॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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नाम जप से हृदय जलता है, तो पाप नष्ट होते हैं। पर मुझे तो बिल्कुल जलन नहीं हो रही।

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

मनीषा कौशिक जी चेन्नई से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी आपके श्री मुख से सुना है कि नाम जप करने से हृदय जलता है तो पाप नष्ट होते हैं परंतु महाराज जी मुझे नाम जप करते हुए बिल्कुल भी अभी जलन नहीं हो रही क्या मेरे पाप नष्ट नहीं हो रहे महाराज जी अभी अभी उस कोटि का नाम जप नहीं हो रहा अभी उस कोटि का नाम जप नहीं हो रहा जब एकाग्रता पूर्वक नाम जप होने लगेगा तो एक असंतुष्टता ता पैदा होगी। एक ताप पैदा होगा जो कुछ अच्छा नहीं लगता।

सब कुछ भस्म होना शुरू हो जाता है। पाप वासनाएं, संस्कार और अच्छे सद्गुण प्रकट होने शुरू हो जाते हैं। हृदय में एक जब आनंद प्रकट होगा। फिर भगवान का रूप प्रकट होगा। फिर भगवान का साक्षात्कार हो जाएगा। जीवन का पूरा हो गया। तो प्रथम जब होता है तो अभी उस कोटि का नाम जप कहां हो रहा है? और बढ़ाओ नाम जप। जितना अधिक बढ़ाओगे उतना ही अपना प्रभाव दिखाता चला जाएगा। जैसे हम एक दो कवल कई दिन के भूखे हो और एक दो कवल भोजन करके तो कुछ समझ में आएगा क्या? कम से कम आधा पेट भोजन हो तब समझ में आएगा कि हां खीर कैसी है?

पूरी कैसी है, सब्जी कैसी है। एक दो कवल तो केवल भरने मात्र की जरूरत रहेगी। एक दो कवल करके रुकवा दिया जाए। आपसे पूछा जाए आपको कैसा लगा? तो आप कहोगे अब बुरा लगा। इससे तो अच्छा था ना पाते तो चैन थी। जब पाना शुरू किया तो पाने दो। तो अभी शुरू किया है। एक दो कवल है। वह अपना काम कर रहा है। एक दो कवल उतनी भूख मिटाया पर समझ में नहीं आएगा। मिटेगी तब जब कम से कम आधा पेट हो। ऐसे ही हम कम से कम 12 घंटा 24 घंटे में भजन हो। तब हमारे को समझ में आएगा कि हमसे भजन हो रहा है।

12 घंटे चलते फिरते उठते बैठते कार्य करते हुए नाम जप चलता है। नाम जप अधिक होगा तब वो बात आती है। कभी तो 500 हो जाते हैं और कभी 2000 भी नहीं होती। इसका क्या करेंगे? 1000 2000 अभी शुरुआत हुई जपो और जपो अभी जबान से जपो पहले वाचिक जपो राधा राधा राधा राधा राधा राधा जीभ में दर्द होने लगता है जीभ में दर्द होने लगता है ज्यादा जपने से सर में दर्द क्या प्रपंच घंटा अगर बार बताना पड़े तो जबान नहीं दर्द करेगी नहीं लड़ाई लड़नी पड़े तो राधा नाम में जबान दर्द कर ले क्यों भाई आप लोगों का क्या अनुभव है जबान दर्द करती है नहीं कर यार रात दिन भजन करने पर भी हृदय में आज तक यही है कि काश हमसे भजन बन जाए काश हमसे भजन बन जाए भजन ना छूटे जितना भजन होता है उतना थोड़ा लगता है लगता है और हो हो जाए और हो जाए और हो जाए आनंद आता है जवान थोड़ी दर्द करते हैं शुरुआत में थोड़ा पाप है ना पापवंत कर सहज स्वभाव भजन मूर्त भाव न काऊ जो पाप है वह भजन में नहीं लगने देते तो अगर यही नाम जप करें तो यही पाप को नष्ट कर देगा जैसे मिश्री मीठी होती है पर पित्त बढ़ जाए तो मिश्री भी आपको मीठी नहीं लगेगी।

कड़वी लगने लगेगी। लेकिन वही मिश्री रोज अनुपान से पाई जाए तो पित्त का समन करके ठीक कर देगी। ऐसे ही नाम जप अच्छा नहीं लगता। मन नहीं लगता। लेकिन वही नाम जप यदि नियम पूर्वक किया जाए तो मन को आनंद आने लगेगा। पाप भस्म हो जाएंगे। पाप के घड़े हजार दो हजार हमारी कोई स्वास खाली ना जाए। ऐसे भजन करें तब भजन का रंग आएगा। अभी तो बहुत पहाड़ जैसे पाप जमा है जन्म जन्मांतर के इसलिए मेघा जी हर हर महादेव महाराज जी मुझे बचपन से ही बड़े-बड़े सिद्ध संतों को देखने का और मिलने का अत्यंत उत्साह है।

मैं अधम ऐसा क्या करूं कि देवरा बाबा नीम करोरी बाबा जैसे दिव्य संतों के दर्शन मुझे प्राप्त हो प्राप्त हो आगे मतलब ऐसा क्या साधन करूं नाम जप जितना नाम जप करोगे अभी एक दिन सत्संग में चर्चा हुई थी कि एक करोड़ नाम जप करने वाले को दिव्य संतों के देवताओं के दर्शन होने लगते हैं। ऐसे 11 करोड़ तक की संख्या का चर्चा हुई थी। तो एक करोड़ जो नाम जप करेगा उसको स्वप्न में दर्शन होंगे और शायद छ करोड़ या ऐसा था कि वो सिद्धों से बात करेगा। जैसे हम आपसे बात कर रहे हैं सनक सनंदन देवर्षि नारद यह जो बड़े-बड़े महापुरुष है इनसे मिलना छ करोड़ नाम जप कर यहां दो चार माला तो चलाए ले जा तो भाई स्थिति बनानी पड़ेगी भजन की स्थिति जैसे अब दिव्य महापुरुष से बात करना है तुम्हारे अंदर दिव्य स्थिति आनी चाहिए ना दिव्य भाव आना चाहिए तभी तो हम देख सकते हैं जैसे अर्जुन को भगवान ने अपने दिव्य रूप के दर्शन के लिए दिव्य दृष्टि प्रदान की ना तो ऐसे भजन दिव्य दृष्टि प्रदान करता है।

जब हम नाम जब बढ़ाते हैं करोड़ों की संख्या में नाम तो नाम हमारे अंदर इन्हीं नेत्रों में चिदानंद भाव लाता है। तब हम इन दिव्य संतों के दर्शन कर पाते हैं। और संत दर्शन का मतलब है संत बन जाना। संत दर्शन का मतलब संत बन जाना। अगर हम संतों से मिलते रहे तो हमारा स्वभाव संत हो जाएगा। भले भष संत ना हो लेकिन स्थिति हमारी संतों जैसी हो जाएगी।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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