लोगों को क्या है बचपन से भगवान की कृपा से लगे रहे तो सारी बातें समझ में आ गई तो अब ये थोड़ी कि कष्ट है तो चित्त खींच लेगा जैसे तुम्हारे शरीर में कष्ट हो और मुझे पता हो ऐसे मेरे शरीर के कष्ट का उतना ही है जितना तुम्हारे शरीर के कष्ट का पता हो तो लगेगा नहीं बड़ा कष्ट है बस ऐसे ही लगता है और हर समय आनंद रहता है अगर भगवान से ना जुड़े होते तो दुर्गति हो जाती इसलिए हम सबसे प्रार्थना करते हैं अभी शरीर स्वस्थ है जितना बने उतना नाम
जप कर लो और इतना तो ज्ञान प्राप्त ही कर लो कि शरीर टिकेगा नहीं बाल्यावस्था नहीं टिकी तो यौवन अवस्था कैसे टिक जाएगी यौवन अवस्था गई तो बुढ़ापा आ गया भारी दुख दुख वाला फिर मृत्यु आ गया। इसलिए भजन करके पहले शरीर राग का त्याग कर दो। जीते जी जीवन मुक्त हो जाओ। खूब नाम जप करो। सत्संग सुनो और अपने कर्तव्य का पालन करो। इसी से काम बन जाएगा। भगवान बहुत कृपालु है। बिना भगवान की शरण के शुद्ध ज्ञान नहीं होता। सोई जाने जे देहु जनाई। जानत तुम्हें तुम्हें हो जाई।
भगवान से प्यार करो। भगवान का नाम जप करो। उन्हीं की शरण में रहो। विश्वनाथ जी दिल्ली से। जय जगन्नाथ जय विश्वनाथ जय जगन्नाथ जी बोलिए क्या प्रश्न है कर्म क्या है विकर्म क्या है अकर्मण्य क्या है कर्म को अकर्म और कर्म को कर्म योग में कैसे बदला जा सकता है अकर्म को कर्म योग भी कहा जाता है क्या हम कर्म की गति को कैसे जान सकते हैं कर्मणा गहनो गति पहली बात समझ जो हम वासनाओं से प्रेरित होकर के क्रिया करते हैं उसे कर्म कहते हैं। जो शास्त्र से प्रेरित होकर के क्रिया करते हैं उसे शुभ कर्म कहते हैं।
जो हम वासनाओं से प्रेरित करते हैं ना जैसे हमारे अंदर काम की, क्रोध की, लोभ की, मोह की वृत्तियां है तो उनसे पहले अंदर संकल्प विकल्प बनता है। तो जो क्रिया होती है वो कर्म बनता है। वह अशुभ हो जाता है। और जो शास्त्र सम्मत होता है वही काम शास्त्र सम्मत भोगा जाए। वही क्रिया शास्त्र सम्मत हो तो शुभ हो जाता है। शुभ और अशुभ यह जब तक होते रहेंगे तब तक हमारा जन्म और मरण होता रहेगा। अब पहली बात तो हमें निषिद्ध कर्म का त्याग करना है और शुभ कर्म का कर्ता भाव त्याग करना है तो अकर्म हो जाएगा।
कर्म होते हुए भी वो शुभ कर्म आपको बांध नहीं पाएगा। जैसे भगवान ने कहा अवश्य में भोक्तव्यम कृतम कर्म शुभाशुभम दो प्रकार के कर्मों की बात कही शुभ और अशुभ कर्म जो अकर्म है वो अकर्ता के द्वारा होता है कर्ता के द्वारा कही जो अकर्ता है क्या करता है गुणानगुण वर्तते मनुष्या पार्थ सर्वसा गुणों की प्रेरणा से प्रकृति जन्य करण और उन्हीं से क्रियाएं हो गई मैं दृष्टा मात्र हूं और शुभ कर्म कर्ता भाव रहित तो वह अकर्म हो गया और यह जीवन भर बड़े-बड़े महापुरुषों से भी होता रहता है।
शुभ कर्म कर्ता भाव रहित और जो अशुभ कर्म है वो तो वासना से प्रेरित कर्ता भाव से है ही है। लेकिन जो शुभ कर्म कर्ता भाव से वो भी बंधन कारक है। पुण्य छण मृत्यु के बसती लेकिन योग तो नहीं हुआ ना कर्म योग तब बनेगा जाके जब हमारा कर्ता भाव ना हो ना हमारा शरीर है ना हमारी इंद्रियां है यह सब भगवान की दी हुई है और यह सृष्टि भगवान की है परिवार भगवान का है इससे सेवा कर रहे हैं और वह सेवा धर्म भगवान को समर्पित है जब भक्ति मार्ग का भाव लेकर नाम जप करते हुए सारे सारे कर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए करते हैं तो बंधन कट जाता है या निष्काम भाव से संसार को भगवत स्वरूप मान करके और यह पूरा शरीर इंद्रियां सब भगवान की दी हुई आपकी थोड़ी है भगवान की दी हुई है ना ये भगवान की पूरी सृष्टि है तो प्रकृति के द्वारा जो हमारी सेवा बनी इस वो निष्काम भाव तो कर्म योग बन जाता है सुख दुख लाभहान जय पराजय इसमें समभाव रखने वाला और संपूर्ण निष्कामता हर क्रिया में वो कर्म योगी होता है।
प्रकृति का जितना भी कार्य हो रहा है प्रकृति से ही हो रहा है। कभी देखा है कभी स्वरूप में कभी कोई कर्ता भाव है क्या? स्वरूप में कभी कोई हलन चलन, कोई अभाव, कोई चाहत स्वरूप में कभी नहीं। आप थोड़ा समझ पा रहे नहीं हमारी बात। जितना अंतःकरण और शरीर में है। अंतःकरण और शरीर यह माया द्वारा रचित है। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर और आप जो हैं इन तीनों शरीरों को जानने वाले हैं। आपके द्वारा इन तीनों शरीरों में हलचलन हो रही है। पर आप करता नहीं है। जो सब कर परम प्रकाशक जोई जैसे विषय का प्रकाश इंद्रियों से इंद्रियों का प्रकाश मन से मन का प्रकाश बुद्धि से और जो बुद्धि का भी प्रकाशक है वह आप है आत्मा सबकर परम प्र लेकिन असंग है वो कोई कामना नहीं है तो कामना नहीं है जो हमारे स्वरूप में उसी बात को हमको साक्षात्कार करना है ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा सोचत आकांक्षा और कामनाएं कितनी है अंतकरण में और उन्हीं से प्रेरित होकर कर्म हो रहे हैं।
कोई शुभ कोई अशुभ और वह उसका कर्ता बन रहा है तो यही पुनरपि जननम पुनरप मरणम पुनरपि जननी जठर शयनम अब अकर्म हो जाए कर्म होते हुए भी अकर्म हो जाए फल देने लायक ना रह जाए वो होता है निष्काम भाव से भगवत समर्पित तो जैसे भुना हुआ दाना पुनः उसमें अंकुरण नहीं होता ऐसे जो कर्म भगवत अर्पित होते हैं या जो कर्म निष्काम भाव से किए जाते हैं वो योग बन जाते और ऐसे जो कर्म किए जाते हैं वह बंधन कारक होते हैं। उसे अवश्य में भोक्तव्यम कृतम कर्म शुभा अशुभम शुभ और अशुभ लेकिन वही कर्ता भाव त्याग करके अब कर्ता भाव ऐसे त्याग देगा बिना अंतःकरण पवित्र हुए बिना सद्गुरु का सेवन किए बिना तत्व ज्ञान हुए कर्ता भाव छूट जाएगा क्या लाख समझाओ लेकिन रहता है ना मैं खा रहा हूं मैं देख रहा हूं मैं पी रहा हूं मैं चल रहा हूं मैं और वो पुरुष कैसा होता है वो देखता हुआ सुनता हुआ खाता हुआ पीता हुआ चलता हुआ भोगता हुआ भी कुछ नहीं करता विषय ग्रहण तो मुंच हुआ अब यह टेढ़ी खीर के लिए
ही साधना बताई गई है कि प्रणिपातेन महापुरुषों के सामने जाओ साष्टांग दंडवत करो और उनके द्वारा बताई हुई साधना को करो जैसे ज्ञान मार्ग में चलना है तो विवेक सत असत का पूर्ण निर्णय करने वाला शुद्ध विवेक वैराग्य लोक परलोक के समस्त भोगों से वैराग्य शम इंद्रियों का निग्रह दम मन मन का निग्रह ततीक्षा महान सहनशील समाधान चित्त का परमात्म चिंतन में निरंतर रमण करना मुमुक्षता इसी जन्म में मुझे भगवत प्राप्ति हो मैं मुक्त हो जाऊं ये संपत्ति होना आवश्यक है भक्ति में निरंतर भगवान कह रहे मत मदगत प्राणा बोधता परस्परम कथित माम नित्यम त्यंत च रमंत तेशाम सतत युक्त नाम भजता प्रीति पूर्वकम ददा बुद्धि योगंतम इन माम पंत हो गया बुद्धि योग मेरे में चित्त अर्पित कर दे मेरे में प्राण अर्पित कर दे मेरी ही वार्ता कर मेरा ही चिंतन कर और सतत मेरा नाम जप कर अगर सतत जप करेगा तो तुम्हारी बुद्धि मेरे में स्थित हो जाएगी मैं तुम्हारी बुद्धि में स्थित हो जाऊंगा योग का मतलब ये होता है परमात्म स्थिति भगवान कह रहे हैं मन आदसो मैं
बुद्धि निवेश ये चाहे कर्म योग से चलो तो शरीर इंद्रिय अंतःकरण से संबंध रहित होना है चाहे ज्ञान योग से चलो तो इससे अलग हो रहा है और चाहे भक्ति योग से चलो तो इसमें समर्पण योग आ जाता है। येत सर्वाण कर्माण सनस मत पराहा अनन्य योग माम ध्यासते ते समुदता मृत्यु संसार सागरात समर्पित हो जाए बिना भगवत समर्पित हुए बिना निष्काम हुए बिना स्वरूप बोध हुए योग नहीं बनता है क्योंकि वो कामना वासना इच्छा इसी को लेकर के कर्म होते हैं और फल पर इतनी आसक्ति होती है कि अनुकूल आया तो हर्षित प्रतिकूल आया तो शोकित वो द्वंदों के अंतर्गत रहता है।
लेकिन द्वंद विमुक्तता यह स्थिति तो योगी की होती है। कर्म योगी की और जो सुख दुख समय कृत्वा लाभा लाभ जय जय यह कर्म योगी का भाव होता है। सुख दुख में लाभहानि में जय पराजय में समान भाव रहता है। तो जो कर्म की बड़ी सूक्ष्म गति है। पर मोटा-मोटा इतना समझ लीजिए कि जब तक करता है तब तक उसका योग नहीं हो सकता। वो बंधन का रखिए। चाहे उसे अकर्म कहो, चाहे विकर्म कहो, चाहे शुभ कर्म कहो, चाहे निषिद्ध कर्म कहो। कर्ता है वो बंधा हुआ है। ऊंचेचे लोकों में कर्ता हटा सब खत्म।
जैसे भुना हुआ बीज कभी अंकुरित नहीं होता। ऐसे उसका कर्म से भागने से कर्ता हटेगा कैसे? भगवान की एक एक सेकंड में चिंतन वृत्ति बना लो। वो कह रहे हैं मत। मन आद बुद्धिम निवेश मेरे में मन बुद्धि लगा दो साफ भगवान कह रहे हैं अनन्य चिंतन ठेका मेरा है योग युक्त मैं कर दूंगा तो काहे परेशान हो तेशाम सतत युक्तान भजताम प्रीति पूर्वकम राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण कृष्ण नाम जप करो और ये भाव ध्यान में तो इतना तो आ ही जाता है जब परमार्थ में चलोगे कि शरीर तुम्हारा रचा तो है नहीं ये इंद्रियां तुम्हारी रची तो है नहीं ये मन तुम्हारा रचा तो है नहीं ये जगत तुम्हारा रचा तो है तो व्यर्थ का अह अहंकार काहे करें।
एक ट्रेन चल रही है। उसमें सब बैठे हुए हैं। एक आदमी दौड़ रहा था डिब्बे में। उसने बोले क्यों दौड़ रहा है? बोले अमुक स्टेशन जाना है। बोले बा रे ट्रेन चल रही तू बैठ जा। तू बैठ जा। ये गुणों का चक्र चल रहा है। गुणानुगुण वर्तन थे। सब दौड़ रहा है। अंतःकरण एक क्षण भी बिना क्रिया किए नहीं रह सकता। शरीर हाथ पैर बांध दो तो अंतःकरण से क्रिया एक क्षण में वह हर समय और जो समाधस्त हो गए महापुरुष वो क्रिया रहित है। क्रिया करते हुए शरीर से हो रही पर वो करता नहीं है।
बड़ा मतलब इस समय हमको बहुत बड़ी आवश्यकता पहले अंतःकरण शुद्धि की है। और हमारे अन्य साधनों में अंतःकरण शुद्ध होने में बहुत समस्या है। और भगवन नाम जप बहुत जोर कलयुग में इसीलिए यह कलिकाल मला यतन मन कर देख विचार से श्री रघुनाथ नाम बिन नाही नाना आधार किस साधन की जिस साधन की तरफ देखो विक्षेप ही विक्षेप कलयुग डाले हुए हैं व्यभचार का इतना अंदर मांग बढ़ रही है व्यक्तित्व में आप सब बैठे हो आप सब बैठे तो भगत ही तो बैठे हो भक्त होते हुए भी आप देखो मन में कितना इंद्रियों में व्यभचार दोष है मांग अंदर की कल कलयुग का प्रभाव देखो।
युग धर्म का प्रभाव रसेंद्रिय का अपना स्वभाव देख लो। जनेंद्रिय का अपना स्वभाव देख लो। नेत्रेंद्र का अपना स्वभाव देख लो। हमें लगता है कलिकाल है। नाम जप करो और जितने कर्म करो उनको भगवान को समर्पित करते जाओ। जो जो समय है समय के अनुसार या एक-एक वृत्ति के अनुसार भगवान को समर्पित कर दो। सब मंगल हो जाएगा। चाहे वह हमसे अगर भूलचक से अशुभ भी हो जाता है। जैसे आग में डाला गया चंदन या लोहा या विष्ठा तीनों आग स्वरूप हो जाते हैं। हो जाते हैं ना। आग भेद तो नहीं रखती ना कि ये चंदन है, यह लोहा है और यह विष्ठा है।
तीनों को अपना स्वरूप प्रदान कर देती है। ऐसे सांप भगवान के चरणों का आश्रय लेकर के सब कुछ समर्पित कर दो। ये तो शर्मा करण यत करोशी भगवान कह रहे ना यत करोशी निपट जाओगे हम कहां तक भेद लगाएंगे कभी-कभी सत्य बोलना भी नर्क का हेतु हो जाता है कभी-कभी असत्य बोलना भी बड़ा उत्तम लोकों में जाने का असत्य बोलना भी बड़ा सूक्ष्म विषय कर्म का है। कई ऐसी घटनाएं हमने शास्त्रों में पढ़ी कि एक गौ वध के लिए गौ के पीछे जा रहे और सत्य बोलने वाले थे माला चला कहा गौ किधर गई बोले वो है गौ नरक गए किसी के प्राण बच रहे हो आप झूठ बोल दिए तो आपको उत्तम कई बार हिंसा करने वाला भी वह बड़ा पवित्र हो गया हिंसा करने वाला मतलब तो कर्म की बड़ी सूक्ष्मता यही पूछ रहे थे द्रोपदी जी भीष्म जी से क्या यह धर्म है तो कहते थे धर्म का सूक्ष्म स्वरूप युधिष्ठिर जानता है बेटी बड़ा सूक्ष्म स्वरूप धर्म का है ऐसे कर्म का बड़ा सूक्ष्म स्वरूप है सनकादी से एक बार निमी जी ने प्रश्न किया था वो मौन हो गए थे उत्तर नहीं दिया वही प्रश्न जब नव योगेश्वरों से किया भागवत में तब वो उत्तर दे रहे हैं तब उन्होंने पूछा कि पहले मुझे बताओ सनकादी ने क्यों नहीं बताया बोले उस समय आप अनाधिकारी थे।
आज आप अधिकारी हुए हैं तो आप जो प्रश्न कर रहे हैं उसका मैं उत्तर दे रहा हूं। भागवत में बड़ा वर्णन है और गीता जी में बड़ा सुंदर वर्णन है। तो हम कर्म योग के द्वारा हम भक्ति योग के द्वारा हम ज्ञान योग के द्वारा तीनों के द्वारा एक काम जरूर सब करते हैं। शरीर संसार से राग रहित होकर परमात्मा का चिंतन चाहे वो ब्रह्म रूप में हो, चाहे भगवान रूप में हो और चाहे वो परमात्मा रूप में हो। योगी परमात्मा कहता है, ज्ञानी ब्रह्म कहता है, भक्त भगवान कहता है। और करना सबको यही है।
राग रहित होना है इस शरीर और शरीर की क्रियाओं से और भगवान का चिंतन तभी परमात्म प्राप्ति होगी। निष्काम भाव से भगवत प्रीतर्थ किया हुआ कर्म कर्म योग हो जाता है जो भगवत प्रीतर्थ होता है और जो अपनी दुर्वासना से शास्त्र विरुद्ध होता है अशुभ कर्म होता है और जो हमारी शास्त्र विधान के तस्मात शास्त्रम प्रमाणते कार्या कार्य व्यवस्थित जो शास्त्र प्रमाणित होता है वो शुभ कर्म हो जाता है और जो भगवत समर्पण के लिए होता है वो हमें संसार सागर से जरूर पार कर देता है तो निष्काम कर्म भगवत समर्पित कर्म या ज्ञान के द्वारा कर्ता रहित गुणानगुण वर्तते सब कर्मकर्म हो जाते हैं।
कोई भी उसे दंड नहीं दे सकते। कई कई जगह ऐसा होता है कि जो पुण्य कर्म माना जाता है वो पाप हो जाता है। कभी-कभी पाप कर्म भी पुण्य कर्म बन जाता है। बहुत शास्त्र में कर्मों की सूक्ष्मता का वर्णन है। इसलिए हमें तो इतना लगा है कि भगवान की शरण में होकर नाम जप करते हुए और जितना हमें लग रहा है कि ये पाप कर्म उसका त्याग करके सत्कर्म जो कर रहे हैं वो भगवान को समर्पित कर दें तो इसी जन्म में हमें भगवत प्राप्ति हो जाएगी। क्यों? समझ रहे हो? हां। क्योंकि बड़ा सूक्ष्म विषय कर्म का है।
बड़ा सूक्ष्म विषय है। उसके लिए जो हमें भागवतिक बुद्धि चाहिए वो भगवान ही देते हैं। ददाम बुद्धि योगमतम ये मामयाते तो हम खूब नाम जप करें और जो कार्य करें वो भगवान को समर्पित करें और जो जानते हैं कि ये पाप कर्म है वो भूल करके ना करें तो भगवान कृपा करके बुद्धि योग दे देते हैं। फिर वो अपने आप निर्णय होने लगता है। फिर जैसे अर्जुन के रथ का लगाम भगवान पर पकड़े घोड़ों की बैठे ना ऐसे यही भगवान हृदय में बैठ जाते हैं। फिर उससे गलती नहीं होती। भगवान ही ज्ञान स्वरूप होकर बैठ जाते हैं और वो संभाल लेते हैं।
तब एक-एक सूक्ष्म बात समझ में आती है। ऐसे बहुत बुद्धि मलन है। बहुत स्थूल बुद्धि हो गई। भोग बुद्धि हो गई। सोचो कामना के बिना हम रह कैसे सकते हैं? ऐसी बुद्धि निर्णय दे रही। कर्म करना, कर्तव्य पालन करना, समाज सेवा करना लेकिन भगवत प्राप्ति के लिए वह वासना की पूर्ति के लिए नहीं। लेकिन हमें लग रहा है कि 100 में कोई एक आध भले विचारवान हो नहीं तो 100 के 100 ही केवल वासना पूर्ति के लिए कर्म हो रहा है। भगवत प्राप्ति के लिए नहीं। कर्म योग नहीं बन रहा। कर्म बन रहा है।
निष्काम भाव से कहां? अगर हम किसी को पानी भी पिला देते हैं तो आशा रखते हैं। धन्यवाद बोले। नहीं आशा रखते। तो फिर कर्म निष्काम कहां हुआ? तो हमें लगता है कि इस कलिकाल में भगवान का नाम जप और जो कर्म जैसे वो भगवान को समर्पित तो भगवान हमारी बुद्धि शुद्ध कर देंगे फिर हमें समझ में आ जाएगा कि हमारा कल्याण हमारा भगवत प्राप्ति या तत्व ज्ञान बिल्कुल सहज सरल हो जाएगा। नहीं तो बहुत कठिन है। छोटी-छोटी ऐसे अपराध की प्रवृत्तियां है कि जन्म भर के किए हुए सुकृत कर्म सब भस्म हो जाए।
मान लो एक वैष्णव निंदा कर दो तो किए सुकृत बहु जन्म के क्षण में डायरेक्ट एक कर्म सारे कर्मों को भस्म कर देगा जितने सुकृत भगवत प्राप्ति तो अत्यंत दुर्लभ इसलिए कलयुग में या हर युग में भगवान के चरणों का आश्रय और भगवान के भगवत प्रेमी महात्माओं से सत्संग चर्चा और नाम जप और सारे कर्तव्य कर्म घर परिवार मकान नौकरी जितना भी जो वो सब भगवान को समर्पित तो इसी जन्म हमें भगवत प्राप्ति हो जाएगी अगर हमारी बात समझ में आ रही हो समझ में आ रही अंबिका पांड्या जी कोलकाता से राधेधे राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में सादर प्रणाम महाराज जी भक्तमाल के भक्तों जैसा भगवत प्रेम और भगवत शरणागति हमारे हृदय में कैसे जागृत हो सकती है?
शरणागति तो तभी जागृत होगी जब भगवान व्यवस्था कर दें ऐसी कि शरणागति के लिए हमारा मन तैयार हो जाए। वो भगवान की व्यवस्था से होता है। जब तक मनमानी भोग भोगने को मिलते हैं। जब तक मनमानी यार मित्र यहां हमारे हैं। जब तक मनमानी हमारी हो रही तो भगवान की शरणागति नहीं हो सकती। शरणागति तब होती है जब अन्य कोई हमारा ना रह जाए। हमारे मन का बड़ा चिपकु स्वभाव है। वो वस्तु व्यक्ति, स्थान जहां जो कुछ मिल जाए उससे अपनापन कर लेता है। जब सब जगह से हार होती है तब भगवान की शरणागति होती है।
असली में पक्का समझना। द्रुपदी जी महान भगवान की भक्ता हैं और कोई मनुष्य से नहीं प्रकट हुई। यज्ञ कुंड से प्रकट हुई हैं। देवी हैं। फिर भी शरणागति में कमजोरी रही। जब दुशासन बाल पकड़ के घसीट करके सभा में ले गया। तब उनके मन में भगवान श्री कृष्ण के बल की याद नहीं आई। पांच पांडव भीष्म पितामह आदि धर्मात्मा इन सबकी याद आई कि भला इनके बीच में हमारे साथ दुर्व्यवहार कैसे हो सकता है जिसके पंच महाबली ऐसे पांडव पति हैं पर खाली गया यह सोच पांडव सर झुकाए बैठ गए भीष्म आदि महापुरुषों ने कोई उत्तर नहीं दिया बस इतना कहते थे बेटी धर्म का बड़ा सूक्ष्म स्वरूप है और युधिष्ठिर अच्छी तरह से जानता है रक्षा वाला कोई अपने हाथ से पकड़ ली।
अब भी श्री कृष्ण के बल की याद नहीं आई। फिर दांत से पकड़ ली। जब देखा कि अब महाबली दुशासन के द्वारा एक झटके में दांत से वस्त्र हट जाएगा और मैं निर्वस्त्र हो जाऊंगी। महाबल की याद आई। हे श्री कृष्ण द्वार अब शरणागति है अब शरणागति है जो शरणागति है वो एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास एक राम घनश्याम हित चातक तुलसीदास चातक की तरह अपने इष्ट देव के प्रति पूर्ण समर्पण एक भरोसा सा एक बल एक आस एक विश्वास अभी हमारे कई भरोसे कई विश्वास कई मित्र कई ना कितने कितनों के सामने बोला है कि हम आपको प्यार करते हैं ये हम प्रभु से भी बोलते हैं और जगत से भी बोलते हैं तो मोह कपट चल छिद्र न भावा इसलिए प्रभु नहीं मिल रहे ये शरणागति मात्र ही भगवान का प्रादुर्भाव करने के लिए समर्थ है जे ही द्रोपदी शरण में हुई तो यही वस्त्रावतार भगवान का हो हो गया ना देखो गजेंद्र कब पुकारा भगवान को जब सब तरह से हार गया यह जीव का स्वभाव है पहले हाथी हाथिनियों का बल फिर अपना बल और जब देखा कि अब सूंड डूबने वाली अब तो कोई बल नहीं तो पुकारा हरि यही जीव की दशा है जब तक आसपास पड़ोस मोबाइल नंबर कुछ बल रहता है तब तक हरि को नहीं तो हमें लगता है शरणागति की व्यवस्था भगवान ही करते हैं।
भगवान कृपा करें और मेरे इस अज्ञान को दूर कर दें कि मेरा कोई है इस जगत में और यह हमारे दिमाग में बात आ जाए मेरे तो गिरधर गोपाल दूस दूसरो ना कोई बस ये दूसरा जो है यही शरणागति ल चाहे वो व्यक्ति हो चाहे वस्तु हो चाहे स्थान हो कुछ है कुछ दूसरा जो कुछ है वही बाधा है द्वैत ही बाधा है दूसरो ना कोई मेरे तो गिरधर गोपाल अब भगवान से प्रार्थना करें कि मेरे मन को घेर कर आप अपने चरणों की शरण में ले लीजिए दूसरा प्रश्न है प्रेम क्या है प्रेम प्राप्ति भगवत प्रेम प्राप्ति कैसे होती है हां पहले पहले सोपान पे कदम रखो शरणागति शरणागति का स्वरूप क्या है बोले तदपिता अखिलाचारिता त स्मरण परम व्याकुलते थे भगवान को समस्त कर्म समर्पित करके हर समय भगवान की स्मृति में भगवान की स्मृति से बढ़कर कोई साधना नहीं है।
पूरी गीता जी सुनने के बाद गीता का प्रारंभ शरणागति से होता है। शिष्यस्तम साधिमाम तम प्रपनम यहां से और पूर्णता होती नष्टो मोहा स्मृति लब्धा तत प्रसाद मयाचिता क्या प्राप्त हुआ स्मृति तो हर समय जो भगवत स्मृति में है उसका संसार बंधन नष्ट होता है यस स्मरण मात्रे जन्म संसार बंधनात विमुचते नम तस्मै विष्णवे प्रभु विष्णवे जिनका स्मरण मात्र जन्म मृत्यु के प्रवाह को रोक देता है। उन भगवान की स्मृति हमारे अंदर पहले जागृत हो। मधुर मधुर स्मृति आठों पहर जैसे गंगा की अखंड धारा समुद्र में जा रही ऐसे हमारे चित्त की सब प्रवृत्तियां सब वृत्तियां एकमात्र भगवान में बोले किसी की है ऐसी वृत्तियां बोले हां गोपी जन यथा ब्रज गोपिका नाम मुरारी पादार्पित चित्तवत्त एक एक वृत्त भगवान में तब प्रेम प्रकट हो अभी तो बहुत बाधाएं हैं अभी तो शब्द स्पर्श रूप रस गंध रूपी जाल माया का जो है पांच ज्ञानेंद्र्रियों सहित जो मन इनके भोग में है इसी से नहीं निकल पाया।
अभी इसी का राग नहीं छूटा तो प्रेम तो बहुत ऊंची बात है। पहले हम प्रयास करें शरणागति का और हम प्रयास करें अखंड भजन का। फिर अपने आप ही प्रेम रूपी महान सिद्धि अपने आप जागृत होती है। या गुण साधन ते नहीं होई। तुम्हरी कृपा पाओ कोई। तो नाम जप पर किसका प्रश्न था? नाम जप पर ध्यान दो। अधिक नाम जप करो और भगवान की शरणागति में रहो। हे नाथ मैं आपकी शरण में हूं। आपके सिवा हमारा कोई नहीं और खूब नाम जप करो। इसी से सब काम बन जाएगा। नाम ही प्रेम मूल यह नाम है। प्रेमी रसिक जपतिहा नाम।
प्रेम मगन निज बन विश्राम। जितना नाम जप करोगे उतना ही प्रेम। प्रेम मूल यह नाम है। प्रेम का मूल क्या है? नाम। जितना नाम जप करोगे भजन करोगे उतना ही प्रेम जागृत होगा उतने ही हृदय निर्मल होगा उतनी भगवान की शरणागति होगी अगर भजन नहीं है तो सब वेद शास्त्र कंठस्थ कर लो फिर भी कल्याण नहीं होगा भजन नाम जप जरूरी है नाम जप के बिना ककाहरा ना पढ़े हो राम राम राधा राधा कृष्ण कृष्ण हरे हरि जपने लगे सब ज्ञान हो जाएगा बहुत समुद्र से पार हो जाएगा सब कुछ हो जाएगा और भगवान का भजन नहीं है और खूब साफ ज्ञान वैराग्य खूब काम नहीं बनेगा।
माया ऐसे थप्पड़ आ के गिरा देगी। नाम जप भगवान नाम संकीर्तन भगवान नाम जप ये जीव के लिए अमोख बात है। अमोख बात है। जिसके दिमाग में बैठ जाएगा तो जान लो अनंत जन्मों के पुण्य हमारे फलीभूत हो गए। अगर यह दिमाग में बात बैठ जाए कि निरंतर नाम जप और भगवान के भरोसे हो जाना। यही भव समुद्र से पार होना। यही भगवान से प्रेम करा देगा। जो चाहोगे प्राप्त हो जाएगा। इ परलोक सकल सुख चा पावत मेरी सो भैया कृष्ण गुण संू कृष्ण के गुणों का गायन करो नाम जप करो इस लोक में भी सुखी रहो परलोक में भी सुखी रहो प्रभु के दास सब जगह सुखी रहते हैं उदास नहीं होते दामिनी रघुवंशी जी राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी ये कह रहे हैं कि एक बहुत अच्छे संत थे उन उनके प्रति इनका दोष दर्शन हो गया था सभी जने कहते थे वो बहुत अच्छे हैं बट ये विश्वास नहीं करते थे इनके अपराध बन गया बट अभी वो इस धराधाम पे नहीं रहे तो इनके मन में एक ग्लानी सी है कि मैं उनके प्रति दोष दर्शन कर लिया।
इससे मैं कैसे मुक्त हो पाऊं? उन्हीं से प्रार्थना करो। उन्हीं का ध्यान करके उन्हीं से प्रार्थना करो। वही क्षमा करेंगे तब ऐसा है। देखो हमने कई बार बात स्वाभाविक चर्चा में बहुत इसे ध्यान से सुनना। शुद्ध सोने का कोई आभूषण नहीं बनता। पहली बात समझ लो। कुछ ना कुछ मिलावट होती है तभी वह आभूषण बनता है। क्यों? ऐसा होता है ना? तो यह जो मनुष्य शरीर बना है यह मिलावट से बना है। पाप और पुण्य। पुण्य का शरीर जो होता है वो देवताओं का होता है। पाप का शरीर जो होता है वो नारकी पुरुषों का होता है।
जो नरक की यंत्रणा भोगते हैं। और जो मृत्यु लोक में शरीर मिलता है वह पाप और पुण्य मिश्रित होता है। किसी का भी हो यह बनाई मिलावट से है। तो दोनों है दोनों का है। तो इन दोनों के आचरणों के संस्कार भी हैं। हम चल रहे हैं भजन के लिए। अभी वो पहुंचा तो नहीं और अगर पहुंच गया है तो फिर जैसे भुने हुए चने में कभी अंकुरण नहीं हो सकता। ऐसे न स्वात्माराम विषय मृग तृष्णा भ्रमति आत्माराम पुरुष कभी विषय मृग तृष्णा में भ्रमित नहीं होता। पर अगर वह सिद्ध नहीं हुआ, भगवत प्राप्त नहीं हुआ तो गलतियां होना स्वाभाविक हो सकती है।
कम ज्यादा अलग बात है। तो चलने वाला ही तो फिसल सकता है। चलने वाला ही लड़खड़ा सकता है। तो हम लोगों को चाहिए कि अगर हम चलने वाले साधक को देखें तो उसको इस भाव से प्रणाम करें कि वाह रे वीर जहां सैकड़ों लोग परास्त होकर मुंह भरा गिर जाते हैं वहां तो लड़खड़ाता हुआ ऐसा ही पर चल तो रहा है। हमें दोष दर्शन वहां भी नहीं करना और जो सिद्ध हैं जो भगवत प्राप्त महात्मा जन है उनकी बाह्य चेष्टाएं ऐसी होती है जिनको हम अपनी मानसिक बुद्धि से नहीं समझ सकते तो हमें दोष दर्शन नहीं करना चाहिए जैसे एक वयोवृद्ध महात्मा बीमार शरीर अब उनकी सेवा में माताएं बहने कोई था ही नहीं तो वही उठाना वही उनको सोचाना वही अब उन पर एक साधक की दृष्टि गई तो गुरु भाव रखते थे तो उनकी अंदर भाव आया कि स्त्रियां छूती हैं महाराज अब मान लो वयोवृद्ध तो ऐसे टंग करके ऐसे ऐसे सारा भजन उनका खत्म हो गया सोचने मात्र से क्योंकि अब जैसे मान लो अपने पिता की पुत्री सेवा करें अब भयो वृद्ध संत है उनको उठाना बैठाना तो वैसे जैसे अब वहां स्त्री पुरुष भाव तुम्हारे अंदर देखने में उनके अंदर तो एक मेरा मेरा भगवान इस रूप में सेवा कर रहा है।
वो उनका सारा भजन तो उन्होंने संतों से पूछा कि मेरा चिंतन भजन सब बंद हो गया। तो उनका वैष्णव अपराध बना। उनका हम किसी वैष्णव का तो ऐसा अपराध पर उन्होंने कहा गुरु जी के प्रति ऐसा भाव हो गया कि ऐसा तो उन्होंने कहा जल्दी उनसे क्षमा मांगो। नहीं कोई उपाय नहीं है। बाद में जलते रहोगे कुछ उपाय नहीं रहेगा। उन्हीं से जिसका अपराध बना वही क्षमा कर सकते हैं। तो हमें लगता है कि पहली बात तो संतों में दोष दर्शन करना ही नहीं चाहिए। और अगर कहीं दोष दर्शन हो भी रहा है तो हमें यह सोचना चाहिए कि भगवान के जन बहुत बड़े के जन है।
आज थोड़ी कमी रह गई है तो कल भगवान इसको भी पूरी कर देंगे। हटा देंगे। भाई भगवान की शरण में है। देखो जन्म से अब मान लो आज ही कोई बाबा जी बना है तो अब आपको तो पता नहीं कि आज ही बना है तो उसमें सांसारिकता तो होगी ही क्योंकि वो धीरे-धीरे ऊंचाई पर चढ़ेगा। अब आप अगर उसके प्रति दोष दर्शन कर लेंगे तो आपका मार्ग रुक जाएगा। उसका तो चलता रहेगा। तो इसलिए हमें लगता है हम दोष दर्शन ना करें। किसी से भी अगर हमारा मिलान हो और उसमें हमें दोष दिखाई दें तो अपने को दूरी बना लेनी चाहिए।
लेकिन उसकी निंदा नहीं करनी चाहिए। अपने को नहीं सूट कर रहा संग आपका और भी है हम आगे देखेंगे पर निंदा करने की जरूरत नहीं रहे। निंदा करने से फिर अपनी हानि हो जाएगी। हो सकता है वो भी नए-नए भगवान के मार्ग में चले तो उनमें कमियां हो सकती है। वो अपनी सुधार और नए-नए क्या बड़े-बड़े पुराणों को भी माया परेशान कर देती है। शिव विरंचिका मोह को है वो पुराण। बड़े बड़ों को मोहित कर लेती भगवान की माया। बहुत कठिन है। संसार बखशने वाला नहीं भाई। 50 साल ब्रह्मचर्य रहे।
50 साल लड़ते रहे माया से और पांच मिनट फेल हो गए तो 50 साल की लड़ाई वाली बात तुम्हारी कोई नहीं देखेगा। 5 मिनट की फेल होने वाली बात देख के तुम पर प्रहार कर देगा। कोई ऐसा नहीं है कि यार 50 साल से ये लड़ रहा है माया से। आज चूक हो गई है। निकलो। चलो आगे बढ़ो। कोई क्षमा नहीं करेगा। उसी समय तुम्हें दंड देगा। इसलिए बाबागिरी बहुत कठिन बात है। अरे सोचो कितना कष्ट सहते संत लोग आप क्या जानो संतजन कितना क्या केवल कपड़ा मिल जाना भोजन मिल जाना यही सारी बात होती है क्या अरे अंदर तुम देखो ना अपने अंदर देखो जो तुम्हारे अंदर है वो उनके अंदर भी तो आता है काम का वेग क्रोध का वेग लोभ का वेग हर तरह कोई प्यार से बात नहीं करता कोई प्यार से बात नहीं वो तो जब आगे वैभव प्रकाश होता है तो सब नहीं साधना काल में कोई प्यार से गाली मिलती है अपमान मिलता है कई कई दिन भूखे रहना कष्ट सहना देख नहीं सकते आप अगर देख रहे थे बाबा जी तू कैसे देख रहा है इधर देख नहीं सकते संसार और वह फिर जब कष्ट सहकर भगवान को तब सारा संसार झुकता है उसके आगे ले झता है तो इसलिए हमें लगता है संतों में दोष दर्शन तो करो मति देखो कुछ होते हैं जो इस वश का प्रयोग केवल वासना पूर्ति के लिए करते हैं वो एकदम पाखंड अलग होता है लेकिन जो सच्चाई से चलता है तो चढ़ने वाला ही फिसल सकता है दौड़ने वाला ही गिर सकता है और गिरने वाला ही उठकर लक्ष्य को प्राप्त करता है।
तो हमें लगता है दोष दर्शन नहीं करना चाहिए और अगर दोष दर्शन हो रहा है तो हमें हट जाना चाहिए। निंदा नहीं करनी चाहिए। अगर हम निंदा नहीं करेंगे तो हमारा मार्ग पुष्ट हो जाएगा। वो भगवान के जन है तो साम दाम दंड भेद से भगवान एक दिन उन्हें सच्चा भगत बना लेंगे क्योंकि भगवान की शरणागति व्यर्थ नहीं जाती। पर हमको अपने बचाव के लिए किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। तो आप उनहीं संत का ध्यान करते हैं। उन्हीं से प्रार्थना कीजिए। वो भगवान के स्वरूप हैं। जरूर क्षमा कर देंगे।
संत बड़े दयाल होते हैं। जी राजीव कुमार शर्मा जी राधे-राधे राधे-धे महाराज जी महाराज जी दुनिया में बुराई क्यों है? भगवान का बगीचा है। भगवान के बगीचे में तीन प्रकार के बीजों का एक सतोगुणी एक रजोगुणी एक तमोगुणी कहीं तमोगुण की लीला हो रही है। कहीं सतोगुण की कहीं रजोग आप क्या देखना चाहते हो? भलाई भलाई हो महाराज जी आप देखो भलाई भलाई तो भलाई दिखाई देगी। आपने बुराई का चश्मा क्यों पहन रखा है? बुराई है ही नहीं। गोस्वामी जी ने चश्मा अपना बदला तो देखा जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम मैं जानी सकल राम मैं जानी बंदो सबके पद कमल सदा जोर जुग पानी गोपी जनों ने देखा जित देखूं तित श्याम मई है आप तो बुराई मई कह रहे हो बुराई है क्यों सब कहां है बुराई की सत्ता ही नहीं है ना सतो विधते भाव ना भाव विधते स आप क्यों सत्ता दे रहे हैं सत्ता ही नहीं है रस्सी पड़ी है सांप आपको दिखाई दे रहा है सांप नहीं है रस्सी है आप देखो ना ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या क्या देख रहे हो मिथ्या को सत्य
मान रहे हो सुधार करो अपना वो तो है तो फिर है ही नहीं ना जो है ही नहीं रस्सी में सांप था नहीं है नहीं रहेगा नहीं पर इस इस बात को मानो तो पहले भगवान थे बाद में भगवान है तो मध्य में कौन है भगवान ही है बुराई नहीं ना पहले बुराई थी ना बाद में रहेगी बीच में भास रही है उसकी सत्ता नहीं ना सतो विद्यते भाव ना भाव विद्यते सता विचार करो बुराई की सत्ता है क्या अंधकार की सत्ता है क्या तो काहे को मान रहे हो तुम्हारी मान्यता ही तो तुमको अनुभव कराएगी जो अनुभव करना
चाहते हो जैसी मान्यता करोगे वैसा अनुभव होगा अभी अनुभव करना चाहो कोई बुरा नहीं कोई पापी नहीं सब में मेरे भगवान विराजमान तो कोई बुराई नहीं कोई पापी नहीं विचार करके बताओ आप कहोगे भगवान ने बुराई क्यों बनाई तो भगवान ने बनाई नहीं बनाई नहीं वो है विद्यमान तो है तो फिर उन विद्यमान को तुम बुरा कह सकते हो क्या ए जब हम फिल्म देखने जाते हैं ना तो एक ही अभिनेता अभिनय करने वाला कभी वो हीरो का रोल करता है कभी कभी अच्छा रोल करता है और कभी वो खलनायक का रोल करता है।
लेकिन पहचानने वाला ये कहता है बहुत अच्छा आदमी है पर रोल बड़ा टाइप का कर लेता है। तो जगन्नाटक वैभवा में श्री कृष्ण रोल कर रहे हैं तीन गुणों का सतोगुण का, रजोगुण का, तमोगुण का। अब तुम्हें जो रोल पसंद हो उस पक्ष में हो जाओ। तुम्हें रोल अगर खलनायक पसंद है तो उधर हो जाओ। बुराई की तरफ और अगर आपको अच्छाई की तरफ तो अच्छाई। बस इस नाटक मंच पर यह देखना है कि नाटक करने वाला कौन है। अच्छा उसमें क्या होता है? डायरेक्टर अलग होता है। मंच अलग होता है। नाटक करने वाले अलग होते हैं।
इसमें मंच भी वही है। डायरेक्टर भी वही है। नाटक करता भी वही है और नाटक दृष्टा भी वही है। ये बात नहीं समझ में आती। या रास्ते रघुनाथ कर वेग ले जा कोई जो जाले रघुपति कृपा तो सपने मोह ना हो। कुछ नहीं केवल भगवान ही भगवान है। बुराई है ही नहीं प्रभु मर्जी दृष्टि परिपक कैसे होगी भजन इसीलिए तो भजन करना चाहिए बिना भजन के नहीं बिना भजन के नहीं भजन करोगे तभी बात समझ में आएगी बार मथे घत होएवर शिकता ते वरु तेल बिनु हरि भजन भरी या सिद्धांत पे यही तो भव है भ माने संशय भ्रम कहां समुद्र है बोले भ समुद्र से पार लगा दो एक बूंद पानी ले समुद्र में एक बूंद पानी नहीं समुद्र कहा जा रहा है क्या दिमाग का ठीक होना चिंतन ठीक होना तभी कह रहे हैं नाम लेत भवसिंध सुखाही करो विचार सुजन मन माही ऐ सुजन जन विचार करके देखो भगवान का नाम जप करते ही भवसिंध सूख जाता है भसि सिंधु मतलब विचार पवित्र हो जाते हैं अब कोई बुरा नहीं रहा अपने ऊपर मारने वाला जो पीड़ा दे रहा है जो गाली दे रहा है जो अपमान कर रहा है उसमें भी भगवान का प्यार और दुलार दिखाई देता है भक्त को और अभक्त को बुराई दिखाई देती है तो हम खुद अपना सुधार करें।
तो हमें पहले ये विचार करना है। देखो आप जहां प्रश्न कर रहे हो अध्यात्म की जगह पर प्रश्न कर रहे हो और हमें जब अपना सुधार हो जाता है। जैसे हम देखो लाल चश्मा लगाएं तो लाल दिखाई देगा। हरा दिखाए तो हरा। आप देखो जरा हमें उत्तर देना तो आपको समझ में आ जाएगा। जैसे हाइलोजन है, यह एसी है, यह पंखा है, फ्रिज है, कूलर है। इनमें सब हीटर है। इनमें सब अलग-अलग क्रियाएं दिखाई दे रही है। लेकिन आपसे पूछा जाए इनको चलाने वाला कौन है? तो आप एक शब्द में कहोगे बिजली। अच्छा बिजली में क्या दोष है?
वो गर्म है कि ठंडी है कि वो काटती है कि क्या कर? वो प्रकाश भी दे रहे हैं। वो ये करणों के प्रभाव से बिजली का अलग-अलग रूप दिखाई दे रहा है। हां मतलब आप देखना प्रकाश भी तो वही दे रही है। लेकिन ये करण के प्रभाव से है। करण है ना उपकरण उनके प्रभाव से अलग-अलग दे रही। तो अब एक माइंड तमोगुणी अब वो बड़ा दुष्ट स्वभाव प्रकट करेगा। लेकिन पावर उसमें पावर उसमें पावर वही है ना तो हमें पावर देखना है। पावर जो देखता है कारण तत्व को जो देखता है वह क्रिया में फंसता नहीं और जो क्रिया में फंस जाता है वह कारण तत्व को नहीं देख पाता।
अच्छा अच्छाई और बुराई ये दोनों हमारे भगवान के बगीचे की शोभा है। समझना अगर कड़क धूप ना हो तो छाया का आनंद नहीं मिलेगा। अगर रावण पैदा ना होता। समझना अगर कंस का अत्याचार ना होता तो कृष्ण का दुलार नहीं मिलता। भगवान अपने अवतार के पहले व्यवस्था बुराई की भी करते नहीं करते। आप विचार करके देखना अगर ये कंस, हिरणाक्ष, हिरण्यकश्यप, रावण, कुंभकरण इनका यह भयंकर रूप ना होता तो मेरे प्रभु के प्रिय अवतार नहीं होते। कृष्णा अवतार, रामा अवतार, भगवान का नरसिंघा अवतार, भगवान का वाराह अवतार यह सब इनहीं के लिए तो हुआ।
तो यह हमारे प्रभु का लीला विनोद है। देखो दिव्य पार्षद है और वही बुराई का रूप धारण कर लेते हैं। तो भगवान उस बुराई को मिटाने के लिए अवतार ले लेते हैं। और हम भक्तों के जीवन पालन पोषण के लिए उनके पावन चरित्र पावन नाम पावन गुण उन्हीं को गाकर हम जीवन मुक्त हो जाते हैं। तो हमें लगता है बुराई कुछ नहीं। भगवान की एक लीला का वह भी हिस्सा है। आपने शास्त्र स्वाध्याय किया होगा तो अगर पता चलेगा भगवान की छाती से धर्म प्रकट होता है और पीठ से अधर्म प्रकट होता है। पीठ से भगवान के अधर्म प्रकट होता है और छाती से धर्म प्रकट होता है।
तो पीठ में घुसा मारो तो भगवान के लगेगा और छाती में मारो तो भग। इसीलिए संत जन हाथ जोड़ते हैं सब में। ये क्रूरा पापिनो नच सताम संभास दृश्या ये देखो अध्यात्म की बात कह रहे हैं अगर आप राजनीति की बात करोगे तो फिर सिद्धांत दूसरा हो जाएगा लेकिन अध्यात्म की बात करोगे तो जीवन मुक्त होने के लिए फिर तो सब में भगवान का भाव करके कहीं कोई बुराई नहीं है। वो खेल कर रहा है। बुराई से ही हम अच्छाई की पहचान कर पाते हैं। एक पक्ष में तो हम पहले आपका खंडन किया कि बुराई है ही नहीं क्योंकि ना सत विधते भाव असत की सत्ता ही नहीं अब दूसरी बात में कह रहे अगर लीला में बुराई ना हो तो मजा नहीं आएगा आप पक्का समझ लो ऐ अगर कोई नाटक हो कोई फिल्म हो और उसमें जोर का विलियन कहते हैं विलियन विलयन ना हो तो आनंद आएगा बोले इसमें विलियन बोले अमुक है अरे बोले बड़ा मजा आएगा क्योंकि अगर विपक्ष जोर का है और बोले फिर हीरो कौन है?
बोले हम बोले अब तो और मजा आएगा। ऐसे हमारे भगवान की लीला होती है। बोले इसमें विपक्ष कौन है? बोले रावण कुंभकरण कौन है? बोले भगवान के पार्षद जय विजय और फिर पक्ष में कौन आ रहा है? बोले राम जी बोले बड़ा आनंद आएगा। अब तो लीला बहुत जोर की होगी। भैया वही विपक्ष बनता है। वही पक्ष बनता है। और बिना बुराई के बुराई मिटाने का लीला कैसे बनेगी? भगवान कह रहे यदा यदा धर्मस गन भवत भारत तो ग्लानी कब होती है? जब अधर्म की वृद्धि होती है। जब बुराइयों की वृद्धि होती है।
तो बुराइयों की रचना और वृद्धि आप ऐसे ही से तो हो रही सरकार आप क्यों कर रहे हैं? ये उनका लीला विनोद है। क्यों का तो कहीं भी विश्राम नहीं हो सकता। यह लीला विनोद क्यों है? ये भगवान की इच्छा ये भगवान की इच्छा क्यों है? अब क्यों का कहीं विश्राम नहीं होगा। उसको हम यह मानते हैं यह भगवान का लीला विनोद। मुझे ये पहचानना है कि भगवान का लीला विनोद है। इसी से हम मुक्त हो जाएंगे। वही रावण है वही कुंभकरण है। जो भगवान के दिव्य पार्षद जय विजय कहलाए। दूसरा कोई नहीं।
वही हिरणाक्ष हिरण्यकश्यप दिव्य पार्षद वही चषपाल दंतवक भगवान के दिव्य पार्षद ये लीला कर रहे हैं तो बुराई भी भगवान की पीठ से प्रकट हुई और अच्छाई भगवान के हृदय से प्रकट हुई दोनों में भगवत भाव करके निकल चलो अगर फंस जा फसो तो फिर जन्म मरण के चक्र में फंसते चले जाओ निकलना है फंसना नहीं है नहीं और भगवान सबकी सेवाएं लगाए हुए हैं तो सबकी सेवा सफल हो रही है। अच्छाई और बुराई दोनों का बहुत बड़ा योग है। जितना योग अच्छाई का उतना ही बुराई का योग है। भाई बहुत बड़ा अस्तित्व उन्हीं से प्रकट हुई है।
देखो प्रकाश का महत्व अंधकार से ही है। तुम्हें मानना होगा। प्रकाश का जो महत्व है वह अंधकार से है। ऐसे मृत्यु से जीवन का महत्व है। जीवन का महत्व मृत्यु से है। ऐसे अच्छाई का महत्व बुराई से है। तो हम यह नहीं कह सकते कि भगवान बुराई क्यों रचे? नहीं जरूरी है। ये बहुत सुंदर घर हो लैट्रिन बाथरूम ना हो। लैट्रिन बाथरूम कितनी गंदी चीज है। नई चीज है। क्यों दुर्गंध वाली चीज होनी चाहिए? लेकिन आप बताओ होना जरूरी है कि नहीं? जरूरी है ना? यहां लेट्रिंग बाथरूम है। यहां ऐसे ही रसोई लेटिंग बाथरूम, अच्छाई, बुराई यह सब जरूरी भैया।
सब जरूरी है। अमृत का महत्व विश्व से है। पक्का समझ लीजिए। इसीलिए हमें आनंद लेना है। हमें बुराइयों के बुराई में फंसकर अपने को अगले जन्म का विस्तार नहीं करना। हमें आनंद लेना है। जब अपना कोई प्रियजन पात्र में होता है तब बहुत आनंद आता है। आप देखिएगा अगर वह जोकर बना हो ना आपका कोई परिचय का हो रिश्तेदार नातेदार मित्र तो आप बड़े गौर से देखोगे उसकी झुककर पर आनंद आएगा पर आपको पता चलेगा जोकर नहीं बहुत ग्रेजुएट आदमी हम जानते कौन है ऐसे ही हम जानते कौन है मत्ता परतर न्यत किंचित धनंजय मेरा श्री कृष्ण है वो स्त्री बना वो पुरुष बना हुआ वो जड़ वो पशु पक्षी चैतन्य वो अच्छा बुरा सब रोल कर रहा है लेकिन ना अच्छा है ना बुरा है ना स्त्री है ना पुरुष है ना जड़ है ना चैतन्य है वो सच्चिदानंद घन परमात्मा है यही जानकर परमहंस जन आनंदित रहते हैं और यही जानना ही वास्तविक जालनाला है दूसरा कुछ नहीं है प्यारे ये व्यवहार है और व्यवहार में दोनों की आवश्यकता है अगर नहीं होगा तो फिर सबका काम नहीं चल पाएगा नहीं काम चल पाएगा नहीं बुरा आचरण का परिणाम ही रोग होता है अगर बुराई नहीं होगी बुरे आचरण नहीं होंगे तो रोग नहीं होगा शोक नहीं होगा फिर हमें लगता है मृत्यु लोक मृत्यु लोक ही रहेगा इसलिए भगवान भगवान ने लोक के अनुसार रचा है।
यहां आपको बुराई भी मिलेगी और यहां भलाई भी मिलेगी। भगवान की मेरी बाजार है, दुकान है। आप खरीदना क्या चाहते हो? अगर भलाई खरीदना चाहते हो तो भलाई खरीद लो। बुराई खरीदना चाहते हो तो बुराई मिलेगी दोनों चीजें। यह बात है। और ये हम दूसरी बात में कह रहे हैं। पहली बात में तो खंडन करते हैं कि बुराई है ही नहीं। क्योंकि ना सतो विद्यते भाव ना भाव विद्यते सता। सत का कहीं अभाव नहीं है और असत की कभी सत्ता ही नहीं है। जैसे रस्सी में कभी सांप ना था ना है ना रहेगा। ऐसे परमात्मा में माया ना थी ना है ना रहेगी।
ये भास रही है वो परमात्मा ही परमात्मा है। सर्वम खलमिदम ब्रह्म और दूसरी बात व्यवहार की की कि व्यवहार में इसकी जरूरत है। लेकिन अपने को नहीं धारण कर रहा। पूरी सृष्टि में इसकी जरूरत है। इसका महत्व है। जो भगवान ने रचा उसको यह ना समझे कि क्यों रचा क्योंकि जरूरत है सृष्टि में उसकी जितना अमृत का महत्व उतने विष का महत्व है। पक्का समझ लीजिए अगर विष ना हो तो काम नहीं चलेगा सृष्टि का। विष चाहिए। जितना निर्वसन होने में आनंद है उतना ही एक सृष्टि में व्यसन की भी जरूरत है।
रचा है भगवान ने। कितनी औषधियां जहरीली वस्तुओं से बनती हैं? बड़े-बड़े रोगों का नाश करने वाले जैसे संख्या है उसको ऐसे खा लो तो मर जाओगे और वैद्य शोध के दे दे तो दमा आद बड़े-बड़े रोगों का नाश करने वाला बनता है। तो सब भगवान ने जो किया है वो बहुत सुंदर किया है। बस केवल समझना अपने को है। अपने प्रतिकूल पड़ता है तो हम फिर गाली देने लगते हैं। नहीं तो अपनी अनुकूलता प्रतिकूलता अगर समतुलता में आ जाए तो भगवान के ये बाजार बहुत आनंदमय बाजार है। ना खाओ उसे दोस्ती ना खाओ उसे बैर।
परमहंस जल ऐसे निकल जाते हैं बाजार से संसार से। ना किसी से दोस्ती, ना किसी से बैर। वो अपने लोग फंस जाते हैं अनुकूलता, प्रतिकूलता, राग द्वेष में। जी
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
संबंधित
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1400 — श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान…
- भगवत् मार्ग पर चलना चाहते हैं, पर हर दिन असफल हो रहे हैं। — आस्था बोरा जी जयपुर से श्री हरिवंश महाराज राधे-राधे महाराज जी 2 साल पहले जब आपको सुनना शुरू किया तो जानना हुआ कि हम कितना अज्ञानता और अंधकार में जीवन जी रहे हैं। आपको सुनने से यह…
- भगवान मिलेंगे या नहीं कैसे पता चलेगा? — भगवत दर्शन का सर्वोत्तम उपाय क्या है? भगवान के दर्शन करने का सर्वोत्तम उपाय क्या है? भगवत दर्शन का सरल और सर्वोत्तम उपाय दिन रात उनके नाम का जप करो और एकांत में रो भगवान मिल जाओ।…
- अगर एक नाम का इतना बड़ा फल है, तो निरंतर नाम क्यों जपें? — निखिल जी मुंबई से राधा वल्लभ श्री हरिव श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी एक नाम का फल पूरा त्रिभुवन से भी बड़ा है तो फिर निरंतर नाम जप क्यों कहा जाता है क्योंकि एक नाम जिसको कहा…
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1399 — जय प्रकाश प्रजापति जी गौरव जी गुरुदेव भगवान आपके चरणों में प्रणाम महाराज जी पिछले दो सालों से प्रतिदिन आपको सुन रहा हूं नाम जप भी कर रहा हूं परंतु कुछ महीनों से संसार की बनावटी…
- जिसका लक्ष्य भगवत् प्राप्ति होता है उसके क्या लक्षण होते हैं? — रस शेखरी शरण जी वृंदावन से महाराज जी जिसका दृढ़ लक्ष्य भगवत प्राप्ति हो गया है उस साधक के क्या लक्षण है नारायण हरि भजन में पांचो न सुहात विषय भोग निद्रा हंसी जगत प्रीत बहु बात ये…