॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1388

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

प्रतीक जी महाराष्ट्र से श्री हरिवंश गुरु जी श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी जैसे कि आपने काफी बार बताया है कि हमारे संचित पुण्य और पाप के अनुसार हमारे वर्तमान में सुख और दुख का निर्णय होता है। महाराज जी मैं यह जानना चाहता हूं कि हमारे संचित पाप और पुण्य खत्म हुए या फिर जल्द से ही खत्म होने वाले हैं। इस बात का वर्तमान में क्या लक्षण और संकेत परिणाम स्वरूप दिखाई देते हैं? इस पूर्णाएं कम हो जाएंगी। पाप की कामनाएं नष्ट हो जाएंगी। कोई चिंता नहीं, कोई शोक नहीं, कोई भय नहीं, कोई उद्दिग्नता नहीं।

एक निर्भय, एक निश्चिंतता, एक निशोकता और भगवान में तन्मयता ये लक्षण प्रकट होते हैं। बिल्कुल निश्चिंत जब उधर खत्म हो जाएगा ना इधर निश्चिंतता पर्यक्त होगी कब? जब पूरी नवधा भक्ति हमारे जीवन में अपना रंग लाएगी। श्रवण कथन सुमिरन सेवन चित लावह अर्चन वंदन अरुदासंतन सख्य और आत्म समर्पण ये नव लक्षण भक्ति बढ़ाई तब ति प्रेम लक्षणा पाई जब भगवत प्रेम प्रकट होता है भगवत तन्मयता होती एक अद्भुत आनंद ना कुछ चाह ना किसी से मिलने की इच्छा ना कोई पद ना कोई जीने की इच्छा ना कोई मरने की चाह एक अलौकिक स्थिति तो सब संशय खत्म हो जाते हैं सब संचित कर्म भस्म हो जाते हैं।

बस हृदय अपने प्यारे के लिए विकल रहे तो समझो अब हमारा काम हो गया। अन्य कोई चाह ना रह जाए। निरंतर अपने प्रभु के लिए विकलता आ जाए। यही जीवन का संकेत है कि अब आखिरी जीवन है। यही हमारा आखिरी जन्म है। जब हमारे हृदय में किसी भी तरह की कोई चाहना किसी तरह की कोई कामना ना कोई वासना नहीं स्वात्मारामम विषय मृग तृष्णा भ्रमति आत्माराम पुरुष कभी विषय मृग तृष्णा में भ्रमित नहीं होता। वो अपने प्रभु में ही लगा रहता है। तो यह प्रतीक है कि अब हमारा आखिरी जन्म है। हमारे संचित कर्म भस्म हो गए।

अब जैसे अपने लोगों का है ये विषय ही नहीं रह गया। संचित कर्म प्रारब्ध कर्म क्रमा इसका विषय नहीं है। कोई मतलब नहीं है। प्रश्न है तो यहां चिंतन जा रहा है। नहीं तो ठीक ठिकाने पे लगे हुए हमें। अब जो ही जोई प्यारो करे सो भावे प्यारे का जो मनावे सो करे। जैसे मना जो मनावे सो बुलवा दे। जो मनावे सो दिखवा दे। जो मनावे सो खवा दे। जैसे मनावे वैसे चला दे। जिस तरह से चाहे वैसे मुझे रखें। खत्म खेल अपना अस्तित्व मिटा देना ही साधना है। अपना ममत्व प्रभु में समर्पित कर देना ही आराधना है।

प्रभु के सिवा और कोई नहीं है। ये दिमाग में बैठ जाए। यही सच्चा ज्ञान है। वासुदेवाित समात्मा सुद दुर्लभा प्रभु प्रभु प्रभु प्रभु मन में प्रभुित में प्रभु बुद्धि में प्रभु सब जगह मेरे श्यामा श्याम श्यामा श्याम मेरी राधा राधा राधा राधा दिमाग में भरना है जो कूड़ा करकट है वो सब डिलीट हो जाए निकल जाए अंदर राधा राधा राधा बस चुप हो जाए अपनी स्थिति कभी किसी से कहे नहीं दूसरी स्थिति में हमें जो आगे बढ़ना है उसकी जानकारियां रखें अपनी स्थिति किसी से बताए ना जो आगे भागवत की स्थिति अब जानकारी अब इस स्थिति में वह अपने आप समझ में आ जाता है।

अब इस स्थिति में हम पहुंच रहे हैं इस स्थिति में पहुंचना है। दुनिया से नहीं दुनिया से मतलब जो दुनिया से अपने को अलग कर लिया है वही भगत है। ये बात समझ लो। समिटे सो आशिक और फैले सो जमाना जो फैल रहा है वो दुनियादारी में फंस रहा है और जो धर्म कर्म सबसे पिंड छुड़ा के अपने प्रभु में चिपक गया चित्त प्रभु में चिपक गया मन प्रभु में बस सुने ना काू की कही कहे ना अपनी बात नारायण व रूप में मगन है दिन रात विरह कमंडल कर लिए बैरागी दो नैन मांगत दरस मधु करी छके रहत दिन रहन बस अपने प्रभु से मतलब ना काू सो बोल वो ना कोई व्यवहार अपनी कुंवर किशोरी को जयत निहार निहार बस अपने लाडले प्रभु की तरफ चित्तवृत्ति महाराज जी तो

क्या श्री जी को जैसे नईनई चीजें पवाने की पूर्ण होती है जैसे आजा पिज़्ज़ा पाग पवा देते हैं आज बर्गर पवा देते हैं तो वो भक्ति के अंदर आ जाता है अब बचा ये मन की बातें हैं श्री जी को पिज़्ज़ा बर्गर नहीं चाहिए आप समझो एक सात्विक साधक के अंदर ऐसी इच्छा प्रकट नहीं होगी तो श्री जी के अंदर कैसे इच्छा प्रकट होगी श्री जी भावोत्सवेन भजता रस कामधेनु पहले हमारा स्वरूप प्रकट हो श्री जी की सेवा वाला और फिर श्री जी की सेवा में उनके चरणों में महावर लगा रहे हैं उनके केश पास संभाले उनको दर्पण दिखा रहे उनको चवर कर रहे हैं उनको सुंदर भाव युक्त भोग लगा रहे हैं पवित्र ये पी पिज़्ज़ा बर्गर पवित्र चीज है क्या बच्चा जो बाजारों में बनती है बनाने वालों के भाव नहीं है वो भगत थोड़ी है वो कैसे अपवित्र बनाते हैं हमारा तो श्रद्धा ही नहीं है हमारी श्रद्धा ही नहीं इन वस्तुओं में बनाने वाला कैसा था उसका भाव क्या था वो कितना पवित्र है ये वस्तुएं सब हमारे दिमाग में जाकर काम पैदा करती हैं रजोगुण पैदा करते हैं राग पैदा करते हैं ना

इन वस्तुओं को खाना चाहिए ना इन वस्तुओं का भोग लगाना चाहिए। रोटी दाल सादा भोग लगाओ। आपको अगर अच्छा तो खीर है, पुआ है, गुजिया है, कढ़ी, चावल, रोटी, दाल ये सब पवित्र चीजें पिज़्ज़ा, बर्गर और चााउमीन, पाउमीन ये श्री जी महाराज महाराज जी जैसा एकादशी का व्रत रखते हैं जो लोग क्या उनको भगवत प्राप्ति होती है? हां। एकादशी का व्रत रखें और निरंतर नाम जप करें। नाम जप जरूर करें। महाराज जी निरंजन नाम जपी करते हैं। काशी का हां बढ़िया है। फिर भगवान की तरफ जितना चित्तवृत्ति गई अंतिम समय भगवान का स्मरण आ गया तो सब ठीक हो जाएगा।

महाराज पारिवारिक सांसारिक के साथ रह के हम राधा रानी के आपके चरणों में कैसे अलग जाए? अगर हम अलग जाते हैं तो समाज बोलता है कि नहीं हमने कभी कहा क्या कि सन्यास ले लो। सन्यास नहीं जैसे कि उसी में लीन हो जाना और तो क्षमता होती है। हम इस समय बैठे दो कार्य कर रहे हैं। अंदर हाहाकार मचा है। तुम जान रहे हो बाहर शांत बैठे हैं। अंदर हमारे क्या हो रहा है तुम्हें पता है। और जहां हम हैं वहां की बात जान जाओ तो निहाल हो जाओगे। हम बैठे तुम्हारे बीच में बैठे हैं बिल्कुल स्वस्थ बैठे हैं तो ऐसे थोड़ी है क्षमता मिलेगी और एक तन्मयता है तो तन्मयता करते हुए हल भी जोत सकते हो तन्मयता करते हुए प्रश्न का उत्तर भी दे सकते हो तन्मयता में रहते हुए हर काम कर सकते हो क्या गोपीज की स्थिति छोटी मोटी थी उद्धव जी जैसे महाज्ञानी जिनकी चरण धूल चाहते हैं वो क्या करते थे बच्चे को खिला रहे पति की सेवा कर रहे हैं।

घर लीप रहे हैं। धान कूट रहे हैं। दूध दो रहे हैं। दही जमा रहे हैं। लेकिन वृत्ति कहां है? कृष्णाकार। लोग पागल बोलना शुरू कर रहे हैं। लोगों को लग रहा हो कि भजन करने वाले पागल होते हैं। ऐसे होते हैं। स्थितियां होती हैं। श्री सुखदेव जी ने जनक जी को गुरु माना। और जनक जी राजा है। सुखदेव जी के शरीर में लंगोटी भी है। 16 वर्ष के दिगंबर महापुरुष ऐसा वैरागी ऐसा ज्ञानी महात्मा त्रिभुवन में नहीं हो सकता। सुखदेव जी जैसा उनके गुरु जी कौन जानते हो? जनक जी और जनक जी राज दरबार में सिंहासन में बैठे हैं।

तो यह कोई ना समझे कि ज्ञानी या भगत पागल हो जाता है। सम्यक रूप से व्यवहार का निर्वाह करते हुए भी भक्ति में चला जा सकता है। ऐसा नहीं कि भक्ति कोई पागल बना दे। नहीं लड़के बच्चे परिवार सब ऐसे गोपीजन बहुत सिद्ध महापुरुष हैं। उनकी संतान भी होती है। उनके परिवार भी है उनका ऐसा नहीं भक्ति के रहस्य को नहीं समझा इसलिए ऐसा लगता है। वात्सल्य जी श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी सही फैसला कैसे लें? जब दुविधा हो या एक सामान्य जीवन में शास्त्र से प्रमाणित होना चाहिए।

फैसला या किसी संत महापुरुष के वचनों के द्वारा प्रमाणित होना चाहिए। जो पहुंचे हुए महापुरुष हैं जो भगवान के निज जन है सही फैसला वहीं से और दूसरी बात अपना हृदय सही फैसला देता है। देखो आप कुछ गलत सोचो तत्काल उत्तर आएगा गलत है। आता है आता है आप लोगों के हृदय में कि नहीं आता है? आप कुछ गलत करना चाहो अंदर आता है नहीं कि गलत है मत करो। सही फैसले के लिए अंदर भगवान बैठे हुए हैं वो आपको उपदेश करते हैं। बहुत धीमे स्वर में होता है वो। वो ऐसा नहीं होता। बंद करो नहीं मतलब ये करने जा रहे हो गलत है आपको लगता है मेरे विचार हैं वो आपके विचार नहीं है वो भगवान के विचार है आपको दो जो दिए जा रहे हैं लेकिन अपने लोगों को बात मानते नहीं कुछ भी गलत सोचो तुरंत उत्तर आएगा गलत है मत करो गलत है मत करो और जब सही होगा तो हृदय शीतल हो जाएगा और प्रसन्नता आ जाए तो जान लेना सही है जब हृदय जले और अंदर से हो कि ना करो तो जान लो ये कार्य गलत है या संतों के वचन या शास्त्र प्रमाणित या हृदय प्रमाणित हृदय में देखना होगा मन

हर्ष से भोगों को भोगना चाहता है और हृदय के आराध्य भगवान हृदय से मना करते हैं गलत है गलत जा रहे हो गलत देख रहे हो गलत सुन रहे हो गलत भोग रहे हो अंदर आएगा देख लेना तो जब वो आए कि गलत है तो मान लो गलत है फिर मत करो तो किसी से पूछने की जरूरत नहीं हृदय में भगवान बैठे हैं सबको उपदेश दे देते हैं महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी ये प्रश्न जो है ये कह रहे हैं कि दीक्षा के बाद अगर बहुत व्यभचार या ऐसे नशे आदि में थे कृपा से सत्संग सुना और

छोड़ दिया और शरणागति मिली फिर जब किसी कुसंग वश फिर उन्हीं विषयों में जाना हो जाए तो दुर्गति हो जाएगी हां महाराज जी बहुत सारे ऐसे प्रश्न आ रहे हैं दुर्गति हो जाएगी पक्का हो जाएगी अगर आपसे पाप बनते रहे और आप शरणागत हो गए और अब नशानी अब नश नहीं करूंगा करूंगा तो सब माफ हो जाएंगे और अगर फिर करने लगे तो दुर्गति हो जाएगी पक्का क्योंकि अब तो रजिस्टर्ड पाप हो रहे हैं गुरु बनाकर पाप कर रहे हो रजिस्टर्ड पाप है संसार में पाप हुए गुरु की शरण में आ गए क्षमा हो

गए अब गुरु की शरण में आकर शरणागत होकर पाप करोगे रजिस्टर्ड पाप हो जाएंगे उनको भोगना ही पड़ेगा लिखा है उन्होंने कि जलन हो रही है सांसारिक जलन से केवल नहीं मिटने वाले ये तो नरक भोगना पड़ेगा ऐसे कोई खिलवाड़ थोड़ी है तुम मनमानी नहीं पाप करो। अब आप सॉरी बोल दो किसी का कत्ल करके तो सॉरी मानी जाएगी क्या? तो ऐसे ही जानते हो कि यह पाप कर्म है और फिर गुरु की शरण में हुए कि अब नहीं करूंगा और फिर जान के पाप कर रहे तो सॉरी बोलने से थोड़ी होगा। जलन होने से थोड़ी होगा।

उनको भोगना पड़ेगा। उनको भोगना पड़ेगा। अभी होश में हो जाओ। अभी भगवान से प्रार्थना करो और नाम जप करो। मंत्र जप करो। गंदे आचरण ना करो तो शायद कृपा हो जाए। नहीं तो फिर ये तो भोगना ही पड़ते हैं। वज्र के समान मजबूत पाप हो जाते हैं। इनको भोगना पड़ता है। फिर शरणागत होने के बाद हर जीव को समझ लेना चाहिए। ऐसे गुरु मंत्र नहीं लेना चाहिए। जब तक अपने में कंट्रोल ना हो तब तक गुरु मंत्र नहीं लेना चाहिए। या मनमानी आचरण करो गुरु बना के तब तो हरेभरे और होंगे और भोग भोगना पड़ेगा तुम्हें और दंड भोगना पड़ेगा।

गुरु बना के पाप करो तो दंड नहीं भोगना पड़ेगा। कम से कम पाप हुए तब गुरु बना लिया तो मुक्त तो हो गए लेकिन गुरु बना के पाप किए तब तो फिर और ही परेशानी है। हां कोई भूल चूक से कभी हो जाए वो बात अलग है। जानबूझ के बलात्कार करो नशा करो गंदे पाप करो तो फिर यहां भी भोगना पड़ेगा और वहां भी भोगना पड़ेगा। श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी शरीर की आयु 24 वर्ष है। इन 24 वर्षों में हमने केवल गलत ही आचरण किए हैं और प्रभु कहते हैं कि निर्मल मन जन सो मोहि पावा। और हम शरीर मन बुद्धि से अत्यंत मलिन है।

ऐसे में तो जब हमें पता है कि यह गलत किया है तो जैसे गंदा पात्र हो जाता है तो साबुन डाल के धोते हैं फिर रज लगा के उसे शुद्ध कर लेते हैं तो शुद्ध कर लो। भगवान की लीला कथा नाम जप नाम कीर्तन अच्छे आचरण के द्वारा अपने जीवन को पवित्र कर लो। हमसे जो गलतियां हुई उनकी पुनरावृति हम ना करें और भगवान के नाम जप नाम कीर्तन भगवत लीला कथा व्रत उपवास इनके द्वारा हम अपने को पवित्र कर ले अपनी जो गलतियां है उनको त्याग दें अभी ठीक हो जाएगा ऐसा थोड़ी कि पात्र गंदा हो गया तो फेंक दें उसका मार्जन करते हैं उसको हम धो देते हैं तो हमारा जीवन मान लो गंदा हो गया हमसे कोई गलती हो गई हमसे पापाचरण बन गया तो उसका प्रायश्चित है अभी जल्दी-जल्दी कर लो मनुष्य शरीर है स्वस्थ शरीर है तो उस पाप को मिटा के निष्पाप बन जाओ।

भगवान का चिंतन करो। क्योंकि अगर निष्पाप ना हुआ जाता तो बड़े-बड़े वैश्यागामी बड़े-बड़े चोर, बड़े-बड़े हिंसक महात्मा बन गए। हमारा इतिहास कहता है भक्तों के चरित्र कहते हैं तो हम तो 100 200 ग्राम है। जब किलो दो किलो वालों को पवित्र कर दिया तो 100 50 ग्राम वाले तो पवित्र हो ही जाएंगे। अहम तो सर्व पापभ्य मोक्ष्यामि मासचा भगवान कहते मेरी शरण में हो जाओ। मैं तुम्हें पावन कर दूंगा। तो भगवान की शरण में होकर नाम जप करो। नाम कीर्तन करो। भगवान लीला कथा सुनो। भगवान की लीला कथा गाओ।

भगवान की सेवा घर में विराजमान करो। पवित्र हो जाओगे। जी श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आप कह रहे हैं कि पिछले आठ सालों से आप रक्तदान केंद्र लगा रहे हैं। उसमें काफी लोगों को फायदा भी हुआ है। महाराज जी ये कह रहे हैं कि कभी-कभी मन इतना उदास हो जाता है कि रक्त की दलाली कुछ लोग करते हैं महाराज जी। तो आरोप सब पर लगाए जाते हैं। लोग हमें भी शंका की दृष्टि से देखते हैं। ऐसे में मन महाराज जी विचलित हो जाता है कि हम ये गलत इतनी परेशानी आ जाती है कि हमने 24ों 24ों घंटे सेवा की है हमने।

लेकिन ठाकुर जी की असीम कृपा से लेकिन परेशानी क्या है कि जो लोग गलत करते हैं उनके चक्कर में लोग हमको भी इतना गलत समझने लग जाते हैं कि हमारा फिर मन बहुत विचलित हो जाता है। नहीं विचलित होना चाहिए क्योंकि आप सही है ना तो विचलित होने की जरूरत नहीं। अच्छा लोगों का कहना भी सही है क्योंकि लोग गलत करते हैं मान लो रक्त लेते हैं दान के रूप में और उसको बेच देते हैं तो फिर अब लोगों की तो दृष्टि वही होगी तो अगर एक आपके डिपार्टमेंट में कोई गलत हुआ कहते हैं ना एक मछली मर जाए तो पूरा तालाब गंदा कर देती है तो अपने को सहना कि अपने भाई किसी भाई के द्वारा गलती हुई तो अपने को भी गालियां पड़ रहे लेकिन अपने तो सही है अपने को टूटना नहीं है क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है कि पैसा दिशा देने पर भी रक्त नहीं मिलता और वो अत्यंत आवश्यक विषय नहीं तो उसके प्राण चले जाएंगे।

मान लो जैसे ऑपरेशन हुआ अब रक्त की जरूरत है। अब यह रक्त तो ऐसा है कि ग्रुप के अनुसार जी यह थोड़ी कि किसी का रक्त किसी के भी चढ़ उसको मिलना चाहिए। तो अगर आप 50ों व्यक्तियों का रक्त लिए हैं तो किसी न किसी का ग्रुप मिल जाएगा और उसकी प्राण रक्षा हो जाएगी। तो यह बहुत उत्तम कार्य आप कीजिए। बस यह है कि जब हमारे ऊपर फूल बरसे तो फूले ना और जब गाली बरसे तो भूले ना कि हमारा कर्तव्य है परहित मैं गलत नहीं हूं इसलिए कोई मुझे गलत कहे तो टूटना नहीं यद्यपि बुरा लगता है पर बुरा को सह जाओ हां आगे आगे बढ़ो ऐसे भारत जी नेपाल से राधे राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं।

महाराज जी आत्मा परमात्मा और जीव का बीच में क्या संबंध है? कैसा संबंध है? एक एक ही है। जब अपने स्वरूप को भूल के देह भाव से भावित हो जाता है तो उसे जीव कहते हैं। जब अपने स्वरूप का बोध हो जाता है तो वही आत्मा है और वही परमात्मा है। आत्मा और परमात्मा में किंचिन मात्र भेद नहीं है। आत्मा और जीव में जो भेद बुद्धि की गई वो देहाभिमान के कारण की गई। वो अपने स्वरूप को निर्विकार स्वरूप को अविनाशी स्वरूप को अजन्मा स्वरूप को भूल करके विकारी विनाशी और जन्मने मरने वाले देह और अंतःकरण में तदात्म भाव को प्राप्त होने के कारण उसे जीव कहा गया और जब वो गुरु चरणों की आराधना करके ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर लेता है तो ब्रह्मवि ब्रह्म भवती क्योंकि वो ब्रह्म ही था कोई साधना से ब्रह्म नहीं हुआ उसका भ्रम नष्ट हो गया जो देह भाव था जा कृपा सब भ्रम मिट जाई गिरजा सोई कृपालु रघुराई जीव अपने सहज स्वरूप को जब प्राप्त होता है तो ब्रह्म स्वरूप ही होता है परमात्म स्वरूप ही होता है आत्म स्वरूप ही होता है जीव संज्ञा देहाभिमान के कारण उसको दी गई नहीं वो निर्मल चिदानंद घन आत्मा ही है समझ पा रहे हैं आप समझ पा रहे हैं आप भजन करोगे तब समझ पाओगे अभी देह भाव में स्थित हो तो कैसे आत्म स्वरूप को समझ पाओगे जो आत्मा है वही अखंड परमात्मा है जो परमात्मा है वही आत्म स्वरूप में है।

जो जीवात्मा है वह भ्रम के कारण देह भाव को प्राप्त होने से जीवात्मा कहा गया। नहीं तो परमात्मा ही है दूसरा कोई नहीं है। भगवान अर्जुन जी को कह रहे हैं मत्ता परतरम नान्यत किंचित्त धनंजय हे धनंजय मेरे सिवा कुछ और नहीं है। उपनिषद कह रहे हैं सर्वम खलमिदम ब्रह्मने नानास्त किंचन सब कुछ ब्रह्म है। ब्रह्म के सिवा किंचिन मात्र कुछ नहीं है। ईशा वासमिदम सर्वम यत किंच जगतम जगत इस जगत में एक एक कण केवल ईश्वर ही है। ईश्वर के सिवा और कुछ नहीं। वासुदेवा सम महात्मा सुद दुर्लभा केवल वासुदेव ही वासुदेव है दूसरा कोई है ही नहीं वासना वासुदेवस वासितम भत्रम सर्वभूत निवास्म वासुदेव नमोस्तुते दूसरा अज्ञान से कल्पित है जैसे स्वप्न में कुछ ना होने पर भी सब कुछ भासता है तब तक जब तक जग नहीं जाता ऐसे ही जागृत में जो कुछ नान भास रहा है ये अज्ञान निद्रा में और जिस समय वो जगा तो केवल एक है दूसरा एक को ब्रह्म द्वितीय नास्त समझ पा रहे हैं आप सत्य जी हिमाचल प्रदेश से गुरुदेव आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी नाम जप प्रार्थना ध्यान इन तीनों साधनों के द्वारा और भगवान के प्रति समर्पण शरणागत होने पर भगवत प्राप्ति हो जाती है।

गुरुदेव मुझे तो शरणागत होने की विधि भी ज्ञान नहीं है। महाराज जी कैसे हुआ? हां शरणागत की कोई विधि नहीं है। जब कहीं कोई आश्रय दिखाई ना दे तब भगवान की शरणागति होती है। असरण शरण असरण कोई हमें स्वीकार ही नहीं करता। वह भगवान विधि पैदा करते हैं। सब तरह से जब समझ में आ जाता है कि मैं निर्बल हो गए तो महाबल का आश्रय जागृत हो जाता है। सुनेरी मैंने निर्बल के बल राम। द्रोपदी को जब तक ये था मेरे पति हैं। भीष्मा आदि महापुरुष है। लेकिन जब देखा पति सर झुकाए भीष्मा आदि कोई विरोध नहीं कर रहे तो भगवान का आश्रय नहीं लिया।

अपनी भुजाओं का आश्रय लिया। जब देखा भुजा भी तो दांत से पकड़ लिया। जब देखा दांत भी धोखा दे देगा तो आखिरी अब कोई है ही नहीं। अब कोई है नहीं तो तब पुकारा हे गोविंद द्वारिका वासिन गजेंद्र ने उसकी हाथी हाथनिया पूछ पकड़ के ऐसे सूंड से निकाल रहे। हजार वर्ष तक स्वयं लड़ा। जब देखा हाथी हाथनिया छोड़कर चले गए। अब ग्राह घसीट कर जल में ले गया। अब स्वयं में शक्ति नहीं रही। तब उसे पूर्व जन्म के भजन के अनुसार इंद्रद नाम का राजा था। उसे स्मृति आई। हे हरि और गजेंद्र स्त्रोत्र का जो गान किया भगवान आए और तो शरणागति सही मायने में कोई सीखने पढ़ने की चीज नहीं है।

ऐसी परिस्थिति जब रावण ने लात मारी विभीषण को जब देखा अब कोई आश्रय नहीं। तो चल गए। श्रवण सुजस सुनियो प्रभु भंजन भव वीर त्राहि त्राहि आरती हरण शरण सुखद रघुवीर जब हमको सारे रास्ते बंद दिखाई देते हैं और एक रास्ता खुला दिखाई देता है भगवान का तो जीव अपने आप शरण हो जाता है और इसकी पद्धति यह है कि गुरुजनों का संत जनों का आश्रय ले तो श्रवण सुजस जब भगवान की महिमा सुनते हैं संसार का दुख देखते हैं तो आनंद सिंधु भगवान की तरफ बढ़ने की जो इच्छा होती है वही शरणागति जो आप बोलेंगे वही नाम जप जप करो नाम जप करो सब कुछ ठीक हो जाएगा इसी से राधा राधा राधा सब कुछ ठीक हो जाएगा प्राण के पति भी दुखी है थोड़ा सा उनका खानपान बेचारी तुम अपना संभालो अपने अपने कर्म को सब कोई भोगता है को काू के सुखदख कर दाता निज कृत कर्म भोग सुन भ्राता हे पति पुत्रा आदि ये प्याऊ में जैसे मिलते हैं 10 लोग ऐसे मिले हुए हैं समय आने पर सब अपनेप निकल जाएंगे यहां ना कोई किसी का पति है ना कोई किसी का पुत्र है ना कोई किसी की पत्नी है एक नाटक माया का चल रहा वही सच्चिदानंद भगवान सब रूपों में है।

अपने स्वरूप को भूलकर माया आकर्षित इसलिए बार-बार जन्म बार-बार मरण नाना प्रकार की योनियों का भोग भोगना पड़ रहा है। राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी आज तक हमने कभी मदिरा आदि का सेवन नहीं किया और अपने मन को संतुलित रखा है। जब भी किसी दोस्त या ऑफिस दोस्त ने हमें मजबूर किया है। परंतु जब हम अपने रिश्तेदारों ये सब के कारण हमें जड़, बुद्धि और पिछड़ी सोच का कहते हैं तो इस स्थिति में मन को संभालने के लिए क्या करें? नहीं आप गलत आचरण ना करें तो आपको जड़ बुद्धि का कहा जाएगा क्या?

मुझे लगता है उल्टा है। जड़ बुद्धि वह लोग हैं जो ऐसा करते हैं। विवेकवान वो हैं जो नहीं करते हैं। आखिरकार कहीं ना कहीं सत्य का आदर तो होता ही बच्चा। भले कोई प्रमादवश तुम्हें गलत कह दे लेकिन उनके भी हृदय में आदर होता है। अगर सत्य जड़ बुद्धि होता है तो हमारे पास एकांतिक में प्रश्न उत्तर करने कोई आए ही ना। जड़ बुद्धि से क्या बात करें? तो इसलिए हमें लगता है कि कोई हमें मूर्ख कहे या जड़ बुद्धि कहे या पुरानी रीति का कहे। देखो कुछ लोगों का भाव यह होता है कि अगर हम अंडा नहीं खाएंगे, मांस नहीं खाएंगे तो स्वस्थ नहीं रहेंगे।

अगर हम प्रसन्न है, सात्विक आहार है और सुंदर विचार है तो हमारा तन भी स्वस्थ रहेगा और मन भी स्वस्थ रहेगा। आप अच्छा दूर से देख के बताओ क्या हम आपको लगते हैं किडनी फेलियर है? नहीं। आप विचार करके देखो। क्यों? क्योंकि हम हर समय प्रसन्न रहते हैं। हम एक मिनट भी कभी किडनी फेलियर बन के नहीं बैठते। अब 1:00 बजे रात्रि से हमारी दिनचर्या चल रही या क्या किडनी फेलियर की चल रही? हर समय हमारा दिमाग भगवान की तरह। क्या आप नहीं लगा सकते? आप भी वैसे लगाइए। दुखों से लड़ना पड़ेगा।

दुखों को जीतना पड़ेगा। ये संसार दुखालयम है। संघर्ष करना पड़ेगा। संघर्ष हमारा जीवन है। तो हम ऐसे आनंदमय बने। यह हम इसलिए उदाहरण दे देते हैं अहंकार पुष्टता के लिए नहीं कि जिनको लगता है मंडा खाकर के मांस खा के बलवान बनेंगे। ब्रह्मचर्य पवित्र आहार तो संकल्प बल और शरीर बल दोनों बल पुष्ट होता है। किसी ने कहा कि महाराज जी यही प्रश्न किया था एकांत में कि आप और आपके चेले बड़े अष्टपुष्ट है। तो संयम अगर संयम है, नियम है तो देखो बीमार होते हुए भी पवित्रता और संयम के कारण हमको खुद महसूस होता है कि मैं बलवान हूं।

मुझे यह महसूस नहीं होता कि किडनी फेलियर ऐसे। नहीं हमें खुद महसूस होता है मुझे बल है और अगर अभी संयम बिगड़ जाए और भगवान का भरोसा छूट जाए तो डिप्रेशन में पहुंच जाओ। इतना कष्ट रहता है। तो हम ये कह रहे हैं कि अगर हमको कोई मूर्ख कहे, जड़ कहे और हम सही ढंग से चल रहे तो हमें हिलना नहीं चाहिए। हमें अपने मार्ग से हटना नहीं चाहिए। हमें बलवान होना चाहिए। और बहुत सुंदर जीवन जाएगा। यदि आप ऐसे चलोगे शराब पीने वाला, मांस खाने वाला, व्यभचार करने वाला आज भले स्वस्थ दिखाई दे रहा है लेकिन कल दुर्गति को प्राप्त होगा।

आप आज भले दुखी हो लेकिन कल आप सद्गति को प्राप्त होंगे। कल आप अच्छा जीवन व्यतीत करेंगे। इसलिए हमको अच्छे आचरणों में दृढ़ रहना चाहिए। सामने वाला निंदा करे तो भी। अगर सामने वाला निंदा कर रहा हो मैं गलत हूं तो सुधार करना चाहिए। बुरा नहीं मानना चाहिए। सामने वाला निंदा कर रहा मैं गलत नहीं हूं तब तो मुस्कुराना चाहिए। फिर शोक नहीं करना चाहिए कि वो कहे जड़ बुद्धि तो अपने को विद्वान दिखाने के लिए हम शराब पी लें। हम मांस खा लें। ऐसे गंदे आचरण नहीं करना चाहिए।

काफी बच्चे तो महाराज जी इसी उसमें आ जाते हैं। दबाव में आकर भी गलत आचरण करने लगते हैं। नहीं गलत है। गलत है। वो बच्चे वो बच्चे कम बुद्धि वाले हैं। प्रवीण बुद्धि अपने जीवन को गंदा ना करें। अधिकांश वैसे स्तर के हो गए हैं ना महाराज जी? देखो शराब जो है एक तो शास्त्र निषिद्ध है। शास्त्र रोकता है और दूसरी बात उसमें लाभ क्या है? प्राय हमने शराबी जनों को अपने धर्म से चित होते देखा है। जब आप शराब के नशे में होगे तो आपका बर्ताव ठीक नहीं होगा। आपके आचरण ठीक नहीं होंगे।

आपका चरित्र पवित्र नहीं होगा। और नालियों में तो पड़े आप देखते ही हो। नालियों में पड़े आप देखो नालियों में पड़े दिखाई देते। पैसा गया, स्वास्थ्य गया, इज्जत गई। भला ऐसा क्यों? जब हमारे शास्त्र रोकते हैं तो शराब नहीं पीना चाहिए। और जब तक ब्याह ना हो तब तक ब्रह्मचर्य से रहो। ब्याह हो जाए तो एक पत्नी व्रत धारण करो। ये जो चला है ना गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड ये बहुत नरक है। बहुत अपवित्र जीवन पूरी गृहस्ती को चौपट कर देने वाला जीवन है। मान लो जो बच्ची बच्चा दो चार बच्ची बच्चों से संबंध रखते हैं वो कभी ब्याह करके एक में टिक पाएंगे क्या?

उनकी गंदी आदत बनी रहेगी। उनका जीवन व्यर्थ हो जाएगा। गृहस्ती संबंध टूट जाएंगे। इसीलिए नए-नए ब्याह होते हैं। डिवोर्स हो जाता है। यह कोई जीवन है? अरे जीवन है कि चलो अब लो निशानी अब ना नश हो। एक दो बार गलती हो गई। अब पति प्राप्त हो गया तो अब बहुत धर्म से रहे या पत्नी प्राप्त हो गई तो धर्म से रहे। लेकिन आजकल शराब पीना और नया-नया व्यभचार करना और जैसे बने वैसे धन कमाना। यही उद्देश्य रह गया है। गृहस्ती के लिए ब्रह्मचर्य क्या नियम होना चाहिए महाराज? मासिक धर्म के आठ दिन बाद एक बार केवल संयोग कर सकता है।

शास्त्री पद्धति के महीने में एक बार महीने में एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु जी से पूछा कि हमारा ब्याह हुआ तो कैसे चले? उनका वर्ष में एक बार उनका कहा ऐसा तो नहीं रह पाएंगे गृहस्थ में तो उनका छ महीने में एक बार उनका कहा यह भी नहीं रह पाएंगे तब फिर ये शास्त्री पद्धति बताई महीने में एक बार शास्त्री पद्धति है महीने में एक बार अब सोचो आजकल नए-नए बच्चे कितने आके बता गए कि पांच बार हस्तमैथुन आठ बार हस्तमैथुन ये जिंदा रह रहे हैं यही बड़ी बात है एक मन द्रवित पदार्थ सहित एक मन कहते हैं 40 किलो को 40 किलो अन्न और पानी और दूध सब कुछ मिलाकर जब पचता है तब एक बार संतान उत्पन्न करने की योग्यता का वीर्य बनता है और जो लोग ऐसे नष्ट करते हैं उनकी जीवनी क्या होगी इसलिए वह ब्रह्मचारी ही माना जाएगा गृहस्थ जो एक पत्नी व्रत है वो महीने में एक बार संयोग करता है संतान उत्पत्ति के लिए शास्त्र आज्ञा जो है शेष समय ब्रह्मचारी संतान उत्पत्ति का उद्देश्य नहीं है फिर नहीं करना चाहिए व्यभचार के लिए आदेश नहीं है।

नहीं शास्त्रीय आदेश नहीं है। बका उसको पाप लगेगा नहीं। जी अगर वो महीने में एक बार संयोग करता है तो पाप नहीं लगेगा। पाप का अधिकारी नहीं है। लेकिन शास्त्र आदेश नहीं है। शास्त्र आदेश केवल संतानोत्पत्ति के लिए है। शेष समय ब्रह्मचर्य रहकर भगवत आराधन करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना। और संतान हो जाने के बाद फिर तो पूर्ण ब्रह्मचारी हां पूर्ण ब्रह्मचारी क्योंकि ब्रह्मचर्य गृहस्थ वानप्रस्थ सन्यास अर्थात हमारे चार पुरुषार्थ है धर्म अर्थ काम मोक्ष तो हमारा लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति भी है।

वो इंद्रियों का विलास जब बंद होगा तभी तो हम मुक्त अवस्था की तरफ जा पाएंगे। तो हमको ये चाहिए कि 40 तक हिसाब किताब बराबर कर ले गृहस्ती का। इसके बाद भगवान की प्राप्ति का पूरा कमर कस के लग जाना चाहिए। गृहस्ती में भी रहे तो तो फिर बात बन जाती है। अब तो 30 40 में तो ब्याह लोग करना शुरू कर दिए। 30 में तो ब्याह करना और हमें लगता है कि 30 तक तो 10 12 वर्ष का लड़का बच्चा हो जाता था। तो वही ठीक है। आप जब वृद्धावस्था की तब पदार्पण कर रहे तो गृहस्ती संभालने लायक हो गए।

ये हमारा जो क्रम था शास्त्री वो बहुत बढ़िया था। बहुत बढ़िया था। उससे बहुत मर्यादा अब जैसे लड़के और लड़कियां नई अवस्था को प्राप्त हुई। उनका ब्याह हो गया। उनको मिल गया जीवन साथी तो इसलिए भटकना व्यभचार करना ये हो नहीं पाया जीवन में और वो आजीवन अपने पति को भगवान मानकर निर्वाह किए या अपनी पत्नी को प्राण मानकर निर्वाह किए। अब क्या हो रहा है? ये जो बॉयफ्रेंड ब्रेकअप बॉयफ्रेंड ब्रेकअप ये है क्या? मतलब ये है क्या? कितनी गंदी बात है। अपने शरीर को हम अपवित्र कर रहे हैं।

अभी बच्चे हैं जानते हैं नहीं। खुले लिविंग रिलेशन क्या है? खुले में देखो लिव इन रिलेशन क्या है? व्यभचार खुला व्यभचार ये हमारा धर्म तो नहीं है। भारत देश का धर्म नहीं। भारत देश के शास्त्रों का भारत देश में तो एक एक बार हाथ पकड़ा पाणिग्रह आजीवन निर्वाह किया। और कितना सुंदर है। कम से कम आप आप यह तो कह सकते हो मेरा लड़का है। अब पता ही नहीं है ना जब आप कहीं से मिल रहे हो आप कहीं मिल रहे हो तो हमारे पितरों को जल कौन देगा? जब हमारी संतान ही नहीं तो जल कौन देगा?

जब कुल परंपरागत इसीलिए बहुत पवित्र रखा जाता था शरीरों को कि हमारी हमारा उद्देश्य संतान उत्पन्न करना केवल भोग के लिए थोड़ी है। अब यह सब कोई बातें मानना चाहिए तो भगवान की कृपा को कि आप लोग कृपा करके सुन रहे हैं संत बातें नहीं कौन टीवी देखे गंदी बातें देखे मनमानी आचरण किए साधु समाज या शास्त्र सम्मत बात सुनना ही लोगों को पसंद नहीं ये तो भगवान की कृपा है कि इस समय लोग सुनना चालू कर दिए कि चलो सुन रहे हैं और मान भी रहे हमें लगता है मान भी रहे हैं सुधर भी रहे इसलिए हम बड़ा एहसान मानते हैं अपने देशवासियों का कि हमारी बात सुन रहे हैं मान रहे हैं हमारे ऊपर एहसान कर रहे हैं।

हमारा जीवन धन्य हो रहा है कि आपका जीवन धन्य हो गया तो हमारा जीवन धन्य हो गया। हमारा बोलना सार्थक हो गया।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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